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कैलास संहिता · अध्याय 11

वामदेव-ब्रह्मवर्णन

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (shiva.kailasa.11.1)

ऋषय ऊचुः ॥ सूत सूत महाभागः त्वमस्मद्गुरुरुत्तमः । अतस्त्वां परिपृच्छामो भवतोऽनुग्रहो यदि

ṛṣaya ūcuḥ || sūta sūta mahābhāgaḥ tvamasmadgururuttamaḥ | atastvāṁ paripṛcchāmo bhavato'nugraho yadi

ऋषियों ने कहा — हे सूत, सूत! हे महाभाग! आप हमारे श्रेष्ठ गुरु हैं; इसलिए यदि आपकी कृपा हो तो हम आपसे पुनः पूछते हैं।

श्लोक 2 (shiva.kailasa.11.2)

श्रद्धालुषु च शिष्येषु त्वादृशा गुरवः सदा । स्निग्धभावा इतीदं नो दर्शितं भवताधुना

śraddhāluṣu ca śiṣyeṣu tvādṛśā guravaḥ sadā | snigdhabhāvā itīdaṁ no darśitaṁ bhavatādhunā

श्रद्धालु शिष्यों के प्रति आप-जैसे गुरु सदा स्नेहशील होते हैं — यह आपने अभी हमें दिखा दिया है।

श्लोक 3 (shiva.kailasa.11.3)

विरजाहोमसमये वामदेवमतं पुरा । सूचितं भवतास्माभिर्न श्रुतं विस्तरान्मुने

virajāhomasamaye vāmadevamataṁ purā | sūcitaṁ bhavatāsmābhirna śrutaṁ vistarānmune

विरजा-होम के समय आपने पूर्व में वामदेव के मत का संकेत दिया था, किन्तु हे मुने! हमने उसे विस्तार से नहीं सुना।

श्लोक 4 (shiva.kailasa.11.4)

तदिदानीं श्रोतुकामाः श्रद्धया परमादरात् । वयं सर्वे कृपासिन्धो प्रीत्या तद्वक्तुमर्हसि

tadidānīṁ śrotukāmāḥ śraddhayā paramādarāt | vayaṁ sarve kṛpāsindho prītyā tadvaktumarhasi

अतः अब हम सब उसे श्रद्धा और परम आदर से सुनना चाहते हैं; हे कृपासिन्धो! प्रेमपूर्वक आप वह बताने योग्य हैं।

श्लोक 5 (shiva.kailasa.11.5)

इति तेषां वचः श्रुत्वा सूतो हृष्टतनूरुहः । नमस्कृत्य महादेवं गुरोः परतरं गुरुम्

iti teṣāṁ vacaḥ śrutvā sūto hṛṣṭatanūruhaḥ | namaskṛtya mahādevaṁ guroḥ parataraṁ gurum

उनके ये वचन सुनकर, रोमांचित शरीर वाले सूत ने महादेव को, गुरु से भी परम गुरु को नमस्कार करके —

श्लोक 6 (shiva.kailasa.11.6)

महादेवीं त्रिजननीं गुरुं व्यासं च भक्तितः । प्राह गम्भीरया वाचा मुनीनाह्लादयन्निदम्

mahādevīṁ trijananīṁ guruṁ vyāsaṁ ca bhaktitaḥ | prāha gambhīrayā vācā munīnāhlādayannidam

— तीनों लोकों की जननी महादेवी को तथा गुरु व्यास को भक्तिपूर्वक प्रणाम करके, गम्भीर वाणी से मुनियों को आनन्दित करते हुए यह कहा।

श्लोक 7 (shiva.kailasa.11.7)

सूत उवाच । स्वस्त्यस्तु मुनयः सर्वे सुखिनः सन्तु सर्वदा । शिवभक्ताः स्थिरात्मानः शिवभक्तिप्रवर्तकाः

sūta uvāca | svastyastu munayaḥ sarve sukhinaḥ santu sarvadā | śivabhaktāḥ sthirātmānaḥ śivabhaktipravartakāḥ

सूत ने कहा — सब मुनियों का कल्याण हो, वे सदा सुखी रहें, शिव-भक्त, स्थिरचित्त तथा शिव-भक्ति के प्रवर्तक बनें रहें।

