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कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 9

चाण्डाली की सद्गति

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (shiva.kotirudra.9.1)

ऋषय ऊचुः । सूत सूत महाभाग धन्यस्त्वं शैवसत्तमः । चाण्डाली का समाख्याता तत्कथां कथय प्रभो ॥ 9.1 ॥

ṛṣaya ūcuḥ sūta sūta mahābhāga dhanyastvaṁ śaivasattamaḥ cāṇḍālī kā samākhyātā tatkathāṁ kathaya prabho

ऋषियों ने कहा — हे सूत! हे सूत! हे महाभाग्यशाली! आप धन्य हैं, शैवों में श्रेष्ठ हैं। जिस चाण्डाली का उल्लेख हुआ, वह कौन थी? हे प्रभो! उसकी कथा कहिए।

श्लोक 2 (shiva.kotirudra.9.2)

सूत उवाच । द्विजाः शृणुत सद्भक्त्या तां कथां परमाद्भुताम् । शिवप्रभावसम्मिश्रां शृण्वतां भक्तिवर्धिनीम् ॥ 9.2 ॥

sūta uvāca dvijāḥ śṛṇuta sadbhaktyā tāṁ kathāṁ paramādbhutām śivaprabhāvasammiśrāṁ śṛṇvatāṁ bhaktivardhinīm

सूत जी ने कहा — हे द्विजो! उस परम अद्भुत कथा को श्रद्धापूर्वक सुनो, जो शिव की महिमा से युक्त है और सुनने वालों की भक्ति को बढ़ाने वाली है।

श्लोक 3 (shiva.kotirudra.9.3)

चाण्डाली सा पूर्वभवेऽभवद् ब्राह्मणकन्यका । सौमिनी नाम चन्द्रास्या सर्वलक्षणसंयुता ॥ 9.3 ॥

cāṇḍālī sā pūrvabhave’bhavad brāhmaṇakanyakā sauminī nāma candrāsyā sarvalakṣaṇasaṁyutā

वह चाण्डाली अपने पूर्वजन्म में एक ब्राह्मण-कन्या थी, जिसका नाम सौमिनी था; वह चन्द्रमुखी थी और समस्त शुभ लक्षणों से युक्त थी।

श्लोक 4 (shiva.kotirudra.9.4)

अथ सा समये कन्या युवतिः सौमिनी द्विजाः । पित्रा दत्ता च कस्मैचिद्विधिना द्विजसूनवे ॥ 9.4 ॥

atha sā samaye kanyā yuvatiḥ sauminī dvijāḥ pitrā dattā ca kasmaicidvidhinā dvijasūnave

हे द्विजो! समय आने पर युवती कन्या सौमिनी को उसके पिता ने विधिपूर्वक किसी ब्राह्मण-पुत्र को विवाह में दे दिया।

श्लोक 5 (shiva.kotirudra.9.5)

सा भर्तारमनुप्राप्य किञ्चित्कालं शुभव्रता । रेमे तेन द्विजश्रेष्ठा नवयौवनशालिनी ॥ 9.5 ॥

sā bhartāramanuprāpya kiñcitkālaṁ śubhavratā reme tena dvijaśreṣṭhā navayauvanaśālinī

पति को प्राप्त कर वह शुभव्रता, नवयौवनसम्पन्न स्त्री कुछ काल तक उसके साथ सानन्द रही, हे द्विजश्रेष्ठो!

श्लोक 6 (shiva.kotirudra.9.6)

अथ तस्याः पतिर्विप्रस्तरुणः सुरुजार्दितः । सौमिन्याः कालयोगात्तु पञ्चत्वमगमद् द्विजाः ॥ 9.6 ॥

atha tasyāḥ patirviprastaruṇaḥ surujārditaḥ sauminyāḥ kālayogāttu pañcatvamagamad dvijāḥ

तत्पश्चात् सौमिनी का युवा ब्राह्मण पति गम्भीर रोग से पीड़ित होकर, कालयोग से मृत्यु को प्राप्त हो गया, हे द्विजो!

