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कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 10

महाबल शिवलिंग की महिमा

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (shiva.kotirudra.10.1)

सूत उवाच । श्रीमतीक्ष्वाकुवंशे हि राजा परमधार्मिकः । आसीन्मित्रसहो नाम श्रेष्ठः सर्वधनुष्मताम् ॥ 10.1 ॥

sūta uvāca śrīmatīkṣvākuvaṁśe hi rājā paramadhārmikaḥ āsīnmitrasaho nāma śreṣṭhaḥ sarvadhanuṣmatām

सूत जी ने कहा — श्रीमान् इक्ष्वाकु वंश में मित्रसह नामक एक परम धार्मिक राजा थे, जो समस्त धनुर्धरों में श्रेष्ठ थे।

श्लोक 2 (shiva.kotirudra.10.2)

तस्य राज्ञः सुधर्मिष्ठा मदयन्ती प्रिया शुभा । दमयन्ती नलस्येव बभूव विदिता सती ॥ 10.2 ॥

tasya rājñaḥ sudharmiṣṭhā madayantī priyā śubhā damayantī nalasyeva babhūva viditā satī

उस राजा की परम धर्मपरायणा, शुभ और प्रिय पत्नी मदयन्ती थीं, जो नल की दमयन्ती के समान पतिव्रता स्त्री के रूप में विख्यात हुईं।

श्लोक 3 (shiva.kotirudra.10.3)

स एकदा हि मृगयास्नेही मित्रसहो नृपः । महद्बलेन संयुक्तो जगाम गहनं वनम् ॥ 10.3 ॥

sa ekadā hi mṛgayāsnehī mitrasaho nṛpaḥ mahadbalena saṁyukto jagāma gahanaṁ vanam

एक बार मृगया-प्रेमी राजा मित्रसह विशाल सेना के साथ एक घने वन में गए।

श्लोक 4 (shiva.kotirudra.10.4)

विहरंस्तत्र स नृपः कमठाह्वं निशाचरम् । निजघान महादुष्टं साधुपीडाकरं खलम् ॥ 10.4 ॥

viharaṁstatra sa nṛpaḥ kamaṭhāhvaṁ niśācaram nijaghāna mahāduṣṭaṁ sādhupīḍākaraṁ khalam

वहाँ विचरण करते हुए उस राजा ने कमठ नामक एक महादुष्ट, साधुजनों को पीड़ा देने वाले, खल निशाचर का वध कर दिया।

श्लोक 5 (shiva.kotirudra.10.5)

अथ तस्यानुजः पापी जयेयं छद्मनैव तम् । मत्वा जगाम नृपतेरन्तिकं छद्मकारकः ॥ 10.5 ॥

atha tasyānujaḥ pāpī jayeyaṁ chadmanaiva tam matvā jagāma nṛpaterantikaṁ chadmakārakaḥ

तब उस राक्षस का पापी छोटा भाई यह सोचकर कि "मैं इसे केवल छल से ही जीतूँगा," छद्मवेश धारण कर राजा के समीप गया।

श्लोक 6 (shiva.kotirudra.10.6)

तं विनम्राकृतिं दृष्ट्वा भृत्यतां कर्तुमागतम् । चक्रे महानसाध्यक्षमज्ञानात्स महीपतिः ॥ 10.6 ॥

taṁ vinamrākṛtiṁ dṛṣṭvā bhṛtyatāṁ kartumāgatam cakre mahānasādhyakṣamajñānātsa mahīpatiḥ

उसे विनम्र रूप में सेवा करने के लिए आया हुआ देखकर, राजा ने अनजाने में उसे रसोई का अध्यक्ष बना दिया।

श्लोक 7 (shiva.kotirudra.10.7)

अथ तस्मिन्वने राजा कियत्कालं विहृत्य सः । निवृत्तो मृगयां हित्वा स्वपुरीमाययौ मुदा ॥ 10.7 ॥

atha tasminvane rājā kiyatkālaṁ vihṛtya saḥ nivṛtto mṛgayāṁ hitvā svapurīmāyayau mudā