श्लोक 8 (shiva.kailasa.11.8)

तदतीव विचित्रं हि श्रुतं गुरुमुखाम्बुजात् । इतः पूर्वं मया नोक्तं गुह्यप्राकट्यशङ्कया

tadatīva vicitraṁ hi śrutaṁ gurumukhāmbujāt | itaḥ pūrvaṁ mayā noktaṁ guhyaprākaṭyaśaṅkayā

गुरु के मुखकमल से सुना हुआ वह अत्यन्त विचित्र वृत्तान्त, गुह्य के प्रकट होने की आशंका से मैंने अब तक नहीं कहा था।

श्लोक 9 (shiva.kailasa.11.9)

यूयं खलु महाभागाः शिवभक्ता दृढव्रताः । इति निश्चित्य युष्माकं वक्ष्यामि श्रूयतां मुदा

yūyaṁ khalu mahābhāgāḥ śivabhaktā dṛḍhavratāḥ | iti niścitya yuṣmākaṁ vakṣyāmi śrūyatāṁ mudā

किन्तु आप निश्चय ही महाभाग, दृढ़व्रती शिव-भक्त हैं — यह निश्चय करके अब मैं आपसे कहूँगा, प्रसन्नतापूर्वक सुनिए।

श्लोक 10 (shiva.kailasa.11.10)

पुरा रथन्तरे कल्पे वामदेवो महामुनिः । गर्भमुक्तः शिवज्ञानविदां गुरुतमः स्वयम्

purā rathantare kalpe vāmadevo mahāmuniḥ | garbhamuktaḥ śivajñānavidāṁ gurutamaḥ svayam

पूर्वकाल में रथन्तर कल्प में वामदेव नामक महामुनि, जो जन्म से ही मुक्त थे, स्वयं शिव-ज्ञान के ज्ञाताओं में सबसे बड़े गुरु थे —

श्लोक 11 (shiva.kailasa.11.11)

वेदागमपुराणादिसर्वशास्त्रार्थतत्त्ववित् । देवासुरमनुष्यादिजीवानां जन्मकर्मवित्

vedāgamapurāṇādisarvaśāstrārthatattvavit | devāsuramanuṣyādijīvānāṁ janmakarmavit

— वेद, आगम, पुराण आदि समस्त शास्त्रों के अर्थ-तत्त्व के ज्ञाता, देव, असुर, मनुष्य आदि जीवों के जन्म-कर्म के ज्ञाता —

श्लोक 12 (shiva.kailasa.11.12)

भस्मावदातसर्वाङ्गो जटामण्डलमण्डितः । निराश्रयो निःस्पृहश्च निर्द्वन्द्वो निरहङ्कृतिः

bhasmāvadātasarvāṅgo jaṭāmaṇḍalamaṇḍitaḥ | nirāśrayo niḥspṛhaśca nirdvandvo nirahaṅkṛtiḥ

— सम्पूर्ण अंगों में भस्म से उज्ज्वल, जटाओं के मण्डल से सुशोभित, आश्रयरहित, इच्छारहित, द्वन्द्वरहित, अहंकाररहित —

श्लोक 13 (shiva.kailasa.11.13)

दिगम्बरो महाज्ञानी महेश्वर इवापरः । शिष्यभूतैर्मुनीन्द्रैश्च तादृशैः परिवारितः

digambaro mahājñānī maheśvara ivāparaḥ | śiṣyabhūtairmunīndraiśca tādṛśaiḥ parivāritaḥ

— दिगम्बर, महाज्ञानी, मानो दूसरे महेश्वर ही हों, अपने ही शिष्य बने ऐसे अनेक मुनीन्द्रों से घिरे हुए —

श्लोक 14 (shiva.kailasa.11.14)

पर्यटन्पृथिवीमेतां स्वपादस्पर्शपुण्यतः । पवित्रयन्परे धाम्नि निमग्नहृदयोऽन्वहम्

paryaṭanpṛthivīmetāṁ svapādasparśapuṇyataḥ | pavitrayanpare dhāmni nimagnahṛdayo'nvaham