श्लोक 7 (shiva.kotirudra.9.7)

मृते भर्तरि सा नारी दुःखितातिविषण्णधीः । किञ्चित्कालं शुभाचारा सुशीलोवास सद्मनि ॥ 9.7 ॥

mṛte bhartari sā nārī duḥkhitātiviṣaṇṇadhīḥ kiñcitkālaṁ śubhācārā suśīlovāsa sadmani

पति की मृत्यु के पश्चात् वह दुःखित और अत्यंत उदास मन वाली स्त्री कुछ काल तक शुभ आचरण और सुशीलता से घर में रही।

श्लोक 8 (shiva.kotirudra.9.8)

ततः सा मन्मथाविष्टहृदया विधवापि च । युवावस्थाविशेषेण बभूव व्यभिचारिणी ॥ 9.8 ॥

tataḥ sā manmathāviṣṭahṛdayā vidhavāpi ca yuvāvasthāviśeṣeṇa babhūva vyabhicāriṇī

तत्पश्चात् काम से आविष्ट हृदय वाली वह विधवा स्त्री, अपनी युवावस्था के विशेष प्रभाव से व्यभिचारिणी बन गई।

श्लोक 9 (shiva.kotirudra.9.9)

तज्ज्ञात्वा गोत्रिणस्तस्या दुष्कर्म कुलदूषणम् । समेतास्तत्यजुर्दूरं नीत्वा तां सकचग्रहाम् ॥ 9.9 ॥

tajjñātvā gotriṇastasyā duṣkarma kuladūṣaṇam sametāstatyajurdūraṁ nītvā tāṁ sakacagrahām

उसका यह कुल को कलंकित करने वाला दुष्कर्म जानकर उसके सहगोत्री एकत्र हुए और उसे बालों से पकड़कर दूर ले जाकर त्याग दिया।

श्लोक 10 (shiva.kotirudra.9.10)

कश्चिच्छूद्रवरस्तां वै विचरन्तीं निजेच्छया । दृष्ट्वा वने स्त्रियं चक्रे निनाय स्वगृहं ततः ॥ 9.10 ॥

kaścicchūdravarastāṁ vai vicarantīṁ nijecchayā dṛṣṭvā vane striyaṁ cakre nināya svagṛhaṁ tataḥ

किसी श्रेष्ठ शूद्र ने उस स्त्री को वन में स्वेच्छा से विचरण करते देखा, और उसे अपनी बना लिया, फिर अपने घर ले गया।

श्लोक 11 (shiva.kotirudra.9.11)

अथ सा पिशिताहारा नित्यमापीतवारुणी । अजीजनत्सुतां तेन शूद्रेण सुरतप्रिया ॥ 9.11 ॥

atha sā piśitāhārā nityamāpītavāruṇī ajījanatsutāṁ tena śūdreṇa suratapriyā

तत्पश्चात् मांसाहारी, नित्य मदिरापान करने वाली और रतिप्रिय वह स्त्री उस शूद्र से एक पुत्री को जन्म देने लगी।

श्लोक 12 (shiva.kotirudra.9.12)

कदाचिद्भर्तरि क्वापि याते पीतसुराथ सा । इयेष पिशिताहारं सौमिनी व्यभिचारिणी ॥ 9.12 ॥

kadācidbhartari kvāpi yāte pītasurātha sā iyeṣa piśitāhāraṁ sauminī vyabhicāriṇī

एक बार जब उसका पति कहीं गया हुआ था, तब मदिरा पीकर व्यभिचारिणी सौमिनी को मांसाहार की इच्छा हुई।

श्लोक 13 (shiva.kotirudra.9.13)

ततो मेषेषु बद्धेषु गोभिः सह बहिर्व्रजे । निशामुखे तमोऽन्धे हि खड्गमादाय सा ययौ ॥ 9.13 ॥

tato meṣeṣu baddheṣu gobhiḥ saha bahirvraje niśāmukhe tamo’ndhe hi khaḍgamādāya sā yayau

