कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 1
ज्योतिर्लिङ्ग और उपलिङ्गों की महिमा
श्लोक 1 (shiva.kotirudra.1.1)
यो धत्ते निजमाययैव भुवनाकारं विकारोज्झितो । यस्याहुः करुणाकटाक्षविभवौ स्वर्गापवर्गाभिधौ । प्रत्यग्बोधसुखाद्वयं हृदि सदा पश्यन्ति यं योगिन- स्तस्मै शैलसुताञ्चितार्धवपुषे शश्वन्नमस्तेजसे ॥ 1.1 ॥
yo dhatte nijamāyayaiva bhuvanākāraṁ vikārojjhito yasyāhuḥ karuṇākaṭākṣavibhavau svargāpavargābhidhau pratyagbodhasukhādvayaṁ hṛdi sadā paśyanti yaṁ yogina- stasmai śailasutāñcitārdhavapuṣe śaśvannamastejase
उस तेज को सदा नमस्कार है, जो विकाररहित होकर अपनी माया से ही संसार का रूप धारण करता है; जिसकी करुणा-भरी कृपादृष्टि को स्वर्ग और मोक्ष नामक दो ऐश्वर्य कहा जाता है; जिसे योगीजन सदा हृदय में अद्वैत, अन्तर्ज्ञानमय सुख के रूप में देखते हैं; जिसका आधा शरीर पर्वतपुत्री पार्वती से सुशोभित है।
श्लोक 2 (shiva.kotirudra.1.2)
कृपाललितवीक्षणं स्मितमनोज्ञवक्त्राम्बुजं शशाङ्ककलयोज्ज्वलं शमितघोरतापत्रयम् । करोतु किमपि स्फुरत्परमसौख्यसच्चिद्वपु- र्धराधरसुताभुजोद्वलयितं महो मङ्गलम् ॥ 1.2 ॥
kṛpālalitavīkṣaṇaṁ smitamanojñavaktrāmbujaṁ śaśāṅkakalayojjvalaṁ śamitaghoratāpatrayam karotu kimapi sphuratparamasaukhyasaccidvapu- rdharādharasutābhujodvalayitaṁ maho maṅgalam
वह अवर्णनीय, मंगलमय तेज हमारा कल्याण करे — जिसका दृष्टिपात करुणा से कोमल है, जिसका मुखकमल मुस्कान से मनोहर है, जो चन्द्रकला से उज्ज्वल है, जिसने तीनों घोर तापों को शांत किया है, और जिसके स्फुरित परम सुख, सत् और चित् से युक्त शरीर को पर्वतपुत्री की भुजाओं ने घेर रखा है।
श्लोक 3 (shiva.kotirudra.1.3)
ऋषय ऊचुः सम्यगुक्तं त्वया सूत लोकानां हितकाम्यया । शिवावतारमाहात्म्यं नानाख्यानसमन्वितम् ॥ 1.3 ॥
ṛṣaya ūcuḥ samyaguktaṁ tvayā sūta lokānāṁ hitakāmyayā śivāvatāramāhātmyaṁ nānākhyānasamanvitam
ऋषियों ने कहा — हे सूत! आपने लोक-कल्याण की कामना से शिव के अवतारों की महिमा को अनेक कथाओं सहित भलीभाँति वर्णन किया है।
श्लोक 4 (shiva.kotirudra.1.4)
पुनश्च कथ्यतां तात शिवमाहात्म्यमुत्तमम् । लिङ्गसम्बन्धि सुप्रीत्या धन्यस्त्वं शैवसत्तम ॥ 1.4 ॥
punaśca kathyatāṁ tāta śivamāhātmyamuttamam liṅgasambandhi suprītyā dhanyastvaṁ śaivasattama
हे तात! अब लिंग से सम्बद्ध शिव की उत्तम महिमा को प्रसन्नतापूर्वक पुनः कहिए। हे शैवश्रेष्ठ! आप धन्य हैं।
श्लोक 5 (shiva.kotirudra.1.5)
शृण्वन्तस्त्वन्मुखाम्भोजान्न तृप्ताः स्मो वयं प्रभो । शैवं यशोऽमृतं रम्यं तदेव पुनरुच्यताम् ॥ 1.5 ॥