— अपने चरणों के स्पर्श के पुण्य से इस पृथ्वी पर विचरण करते हुए और उसे पवित्र करते हुए, प्रतिदिन परम धाम में लीन हृदय वाले —

श्लोक 15 (shiva.kailasa.11.15)

कुमारशिखरं मेरोर्दक्षिणं प्राविशन्मुदा । यत्रास्ते भगवानीशतनयः शिखिवाहनः

kumāraśikharaṁ merordakṣiṇaṁ prāviśanmudā | yatrāste bhagavānīśatanayaḥ śikhivāhanaḥ

— हर्षपूर्वक मेरु के दक्षिण में स्थित कुमारशिखर में प्रवेश किया, जहाँ ईश-पुत्र मयूरवाहन भगवान् विराजते हैं —

श्लोक 16 (shiva.kailasa.11.16)

ज्ञानशक्तिधरो वीरः सर्वासुरविमर्दनः । गजावल्लीसमायुक्तः सर्वैर्देवैर्नमस्कृतः

jñānaśaktidharo vīraḥ sarvāsuravimardanaḥ | gajāvallīsamāyuktaḥ sarvairdevairnamaskṛtaḥ

— जो ज्ञानशक्ति (शक्ति-आयुध) धारण करने वाले वीर हैं, समस्त असुरों के विमर्दक हैं, गजा (देवसेना) और वल्ली से युक्त तथा सभी देवों द्वारा नमस्कृत हैं।

श्लोक 17 (shiva.kailasa.11.17)

तत्र स्कन्दसरो नाम सरः सागरसन्निभम् । शिशिरस्वादुपानीयं स्वच्छागाधबहूदकम्

tatra skandasaro nāma saraḥ sāgarasannibham | śiśirasvādupānīyaṁ svacchāgādhabahūdakam

वहाँ स्कन्दसर नामक एक सरोवर है, जो समुद्र के समान है, जिसका जल शीतल-मधुर, स्वच्छ, अगाध और प्रचुर है —

श्लोक 18 (shiva.kailasa.11.18)

सर्वाश्चर्यगुणोपेतं विद्यते स्वामिसन्निधौ । तत्र स्नात्वा वामदेवः सहशिष्यैर्महामुनिः

sarvāścaryaguṇopetaṁ vidyate svāmisannidhau | tatra snātvā vāmadevaḥ sahaśiṣyairmahāmuniḥ

— जो समस्त आश्चर्यजनक गुणों से युक्त है और स्वामी [स्कन्द] के समीप स्थित है। वहाँ स्नान करके महामुनि वामदेव ने अपने शिष्यों सहित —

श्लोक 19 (shiva.kailasa.11.19)

कुमारं शिखरासीनं मुनिवृन्दनिषेवितम् । उद्यदादित्यसङ्काशं मयूरवरवाहनम्

kumāraṁ śikharāsīnaṁ munivṛndaniṣevitam | udyadādityasaṅkāśaṁ mayūravaravāhanam

— शिखर पर विराजमान, मुनिवृन्दों से सेवित, उगते सूर्य के समान तेजस्वी, श्रेष्ठ मयूर पर सवार कुमार को देखा —

श्लोक 20 (shiva.kailasa.11.20)

चतुर्भुजमुदाराङ्गं मुकुटादिविभूषितम् । शक्तिरत्नद्वयोपास्यं शक्तिकुक्कुटधारिणम्

caturbhujamudārāṅgaṁ mukuṭādivibhūṣitam | śaktiratnadvayopāsyaṁ śaktikukkuṭadhāriṇam

— चार भुजाओं वाले, उदार अंगों वाले, मुकुट आदि से विभूषित, दोनों शक्ति-रत्न [देवसेना-वल्ली] से उपासित, शक्ति और कुक्कुट धारण करने वाले —

श्लोक 21 (shiva.kailasa.11.21)

वरदाभयहस्तं च दृष्ट्वा स्कन्दं मुनीश्वरः । सम्पूज्य परया भक्त्या स्तोतुं समुपचक्रमे

varadābhayahastaṁ ca dṛṣṭvā skandaṁ munīśvaraḥ | sampūjya parayā bhaktyā stotuṁ samupacakrame

