कैलास संहिता · अध्याय 15
उपासना-मूर्ति-वर्णन
श्लोक 1 (shiva.kailasa.15.1)
ईश्वर उवाच । ततः परं प्रवक्ष्यामि सृष्टिपद्धतिमुत्तमाम् । सदाशिवान्महेशादिचतुष्कस्य वरानने
īśvara uvāca | tataḥ paraṁ pravakṣyāmi sṛṣṭipaddhatimuttamām | sadāśivānmaheśādicatuṣkasya varānane
ईश्वर ने कहा — हे वरानने! उसके बाद मैं सदाशिव से महेश आदि चतुष्क की उत्तम सृष्टि-विधि कहूँगा।
श्लोक 2 (shiva.kailasa.15.2)
सदाशिवः समष्टिः स्यादाकाशधिपतिः प्रभुः । अस्यैव व्यष्टितापन्नं महेशादिचतुष्टयम्
sadāśivaḥ samaṣṭiḥ syādākāśadhipatiḥ prabhuḥ | asyaiva vyaṣṭitāpannaṁ maheśādicatuṣṭayam
सदाशिव समष्टि-रूप हैं, आकाश के अधिपति प्रभु; उन्हीं का व्यष्टि-रूप महेश आदि चतुष्टय है।
श्लोक 3 (shiva.kailasa.15.3)
सदाशिवसहस्रांशान्महेशस्य समुद्भवः । पुरुषानन्तरूपत्वाद्वायोरधिपतिश्च सः
sadāśivasahasrāṁśānmaheśasya samudbhavaḥ | puruṣānantarūpatvādvāyoradhipatiśca saḥ
सदाशिव के सहस्रांश से महेश की उत्पत्ति हुई; पुरुष के अनन्तर रूप होने से वे वायु के अधिपति भी हैं।
श्लोक 4 (shiva.kailasa.15.4)
मायाशक्तियुतो वामे सकलश्च क्रियाधिकः । अस्यैव व्यष्टिरूपं स्यादीश्वरादिचतुष्टयम्
māyāśaktiyuto vāme sakalaśca kriyādhikaḥ | asyaiva vyaṣṭirūpaṁ syādīśvarādicatuṣṭayam
वाम भाग में माया-शक्ति से युक्त, सकल तथा क्रिया में अधिक — उन्हीं का व्यष्टि-रूप ईश्वर आदि चतुष्टय है।
श्लोक 5 (shiva.kailasa.15.5)
ईशो विश्वेश्वरः पश्चात्परमेशस्ततः परम् । सर्वेश्वर इतीदं तु तिरोधाचक्रमुत्तमम्
īśo viśveśvaraḥ paścātparameśastataḥ param | sarveśvara itīdaṁ tu tirodhācakramuttamam
ईश, फिर विश्वेश्वर, फिर परमेश, उसके बाद सर्वेश्वर — यह उत्तम तिरोधान-चक्र है।
श्लोक 6 (shiva.kailasa.15.6)
तिरोभावो द्विधा भिन्न एको रुद्रादिगोचरः । अन्यश्च देहभावेन पशुवर्गस्य सन्ततेः
tirobhāvo dvidhā bhinna eko rudrādigocaraḥ | anyaśca dehabhāvena paśuvargasya santateḥ
तिरोभाव दो प्रकार का है — एक रुद्र आदि से सम्बद्ध, तथा दूसरा देहभाव से पशु-वर्ग की सन्तति से सम्बद्ध।
श्लोक 7 (shiva.kailasa.15.7)
भोगानुरञ्जनपरः कर्मसाम्यक्षणावधि । कर्मसाम्ये स एकः स्यादनुग्रहमयो विभुः
bhogānurañjanaparaḥ karmasāmyakṣaṇāvadhi | karmasāmye sa ekaḥ syādanugrahamayo vibhuḥ
