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कोटिरुद्र संहिता · अध्याय 12

लिंग-स्वरूप के कारण का वर्णन

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

श्लोक 1 (shiva.kotirudra.12.1)

ऋषय ऊचुः । सूत जानासि सकलं वस्तु व्यासप्रसादतः । तवाज्ञातं न विद्येत तस्मात्पृच्छामहे वयम् ॥ 12.1 ॥

ṛṣaya ūcuḥ sūta jānāsi sakalaṁ vastu vyāsaprasādataḥ tavājñātaṁ na vidyeta tasmātpṛcchāmahe vayam

ऋषियों ने कहा — हे सूत! व्यास जी की कृपा से तुम सब कुछ जानते हो; तुम्हें कुछ भी अज्ञात नहीं है, इसलिए हम तुमसे पूछते हैं।

श्लोक 2 (shiva.kotirudra.12.2)

लिङ्गं च पूज्यते लोके तत्त्वया कथितं च यत् । तत्तथैव न चान्यद्वा कारणं विद्यते त्विह ॥ 12.2 ॥

liṅgaṁ ca pūjyate loke tattvayā kathitaṁ ca yat tattathaiva na cānyadvā kāraṇaṁ vidyate tviha

संसार में लिंग की जो पूजा होती है, वह तुमने जैसी बताई वैसी तो है ही, किंतु क्या इसका और भी कोई कारण है?

श्लोक 3 (shiva.kotirudra.12.3)

बाणरूपा श्रुता लोके पार्वती शिववल्लभा । एतत्किं कारणं सूत कथय त्वं यथाश्रुतम् ॥ 12.3 ॥

bāṇarūpā śrutā loke pārvatī śivavallabhā etatkiṁ kāraṇaṁ sūta kathaya tvaṁ yathāśrutam

शिव की प्रिया पार्वती लोक में "बाण" (योनि-रूप शिला) रूप में प्रसिद्ध हैं; हे सूत! इसका क्या कारण है? जैसा तुमने सुना है, वैसा ही कहो।

श्लोक 4 (shiva.kotirudra.12.4)

सूत उवाच । कल्पभेदकथा चैव श्रुता व्यासान्मया द्विजाः । तामेव कथयाम्यद्य श्रूयतामृषिसत्तमाः ॥ 12.4 ॥

sūta uvāca kalpabhedakathā caiva śrutā vyāsānmayā dvijāḥ tāmeva kathayāmyadya śrūyatāmṛṣisattamāḥ

सूत जी ने कहा — हे द्विजो! मैंने व्यास जी से एक भिन्न कल्प की कथा सुनी है; वही कथा आज मैं कहता हूँ, हे ऋषिसत्तमो! सुनिए।

श्लोक 5 (shiva.kotirudra.12.5)

पुरा दारुवने जातं यद् वृत्तं तु द्विजन्मनाम् । तदेव श्रूयतां सम्यक् कथयामि यथाश्रुतम् ॥ 12.5 ॥

purā dāruvane jātaṁ yad vṛttaṁ tu dvijanmanām tadeva śrūyatāṁ samyak kathayāmi yathāśrutam

प्राचीन काल में दारुवन में द्विजों के साथ जो घटना घटी, उसे भलीभाँति सुनो; मैं उसे यथाश्रुत कहता हूँ।

श्लोक 6 (shiva.kotirudra.12.6)

दारुनाम वनं श्रेष्ठं तत्रासन् ऋषिसत्तमाः । शिवभक्ताः सदा नित्यं शिवध्यानपरायणाः ॥ 12.6 ॥

dārunāma vanaṁ śreṣṭhaṁ tatrāsan ṛṣisattamāḥ śivabhaktāḥ sadā nityaṁ śivadhyānaparāyaṇāḥ

दारु नामक एक श्रेष्ठ वन था; वहाँ श्रेष्ठ ऋषि रहते थे, जो सदा शिवभक्त और नित्य शिवध्यान में तत्पर रहते थे।

श्लोक 7 (shiva.kotirudra.12.7)

त्रिकालं शिवपूजां च कुर्वन्ति स्म निरन्तरम् । नानाविधैः स्तवैर्दिव्यैस्तुष्टुवुस्ते मुनीश्वराः ॥ 12.7 ॥

trikālaṁ śivapūjāṁ ca kurvanti sma nirantaram nānāvidhaiḥ stavairdivyaistuṣṭuvuste munīśvarāḥ