śṛṇvantastvanmukhāmbhojānna tṛptāḥ smo vayaṁ prabho śaivaṁ yaśo’mṛtaṁ ramyaṁ tadeva punarucyatām
हे प्रभो! आपके मुखकमल से सुनते हुए भी हम तृप्त नहीं होते; वही मनोहर, अमृततुल्य शिव-यश पुनः कहा जाए।
श्लोक 6 (shiva.kotirudra.1.6)
पृथिव्यां यानि लिङ्गानि तीर्थे तीर्थे शुभानि हि । अन्यत्र वा स्थले यानि प्रसिद्धानि स्थितानि वै ॥ 1.6 ॥
pṛthivyāṁ yāni liṅgāni tīrthe tīrthe śubhāni hi anyatra vā sthale yāni prasiddhāni sthitāni vai
पृथ्वी पर प्रत्येक तीर्थ में जो शुभ लिंग हैं, अथवा अन्य किसी स्थान में जो प्रसिद्ध लिंग स्थित हैं —
श्लोक 7 (shiva.kotirudra.1.7)
तानि तानि च दिव्यानि लिङ्गानि परमेशितुः । व्यासशिष्य समाचक्ष्व लोकानां हितकाम्यया ॥ 1.7 ॥
tāni tāni ca divyāni liṅgāni parameśituḥ vyāsaśiṣya samācakṣva lokānāṁ hitakāmyayā
हे व्यासशिष्य! परमेश्वर के उन-उन दिव्य लिंगों को लोक-कल्याण की कामना से हमें भलीभाँति बताइए।
श्लोक 8 (shiva.kotirudra.1.8)
सूत उवाच । साधु पृष्टमृषिश्रेष्ठा लोकानां हितकाम्यया । कथयामि भवत्स्नेहात्तानि सङ्क्षेपतो द्विजाः ॥ 1.8 ॥
sūta uvāca sādhu pṛṣṭamṛṣiśreṣṭhā lokānāṁ hitakāmyayā kathayāmi bhavatsnehāttāni saṅkṣepato dvijāḥ
सूत ने कहा — हे ऋषिश्रेष्ठो! आपने लोक-कल्याण की कामना से भलीभाँति पूछा है। हे द्विजो! आपके प्रति स्नेह के कारण मैं उन्हें संक्षेप में कहता हूँ।
श्लोक 9 (shiva.kotirudra.1.9)
सर्वेषां शिवलिङ्गानां मुने सङ्ख्या न विद्यते । सर्वा लिङ्गमयी भूमिः सर्वं लिङ्गमयं जगत् ॥ 1.9 ॥
sarveṣāṁ śivaliṅgānāṁ mune saṅkhyā na vidyate sarvā liṅgamayī bhūmiḥ sarvaṁ liṅgamayaṁ jagat
हे मुने! समस्त शिवलिंगों की गणना नहीं की जा सकती; सम्पूर्ण पृथ्वी लिंगमयी है, सम्पूर्ण जगत् लिंगमय है।
श्लोक 10 (shiva.kotirudra.1.10)
लिङ्गयुक्तानि तीर्थानि सर्वं लिङ्गे प्रतिष्ठितम् । सङ्ख्या न विद्यते तेषां तानि किञ्चिद्ब्रवीम्यहम् ॥ 1.10 ॥
liṅgayuktāni tīrthāni sarvaṁ liṅge pratiṣṭhitam saṅkhyā na vidyate teṣāṁ tāni kiñcidbravīmyaham
समस्त तीर्थ लिंग से युक्त हैं, सब कुछ लिंग में ही प्रतिष्ठित है। उनकी गणना संभव नहीं, फिर भी मैं उनमें से कुछ का वर्णन करता हूँ।
श्लोक 11 (shiva.kotirudra.1.11)
यत्किञ्चिद् दृश्यते दृश्यं वर्ण्यते स्मर्यते च यत् । तत्सर्वं शिवरूपं हि नान्यदस्तीति किञ्चन ॥ 1.11 ॥
yatkiñcid dṛśyate dṛśyaṁ varṇyate smaryate ca yat tatsarvaṁ śivarūpaṁ hi nānyadastīti kiñcana
जो कुछ भी दृश्य वस्तु देखी, वर्णित अथवा स्मरण की जाती है, वह सब शिव का ही स्वरूप है; इसके अतिरिक्त कुछ भी अन्य नहीं है।
श्लोक 12 (shiva.kotirudra.1.12)