जो कर्म-साम्य के क्षण तक भोग द्वारा [जीवों को] रंजित करने में परायण रहता है; कर्म-साम्य होने पर वह एक ही विभु अनुग्रहमय हो जाता है।
श्लोक 8 (shiva.kailasa.15.8)
तत्र सर्वेश्वरा यास्ते देवताः परिकीर्तिताः । परब्रह्मात्मकाः साक्षान्निर्विकल्पा निरामयाः
tatra sarveśvarā yāste devatāḥ parikīrtitāḥ | parabrahmātmakāḥ sākṣānnirvikalpā nirāmayāḥ
वहाँ जो सर्वेश्वर नामक देवताएँ कही गई हैं, वे साक्षात् परब्रह्म-स्वरूप, निर्विकल्प, निरामय हैं।
श्लोक 9 (shiva.kailasa.15.9)
तिरोभावात्मकं चक्रं भवेच्छान्तिकलामयम् । महेश्वराधिष्ठितं च पदमेतदनुत्तमम्
tirobhāvātmakaṁ cakraṁ bhavecchāntikalāmayam | maheśvarādhiṣṭhitaṁ ca padametadanuttamam
तिरोभाव-स्वरूप चक्र शान्ति-कला से युक्त होता है; महेश्वर द्वारा अधिष्ठित यह पद अनुत्तम है।
श्लोक 10 (shiva.kailasa.15.10)
एतदेव पदं प्राप्यं महेशपदसेविनाम् । माहेश्वराणां सालोक्यक्रमादेव विमुक्तिदम्
etadeva padaṁ prāpyaṁ maheśapadasevinām | māheśvarāṇāṁ sālokyakramādeva vimuktidam
इसी पद को महेश-पद के सेवकों को प्राप्त करना है; माहेश्वरों के लिए यह सालोक्य-क्रम से ही मुक्ति देने वाला है।
श्लोक 11 (shiva.kailasa.15.11)
महेश्वरसहस्रांशाद् रुद्रमूर्तिरजायत । अघोरवदनाकारस्तेजस्तत्त्वाधिपश्च सः
maheśvarasahasrāṁśād rudramūrtirajāyata | aghoravadanākārastejastattvādhipaśca saḥ
महेश्वर के सहस्रांश से रुद्र-मूर्ति उत्पन्न हुई; अघोर-मुख के आकार वाले वे तेज-तत्त्व के अधिपति भी हैं।
श्लोक 12 (shiva.kailasa.15.12)
गौरीशक्तियुतो वामे सर्वसंहारकृत्प्रभुः । अस्यैव व्यष्टिरूपं स्याच्छिवाद्यथ चतुष्टयम्
gaurīśaktiyuto vāme sarvasaṁhārakṛtprabhuḥ | asyaiva vyaṣṭirūpaṁ syācchivādyatha catuṣṭayam
वाम भाग में गौरी-शक्ति से युक्त, सबका संहार करने वाले प्रभु — उन्हीं का व्यष्टि-रूप शिव आदि चतुष्टय है।
श्लोक 13 (shiva.kailasa.15.13)
शिवो हरो मृडभवौ विदितं चक्रमद्भुतम् । संहाराख्यं महादिव्यं परमं हि मुनीश्वर
śivo haro mṛḍabhavau viditaṁ cakramadbhutam | saṁhārākhyaṁ mahādivyaṁ paramaṁ hi munīśvara
शिव, हर, मृड और भव — इस प्रकार यह अद्भुत चक्र जाना जाता है, हे मुनीश्वर! संहार नामक, महादिव्य, परम।
श्लोक 14 (shiva.kailasa.15.14)
स संहारस्त्रिधा प्रोक्तो बुधैर्नित्यादिभेदतः । नित्यो जीवसुषुप्त्याख्यो विधेर्नैमित्तिकः स्मृतः
