Skip to main content

कैलास संहिता · अध्याय 14

शिवरूप-प्रणव-वर्णन

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15

श्लोक 1 (shiva.kailasa.14.1)

वामदेव उवाच । भगवन्षण्मुखाशेषविज्ञानामृतवारिधे । विश्वामरेश्वरसुत प्रणतार्त्तिप्रभञ्जन

vāmadeva uvāca | bhagavanṣaṇmukhāśeṣavijñānāmṛtavāridhe | viśvāmareśvarasuta praṇatārttiprabhañjana

वामदेव ने कहा — हे भगवन्! षण्मुख! समस्त विज्ञान के अमृत-सागर! विश्व के अमरेश्वर के पुत्र! प्रणत जनों की पीड़ा को नष्ट करने वाले!

श्लोक 2 (shiva.kailasa.14.2)

षड्विधार्त्थपरिज्ञानमिष्टदं किमुदाहृतम् । के तत्र षड्विधा अर्थाः परिज्ञानं च किं प्रभो

ṣaḍvidhārtthaparijñānamiṣṭadaṁ kimudāhṛtam | ke tatra ṣaḍvidhā arthāḥ parijñānaṁ ca kiṁ prabho

छह प्रकार के अर्थ का वह परिज्ञान, जो इष्ट देने वाला कहा गया है, वह क्या है? वहाँ छह प्रकार के अर्थ कौन-से हैं, और परिज्ञान क्या है, हे प्रभो?

श्लोक 3 (shiva.kailasa.14.3)

प्रतिपाद्यश्च कस्तस्य परिज्ञाने च किं फलम् । एतत्सर्वं समाचक्ष्व यद्यत्पृष्टं मया गुह

pratipādyaśca kastasya parijñāne ca kiṁ phalam | etatsarvaṁ samācakṣva yadyatpṛṣṭaṁ mayā guha

उसका प्रतिपाद्य कौन है, और उसके परिज्ञान का फल क्या है? हे गुह! मैंने जो-जो पूछा है, वह सब बताइए।

श्लोक 4 (shiva.kailasa.14.4)

एतमर्त्थमविज्ञाय पशुशास्त्रविमोहितः । अद्याप्यहं महासेन भ्रान्तश्च शिवमायया

etamartthamavijñāya paśuśāstravimohitaḥ | adyāpyahaṁ mahāsena bhrāntaśca śivamāyayā

इस अर्थ को न जानकर, पशु-शास्त्रों से मोहित होकर, हे महासेन! मैं आज भी शिव की माया से भ्रमित हूँ।

श्लोक 5 (shiva.kailasa.14.5)

अहं शिवपदद्वन्द्वज्ञानामृतरसायनम् । पीत्त्वा विगतसम्मोहो भविष्यामि यथा तथा

ahaṁ śivapadadvandvajñānāmṛtarasāyanam | pīttvā vigatasammoho bhaviṣyāmi yathā tathā

मैं शिव के दोनों चरणों के ज्ञान-रूपी अमृत-रसायन को पीकर, जैसे भी हो, सम्मोह-रहित हो जाऊँ।

श्लोक 6 (shiva.kailasa.14.6)

कृपामृतार्द्रया दृष्ट्या विलोक्य सुचिरं मयि । कर्त्तव्योऽनुग्रहः श्रीमत्पादाब्जशरणागते

kṛpāmṛtārdrayā dṛṣṭyā vilokya suciraṁ mayi | karttavyo'nugrahaḥ śrīmatpādābjaśaraṇāgate

कृपा-अमृत से आर्द्र दृष्टि से मुझे बहुत देर तक देखकर, आपके श्रीमत् चरण-कमल की शरण में आए हुए मुझ पर अनुग्रह किया जाए।

श्लोक 7 (shiva.kailasa.14.7)

इति श्रुत्वा मुनीन्द्रोक्तं ज्ञानशक्तिधरो विभुः । प्राहान्यदर्शनमहासन्त्रासजनकं वचः

iti śrutvā munīndroktaṁ jñānaśaktidharo vibhuḥ | prāhānyadarśanamahāsantrāsajanakaṁ vacaḥ

