रुद्र संहिता · अध्याय 47
यज्ञ-प्रारम्भ वर्णन
श्लोक 1 (shiva.rudra.47.1)
ब्रह्मोवाच । एकदा तु मुने तेन यज्ञः प्रारम्भितो महान् । तत्राहूतास्तदा सर्वे दीक्षितेन सुरर्षयः
brahmovāca | ekadā tu mune tena yajñaḥ prārambhito mahān | tatrāhūtāstadā sarve dīkṣitena surarṣayaḥ
ब्रह्मा ने कहा — हे मुने! एक बार उस दक्ष ने एक महान यज्ञ आरम्भ किया; दीक्षा ग्रहण किये हुए उस दक्ष ने उस यज्ञ में उस समय समस्त देवर्षियों को आमन्त्रित किया।
श्लोक 2 (shiva.rudra.47.2)
महर्षयोऽखिलास्तत्र निर्जराश्च समागताः । यद्यज्ञकरणार्थं हि शिवमायाविमोहिताः
maharṣayo'khilāstatra nirjarāśca samāgatāḥ | yadyajñakaraṇārthaṁ hi śivamāyāvimohitāḥ
वहाँ समस्त महर्षि तथा देवगण, शिव की माया से मोहित होकर, उस यज्ञ को सम्पन्न करने के लिए एकत्रित हुए।
श्लोक 3 (shiva.rudra.47.3)
अगस्त्यः कश्यपोऽत्रिश्च वामदेवस्तथा भृगुः । दधीचिर्भगवान् व्यासो भारद्वाजोऽथ गौतमः
agastyaḥ kaśyapo'triśca vāmadevastathā bhṛguḥ | dadhīcirbhagavān vyāso bhāradvājo'tha gautamaḥ
अगस्त्य, कश्यप, अत्रि, वामदेव, भृगु, भगवान् दधीचि, व्यास, भारद्वाज तथा गौतम —
श्लोक 4 (shiva.rudra.47.4)
पैलः पराशरो गर्गो भार्गवः ककुभः सितः । सुमन्तुत्रिककङ्काश्च वैशम्पायन एव च
pailaḥ parāśaro gargo bhārgavaḥ kakubhaḥ sitaḥ | sumantutrikakaṅkāśca vaiśampāyana eva ca
— पैल, पराशर, गर्ग, भार्गव, ककुभ, सित, सुमन्तु, त्रिक, कंक, तथा वैशम्पायन —
श्लोक 5 (shiva.rudra.47.5)
एते चान्ये च बहवो मुनयो हर्षिता ययुः । मम पुत्रस्य दक्षस्य सदाराः ससुता मखम्
ete cānye ca bahavo munayo harṣitā yayuḥ | mama putrasya dakṣasya sadārāḥ sasutā makham
— ये तथा अन्य अनेक मुनि, अपनी-अपनी पत्नियों और पुत्रों सहित, हर्षपूर्वक मेरे पुत्र दक्ष के उस यज्ञ में गये।
श्लोक 6 (shiva.rudra.47.6)
तथा सर्वे सुरगणा लोकपाला महोदयाः । तथोपनिर्जराः सर्वे स्वोपकारबलान्विताः
tathā sarve suragaṇā lokapālā mahodayāḥ | tathopanirjarāḥ sarve svopakārabalānvitāḥ
उसी प्रकार समस्त देवगण, महान् ऐश्वर्यशाली लोकपाल, तथा अपने-अपने सामर्थ्य से युक्त सभी उपदेवगण भी वहाँ गये।
श्लोक 7 (shiva.rudra.47.7)
सत्यलोकात्समानीतो नुतोऽहं विश्वकारकः । ससुतः सपरीवारो मूर्तवेदादिसंयुतः
satyalokātsamānīto nuto'haṁ viśvakārakaḥ | sasutaḥ saparīvāro mūrtavedādisaṁyutaḥ
मुझे भी, विश्व के रचयिता, सत्यलोक से पुत्रों और परिवार सहित, तथा साक्षात् मूर्तिमान वेदों आदि सहित बुलाया गया, और मेरी स्तुति की गयी।
श्लोक 8 (shiva.rudra.47.8)
वैकुण्ठाच्च तथा विष्णुः सम्प्रार्थ्य विविधादरात् । सपार्षदपरीवारः समानीतो मखं प्रति
