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कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 11

चन्द्रभाल एवं पशुपतिनाथ लिंग की महिमा

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (shiva.kotirudra.11.1)

ऋषय ऊचुः । सूत सूत महाभाग धन्यस्त्वं शिवसक्तधीः । महाबलस्य लिङ्गस्य श्रावितेयं कथाद्भुता ॥ 11.1 ॥

ṛṣaya ūcuḥ sūta sūta mahābhāga dhanyastvaṁ śivasaktadhīḥ mahābalasya liṅgasya śrāviteyaṁ kathādbhutā

ऋषियों ने कहा — हे सूत! हे सूत! हे महाभाग! शिव में अनुरक्त बुद्धि वाले, धन्य हो तुम! तुमने हमें महाबल लिंग की यह अद्भुत कथा सुनाई है।

श्लोक 2 (shiva.kotirudra.11.2)

उत्तरस्यां दिशायां च शिवलिङ्गानि यानि च । तेषां माहात्म्यमनघं वद त्वं पापनाशकम् ॥ 11.2 ॥

uttarasyāṁ diśāyāṁ ca śivaliṅgāni yāni ca teṣāṁ māhātmyamanaghaṁ vada tvaṁ pāpanāśakam

अब उत्तर दिशा में जो शिवलिंग हैं, उनकी निष्पाप एवं पापनाशक महिमा हमें बताओ।

श्लोक 3 (shiva.kotirudra.11.3)

सूत उवाच । शृणुतादरतो विप्रा औत्तराणां विशेषतः । माहात्म्यं शिवलिङ्गानां प्रवदामि समासतः ॥ 11.3 ॥

sūta uvāca śṛṇutādarato viprā auttarāṇāṁ viśeṣataḥ māhātmyaṁ śivaliṅgānāṁ pravadāmi samāsataḥ

सूत जी ने कहा — हे विप्रो! आदरपूर्वक सुनो; मैं विशेषतः उत्तर दिशा के शिवलिंगों की महिमा संक्षेप में कहता हूँ।

श्लोक 4 (shiva.kotirudra.11.4)

गोकर्णं क्षेत्रमपरं महापातकनाशनम् । महावनं च तत्रास्ति पवित्रमतिविस्तरम् ॥ 11.4 ॥

gokarṇaṁ kṣetramaparaṁ mahāpātakanāśanam mahāvanaṁ ca tatrāsti pavitramativistaram

गोकर्ण एक अन्य क्षेत्र है, जो महापातकों का नाश करने वाला है; वहाँ एक अत्यंत विस्तृत और पवित्र महावन भी है।

श्लोक 5 (shiva.kotirudra.11.5)

तत्रास्ति चन्द्रभालाख्यं शिवलिङ्गमनुत्तमम् । रावणेन समानीतं सद्भक्त्या सर्वसिद्धिदम् ॥ 11.5 ॥

tatrāsti candrabhālākhyaṁ śivaliṅgamanuttamam rāvaṇena samānītaṁ sadbhaktyā sarvasiddhidam

वहाँ चन्द्रभाल नामक अनुपम शिवलिंग है, जिसे रावण सच्ची भक्ति से लाया था, और जो समस्त सिद्धियाँ प्रदान करने वाला है।

श्लोक 6 (shiva.kotirudra.11.6)

तस्य तत्र स्थितिर्वैद्यनाथस्येव मुनीश्वराः । सर्वलोकहितार्थाय करुणासागरस्य च ॥ 11.6 ॥

tasya tatra sthitirvaidyanāthasyeva munīśvarāḥ sarvalokahitārthāya karuṇāsāgarasya ca

हे मुनीश्वरो! वहाँ उसकी स्थिति वैद्यनाथ के समान है — समस्त लोकों के कल्याण हेतु उस करुणासागर की।

श्लोक 7 (shiva.kotirudra.11.7)

स्नानं कृत्वा तु गोकर्णे चन्द्रभालं समर्च्य च । शिवलोकमवाप्नोति सत्यं सत्यं न संशयः ॥ 11.7 ॥

snānaṁ kṛtvā tu gokarṇe candrabhālaṁ samarcya ca śivalokamavāpnoti satyaṁ satyaṁ na saṁśayaḥ

गोकर्ण में स्नान करके और चन्द्रभाल की भलीभाँति पूजा करके मनुष्य शिवलोक को प्राप्त करता है — यह सत्य है, सत्य है, इसमें संशय नहीं।