तथापि श्रूयतां प्रीत्या कथयामि यथाश्रुतम् । लिङ्गानि च ऋषिश्रेष्ठाः पृथिव्यां यानि तानि ह ॥ 1.12 ॥
tathāpi śrūyatāṁ prītyā kathayāmi yathāśrutam liṅgāni ca ṛṣiśreṣṭhāḥ pṛthivyāṁ yāni tāni ha
फिर भी हे ऋषिश्रेष्ठो! जैसा मैंने सुना है वैसा प्रेमपूर्वक सुनिए — पृथ्वी पर जो लिंग हैं, उन्हें मैं कहता हूँ —
श्लोक 13 (shiva.kotirudra.1.13)
पाताले चापि वर्तन्ते स्वर्गे चापि तथा भुवि । सर्वत्र पूज्यते शम्भुः स देवासुरमानुषैः ॥ 1.13 ॥
pātāle cāpi vartante svarge cāpi tathā bhuvi sarvatra pūjyate śambhuḥ sa devāsuramānuṣaiḥ
वे पाताल में भी हैं, स्वर्ग में भी और पृथ्वी में भी; शम्भु सर्वत्र देवताओं, असुरों और मनुष्यों द्वारा पूजे जाते हैं।
श्लोक 14 (shiva.kotirudra.1.14)
त्रिजगच्छम्भुना व्याप्तं सदेवासुरमानुषम् । अनुग्रहाय लोकानां लिङ्गरूपेण सत्तमाः ॥ 1.14 ॥
trijagacchambhunā vyāptaṁ sadevāsuramānuṣam anugrahāya lokānāṁ liṅgarūpeṇa sattamāḥ
हे सत्तमो! देवता, असुर और मनुष्यों सहित तीनों लोक शम्भु से ही व्याप्त हैं, जो लोगों पर अनुग्रह करने हेतु लिंगरूप में विद्यमान हैं।
श्लोक 15 (shiva.kotirudra.1.15)
अनुग्रहाय लोकानां लिङ्गानि च महेश्वरः । दधाति विविधान्यत्र तीर्थे चान्यस्थले तथा ॥ 1.15 ॥
anugrahāya lokānāṁ liṅgāni ca maheśvaraḥ dadhāti vividhānyatra tīrthe cānyasthale tathā
लोगों पर अनुग्रह करने के लिए महेश्वर तीर्थों में तथा अन्य स्थानों में भी विविध लिंग धारण करते हैं।
श्लोक 16 (shiva.kotirudra.1.16)
यत्र यत्र यदा शम्भुर्भक्त्या भक्तैश्च संस्मृतः । तत्र तत्रावतीर्याथ कार्यं कृत्वा स्थितस्तदा ॥ 1.16 ॥
yatra yatra yadā śambhurbhaktyā bhaktaiśca saṁsmṛtaḥ tatra tatrāvatīryātha kāryaṁ kṛtvā sthitastadā
जहाँ-जहाँ और जब-जब भक्तों द्वारा भक्तिपूर्वक शम्भु का स्मरण किया जाता है, वहाँ-वहाँ वे अवतरित होकर, कार्य सिद्ध कर, स्थित हो जाते हैं।
श्लोक 17 (shiva.kotirudra.1.17)
लोकानामुपकारार्थं स्वलिङ्गं चाप्यकल्पयत् । तल्लिङ्गं पूजयित्वा तु सिद्धिं समधिगच्छति ॥ 1.17 ॥
lokānāmupakārārthaṁ svaliṅgaṁ cāpyakalpayat talliṅgaṁ pūjayitvā tu siddhiṁ samadhigacchati
लोगों के उपकार हेतु उन्होंने वहाँ अपना लिंग स्थापित किया; उस लिंग की पूजा करके व्यक्ति सिद्धि प्राप्त करता है।
श्लोक 18 (shiva.kotirudra.1.18)
पृथिव्यां यानि लिङ्गानि तेषां सङ्ख्या न विद्यते । तथापि च प्रधानानि कथ्यन्ते च मया द्विजाः ॥ 1.18 ॥
pṛthivyāṁ yāni liṅgāni teṣāṁ saṅkhyā na vidyate tathāpi ca pradhānāni kathyante ca mayā dvijāḥ