vaikuṇṭhācca tathā viṣṇuḥ samprārthya vividhādarāt | sapārṣadaparīvāraḥ samānīto makhaṁ prati
उसी प्रकार वैकुण्ठ से भी अनेक प्रकार के आदरपूर्वक प्रार्थना कर, अपने पार्षदों और परिवार सहित विष्णु को उस यज्ञ के लिए लाया गया।
श्लोक 9 (shiva.rudra.47.9)
एवमन्ये समायाता दक्षयज्ञं विमोहिताः । सत्कृतास्तेन दक्षेण सर्वे ते हि दुरात्मना
evamanye samāyātā dakṣayajñaṁ vimohitāḥ | satkṛtāstena dakṣeṇa sarve te hi durātmanā
इसी प्रकार मोहित होकर अन्य भी अनेक लोग दक्ष के उस यज्ञ में आये; उस दुरात्मा दक्ष ने उन सभी का सत्कार किया।
श्लोक 10 (shiva.rudra.47.10)
भवनानि महार्हाणि सुप्रभाणि महान्ति च । त्वष्ट्रा कृतानि दिव्यानि तेभ्यो दत्तानि तेन वै
bhavanāni mahārhāṇi suprabhāṇi mahānti ca | tvaṣṭrā kṛtāni divyāni tebhyo dattāni tena vai
त्वष्टा द्वारा निर्मित अत्यंत मूल्यवान, अत्यंत तेजस्वी, विशाल तथा दिव्य भवन उन सबको उसने प्रदान किए।
श्लोक 11 (shiva.rudra.47.11)
तेषु सर्वेषु धिष्ण्येषु यथायोग्यं च संस्थिताः । सन्मानिता अराजंस्ते सकला विष्णुना मया
teṣu sarveṣu dhiṣṇyeṣu yathāyogyaṁ ca saṁsthitāḥ | sanmānitā arājaṁste sakalā viṣṇunā mayā
उन सभी निवास-स्थानों में यथोचित रूप से स्थित होकर, विष्णु और मुझसे सम्मानित होकर, वे सब वहाँ शोभायमान हुए।
श्लोक 12 (shiva.rudra.47.12)
वर्तमाने महायज्ञे तीर्थे कनखले तदा । ऋत्विजश्च कृतास्तेन भृग्वाद्याश्च तपोधनाः
vartamāne mahāyajñe tīrthe kanakhale tadā | ṛtvijaśca kṛtāstena bhṛgvādyāśca tapodhanāḥ
कनखल तीर्थ में उस समय चल रहे उस महायज्ञ में, भृगु आदि तपोधन मुनियों को उसने ऋत्विज़ बनाया।
श्लोक 13 (shiva.rudra.47.13)
अधिष्ठाता स्वयं विष्णुः सह सर्वमरुद्गणैः । अहं तत्राभवं ब्रह्मा त्रयीविधिनिदर्शकः
adhiṣṭhātā svayaṁ viṣṇuḥ saha sarvamarudgaṇaiḥ | ahaṁ tatrābhavaṁ brahmā trayīvidhinidarśakaḥ
उसके अध्यक्ष स्वयं विष्णु समस्त मरुद्गणों सहित बने, और मैं ब्रह्मा वहाँ तीनों वेदों की विधि दिखाने वाला बना।
श्लोक 14 (shiva.rudra.47.14)
तथैव सर्वे दिक्पाला द्वारपालाश्च रक्षकाः । सायुधाः सपरीवाराः कुतूहलकराः सदा
tathaiva sarve dikpālā dvārapālāśca rakṣakāḥ | sāyudhāḥ saparīvārāḥ kutūhalakarāḥ sadā
उसी प्रकार समस्त दिक्पाल, द्वारपाल तथा रक्षक, शस्त्रों और परिवार सहित, सदैव कौतूहल उत्पन्न करते हुए वहाँ उपस्थित थे।
श्लोक 15 (shiva.rudra.47.15)
उपतस्थे स्वयं यज्ञः सुरूपस्तस्य चाध्वरे । सर्वे महामुनिश्रेष्ठाः स्वयं वेदधराभवन्
upatasthe svayaṁ yajñaḥ surūpastasya cādhvare | sarve mahāmuniśreṣṭhāḥ svayaṁ vedadharābhavan
