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शतरुद्र संहिता · अध्याय 12

शरभावतार वर्णन २

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

श्लोक 1 (shiva.shatarudra.12.1)

सनत्कुमार उवाच । नन्दीश्वर महाप्राज्ञ विज्ञातं तदनन्तरम् । ममोपरि कृपां कृत्वा प्रीत्या त्वं तद्वदाधुना

sanatkumāra uvāca nandīśvara mahāprājña vijñātaṁ tadanantaram mamopari kṛpāṁ kṛtvā prītyā tvaṁ tadvadādhunā

सनत्कुमार बोले - हे महाप्राज्ञ नन्दीश्वर! उसके बाद जो हुआ, उसे जानने की इच्छा है; मुझ पर कृपा कर, प्रेमपूर्वक अब वह कहिए।

श्लोक 2 (shiva.shatarudra.12.2)

नन्दीश्वर उवाच । इत्युक्तो वीरभद्रेण नृसिंहः क्रोधविह्वलः । निनदन्ननुवेगेन तं ग्रहीतुं प्रचक्रमे

nandīśvara uvāca ityukto vīrabhadreṇa nṛsiṁhaḥ krodhavihvalaḥ ninadannanuvegena taṁ grahītuṁ pracakrame

नन्दीश्वर बोले - वीरभद्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर क्रोध से विह्वल नृसिंह गर्जना करते हुए वेगपूर्वक उन्हें पकड़ने के लिए दौड़े।

श्लोक 3 (shiva.shatarudra.12.3)

अत्रान्तरे महाघोरं प्रत्यक्षभयकारणम् । गगनव्यापि दुर्धर्षं शैवतेजः समुद्भवम्

atrāntare mahāghoraṁ pratyakṣabhayakāraṇam gaganavyāpi durdharṣaṁ śaivatejaḥ samudbhavam

उसी क्षण एक अत्यन्त भयंकर, प्रत्यक्ष भय उत्पन्न करने वाला, आकाश में व्याप्त, दुर्धर्ष शैव तेज प्रकट हुआ।

श्लोक 4 (shiva.shatarudra.12.4)

वीरभद्रस्य तद्रूमदृश्यं तु ततः क्षणात् । तद्वै हिरण्मयं सौम्यं न सौरं नाग्निसम्भवम्

vīrabhadrasya tadrūmadṛśyaṁ tu tataḥ kṣaṇāt tadvai hiraṇmayaṁ saumyaṁ na sauraṁ nāgnisambhavam

उसी क्षण वीरभद्र का वह रूप अदृश्य हो गया; वह तेज स्वर्णिम और सौम्य था, न सूर्य से उत्पन्न था और न अग्नि से।

श्लोक 5 (shiva.shatarudra.12.5)

न तडिच्चन्द्रसदृशमनौपम्यं महेश्वरम् । तदा तेजांसि सर्वाणि तस्मिंल्लीनानि शङ्करे

na taḍiccandrasadṛśamanaupamyaṁ maheśvaram tadā tejāṁsi sarvāṇi tasmiṁllīnāni śaṅkare

वह बिजली या चन्द्रमा के समान भी नहीं था, वह महेश्वर अनुपम थे; तब समस्त तेज उन्हीं शंकर में विलीन हो गए।

श्लोक 6 (shiva.shatarudra.12.6)

न तद्व्योमं महत्तेजो व्यक्तान्तश्चाभवत्ततः । रुद्रसाधारणं चैव चिह्नितं विकृताकृति

na tadvyomaṁ mahattejo vyaktāntaścābhavattataḥ rudrasādhāraṇaṁ caiva cihnitaṁ vikṛtākṛti

वह महान् तेज केवल आकाश नहीं था, वह अन्ततः एक व्यक्त रूप में प्रकट हो गया - रुद्र के ही चिह्नों से युक्त, विचित्र आकृति वाला।

श्लोक 7 (shiva.shatarudra.12.7)

ततस्संहाररूपेण सुव्यक्तं परमेश्वरः । पश्यतां सर्वदेवानां जयशब्दादिमङ्गलैः

tatassaṁhārarūpeṇa suvyaktaṁ parameśvaraḥ paśyatāṁ sarvadevānāṁ jayaśabdādimaṅgalaiḥ