वे निरंतर तीनों संध्याओं में शिवपूजा करते थे, और वे मुनीश्वर विविध दिव्य स्तोत्रों से शिव की स्तुति करते थे।

श्लोक 8 (shiva.kotirudra.12.8)

ते कदाचिद्वने याताः समिधाहरणाय च । सर्वे द्विजर्षभाः शैवाः शिवध्यानपरायणाः ॥ 12.8 ॥

te kadācidvane yātāḥ samidhāharaṇāya ca sarve dvijarṣabhāḥ śaivāḥ śivadhyānaparāyaṇāḥ

एक बार वे सभी शैव द्विजश्रेष्ठ, जो शिवध्यान में तत्पर थे, समिधा लाने के लिए वन में गए।

श्लोक 9 (shiva.kotirudra.12.9)

एतस्मिन्नन्तरे साक्षाच्छङ्करो नीललोहितः । विरूपं च समास्थाय परीक्षार्थं समागतः ॥ 12.9 ॥

etasminnantare sākṣācchaṅkaro nīlalohitaḥ virūpaṁ ca samāsthāya parīkṣārthaṁ samāgataḥ

इसी बीच साक्षात् नीललोहित शंकर, विरूप वेश धारण कर, उनकी परीक्षा लेने के लिए वहाँ आए।

श्लोक 10 (shiva.kotirudra.12.10)

दिगम्बरोऽतितेजस्वी भूतिभूषणभूषितः । स चेष्टामकरोद्दुष्टां हस्ते लिङ्गं विधारयन् ॥ 12.10 ॥

digambaro’titejasvī bhūtibhūṣaṇabhūṣitaḥ sa ceṣṭāmakarodduṣṭāṁ haste liṅgaṁ vidhārayan

दिगम्बर, अत्यंत तेजस्वी, भस्म से विभूषित वे शिव हाथ में लिंग धारण किए हुए उन्मुक्त चेष्टा करने लगे।

श्लोक 11 (shiva.kotirudra.12.11)

मनसा च प्रियं तेषां कर्तुं वै वनवासिनाम् । जगाम तद्वनं प्रीत्या भक्तप्रीतो हरः स्वयम् ॥ 12.11 ॥

manasā ca priyaṁ teṣāṁ kartuṁ vai vanavāsinām jagāma tadvanaṁ prītyā bhaktaprīto haraḥ svayam

उन वनवासियों के मन को प्रिय करने की इच्छा से, अपने भक्तों के प्रिय हर स्वयं प्रेमपूर्वक उस वन में गए।

श्लोक 12 (shiva.kotirudra.12.12)

तं दृष्ट्वा ऋषिपत्न्यस्ताः परं त्रासमुपागताः । विह्वला विस्मिताश्चान्याः समाजग्मुस्तथा पुनः ॥ 12.12 ॥

taṁ dṛṣṭvā ṛṣipatnyastāḥ paraṁ trāsamupāgatāḥ vihvalā vismitāścānyāḥ samājagmustathā punaḥ

उन्हें देखकर ऋषिपत्नियाँ अत्यंत भयभीत हो उठीं; कुछ विह्वल और विस्मित होकर पुनः उनके पास एकत्र हो गईं।

श्लोक 13 (shiva.kotirudra.12.13)

आलिलिङ्गुस्तथा चान्याः करं धृत्वा तथापराः । परस्परं तु सङ्घर्षात्सम्मग्नास्ताः स्त्रियस्तदा ॥ 12.13 ॥

āliliṅgustathā cānyāḥ karaṁ dhṛtvā tathāparāḥ parasparaṁ tu saṅgharṣātsammagnāstāḥ striyastadā

कुछ ने उन्हें आलिंगन कर लिया, कुछ ने उनका हाथ पकड़ लिया; और आपस की उस धक्का-मुक्की में वे स्त्रियाँ तब पूर्णतः तल्लीन हो गईं।

श्लोक 14 (shiva.kotirudra.12.14)

एतस्मिन्नेव समये ऋषिवर्याः समागमन् । विरुद्धं तं च ते दृष्ट्वा दुःखिताः क्रोधमूर्च्छिताः ॥ 12.14 ॥

etasminneva samaye ṛṣivaryāḥ samāgaman viruddhaṁ taṁ ca te dṛṣṭvā duḥkhitāḥ krodhamūrcchitāḥ