मुनीन्द्र द्वारा कहा गया यह सुनकर, ज्ञान-शक्ति धारण करने वाले प्रभु ने अन्य किसी को देखने पर भी महान् विस्मय उत्पन्न करने वाला वचन कहा।

श्लोक 8 (shiva.kailasa.14.8)

सुब्रह्मण्य उवाच । श्रूयतां मुनिशार्दूल त्वया यत्पृष्टमादरात् । समष्टिव्यष्टिभावेन परिज्ञानम्महेशितुः

subrahmaṇya uvāca | śrūyatāṁ muniśārdūla tvayā yatpṛṣṭamādarāt | samaṣṭivyaṣṭibhāvena parijñānammaheśituḥ

सुब्रह्मण्य ने कहा — हे मुनिशार्दूल! सुनो, तुमने जो आदरपूर्वक पूछा है, वह समष्टि और व्यष्टि भाव से महेश्वर का परिज्ञान है।

श्लोक 9 (shiva.kailasa.14.9)

प्रणवार्त्थपरिज्ञानरूपं तद्विस्तरादहम् । वदामि षड्विधार्थैक्यपरिज्ञानेन सुव्रत

praṇavārtthaparijñānarūpaṁ tadvistarādaham | vadāmi ṣaḍvidhārthaikyaparijñānena suvrata

प्रणव के अर्थ के परिज्ञान के रूप में उसे मैं विस्तार से, हे सुव्रत! छह प्रकार के अर्थों की एकता के परिज्ञान द्वारा कहता हूँ।

श्लोक 10 (shiva.kailasa.14.10)

प्रथमो मन्त्ररूपः स्याद् द्वितीयो मन्त्रभावितः । देवतार्त्थस्तृतीयोऽर्थः प्रपञ्चार्थस्ततः परम्

prathamo mantrarūpaḥ syād dvitīyo mantrabhāvitaḥ | devatārtthastṛtīyo'rthaḥ prapañcārthastataḥ param

पहला मन्त्र-रूप है, दूसरा मन्त्र से भावित (यन्त्र-रूप), तीसरा अर्थ देवता-अर्थ है, फिर उसके बाद प्रपंच-अर्थ है —

श्लोक 11 (shiva.kailasa.14.11)

चतुर्थः पञ्चमार्थः स्याद् गुरुरूपप्रदर्शकः । षष्ठः शिष्यात्मरूपोऽर्थः षड्विधार्थाः प्रकीर्तिताः

caturthaḥ pañcamārthaḥ syād gururūpapradarśakaḥ | ṣaṣṭhaḥ śiṣyātmarūpo'rthaḥ ṣaḍvidhārthāḥ prakīrtitāḥ

— चौथा और पाँचवाँ अर्थ गुरु-रूप को दिखाने वाला है, छठा शिष्य-आत्म-रूप अर्थ है — इस प्रकार छह प्रकार के अर्थ कहे गए हैं।

श्लोक 12 (shiva.kailasa.14.12)

तत्र मन्त्रस्वरूपं ते वदामि मुनिसत्तम । येन विज्ञातमात्रेण महाज्ञानी भवेन्नरः

tatra mantrasvarūpaṁ te vadāmi munisattama | yena vijñātamātreṇa mahājñānī bhavennaraḥ

हे मुनिसत्तम! उनमें मन्त्र-स्वरूप को मैं तुम्हें बताता हूँ, जिसे जानते ही मनुष्य महाज्ञानी हो जाता है।

श्लोक 13 (shiva.kailasa.14.13)

आद्यः स्वरः पञ्चमश्च पञ्चमान्तस्ततः परः । बिन्दुनादौ च पञ्चार्णाः प्रोक्ता वेदैर्न चान्यथा

ādyaḥ svaraḥ pañcamaśca pañcamāntastataḥ paraḥ | bindunādau ca pañcārṇāḥ proktā vedairna cānyathā

