कैलास संहिता · अध्याय 19
योगपट्ट-विधि का वर्णन
श्लोक 1 (shiva.kailasa.19.1)
सुब्रह्मण्य उवाच । अथ महावाक्यानि । (१) प्रज्ञानं ब्रह्म । (२) अहं ब्रह्मास्मि । (३) तत्त्वमसि । (४) अयमात्मा ब्रह्म । (५) ईशावास्यमिदं सर्वम् । (६) प्राणोऽस्मि । (७) प्रज्ञानात्मा । (८) यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह । (९) अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि । (१०) एष न आत्मान्तर्याम्यमृतः । (११) स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः । (१२) अहमस्मि परं ब्रह्म परापरपरात्परम् । (१३) वेदशास्त्रगुरुत्वात्तु स्वयमानन्दलक्षणम् । (१४) सर्वभूतस्थितं ब्रह्म तदेवाहं न संशयः । (१५) तत्त्वस्य प्राणोऽहमस्मि पृथिव्याः प्राणोऽहमस्मि । (१६) अपां च प्राणोऽहमस्मि तेजसश्च प्राणोऽहमस्मि । (१७) वायोश्च प्राणोऽहमस्मि आकाशस्य प्राणोऽहमस्मि । (१८) त्रिगुणस्य प्राणोऽहमस्मि । (१९) सर्वोऽहं सर्वात्मकोऽहं संसारी यद्भूतं यच्च भव्यं यद्वर्तमानं सर्वात्मकत्वादद्वितीयोऽहम् । (२०) सर्वं खल्विदं ब्रह्म । (२१) सर्वोऽहं विमुक्तोऽहम् । (२२) योऽसौ सोऽहं हंसः सोऽहमस्मि । इत्येवं सर्वत्र सदा ध्यायेत् । अथ महावाक्यानामर्थमाह । प्रज्ञानं ब्रह्मवाक्यार्थः पूर्वमेव प्रबोधितः । अहम्पदस्यार्थभूतः शक्त्यात्मा परमेश्वरः
subrahmaṇya uvāca | atha mahāvākyāni | (1) prajñānaṁ brahma | (2) ahaṁ brahmāsmi | (3) tattvamasi | (4) ayamātmā brahma | (5) īśāvāsyamidaṁ sarvam | (6) prāṇo'smi | (7) prajñānātmā | (8) yadeveha tadamutra yadamutra tadanviha | (9) anyadeva tadviditādatho aviditādadhi | (10) eṣa na ātmāntaryāmyamṛtaḥ | (11) sa yaścāyaṁ puruṣe yaścāsāvāditye sa ekaḥ | (12) ahamasmi paraṁ brahma parāparaparātparam | (13) vedaśāstragurutvāttu svayamānandalakṣaṇam | (14) sarvabhūtasthitaṁ brahma tadevāhaṁ na saṁśayaḥ | (15) tattvasya prāṇo'hamasmi pṛthivyāḥ prāṇo'hamasmi | (16) apāṁ ca prāṇo'hamasmi tejasaśca prāṇo'hamasmi | (17) vāyośca prāṇo'hamasmi ākāśasya prāṇo'hamasmi | (18) triguṇasya prāṇo'hamasmi | (19) sarvo'haṁ sarvātmako'haṁ saṁsārī yadbhūtaṁ yacca bhavyaṁ yadvartamānaṁ sarvātmakatvādadvitīyo'ham | (20) sarvaṁ khalvidaṁ brahma | (21) sarvo'haṁ vimukto'ham | (22) yo'sau so'haṁ haṁsaḥ so'hamasmi | ityevaṁ sarvatra sadā dhyāyet | atha mahāvākyānāmarthamāha | prajñānaṁ brahmavākyārthaḥ pūrvameva prabodhitaḥ | ahampadasyārthabhūtaḥ śaktyātmā parameśvaraḥ