पृथ्वी पर जो लिंग हैं, उनकी गणना नहीं हो सकती; फिर भी हे द्विजो! मैं उनमें से प्रमुख लिंगों का वर्णन करता हूँ।
श्लोक 19 (shiva.kotirudra.1.19)
प्रधानेषु च यानीह मुख्यानि प्रवदाम्यहम् । यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवः क्षणात् ॥ 1.19 ॥
pradhāneṣu ca yānīha mukhyāni pravadāmyaham yacchrutvā sarvapāpebhyo mucyate mānavaḥ kṣaṇāt
प्रधान लिंगों में जो मुख्य हैं, उन्हें मैं बताता हूँ, जिन्हें सुनकर मनुष्य क्षणभर में समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।
श्लोक 20 (shiva.kotirudra.1.20)
ज्योतिर्लिङ्गानि यानीह मुख्यमुख्यानि सत्तम । तान्यहं कथयाम्यद्य श्रुत्वा पापं व्यपोहति ॥ 1.20 ॥
jyotirliṅgāni yānīha mukhyamukhyāni sattama tānyahaṁ kathayāmyadya śrutvā pāpaṁ vyapohati
हे सत्तम! जो ज्योतिर्लिंग यहाँ मुख्यों में भी मुख्य हैं, उन्हें मैं आज कहता हूँ; उन्हें सुनकर पाप दूर हो जाता है।
श्लोक 21 (shiva.kotirudra.1.21)
सौराष्ट्रे सोमनाथं च श्रीशैले मल्लिकार्जुनम् । उज्जयिन्यां महाकालमोङ्कारे परमेश्वरम् ॥ 1.21 ॥
saurāṣṭre somanāthaṁ ca śrīśaile mallikārjunam ujjayinyāṁ mahākālamoṅkāre parameśvaram
सौराष्ट्र में सोमनाथ, श्रीशैल में मल्लिकार्जुन, उज्जयिनी में महाकाल, ओंकार में परमेश्वर —
श्लोक 22 (shiva.kotirudra.1.22)
केदारं हिमवत्पृष्ठे डाकिन्यां भीमशङ्करम् । वाराणस्यां च विश्वेशं त्र्यम्बकं गौतमीतटे ॥ 1.22 ॥
kedāraṁ himavatpṛṣṭhe ḍākinyāṁ bhīmaśaṅkaram vārāṇasyāṁ ca viśveśaṁ tryambakaṁ gautamītaṭe
हिमालय की चोटी पर केदार, डाकिनी में भीमशंकर, वाराणसी में विश्वेश, गौतमी के तट पर त्र्यम्बक —
श्लोक 23 (shiva.kotirudra.1.23)
वैद्यनाथं चिताभूमौ नागेशं दारुकावने । सेतुबन्धे च रामेशं घुश्मेशं च शिवालये ॥ 1.23 ॥
vaidyanāthaṁ citābhūmau nāgeśaṁ dārukāvane setubandhe ca rāmeśaṁ ghuśmeśaṁ ca śivālaye
चिताभूमि में वैद्यनाथ, दारुकावन में नागेश, सेतुबन्ध में रामेश और शिवालय में घुश्मेश।
श्लोक 24 (shiva.kotirudra.1.24)
द्वादशैतानि नामानि प्रातरुत्थाय यः पठेत् । सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वसिद्धिफलं लभेत् ॥ 1.24 ॥
dvādaśaitāni nāmāni prātarutthāya yaḥ paṭhet sarvapāpavinirmuktaḥ sarvasiddhiphalaṁ labhet
जो प्रातःकाल उठकर इन बारह नामों का पाठ करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर सर्वसिद्धि का फल प्राप्त करता है।
श्लोक 25 (shiva.kotirudra.1.25)
यं यं काममपेक्ष्यैव पठिष्यन्ति नरोत्तमाः । प्राप्स्यन्ति कामं तं तं हि परत्रेह मुनीश्वराः ॥ 1.25 ॥