पहला स्वर (अ), पाँचवाँ (उ), फिर पाँचवें पर समाप्त होने वाला (म्), उसके बाद बिन्दु और नाद — ये पाँच वर्ण-तत्त्व वेदों द्वारा कहे गए हैं, अन्यथा नहीं।

श्लोक 14 (shiva.kailasa.14.14)

एतत्समष्टिरूपो हि वेदादिः समुदाहृतः । नादः सर्वसमष्टिः स्याद् बिन्द्वाढ्यं यच्चतुष्टयम्

etatsamaṣṭirūpo hi vedādiḥ samudāhṛtaḥ | nādaḥ sarvasamaṣṭiḥ syād bindvāḍhyaṁ yaccatuṣṭayam

यह समष्टि-रूप ही वेद का आदि कहा गया है; नाद सबकी समष्टि है, तथा बिन्दु सहित यह चतुष्टय —

श्लोक 15 (shiva.kailasa.14.15)

व्यष्टिरूपेण संसिद्धं प्रणवे शिववाचके । यन्त्ररूपं शृणु प्राज्ञ शिवलिङ्गं तदेव हि

vyaṣṭirūpeṇa saṁsiddhaṁ praṇave śivavācake | yantrarūpaṁ śṛṇu prājña śivaliṅgaṁ tadeva hi

— व्यष्टि-रूप से शिव-वाचक प्रणव में सिद्ध है। हे प्राज्ञ! अब यन्त्र-रूप सुनो — वही साक्षात् शिव-लिंग है।

श्लोक 16 (shiva.kailasa.14.16)

सर्वाधस्ताल्लिखेत्पीठं तदूर्ध्वं प्रथमं स्वरम् । उवर्णं च तदूर्ध्वस्थं पवर्गान्तं तदूर्ध्वगम्

sarvādhastāllikhetpīṭhaṁ tadūrdhvaṁ prathamaṁ svaram | uvarṇaṁ ca tadūrdhvasthaṁ pavargāntaṁ tadūrdhvagam

सबसे नीचे पीठ लिखे, उसके ऊपर पहला स्वर (अ), उसके ऊपर उकार, उसके ऊपर पवर्ग का अन्त्य (म्) —

श्लोक 17 (shiva.kailasa.14.17)

तन्मस्तकस्थं बिन्दुं च तदूर्ध्वं नादमालिखेत् । यन्त्रे सम्पूर्णतां याते सर्वकामः प्रसिध्यति

tanmastakasthaṁ binduṁ ca tadūrdhvaṁ nādamālikhet | yantre sampūrṇatāṁ yāte sarvakāmaḥ prasidhyati

— उसके शीर्ष पर बिन्दु, और उसके ऊपर नाद अंकित करे। यन्त्र के पूर्ण होने पर समस्त कामनाएँ सिद्ध हो जाती हैं।

श्लोक 18 (shiva.kailasa.14.18)

एवं यन्त्रं समालिख्य प्रणवे नव वेष्टयेत् । तदुत्थेनैव नादेन विद्यन्नादावसानकम्

evaṁ yantraṁ samālikhya praṇave nava veṣṭayet | tadutthenaiva nādena vidyannādāvasānakam

इस प्रकार यन्त्र बनाकर उसे प्रणव में नौ बार वेष्टित करे; उससे उत्पन्न नाद से ही ज्ञान-नाद पर्यन्त [स्फुरण होता है]।

श्लोक 19 (shiva.kailasa.14.19)

देवतार्त्थं प्रवक्ष्यामि गूढं सर्वत्र यन्मुने । तव स्नेहाद् वामदेव यथा शङ्करभाषितम्

devatārtthaṁ pravakṣyāmi gūḍhaṁ sarvatra yanmune | tava snehād vāmadeva yathā śaṅkarabhāṣitam

हे मुने! सर्वत्र गूढ़ देवता-अर्थ को मैं कहूँगा — तुम्हारे स्नेह के कारण, हे वामदेव! जैसे शंकर ने कहा था।