sa saṁhārastridhā prokto budhairnityādibhedataḥ | nityo jīvasuṣuptyākhyo vidhernaimittikaḥ smṛtaḥ
वह संहार बुद्धिमानों द्वारा नित्य आदि भेद से त्रिविध कहा गया है — नित्य संहार जीव की सुषुप्ति कहलाता है, नैमित्तिक ब्रह्मा के विधान से स्मृत है।
श्लोक 15 (shiva.kailasa.15.15)
विलयस्तस्य तु महानिति वेदनिदर्शितः । जीवानां जन्मदुःखादिशान्तानामुषितात्मनाम्
vilayastasya tu mahāniti vedanidarśitaḥ | jīvānāṁ janmaduḥkhādiśāntānāmuṣitātmanām
उसका महाप्रलय वेद में दिखाया गया है — जन्म-दुःख आदि से शान्त, [चिरकाल] निवास करने वाले जीवों के लिए —
श्लोक 16 (shiva.kailasa.15.16)
विश्रान्त्यर्थं मुनिश्रेष्ठ कर्मणां पाकहेतवे । संहारः कल्पितस्त्रेधा रुद्रेणामिततेजसा
viśrāntyarthaṁ muniśreṣṭha karmaṇāṁ pākahetave | saṁhāraḥ kalpitastredhā rudreṇāmitatejasā
— हे मुनिश्रेष्ठ! विश्राम के लिए तथा कर्मों के पाक के हेतु, अमित तेजस्वी रुद्र द्वारा यह संहार त्रिविध रूप से रचा गया है।
श्लोक 17 (shiva.kailasa.15.17)
रुद्रस्यैव तु कृत्यानां त्रयमेतदुदाहृतम् । संहृतवपि सृष्ट्यादिकृत्यानां पञ्चकं विभोः
rudrasyaiva tu kṛtyānāṁ trayametadudāhṛtam | saṁhṛtavapi sṛṣṭyādikṛtyānāṁ pañcakaṁ vibhoḥ
यह त्रिविध रुद्र के ही कृत्य कहे गए हैं; संहार में भी विभु के सृष्टि आदि पाँच कृत्य होते हैं।
श्लोक 18 (shiva.kailasa.15.18)
मुने तत्र भवाद्यास्ते देवताः परिकीर्तिताः । परब्रह्मस्वरूपाश्च लोकानुग्रहकारकाः
mune tatra bhavādyāste devatāḥ parikīrtitāḥ | parabrahmasvarūpāśca lokānugrahakārakāḥ
हे मुने! वहाँ भव आदि देवताएँ कही गई हैं, जो परब्रह्म-स्वरूप तथा लोक-अनुग्रह करने वाली हैं।
श्लोक 19 (shiva.kailasa.15.19)
संहाराख्यमिदं चक्रं विद्यारूपकलामयम् । अधिष्ठितं च रुद्रेण पदमेतन्निरामयम्
saṁhārākhyamidaṁ cakraṁ vidyārūpakalāmayam | adhiṣṭhitaṁ ca rudreṇa padametannirāmayam
यह संहार नामक चक्र विद्या-रूप कला से युक्त है; रुद्र द्वारा अधिष्ठित यह पद निरामय है।
श्लोक 20 (shiva.kailasa.15.20)
एतदेव पदं प्राप्यं रुद्राराधनकाङ्क्षिणाम् । रुद्राणां तद्धि सालोक्यक्रमात्सायुज्यदं मुने
etadeva padaṁ prāpyaṁ rudrārādhanakāṅkṣiṇām | rudrāṇāṁ taddhi sālokyakramātsāyujyadaṁ mune
इसी पद को रुद्र की आराधना की इच्छा वालों को प्राप्त करना है; रुद्रों के लिए यह सालोक्य-क्रम से सायुज्य देने वाला है, हे मुने!