ठीक उसी समय श्रेष्ठ ऋषिगण लौट आए, और उस अनुचित दृश्य को देखकर वे दुःखित होकर क्रोध से मूर्च्छित हो गए।

श्लोक 15 (shiva.kotirudra.12.15)

तदा दुःखमनुप्राप्ताः कोऽयं कोऽयं तथाब्रुवन् । समस्ता ऋषयस्ते वै शिवमायाविमोहिताः ॥ 12.15 ॥

tadā duḥkhamanuprāptāḥ ko’yaṁ ko’yaṁ tathābruvan samastā ṛṣayaste vai śivamāyāvimohitāḥ

तब दुःखी होकर, शिव की माया से मोहित हुए वे समस्त ऋषि बार-बार कहने लगे — "यह कौन है? यह कौन है?"

श्लोक 16 (shiva.kotirudra.12.16)

यदा च नोक्तवान् किञ्चित्सोऽवधूतो दिगम्बरः । ऊचुस्तं पुरुषं भीमं तदा ते परमर्षयः ॥ 12.16 ॥

yadā ca noktavān kiñcitso’vadhūto digambaraḥ ūcustaṁ puruṣaṁ bhīmaṁ tadā te paramarṣayaḥ

और जब वह अवधूत, दिगम्बर पुरुष कुछ भी नहीं बोला, तब उन परम ऋषियों ने उस भयंकर पुरुष से कहा।

श्लोक 17 (shiva.kotirudra.12.17)

त्वया विरुद्धं क्रियते वेदमार्गविलोपि यत् । ततस्त्वदीयं तल्लिङ्गं पततां पृथिवीतले ॥ 12.17 ॥

tvayā viruddhaṁ kriyate vedamārgavilopi yat tatastvadīyaṁ talliṅgaṁ patatāṁ pṛthivītale

"तुम जो यह अनुचित कार्य कर रहे हो, वह वेदमार्ग का लोप करने वाला है; अतः तुम्हारा वह लिंग पृथ्वीतल पर गिर जाए!"

श्लोक 18 (shiva.kotirudra.12.18)

सूत उवाच । इत्युक्ते तु तदा तैश्च लिङ्गं च पतितं क्षणात् । अवधूतस्य तस्याशु शिवस्याद्भुतरूपिणः ॥ 12.18 ॥

sūta uvāca ityukte tu tadā taiśca liṅgaṁ ca patitaṁ kṣaṇāt avadhūtasya tasyāśu śivasyādbhutarūpiṇaḥ

सूत जी ने कहा — उनके ऐसा कहते ही, उस अद्भुतरूपी अवधूत शिव का वह लिंग तत्क्षण पृथ्वी पर गिर पड़ा।

श्लोक 19 (shiva.kotirudra.12.19)

तल्लिङ्गं चाग्निवत्सर्वं यद्ददाह पुरा स्थितम् । यत्र यत्र च तद्याति तत्र तत्र दहेत्पुनः ॥ 12.19 ॥

talliṅgaṁ cāgnivatsarvaṁ yaddadāha purā sthitam yatra yatra ca tadyāti tatra tatra dahetpunaḥ

वह लिंग अग्नि के समान, अपने सामने जो कुछ भी था उसे जलाने लगा; और वह जहाँ-जहाँ जाता, वहाँ-वहाँ पुनः जलाता रहता।

श्लोक 20 (shiva.kotirudra.12.20)

पाताले च गतं तच्च स्वर्गे चापि तथैव च । भूमौ सर्वत्र तद्यातं न कुत्रापि स्थिरं हि तत् ॥ 12.20 ॥

pātāle ca gataṁ tacca svarge cāpi tathaiva ca bhūmau sarvatra tadyātaṁ na kutrāpi sthiraṁ hi tat

वह पाताल में गया, और उसी प्रकार स्वर्ग में भी; पृथ्वी पर भी सर्वत्र वह भ्रमण करता रहा, कहीं भी वह स्थिर नहीं हुआ।

श्लोक 21 (shiva.kotirudra.12.21)

लोकाश्च व्याकुला जाता ऋषयस्तेऽतिदुःखिताः । न शर्म लेभिरे केचिद्देवाश्च ऋषयस्तथा ॥ 12.21 ॥

lokāśca vyākulā jātā ṛṣayaste’tiduḥkhitāḥ na śarma lebhire keciddevāśca ṛṣayastathā