तब संहाररूप में परमेश्वर सम्पूर्ण देवताओं के देखते हुए 'जय-जय' आदि मंगल शब्दों के साथ भलीभाँति प्रकट हो गए।

श्लोक 8 (shiva.shatarudra.12.8)

सहस्रबाहुर्जटिलश्चन्द्रार्द्धकृतशेखरः । समृद्धोग्रशरीरेण पक्षाभ्यां चञ्चुना द्विजः

sahasrabāhurjaṭilaścandrārddhakṛtaśekharaḥ samṛddhograśarīreṇa pakṣābhyāṁ cañcunā dvijaḥ

सहस्रभुज, जटाधारी, अर्धचन्द्र को शिखा बनाए हुए; समृद्ध और उग्र शरीर वाले, पंखों और चोंच से युक्त पक्षी-रूप;

श्लोक 9 (shiva.shatarudra.12.9)

अतितीक्ष्णो महादंष्ट्रो वज्रतुल्यनखायुधः । कण्ठे कालो महाबाहुश्चतुष्पाद्वह्निसन्निभः

atitīkṣṇo mahādaṁṣṭro vajratulyanakhāyudhaḥ kaṇṭhe kālo mahābāhuścatuṣpādvahnisannibhaḥ

अत्यन्त तीक्ष्ण, विशाल दाढ़ों वाले, वज्र के समान नखों को शस्त्र बनाए हुए; कण्ठ में कालिमा, महाभुजाओं वाले, चार पैरों वाले, अग्नि के समान तेजस्वी।

श्लोक 10 (shiva.shatarudra.12.10)

युगान्तोद्यतजीमूतभीमगम्भीरनिःस्वनः । महाकुपितकृत्याग्निव्यावृत्तनयनत्रयः

yugāntodyatajīmūtabhīmagambhīraniḥsvanaḥ mahākupitakṛtyāgnivyāvṛttanayanatrayaḥ

उनकी भीषण, गम्भीर गर्जना युगान्त के मेघों के समान थी; उनके तीनों नेत्र महाक्रुद्ध कृत्या की अग्नि के समान घूम रहे थे।

श्लोक 11 (shiva.shatarudra.12.11)

स्पष्टदंष्ट्राधरोष्ठश्च हुङ्कारैः संयुतो हरः । ईदृग्विधस्वरूपश्च ह्युग्र आविर्बभूव ह

spaṣṭadaṁṣṭrādharoṣṭhaśca huṅkāraiḥ saṁyuto haraḥ īdṛgvidhasvarūpaśca hyugra āvirbabhūva ha

स्पष्ट दिखती दाढ़ों तथा होंठों वाले, हुंकारों से युक्त हर - इस प्रकार के भयंकर स्वरूप में वे प्रकट हुए।

श्लोक 12 (shiva.shatarudra.12.12)

हरिस्तद्दर्शनादेव विनष्टबलविक्रमः । बिभ्रद्धामसहस्रांशोरधः खद्योतविभ्रमम्

haristaddarśanādeva vinaṣṭabalavikramaḥ bibhraddhāmasahasrāṁśoradhaḥ khadyotavibhramam

हरि उस दर्शन मात्र से अपना सारा बल और पराक्रम खो बैठे, और उस सहस्ररश्मि तेज के सामने वे जुगनू के समान तुच्छ प्रतीत होने लगे।

श्लोक 13 (shiva.shatarudra.12.13)

अथ विभ्रम्य पक्षाभ्यां नाभिपादान्विदारयन् । पादान्बबन्ध पुच्छेन बाहुभ्यां बाहुमण्डलम्

atha vibhramya pakṣābhyāṁ nābhipādānvidārayan pādānbabandha pucchena bāhubhyāṁ bāhumaṇḍalam

फिर पंखों से घूमते हुए, उसकी नाभि और पैरों को विदीर्ण करते हुए, उन्होंने अपनी पूँछ से उसके पैर और अपनी भुजाओं से उसकी भुजाओं का मण्डल बाँध दिया।

श्लोक 14 (shiva.shatarudra.12.14)