श्लोक 20 (shiva.kailasa.14.20)

सद्योजातं प्रपद्यामीत्युपक्रम्य सदाशिवोम् । इति प्राह श्रुतिस्तारं ब्रह्मपञ्चकवाचकम्

sadyojātaṁ prapadyāmītyupakramya sadāśivom | iti prāha śrutistāraṁ brahmapañcakavācakam

"सद्योजातं प्रपद्यामि" से आरम्भ करके "सदाशिवोम्" तक — इस प्रकार श्रुति उस प्रणव को पंचब्रह्म का वाचक कहती है।

श्लोक 21 (shiva.kailasa.14.21)

विज्ञेया ब्रह्मरूपिण्यः सूक्ष्माः पञ्चैव देवताः । एता एव शिवस्यापि मूर्तित्वेनोपबृंहिताः

vijñeyā brahmarūpiṇyaḥ sūkṣmāḥ pañcaiva devatāḥ | etā eva śivasyāpi mūrtitvenopabṛṁhitāḥ

ब्रह्म-स्वरूप, सूक्ष्म, पाँच ही देवताओं को जानना चाहिए; ये ही शिव की भी मूर्ति के रूप में वर्णित हैं।

श्लोक 22 (shiva.kailasa.14.22)

शिवस्य वाचको मन्त्रः शिवमूर्त्तेश्च वाचकः । मूर्त्तिमूर्तिमतोर्भेदो नात्यन्तं विद्यते यतः

śivasya vācako mantraḥ śivamūrtteśca vācakaḥ | mūrttimūrtimatorbhedo nātyantaṁ vidyate yataḥ

मन्त्र शिव का वाचक है, और शिव की मूर्ति का भी वाचक है; क्योंकि मूर्ति और मूर्तिमान् में अत्यन्त भेद नहीं है।

श्लोक 23 (shiva.kailasa.14.23)

ईशानमुकुटोपेत इत्यारभ्य पुरोदितः । शिवस्य विग्रहः पञ्चवक्त्राणि शृणु साम्प्रतम्

īśānamukuṭopeta ityārabhya puroditaḥ | śivasya vigrahaḥ pañcavaktrāṇi śṛṇu sāmpratam

"ईशानमुकुटोपेत" इत्यादि से पूर्व कहा गया शिव का विग्रह — अब पाँच मुखों को सुनो।

श्लोक 24 (shiva.kailasa.14.24)

पञ्चमादि समारभ्य सद्योजाताद्यनुक्रमात् । ऊर्ध्वान्तमीशानान्तं च मुखपञ्चकमीरितम्

pañcamādi samārabhya sadyojātādyanukramāt | ūrdhvāntamīśānāntaṁ ca mukhapañcakamīritam

पाँचवें [वर्ण] से आरम्भ करके सद्योजात आदि के क्रम से, ऊर्ध्व अन्त में ईशान पर्यन्त — इस प्रकार पाँच मुख कहे गए हैं।

श्लोक 25 (shiva.kailasa.14.25)

ईशानस्यैव देवस्य चतुर्व्यूहपदे स्थितम् । पुरुषाद्यं च सद्यान्तं ब्रह्मरूपं चतुष्टयम्

īśānasyaiva devasya caturvyūhapade sthitam | puruṣādyaṁ ca sadyāntaṁ brahmarūpaṁ catuṣṭayam

ईशान देव के ही चतुर्व्यूह-पद में स्थित पुरुष आदि से सद्य पर्यन्त चार ब्रह्म-रूप हैं।

श्लोक 26 (shiva.kailasa.14.26)

पञ्च ब्रह्मसमष्टिः स्यादीशानं ब्रह्म विश्रुतम् । पुरुषाद्यं तु तद्व्यष्टिः सद्योजातान्तिकं मुने

pañca brahmasamaṣṭiḥ syādīśānaṁ brahma viśrutam | puruṣādyaṁ tu tadvyaṣṭiḥ sadyojātāntikaṁ mune