तत्पश्चात् उस वन में कुछ काल तक विहार करके, राजा शिकार छोड़कर प्रसन्नतापूर्वक अपनी नगरी को लौट आए।

श्लोक 8 (shiva.kotirudra.10.8)

पितुः क्षयाहे सम्प्राप्ते निमन्त्र्य स्वगुरुं नृपः । वसिष्ठं गृहमानिन्ये भोजयामास भक्तितः ॥ 10.8 ॥

pituḥ kṣayāhe samprāpte nimantrya svaguruṁ nṛpaḥ vasiṣṭhaṁ gṛhamāninye bhojayāmāsa bhaktitaḥ

पिता के श्राद्ध का दिन आने पर राजा ने अपने गुरु वसिष्ठ को निमंत्रित कर अपने घर बुलाया और भक्तिपूर्वक उन्हें भोजन कराया।

श्लोक 9 (shiva.kotirudra.10.9)

रक्षसा सूदरूपेण सम्मिश्रितनरामिषम् । शाकामिषं पुरः क्षिप्तं दृष्ट्वा गुरुरथाब्रवीत् ॥ 10.9 ॥

rakṣasā sūdarūpeṇa sammiśritanarāmiṣam śākāmiṣaṁ puraḥ kṣiptaṁ dṛṣṭvā gururathābravīt

रसोइए के रूप में उस राक्षस द्वारा भोजन में मानव-मांस मिलाकर सामने परोसा गया देखकर, गुरु ने कहा।

श्लोक 10 (shiva.kotirudra.10.10)

गुरुरुवाच । धिक् त्वां नरामिषं राजंस्त्वयैतच्छद्मकारिणा । खलेनोपहृतं मह्यं ततो रक्षो भविष्यसि ॥ 10.10 ॥

gururuvāca dhik tvāṁ narāmiṣaṁ rājaṁstvayaitacchadmakāriṇā khalenopahṛtaṁ mahyaṁ tato rakṣo bhaviṣyasi

गुरु ने कहा — हे राजन्! तुझे धिक्कार है! तूने छलपूर्वक, दुष्टतावश यह नरमांस मुझे परोसा है; अतः अब तू राक्षस बन जाएगा।

श्लोक 11 (shiva.kotirudra.10.11)

रक्षःकृतं च विज्ञाय तदैवं स गुरुस्तदा । पुनर्विमृश्य तं शापं चकार द्वादशाब्दिकम् ॥ 10.11 ॥

rakṣaḥkṛtaṁ ca vijñāya tadaivaṁ sa gurustadā punarvimṛśya taṁ śāpaṁ cakāra dvādaśābdikam

तत्पश्चात् यह जानकर कि यह कार्य राक्षस ने किया था, गुरु ने पुनः विचार कर उस शाप को बारह वर्ष की अवधि तक सीमित कर दिया।

श्लोक 12 (shiva.kotirudra.10.12)

स राजानुचितं शापं विज्ञाय क्रोधमूर्छितः । जलाञ्जलिं समादाय गुरुं शप्तुं समुद्यतः ॥ 10.12 ॥

sa rājānucitaṁ śāpaṁ vijñāya krodhamūrchitaḥ jalāñjaliṁ samādāya guruṁ śaptuṁ samudyataḥ

उस अनुचित शाप को जानकर क्रोध से मूर्च्छित हुआ राजा जल अंजलि में लेकर गुरु को शाप देने के लिए उद्यत हो गया।

श्लोक 13 (shiva.kotirudra.10.13)

तदा च तत्प्रिया साध्वी मदयन्ती सुधर्मिणी । पतित्वा पादयोस्तस्य शापं तं हि न्यवारयत् ॥ 10.13 ॥

tadā ca tatpriyā sādhvī madayantī sudharmiṇī patitvā pādayostasya śāpaṁ taṁ hi nyavārayat