भिन्दन्नुरसि बाहुभ्यां निजग्राह हरो हरिम् । ततो जगाम गगनं देवैस्सह महर्षिभिः

bhindannurasi bāhubhyāṁ nijagrāha haro harim tato jagāma gaganaṁ devaissaha maharṣibhiḥ

अपनी भुजाओं से उसकी छाती को भेदते हुए हर ने हरि को पकड़ लिया; फिर देवताओं और महर्षियों सहित वे आकाश में उड़ गए।

श्लोक 15 (shiva.shatarudra.12.15)

सहसैवाभयाद्विष्णुं स हि श्येन इवोरगम् । उत्क्षिप्योत्क्षिप्य सङ्गृह्य निपात्य च निपात्य च

sahasaivābhayādviṣṇuṁ sa hi śyena ivoragam utkṣipyotkṣipya saṅgṛhya nipātya ca nipātya ca

जैसे बाज सर्प को निःशंक होकर पकड़ लेता है, वैसे ही उन्होंने विष्णु को बार-बार ऊपर उछाला, पकड़ा और नीचे पटका।

श्लोक 16 (shiva.shatarudra.12.16)

उड्डीयोड्डीय भगवान्पक्षघातविमोहितम् । हरीं हरस्तं वृषभं विवेशानन्त ईश्वरः

uḍḍīyoḍḍīya bhagavānpakṣaghātavimohitam harīṁ harastaṁ vṛṣabhaṁ viveśānanta īśvaraḥ

बार-बार ऊपर उड़ते हुए, वे अनन्त प्रभु अपने पंखों की मार से मूर्च्छित हुए हरि को लेकर वृषभध्वज शिव के पास पहुँचे।

श्लोक 17 (shiva.shatarudra.12.17)

अनुयान्तं सुराः सर्वे नमोवाक्येन तुष्टुवुः । प्रणेमुः सादरं प्रीत्या ब्रह्माद्याश्च मुनीश्वराः

anuyāntaṁ surāḥ sarve namovākyena tuṣṭuvuḥ praṇemuḥ sādaraṁ prītyā brahmādyāśca munīśvarāḥ

उनके पीछे-पीछे जाते हुए समस्त देवताओं ने नमस्कार-वचनों से उनकी स्तुति की; ब्रह्मा आदि तथा मुनिश्रेष्ठों ने भी प्रेमपूर्वक आदरसहित प्रणाम किया।

श्लोक 18 (shiva.shatarudra.12.18)

नीयमानः परवशो दीनवक्त्रः कृताञ्जलिः । तुष्टाव परमेशानं हरिस्तं ललिताक्षरैः

nīyamānaḥ paravaśo dīnavaktraḥ kṛtāñjaliḥ tuṣṭāva parameśānaṁ haristaṁ lalitākṣaraiḥ

इस प्रकार ले जाए जाते हुए, पराधीन, म्लान मुख वाले हरि ने हाथ जोड़कर मधुर शब्दों में उन परमेश्वर की स्तुति की।

श्लोक 19 (shiva.shatarudra.12.19)

नाम्नामष्टशतेनैव स्तुत्वा तं मृडमेव च । पुनश्च प्रार्थयामास नृसिंहः शरभेश्वरम्

nāmnāmaṣṭaśatenaiva stutvā taṁ mṛḍameva ca punaśca prārthayāmāsa nṛsiṁhaḥ śarabheśvaram

उन कल्याणकारी शिव को एक सौ आठ नामों से स्तुति करके नृसिंह ने पुनः शरभेश्वर से प्रार्थना की।

श्लोक 20 (shiva.shatarudra.12.20)

यदा यदा ममाज्ञेयं मतिः स्याद्गर्वदूषिता । तदा तदाऽपनेतव्या त्वयैव परमेश्वर

yadā yadā mamājñeyaṁ matiḥ syādgarvadūṣitā tadā tadā’panetavyā tvayaiva parameśvara

हे परमेश्वर! जब-जब मेरी बुद्धि अज्ञानवश अहंकार से दूषित हो जाए, तब-तब आप ही उसे दूर कीजिएगा।

श्लोक 21 (shiva.shatarudra.12.21)