श्लोक 21 (shiva.kailasa.15.21)
रुद्रमूर्तेः सहस्रांशाद्विष्णोश्चैवाभवज्जनिः । स वामदेवचक्रात्मा वारितत्त्वैकनायकः
rudramūrteḥ sahasrāṁśādviṣṇoścaivābhavajjaniḥ | sa vāmadevacakrātmā vāritattvaikanāyakaḥ
रुद्र-मूर्ति के सहस्रांश से विष्णु की उत्पत्ति हुई; वे वामदेव-चक्र-स्वरूप, जल-तत्त्व के एकमात्र स्वामी हैं।
श्लोक 22 (shiva.kailasa.15.22)
रमाशक्तियुतो वामे सर्व्वरक्षाकरो महान् । चतुर्भुजोऽरविन्दाक्षः श्यामः शङ्खादिचिह्नभृत्
ramāśaktiyuto vāme sarvvarakṣākaro mahān | caturbhujo'ravindākṣaḥ śyāmaḥ śaṅkhādicihnabhṛt
वाम भाग में रमा-शक्ति से युक्त, समस्त रक्षा करने वाले महान्, चतुर्भुज, कमल-नेत्र, श्याम, शंख आदि चिह्न धारण करने वाले —
श्लोक 23 (shiva.kailasa.15.23)
अस्यैव वासुदेवादिचतुष्कं व्यष्टितां गतम् । उपासनरतानां वै वैष्णवानां विमुक्तिदम्
asyaiva vāsudevādicatuṣkaṁ vyaṣṭitāṁ gatam | upāsanaratānāṁ vai vaiṣṇavānāṁ vimuktidam
— उन्हीं का वासुदेव आदि चतुष्क व्यष्टि-रूप को प्राप्त हुआ है; यह उपासना में रत वैष्णवों को मुक्ति देने वाला है।
श्लोक 24 (shiva.kailasa.15.24)
वासुदेवोऽनिरुद्धश्च ततः सङ्कर्षणः परः । प्रद्युम्नश्चेति विख्यातं स्थितिचक्रमनुत्तमम्
vāsudevo'niruddhaśca tataḥ saṅkarṣaṇaḥ paraḥ | pradyumnaśceti vikhyātaṁ sthiticakramanuttamam
वासुदेव, अनिरुद्ध, फिर उससे परे संकर्षण, तथा प्रद्युम्न — इस प्रकार यह अनुत्तम स्थिति-चक्र विख्यात है।
श्लोक 25 (shiva.kailasa.15.25)
स्थितिः सृष्टस्य जगतस्तत्कर्त्रा सह पालनम् । आरब्धकर्मभोगान्तं जीवानां फलभोगिनाम्
sthitiḥ sṛṣṭasya jagatastatkartrā saha pālanam | ārabdhakarmabhogāntaṁ jīvānāṁ phalabhoginām
स्थिति सृष्ट जगत् का उसके कर्ता द्वारा पालन है, आरब्ध कर्म के भोग की समाप्ति तक, फल भोगने वाले जीवों के लिए।
श्लोक 26 (shiva.kailasa.15.26)
विष्णोरेवेदमाख्यातं कृत्यं रक्षाविधायिनः । स्थितावपि तु सृष्ट्यादिकृत्यानां पञ्चकं विभोः
viṣṇorevedamākhyātaṁ kṛtyaṁ rakṣāvidhāyinaḥ | sthitāvapi tu sṛṣṭyādikṛtyānāṁ pañcakaṁ vibhoḥ
यह रक्षा करने वाले विष्णु का ही कृत्य कहा गया है; स्थिति में भी विभु के सृष्टि आदि पाँच कृत्य होते हैं।
श्लोक 27 (shiva.kailasa.15.27)
तत्र प्रद्युम्नमुख्यास्ते देवताः परिकीर्तिताः । निर्विकल्पा निरातङ्का मुक्तानन्दकराः सदा
tatra pradyumnamukhyāste devatāḥ parikīrtitāḥ | nirvikalpā nirātaṅkā muktānandakarāḥ sadā
वहाँ प्रद्युम्न प्रमुख देवताएँ कही गई हैं, जो निर्विकल्प, निर्भय, सदा मुक्ति-आनन्द देने वाली हैं।
श्लोक 28 (shiva.kailasa.15.28)
स्थितिचक्रमिदं ब्रह्मन् प्रतिष्ठारूपमुत्तमम् । जनार्दनाधिष्ठितं च परमं पदमुच्यते
sthiticakramidaṁ brahman pratiṣṭhārūpamuttamam | janārdanādhiṣṭhitaṁ ca paramaṁ padamucyate