सुब्रह्मण्य ने कहा — अब महावाक्य सुनो: (१) प्रज्ञानं ब्रह्म — चेतना ही ब्रह्म है। (२) अहं ब्रह्मास्मि — मैं ब्रह्म हूँ। (३) तत्त्वमसि — तू वही है। (४) अयमात्मा ब्रह्म — यह आत्मा ब्रह्म है। (५) ईशावास्यमिदं सर्वम् — यह सब ईश्वर से व्याप्त है। (६) प्राणोऽस्मि — मैं प्राण हूँ। (७) प्रज्ञानात्मा — मैं चेतना-स्वरूप आत्मा हूँ। (८) यदेवेह तदमुत्र यदमुत्र तदन्विह — जो यहाँ है वही वहाँ है, जो वहाँ है वही यहाँ भी है। (९) अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादधि — वह ज्ञात से भी भिन्न है और अज्ञात से भी परे है। (१०) एष न आत्मान्तर्याम्यमृतः — यह अमृत, अन्तर्यामी आत्मा है। (११) स यश्चायं पुरुषे यश्चासावादित्ये स एकः — जो यह पुरुष में है और जो वह सूर्य में है, वह एक ही है। (१२) अहमस्मि परं ब्रह्म परापरपरात्परम् — मैं परब्रह्म हूँ, पर और अपर दोनों से परे। (१३) वेदशास्त्रगुरुत्वात्तु स्वयमानन्दलक्षणम् — वेद, शास्त्र और गुरु की प्रमाणता से वह स्वयं आनन्द-स्वरूप है। (१४) सर्वभूतस्थितं ब्रह्म तदेवाहं न संशयः — सब भूतों में स्थित ब्रह्म वही मैं हूँ, इसमें संशय नहीं। (१५) तत्त्वस्य प्राणोऽहमस्मि पृथिव्याः प्राणोऽहमस्मि — मैं तत्त्व का प्राण हूँ, मैं पृथ्वी का प्राण हूँ। (१६) अपां च प्राणोऽहमस्मि तेजसश्च प्राणोऽहमस्मि — मैं जल का प्राण हूँ, मैं अग्नि का प्राण हूँ। (१७) वायोश्च प्राणोऽहमस्मि आकाशस्य प्राणोऽहमस्मि — मैं वायु का प्राण हूँ, मैं आकाश का प्राण हूँ। (१८) त्रिगुणस्य प्राणोऽहमस्मि — मैं तीनों गुणों का प्राण हूँ। (१९) सर्वोऽहं सर्वात्मकोऽहं संसारी यद्भूतं यच्च भव्यं यद्वर्तमानं सर्वात्मकत्वादद्वितीयोऽहम् — मैं सब हूँ, सबका आत्मा हूँ, संसारी हूँ; जो हुआ, जो होगा, जो है — सबका आत्मा होने से मैं अद्वितीय हूँ। (२०) सर्वं खल्विदं ब्रह्म — यह सब निश्चय ही ब्रह्म है। (२१) सर्वोऽहं विमुक्तोऽहम् — मैं सब हूँ, मैं मुक्त हूँ। (२२) योऽसौ सोऽहं हंसः सोऽहमस्मि — जो वह है, वह मैं हूँ; मैं हंस हूँ, वही मैं हूँ। इस प्रकार सर्वत्र सदा ध्यान करना चाहिए। अब महावाक्यों का अर्थ कहा जाता है। 'प्रज्ञानं ब्रह्म' इस वाक्य का अर्थ पहले ही बताया जा चुका है — 'अहं' पद का अर्थभूत, शक्ति-स्वरूप परमेश्वर है।
श्लोक 2 (shiva.kailasa.19.2)
अकारः सर्ववर्णाग्र्यः प्रकाशः परमः शिवः । हकारो व्योमरूपः स्याच्छक्त्यात्मा सम्प्रकीर्तितः
akāraḥ sarvavarṇāgryaḥ prakāśaḥ paramaḥ śivaḥ | hakāro vyomarūpaḥ syācchaktyātmā samprakīrtitaḥ