उस यज्ञ में साक्षात् यज्ञ-देवता ही सुन्दर रूप धारण कर उपस्थित हुए, तथा समस्त महामुनिश्रेष्ठ स्वयं वेदों के धारक बने।
श्लोक 16 (shiva.rudra.47.16)
तनूनपादपि निजं चक्रे रूपं सहस्रशः । हविषां ग्रहणायाशु तस्मिन् यज्ञे महोत्सवे
tanūnapādapi nijaṁ cakre rūpaṁ sahasraśaḥ | haviṣāṁ grahaṇāyāśu tasmin yajñe mahotsave
उस महोत्सव-रूप यज्ञ में, हवि ग्रहण करने के लिए तनूनपात् ने भी सहस्रों रूप धारण कर लिए।
श्लोक 17 (shiva.rudra.47.17)
अष्टाशीतिसहस्राणि जुह्वति सह ऋत्विजः । उद्गातारश्चतुःषष्टिसहस्राणि सुरर्षयः
aṣṭāśītisahasrāṇi juhvati saha ṛtvijaḥ | udgātāraścatuḥṣaṣṭisahasrāṇi surarṣayaḥ
अठासी हजार देवर्षि ऋत्विजों के साथ हवन कर रहे थे, तथा चौंसठ हजार देवर्षि उद्गाता बने।
श्लोक 18 (shiva.rudra.47.18)
अध्वर्यवोऽथ होतारस्तावन्तो नारदादयः । सप्तर्षयः समा गाथाः कुर्वन्ति स्म पृथक्पृथक्
adhvaryavo'tha hotārastāvanto nāradādayaḥ | saptarṣayaḥ samā gāthāḥ kurvanti sma pṛthakpṛthak
नारद आदि उतनी ही संख्या में अध्वर्यु तथा होता बने, और सातों ऋषि पृथक्-पृथक् समान रूप से यज्ञ-गाथाएँ गा रहे थे।
श्लोक 19 (shiva.rudra.47.19)
गन्धर्वविद्याधरसिद्धसङ्घा- नादित्यसङ्घान् सगणान् सयज्ञान् । सङ्ख्यावतान्नागचरान् समस्तान् वव्रे स दक्षो हि महाध्वरे स्वे
gandharvavidyādharasiddhasaṅghā- nādityasaṅghān sagaṇān sayajñān | saṅkhyāvatānnāgacarān samastān vavre sa dakṣo hi mahādhvare sve
दक्ष ने अपने उस महायज्ञ में गन्धर्वों, विद्याधरों तथा सिद्धों के समूहों को, आदित्यों के समूहों को उनके गणों सहित, यज्ञ करने वाले सांख्यवादियों को, तथा नागचारी सबको आमन्त्रित किया।
श्लोक 20 (shiva.rudra.47.20)
द्विजर्षिराजर्षिसुरर्षिसङ्घा नृपाः समित्राः सचिवाः ससैन्याः । वसुप्रमुख्या गणदेवताश्च सर्वे वृतास्तेन मखोपवेत्त्रा
dvijarṣirājarṣisurarṣisaṅghā nṛpāḥ samitrāḥ sacivāḥ sasainyāḥ | vasupramukhyā gaṇadevatāśca sarve vṛtāstena makhopavettrā
द्विज-ऋषियों, राजर्षियों, देवर्षियों के समूह, मित्रों और मन्त्रियों सहित राजा, सेना सहित, वसु आदि प्रमुख गणदेवता — इन सबको उस यज्ञ के आयोजक दक्ष ने आमन्त्रित किया।
श्लोक 21 (shiva.rudra.47.21)
दीक्षायुक्तस्तदा दक्षः कृतकौतुकमङ्गलः । भार्यया सहितो रेजे कृतस्वस्त्ययनो भृशम्
dīkṣāyuktastadā dakṣaḥ kṛtakautukamaṅgalaḥ | bhāryayā sahito reje kṛtasvastyayano bhṛśam
दीक्षा से युक्त, मंगल-कौतुक सम्पन्न किये हुए दक्ष अपनी पत्नी सहित, स्वस्त्ययन कर्म पूर्ण करके, अत्यंत शोभायमान हो रहा था।
श्लोक 22 (shiva.rudra.47.22)
तस्मिन् यज्ञे वृतः शम्भुर्न दक्षेण दुरात्मना । कपालीति विनिश्चित्य तस्य यज्ञार्हता न हि