हे ब्रह्मन्! यह स्थिति-चक्र प्रतिष्ठा-रूप उत्तम है; जनार्दन द्वारा अधिष्ठित यह परम पद कहलाता है।
श्लोक 29 (shiva.kailasa.15.29)
एवदेव पदं प्राप्यं विष्णुपादाब्जसेविनाम् । वैष्णवानां चक्रमिदं सालोक्यादिपदप्रदम्
evadeva padaṁ prāpyaṁ viṣṇupādābjasevinām | vaiṣṇavānāṁ cakramidaṁ sālokyādipadapradam
इसी पद को विष्णु के चरण-कमल के सेवकों को प्राप्त करना है; यह चक्र वैष्णवों को सालोक्य आदि पद देने वाला है।
श्लोक 30 (shiva.kailasa.15.30)
विष्णोरेव सहस्रांशात्सम्बभूव पितामहः । सद्योजातमुखात्मा यः पृथिवीतत्त्वनायकः
viṣṇoreva sahasrāṁśātsambabhūva pitāmahaḥ | sadyojātamukhātmā yaḥ pṛthivītattvanāyakaḥ
विष्णु के ही सहस्रांश से पितामह उत्पन्न हुए, जो सद्योजात-मुख-स्वरूप, पृथ्वी-तत्त्व के नायक हैं।
श्लोक 31 (shiva.kailasa.15.31)
वाग्देवीसहितो वामे सृष्टिकर्त्ता जगत्प्रभुः । चतुर्मुखो रक्तवर्णो रजोरूपस्वरूपवान्
vāgdevīsahito vāme sṛṣṭikarttā jagatprabhuḥ | caturmukho raktavarṇo rajorūpasvarūpavān
वाम भाग में वाग्देवी सहित, सृष्टि के कर्ता, जगत् के प्रभु, चतुर्मुख, रक्तवर्ण, रजोगुण-स्वरूप वाले —
श्लोक 32 (shiva.kailasa.15.32)
हिण्यगर्भाद्यस्यैव व्यष्टिरूपं चतुष्टयम् । हिरण्यगर्भोऽथ विराट् पुरुषः काल एव च
hiṇyagarbhādyasyaiva vyaṣṭirūpaṁ catuṣṭayam | hiraṇyagarbho'tha virāṭ puruṣaḥ kāla eva ca
— उन्हीं का हिरण्यगर्भ आदि व्यष्टि-रूप चतुष्टय है — हिरण्यगर्भ, फिर विराट्, पुरुष तथा काल।
श्लोक 33 (shiva.kailasa.15.33)
सृष्टिचक्रमिदं ब्रह्म पुत्रादिऋषिसेवितम् । सर्वकामार्थदं ब्रह्मन्परिवारसुखप्रदम्
sṛṣṭicakramidaṁ brahma putrādiṛṣisevitam | sarvakāmārthadaṁ brahmanparivārasukhapradam
यह सृष्टि-चक्र, हे ब्रह्मन्! पुत्र आदि ऋषियों द्वारा सेवित है, समस्त कामनाओं को पूर्ण करने वाला, परिवार को सुख देने वाला है।
श्लोक 34 (shiva.kailasa.15.34)
सृष्टिस्तु संहृतस्यास्य जीवस्य प्रकृतौ बहिः । आनीय कर्मभोगार्थं साधनाङ्गफलैस्सह
sṛṣṭistu saṁhṛtasyāsya jīvasya prakṛtau bahiḥ | ānīya karmabhogārthaṁ sādhanāṅgaphalaissaha
सृष्टि तो प्रकृति में लीन हुए इस जीव को बाहर लाकर, कर्म-भोग के लिए, साधनों, अंगों और फलों सहित —
श्लोक 35 (shiva.kailasa.15.35)
संयोजनमितीदं तु कृत्यं पैतामहं विदुः । जगत्सृष्टिक्रियाविज्ञा यावद् व्यूहं सुखावहम्
saṁyojanamitīdaṁ tu kṛtyaṁ paitāmahaṁ viduḥ | jagatsṛṣṭikriyāvijñā yāvad vyūhaṁ sukhāvaham
— इस कृत्य को "संयोजन" कहते हैं, जो पैतामह कहलाता है — जगत्-सृष्टि की क्रिया के ज्ञाता, व्यूह तक, सुखदायक।
श्लोक 36 (shiva.kailasa.15.36)
जगत्सृष्टावपि मुने कृत्यानां च पञ्चकं विभोः । अस्ति कालोदयस्तत्र देवताः परिकीर्तिताः