अकार सब वर्णों में अग्रगण्य, परम प्रकाश, शिव है; हकार आकाश-स्वरूप, शक्ति-स्वरूप कहा गया है।
श्लोक 3 (shiva.kailasa.19.3)
शिवशक्त्योस्तु संयोगादानन्दः सततोदितः । ब्रह्मेति शिवशक्त्योस्तु सर्वात्मत्वमिति स्फुटम्
śivaśaktyostu saṁyogādānandaḥ satatoditaḥ | brahmeti śivaśaktyostu sarvātmatvamiti sphuṭam
शिव और शक्ति के संयोग से निरन्तर आनन्द उदित होता है; इस प्रकार 'ब्रह्म' का अर्थ शिव-शक्ति की सर्वात्मता ही स्पष्ट होता है।
श्लोक 4 (shiva.kailasa.19.4)
पूर्वमेवोपदिष्टं तत्सोऽहमस्मीति भावयेत् । तत्त्वमित्यत्र तदिति तच्छब्दार्थः प्रबोधितः
pūrvamevopadiṣṭaṁ tatso'hamasmīti bhāvayet | tattvamityatra taditi tacchabdārthaḥ prabodhitaḥ
पहले ही उपदेश दिया गया कि 'वह मैं हूँ' — ऐसी भावना करनी चाहिए; 'तत्त्वमसि' में 'तत्' शब्द का यही अर्थ बताया गया है।
श्लोक 5 (shiva.kailasa.19.5)
अन्यथा सोऽहमित्यत्र विपरीतार्थभावना । अहंशब्दस्तु पुरुषस्तदिति स्यान्नपुंसकम् । एवमन्योऽन्यवैरुध्यादन्वयो न भवेत्तयोः
anyathā so'hamityatra viparītārthabhāvanā | ahaṁśabdastu puruṣastaditi syānnapuṁsakam | evamanyo'nyavairudhyādanvayo na bhavettayoḥ
अन्यथा 'सोऽहम्' में अर्थ विपरीत हो जाएगा — 'अहं' शब्द पुरुषवाचक है और 'तत्' नपुंसकलिंग है; इस प्रकार परस्पर विरोध से दोनों का अन्वय नहीं हो सकेगा।
श्लोक 6 (shiva.kailasa.19.6)
स्त्रीपुंरूपस्य जगतः कारणं चान्यथा भवेत् । स तत्त्वमसि इत्येवमुपदेशार्थभावना
strīpuṁrūpasya jagataḥ kāraṇaṁ cānyathā bhavet | sa tattvamasi ityevamupadeśārthabhāvanā
स्त्री-पुरुष रूप जगत् का कारण अन्यथा नहीं हो सकता; अतः 'स तत्त्वमसि' — इस प्रकार यह उपदेश का अर्थ समझना चाहिए।
श्लोक 7 (shiva.kailasa.19.7)
अयमात्मेति वाक्ये च पुंरूपं पदयुग्मकम् । ईशेन रक्षणीयत्वादीशावास्यमिदं जगत्
ayamātmeti vākye ca puṁrūpaṁ padayugmakam | īśena rakṣaṇīyatvādīśāvāsyamidaṁ jagat
'अयमात्मा' वाक्य में दोनों पद पुल्लिंग हैं; ईश्वर द्वारा रक्षणीय होने से 'यह सब जगत् ईश्वर से व्याप्त है' — ऐसा कहा जाता है।
श्लोक 8 (shiva.kailasa.19.8)
प्रज्ञानात्मा यदेवेह तदमुत्रेति चिन्तयेत् । यः स एवेति विद्वद्भिः सिद्धान्तिभिरिहोच्यते
prajñānātmā yadeveha tadamutreti cintayet | yaḥ sa eveti vidvadbhiḥ siddhāntibhirihocyate
'प्रज्ञानात्मा — जो यहाँ है वही वहाँ है' — ऐसा चिन्तन करना चाहिए; 'जो वह है वही यह है' — इस प्रकार विद्वान सिद्धान्तियों द्वारा यहाँ कहा जाता है।