tasmin yajñe vṛtaḥ śambhurna dakṣeṇa durātmanā | kapālīti viniścitya tasya yajñārhatā na hi
उस दुरात्मा दक्ष ने उस यज्ञ में शम्भु को आमन्त्रित नहीं किया; उसने यह निश्चय कर लिया था कि कपाली शिव यज्ञ में भाग पाने के योग्य नहीं है।
श्लोक 23 (shiva.rudra.47.23)
कपालिभार्येति सती दयिता स्वसुतापि च । नाहूता यज्ञविषये दक्षेणागुणदर्शिना
kapālibhāryeti satī dayitā svasutāpi ca | nāhūtā yajñaviṣaye dakṣeṇāguṇadarśinā
दोष ही देखने वाले दक्ष ने अपनी प्रिय पुत्री सती को भी, "यह कपाली की पत्नी है" यह सोचकर, उस यज्ञ में नहीं बुलाया।
श्लोक 24 (shiva.rudra.47.24)
एवं प्रवर्तमाने हि दक्षयज्ञे महोत्सवे । स्वकार्यलग्नास्तत्रासन् सर्वे तेऽध्वरसम्मताः
evaṁ pravartamāne hi dakṣayajñe mahotsave | svakāryalagnāstatrāsan sarve te'dhvarasammatāḥ
इस प्रकार दक्ष के उस महोत्सव-रूप यज्ञ के चलते रहने पर, यज्ञ में सम्मानित वे सभी लोग अपने-अपने कार्यों में लीन रहे।
श्लोक 25 (shiva.rudra.47.25)
एतस्मिन्नन्तरेऽदृष्ट्वा तत्र वै शङ्करं प्रभुम् । प्रोद्विग्नमानसः शैवो दधीचो वाक्यमब्रवीत्
etasminnantare'dṛṣṭvā tatra vai śaṅkaraṁ prabhum | prodvignamānasaḥ śaivo dadhīco vākyamabravīt
इसी बीच वहाँ प्रभु शंकर को न देखकर, शिव-भक्त दधीचि का मन अत्यंत व्याकुल हो गया, और उन्होंने यह वचन कहा।
श्लोक 26 (shiva.rudra.47.26)
दधीच उवाच । सर्वे शृणुत मद्वाक्यं देवर्षिप्रमुखा मुदा । कस्मान्नैवागतः शम्भुरस्मिन् यज्ञे महोत्सवे
dadhīca uvāca | sarve śṛṇuta madvākyaṁ devarṣipramukhā mudā | kasmānnaivāgataḥ śambhurasmin yajñe mahotsave
दधीचि ने कहा — हे देवर्षि-प्रमुखो! तुम सब हर्षपूर्वक मेरे वचन सुनो — इस महोत्सव-रूप यज्ञ में शम्भु क्यों नहीं पधारे?
श्लोक 27 (shiva.rudra.47.27)
एते सुरेशा मुनयो महत्तराः सलोकपालाश्च समागता हि । तथापि यज्ञस्तु न शोभते भृशं पिनाकिना तेन महात्मना विना
ete sureśā munayo mahattarāḥ salokapālāśca samāgatā hi | tathāpi yajñastu na śobhate bhṛśaṁ pinākinā tena mahātmanā vinā
ये सभी देवेश, महान मुनि, तथा लोकपाल सहित सभी यहाँ एकत्रित हुए हैं; फिर भी उस महात्मा पिनाकधारी शिव के बिना यह यज्ञ तनिक भी शोभा नहीं पा रहा है।
श्लोक 28 (shiva.rudra.47.28)
येनैव सर्वाण्यपि मङ्गलानि भवन्ति शंसन्ति महाविपश्चितः । सोऽसौ न दृष्टोऽत्र पुमान् पुराणो वृषध्वजो नीलगलः परेशः
yenaiva sarvāṇyapi maṅgalāni bhavanti śaṁsanti mahāvipaścitaḥ | so'sau na dṛṣṭo'tra pumān purāṇo vṛṣadhvajo nīlagalaḥ pareśaḥ
महान विद्वान जिसकी कृपा से समस्त मंगल-कार्य सम्पन्न होते हैं, ऐसा बताते हैं — वह पुरातन पुरुष, वृषभध्वज, नीलकंठ परमेश्वर यहाँ नहीं दिखायी दे रहा है।