jagatsṛṣṭāvapi mune kṛtyānāṁ ca pañcakaṁ vibhoḥ | asti kālodayastatra devatāḥ parikīrtitāḥ
हे मुने! जगत्-सृष्टि में भी विभु के पाँच कृत्य होते हैं; वहाँ काल का उदय भी होता है, देवताएँ कही गई हैं —
श्लोक 37 (shiva.kailasa.15.37)
निवृत्तिरूपमाख्यातं सृष्टिचक्रमिदं बुधैः । पितामहाधिष्ठितं च पदमेतद्धि शोभनम्
nivṛttirūpamākhyātaṁ sṛṣṭicakramidaṁ budhaiḥ | pitāmahādhiṣṭhitaṁ ca padametaddhi śobhanam
— यह सृष्टि-चक्र बुद्धिमानों द्वारा निवृत्ति-रूप कहा गया है; पितामह द्वारा अधिष्ठित यह पद शोभन है।
श्लोक 38 (shiva.kailasa.15.38)
एतदेव प्रदं प्राप्यं ब्रह्मार्पितधियां नृणाम् । पैतामहानामेतद्धि सालोक्यादिविमुक्तिदम्
etadeva pradaṁ prāpyaṁ brahmārpitadhiyāṁ nṛṇām | paitāmahānāmetaddhi sālokyādivimuktidam
इसी पद को ब्रह्मा में अर्पित बुद्धि वाले मनुष्यों को प्राप्त करना है; पैतामहों के लिए यह सालोक्य आदि से मुक्ति देने वाला है।
श्लोक 39 (shiva.kailasa.15.39)
अस्मिन्नपि चतुष्के तु चक्राणां प्रणवो भवेत् । महेशादिक्रमादेव गौण्या वृत्त्या स वाचकः
asminnapi catuṣke tu cakrāṇāṁ praṇavo bhavet | maheśādikramādeva gauṇyā vṛttyā sa vācakaḥ
इन्हीं चारों चक्रों में भी प्रणव विद्यमान है; महेश आदि के क्रम से ही वह गौण वृत्ति से वाचक है।
श्लोक 40 (shiva.kailasa.15.40)
इदं खलु जगच्चक्रं श्रुतिविश्रुतवैभवम् । पञ्चारं चक्रमिति ह स्तौति श्रुतिरिदं मुने
idaṁ khalu jagaccakraṁ śrutiviśrutavaibhavam | pañcāraṁ cakramiti ha stauti śrutiridaṁ mune
यह जगत्-चक्र श्रुति में विश्रुत वैभव वाला है; इसे "पंचार चक्र" कहकर श्रुति ही इसकी स्तुति करती है, हे मुने!
श्लोक 41 (shiva.kailasa.15.41)
एकमेव जगच्चक्रं शम्भोः शक्तिविजृम्भितम् । सृष्ट्यादिपञ्चावयवं पञ्चारमिति कथ्यते
ekameva jagaccakraṁ śambhoḥ śaktivijṛmbhitam | sṛṣṭyādipañcāvayavaṁ pañcāramiti kathyate
यह एक ही जगत्-चक्र शम्भु की शक्ति से विस्तारित है; सृष्टि आदि पाँच अवयवों वाला होने से यह "पंचार" कहलाता है।
श्लोक 42 (shiva.kailasa.15.42)
अलातचक्रभ्रमिवदविच्छिन्नलयोदयम् । परितो वर्तते यस्मात्तस्माच्चक्रमितीरितम्
alātacakrabhramivadavicchinnalayodayam | parito vartate yasmāttasmāccakramitīritam
अलात-चक्र (अंगारे के घुमाने) के समान अविच्छिन्न लय-उदय वाला होकर सब ओर घूमता है, इसलिए इसे "चक्र" कहा गया है।
श्लोक 43 (shiva.kailasa.15.43)
सृष्ट्यादिपृथुसृष्टित्वात्पृथुत्वेनोपदृश्यते । हिरण्मयस्य देवस्य शम्भोरमिततेजसः
sṛṣṭyādipṛthusṛṣṭitvātpṛthutvenopadṛśyate | hiraṇmayasya devasya śambhoramitatejasaḥ
सृष्टि आदि की विशालता के कारण यह विशाल रूप में दिखाई देता है — यह स्वर्णमय, अमित तेजस्वी शम्भु देव का [चक्र] है।
श्लोक 44 (shiva.kailasa.15.44)