सभी लोक व्याकुल हो गए, वे ऋषि अत्यंत दुःखित हो गए; न तो देवताओं को और न ही ऋषियों को कहीं शांति मिली।

श्लोक 22 (shiva.kotirudra.12.22)

न ज्ञातस्तु शिवो यैस्तु ते सर्वे च सुरर्षयः । दुःखिता मिलिताः शीघ्रं ब्रह्माणं शरणं ययुः ॥ 12.22 ॥

na jñātastu śivo yaistu te sarve ca surarṣayaḥ duḥkhitā militāḥ śīghraṁ brahmāṇaṁ śaraṇaṁ yayuḥ

जिन देवताओं और ऋषियों ने शिव को नहीं पहचाना था, वे सभी दुःखित होकर शीघ्र एकत्र हुए और ब्रह्मा जी की शरण में गए।

श्लोक 23 (shiva.kotirudra.12.23)

तत्र गत्वा च ते सर्वे नत्वा स्तुत्वा विधिं द्विजाः । तत्सर्वमवदन् वृत्तं ब्रह्मणे सृष्टिकारिणे ॥ 12.23 ॥

tatra gatvā ca te sarve natvā stutvā vidhiṁ dvijāḥ tatsarvamavadan vṛttaṁ brahmaṇe sṛṣṭikāriṇe

हे द्विजो! वहाँ जाकर उन सबने ब्रह्मा को प्रणाम और स्तुति करके, सृष्टिकर्ता ब्रह्मा को वह सारी घटना कह सुनाई।

श्लोक 24 (shiva.kotirudra.12.24)

ब्रह्मा तद्वचनं श्रुत्वा शिवमायाविमोहितान् । ज्ञात्वा तान् शङ्करं नत्वा प्रोवाच ऋषिसत्तमान् ॥ 12.24 ॥

brahmā tadvacanaṁ śrutvā śivamāyāvimohitān jñātvā tān śaṅkaraṁ natvā provāca ṛṣisattamān

ब्रह्मा जी उनकी बात सुनकर और यह जानकर कि वे शिव की माया से मोहित हुए थे, शंकर को नमन कर उन श्रेष्ठ ऋषियों से बोले।

श्लोक 25 (shiva.kotirudra.12.25)

ब्रह्मोवाच । ज्ञातारश्च भवन्तो वै कुर्वते गर्हितं द्विजाः । अज्ञातारो यदा कुर्युः किं पुनः कथ्यते पुनः ॥ 12.25 ॥

brahmovāca jñātāraśca bhavanto vai kurvate garhitaṁ dvijāḥ ajñātāro yadā kuryuḥ kiṁ punaḥ kathyate punaḥ

ब्रह्मा जी ने कहा — हे द्विजो! तुम विद्वान होकर भी यह निंदनीय कार्य कर बैठे — यदि अज्ञानी लोग ऐसा करें तो फिर क्या कहा जाए?

श्लोक 26 (shiva.kotirudra.12.26)

विरुद्ध्यैवं शिवं देवं कुशलं कः समीहते । मध्याह्नसमये यो वै नातिथिं च परामृशेत् ॥ 12.26 ॥

viruddhyaivaṁ śivaṁ devaṁ kuśalaṁ kaḥ samīhate madhyāhnasamaye yo vai nātithiṁ ca parāmṛśet

इस प्रकार भगवान् शिव का विरोध कर कल्याण की कामना कौन कर सकता है? — जैसे मध्याह्न के समय आए अतिथि की उपेक्षा करने वाला कल्याण नहीं पाता।

श्लोक 27 (shiva.kotirudra.12.27)

तस्यैव सुकृतं नीत्वा स्वीयं च दुष्कृतं पुनः । संस्थाप्य चातिथिर्याति किं पुनः शिवमेव वा ॥ 12.27 ॥

tasyaiva sukṛtaṁ nītvā svīyaṁ ca duṣkṛtaṁ punaḥ saṁsthāpya cātithiryāti kiṁ punaḥ śivameva vā

उस उपेक्षा करने वाले का पुण्य लेकर और अपना पाप वहाँ छोड़कर उपेक्षित अतिथि चला जाता है — तो फिर स्वयं शिव के विषय में क्या कहा जाए!