पाँच ब्रह्म की समष्टि ईशान नामक विश्रुत ब्रह्म है; और पुरुष आदि से सद्योजात पर्यन्त, हे मुने! उसकी व्यष्टि है।

श्लोक 27 (shiva.kailasa.14.27)

अनुग्रहमयं चक्रमिदं पञ्चार्थकारणम् । परब्रह्मात्मकं सूक्ष्मं निर्विकारमनामयम्

anugrahamayaṁ cakramidaṁ pañcārthakāraṇam | parabrahmātmakaṁ sūkṣmaṁ nirvikāramanāmayam

यह अनुग्रहमय चक्र पंचार्थ का कारण है, परब्रह्म-स्वरूप, सूक्ष्म, निर्विकार, निरामय है।

श्लोक 28 (shiva.kailasa.14.28)

अनुग्रहोऽपि द्विविधस्तिरोभावादिगोचरः । प्रभुश्चान्यस्तु जीवानां परावरविमुक्तिदः

anugraho'pi dvividhastirobhāvādigocaraḥ | prabhuścānyastu jīvānāṁ parāvaravimuktidaḥ

अनुग्रह भी दो प्रकार का है — एक तिरोभाव आदि से सम्बन्धित, तथा दूसरा प्रभु-रूप, जो जीवों को पर और अपर दोनों प्रकार की मुक्ति देने वाला है।

श्लोक 29 (shiva.kailasa.14.29)

एतत्सदाशिवस्यैव कृत्यद्वयमुदाहृतम् । अनुग्रहेऽपि सृष्ट्यादिकृत्यानां पञ्चकं विभोः

etatsadāśivasyaiva kṛtyadvayamudāhṛtam | anugrahe'pi sṛṣṭyādikṛtyānāṁ pañcakaṁ vibhoḥ

यह सदाशिव का ही द्विविध कृत्य कहा गया है; अनुग्रह में भी विभु के सृष्टि आदि पाँच कृत्य होते हैं।

श्लोक 30 (shiva.kailasa.14.30)

मुने तत्रापि सद्याद्या देवताः परिकीर्तिताः । परब्रह्मस्वरूपास्ताः पञ्च कल्याणदाः सदा

mune tatrāpi sadyādyā devatāḥ parikīrtitāḥ | parabrahmasvarūpāstāḥ pañca kalyāṇadāḥ sadā

हे मुने! वहाँ भी सद्य आदि देवताएँ कही गई हैं; परब्रह्म-स्वरूप वे पाँचों सदा कल्याण देने वाली हैं।

श्लोक 31 (shiva.kailasa.14.31)

अनुग्रहमयं चक्रं शान्त्यतीतकलामयम् । सदाशिवाधिष्ठितं च परमं पदमुच्यते

anugrahamayaṁ cakraṁ śāntyatītakalāmayam | sadāśivādhiṣṭhitaṁ ca paramaṁ padamucyate

यह अनुग्रहमय चक्र शान्त्यतीत कला से युक्त, सदाशिव द्वारा अधिष्ठित है, तथा परम पद कहलाता है।

श्लोक 32 (shiva.kailasa.14.32)

एतदेव पदं प्राप्य यतीनां भवितात्मनाम् । सदाशिवोपासकानां प्रणवासक्तचेतसाम्

etadeva padaṁ prāpya yatīnāṁ bhavitātmanām | sadāśivopāsakānāṁ praṇavāsaktacetasām

इसी पद को प्राप्त करके, शुद्धात्मा यतियों का, सदाशिव के उपासकों का, प्रणव में आसक्त चित्त वालों का —

श्लोक 33 (shiva.kailasa.14.33)

एतदेव पदं प्राप्य तेन साकं मुनीश्वराः । भुक्त्वा सुविपुलान्भोगान्देवेन ब्रह्मरूपिणा

etadeva padaṁ prāpya tena sākaṁ munīśvarāḥ | bhuktvā suvipulānbhogāndevena brahmarūpiṇā