श्लोक 9 (shiva.kailasa.19.9)
उपरिस्थितवाक्ये च योऽमुत्र स इह स्थितः । इति पूर्ववदेवार्थः पुरुषो विदुषां मतः
uparisthitavākye ca yo'mutra sa iha sthitaḥ | iti pūrvavadevārthaḥ puruṣo viduṣāṁ mataḥ
ऊपर कहे गए वाक्य में 'जो वहाँ है वह यहाँ भी स्थित है' — यह अर्थ पहले की भाँति ही है; यह पुरुष का ही अर्थ विद्वानों का मत है।
श्लोक 10 (shiva.kailasa.19.10)
अन्यदेव तद्विदितादथो अविदितादपि । अस्मिन्वाक्ये फलस्यापि वैपरीत्यविभावना
anyadeva tadviditādatho aviditādapi | asminvākye phalasyāpi vaiparītyavibhāvanā
'वह ज्ञात से भी भिन्न है, और अज्ञात से भी परे है' — इस वाक्य में फल की भी विपरीतता की भावना है।
श्लोक 11 (shiva.kailasa.19.11)
यथा स्यात्तद्वदेवात्र वक्ष्यामि श्रूयतां मुने । अयथाविदिताशब्दो पूर्ववद्विदितादिति
yathā syāttadvadevātra vakṣyāmi śrūyatāṁ mune | ayathāviditāśabdo pūrvavadviditāditi
यह कैसे है, वही मैं यहाँ बताऊँगा — हे मुने, सुनो; 'अज्ञात' शब्द भी पूर्ववत् 'ज्ञात' के समान ही प्रयुक्त है।
श्लोक 12 (shiva.kailasa.19.12)
प्रवृत्तः स्यात्तद्विदितात्तथैवाविदितात्परम् । अन्यदेव हि संसिद्ध्यै न भवेदिति निश्चितम्
pravṛttaḥ syāttadviditāttathaivāviditātparam | anyadeva hi saṁsiddhyai na bhavediti niścitam
उसकी प्रवृत्ति ज्ञात से भी होती है, और उसी प्रकार अज्ञात से भी परे होती है; क्योंकि वह अन्य ही है, वह सिद्धि के साधारण उपायों से प्राप्य नहीं — यह निश्चित है।
श्लोक 13 (shiva.kailasa.19.13)
एष त आत्मान्तर्यामी योऽमृतश्च शिवः स्वयम् । यश्चायं पुरुषे शम्भुर्यश्चादित्ये व्यवस्थितः
eṣa ta ātmāntaryāmī yo'mṛtaśca śivaḥ svayam | yaścāyaṁ puruṣe śambhuryaścāditye vyavasthitaḥ
यह तेरा अन्तर्यामी आत्मा है, जो अमृत और स्वयं शिव है — जो यह पुरुष में शम्भु है, और जो सूर्य में स्थित है।
श्लोक 14 (shiva.kailasa.19.14)
स चाऽसौ सेति पार्थक्यं नैकं सर्वं स ईरितः । सोपाधिद्वयमस्यार्थ उपचारात्तथोच्यते
sa cā'sau seti pārthakyaṁ naikaṁ sarvaṁ sa īritaḥ | sopādhidvayamasyārtha upacārāttathocyate
'वह', 'वह' और 'यह' — इनमें कोई पार्थक्य नहीं, सब वही एक कहा गया है; उसका अर्थ दो उपाधियों के साथ केवल उपचार से कहा जाता है।
श्लोक 15 (shiva.kailasa.19.15)
तं शम्भुनाथं श्रुतयो वदन्ति हि हिरण्मयम् । हिरण्यबाहव इति सर्वाङ्गस्योपलक्षलम्