शक्तिकार्यमिदं चक्रं हिरण्यज्योतिराश्रितम् । सलिलेनावृतमिदं सलिलं वह्निनावृतम्
śaktikāryamidaṁ cakraṁ hiraṇyajyotirāśritam | salilenāvṛtamidaṁ salilaṁ vahnināvṛtam
यह चक्र शक्ति का कार्य है, हिरण्य-ज्योति पर आश्रित है; यह जल से आवृत है, वह जल अग्नि से आवृत है,
श्लोक 45 (shiva.kailasa.15.45)
आवृतो वायुना वह्निराकाशेनावृतं महत् । भूतादिना तथाकाशो भूतादिर्महतावृतः
āvṛto vāyunā vahnirākāśenāvṛtaṁ mahat | bhūtādinā tathākāśo bhūtādirmahatāvṛtaḥ
— अग्नि वायु से आवृत है, महत् आकाश से आवृत है; इसी प्रकार आकाश भूतादि से, भूतादि महत् से आवृत है,
श्लोक 46 (shiva.kailasa.15.46)
अव्यक्तेनावृतस्तद्वन्महानित्येवमास्तिकैः । ब्रह्माण्डमिति सम्प्रोक्तमाचार्यैर्मुनिसत्तम
avyaktenāvṛtastadvanmahānityevamāstikaiḥ | brahmāṇḍamiti samproktamācāryairmunisattama
— और महत् उसी प्रकार अव्यक्त से आवृत है — इस प्रकार, हे मुनिसत्तम! आस्तिक आचार्यों द्वारा इसे "ब्रह्माण्ड" कहा गया है।
श्लोक 47 (shiva.kailasa.15.47)
उक्तानि सप्तावरणान्यस्य विश्वस्य गुप्तये । चक्राद्दशगुणाधिक्यं सलिलस्य विधीयते
uktāni saptāvaraṇānyasya viśvasya guptaye | cakrāddaśaguṇādhikyaṁ salilasya vidhīyate
यह विश्व की रक्षा के लिए सात आवरण कहे गए हैं; चक्र से जल का दस गुना अधिक होना विहित है।
श्लोक 48 (shiva.kailasa.15.48)
उपर्युपरि चान्योऽन्यमेवं दशगुणाधिकम् । ब्रह्माण्डमिति विज्ञेयं तद् विजैर्मुनिनायक
uparyupari cānyo'nyamevaṁ daśaguṇādhikam | brahmāṇḍamiti vijñeyaṁ tad vijairmunināyaka
और इसी प्रकार ऊपर-ऊपर एक-दूसरे से दस गुना अधिक — इसे ही, हे मुनिनायक! विद्वानों द्वारा ब्रह्माण्ड जानना चाहिए।
श्लोक 49 (shiva.kailasa.15.49)
इममर्थमुरीकृत्य चक्रसामीप्यवर्त्तनात् । सलिलस्य च तन्मध्ये इति प्राह श्रुतिः स्वयम्
imamarthamurīkṛtya cakrasāmīpyavarttanāt | salilasya ca tanmadhye iti prāha śrutiḥ svayam
इस अर्थ को स्वीकार करके, चक्र की समीपता और उसके चारों ओर होने के कारण, जल के उस मध्य में — ऐसा श्रुति स्वयं कहती है।
श्लोक 50 (shiva.kailasa.15.50)
अनुग्रहतिरोभावसंहृतिस्थितिसृष्टिभिः । करोत्यविरतं लीलामेकः शक्तियुतः शिवः
anugrahatirobhāvasaṁhṛtisthitisṛṣṭibhiḥ | karotyavirataṁ līlāmekaḥ śaktiyutaḥ śivaḥ
अनुग्रह, तिरोभाव, संहार, स्थिति और सृष्टि द्वारा शक्ति-युक्त एक ही शिव अविरत लीला करते हैं।
श्लोक 51 (shiva.kailasa.15.51)
बहुनेह किमुक्तेन मुने सारं वदामि ते । शिव एवेदमखिलं शक्तिमानिति निश्चितम्
bahuneha kimuktena mune sāraṁ vadāmi te | śiva evedamakhilaṁ śaktimāniti niścitam
हे मुने! यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ? मैं तुम्हें सार कहता हूँ — यह निश्चित है कि यह सम्पूर्ण जगत् शक्तिमान् शिव ही हैं।