— वरद और अभय मुद्रा वाले हाथों से युक्त स्कन्द को देखकर मुनीश्वर ने परम भक्ति से पूजा करके स्तुति करना आरम्भ किया।

श्लोक 22 (shiva.kailasa.11.22)

वामदेव उवाच । ॐ नमः प्रणवार्थाय प्रणवार्थविधायिने । प्रणवाक्षरबीजाय प्रण वाय नमो नमः

vāmadeva uvāca | oṁ namaḥ praṇavārthāya praṇavārthavidhāyine | praṇavākṣarabījāya praṇa vāya namo namaḥ

वामदेव ने कहा — ॐ, प्रणव के अर्थ को, प्रणव के अर्थ के विधाता को नमस्कार है; प्रणव के अक्षर-बीज को, स्वयं प्रणव को बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 23 (shiva.kailasa.11.23)

वेदान्तार्थस्वरूपाय वेदान्तार्थविधायिने । वेदान्तार्थविदे नित्यं विदिताय नमो नमः

vedāntārthasvarūpāya vedāntārthavidhāyine | vedāntārthavide nityaṁ viditāya namo namaḥ

वेदान्त के अर्थ-स्वरूप को, वेदान्त के अर्थ के विधाता को, वेदान्त के अर्थ के नित्य ज्ञाता तथा ज्ञात-स्वरूप को बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 24 (shiva.kailasa.11.24)

नमो गुहाय भूतानां गुहासु निहिताय च । गुह्याय गुह्यरूपाय गुह्यागमविदे नमः

namo guhāya bhūtānāṁ guhāsu nihitāya ca | guhyāya guhyarūpāya guhyāgamavide namaḥ

समस्त प्राणियों के गुह [रहस्य-स्वरूप] को, [उनके] हृदय-गुहाओं में स्थित को नमस्कार है; गुह्य को, गुह्य-रूप को, गुह्य आगमों के ज्ञाता को नमस्कार है।

श्लोक 25 (shiva.kailasa.11.25)

अणोरणीयसे तुभ्यं महतोऽपि महीयसे । नमः परावरज्ञाय परमात्मस्वरूपिणे

aṇoraṇīyase tubhyaṁ mahato'pi mahīyase | namaḥ parāvarajñāya paramātmasvarūpiṇe

अणु से भी अणुतर तथा महान् से भी महत्तर आपको नमस्कार है; पर और अपर दोनों के ज्ञाता, परमात्म-स्वरूप को नमस्कार है।

श्लोक 26 (shiva.kailasa.11.26)

स्कन्दाय स्कन्दरूपाय मिहिरारुणतेजसे । नमो मन्दारमालोद्यन्मुकुटादिभृते सदा

skandāya skandarūpāya mihirāruṇatejase | namo mandāramālodyanmukuṭādibhṛte sadā

स्कन्द को, स्कन्द-स्वरूप को, सूर्य के समान अरुण तेज वाले को नमस्कार है; सदा मन्दार-माला से सुशोभित मुकुट आदि धारण करने वाले को नमस्कार है।

श्लोक 27 (shiva.kailasa.11.27)

शिवशिष्याय पुत्राय शिवस्य शिवदायिने । शिवप्रियाय शिवयोरानन्दनिधये नमः

śivaśiṣyāya putrāya śivasya śivadāyine | śivapriyāya śivayorānandanidhaye namaḥ

शिव के शिष्य को, पुत्र को, शिव को मंगल देने वाले को नमस्कार है; शिव के प्रिय, शिव-शिवा दोनों के आनन्द-निधि को नमस्कार है।

श्लोक 28 (shiva.kailasa.11.28)

गाङ्गेयाय नमस्तुभ्यं कार्तिकेयाय धीमते । उमापुत्राय महते शरकाननशायिने

gāṅgeyāya namastubhyaṁ kārtikeyāya dhīmate | umāputrāya mahate śarakānanaśāyine

गंगापुत्र, आपको नमस्कार है; बुद्धिमान् कार्तिकेय, उमा के महान् पुत्र, शरवन में शयन करने वाले को नमस्कार है।

श्लोक 29 (shiva.kailasa.11.29)