तब भेड़ें गौओं के साथ बाहर बाड़े में बँधी हुई थीं; रात्रि के प्रारम्भ में, घोर अंधकार में, वह तलवार लेकर वहाँ गई।

श्लोक 14 (shiva.kotirudra.9.14)

अविमृश्य मदावेशान्मेषबुद्ध्यामिषप्रिया । एकं जघान गोवत्सं क्रोशन्तमतिदुर्भगा ॥ 9.14 ॥

avimṛśya madāveśānmeṣabuddhyāmiṣapriyā ekaṁ jaghāna govatsaṁ krośantamatidurbhagā

बिना विचारे, मद के वेग में, मांस की लालसा में, उस अत्यंत अभागिनी ने भेड़ समझकर एक रँभाते हुए गोवत्स को मार डाला।

श्लोक 15 (shiva.kotirudra.9.15)

हतं तं गृहमानीय ज्ञात्वा गोवत्समङ्गना । भीता शिव शिवेत्याह केनचित्पुण्यकर्मणा ॥ 9.15 ॥

hataṁ taṁ gṛhamānīya jñātvā govatsamaṅganā bhītā śiva śivetyāha kenacitpuṇyakarmaṇā

मारे गए उस पशु को घर लाकर जब उस स्त्री ने जाना कि वह गोवत्स है, तो वह भयभीत हो उठी और किसी पूर्वजन्म के पुण्य-प्रभाव से "शिव शिव" कह उठी।

श्लोक 16 (shiva.kotirudra.9.16)

सा मुहूर्तं शिवं ध्यात्वामिषभोजनलालसा । छित्त्वा तमेव गोवत्सं चकाराहारमीप्सितम् ॥ 9.16 ॥

sā muhūrtaṁ śivaṁ dhyātvāmiṣabhojanalālasā chittvā tameva govatsaṁ cakārāhāramīpsitam

फिर भी, क्षणभर शिव का ध्यान करने के बाद, मांसाहार की लालसा वाली उस स्त्री ने उसी गोवत्स को काटकर अपना अभीष्ट आहार बना लिया।

श्लोक 17 (shiva.kotirudra.9.17)

एवं बहुतिथे काले गते सा सौमिनी द्विजाः । कालस्य वशमापन्ना जगाम यमसङ्क्षयम् ॥ 9.17 ॥

evaṁ bahutithe kāle gate sā sauminī dvijāḥ kālasya vaśamāpannā jagāma yamasaṅkṣayam

हे द्विजो! इस प्रकार बहुत समय बीत जाने पर वह सौमिनी काल के वशीभूत होकर यमलोक को चली गई।

श्लोक 18 (shiva.kotirudra.9.18)

यमोऽपि धर्ममालोक्य तस्याः कर्म च पौर्विकम् । निवर्त्य निरयावासाच्चक्रे चाण्डालजातिकाम् ॥ 9.18 ॥

yamo’pi dharmamālokya tasyāḥ karma ca paurvikam nivartya nirayāvāsāccakre cāṇḍālajātikām

यम ने भी उसके धर्म और पूर्वकर्म को देखकर, उसे नरकवास से मुक्त कर, चाण्डाल-जाति में जन्म दिलाया।

श्लोक 19 (shiva.kotirudra.9.19)

साथ भ्रष्टा यमपुराच्चाण्डालीगर्भमाश्रिता । ततो बभूव जन्मान्धा प्रशान्ताङ्गारमेचका ॥ 9.19 ॥

sātha bhraṣṭā yamapurāccāṇḍālīgarbhamāśritā tato babhūva janmāndhā praśāntāṅgāramecakā

यमपुरी से च्युत होकर वह एक चाण्डाल-स्त्री के गर्भ में आश्रित हुई, और वहाँ से जन्मांध तथा बुझे हुए अंगारे के समान श्याम वर्ण की होकर उत्पन्न हुई।

श्लोक 20 (shiva.kotirudra.9.20)