yaṁ yaṁ kāmamapekṣyaiva paṭhiṣyanti narottamāḥ prāpsyanti kāmaṁ taṁ taṁ hi paratreha munīśvarāḥ
हे मुनीश्वरो! श्रेष्ठ मनुष्य जिस-जिस कामना की अपेक्षा से इनका पाठ करेंगे, वे उस-उस कामना को इस लोक और परलोक में अवश्य प्राप्त करेंगे।
श्लोक 26 (shiva.kotirudra.1.26)
ये निष्कामतया तानि पठिष्यन्ति शुभाशयाः । तेषां च जननीगर्भे वासो नैव भविष्यति ॥ 1.26 ॥
ye niṣkāmatayā tāni paṭhiṣyanti śubhāśayāḥ teṣāṁ ca jananīgarbhe vāso naiva bhaviṣyati
जो शुद्ध हृदय वाले लोग निष्काम भाव से इनका पाठ करेंगे, उनका माता के गर्भ में पुनः वास कभी नहीं होगा।
श्लोक 27 (shiva.kotirudra.1.27)
एतेषां पूजनेनैव वर्णानां दुःखनाशनम् । इहलोके परत्रापि मुक्तिर्भवति निश्चितम् ॥ 1.27 ॥
eteṣāṁ pūjanenaiva varṇānāṁ duḥkhanāśanam ihaloke paratrāpi muktirbhavati niścitam
इनकी पूजा मात्र से ही सभी वर्णों का दुःख नष्ट हो जाता है; इस लोक और परलोक दोनों में मुक्ति निश्चित है।
श्लोक 28 (shiva.kotirudra.1.28)
ग्राह्यमेषां च नैवेद्यं भोजनीयं प्रयत्नतः । तत्कर्तुः सर्वपापानि भस्मसाद्यान्ति वै क्षणात् ॥ 1.28 ॥
grāhyameṣāṁ ca naivedyaṁ bhojanīyaṁ prayatnataḥ tatkartuḥ sarvapāpāni bhasmasādyānti vai kṣaṇāt
इनका नैवेद्य ग्रहण कर सावधानी से भोजन करना चाहिए; ऐसा करने वाले के समस्त पाप क्षणभर में भस्म हो जाते हैं।
श्लोक 29 (shiva.kotirudra.1.29)
ज्योतिषां चैव लिङ्गानां ब्रह्मादिभिरलं द्विजाः । विशेषतः फलं वक्तुं शक्यते न परैस्तथा ॥ 1.29 ॥
jyotiṣāṁ caiva liṅgānāṁ brahmādibhiralaṁ dvijāḥ viśeṣataḥ phalaṁ vaktuṁ śakyate na paraistathā
हे द्विजो! ज्योतिर्लिंगों के विशेष फल का वर्णन तो ब्रह्मा आदि देवता भी नहीं कर सकते, फिर अन्य किसकी बात करें।
श्लोक 30 (shiva.kotirudra.1.30)
एकं च पूजितं येन षण्मासं तन्निरन्तरम् । तस्य दुःखं न जायेत मातृकुक्षिसमुद्भवम् ॥ 1.30 ॥
ekaṁ ca pūjitaṁ yena ṣaṇmāsaṁ tannirantaram tasya duḥkhaṁ na jāyeta mātṛkukṣisamudbhavam
जो एक भी लिंग की छह मास तक निरन्तर पूजा करता है, उसे माता के गर्भ में उत्पन्न होने का दुःख नहीं होता।
श्लोक 31 (shiva.kotirudra.1.31)
हीनयोनौ यदा जातो ज्योतिर्लिङ्गं च पश्यति । तस्य जन्म भवेत्तत्र विमले सत्कुले पुनः ॥ 1.31 ॥
hīnayonau yadā jāto jyotirliṅgaṁ ca paśyati tasya janma bhavettatra vimale satkule punaḥ
यदि हीन योनि में उत्पन्न व्यक्ति भी ज्योतिर्लिंग का दर्शन कर ले, तो उसका पुनर्जन्म निर्मल, उत्तम कुल में होता है।
श्लोक 32 (shiva.kotirudra.1.32)
सत्कुले जन्म सम्प्राप्य धनाढ्यो वेदपारगः । शुभकर्म तदा कृत्वा मुक्तिं यात्यनपायिनीम् ॥ 1.32 ॥