taṁ śambhunāthaṁ śrutayo vadanti hi hiraṇmayam | hiraṇyabāhava iti sarvāṅgasyopalakṣalam
श्रुतियाँ उस शम्भुनाथ को हिरण्मय (सुवर्णमय) कहती हैं; 'हिरण्यबाहु' यह उनके सम्पूर्ण अंग का उपलक्षण है।
श्लोक 16 (shiva.kailasa.19.16)
अन्यथा तत्पतित्वं तु न भवेदिति यत्नतः । य एषोऽन्तरिति शम्भुश्छान्दोग्ये श्रूयते शिवः
anyathā tatpatitvaṁ tu na bhavediti yatnataḥ | ya eṣo'ntariti śambhuśchāndogye śrūyate śivaḥ
अन्यथा उनका सबका स्वामी होना सिद्ध नहीं होगा; अतः यत्नपूर्वक — 'जो यह भीतर है', वही शम्भु शिव, छान्दोग्य में सुना जाता है।
श्लोक 17 (shiva.kailasa.19.17)
हिरण्यश्मश्रुवांस्तद्वद्धिरण्यमयकेशवान् । नखमारभ्य केशान्तं सर्वत्रापि हिरण्मयः
hiraṇyaśmaśruvāṁstadvaddhiraṇyamayakeśavān | nakhamārabhya keśāntaṁ sarvatrāpi hiraṇmayaḥ
उसी प्रकार वे हिरण्य-श्मश्रु (सुवर्ण दाढ़ी) वाले और हिरण्यमय केश वाले हैं; नखों से लेकर केशों के अन्त तक सर्वत्र हिरण्मय हैं।
श्लोक 18 (shiva.kailasa.19.18)
अहमस्मि परं ब्रह्म परापरपरात्परम् । इति वाक्यस्य तात्पर्यं वदामि श्रूयतामिदम्
ahamasmi paraṁ brahma parāparaparātparam | iti vākyasya tātparyaṁ vadāmi śrūyatāmidam
'मैं परब्रह्म हूँ, पर और अपर दोनों से परे' — इस वाक्य का तात्पर्य अब मैं कहता हूँ, सुनो।
श्लोक 19 (shiva.kailasa.19.19)
अहम्पदस्यार्थभूतः शक्त्यात्मा शिव ईरितः । स एवास्मीति वाक्यार्थ योजना भवति ध्रुवम्
ahampadasyārthabhūtaḥ śaktyātmā śiva īritaḥ | sa evāsmīti vākyārtha yojanā bhavati dhruvam
'अहं' पद का अर्थभूत, शक्ति-स्वरूप शिव कहा गया है; 'वही मैं हूँ' — इस प्रकार वाक्य का अर्थ-योजन निश्चय ही होता है।
श्लोक 20 (shiva.kailasa.19.20)
सर्वोत्कृष्टश्च सर्वात्मा परब्रह्म स ईरितः । परश्चाथापरश्चेति परात्परमिति त्रिधा
sarvotkṛṣṭaśca sarvātmā parabrahma sa īritaḥ | paraścāthāparaśceti parātparamiti tridhā
सर्वश्रेष्ठ और सर्वात्मा वह परब्रह्म कहा गया है; पर, अपर, और परात्पर — इस प्रकार वह त्रिविध है।
श्लोक 21 (shiva.kailasa.19.21)
रुद्रो ब्रह्मा च विष्णुश्च प्रोक्ताः श्रुत्यैव नान्यथा । तेभ्यश्च परमो देवः परशब्देन बोधितः
rudro brahmā ca viṣṇuśca proktāḥ śrutyaiva nānyathā | tebhyaśca paramo devaḥ paraśabdena bodhitaḥ
रुद्र, ब्रह्मा और विष्णु — श्रुति द्वारा ही ऐसा कहे गए हैं, अन्यथा नहीं; और उनसे भी परम देव को 'पर' शब्द से जाना जाता है।
श्लोक 22 (shiva.kailasa.19.22)
वेदशास्त्रगुरूणां च वाक्याभ्यासवशाच्छिशोः । पूर्णानन्दमयः शम्भुः प्रादुर्भूतो भवेद्धृदि