— इसी पद को प्राप्त करके मुनीश्वर, उनके साथ, ब्रह्म-स्वरूप देव के साथ अत्यन्त विपुल भोगों को भोगकर —

श्लोक 34 (shiva.kailasa.14.34)

महाप्रलयसम्भूतौ शिवसाम्यं भजन्ति हि । न पतन्ति पुनः क्वापि संसाराब्धौ जनाश्च ते

mahāpralayasambhūtau śivasāmyaṁ bhajanti hi | na patanti punaḥ kvāpi saṁsārābdhau janāśca te

— महाप्रलय होने पर शिव के साम्य को प्राप्त होते हैं; और वे लोग पुनः कहीं भी संसार-सागर में नहीं गिरते।

श्लोक 35 (shiva.kailasa.14.35)

ते ब्रह्मलोक इति च श्रुतिराह सनातनी । ऐश्वर्यं तु शिवस्यापि समष्टिरिदमेव हि

te brahmaloka iti ca śrutirāha sanātanī | aiśvaryaṁ tu śivasyāpi samaṣṭiridameva hi

"वे ब्रह्मलोक में हैं" ऐसा सनातन श्रुति कहती है। शिव का ऐश्वर्य भी यही समष्टि-रूप है।

श्लोक 36 (shiva.kailasa.14.36)

सर्वैश्वर्येण सम्पन्न इत्याहाथर्वणी शिखा । सर्वैश्वर्यप्रदातृत्वमस्यैव प्रवदन्ति हि

sarvaiśvaryeṇa sampanna ityāhātharvaṇī śikhā | sarvaiśvaryapradātṛtvamasyaiva pravadanti hi

"सर्व-ऐश्वर्य से सम्पन्न" ऐसा अथर्ववेद की शिखा कहती है; वे उन्हीं को सर्व-ऐश्वर्य देने वाला कहते हैं।

श्लोक 37 (shiva.kailasa.14.37)

चमकस्य पदान्नान्यदधिकं विद्यते पदम् । ब्रह्मपञ्चकविस्तारप्रपञ्चः खलु दृश्यते

camakasya padānnānyadadhikaṁ vidyate padam | brahmapañcakavistāraprapañcaḥ khalu dṛśyate

चमक के पदों से अधिक कोई अन्य पद विद्यमान नहीं है; पंच-ब्रह्म के विस्तार का ही यह प्रपंच वस्तुतः दिखाई देता है।

श्लोक 38 (shiva.kailasa.14.38)

ब्रह्मभ्य एवं सञ्जाता निवृत्त्याद्याः कला मताः । सूक्ष्मभूतस्वरूपिण्यः कारणत्वेन विश्रुताः

brahmabhya evaṁ sañjātā nivṛttyādyāḥ kalā matāḥ | sūkṣmabhūtasvarūpiṇyaḥ kāraṇatvena viśrutāḥ

इन्हीं पंच-ब्रह्मों से निवृत्ति आदि कलाएँ उत्पन्न मानी जाती हैं; सूक्ष्म-भूत-स्वरूप वाली ये कारण-रूप में विख्यात हैं।

श्लोक 39 (shiva.kailasa.14.39)

स्थूलरूपस्वरूपस्य प्रपञ्चस्यास्य सुव्रत । पञ्चधावस्थितं यत्तद् ब्रह्मपञ्चकमिष्यते

sthūlarūpasvarūpasya prapañcasyāsya suvrata | pañcadhāvasthitaṁ yattad brahmapañcakamiṣyate

हे सुव्रत! स्थूल-रूप वाले इस प्रपंच का जो पाँच प्रकार से अवस्थित रूप है, वही पंच-ब्रह्म कहलाता है।

श्लोक 40 (shiva.kailasa.14.40)

पुरुषः श्रोत्रवाण्यौ च शब्दकाशौ च पञ्चकम् । व्याप्तमीशानरूपेण ब्रह्मणा मुनिसत्तम

puruṣaḥ śrotravāṇyau ca śabdakāśau ca pañcakam | vyāptamīśānarūpeṇa brahmaṇā munisattama

पुरुष, श्रोत्र और वाणी, शब्द और आकाश — यह पंचक ईशान-रूप ब्रह्म द्वारा व्याप्त है, हे मुनिसत्तम!