satkule janma samprāpya dhanāḍhyo vedapāragaḥ śubhakarma tadā kṛtvā muktiṁ yātyanapāyinīm
उत्तम कुल में जन्म पाकर, धनवान और वेदपारंगत होकर, तब शुभ कर्म करके वह अविनाशी मुक्ति को प्राप्त करता है।
श्लोक 33 (shiva.kotirudra.1.33)
म्लेच्छो वाप्यन्त्यजो वापि षण्ढो वापि मुनीश्वराः । द्विजो भूत्वा भवेन्मुक्तस्तस्मात्तद्दर्शनं चरेत् ॥ 1.33 ॥
mleccho vāpyantyajo vāpi ṣaṇḍho vāpi munīśvarāḥ dvijo bhūtvā bhavenmuktastasmāttaddarśanaṁ caret
हे मुनीश्वरो! म्लेच्छ हो, अन्त्यज हो अथवा नपुंसक हो — वह द्विज होकर मुक्त हो जाता है; इसलिए उसका दर्शन अवश्य करना चाहिए।
श्लोक 34 (shiva.kotirudra.1.34)
ज्योतिषां चैव लिङ्गानां किञ्चित्प्रोक्तं फलं मया । ज्योतिषां चोपलिङ्गानि श्रूयन्तामृषिसत्तमाः ॥ 1.34 ॥
jyotiṣāṁ caiva liṅgānāṁ kiñcitproktaṁ phalaṁ mayā jyotiṣāṁ copaliṅgāni śrūyantāmṛṣisattamāḥ
इस प्रकार मैंने ज्योतिर्लिंगों के फल का कुछ वर्णन किया है; हे ऋषिसत्तमो! अब ज्योतिर्लिंगों के उपलिंगों को सुनिए।
श्लोक 35 (shiva.kotirudra.1.35)
सोमेश्वरस्य यल्लिङ्गमन्तकेशमुदाहृतम् । मह्याः सागरसंयोगे तल्लिङ्गमुपलिङ्गकम् ॥ 1.35 ॥
someśvarasya yalliṅgamantakeśamudāhṛtam mahyāḥ sāgarasaṁyoge talliṅgamupaliṅgakam
सोमेश्वर का जो उपलिंग अन्तकेश कहा जाता है, वह महीनदी के सागर-संगम पर स्थित है।
श्लोक 36 (shiva.kotirudra.1.36)
मल्लिकार्जुनसम्भूतमुपलिङ्गमुदाहृतम् । रुद्रेश्वरमिति ख्यातं भृगुकक्षे सुखावहम् ॥ 1.36 ॥
mallikārjunasambhūtamupaliṅgamudāhṛtam rudreśvaramiti khyātaṁ bhṛgukakṣe sukhāvaham
मल्लिकार्जुन से उत्पन्न उपलिंग रुद्रेश्वर के नाम से प्रसिद्ध है, जो भृगुकक्ष में सुख प्रदान करता है।
श्लोक 37 (shiva.kotirudra.1.37)
महाकालभवं लिङ्गं दुग्धेशमिति विश्रुतम् । नर्मदायां प्रसिद्धं तत्सर्वपापहरं स्मृतम् ॥ 1.37 ॥
mahākālabhavaṁ liṅgaṁ dugdheśamiti viśrutam narmadāyāṁ prasiddhaṁ tatsarvapāpaharaṁ smṛtam
महाकाल से उत्पन्न लिंग दुग्धेश नाम से विख्यात है, जो नर्मदा तट पर प्रसिद्ध है और सर्वपापहर माना जाता है।
श्लोक 38 (shiva.kotirudra.1.38)
ऊँकारजं च यल्लिङ्गं कर्दमेशमिति श्रुतम् । प्रसिद्धं बिन्दुसरसि सर्वकामफलप्रदम् ॥ 1.38 ॥
ū~kārajaṁ ca yalliṅgaṁ kardameśamiti śrutam prasiddhaṁ bindusarasi sarvakāmaphalapradam
ओंकार से उत्पन्न जो लिंग कर्दमेश नाम से सुना जाता है, वह बिन्दुसरोवर में प्रसिद्ध है और सर्वकामनाओं का फल देने वाला है।
श्लोक 39 (shiva.kotirudra.1.39)
केदारेश्वरसञ्जातं भूतेशं यमुनातटे । महापापहरं प्रोक्तं पश्यतामर्चतां तथा ॥ 1.39 ॥
