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कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 8

महाबल की महिमा

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

श्लोक 1 (shiva.kotirudra.8.1)

सूत उवाच । द्विजाः शृणुत सद्भक्त्या शिवलिङ्गानि तानि च । पश्चिमायां दिशायां वै यानि ख्यातानि भूतले ॥ 8.1 ॥

sūta uvāca dvijāḥ śṛṇuta sadbhaktyā śivaliṅgāni tāni ca paścimāyāṁ diśāyāṁ vai yāni khyātāni bhūtale

सूत ने कहा — हे द्विजो! उन शिवलिंगों को सद्भक्तिपूर्वक सुनिए, जो पश्चिम दिशा में पृथ्वी पर विख्यात हैं।

श्लोक 2 (shiva.kotirudra.8.2)

कपिलायां नगर्यां तु कालरामेश्वराभिधे । शिवलिङ्गे महादिव्ये दर्शनात्पापहारके ॥ 8.2 ॥

kapilāyāṁ nagaryāṁ tu kālarāmeśvarābhidhe śivaliṅge mahādivye darśanātpāpahārake

कपिला नगरी में कालरामेश्वर नामक महादिव्य शिवलिंग है, जो दर्शनमात्र से पाप हरने वाला है।

श्लोक 3 (shiva.kotirudra.8.3)

पश्चिमे सागरे चैव महासिद्धेश्वरः स्मृतः । धर्मार्थकामदश्चैव तथा मोक्षप्रदोऽपि हि ॥ 8.3 ॥

paścime sāgare caiva mahāsiddheśvaraḥ smṛtaḥ dharmārthakāmadaścaiva tathā mokṣaprado’pi hi

और पश्चिम सागर में महासिद्धेश्वर स्मरण किया जाता है, जो धर्म, अर्थ, काम देने वाला तथा मोक्षप्रद भी है।

श्लोक 4 (shiva.kotirudra.8.4)

पश्चिमाम्बुधितीरस्थं गोकर्णं क्षेत्रमुत्तमम् । ब्रह्महत्यादिपापघ्नं सर्वकामफलप्रदम् ॥ 8.4 ॥

paścimāmbudhitīrasthaṁ gokarṇaṁ kṣetramuttamam brahmahatyādipāpaghnaṁ sarvakāmaphalapradam

पश्चिम सागर के तट पर स्थित गोकर्ण एक उत्तम क्षेत्र है, जो ब्रह्महत्या आदि पापों का नाश करने वाला और समस्त कामनाओं का फल देने वाला है।

श्लोक 5 (shiva.kotirudra.8.5)

गोकर्णे शिवलिङ्गानि विद्यन्ते कोटिकोटिशः । असङ्ख्यातानि तीर्थानि तिष्ठन्ति च पदे पदे ॥ 8.5 ॥

gokarṇe śivaliṅgāni vidyante koṭikoṭiśaḥ asaṅkhyātāni tīrthāni tiṣṭhanti ca pade pade

गोकर्ण में करोड़ों-करोड़ों शिवलिंग विद्यमान हैं; वहाँ पग-पग पर असंख्य तीर्थ स्थित हैं।

श्लोक 6 (shiva.kotirudra.8.6)

बहुनात्र किमुक्तेन गोकर्णस्थानि सर्वशः । शिवप्रत्यक्षलिङ्गानि तीर्थान्यम्भांसि सर्वशः ॥ 8.6 ॥

bahunātra kimuktena gokarṇasthāni sarvaśaḥ śivapratyakṣaliṅgāni tīrthānyambhāṁsi sarvaśaḥ

यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ? गोकर्ण में सब कुछ शिव का साक्षात् लिंग है, और वहाँ के समस्त जल तीर्थ ही हैं।

श्लोक 7 (shiva.kotirudra.8.7)

गोकर्णे शिवलिङ्गानां तीर्थानामपि सर्वशः । वर्ण्यते महिमा तात पुराणेषु महर्षिभिः ॥ 8.7 ॥

gokarṇe śivaliṅgānāṁ tīrthānāmapi sarvaśaḥ varṇyate mahimā tāta purāṇeṣu maharṣibhiḥ