तब उसकी पतिव्रता, परम धर्मपरायणा पत्नी मदयन्ती ने उसके चरणों में गिरकर उस शाप से उसे रोक दिया।

श्लोक 14 (shiva.kotirudra.10.14)

ततो निवृत्तशापस्तु तस्या वचनगौरवात् । तत्याज पादयोरम्भः पादौ कल्मषतां गतौ ॥ 10.14 ॥

tato nivṛttaśāpastu tasyā vacanagauravāt tatyāja pādayorambhaḥ pādau kalmaṣatāṁ gatau

तत्पश्चात् उसके वचनों के सम्मानवश शाप से विरत होकर उसने पैरों का वह जल छोड़ दिया, और उसके दोनों चरण मलिन हो गए।

श्लोक 15 (shiva.kotirudra.10.15)

ततःप्रभृति राजा भूत्स लोकेऽस्मिन्मुनीश्वराः । कल्मषाङ्घ्रिरिति ख्यातः प्रभावात्तज्जलस्य हि ॥ 10.15 ॥

tataḥprabhṛti rājā bhūtsa loke’sminmunīśvarāḥ kalmaṣāṅghririti khyātaḥ prabhāvāttajjalasya hi

हे मुनीश्वरो! तभी से वह राजा उस जल के प्रभाव से इस लोक में "कल्माषपाद" (चित्तीदार चरणों वाला) नाम से विख्यात हो गया।

श्लोक 16 (shiva.kotirudra.10.16)

राजा मित्रसहः शापाद् गुरोरॄषिवरस्य हि । बभूव राक्षसो घोरो हिंसको वनगोचरः ॥ 10.16 ॥

rājā mitrasahaḥ śāpād gurorṝṣivarasya hi babhūva rākṣaso ghoro hiṁsako vanagocaraḥ

गुरु — उस श्रेष्ठ ऋषि के शाप से राजा मित्रसह एक भयंकर, हिंसक, वनचारी राक्षस बन गए।

श्लोक 17 (shiva.kotirudra.10.17)

स बिभ्रद्राक्षसं रूपं कालान्तकयमोपमम् । चखाद विविधाञ्जन्तून् मानुषादीन्वनेचरः ॥ 10.17 ॥

sa bibhradrākṣasaṁ rūpaṁ kālāntakayamopamam cakhāda vividhāñjantūn mānuṣādīnvanecaraḥ

कालान्तक यम के समान भयंकर राक्षसी रूप धारण किए हुए वे वनचारी राजा नाना प्रकार के प्राणियों — मनुष्यों आदि — को खाने लगे।

श्लोक 18 (shiva.kotirudra.10.18)

स कदाचिद्वने क्वापि रममाणौ किशोरकौ । अपश्यदन्तकाकारो नवोढौ मुनिदम्पती ॥ 10.18 ॥

sa kadācidvane kvāpi ramamāṇau kiśorakau apaśyadantakākāro navoḍhau munidampatī

एक बार यमरूपी उस राक्षस ने वन में कहीं एक नवविवाहित युवा मुनि-दम्पति को क्रीड़ा करते हुए देखा।

श्लोक 19 (shiva.kotirudra.10.19)

राक्षसः स नराहारः किशोरं मुनिनन्दनम् । जग्धुं जग्राह शापार्त्तो व्याघ्रो मृगशिशुं यथा ॥ 10.19 ॥

rākṣasaḥ sa narāhāraḥ kiśoraṁ muninandanam jagdhuṁ jagrāha śāpārtto vyāghro mṛgaśiśuṁ yathā

नरभक्षी वह राक्षस, शापपीड़ित होने के कारण, उस युवा मुनि-पुत्र को इस प्रकार पकड़ लेता है जैसे व्याघ्र मृगशिशु को पकड़ता है, उसे खाने के लिए।

श्लोक 20 (shiva.kotirudra.10.20)