vedaśāstragurūṇāṁ ca vākyābhyāsavaśācchiśoḥ | pūrṇānandamayaḥ śambhuḥ prādurbhūto bhaveddhṛdi
वेद, शास्त्र और गुरुओं के वाक्यों के अभ्यास के वश से, शिष्य के हृदय में पूर्णानन्दमय शम्भु प्रकट हो जाते हैं।
श्लोक 23 (shiva.kailasa.19.23)
सर्वभूतस्थितः शम्भुः स एवाहं न संशयः । तत्त्वजातस्य सर्वस्य प्राणोऽस्म्यहमहं शिवः
sarvabhūtasthitaḥ śambhuḥ sa evāhaṁ na saṁśayaḥ | tattvajātasya sarvasya prāṇo'smyahamahaṁ śivaḥ
सब भूतों में स्थित शम्भु वही मैं हूँ, इसमें संशय नहीं; सम्पूर्ण तत्त्व-समूह का प्राण मैं हूँ, मैं ही शिव हूँ।
श्लोक 24 (shiva.kailasa.19.24)
इत्युक्त्वा पुनरप्याह शिवस्तत्त्वत्रयस्य च । प्राणोऽस्मीत्यत्र पृथ्व्यादिगुणान्तग्रहणान्मुने
ityuktvā punarapyāha śivastattvatrayasya ca | prāṇo'smītyatra pṛthvyādiguṇāntagrahaṇānmune
ऐसा कहकर शिव पुनः कहते हैं — तीनों तत्त्वों का प्राण भी मैं हूँ; हे मुने, यहाँ पृथ्वी आदि से लेकर गुणों तक के ग्रहण से —
श्लोक 25 (shiva.kailasa.19.25)
आत्मतत्त्वानि सर्वाणि गृहीतानीति भावय । पुनश्च सर्वग्रहणं विद्यातत्त्वे शिवात्मनोः
ātmatattvāni sarvāṇi gṛhītānīti bhāvaya | punaśca sarvagrahaṇaṁ vidyātattve śivātmanoḥ
— सभी आत्म-तत्त्व गृहीत हो गए हैं, ऐसा समझो; और पुनः विद्या-तत्त्व तथा शिव-आत्मा में भी 'सर्व' का ग्रहण है।
श्लोक 26 (shiva.kailasa.19.26)
तत्त्वयोश्चास्म्यहं प्राणाः सर्वः सर्वात्मको ह्यहम् । जीवस्य चान्तर्यामित्वाज्जीवोऽहं तस्य सर्वदा
tattvayoścāsmyahaṁ prāṇāḥ sarvaḥ sarvātmako hyaham | jīvasya cāntaryāmitvājjīvo'haṁ tasya sarvadā
उन दोनों तत्त्वों का प्राण भी मैं ही हूँ, मैं सब हूँ, सबका आत्मा हूँ; और जीव का अन्तर्यामी होने से मैं सदा उसका जीव भी हूँ।
श्लोक 27 (shiva.kailasa.19.27)
यद्भूतं यच्च भव्यं यद्भविष्यत्सर्वमेव च । मन्मयत्वादहं सर्वः सर्वो वै रुद्र इत्यपि
yadbhūtaṁ yacca bhavyaṁ yadbhaviṣyatsarvameva ca | manmayatvādahaṁ sarvaḥ sarvo vai rudra ityapi
जो हुआ, जो होगा, और जो वर्तमान है — यह सब मेरे ही रूप होने से मैं सब हूँ; 'सब कुछ रुद्र ही है' — यह भी कहा गया है।
श्लोक 28 (shiva.kailasa.19.28)
श्रुतिराह मुने सा हि साक्षाच्छिवमुखोद्गता । सर्वात्मा परमैरेभिर्गुणैर्नित्यसमन्वयात्
śrutirāha mune sā hi sākṣācchivamukhodgatā | sarvātmā paramairebhirguṇairnityasamanvayāt