षडक्षरशरीराय षड्विधार्थविधायिने । षडध्वातीतरूपाय षण्मुखाय नमो नमः

ṣaḍakṣaraśarīrāya ṣaḍvidhārthavidhāyine | ṣaḍadhvātītarūpāya ṣaṇmukhāya namo namaḥ

षडक्षर-मन्त्र को शरीर धारण करने वाले, छह प्रकार के अर्थ के विधाता, छह अध्वाओं से परे स्वरूप वाले, षण्मुख को बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 30 (shiva.kailasa.11.30)

द्वादशायतनेत्राय द्वादशोद्यतबाहवे । द्वादशायुधधाराय द्वादशात्मन्नमोऽस्तु ते

dvādaśāyatanetrāya dvādaśodyatabāhave | dvādaśāyudhadhārāya dvādaśātmannamo'stu te

बारह विशाल नेत्रों वाले, बारह उठी हुई भुजाओं वाले, बारह आयुध धारण करने वाले, हे द्वादशात्मन्! आपको नमस्कार हो।

श्लोक 31 (shiva.kailasa.11.31)

चतुर्भुजाय शान्ताय शक्तिकुक्कुटधारिणे । वरदाभयहस्ताय नमोऽसुरविदारिणे

caturbhujāya śāntāya śaktikukkuṭadhāriṇe | varadābhayahastāya namo'suravidāriṇe

चतुर्भुज, शान्त, शक्ति और कुक्कुट धारण करने वाले, वरद-अभय हस्त वाले, असुरों के विदारक को नमस्कार है।

श्लोक 32 (shiva.kailasa.11.32)

गजावल्लीकुचालिप्तकुङ्कुमाङ्कितवक्षसे । नमो गजाननानन्दमहिमानन्दितात्मने

gajāvallīkucāliptakuṅkumāṅkitavakṣase | namo gajānanānandamahimānanditātmane

गजा और वल्ली के कुचों से लगे कुंकुम से अंकित वक्षस्थल वाले को नमस्कार है; गजानन [गणेश] के आनन्द की महिमा से आनन्दित आत्मा वाले को नमस्कार है।

श्लोक 33 (shiva.kailasa.11.33)

ब्रह्मादिदेवमुनिकिन्नरगीयमान-गाथाविशेषशुचिचिन्तितकीर्त्तिधाम्ने । वृन्दारकामलकिरीटविभूषणस्रक्-पूज्याभिरामपदपङ्कज ते नमोऽस्तु

brahmādidevamunikinnaragīyamāna-gāthāviśeṣaśucicintitakīrttidhāmne | vṛndārakāmalakirīṭavibhūṣaṇasrak-pūjyābhirāmapadapaṅkaja te namo'stu

ब्रह्मा आदि देवों, मुनियों और किन्नरों द्वारा गाई गई विशेष पवित्र गाथाओं में जिनकी कीर्ति का धाम चिन्तित होता है, देवगणों के मुकुटों की सुन्दर मालाओं से पूज्य और मनोहर चरण-कमलों वाले, आपको नमस्कार हो।

श्लोक 34 (shiva.kailasa.11.34)

इति स्कन्दस्तवं दिव्यं वामदेवेन भाषितम् । यः पठेच्छृणुयाद्वापि स याति परमां गतिम्

iti skandastavaṁ divyaṁ vāmadevena bhāṣitam | yaḥ paṭhecchṛṇuyādvāpi sa yāti paramāṁ gatim

इस प्रकार वामदेव द्वारा कहा गया यह दिव्य स्कन्द-स्तव — जो कोई इसे पढ़ता या सुनता है, वह परम गति को प्राप्त होता है।

श्लोक 35 (shiva.kailasa.11.35)

महाप्रज्ञाकरं ह्येतच्छिवभक्तिविवर्द्धनम् । आयुरारोग्यधनकृत्सर्व्वकामप्रदं सदा

mahāprajñākaraṁ hyetacchivabhaktivivarddhanam | āyurārogyadhanakṛtsarvvakāmapradaṁ sadā

यह महान् प्रज्ञा प्रदान करने वाला, शिव-भक्ति को बढ़ाने वाला, आयु, आरोग्य और धन देने वाला तथा सदा सर्व-कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।