कक्षे गृहीतं भर्तारं दृष्ट्वा भीता च तत्प्रिया । सा चक्रे प्रार्थनां तस्मै वदती करुणं वचः ॥ 10.20 ॥

kakṣe gṛhītaṁ bhartāraṁ dṛṣṭvā bhītā ca tatpriyā sā cakre prārthanāṁ tasmai vadatī karuṇaṁ vacaḥ

अपने पति को बगल में दबोचा हुआ देखकर, भयभीत उस पत्नी ने करुण वचन कहते हुए उससे प्रार्थना की।

श्लोक 21 (shiva.kotirudra.10.21)

प्रार्थ्यमानोऽपि बहुशः पुरुषादः स निर्घृणः । चखाद शिर उत्कृत्य विप्रसूनोर्दुराशयः ॥ 10.21 ॥

prārthyamāno’pi bahuśaḥ puruṣādaḥ sa nirghṛṇaḥ cakhāda śira utkṛtya viprasūnordurāśayaḥ

बार-बार प्रार्थना किए जाने पर भी वह निर्दयी, दुराशय नरभक्षी राक्षस उस ब्राह्मण-पुत्र का सिर काटकर खा गया।

श्लोक 22 (shiva.kotirudra.10.22)

अथ साध्वी च सा दीना विलप्य भृशदुःखिता । आहृत्य भर्तुरस्थीनि चितां चक्रे किलोल्बणाम् ॥ 10.22 ॥

atha sādhvī ca sā dīnā vilapya bhṛśaduḥkhitā āhṛtya bharturasthīni citāṁ cakre kilolbaṇām

तब वह पतिव्रता, दुखियारी स्त्री विलाप करती हुई अत्यंत दुःखित होकर, अपने पति की अस्थियाँ एकत्र कर एक विशाल चिता बनाती है।

श्लोक 23 (shiva.kotirudra.10.23)

भर्तारमनुगच्छन्ती संविशन्ती हुताशनम् । राजानं राक्षसाकारं सा शशाप द्विजाङ्गना ॥ 10.23 ॥

bhartāramanugacchantī saṁviśantī hutāśanam rājānaṁ rākṣasākāraṁ sā śaśāpa dvijāṅganā

पति के पीछे जाती हुई, अग्नि में प्रवेश करती हुई उस ब्राह्मणी ने राक्षसरूपी राजा को शाप दिया।

श्लोक 24 (shiva.kotirudra.10.24)

अद्यप्रभृति नारीषु यदा त्वं सङ्गतो भवेः । तदा मृतिस्तवेत्युक्त्वा विवेश ज्वलनं सती ॥ 10.24 ॥

adyaprabhṛti nārīṣu yadā tvaṁ saṅgato bhaveḥ tadā mṛtistavetyuktvā viveśa jvalanaṁ satī

"आज से जब भी तू किसी स्त्री का संगम करेगा, उसी क्षण तेरी मृत्यु हो जाएगी" — यह कहकर वह सती अग्नि में प्रविष्ट हो गई।

श्लोक 25 (shiva.kotirudra.10.25)

सोऽपि राजा गुरोः शापमनुभूय कृतावधिम् । पुनः स्वरूपमास्थाय स्वगृहं मुदितो ययौ ॥ 10.25 ॥

so’pi rājā guroḥ śāpamanubhūya kṛtāvadhim punaḥ svarūpamāsthāya svagṛhaṁ mudito yayau

वह राजा भी गुरु के शाप को उसकी निश्चित अवधि तक भोगकर, पुनः अपना स्वरूप धारण कर प्रसन्नतापूर्वक अपने घर लौट गया।

श्लोक 26 (shiva.kotirudra.10.26)

ज्ञात्वा विप्रसतीशापं मदयन्ती रतिप्रियम् । पतिं निवारयामास वैधव्यादतिबिभ्यती ॥ 10.26 ॥

jñātvā viprasatīśāpaṁ madayantī ratipriyam patiṁ nivārayāmāsa vaidhavyādatibibhyatī