जन्मान्धा साथ बाल्येऽपि विध्वस्तपितृमातृका । ऊढा न केनचिद्दुष्टा महाकुष्ठरुजार्दिता ॥ 9.20 ॥

janmāndhā sātha bālye’pi vidhvastapitṛmātṛkā ūḍhā na kenacidduṣṭā mahākuṣṭharujārditā

जन्म से अंधी वह बाल्यावस्था में ही माता-पिता से वंचित हो गई; कुरूप और महाकुष्ठरोग से पीड़ित होने के कारण किसी ने उससे विवाह नहीं किया।

श्लोक 21 (shiva.kotirudra.9.21)

ततः क्षुधार्दिता दीना यष्टिपाणिर्गतेक्षणा । चाण्डालोच्छिष्टपिण्डेन जठराग्निमतर्पयत् ॥ 9.21 ॥

tataḥ kṣudhārditā dīnā yaṣṭipāṇirgatekṣaṇā cāṇḍālocchiṣṭapiṇḍena jaṭharāgnimatarpayat

तब भूख से पीड़ित, दीन, हाथ में लाठी लिए, नेत्रहीन वह चाण्डालों के उच्छिष्ट अन्न से अपनी उदराग्नि शांत करती थी।

श्लोक 22 (shiva.kotirudra.9.22)

एवं कृच्छ्रेण महता नीत्वा स्वविपुलं वयः । जरया ग्रस्तसर्वाङ्गी दुःखमाप दुरत्ययम् ॥ 9.22 ॥

evaṁ kṛcchreṇa mahatā nītvā svavipulaṁ vayaḥ jarayā grastasarvāṅgī duḥkhamāpa duratyayam

इस प्रकार भारी कष्ट से अपनी दीर्घ आयु बिताकर, वृद्धावस्था से समस्त अंगों के जर्जर हो जाने पर, उसे असह्य दुःख प्राप्त हुआ।

श्लोक 23 (shiva.kotirudra.9.23)

कदाचित्साथ चाण्डाली गोकर्णं तं महाजनान् । आयास्यन्त्यां शिवतिथौ गच्छतो बुबुधेऽध्वगान् ॥ 9.23 ॥

kadācitsātha cāṇḍālī gokarṇaṁ taṁ mahājanān āyāsyantyāṁ śivatithau gacchato bubudhe’dhvagān

एक बार, शिव की पावन तिथि के आने पर, उस चाण्डाली को पता चला कि बहुत से यात्री गोकर्ण की ओर मार्ग में जा रहे हैं।

श्लोक 24 (shiva.kotirudra.9.24)

अथासावपि चाण्डाली वसनाशनतृष्णया । महाजनान् याचयितुं सञ्चचार शनैः शनैः ॥ 9.24 ॥

athāsāvapi cāṇḍālī vasanāśanatṛṣṇayā mahājanān yācayituṁ sañcacāra śanaiḥ śanaiḥ

तब वह चाण्डाली भी वस्त्र और भोजन की तृष्णा से उन महाजनों से भिक्षा माँगने के लिए धीरे-धीरे चलने लगी।

श्लोक 25 (shiva.kotirudra.9.25)

गत्वा तत्राथ चाण्डाली प्रार्थयन्ती महाजनान् । यत्र तत्र चचारासौ दीनवाक्प्रसृताञ्जलिः ॥ 9.25 ॥

gatvā tatrātha cāṇḍālī prārthayantī mahājanān yatra tatra cacārāsau dīnavākprasṛtāñjaliḥ

वहाँ जाकर वह चाण्डाली महाजनों से प्रार्थना करती हुई, दीन वाणी में हाथ फैलाए इधर-उधर घूमने लगी।

श्लोक 26 (shiva.kotirudra.9.26)

एवमभ्यर्थयन्त्यास्तु चाण्डाल्याः प्रसृताञ्जलौ । एकः पुण्यतमः पान्थः प्राक्षिपद्विल्वमञ्जरीम् ॥ 9.26 ॥

evamabhyarthayantyāstu cāṇḍālyāḥ prasṛtāñjalau ekaḥ puṇyatamaḥ pānthaḥ prākṣipadvilvamañjarīm