नन्दीश्वर उवाच । एवं विज्ञापयन्प्रीत्या शङ्करं नरकेसरी । नत्वाशक्तोऽभवद्विष्णुर्जीवितान्तपराजितः

nandīśvara uvāca evaṁ vijñāpayanprītyā śaṅkaraṁ narakesarī natvāśakto’bhavadviṣṇurjīvitāntaparājitaḥ

नन्दीश्वर बोले - इस प्रकार प्रेमपूर्वक शंकर से निवेदन करते हुए नरकेसरी नृसिंह ने प्रणाम किया, और विष्णु शक्तिहीन होकर प्राणान्त तक पराजित हो गए।

श्लोक 22 (shiva.shatarudra.12.22)

तद्वक्त्रं शेषगात्रान्तं कृत्वा सर्वस्वविग्रहम् । शक्तियुक्तं तदीयाङ्गं वीरभद्रः क्षणात्ततः

tadvaktraṁ śeṣagātrāntaṁ kṛtvā sarvasvavigraham śaktiyuktaṁ tadīyāṅgaṁ vīrabhadraḥ kṣaṇāttataḥ

उसी क्षण वीरभद्र ने उसके मुख को अपने ही अंग के शेष भाग पर, शक्तिसम्पन्न आभूषण के रूप में, स्थापित कर दिया।

श्लोक 23 (shiva.shatarudra.12.23)

नन्दीश्वर उवाच । अथ ब्रह्मादयो देवाः शारभं रूपमास्थितम् । तुष्टुवुः शङ्करं देवं सर्वलोकैकशङ्करम्

nandīśvara uvāca atha brahmādayo devāḥ śārabhaṁ rūpamāsthitam tuṣṭuvuḥ śaṅkaraṁ devaṁ sarvalokaikaśaṅkaram

नन्दीश्वर बोले - तब ब्रह्मा आदि देवताओं ने शारभ रूप में स्थित उन शंकर देव की स्तुति की, जो समस्त लोकों के एकमात्र कल्याणकर्ता हैं।

श्लोक 24 (shiva.shatarudra.12.24)

॥ देवा ऊचुः । ब्रह्मविष्ण्विन्द्रचन्द्रादिसुराः सर्वे महर्षयः । दितिजाद्याः सम्प्रसूताः त्वत्तः सर्वे महेश्वर

devā ūcuḥ brahmaviṣṇvindracandrādisurāḥ sarve maharṣayaḥ ditijādyāḥ samprasūtāḥ tvattaḥ sarve maheśvara

देवता बोले - हे महेश्वर! ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, चन्द्रमा आदि देवता, समस्त महर्षि और दितिपुत्र आदि, सभी आपसे ही उत्पन्न हुए हैं।

श्लोक 25 (shiva.shatarudra.12.25)

ब्रह्मविष्णुमहेन्द्रांश्च सूर्याद्यानसुरान्सुरान् । त्वं वै सृजसि पास्यत्सि त्वमेव सकलेश्वरः

brahmaviṣṇumahendrāṁśca sūryādyānasurānsurān tvaṁ vai sṛjasi pāsyatsi tvameva sakaleśvaraḥ

ब्रह्मा, विष्णु, महेन्द्र, सूर्य आदि देवताओं तथा असुरों को आप ही उत्पन्न करते और पालते हैं; आप ही समस्त के स्वामी हैं।

श्लोक 26 (shiva.shatarudra.12.26)

यतो हरसि संसारं हर इत्युच्यते बुधैः । निगृहीतो हरिर्यस्माद्धर इत्युच्यते बुधैः

yato harasi saṁsāraṁ hara ityucyate budhaiḥ nigṛhīto hariryasmāddhara ityucyate budhaiḥ

क्योंकि आप संसार का हरण करते हैं, इसलिए विद्वान आपको 'हर' कहते हैं; और क्योंकि हरि आपके द्वारा वश में किए गए, इसीलिए भी विद्वान आपको 'हर' कहते हैं।

श्लोक 27 (shiva.shatarudra.12.27)

यतो बिभर्षि सकलं विभज्य तनुमष्टधा । अतोऽस्मान्पाहि भगवन् सुरान् दानैरभीप्सितैः

yato bibharṣi sakalaṁ vibhajya tanumaṣṭadhā ato’smānpāhi bhagavan surān dānairabhīpsitaiḥ