उस ब्राह्मणी-सती के शाप को जानकर मदयन्ती, वैधव्य से अत्यंत भयभीत होकर, रतिप्रिय पति को संगम से रोकने लगी।

श्लोक 27 (shiva.kotirudra.10.27)

अनपत्यो विनिर्विण्णो राज्यभोगेषु पार्थिवः । विसृज्य सकलां लक्ष्मीं वनमेव जगाम ह ॥ 10.27 ॥

anapatyo vinirviṇṇo rājyabhogeṣu pārthivaḥ visṛjya sakalāṁ lakṣmīṁ vanameva jagāma ha

संतानहीन और राज्य-भोगों से विरक्त हुआ वह राजा अपनी समस्त राजलक्ष्मी त्यागकर वन में ही चला गया।

श्लोक 28 (shiva.kotirudra.10.28)

स्वपृष्ठतः समायान्तीं ब्रह्महत्यां सुदुःखदाम् । ददर्श विकटाकारां तर्जयन्तीं मुहुर्मुहुः ॥ 10.28 ॥

svapṛṣṭhataḥ samāyāntīṁ brahmahatyāṁ suduḥkhadām dadarśa vikaṭākārāṁ tarjayantīṁ muhurmuhuḥ

उसने अपने पीछे-पीछे आती हुई, भयंकर आकार वाली और बार-बार उसे धमकाती हुई अत्यंत दुःखदायी ब्रह्महत्या को देखा।

श्लोक 29 (shiva.kotirudra.10.29)

तस्या निर्भद्रमन्विच्छन् राजा निर्विण्णमानसः । चकार नानोपायान्स जपव्रतमखादिकान् ॥ 10.29 ॥

tasyā nirbhadramanvicchan rājā nirviṇṇamānasaḥ cakāra nānopāyānsa japavratamakhādikān

उसके निवारण की खोज में, उदासमना वह राजा जप, व्रत, यज्ञ आदि अनेक उपाय करने लगा।

श्लोक 30 (shiva.kotirudra.10.30)

नानोपायैर्यदा राज्ञस्तीर्थस्नानादिभिर्द्विजाः । न निवृत्ता ब्रह्महत्या मिथिलां स ययौ तदा ॥ 10.30 ॥

nānopāyairyadā rājñastīrthasnānādibhirdvijāḥ na nivṛttā brahmahatyā mithilāṁ sa yayau tadā

हे द्विजो! जब तीर्थ-स्नान आदि अनेक उपायों से भी राजा की ब्रह्महत्या दूर नहीं हुई, तब वह मिथिला नगरी गया।

श्लोक 31 (shiva.kotirudra.10.31)

बाह्योद्यानगतस्तस्याश्चिन्तया परयार्दितः । ददर्श मुनिमायान्तं गौतमं पार्थिवश्च सः ॥ 10.31 ॥

bāhyodyānagatastasyāścintayā parayārditaḥ dadarśa munimāyāntaṁ gautamaṁ pārthivaśca saḥ

नगर के बाहरी उद्यान में जाकर, उस चिंता से अत्यंत पीड़ित वह राजा गौतम मुनि को वहाँ आते हुए देखता है।

श्लोक 32 (shiva.kotirudra.10.32)

अभिसृत्य स राजेन्द्रो गौतमं विमलाशयम् । तद्दर्शनाप्तकिञ्चित्कः प्रणनाम मुहुर्मुहुः ॥ 10.32 ॥

abhisṛtya sa rājendro gautamaṁ vimalāśayam taddarśanāptakiñcitkaḥ praṇanāma muhurmuhuḥ

उस निर्मल हृदय वाले गौतम मुनि के समीप जाकर, उनके दर्शनमात्र से कुछ शांति पाकर उस राजेन्द्र ने बार-बार उन्हें प्रणाम किया।

श्लोक 33 (shiva.kotirudra.10.33)