हे तात! गोकर्ण के शिवलिंगों और तीर्थों की महिमा का वर्णन महर्षियों ने पुराणों में किया है।

श्लोक 8 (shiva.kotirudra.8.8)

कृते युगे स हि श्वेतस्त्रेतायां सोऽतिलोहितः । द्वापरे पीतवर्णश्च कलौ श्यामो भविष्यति ॥ 8.8 ॥

kṛte yuge sa hi śvetastretāyāṁ so’tilohitaḥ dvāpare pītavarṇaśca kalau śyāmo bhaviṣyati

कृतयुग में वह श्वेत है, त्रेता में अत्यन्त लाल, द्वापर में पीले वर्ण का, और कलियुग में श्याम हो जाएगा।

श्लोक 9 (shiva.kotirudra.8.9)

आक्रान्तसप्तपातालकुहरोऽपि महाबलः । प्राप्ते कलियुगे घोरे मृदुतामुपयास्यति ॥ 8.9 ॥

ākrāntasaptapātālakuharo’pi mahābalaḥ prāpte kaliyuge ghore mṛdutāmupayāsyati

सातों पातालों की गुफाओं तक व्याप्त वह महाबल, भीषण कलियुग के आने पर कोमल हो जाएगा।

श्लोक 10 (shiva.kotirudra.8.10)

महापातकिनश्चात्र समभ्यर्च्य महाबलम् । शिवलिङ्गं च गोकर्णे प्रयाताः शाङ्करं पदम् ॥ 8.10 ॥

mahāpātakinaścātra samabhyarcya mahābalam śivaliṅgaṁ ca gokarṇe prayātāḥ śāṅkaraṁ padam

बड़े-बड़े पापी भी गोकर्ण के इस महाबल शिवलिंग की भलीभाँति पूजा कर शांकर पद को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 11 (shiva.kotirudra.8.11)

गोकर्णे तत्र मुनयो गत्वा पुण्यर्क्षवासरे । येऽर्चयन्ति च तं भक्त्या ते रुद्राः स्युर्न संशयः ॥ 8.11 ॥

gokarṇe tatra munayo gatvā puṇyarkṣavāsare ye’rcayanti ca taṁ bhaktyā te rudrāḥ syurna saṁśayaḥ

हे मुनियो! जो लोग पुण्य नक्षत्र के दिन गोकर्ण जाकर भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करते हैं, वे निःसन्देह रुद्र हो जाते हैं।

श्लोक 12 (shiva.kotirudra.8.12)

यदा कदाचिद्गोकर्णे यो वा को वापि मानवः । पूजयेच्छिवलिङ्गं तत्स गच्छेद् ब्रह्मणः पदम् ॥ 8.12 ॥

yadā kadācidgokarṇe yo vā ko vāpi mānavaḥ pūjayecchivaliṅgaṁ tatsa gacched brahmaṇaḥ padam

जब कभी भी, जो कोई भी मनुष्य गोकर्ण में उस शिवलिंग की पूजा करता है, वह ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (shiva.kotirudra.8.13)

ब्रह्मविष्ण्वादिदेवानां शङ्करो हितकाम्यया । महाबलाभिधानेन देवः सन्निहितः सदा ॥ 8.13 ॥

brahmaviṣṇvādidevānāṁ śaṅkaro hitakāmyayā mahābalābhidhānena devaḥ sannihitaḥ sadā

ब्रह्मा, विष्णु आदि देवताओं के हित की कामना से शंकर देव सदा महाबल नाम से वहाँ विद्यमान रहते हैं।

श्लोक 14 (shiva.kotirudra.8.14)

घोरेण तपसा लब्धं रावणाख्येन रक्षसा । तल्लिङ्गं स्थापयामास गोकर्णे गणनायकः ॥ 8.14 ॥

ghoreṇa tapasā labdhaṁ rāvaṇākhyena rakṣasā talliṅgaṁ sthāpayāmāsa gokarṇe gaṇanāyakaḥ

रावण नामक राक्षस ने घोर तपस्या से जो लिंग प्राप्त किया था, उसे गणनायक (गणेश) ने गोकर्ण में स्थापित कर दिया।

श्लोक 15 (shiva.kotirudra.8.15)