क्योंकि आप अपने शरीर को आठ भागों में विभक्त कर सबका भरण-पोषण करते हैं, इसलिए हे भगवन्! हम देवताओं की मनोवांछित वरदानों से रक्षा कीजिए।

श्लोक 28 (shiva.shatarudra.12.28)

त्वं महापुरुषः शम्भुः सर्वेशः सुरनायकः । निःस्वात्मा निर्विकारात्मा परब्रह्म सतां गतिः

tvaṁ mahāpuruṣaḥ śambhuḥ sarveśaḥ suranāyakaḥ niḥsvātmā nirvikārātmā parabrahma satāṁ gatiḥ

आप ही महापुरुष शम्भु, सर्वेश्वर, देवताओं के नायक हैं; निरहंकार, निर्विकार, परब्रह्म, सन्तों की गति हैं।

श्लोक 29 (shiva.shatarudra.12.29)

दीनबन्धुर्दयासिन्धुरद्भुतोतिः परात्मदृक् । प्राज्ञो विराट् विभुः सत्यः सच्चिदानन्दलक्षणः

dīnabandhurdayāsindhuradbhutotiḥ parātmadṛk prājño virāṭ vibhuḥ satyaḥ saccidānandalakṣaṇaḥ

दीनबन्धु, दयासागर, अद्भुत महिमा वाले, परमात्मा के द्रष्टा; प्राज्ञ, विराट्, सर्वव्यापी, सत्य, सच्चिदानन्दस्वरूप।

श्लोक 30 (shiva.shatarudra.12.30)

नन्दीश्वर उवाच । इत्याकर्ण्य वचः शम्भुर्देवानां परमेश्वरः । उवाच तान् सुरान्देवामहर्षींश्च पुरातनान्

nandīśvara uvāca ityākarṇya vacaḥ śambhurdevānāṁ parameśvaraḥ uvāca tān surāndevāmaharṣīṁśca purātanān

नन्दीश्वर बोले - यह वचन सुनकर देवताओं के परमेश्वर शम्भु ने उन देवताओं और प्राचीन महर्षियों से यह कहा।

श्लोक 31 (shiva.shatarudra.12.31)

यथा जलं जले क्षिप्तं क्षीरे क्षीरं घृते घृतम् । एक एव तदा विष्णुः शिवे लीनो न चान्यथा

yathā jalaṁ jale kṣiptaṁ kṣīre kṣīraṁ ghṛte ghṛtam eka eva tadā viṣṇuḥ śive līno na cānyathā

जैसे जल में डाला हुआ जल, दूध में दूध, घी में घी - एक ही हो जाता है, वैसे ही विष्णु भी अद्वितीय होकर शिव में लीन हो गए, अन्यथा नहीं।

श्लोक 32 (shiva.shatarudra.12.32)

एको विष्णुर्नृसिंहात्मा सदर्पश्च महाबलः । जगत्संहारकरणे प्रवृत्तो नरकेसरी

eko viṣṇurnṛsiṁhātmā sadarpaśca mahābalaḥ jagatsaṁhārakaraṇe pravṛtto narakesarī

अकेले विष्णु ही नृसिंहरूप में गर्वयुक्त और महाबली होकर जगत् के संहार के कार्य में प्रवृत्त हुए थे, नरकेसरी बनकर।

श्लोक 33 (shiva.shatarudra.12.33)

प्रार्थनीयो नमस्तस्मै मद्भक्तैः सिद्धिकारिभिः । मद्भक्तप्रवरश्चैव मद्भक्तवरदायकः

prārthanīyo namastasmai madbhaktaiḥ siddhikāribhiḥ madbhaktapravaraścaiva madbhaktavaradāyakaḥ

सिद्धि चाहने वाले मेरे भक्तों द्वारा वे प्रार्थनीय और वन्दनीय हैं; वे मेरे भक्तों में श्रेष्ठ हैं और मेरे भक्तों को वर देने वाले भी हैं।

श्लोक 34 (shiva.shatarudra.12.34)