अथ तत्पृष्टकुशलो दीर्घमुष्णं च निःश्वसन् । तत्कृपादृष्टिसम्प्राप्तसुखः प्रोवाच तं नृपः ॥ 10.33 ॥

atha tatpṛṣṭakuśalo dīrghamuṣṇaṁ ca niḥśvasan tatkṛpādṛṣṭisamprāptasukhaḥ provāca taṁ nṛpaḥ

तत्पश्चात् कुशल पूछे जाने पर, दीर्घ और उष्ण निःश्वास लेते हुए, उनकी करुणादृष्टि से कुछ सुख पाकर राजा ने उनसे कहा।

श्लोक 34 (shiva.kotirudra.10.34)

राजोवाच । मुने मां बाधते ह्येषा ब्रह्महत्या दुरत्यया । अलक्षिता परैस्तात तर्जयन्ती पदे पदे ॥ 10.34 ॥

rājovāca mune māṁ bādhate hyeṣā brahmahatyā duratyayā alakṣitā paraistāta tarjayantī pade pade

राजा ने कहा — हे मुने! यह दुस्तर ब्रह्महत्या मुझे सताती है; हे तात! यह दूसरों को दिखाई नहीं देती, किंतु पग-पग पर मुझे धमकाती रहती है।

श्लोक 35 (shiva.kotirudra.10.35)

यन्मया शापदग्धेन विप्रपुत्रश्च भक्षितः । तत्पापस्य न शान्तिर्हि प्रायश्चित्तसहस्रकैः ॥ 10.35 ॥

yanmayā śāpadagdhena vipraputraśca bhakṣitaḥ tatpāpasya na śāntirhi prāyaścittasahasrakaiḥ

शाप से जलते हुए मैंने जो ब्राह्मण-पुत्र को खा लिया, उस पाप की शांति हजारों प्रायश्चित्तों से भी नहीं होती।

श्लोक 36 (shiva.kotirudra.10.36)

नानोपायाः कृता मे हि तच्छान्त्यै भ्रमता मुने । न निवृत्ता ब्रह्महत्या मम पापात्मनः किमु ॥ 10.36 ॥

nānopāyāḥ kṛtā me hi tacchāntyai bhramatā mune na nivṛttā brahmahatyā mama pāpātmanaḥ kimu

हे मुने! उसकी शांति के लिए भटकते हुए मैंने अनेक उपाय किए, फिर भी मुझ पापात्मा की ब्रह्महत्या दूर नहीं हुई — अब मैं क्या करूँ?

श्लोक 37 (shiva.kotirudra.10.37)

अद्य मे जन्मसाफल्यं सम्प्राप्तमिव लक्षये । यतस्त्वद्दर्शनादेव ममानन्दभरोऽभवत् ॥ 10.37 ॥

adya me janmasāphalyaṁ samprāptamiva lakṣaye yatastvaddarśanādeva mamānandabharo’bhavat

आज मुझे ऐसा प्रतीत होता है मानो मेरा जन्म सफल हो गया हो, क्योंकि आपके दर्शनमात्र से ही मुझे अपार आनंद प्राप्त हुआ है।

श्लोक 38 (shiva.kotirudra.10.38)

अद्य मे तव पादाब्जशरणस्य कृतैनसः । शान्तिं कुरु महाभाग येनाहं सुखमाप्नुयाम् ॥ 10.38 ॥

adya me tava pādābjaśaraṇasya kṛtainasaḥ śāntiṁ kuru mahābhāga yenāhaṁ sukhamāpnuyām

हे महाभाग! आज आपके चरणकमलों की शरण में आए हुए, पापयुक्त मेरी शांति कीजिए, जिससे मुझे सुख प्राप्त हो।

श्लोक 39 (shiva.kotirudra.10.39)

सूत उवाच । इति राज्ञा समादिष्टो गौतमः करुणार्द्रधीः । समादिदेश घोराणामघानां साधु निष्कृतिम् ॥ 10.39 ॥

sūta uvāca iti rājñā samādiṣṭo gautamaḥ karuṇārdradhīḥ samādideśa ghorāṇāmaghānāṁ sādhu niṣkṛtim