श्लोक 28 (shiva.kotirudra.12.28)

यावल्लिङ्गं स्थिरं नैव जगतां त्रितये शुभम् । जायते न तदा क्वापि सत्यमेतद्वदाम्यहम् ॥ 12.28 ॥

yāvalliṅgaṁ sthiraṁ naiva jagatāṁ tritaye śubham jāyate na tadā kvāpi satyametadvadāmyaham

जब तक यह लिंग स्थिर नहीं होगा, तब तक तीनों लोकों में कहीं भी शुभता उत्पन्न नहीं होगी — मैं तुम्हें यह सत्य कहता हूँ।

श्लोक 29 (shiva.kotirudra.12.29)

भवद्भिश्च तथा कार्यं यथा स्वास्थ्यं भवेदिह । शिवलिङ्गस्य ऋषयो मनसा संविचार्यताम् ॥ 12.29 ॥

bhavadbhiśca tathā kāryaṁ yathā svāsthyaṁ bhavediha śivaliṅgasya ṛṣayo manasā saṁvicāryatām

हे ऋषियो! तुम्हें ऐसा उपाय करना चाहिए जिससे यहाँ शिवलिंग को स्थिरता प्राप्त हो; इस पर मन से भलीभाँति विचार करो।

श्लोक 30 (shiva.kotirudra.12.30)

सूत उवाच । इत्युक्तास्ते प्रणम्योचुर्ब्रह्माणमृषयश्च वै । किमस्माभिर्विधे कार्यं तत्कार्यं त्वं समादिश ॥ 12.30 ॥

sūta uvāca ityuktāste praṇamyocurbrahmāṇamṛṣayaśca vai kimasmābhirvidhe kāryaṁ tatkāryaṁ tvaṁ samādiśa

सूत जी ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर उन ऋषियों ने प्रणाम कर ब्रह्मा जी से कहा — "हे विधे! हमें क्या करना चाहिए? आप वह कार्य बताइए।"

श्लोक 31 (shiva.kotirudra.12.31)

इत्युक्तश्च मुनीशैस्तैः सर्वलोकपितामहः । मुनीशांस्तांस्तदा ब्रह्मा स्वयं प्रोवाच वै तदा ॥ 12.31 ॥

ityuktaśca munīśaistaiḥ sarvalokapitāmahaḥ munīśāṁstāṁstadā brahmā svayaṁ provāca vai tadā

उन मुनीश्वरों द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, समस्त लोकों के पितामह ब्रह्मा जी ने तब स्वयं उन मुनीश्वरों से कहा।

श्लोक 32 (shiva.kotirudra.12.32)

ब्रह्मोवाच । आराध्य गिरिजां देवीं प्रार्थयन्तु सुराः शिवाम् । योनिरूपा भवेच्चेद्वै तदा तत्स्थिरतां व्रजेत् ॥ 12.32 ॥

brahmovāca ārādhya girijāṁ devīṁ prārthayantu surāḥ śivām yonirūpā bhaveccedvai tadā tatsthiratāṁ vrajet

ब्रह्मा जी ने कहा — देवगण गिरिजा देवी की आराधना कर शिवा से प्रार्थना करें; यदि वे योनिरूप धारण करें, तो वह लिंग स्थिरता को प्राप्त हो जाएगा।

श्लोक 33 (shiva.kotirudra.12.33)

तद्विधिं प्रवदाम्यद्य सर्वे शृणुत सत्तमाः । तामेव कुरुत प्रेम्णा प्रसन्ना सा भविष्यति ॥ 12.33 ॥

tadvidhiṁ pravadāmyadya sarve śṛṇuta sattamāḥ tāmeva kuruta premṇā prasannā sā bhaviṣyati

अब मैं वह विधि बताता हूँ, हे श्रेष्ठजनो! सब सुनो; उसे प्रेमपूर्वक करो, वे प्रसन्न हो जाएँगी।

श्लोक 34 (shiva.kotirudra.12.34)

कुम्भमेकं च संस्थाप्य कृत्वाष्टदलमुत्तमम् । दूर्वायवाङ्कुरैस्तीर्थोदकमापूरयेत्ततः ॥ 12.34 ॥

kumbhamekaṁ ca saṁsthāpya kṛtvāṣṭadalamuttamam dūrvāyavāṅkuraistīrthodakamāpūrayettataḥ