श्लोक 29 (shiva.rudra.47.29)
अमङ्गलान्येव च मङ्गलानि भवन्ति येनाधिगतानि दक्ष । त्रिपञ्चकेनाप्यथ मङ्गलानि भवन्ति सद्यः परतः पराणि
amaṅgalānyeva ca maṅgalāni bhavanti yenādhigatāni dakṣa | tripañcakenāpyatha maṅgalāni bhavanti sadyaḥ parataḥ parāṇi
हे दक्ष! जिसकी प्राप्ति से अमंगल भी मंगल में बदल जाता है, उसी की कृपा से पंद्रह प्रकार के भी शुभ कार्य तत्काल परम श्रेष्ठ फल देने वाले बन जाते हैं।
श्लोक 30 (shiva.rudra.47.30)
तस्मात्त्वयैव कर्तव्यमाह्वानं परमेशितुः । त्वरितं ब्रह्मणा वापि विष्णुना प्रभुविष्णुना
tasmāttvayaiva kartavyamāhvānaṁ parameśituḥ | tvaritaṁ brahmaṇā vāpi viṣṇunā prabhuviṣṇunā
अतः तुम्हें ही उस परमेश्वर का आह्वान करना चाहिए, अथवा शीघ्र ब्रह्मा के द्वारा या स्वयं प्रभु विष्णु के द्वारा भी वह आह्वान करवाना चाहिए।
श्लोक 31 (shiva.rudra.47.31)
इन्द्रेण लोकपालैश्च द्विजैः सिद्धैः सहाधुना । सर्वथानयनीयोऽसौ शङ्करो यज्ञपूर्तये
indreṇa lokapālaiśca dvijaiḥ siddhaiḥ sahādhunā | sarvathānayanīyo'sau śaṅkaro yajñapūrtaye
इन्द्र, लोकपालों, द्विजों तथा सिद्धों के साथ अभी इस यज्ञ को पूर्ण करने के लिए हर प्रकार से शंकर को यहाँ लाना ही चाहिए।
श्लोक 32 (shiva.rudra.47.32)
सर्वैर्भवद्भिर्गन्तव्यं यत्र देवो महेश्वरः । दाक्षायण्या समं शम्भुमानयध्वं त्वरान्विताः
sarvairbhavadbhirgantavyaṁ yatra devo maheśvaraḥ | dākṣāyaṇyā samaṁ śambhumānayadhvaṁ tvarānvitāḥ
आप सब को वहाँ जाना चाहिए, जहाँ देव महेश्वर हैं; शीघ्रता से जाकर दाक्षायणी सहित शम्भु को यहाँ ले आओ।
श्लोक 33 (shiva.rudra.47.33)
तेन सर्वं पवित्रं स्याच्छम्भुना परमात्मना । अत्रागतेन देवेशाः साम्बेन परमात्मना
tena sarvaṁ pavitraṁ syācchambhunā paramātmanā | atrāgatena deveśāḥ sāmbena paramātmanā
हे देवेशो! उन परमात्मा शम्भु के, अपनी अम्बिका सहित, यहाँ आने से ही यह सब कुछ पवित्र होगा।
श्लोक 34 (shiva.rudra.47.34)
यस्य स्मृत्या च नामोक्त्या समग्रं सुकृतं भवेत् । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन ह्यानेतव्यो वृषध्वजः
yasya smṛtyā ca nāmoktyā samagraṁ sukṛtaṁ bhavet | tasmātsarvaprayatnena hyānetavyo vṛṣadhvajaḥ
जिनके स्मरण मात्र से और नाम-उच्चारण से ही सम्पूर्ण शुभ कर्म सम्पन्न हो जाता है, उन्हीं वृषभध्वज को समस्त प्रयत्न करके यहाँ लाना चाहिए।
श्लोक 35 (shiva.rudra.47.35)
समागते शङ्करेऽत्र पावनो हि भवेन्मखः । भविष्यत्यन्यथापूर्णः सत्यमेतद् ब्रवीम्यहम्
samāgate śaṅkare'tra pāvano hi bhavenmakhaḥ | bhaviṣyatyanyathāpūrṇaḥ satyametad bravīmyaham