सूत जी ने कहा — इस प्रकार राजा द्वारा निवेदन किए जाने पर, करुणा से द्रवित हृदय वाले गौतम मुनि ने उन भयंकर पापों के उचित निवारण का उपदेश दिया।

श्लोक 40 (shiva.kotirudra.10.40)

गौतम उवाच । साधु राजेन्द्र धन्योऽसि महाघेभ्यो भयं त्यज । शिवे शास्तरि भक्तानां क्व भयं शरणैषिणाम् ॥ 10.40 ॥

gautama uvāca sādhu rājendra dhanyo’si mahāghebhyo bhayaṁ tyaja śive śāstari bhaktānāṁ kva bhayaṁ śaraṇaiṣiṇām

गौतम ने कहा — साधु, हे राजेन्द्र! तुम धन्य हो। इन महापापों से भय त्याग दो। जब शिव जैसे शासक भक्तों के रक्षक हैं, तो शरणागत भक्तों को भय किस बात का?

श्लोक 41 (shiva.kotirudra.10.41)

शृणु राजन्महाभाग क्षेत्रमन्यत्प्रतिष्ठितम् । महापातकसंहारि गोकर्णाख्यं शिवालयम् ॥ 10.41 ॥

śṛṇu rājanmahābhāga kṣetramanyatpratiṣṭhitam mahāpātakasaṁhāri gokarṇākhyaṁ śivālayam

हे राजन्, हे महाभाग! सुनो — एक और प्रतिष्ठित तीर्थस्थान है, जो महापातकों का नाश करने वाला है — गोकर्ण नामक शिवालय।

श्लोक 42 (shiva.kotirudra.10.42)

तत्र स्थितिर्न पापानां महद्भ्यो महतामपि । महाबलाभिधानेन शिवः सन्निहितः स्वयम् ॥ 10.42 ॥

tatra sthitirna pāpānāṁ mahadbhyo mahatāmapi mahābalābhidhānena śivaḥ sannihitaḥ svayam

वहाँ पाप चाहे कितने भी बड़े क्यों न हों, वे टिक नहीं सकते; क्योंकि वहाँ स्वयं शिव महाबल के नाम से साक्षात् विराजमान हैं।

श्लोक 43 (shiva.kotirudra.10.43)

सर्वेषां शिवलिङ्गानां सार्वभौमो महाबलः । चतुर्युगे चतुर्वर्णः सर्वपापापहारकः ॥ 10.43 ॥

sarveṣāṁ śivaliṅgānāṁ sārvabhaumo mahābalaḥ caturyuge caturvarṇaḥ sarvapāpāpahārakaḥ

महाबल समस्त शिवलिंगों के सार्वभौम स्वामी हैं, जो चारों युगों में चार रूपों में विद्यमान रहते हुए समस्त पापों का हरण करते हैं।

श्लोक 44 (shiva.kotirudra.10.44)

पश्चिमाम्बुधितीरस्थं गोकर्णं तीर्थमुत्तमम् । तत्रास्ति शिवलिङ्गं तन्महापातकनाशकम् ॥ 10.44 ॥

paścimāmbudhitīrasthaṁ gokarṇaṁ tīrthamuttamam tatrāsti śivaliṅgaṁ tanmahāpātakanāśakam

पश्चिम समुद्र के तट पर स्थित गोकर्ण एक उत्तम तीर्थ है; वहाँ वह शिवलिंग विराजमान है, जो महापातकों का नाशक है।

श्लोक 45 (shiva.kotirudra.10.45)

तत्र गत्वा महापापाः स्नात्वा तीर्थेषु भूरिशः । महाबलं च सम्पूज्य प्रयाताः शाङ्करं पदम् ॥ 10.45 ॥

tatra gatvā mahāpāpāḥ snātvā tīrtheṣu bhūriśaḥ mahābalaṁ ca sampūjya prayātāḥ śāṅkaraṁ padam