इस प्रकार याचना करती हुई चाण्डाली के फैले हुए हाथों में एक अत्यंत पुण्यात्मा पथिक ने बिल्वपत्रों का एक गुच्छा डाल दिया।

श्लोक 27 (shiva.kotirudra.9.27)

तामञ्जलौ निपतितां सा विमृश्य पुनः पुनः । अभक्ष्यमिति मत्वाथ दूरे प्राक्षिपदातुरा ॥ 9.27 ॥

tāmañjalau nipatitāṁ sā vimṛśya punaḥ punaḥ abhakṣyamiti matvātha dūre prākṣipadāturā

अपने हाथों में गिरी उस वस्तु को बार-बार टटोलकर, उसे अखाद्य समझकर, वह व्याकुल स्त्री उसे दूर फेंक देती है।

श्लोक 28 (shiva.kotirudra.9.28)

तस्याः कराद्विनिर्मुक्ता रात्रौ सा बिल्वमञ्जरी । पपात कस्यचिद्दिष्ट्या शिवलिङ्गस्य मस्तके ॥ 9.28 ॥

tasyāḥ karādvinirmuktā rātrau sā bilvamañjarī papāta kasyaciddiṣṭyā śivaliṅgasya mastake

उसके हाथ से छूटकर वह बिल्वपत्रों का गुच्छा रात्रि में किसी सौभाग्य से एक शिवलिंग के मस्तक पर जा गिरा।

श्लोक 29 (shiva.kotirudra.9.29)

सैवं शिवचतुर्दश्यां रात्रौ पान्थजनान् मुहुः । याचमानापि यत्किञ्चिन्न लेभे दैवयोगतः ॥ 9.29 ॥

saivaṁ śivacaturdaśyāṁ rātrau pānthajanān muhuḥ yācamānāpi yatkiñcinna lebhe daivayogataḥ

इस प्रकार शिवचतुर्दशी की रात्रि में बार-बार पथिकों से याचना करते हुए भी, दैवयोग से उसे कुछ भी प्राप्त नहीं हुआ।

श्लोक 30 (shiva.kotirudra.9.30)

एवं शिवचतुर्दश्या व्रतं जातं च निर्मलम् । अज्ञानतो जागरणं परमानन्ददायकम् ॥ 9.30 ॥

evaṁ śivacaturdaśyā vrataṁ jātaṁ ca nirmalam ajñānato jāgaraṇaṁ paramānandadāyakam

इस प्रकार अनजाने में ही शिवचतुर्दशी का निर्मल व्रत उससे सम्पन्न हो गया — वह जागरण, जो परम आनंद प्रदान करने वाला है।

श्लोक 31 (shiva.kotirudra.9.31)

ततः प्रभाते सा नारी शोकेन महतावृता । शनैर्निववृते दीना स्वदेशायैव केवलम् ॥ 9.31 ॥

tataḥ prabhāte sā nārī śokena mahatāvṛtā śanairnivavṛte dīnā svadeśāyaiva kevalam

तत्पश्चात् प्रातःकाल वह स्त्री महाशोक से आवृत होकर, दीन दशा में धीरे-धीरे अकेली अपने स्थान की ओर लौट चली।

श्लोक 32 (shiva.kotirudra.9.32)

श्रान्ता चिरोपवासेन निपतन्ती पदे पदे । अतीत्य तावतीं भूमिं निपपात विचेतना ॥ 9.32 ॥

śrāntā ciropavāsena nipatantī pade pade atītya tāvatīṁ bhūmiṁ nipapāta vicetanā

दीर्घ उपवास से थकी हुई, पग-पग पर गिरती हुई, इतनी दूर चलकर वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ी।

श्लोक 33 (shiva.kotirudra.9.33)