शंकर के यहाँ पधारने पर ही यह यज्ञ पवित्र होगा; अन्यथा यह अपूर्ण ही रहेगा — मैं यह सत्य कहता हूँ।
श्लोक 36 (shiva.rudra.47.36)
ब्रह्मोवाच । तस्य तद्वचनं श्रुत्वा दक्षो रोषसमन्वितः । उवाच त्वरितं मूढः प्रहसन्निव दुष्टधीः
brahmovāca | tasya tadvacanaṁ śrutvā dakṣo roṣasamanvitaḥ | uvāca tvaritaṁ mūḍhaḥ prahasanniva duṣṭadhīḥ
ब्रह्मा ने कहा — उनके इस वचन को सुनकर, दक्ष क्रोध से भर उठा, और वह मूर्ख, दुष्ट-बुद्धि, मानो हँसते हुए तुरन्त बोला।
श्लोक 37 (shiva.rudra.47.37)
मूलं विष्णुर्देवतानां यत्र धर्मः सनातनः । समानीतो मया सम्यक् किमूनं यज्ञकर्मणि
mūlaṁ viṣṇurdevatānāṁ yatra dharmaḥ sanātanaḥ | samānīto mayā samyak kimūnaṁ yajñakarmaṇi
देवताओं के मूल विष्णु, जिनमें सनातन धर्म प्रतिष्ठित है, उन्हें मैंने भलीभाँति बुलाया है; इस यज्ञ-कर्म में और क्या कमी रह गयी है?
श्लोक 38 (shiva.rudra.47.38)
यस्मिन् वेदाश्च यज्ञाश्च कर्माणि विविधानि च । प्रतिष्ठितानि सर्वाणि सोऽसौ विष्णुरिहागतः
yasmin vedāśca yajñāśca karmāṇi vividhāni ca | pratiṣṭhitāni sarvāṇi so'sau viṣṇurihāgataḥ
जिनमें वेद, यज्ञ तथा विविध कर्म — ये सभी प्रतिष्ठित हैं, वे ही विष्णु यहाँ पधारे हुए हैं।
श्लोक 39 (shiva.rudra.47.39)
सत्यलोकात्समायातो ब्रह्मा लोकपितामहः । वेदैः सोपनिषद्भिश्च विविधैरागमैः सह
satyalokātsamāyāto brahmā lokapitāmahaḥ | vedaiḥ sopaniṣadbhiśca vividhairāgamaiḥ saha
लोक-पितामह ब्रह्मा भी सत्यलोक से उपनिषदों सहित वेदों तथा विविध आगमों के साथ यहाँ पधारे हैं।
श्लोक 40 (shiva.rudra.47.40)
तथा सुरगणैः साकमागतः सुरराट् स्वयम् । तथा यूयं समायाता ऋषयो वीतकल्मषाः
tathā suragaṇaiḥ sākamāgataḥ surarāṭ svayam | tathā yūyaṁ samāyātā ṛṣayo vītakalmaṣāḥ
उसी प्रकार देवराज इन्द्र भी स्वयं देवगणों सहित पधारे हैं, और तुम सभी निष्पाप ऋषिगण भी यहाँ पधारे हैं।
श्लोक 41 (shiva.rudra.47.41)
ये ये यज्ञोचिताः शान्ताः पात्रभूताः समागताः । वेदवेदार्थतत्त्वज्ञाः सर्वे यूयं दृढव्रताः
ye ye yajñocitāḥ śāntāḥ pātrabhūtāḥ samāgatāḥ | vedavedārthatattvajñāḥ sarve yūyaṁ dṛḍhavratāḥ
यज्ञ के योग्य, शान्त, तथा पात्रता से युक्त जो भी लोग यहाँ आये हैं — तुम सब वेद और वेदार्थ के तत्त्वज्ञ, दृढ़-व्रती हैं।
श्लोक 42 (shiva.rudra.47.42)
अत्रैव च किमस्माकं रुद्रेणापि प्रयोजनम् । कन्या दत्ता मया विप्र ब्रह्मणा नोदितेन हि
atraiva ca kimasmākaṁ rudreṇāpi prayojanam | kanyā dattā mayā vipra brahmaṇā noditena hi
तो फिर यहाँ हमें रुद्र से क्या प्रयोजन है? हे विप्रो! मैंने अपनी कन्या ब्रह्मा की प्रेरणा से ही उसे दी थी।