विष्णुर्ब्रह्मा महेन्द्रश्च विश्वेदेवा मरुद्गणाः । आदित्या वसवो दस्रौ शशाङ्कश्च सतारकः ॥ 8.15 ॥

viṣṇurbrahmā mahendraśca viśvedevā marudgaṇāḥ ādityā vasavo dasrau śaśāṅkaśca satārakaḥ

विष्णु, ब्रह्मा, महेन्द्र, विश्वेदेव, मरुद्गण, आदित्यगण, वसुगण, दोनों अश्विनीकुमार, और नक्षत्रों सहित चन्द्रमा —

श्लोक 16 (shiva.kotirudra.8.16)

एते विमानगतयो देवाश्च सह पार्षदैः । पूर्वद्वारं निषेवन्ते तस्य वै प्रीतिकारणात् ॥ 8.16 ॥

ete vimānagatayo devāśca saha pārṣadaiḥ pūrvadvāraṁ niṣevante tasya vai prītikāraṇāt

— विमानों में गमन करने वाले ये देवगण अपने पार्षदों सहित, उनके प्रति प्रेम के कारण, उनके पूर्वद्वार की सेवा करते हैं।

श्लोक 17 (shiva.kotirudra.8.17)

यमो मृत्युः स्वयं साक्षाच्चित्रगुप्तश्च पावकः । पितृभिः सह रुद्रैश्च दक्षिणद्वारमाश्रितः ॥ 8.17 ॥

yamo mṛtyuḥ svayaṁ sākṣāccitraguptaśca pāvakaḥ pitṛbhiḥ saha rudraiśca dakṣiṇadvāramāśritaḥ

यम, साक्षात् स्वयं मृत्यु, चित्रगुप्त और अग्नि, पितरों तथा रुद्रों सहित दक्षिणद्वार पर आश्रित रहते हैं।

श्लोक 18 (shiva.kotirudra.8.18)

वरुणः सरितां नाथो गङ्गादिसरितां गणैः । महाबलं च सेवन्ते पश्चिमद्वारमाश्रिताः ॥ 8.18 ॥

varuṇaḥ saritāṁ nātho gaṅgādisaritāṁ gaṇaiḥ mahābalaṁ ca sevante paścimadvāramāśritāḥ

नदियों के स्वामी वरुण, गंगा आदि नदियों के समूहों सहित, महाबल की सेवा करते हुए पश्चिमद्वार पर आश्रित रहते हैं।

श्लोक 19 (shiva.kotirudra.8.19)

तथा वायुः कुबेरश्च देवेशी भद्रकालिका । मातृभिश्चण्डिकाद्याभिरुत्तरद्वारमाश्रिताः ॥ 8.19 ॥

tathā vāyuḥ kuberaśca deveśī bhadrakālikā mātṛbhiścaṇḍikādyābhiruttaradvāramāśritāḥ

इसी प्रकार वायु, कुबेर, तथा देवेशी भद्रकालिका, चण्डिका आदि मातृकाओं सहित उत्तरद्वार पर आश्रित रहते हैं।

श्लोक 20 (shiva.kotirudra.8.20)

सर्वे देवाः सगन्धर्वाः पितरः सिद्धचारणाः । विद्याधराः किम्पुरुषाः किन्नरा गुह्यकाः खगाः ॥ 8.20 ॥

sarve devāḥ sagandharvāḥ pitaraḥ siddhacāraṇāḥ vidyādharāḥ kimpuruṣāḥ kinnarā guhyakāḥ khagāḥ

गन्धर्वों सहित सभी देवता, पितर, सिद्ध, चारण, विद्याधर, किम्पुरुष, किन्नर, गुह्यक, पक्षी —

श्लोक 21 (shiva.kotirudra.8.21)

नानापिशाचा वेताला दैतेयाश्च महाबलाः । नागाः शेषादयः सर्वे सिद्धाश्च मुनयोऽखिलाः ॥ 8.21 ॥

nānāpiśācā vetālā daiteyāśca mahābalāḥ nāgāḥ śeṣādayaḥ sarve siddhāśca munayo’khilāḥ

— विविध पिशाच, वेताल, बलशाली दैत्यगण, शेष आदि समस्त नाग, सिद्धगण और समस्त मुनि —

श्लोक 22 (shiva.kotirudra.8.22)