वहाँ जाकर महापापी भी तीर्थों में बार-बार स्नान करके और महाबल की पूजा करके शंकर के परमधाम को प्राप्त हुए हैं।

श्लोक 46 (shiva.kotirudra.10.46)

तथा त्वमपि राजेन्द्र गोकर्णं गिरिशालयम् । गत्वा सम्पूज्य तल्लिङ्गं कृतकृत्यत्वमाप्नुयाः ॥ 10.46 ॥

tathā tvamapi rājendra gokarṇaṁ giriśālayam gatvā sampūjya talliṅgaṁ kṛtakṛtyatvamāpnuyāḥ

उसी प्रकार हे राजेन्द्र! तुम भी गिरीश के धाम गोकर्ण जाकर और उस लिंग की पूजा करके कृतकृत्यता को प्राप्त हो सकते हो।

श्लोक 47 (shiva.kotirudra.10.47)

तत्र सर्वेषु तीर्थेषु स्नात्वाभ्यर्च्य महाबलम् । सर्वपापविनिर्मुक्तः शिवलोकं त्वमाप्नुयाः ॥ 10.47 ॥

tatra sarveṣu tīrtheṣu snātvābhyarcya mahābalam sarvapāpavinirmuktaḥ śivalokaṁ tvamāpnuyāḥ

वहाँ सभी तीर्थों में स्नान करके और महाबल की पूजा करके, सर्वपापमुक्त होकर तुम शिवलोक को प्राप्त होगे।

श्लोक 48 (shiva.kotirudra.10.48)

सूत उवाच । इत्यादिष्टः स मुनिना गौतमेन महात्मना । महाहृष्टमना राजा गोकर्णं प्रत्यपद्यत ॥ 10.48 ॥

sūta uvāca ityādiṣṭaḥ sa muninā gautamena mahātmanā mahāhṛṣṭamanā rājā gokarṇaṁ pratyapadyata

सूत जी ने कहा — महात्मा गौतम मुनि द्वारा इस प्रकार उपदिष्ट होकर, अत्यंत प्रसन्नमना राजा गोकर्ण की ओर चल पड़ा।

श्लोक 49 (shiva.kotirudra.10.49)

तत्र तीर्थेषु सुस्नात्वा समभ्यर्च्य महाबलम् । निर्धूताशेषपापौघोऽलभच्छम्भोः परं पदम् ॥ 10.49 ॥

tatra tīrtheṣu susnātvā samabhyarcya mahābalam nirdhūtāśeṣapāpaugho’labhacchambhoḥ paraṁ padam

वहाँ तीर्थों में भलीभाँति स्नान करके और महाबल की भलीभाँति पूजा करके, समस्त पापसमूह से मुक्त होकर उसने शम्भु के परमधाम को प्राप्त किया।

श्लोक 50 (shiva.kotirudra.10.50)

य इमां शृणुयान्नित्यं महाबलकथां प्रियाम् । त्रिसप्तकुलजैः सार्धं शिवलोके व्रजत्यसौ ॥ 10.50 ॥

ya imāṁ śṛṇuyānnityaṁ mahābalakathāṁ priyām trisaptakulajaiḥ sārdhaṁ śivaloke vrajatyasau

जो कोई इस प्रिय महाबल-कथा को नित्य सुनता है, वह अपने इक्कीस पीढ़ियों के कुल सहित शिवलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 51 (shiva.kotirudra.10.51)

इति वश्च समाख्यातं माहात्म्यं परमाद्भुतम् । महाबलस्य गिरिशलिङ्गस्य निखिलाघहृत् ॥ 10.51 ॥

iti vaśca samākhyātaṁ māhātmyaṁ paramādbhutam mahābalasya giriśaliṅgasya nikhilāghahṛt

इस प्रकार मैंने तुम्हें गिरीश के महाबल लिंग की परम अद्भुत, समस्त पापों का हरण करने वाली महिमा सुनाई।

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