श्लोक 43 (shiva.rudra.47.43)
हरोऽकुलीनोऽसौ विप्र पितृमातृविवर्जितः । भूतप्रेतपिशाचानां पतिरेको दुरत्ययः
haro'kulīno'sau vipra pitṛmātṛvivarjitaḥ | bhūtapretapiśācānāṁ patireko duratyayaḥ
हे विप्रो! यह हर कुलहीन है, माता-पिता से रहित है, तथा केवल भूत-प्रेत-पिशाचों का ही दुर्जेय स्वामी है।
श्लोक 44 (shiva.rudra.47.44)
आत्मसम्भावितो मूढः स्तब्धो मौनी समत्सरः । कर्मण्यस्मिन्न योग्योऽसौ नानीतो हि मयाधुना
ātmasambhāvito mūḍhaḥ stabdho maunī samatsaraḥ | karmaṇyasminna yogyo'sau nānīto hi mayādhunā
वह मूर्ख अपने आपको ही महान मानता है, अकड़ू, मौन रहने वाला तथा द्वेषी है; इसी कारण मैंने उसे इस कर्म के लिए योग्य न समझते हुए अभी नहीं बुलाया है।
श्लोक 45 (shiva.rudra.47.45)
तस्मात्त्वयेदृशं वाक्यं पुनर्वाच्यं न हि क्वचित् । सर्वैर्भवद्भिः कर्तव्यो यज्ञो मे सफलो महान्
tasmāttvayedṛśaṁ vākyaṁ punarvācyaṁ na hi kvacit | sarvairbhavadbhiḥ kartavyo yajño me saphalo mahān
अतः तुम्हें ऐसा वचन फिर कभी नहीं कहना चाहिए; तुम सब मिलकर मेरे इस महान यज्ञ को सफल बनाओ।
श्लोक 46 (shiva.rudra.47.46)
ब्रह्मोवाच । एतच्छ्रुत्वा वचस्तस्य दधीचिर्वाक्यमब्रवीत् । सर्वेषां शृण्वतां देवमुनीनां सारसंयुतम्
brahmovāca | etacchrutvā vacastasya dadhīcirvākyamabravīt | sarveṣāṁ śṛṇvatāṁ devamunīnāṁ sārasaṁyutam
ब्रह्मा ने कहा — दक्ष के इस वचन को सुनकर, दधीचि ने समस्त देवताओं और मुनियों के सुनते हुए यह सारगर्भित वचन कहा।
श्लोक 47 (shiva.rudra.47.47)
दधीच उवाच । अयज्ञोऽयं महाजातो विना तेन शिवेन हि । विनाशोऽपि विशेषेण ह्यत्र ते हि भविष्यति
dadhīca uvāca | ayajño'yaṁ mahājāto vinā tena śivena hi | vināśo'pi viśeṣeṇa hyatra te hi bhaviṣyati
दधीचि ने कहा — शिव के बिना यह महान यज्ञ यज्ञ ही नहीं, बल्कि अयज्ञ बन गया है; तुम्हारा इसमें विशेष रूप से विनाश ही होगा।
श्लोक 48 (shiva.rudra.47.48)
एवमुक्त्वा दधीचोऽसावेक एव विनिर्गतः । यज्ञवाटाच्च दक्षस्य त्वरितः स्वाश्रमं ययौ
evamuktvā dadhīco'sāveka eva vinirgataḥ | yajñavāṭācca dakṣasya tvaritaḥ svāśramaṁ yayau
ऐसा कहकर दधीचि अकेले ही वहाँ से निकल गये, और दक्ष के उस यज्ञ-प्रांगण से शीघ्र अपने आश्रम को चले गये।
श्लोक 49 (shiva.rudra.47.49)
ततोऽन्ये शाङ्करा ये च मुख्याः शिवमतानुगाः । निर्ययुः स्वाश्रमान् सद्यः शापं दत्त्वा तथैव च
tato'nye śāṅkarā ye ca mukhyāḥ śivamatānugāḥ | niryayuḥ svāśramān sadyaḥ śāpaṁ dattvā tathaiva ca
तत्पश्चात् अन्य जो भी प्रमुख शिव-भक्त, शैव-मत के अनुयायी वहाँ थे, वे भी उसी प्रकार शाप देकर तत्काल अपने-अपने आश्रमों को चले गये।