एक उत्तम अष्टदल बनाकर उस पर एक कलश स्थापित करना चाहिए, फिर उसे दूर्वा और जौ के अंकुरों सहित तीर्थ-जल से भरना चाहिए।

श्लोक 35 (shiva.kotirudra.12.35)

वेदमन्त्रैस्ततस्तं वै कुम्भं चैवाभिमन्त्रयेत् । श्रुत्युक्तविधिना तस्य पूजां कृत्वा शिवं स्मरन् ॥ 12.35 ॥

vedamantraistatastaṁ vai kumbhaṁ caivābhimantrayet śrutyuktavidhinā tasya pūjāṁ kṛtvā śivaṁ smaran

तत्पश्चात् वेदमंत्रों से उस कलश को अभिमंत्रित करना चाहिए, और शिव का स्मरण करते हुए श्रुति-विहित विधि से उसकी पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 36 (shiva.kotirudra.12.36)

तल्लिङ्गं तज्जलेनाभिषेचयेत्परमर्षयः । शतरुद्रियमन्त्रैस्तु प्रोक्षितं शान्तिमाप्नुयात् ॥ 12.36 ॥

talliṅgaṁ tajjalenābhiṣecayetparamarṣayaḥ śatarudriyamantraistu prokṣitaṁ śāntimāpnuyāt

हे परमऋषियो! फिर उस जल से उस लिंग का अभिषेक करना चाहिए; शतरुद्रिय मंत्रों से सिंचित होने पर वह शांति प्राप्त करेगा।

श्लोक 37 (shiva.kotirudra.12.37)

गिरिजायोनिरूपं च बाणं स्थाप्य शुभं पुनः । तत्र लिङ्गं च तत्स्थाप्यं पुनश्चैवाभिमन्त्रयेत् ॥ 12.37 ॥

girijāyonirūpaṁ ca bāṇaṁ sthāpya śubhaṁ punaḥ tatra liṅgaṁ ca tatsthāpyaṁ punaścaivābhimantrayet

फिर गिरिजा के योनिरूप शुभ बाण को स्थापित कर, उस पर उस लिंग को स्थापित करना चाहिए, और पुनः उसे अभिमंत्रित करना चाहिए।

श्लोक 38 (shiva.kotirudra.12.38)

सुगन्धैश्चन्दनैश्चैव पुष्पधूपादिभिस्तथा । नैवेद्यादिकपूजाभिस्तोषयेत्परमेश्वरम् ॥ 12.38 ॥

sugandhaiścandanaiścaiva puṣpadhūpādibhistathā naivedyādikapūjābhistoṣayetparameśvaram

सुगंधित चंदन, पुष्प, धूप आदि से तथा नैवेद्य आदि पूजनों से परमेश्वर को संतुष्ट करना चाहिए।

श्लोक 39 (shiva.kotirudra.12.39)

प्रणिपातैः स्तवैः पुण्यैर्वाद्यैर्गानैस्तथा पुनः । ततः स्वस्त्ययनं कृत्वा जयेति व्याहरेत्तथा ॥ 12.39 ॥

praṇipātaiḥ stavaiḥ puṇyairvādyairgānaistathā punaḥ tataḥ svastyayanaṁ kṛtvā jayeti vyāharettathā

प्रणाम, पवित्र स्तोत्रों, वाद्यों और गान से, तत्पश्चात् स्वस्तिवाचन करके "जय" इस प्रकार उद्घोष करना चाहिए।

श्लोक 40 (shiva.kotirudra.12.40)

प्रसन्नो भव देवेश जगदाह्लादकारक । कर्ता पालयिता त्वं च संहर्ता त्वं निरक्षरः ॥ 12.40 ॥

prasanno bhava deveśa jagadāhlādakāraka kartā pālayitā tvaṁ ca saṁhartā tvaṁ nirakṣaraḥ

"हे देवेश! जगत को आह्लादित करने वाले, प्रसन्न होइए। आप ही सृष्टिकर्ता, आप ही पालनकर्ता, और आप ही अविनाशी संहारकर्ता हैं।"

श्लोक 41 (shiva.kotirudra.12.41)

जगदादिर्जगद्योनिर्जगदन्तर्गतोऽपि च । शान्तो भव महेशान सर्वांल्लोकांश्च पालय ॥ 12.41 ॥

jagadādirjagadyonirjagadantargato’pi ca śānto bhava maheśāna sarvāṁllokāṁśca pālaya