श्लोक 41 (shiva.kailasa.14.41)

प्रकृतिस्त्वक्च पाणिश्च स्पर्शो वायुश्च पञ्चकम् । व्याप्तं पुरुषरूपेण ब्रह्मणैव मुनीश्वर

prakṛtistvakca pāṇiśca sparśo vāyuśca pañcakam | vyāptaṁ puruṣarūpeṇa brahmaṇaiva munīśvara

प्रकृति, त्वचा और हाथ, स्पर्श और वायु — यह पंचक पुरुष-रूप ब्रह्म द्वारा ही व्याप्त है, हे मुनीश्वर!

श्लोक 42 (shiva.kailasa.14.42)

अहङ्कारस्तथा चक्षुः पादो रूपं च पावकः । अघोरब्रह्मणा व्याप्तमेतत्पञ्चकमञ्चितम्

ahaṅkārastathā cakṣuḥ pādo rūpaṁ ca pāvakaḥ | aghorabrahmaṇā vyāptametatpañcakamañcitam

अहंकार, चक्षु, पैर, रूप और अग्नि — यह सुसज्जित पंचक अघोर-ब्रह्म द्वारा व्याप्त है।

श्लोक 43 (shiva.kailasa.14.43)

बुद्धिश्च रसना पायू रस आपश्च पञ्चकम् । ब्रह्मणा वामदेवेन व्याप्तं भवति नित्यशः

buddhiśca rasanā pāyū rasa āpaśca pañcakam | brahmaṇā vāmadevena vyāptaṁ bhavati nityaśaḥ

बुद्धि, जिह्वा, गुदा, रस और जल — यह पंचक वामदेव-ब्रह्म द्वारा सदा व्याप्त रहता है।

श्लोक 44 (shiva.kailasa.14.44)

मनो नासा तथोपस्थो गन्धो भूमिश्च पञ्चकम् । सद्येन ब्रह्मणा व्याप्तं पञ्चब्रह्ममयं जगत्

mano nāsā tathopastho gandho bhūmiśca pañcakam | sadyena brahmaṇā vyāptaṁ pañcabrahmamayaṁ jagat

मन, नासिका, उपस्थ, गन्ध और भूमि — यह पंचक सद्य-ब्रह्म द्वारा व्याप्त है; इस प्रकार यह जगत् पंच-ब्रह्ममय है।

श्लोक 45 (shiva.kailasa.14.45)

यन्त्ररूपेणोपदिष्टः प्रणवः शिववाचकः । समष्टिः पञ्चवर्णानां बिन्द्वाद्यं यच्चतुष्टयम्

yantrarūpeṇopadiṣṭaḥ praṇavaḥ śivavācakaḥ | samaṣṭiḥ pañcavarṇānāṁ bindvādyaṁ yaccatuṣṭayam

यन्त्र-रूप से उपदिष्ट शिव-वाचक प्रणव पाँच वर्णों की समष्टि है, जिसमें बिन्दु आदि चार [तत्त्व सम्मिलित] हैं।

श्लोक 46 (shiva.kailasa.14.46)

शिवोपदिष्टमार्गेण यन्त्ररूपं विभावयेत् । प्रणवं परमं मन्त्राधिराजं शिवरूपिणम्

śivopadiṣṭamārgeṇa yantrarūpaṁ vibhāvayet | praṇavaṁ paramaṁ mantrādhirājaṁ śivarūpiṇam

शिव द्वारा उपदिष्ट मार्ग से मन्त्रों के अधिराज, शिव-स्वरूप, परम प्रणव के यन्त्र-रूप का ध्यान करे।

अध्याय 13अध्याय-सूचीअध्याय 15