श्लोक 36 (shiva.kailasa.11.36)

इति स्तुत्वा वामदेवो देवं सेनापतिं प्रभुम् । प्रदक्षिणात्रयं कृत्वा प्रणम्य भुवि दण्डवत्

iti stutvā vāmadevo devaṁ senāpatiṁ prabhum | pradakṣiṇātrayaṁ kṛtvā praṇamya bhuvi daṇḍavat

इस प्रकार सेनापति प्रभु देव की स्तुति करके वामदेव ने तीन बार प्रदक्षिणा करके भूमि पर दण्डवत् प्रणाम किया —

श्लोक 37 (shiva.kailasa.11.37)

साष्टाङ्गं च पुनः कृत्वा प्रदक्षिणनमस्कृतम् । अभवत्पार्श्वतस्तस्य विनयावनतो द्विजाः

sāṣṭāṅgaṁ ca punaḥ kṛtvā pradakṣiṇanamaskṛtam | abhavatpārśvatastasya vinayāvanato dvijāḥ

— और पुनः साष्टांग प्रदक्षिणा-नमस्कार करके, हे द्विजो! वे विनयपूर्वक झुके हुए उनके समीप खड़े हुए।

श्लोक 38 (shiva.kailasa.11.38)

वामदेवकृतं स्तोत्रं परमार्थविजृम्भितम् । श्रुत्वाभवत्प्रसन्नो हि महेश्वरसुतः प्रभुः

vāmadevakṛtaṁ stotraṁ paramārthavijṛmbhitam | śrutvābhavatprasanno hi maheśvarasutaḥ prabhuḥ

वामदेव द्वारा रचित, परमार्थ से विस्तारित उस स्तोत्र को सुनकर महेश्वर-पुत्र प्रभु अत्यन्त प्रसन्न हुए।

श्लोक 39 (shiva.kailasa.11.39)

तमुवाच महासेनः प्रीतोऽस्मि तव पूजया । भक्त्या स्तुत्या च भद्रं ते किमद्य करवाण्यहम्

tamuvāca mahāsenaḥ prīto'smi tava pūjayā | bhaktyā stutyā ca bhadraṁ te kimadya karavāṇyaham

महासेन ने उनसे कहा — मैं तुम्हारी पूजा, भक्ति और स्तुति से प्रसन्न हूँ; तुम्हारा कल्याण हो, आज मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ?

श्लोक 40 (shiva.kailasa.11.40)

मुने त्वं योगिनां मुख्यः परिपूर्णश्च निःस्पृहः । भवादृशां हि लोकेस्मिप्रार्थनीयं न विद्यते

mune tvaṁ yogināṁ mukhyaḥ paripūrṇaśca niḥspṛhaḥ | bhavādṛśāṁ hi lokesmiprārthanīyaṁ na vidyate

हे मुने! आप योगियों में श्रेष्ठ, परिपूर्ण तथा इच्छारहित हैं; आप-जैसों को इस लोक में कुछ भी माँगने योग्य नहीं रह जाता।

श्लोक 41 (shiva.kailasa.11.41)

तथापि धर्मरक्षायै लोकानुग्रहकाङ्क्षया । त्वादृशाः साधवः सन्तो विचरन्ति महीतले

tathāpi dharmarakṣāyai lokānugrahakāṅkṣayā | tvādṛśāḥ sādhavaḥ santo vicaranti mahītale

फिर भी धर्म की रक्षा के लिए और लोक-कल्याण की इच्छा से आप-जैसे साधुजन इस पृथ्वी पर विचरण करते हैं।

श्लोक 42 (shiva.kailasa.11.42)

श्रोतव्यमस्ति चेद् ब्रह्मन् वक्तुमर्हसि साम्प्रतम् । तदिदानीमहं वक्ष्ये लोकानुग्रहहेतवे

śrotavyamasti ced brahman vaktumarhasi sāmpratam | tadidānīmahaṁ vakṣye lokānugrahahetave

हे ब्रह्मन्! यदि कुछ सुनने योग्य हो तो अभी कहने योग्य है; मैं वह लोक-कल्याण के लिए अभी कहूँगा।