नन्दीश्वर उवाच । एतावदुक्त्वा भगवान् पक्षिराजो महाबलः । पश्यतां सर्वदेवानां तत्रैवान्तरधीयत

nandīśvara uvāca etāvaduktvā bhagavān pakṣirājo mahābalaḥ paśyatāṁ sarvadevānāṁ tatraivāntaradhīyata

नन्दीश्वर बोले - इतना कहकर वे महाबली पक्षिराज भगवान् समस्त देवताओं के देखते हुए वहीं अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 35 (shiva.shatarudra.12.35)

वीरभद्रोऽपि भगवान्गणाध्यक्षो महाबलः । नृसिंहकृत्तिं निष्कृष्य समादाय ययौ गिरिम्

vīrabhadro’pi bhagavāngaṇādhyakṣo mahābalaḥ nṛsiṁhakṛttiṁ niṣkṛṣya samādāya yayau girim

महाबली भगवान् गणाध्यक्ष वीरभद्र भी नृसिंह की खाल उतारकर उसे लेकर कैलास पर्वत को चले गए।

श्लोक 36 (shiva.shatarudra.12.36)

नृसिंहकृत्तिवसनस्तदाप्रभृति शङ्करः । तद्वक्त्रं मुण्डमालायां नायकत्वेन कल्पितम्

nṛsiṁhakṛttivasanastadāprabhṛti śaṅkaraḥ tadvaktraṁ muṇḍamālāyāṁ nāyakatvena kalpitam

तभी से शंकर नृसिंह के चर्म को वस्त्र के रूप में धारण करते हैं; और उसका मुख उनकी मुण्डमाला में मुख्य आभूषण के रूप में सुशोभित किया गया।

श्लोक 37 (shiva.shatarudra.12.37)

ततो देवा निरातङ्काः कीर्तयन्तः कथामिमाम् । विस्मयोत्फुल्लनयना जग्मुः सर्वे यथागतम्

tato devā nirātaṅkāḥ kīrtayantaḥ kathāmimām vismayotphullanayanā jagmuḥ sarve yathāgatam

तब निर्भय हुए देवता, इस कथा का कीर्तन करते हुए, आश्चर्य से विस्फारित नेत्रों के साथ सब जैसे आए थे वैसे ही लौट गए।

श्लोक 38 (shiva.shatarudra.12.38)

य इदं परमाख्यानं पुण्यं वेदरसान्वितम् । पठति शृणुयाच्चैव सर्वान्कामानवाप्नुयात्

ya idaṁ paramākhyānaṁ puṇyaṁ vedarasānvitam paṭhati śṛṇuyāccaiva sarvānkāmānavāpnuyāt

जो इस परम पुण्य, वेदरस से युक्त आख्यान को पढ़ता या सुनता है, वह समस्त कामनाओं को प्राप्त करता है।

श्लोक 39 (shiva.shatarudra.12.39)

धन्यं यशस्यमायुष्यमारोग्यम्पुष्टिवर्द्धनम् । सर्वविघ्नप्रशमनं सर्वव्याधिविनाशनम्

dhanyaṁ yaśasyamāyuṣyamārogyampuṣṭivarddhanam sarvavighnapraśamanaṁ sarvavyādhivināśanam

यह कल्याणकारी, यशदायक, आयुवर्धक, आरोग्यदायक तथा पुष्टिवर्धक है; यह समस्त विघ्नों को शान्त करता है और समस्त व्याधियों का नाश करता है।

श्लोक 40 (shiva.shatarudra.12.40)

दुःखप्रशमनं वाञ्छासिद्धिदं मङ्गलालयम् । अपमृत्युहरं बुद्धिप्रदं शत्रुविनाशनम्

duḥkhapraśamanaṁ vāñchāsiddhidaṁ maṅgalālayam apamṛtyuharaṁ buddhipradaṁ śatruvināśanam

यह दुःख को शान्त करने वाला, मनोकामना सिद्ध करने वाला, मंगल का धाम है; यह अकाल मृत्यु का हरण करने वाला, बुद्धि प्रदान करने वाला तथा शत्रुओं का नाश करने वाला है।

श्लोक 41 (shiva.shatarudra.12.41)