श्लोक 8 (shiva.kotirudra.11.8)

चन्द्रभालस्य लिङ्गस्य महिमा परमाद्भुतः । न शक्यो वर्णितुं व्यासाद्भक्तिस्नेहरतस्य हि ॥ 11.8 ॥

candrabhālasya liṅgasya mahimā paramādbhutaḥ na śakyo varṇituṁ vyāsādbhaktisneharatasya hi

चन्द्रभाल लिंग की महिमा अत्यंत अद्भुत है, जिसे भक्ति-स्नेह में रत व्यास जी के लिए भी वर्णन करना संभव नहीं है।

श्लोक 9 (shiva.kotirudra.11.9)

चन्द्रभालमहादेवलिङ्गस्य महिमा महान् । यथाकथञ्चित्सम्प्रोक्तः परलिङ्गस्य वै शृणु ॥ 11.9 ॥

candrabhālamahādevaliṅgasya mahimā mahān yathākathañcitsamproktaḥ paraliṅgasya vai śṛṇu

चन्द्रभाल महादेव लिंग की महती महिमा जैसे-तैसे कह दी गई; अब दूसरे लिंग के विषय में सुनो।

श्लोक 10 (shiva.kotirudra.11.10)

दाधीचं शिवलिङ्गं तु मिश्रर्षिवरतीर्थके । दधीचिना मुनीशेन सुप्रीत्या च प्रतिष्ठितम् ॥ 11.10 ॥

dādhīcaṁ śivaliṅgaṁ tu miśrarṣivaratīrthake dadhīcinā munīśena suprītyā ca pratiṣṭhitam

मिश्रऋषिवर तीर्थ में दाधीच नामक शिवलिंग है, जिसे मुनीश्वर दधीचि ने अत्यंत प्रीतिपूर्वक स्थापित किया था।

श्लोक 11 (shiva.kotirudra.11.11)

तत्र गत्वा च तत्तीर्थे स्नात्वा सम्यग्विधानतः । शिवलिङ्गं समर्चेद्वै दाधीचेश्वरमादरात् ॥ 11.11 ॥

tatra gatvā ca tattīrthe snātvā samyagvidhānataḥ śivaliṅgaṁ samarcedvai dādhīceśvaramādarāt

वहाँ जाकर, उस तीर्थ में विधिपूर्वक स्नान करके, आदरपूर्वक दाधीचेश्वर शिवलिंग की पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 12 (shiva.kotirudra.11.12)

दधीचमूर्तिस्तत्रैव समर्च्या विधिपूर्वकम् । शिवप्रीत्यर्थमेवाशु तीर्थयात्राफलार्थिभिः ॥ 11.12 ॥

dadhīcamūrtistatraiva samarcyā vidhipūrvakam śivaprītyarthamevāśu tīrthayātrāphalārthibhiḥ

वहीं दधीचि की मूर्ति की भी विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए — तीर्थयात्रा का फल शीघ्र चाहने वालों को शिव की प्रसन्नता के लिए ऐसा करना चाहिए।

श्लोक 13 (shiva.kotirudra.11.13)

एवं कृते मुनिश्रेष्ठाः कृतकृत्यो भवेन्नरः । इह सर्वसुखं भुक्त्वा परत्र गतिमाप्नुयात् ॥ 11.13 ॥

evaṁ kṛte muniśreṣṭhāḥ kṛtakṛtyo bhavennaraḥ iha sarvasukhaṁ bhuktvā paratra gatimāpnuyāt

हे मुनिश्रेष्ठो! ऐसा करने से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है; यहाँ समस्त सुख भोगकर वह परलोक में सद्गति प्राप्त करता है।

श्लोक 14 (shiva.kotirudra.11.14)

नैमिषारण्यतीर्थे तु निखिलर्षिप्रतिष्ठितम् । ऋषीश्वरमिति ख्यातं शिवलिङ्गं सुखप्रदम् ॥ 11.14 ॥

naimiṣāraṇyatīrthe tu nikhilarṣipratiṣṭhitam ṛṣīśvaramiti khyātaṁ śivaliṅgaṁ sukhapradam

नैमिषारण्य तीर्थ में समस्त ऋषियों द्वारा स्थापित, "ऋषीश्वर" नामक सुखप्रद शिवलिंग है।