श्लोक 50 (shiva.rudra.47.50)
मुनौ विनिर्गते तस्मिन् मखादन्येषु दुष्टधीः । शिवद्रोही मुनीन् दक्षः प्रहसन्निदमब्रवीत्
munau vinirgate tasmin makhādanyeṣu duṣṭadhīḥ | śivadrohī munīn dakṣaḥ prahasannidamabravīt
उन मुनि के तथा अन्य लोगों के उस यज्ञ से चले जाने पर, दुष्ट-बुद्धि, शिव-द्रोही दक्ष उन मुनियों के विषय में हँसते हुए यह बोला।
श्लोक 51 (shiva.rudra.47.51)
दक्ष उवाच । गतः शिवप्रियो विप्रो दधीचो नाम नामतः । अन्ये तथाविधा ये च गतास्ते मम चाध्वरात्
dakṣa uvāca | gataḥ śivapriyo vipro dadhīco nāma nāmataḥ | anye tathāvidhā ye ca gatāste mama cādhvarāt
दक्ष ने कहा — शिव का प्रिय, दधीचि नामक ब्राह्मण चला गया, और अन्य भी जो वैसे ही थे, वे सब मेरे इस यज्ञ से चले गये।
श्लोक 52 (shiva.rudra.47.52)
एतच्छुभतरं जातं सम्मतं मे हि सर्वथा । सत्यं ब्रवीमि देवेश सुराश्च मुनयस्तथा
etacchubhataraṁ jātaṁ sammataṁ me hi sarvathā | satyaṁ bravīmi deveśa surāśca munayastathā
यह तो और भी शुभ हुआ, यह मुझे सर्वथा स्वीकार्य है; हे देवेशो! हे मुनियो! मैं सत्य कहता हूँ।
श्लोक 53 (shiva.rudra.47.53)
विनष्टचित्ता मन्दाश्च मिथ्यावादरताः खलाः । वेदबाह्या दुराचाराः त्याज्यास्ते मखकर्मणि
vinaṣṭacittā mandāśca mithyāvādaratāḥ khalāḥ | vedabāhyā durācārāḥ tyājyāste makhakarmaṇi
वे नष्ट-बुद्धि, मन्दमति, मिथ्या-वाद में रत, दुष्ट, वेद-बाह्य तथा दुराचारी लोग यज्ञ-कर्म में त्याग देने योग्य ही थे।
श्लोक 54 (shiva.rudra.47.54)
वेदवादरता यूयं सर्वे विष्णुपुरोगमाः । यज्ञं मे सफलं विप्राः सुराः कुर्वन्तु माचिरम्
vedavādaratā yūyaṁ sarve viṣṇupurogamāḥ | yajñaṁ me saphalaṁ viprāḥ surāḥ kurvantu māciram
तुम सब वेद-मार्ग में रत, विष्णु को आगे रखने वाले हो; हे विप्रो! हे देवो! बिना विलम्ब किये मेरे इस यज्ञ को सफल करो।
श्लोक 55 (shiva.rudra.47.55)
ब्रह्मोवाच । इत्याकर्ण्य वचस्तस्य शिवमायाविमोहिताः । तन्मखे देवयजनं चक्रुः सर्वे सुरर्षयः
brahmovāca | ityākarṇya vacastasya śivamāyāvimohitāḥ | tanmakhe devayajanaṁ cakruḥ sarve surarṣayaḥ
ब्रह्मा ने कहा — उसके इस वचन को सुनकर, शिव की माया से मोहित हुए समस्त देवर्षियों ने उस यज्ञ में देव-यजन कार्य जारी रखा।
श्लोक 56 (shiva.rudra.47.56)
इति तन्मखशापो हि वर्णितो मे मुनीश्वर । यज्ञविध्वंसयोगोऽपि प्रोच्यते शृणु सादरम्
iti tanmakhaśāpo hi varṇito me munīśvara | yajñavidhvaṁsayogo'pi procyate śṛṇu sādaram
हे मुनीश्वर! इस प्रकार मैंने उस यज्ञ के शाप का वर्णन किया है; अब यज्ञ-विध्वंस का प्रसंग भी कहा जाता है, उसे आदरपूर्वक सुनो।