kedāreśvarasañjātaṁ bhūteśaṁ yamunātaṭe mahāpāpaharaṁ proktaṁ paśyatāmarcatāṁ tathā
केदारेश्वर से उत्पन्न भूतेश यमुना के तट पर है, जो दर्शन और पूजन करने वालों के महापापों को हरने वाला कहा गया है।
श्लोक 40 (shiva.kotirudra.1.40)
भीमशङ्करसम्भूतं भीमेश्वरमिति स्मृतम् । सह्याचले प्रसिद्धं तन्महाबलविवर्द्धनम् ॥ 1.40 ॥
bhīmaśaṅkarasambhūtaṁ bhīmeśvaramiti smṛtam sahyācale prasiddhaṁ tanmahābalavivarddhanam
भीमशंकर से उत्पन्न भीमेश्वर सह्याद्रि पर्वत में प्रसिद्ध है, जो महाबल को बढ़ाने वाला माना जाता है।
श्लोक 41 (shiva.kotirudra.1.41)
विश्वेश्वराच्च यज्जातं शरण्येश्वर विश्रुतम् । त्र्यम्बकस्य च यत्प्रोक्तं सिद्धेश्वर इति श्रुतम् ॥ 1.41 ॥
viśveśvarācca yajjātaṁ śaraṇyeśvara viśrutam tryambakasya ca yatproktaṁ siddheśvara iti śrutam
विश्वेश्वर से उत्पन्न उपलिंग शरण्येश्वर नाम से विख्यात है; और त्र्यम्बक का जो उपलिंग है, वह सिद्धेश्वर कहलाता है।
श्लोक 42 (shiva.kotirudra.1.42)
वैद्यनाथाच्च यज्जातं वैजनाथ इति स्मृतम् । नागेश्वरसमुद्भूतं भूतेश्वरमुदाहृतम् ॥ 1.42 ॥
vaidyanāthācca yajjātaṁ vaijanātha iti smṛtam nāgeśvarasamudbhūtaṁ bhūteśvaramudāhṛtam
वैद्यनाथ से उत्पन्न उपलिंग वैजनाथ कहलाता है; नागेश्वर से उत्पन्न उपलिंग भूतेश्वर कहा गया है।
श्लोक 43 (shiva.kotirudra.1.43)
मल्लिकासरस्वतीतीरे दर्शनात्पापहारकम् । रामेश्वराच्च यज्जातं गुप्तेश्वरमिति स्मृतम् ॥ 1.43 ॥
mallikāsarasvatītīre darśanātpāpahārakam rāmeśvarācca yajjātaṁ gupteśvaramiti smṛtam
मल्लिका-सरस्वती के तट पर स्थित यह दर्शनमात्र से पाप हरने वाला है; रामेश्वर से उत्पन्न उपलिंग गुप्तेश्वर कहा गया है।
श्लोक 44 (shiva.kotirudra.1.44)
घुश्मेशाच्चैव यज्जातं व्याघ्रेश्वरमिति स्मृतम् ज्योतिर्लिङ्गोपलिङ्गानि प्रोक्तानीह मया द्विजाः ॥ 1.44 ॥
ghuśmeśāccaiva yajjātaṁ vyāghreśvaramiti smṛtam jyotirliṅgopaliṅgāni proktānīha mayā dvijāḥ
घुश्मेश से उत्पन्न उपलिंग व्याघ्रेश्वर कहलाता है। हे द्विजो! इस प्रकार मैंने यहाँ ज्योतिर्लिंग और उनके उपलिंगों का वर्णन किया है।
श्लोक 45 (shiva.kotirudra.1.45)
दर्शनात्पापहारीणि सर्वकामप्रदानि च । एतानि सुप्रधानानि मुख्यतां हि गतानि च । अन्यानि चापि मुख्यानि श्रूयन्तामृषिसत्तमाः ॥ 1.45 ॥
darśanātpāpahārīṇi sarvakāmapradāni ca etāni supradhānāni mukhyatāṁ hi gatāni ca anyāni cāpi mukhyāni śrūyantāmṛṣisattamāḥ
ये दर्शनमात्र से पाप हरने वाले और समस्त कामनाओं को देने वाले हैं; ये अत्यन्त प्रधान हैं, मुख्यता को प्राप्त हैं। हे ऋषिसत्तमो! अब अन्य मुख्य लिंगों को भी सुनिए।