श्लोक 43 (shiva.kailasa.11.43)

इति स्कन्दवचः श्रुत्वा वामदेवो महामुनिः । प्रश्रयावनतः प्राह मेघगम्भीरया गिरा

iti skandavacaḥ śrutvā vāmadevo mahāmuniḥ | praśrayāvanataḥ prāha meghagambhīrayā girā

स्कन्द के इन वचनों को सुनकर महामुनि वामदेव ने विनयपूर्वक झुककर मेघ के समान गम्भीर वाणी में कहा।

श्लोक 44 (shiva.kailasa.11.44)

वामदेव उवाच । भगवन्परमेशस्त्वं परापरविभूतिदः । सर्वज्ञः सर्वकर्त्ता च सर्वशक्तिधरः प्रभुः

vāmadeva uvāca | bhagavanparameśastvaṁ parāparavibhūtidaḥ | sarvajñaḥ sarvakarttā ca sarvaśaktidharaḥ prabhuḥ

वामदेव ने कहा — हे भगवन्! आप परमेश हैं, पर और अपर दोनों प्रकार की विभूति देने वाले, सर्वज्ञ, सबके कर्ता तथा सर्वशक्तिधर प्रभु हैं।

श्लोक 45 (shiva.kailasa.11.45)

जीवा वयं तु ते वक्तुं सन्निधौ परमेशितुः । तथाप्यनुग्रहोऽयं ते यत्त्वं वदसि मां प्रति

jīvā vayaṁ tu te vaktuṁ sannidhau parameśituḥ | tathāpyanugraho'yaṁ te yattvaṁ vadasi māṁ prati

हम तो परमेश्वर की उपस्थिति में बोलने योग्य साधारण जीव हैं; फिर भी यह आपकी कृपा ही है कि आप मुझसे [इस प्रकार] कहते हैं।

श्लोक 46 (shiva.kailasa.11.46)

कृतार्थोऽहं महाप्राज्ञ विज्ञानकणमात्रतः । प्रेरितः परिपृच्छामि क्षन्तव्योऽतिक्रमो मम

kṛtārtho'haṁ mahāprājña vijñānakaṇamātrataḥ | preritaḥ paripṛcchāmi kṣantavyo'tikramo mama

हे महाप्राज्ञ! विज्ञान की एक कणमात्र से भी मैं कृतार्थ हो गया हूँ; उसी से प्रेरित होकर मैं आगे पूछता हूँ — मेरा यह अतिक्रमण क्षमा करने योग्य हो।

श्लोक 47 (shiva.kailasa.11.47)

प्रणवो हि परः साक्षात्परमेश्वरवाचकः । वाच्यः पशुपतिर्देवः पशूनां पाशमोचकः

praṇavo hi paraḥ sākṣātparameśvaravācakaḥ | vācyaḥ paśupatirdevaḥ paśūnāṁ pāśamocakaḥ

प्रणव ही साक्षात् परमेश्वर का वाचक है; उससे वाच्य पशुपति देव हैं, जो पशुओं (जीवों) के पाश से मुक्त करने वाले हैं।

श्लोक 48 (shiva.kailasa.11.48)

वाचकेन समाहूतः पशून्मोचयते क्षणात् । तस्माद्वाचकतासिद्धिः प्रणवेन शिवम्प्रति

vācakena samāhūtaḥ paśūnmocayate kṣaṇāt | tasmādvācakatāsiddhiḥ praṇavena śivamprati

वाचक (प्रणव) द्वारा आहूत होकर वे क्षणभर में पशुओं को मुक्त कर देते हैं; इसलिए प्रणव द्वारा शिव के प्रति वाचकता की सिद्धि होती है।

श्लोक 49 (shiva.kailasa.11.49)

ओमितीदं सर्वमिति श्रुतिराह सनातनी । ओमिति ब्रह्म सर्वं हि ब्रह्मेति च समब्रवीत्

omitīdaṁ sarvamiti śrutirāha sanātanī | omiti brahma sarvaṁ hi brahmeti ca samabravīt

"ओम् ही यह सब कुछ है" — ऐसा सनातन श्रुति कहती है; "ओम् ब्रह्म है, और सब कुछ निश्चय ही ब्रह्म है" — यह भी उसने समान रूप से कहा।