इदं तु शरभाकारं परं रूपं पिनाकिनः । प्रकाशनीयं भक्तेषु शङ्करस्य चरेषु वै

idaṁ tu śarabhākāraṁ paraṁ rūpaṁ pinākinaḥ prakāśanīyaṁ bhakteṣu śaṅkarasya careṣu vai

पिनाकधारी का यह परम शारभ रूप निश्चय ही भक्तों में तथा शंकर की सेवा में रत लोगों में प्रकट किया जाने योग्य है।

श्लोक 42 (shiva.shatarudra.12.42)

तैरेव पठितव्यं च श्रोतव्यं च शिवात्मभिः । नवधाभक्तिदं दिव्यमन्तःकरणबुद्धिदम्

taireva paṭhitavyaṁ ca śrotavyaṁ ca śivātmabhiḥ navadhābhaktidaṁ divyamantaḥkaraṇabuddhidam

यह उन्हीं शिवस्वरूप भक्तों द्वारा पढ़ा और सुना जाना चाहिए; यह दिव्य है, नवधा भक्ति देने वाला तथा अन्तःकरण और बुद्धि को शुद्ध करने वाला है।

श्लोक 43 (shiva.shatarudra.12.43)

शिवोत्सवेषु सर्वेषु चतुर्दश्यष्टमीषु च । पठेत्प्रतिष्ठाकाले तु शिवसन्निधिकारणम्

śivotsaveṣu sarveṣu caturdaśyaṣṭamīṣu ca paṭhetpratiṣṭhākāle tu śivasannidhikāraṇam

इसे शिव के सभी उत्सवों में, चतुर्दशी और अष्टमी को, तथा प्रतिष्ठा के समय पढ़ना चाहिए, क्योंकि यह शिव की समीपता का कारण है।

श्लोक 44 (shiva.shatarudra.12.44)

चौरव्याघ्रनृसिंहात्मकृतराजभयेषु च । अन्येषूत्पातभूकम्पदस्य्वादिपांसुवृष्टिषु

cauravyāghranṛsiṁhātmakṛtarājabhayeṣu ca anyeṣūtpātabhūkampadasyvādipāṁsuvṛṣṭiṣu

चोर, व्याघ्र, सिंह अथवा राजा से उत्पन्न भय में, तथा अन्य उत्पातों - भूकम्प, धूलिवृष्टि आदि में इसका पाठ करना चाहिए।

श्लोक 45 (shiva.shatarudra.12.45)

उल्कापाते महावाते विनावृष्ट्यतिवृष्टिषु । पठेद्यः प्रयतो विद्वान् शिवभक्तो दृढव्रतः

ulkāpāte mahāvāte vināvṛṣṭyativṛṣṭiṣu paṭhedyaḥ prayato vidvān śivabhakto dṛḍhavrataḥ

उल्कापात में, प्रचण्ड आँधी में, अनावृष्टि अथवा अतिवृष्टि में, जो नियमपूर्वक रहने वाला विद्वान्, दृढ़व्रती शिवभक्त इसका पाठ करता है,

श्लोक 46 (shiva.shatarudra.12.46)

यः पठेच्छृणुयाद्वापि निष्कामो व्रतमैश्वरम् । रुद्रलोकं समासाद्य रुद्रस्यानुचरो भवेत्

yaḥ paṭhecchṛṇuyādvāpi niṣkāmo vratamaiśvaram rudralokaṁ samāsādya rudrasyānucaro bhavet

जो निष्काम भाव से इस ऐश्वर्यमय व्रत को पढ़े या सुने, वह रुद्रलोक को प्राप्त कर रुद्र का अनुचर बनता है।

श्लोक 47 (shiva.shatarudra.12.47)

रुद्रलोकमनुप्राप्य रुद्रेण सह मोदते । ततः सायुज्यमाप्नोति शिवस्य कृपया मुने

rudralokamanuprāpya rudreṇa saha modate tataḥ sāyujyamāpnoti śivasya kṛpayā mune

रुद्रलोक को प्राप्त कर वह रुद्र के साथ आनन्दित होता है; और फिर, हे मुने! शिव की कृपा से वह सायुज्य मुक्ति को प्राप्त करता है।

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