अथ सा शम्भुकृपया जगाम परमं पदम् । आरुह्य सुविमानं च नीतं शिवगणैर्द्रुतम् ॥ 9.33 ॥

atha sā śambhukṛpayā jagāma paramaṁ padam āruhya suvimānaṁ ca nītaṁ śivagaṇairdrutam

तत्पश्चात् शम्भु की कृपा से वह परम पद को प्राप्त हुई, एक सुंदर विमान पर आरूढ़ होकर, शिवगणों द्वारा शीघ्रता से ले जाई गई।

श्लोक 34 (shiva.kotirudra.9.34)

आदौ यदेषा शिवनाम नारी प्रमादतो वाप्यसती जगाद । तेनेह भूयः सुकृतेन विप्रा महाबलस्थानमवाप दिव्यम् ॥ 9.34 ॥

ādau yadeṣā śivanāma nārī pramādato vāpyasatī jagāda teneha bhūyaḥ sukṛtena viprā mahābalasthānamavāpa divyam

क्योंकि आरंभ में इस असती स्त्री ने भी असावधानीवश शिव का नाम उच्चारण किया था, हे विप्रो! उसी पुण्य के कारण उसने महाबल के दिव्य धाम को प्राप्त किया।

श्लोक 35 (shiva.kotirudra.9.35)

श्रीगोकर्णे शिवतिथावुपोष्य शिवमस्तके । कृत्वा जागरणं सा हि चक्रे बिल्वार्चनं निशि ॥ 9.35 ॥

śrīgokarṇe śivatithāvupoṣya śivamastake kṛtvā jāgaraṇaṁ sā hi cakre bilvārcanaṁ niśi

श्री गोकर्ण में शिव की पावन तिथि को उपवास करके और रात्रि-जागरण करके, उसने रात्रि में शिव के मस्तक पर बिल्वपत्र से पूजा की।

श्लोक 36 (shiva.kotirudra.9.36)

अकामतः कृतस्यास्य पुण्यस्यैव च तत्फलम् । भुनक्त्यद्यापि सा चैव महाबलप्रसादतः ॥ 9.36 ॥

akāmataḥ kṛtasyāsya puṇyasyaiva ca tatphalam bhunaktyadyāpi sā caiva mahābalaprasādataḥ

बिना किसी कामना के किए गए इस पुण्य का यही फल है — वह आज भी महाबल की कृपा से उसका उपभोग कर रही है।

श्लोक 37 (shiva.kotirudra.9.37)

एवंविधं महालिङ्गं शङ्करस्य महाबलम् । सर्वपापहरं सद्यः परमानन्ददायकम् ॥ 9.37 ॥

evaṁvidhaṁ mahāliṅgaṁ śaṅkarasya mahābalam sarvapāpaharaṁ sadyaḥ paramānandadāyakam

शंकर का यह महाबल नामक महालिंग ऐसा ही है — यह तत्काल समस्त पापों का हरण करने वाला और परम आनंद प्रदान करने वाला है।

श्लोक 38 (shiva.kotirudra.9.38)

एवं वः कथितं विप्रा माहात्म्यं परमं मया । महाबलाभिधानस्य शिवलिङ्गवरस्य हि ॥ 9.38 ॥

evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā māhātmyaṁ paramaṁ mayā mahābalābhidhānasya śivaliṅgavarasya hi

हे विप्रो! इस प्रकार मैंने आपको महाबल नामक उस श्रेष्ठ शिवलिंग की परम महिमा सुनाई।

श्लोक 39 (shiva.kotirudra.9.39)

अथान्यदपि वक्ष्यामि माहात्म्यं तस्य चाद्भुतम् । श्रुतमात्रेण येनाशु शिवे भक्तिः प्रजायते ॥ 9.39 ॥

athānyadapi vakṣyāmi māhātmyaṁ tasya cādbhutam śrutamātreṇa yenāśu śive bhaktiḥ prajāyate

अब मैं उसकी एक और अद्भुत महिमा कहूँगा, जिसे सुनने मात्र से ही शीघ्र शिव में भक्ति उत्पन्न हो जाती है।

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