प्रणुवन्ति च तं देवं प्रणमन्ति महाबलम् । लभन्त ईप्सितान्कामान् रमन्ते च यथासुखम् ॥ 8.22 ॥

praṇuvanti ca taṁ devaṁ praṇamanti mahābalam labhanta īpsitānkāmān ramante ca yathāsukham

— वे सब उस देव महाबल की स्तुति करते और प्रणाम करते हैं; वे अपनी अभीष्ट कामनाओं को प्राप्त कर यथासुख विहार करते हैं।

श्लोक 23 (shiva.kotirudra.8.23)

बहुभिस्तत्र सुतपस्तप्तं सम्पूज्य तं विभुम् । लब्धा हि परमा सिद्धिरिहामुत्रापि सौख्यदा ॥ 8.23 ॥

bahubhistatra sutapastaptaṁ sampūjya taṁ vibhum labdhā hi paramā siddhirihāmutrāpi saukhyadā

वहाँ अनेकों ने उत्तम तपस्या कर उस विभु की पूजा की है, और इस लोक तथा परलोक दोनों में सुख देने वाली परम सिद्धि प्राप्त की है।

श्लोक 24 (shiva.kotirudra.8.24)

गोकर्णे शिवलिङ्गं तु मोक्षद्वार उदाहृतः । महाबलाभिधानोऽसौ पूजितः संस्तुतो द्विजाः ॥ 8.24 ॥

gokarṇe śivaliṅgaṁ tu mokṣadvāra udāhṛtaḥ mahābalābhidhāno’sau pūjitaḥ saṁstuto dvijāḥ

हे द्विजो! गोकर्ण का वह शिवलिंग, जो महाबल नाम से पूजित और स्तुत है, मोक्ष का द्वार कहा गया है।

श्लोक 25 (shiva.kotirudra.8.25)

माघासितचतुर्दश्यां महाबलसमर्चनम् । विमुक्तिदं विशेषेण सर्वेषां पापिनामपि ॥ 8.25 ॥

māghāsitacaturdaśyāṁ mahābalasamarcanam vimuktidaṁ viśeṣeṇa sarveṣāṁ pāpināmapi

माघ मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को महाबल की पूजा विशेष रूप से समस्त पापियों को भी मुक्ति देने वाली है।

श्लोक 26 (shiva.kotirudra.8.26)

अस्यां शिवतिथौ सर्वे महोत्सवदिदृक्षवः । आयान्ति सर्वदेशेभ्यश्चातुर्वर्ण्यमहाजनाः ॥ 8.26 ॥

asyāṁ śivatithau sarve mahotsavadidṛkṣavaḥ āyānti sarvadeśebhyaścāturvarṇyamahājanāḥ

इस शिव-तिथि पर महोत्सव देखने के इच्छुक चारों वर्णों के लोग सभी देशों से यहाँ आते हैं।

श्लोक 27 (shiva.kotirudra.8.27)

स्त्रियो वृद्धाश्च बालाश्च चतुराश्रमवासिनः । दृष्ट्वा तत्रैत्य देवेशं लेभिरे कृतकृत्यताम् ॥ 8.27 ॥

striyo vṛddhāśca bālāśca caturāśramavāsinaḥ dṛṣṭvā tatraitya deveśaṁ lebhire kṛtakṛtyatām

स्त्रियाँ, वृद्ध, बालक और चारों आश्रमों में रहने वाले लोग वहाँ आकर देवेश का दर्शन कर कृतकृत्यता को प्राप्त होते हैं।

श्लोक 28 (shiva.kotirudra.8.28)

महाबलप्रभावात्ते तच्च लिङ्गं शिवस्य तु । सम्पूज्यैकाथ चाण्डाली शिवलोकं गता द्रुतम् ॥ 8.28 ॥

mahābalaprabhāvātte tacca liṅgaṁ śivasya tu sampūjyaikātha cāṇḍālī śivalokaṁ gatā drutam

महाबल के प्रभाव से ही शिव के उस लिंग की एक बार पूजा कर एक चाण्डाल स्त्री भी शीघ्र शिवलोक को प्राप्त हो गई।

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