श्लोक 15 (shiva.kotirudra.11.15)

तद्दर्शनात्पूजनाच्च जनानां पापिनामपि । भुक्तिर्मुक्तिश्च तेषां तु परत्रेह मुनीश्वराः ॥ 11.15 ॥

taddarśanātpūjanācca janānāṁ pāpināmapi bhuktirmuktiśca teṣāṁ tu paratreha munīśvarāḥ

हे मुनीश्वरो! उसके दर्शन और पूजन से पापी जनों को भी इस लोक और परलोक में भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त होते हैं।

श्लोक 16 (shiva.kotirudra.11.16)

हत्याहरणतीर्थे तु शिवलिङ्गमघापहम् । पूजनीयं विशेषेण हत्याकोटिविनाशनम् ॥ 11.16 ॥

hatyāharaṇatīrthe tu śivaliṅgamaghāpaham pūjanīyaṁ viśeṣeṇa hatyākoṭivināśanam

हत्याहरण तीर्थ में पापनाशक शिवलिंग है, जो विशेष रूप से पूजनीय है और करोड़ों हत्याओं का भी नाश करने वाला है।

श्लोक 17 (shiva.kotirudra.11.17)

देवप्रयागतीर्थे तु ललितेश्वरनामकम् । शिवलिङ्गं सदा पूज्यं नरैः सर्वाघनाशनम् ॥ 11.17 ॥

devaprayāgatīrthe tu laliteśvaranāmakam śivaliṅgaṁ sadā pūjyaṁ naraiḥ sarvāghanāśanam

देवप्रयाग तीर्थ में ललितेश्वर नामक शिवलिंग है, जो मनुष्यों द्वारा सदा पूजनीय और समस्त पापों का नाशक है।

श्लोक 18 (shiva.kotirudra.11.18)

नयपालाख्यपुर्यां तु प्रसिद्धायां महीतले । लिङ्गं पशुपतीशाख्यं सर्वकामफलप्रदम् ॥ 11.18 ॥

nayapālākhyapuryāṁ tu prasiddhāyāṁ mahītale liṅgaṁ paśupatīśākhyaṁ sarvakāmaphalapradam

पृथ्वी पर प्रसिद्ध नयपाल (नेपाल) नामक नगरी में पशुपतीश नामक लिंग है, जो समस्त कामनाओं का फल देने वाला है।

श्लोक 19 (shiva.kotirudra.11.19)

शिरोभागस्वरूपेण शिवलिङ्गं तदस्ति हि । तत्कथां वर्णयिष्यामि केदारेश्वरवर्णने ॥ 11.19 ॥

śirobhāgasvarūpeṇa śivaliṅgaṁ tadasti hi tatkathāṁ varṇayiṣyāmi kedāreśvaravarṇane

वह शिवलिंग वस्तुतः शिव के शीर्ष-भाग के रूप में विद्यमान है; उसकी कथा मैं केदारेश्वर के वर्णन में कहूँगा।

श्लोक 20 (shiva.kotirudra.11.20)

तदारान्मुक्तिनाथाख्यं शिवलिङ्गं महाद्भुतम् । दर्शनादर्चनात्तस्य भुक्तिर्मुक्तिश्च लभ्यते ॥ 11.20 ॥

tadārānmuktināthākhyaṁ śivaliṅgaṁ mahādbhutam darśanādarcanāttasya bhuktirmuktiśca labhyate

उसके निकट ही मुक्तिनाथ नामक अत्यंत अद्भुत शिवलिंग है; उसके दर्शन और पूजन से भोग और मोक्ष दोनों प्राप्त होते हैं।

श्लोक 21 (shiva.kotirudra.11.21)

इति वश्च समाख्यातं लिङ्गवर्णनमुत्तमम् । चतुर्दिक्षु मुनिश्रेष्ठाः किमन्यच्छ्रोतुमिच्छथ ॥ 11.21 ॥

iti vaśca samākhyātaṁ liṅgavarṇanamuttamam caturdikṣu muniśreṣṭhāḥ kimanyacchrotumicchatha

हे मुनिश्रेष्ठो! इस प्रकार चारों दिशाओं के लिंगों का यह उत्तम वर्णन तुम्हें बता दिया गया; अब और क्या सुनना चाहते हो?

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