"आप ही जगत के आदि, जगत की योनि, और जगत के भीतर व्याप्त हैं — हे महेश्वर! शांत होइए और समस्त लोकों की रक्षा कीजिए।"

श्लोक 42 (shiva.kotirudra.12.42)

एवं कृते विधौ स्वास्थ्यं भविष्यति न संशयः । विकारो न त्रिलोकेऽस्मिन्भविष्यति सुखं सदा ॥ 12.42 ॥

evaṁ kṛte vidhau svāsthyaṁ bhaviṣyati na saṁśayaḥ vikāro na triloke’sminbhaviṣyati sukhaṁ sadā

इस विधि को इस प्रकार सम्पन्न करने से निश्चय ही स्थिरता प्राप्त होगी; इन तीनों लोकों में कोई विकार नहीं होगा और सदा सुख बना रहेगा।

श्लोक 43 (shiva.kotirudra.12.43)

सूत उवाच । इत्युक्तास्ते द्विजा देवाः प्रणिपत्य पितामहम् । शिवं तं शरणं प्राप्ताः सर्वलोकसुखेप्सया ॥ 12.43 ॥

sūta uvāca ityuktāste dvijā devāḥ praṇipatya pitāmaham śivaṁ taṁ śaraṇaṁ prāptāḥ sarvalokasukhepsayā

सूत जी ने कहा — हे द्विजो! इस प्रकार कहे जाने पर उन देवताओं ने पितामह को प्रणाम कर, समस्त लोकों के सुख की कामना से उन्हीं शिव की शरण ली।

श्लोक 44 (shiva.kotirudra.12.44)

पूजितः परया भक्त्या प्रार्थितः शङ्करस्तदा । सुप्रसन्नस्ततो भूत्वा तानुवाच महेश्वरः ॥ 12.44 ॥

pūjitaḥ parayā bhaktyā prārthitaḥ śaṅkarastadā suprasannastato bhūtvā tānuvāca maheśvaraḥ

परम भक्ति से पूजित और प्रार्थित होकर शंकर तब अत्यंत प्रसन्न हुए और महेश्वर ने उनसे कहा।

श्लोक 45 (shiva.kotirudra.12.45)

महेश्वर उवाच । हे देवा ऋषयः सर्वे मद्वचः शृणुतादरात् । योनिरूपेण मल्लिङ्गं धृतं चेत्स्यात्तदा सुखम् ॥ 12.45 ॥

maheśvara uvāca he devā ṛṣayaḥ sarve madvacaḥ śṛṇutādarāt yonirūpeṇa malliṅgaṁ dhṛtaṁ cetsyāttadā sukham

महेश्वर ने कहा — हे देवगण, हे समस्त ऋषिगण! मेरी बात आदरपूर्वक सुनो। यदि मेरा लिंग योनि-रूप द्वारा धारण किया जाए, तो सुख होगा।

श्लोक 46 (shiva.kotirudra.12.46)

पार्वतीं च विना नान्या लिङ्गं धारयितुं क्षमा । तया धृतं च मल्लिङ्गं द्रुतं शान्तिं गमिष्यति ॥ 12.46 ॥

pārvatīṁ ca vinā nānyā liṅgaṁ dhārayituṁ kṣamā tayā dhṛtaṁ ca malliṅgaṁ drutaṁ śāntiṁ gamiṣyati

पार्वती के अतिरिक्त और कोई इस लिंग को धारण करने में समर्थ नहीं है; उनके द्वारा धारण किया गया मेरा लिंग शीघ्र ही शांति को प्राप्त होगा।

श्लोक 47 (shiva.kotirudra.12.47)

सूत उवाच । तच्छ्रुत्वा ऋषिभिर्देवैः सुप्रसन्नैर्मुनीश्वराः । गृहीत्वा चैव ब्रह्माणं गिरिजा प्रार्थिता तदा ॥ 12.47 ॥

sūta uvāca tacchrutvā ṛṣibhirdevaiḥ suprasannairmunīśvarāḥ gṛhītvā caiva brahmāṇaṁ girijā prārthitā tadā

सूत जी ने कहा — हे मुनीश्वरो! यह सुनकर, अत्यंत प्रसन्न हुए ऋषियों और देवताओं ने ब्रह्मा जी को साथ लेकर गिरिजा से प्रार्थना की।