श्लोक 50 (shiva.kailasa.11.50)

देवसेनापते तुभ्यं देवानाम्पतये नमः । नमो यतीनां पतये परिपूर्णाय ते नमः

devasenāpate tubhyaṁ devānāmpataye namaḥ | namo yatīnāṁ pataye paripūrṇāya te namaḥ

देवसेनापति! आपको नमस्कार, देवताओं के पति! आपको नमस्कार; यतियों के पति को नमस्कार, हे परिपूर्ण! आपको नमस्कार।

श्लोक 51 (shiva.kailasa.11.51)

एवं स्थिते जगत्यस्मिन् शिवादन्यन्न विद्यते । सर्वरूपधरः स्वामी शिवो व्यापी महेश्वरः

evaṁ sthite jagatyasmin śivādanyanna vidyate | sarvarūpadharaḥ svāmī śivo vyāpī maheśvaraḥ

ऐसी स्थिति में इस जगत् में शिव से भिन्न कुछ भी नहीं है; समस्त रूपों को धारण करने वाले, व्यापी स्वामी शिव ही महेश्वर हैं —

श्लोक 52 (shiva.kailasa.11.52)

समष्टिव्यष्टिभावेन प्रणवार्थः श्रुतो मया । न जातुचिन्महासेन सम्प्राप्तस्त्वादृशो गुरुः

samaṣṭivyaṣṭibhāvena praṇavārthaḥ śruto mayā | na jātucinmahāsena samprāptastvādṛśo guruḥ

— समष्टि और व्यष्टि भाव से प्रणव का अर्थ मैंने सुना है; किन्तु हे महासेन! आप-जैसा गुरु मुझे पहले कभी प्राप्त नहीं हुआ।

श्लोक 53 (shiva.kailasa.11.53)

अतः कृत्वानुकम्पां वै तमर्थं वक्तुमर्हसि । उपदेशविधानेन सदाचारक्रमेण च

ataḥ kṛtvānukampāṁ vai tamarthaṁ vaktumarhasi | upadeśavidhānena sadācārakrameṇa ca

अतः कृपा करके आप वह अर्थ कहने योग्य हैं, उपदेश-विधि और सदाचार के क्रम के अनुसार।

श्लोक 54 (shiva.kailasa.11.54)

स्वाम्येकः सर्वजन्तूनां पाशच्छेदकरो गुरुः । अतस्त्वत्कृपया सोऽर्थः श्रोतव्यो हि मया गुरो

svāmyekaḥ sarvajantūnāṁ pāśacchedakaro guruḥ | atastvatkṛpayā so'rthaḥ śrotavyo hi mayā guro

समस्त प्राणियों के पाश को काटने वाला गुरु ही एकमात्र स्वामी है; अतः हे गुरो! आपकी कृपा से वह अर्थ मुझे अवश्य सुनना है।

श्लोक 55 (shiva.kailasa.11.55)

इति स मुनिना पृष्टः स्कन्दः प्रणम्य सदाशिवं-प्रणववपुषं साष्टत्रिंशत्कलावरलक्षितम् । सहितमुमया शश्वत्पार्श्वे मुनिप्रवरान्वितं-गदितुमुपचक्राम श्रेयः श्रुतिष्वपि गोपितम्

iti sa muninā pṛṣṭaḥ skandaḥ praṇamya sadāśivaṁ-praṇavavapuṣaṁ sāṣṭatriṁśatkalāvaralakṣitam | sahitamumayā śaśvatpārśve munipravarānvitaṁ-gaditumupacakrāma śreyaḥ śrutiṣvapi gopitam

इस प्रकार उस मुनि द्वारा पूछे जाने पर स्कन्द ने प्रणवस्वरूप सदाशिव को, जो अड़तीस श्रेष्ठ कलाओं से लक्षित हैं, उमा सहित सदा अपने पार्श्व में [स्मरण कर] प्रणाम करके, श्रेष्ठ मुनियों से युक्त होकर, श्रुतियों में भी गोपित उस कल्याणकारी विषय को कहना आरम्भ किया।

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