श्लोक 48 (shiva.kotirudra.12.48)

प्रसन्नां गिरिजां कृत्वा वृषभध्वजमेव च । पूर्वोक्तं च विधिं कृत्वा स्थापितं लिङ्गमुत्तमम् ॥ 12.48 ॥

prasannāṁ girijāṁ kṛtvā vṛṣabhadhvajameva ca pūrvoktaṁ ca vidhiṁ kṛtvā sthāpitaṁ liṅgamuttamam

गिरिजा और वृषभध्वज शिव दोनों को प्रसन्न करके, तथा पूर्वोक्त विधि सम्पन्न करके, उस उत्तम लिंग को स्थापित किया गया।

श्लोक 49 (shiva.kotirudra.12.49)

मन्त्रोक्तेन विधानेन देवाश्च ऋषयस्तथा । चक्रुः प्रसन्नां गिरिजां शिवं च धर्महेतवे ॥ 12.49 ॥

mantroktena vidhānena devāśca ṛṣayastathā cakruḥ prasannāṁ girijāṁ śivaṁ ca dharmahetave

मंत्रोक्त विधि से देवताओं और ऋषियों ने धर्म की सिद्धि हेतु गिरिजा और शिव दोनों को प्रसन्न किया।

श्लोक 50 (shiva.kotirudra.12.50)

समानर्चुर्विशेषेण सर्वे देवर्षयः शिवम् । ब्रह्मा विष्णुः परे चैव त्रैलोक्यं सचराचरम् ॥ 12.50 ॥

samānarcurviśeṣeṇa sarve devarṣayaḥ śivam brahmā viṣṇuḥ pare caiva trailokyaṁ sacarācaram

ब्रह्मा, विष्णु और अन्य सभी देवर्षियों तथा चराचर सहित त्रैलोक्य ने विशेष रूप से शिव की पूजा की।

श्लोक 51 (shiva.kotirudra.12.51)

सुप्रसन्नः शिवो जातः शिवा च जगदम्बिका । धृतं तया च तल्लिङ्गं तेन रूपेण वै तदा ॥ 12.51 ॥

suprasannaḥ śivo jātaḥ śivā ca jagadambikā dhṛtaṁ tayā ca talliṅgaṁ tena rūpeṇa vai tadā

शिव अत्यंत प्रसन्न हुए और जगदम्बिका शिवा भी प्रसन्न हुईं; और उन्होंने उसी योनि-रूप में उस लिंग को धारण किया।

श्लोक 52 (shiva.kotirudra.12.52)

लोकानां स्थापिते लिङ्गे कल्याणं चाभवत्तदा । प्रसिद्धं चैव तल्लिङ्गं त्रिलोक्यामभवद् द्विजाः ॥ 12.52 ॥

lokānāṁ sthāpite liṅge kalyāṇaṁ cābhavattadā prasiddhaṁ caiva talliṅgaṁ trilokyāmabhavad dvijāḥ

लोगों के कल्याण हेतु जब वह लिंग स्थापित हुआ, तब कल्याण हुआ; और हे द्विजो! वह लिंग तीनों लोकों में प्रसिद्ध हो गया।

श्लोक 53 (shiva.kotirudra.12.53)

हाटकेशमिति ख्यातं तच्छिवाशिवमित्यपि । पूजनात्तस्य लोकानां सुखं भवति सर्वथा ॥ 12.53 ॥

hāṭakeśamiti khyātaṁ tacchivāśivamityapi pūjanāttasya lokānāṁ sukhaṁ bhavati sarvathā

वह लिंग हाटकेश और शिवाशिव के नाम से विख्यात हुआ; उसकी पूजा से लोगों को सब प्रकार से सुख प्राप्त होता है।

श्लोक 54 (shiva.kotirudra.12.54)

इह सर्वसमृद्धिः स्यान्नानासुखवहाधिका । परत्र परमा मुक्तिर्नात्र कार्या विचारणा ॥ 12.54 ॥

iha sarvasamṛddhiḥ syānnānāsukhavahādhikā paratra paramā muktirnātra kāryā vicāraṇā

इस लोक में सब प्रकार की समृद्धि तथा नाना सुख अधिकाधिक प्राप्त होते हैं, और परलोक में परम मुक्ति मिलती है — इसमें कोई संशय नहीं करना चाहिए।

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