हे मुने, श्रुति ऐसा कहती है, जो साक्षात् शिव के मुख से निकली है — कि वह सर्वात्मा इन परम गुणों से नित्य युक्त है।
श्लोक 29 (shiva.kailasa.19.29)
स्वस्मात्परात्मविरहादद्वितीयोऽहमेव हि । सर्वं खल्विदं ब्रह्मेति वाक्यार्थः पूर्वमीरितः
svasmātparātmavirahādadvitīyo'hameva hi | sarvaṁ khalvidaṁ brahmeti vākyārthaḥ pūrvamīritaḥ
अपने से परे किसी अन्य आत्मा के न होने से मैं ही अद्वितीय हूँ; 'यह सब निश्चय ही ब्रह्म है' — इस वाक्य का अर्थ पहले ही कहा जा चुका है।
श्लोक 30 (shiva.kailasa.19.30)
पूर्णोऽहं भावरूपत्वान्नित्यमुक्तोऽहमेव हि । पशवो मत्प्रसादेन मुक्ता मद्भावमाश्रिताः
pūrṇo'haṁ bhāvarūpatvānnityamukto'hameva hi | paśavo matprasādena muktā madbhāvamāśritāḥ
भाव-स्वरूप होने से मैं पूर्ण हूँ, मैं निश्चय ही नित्य मुक्त हूँ; पशु (बद्ध जीव) मेरी कृपा से मुक्त होकर मेरे ही भाव का आश्रय लेते हैं।
श्लोक 31 (shiva.kailasa.19.31)
योऽसौ सर्वात्मकः शम्भुः सोऽहं हंस शिवोऽस्म्यहम् । इति वै सर्ववाक्यार्थो वामदेव शिवोदितः
yo'sau sarvātmakaḥ śambhuḥ so'haṁ haṁsa śivo'smyaham | iti vai sarvavākyārtho vāmadeva śivoditaḥ
जो वह सर्वात्मक शम्भु है, वही मैं हूँ, मैं हंस हूँ, मैं शिव हूँ — हे वामदेव, यही समस्त वाक्यों का अर्थ है, जो शिव द्वारा कहा गया है।
श्लोक 32 (shiva.kailasa.19.32)
इतीशश्रुतिवाक्याभ्वामुपदिष्टार्थमादरात् । साक्षाच्छिवैक्यदं पुंसां शिशोर्गुरुरुपादिशेत्
itīśaśrutivākyābhvāmupadiṣṭārthamādarāt | sākṣācchivaikyadaṁ puṁsāṁ śiśorgururupādiśet
इस प्रकार ईश्वर की श्रुति-वाक्यों द्वारा उपदिष्ट अर्थ को आदरपूर्वक — साक्षात् शिव से ऐक्य देने वाला यह उपदेश — गुरु शिष्य को दे।
श्लोक 33 (shiva.kailasa.19.33)
आदाय शङ्खं साधारमस्त्रमन्त्रेण भस्मना । शोध्य तत्पुरतः स्थाप्य चतुरस्रे समर्चिते
ādāya śaṅkhaṁ sādhāramastramantreṇa bhasmanā | śodhya tatpurataḥ sthāpya caturasre samarcite
आधार सहित शंख लेकर, अस्त्र-मंत्र और भस्म से शुद्ध कर, सुपूजित चतुष्कोण में उसके सामने स्थापित करें।
श्लोक 34 (shiva.kailasa.19.34)
ओमित्यभ्यर्च्य गन्धाद्यैरस्त्रं वस्त्रोपशोभितम् । वासितं जलमापूर्य सम्पूज्योमिति मन्त्रतः
omityabhyarcya gandhādyairastraṁ vastropaśobhitam | vāsitaṁ jalamāpūrya sampūjyomiti mantrataḥ
'ॐ' कहकर गंध आदि से पूजा कर, वस्त्र से सुशोभित उस [शंख] को सुगन्धित जल से भरकर, 'ॐ' मंत्र से पुनः पूजा करें।
श्लोक 35 (shiva.kailasa.19.35)
सप्तधैवाभिमन्त्र्याथ प्रणवेन पुनश्च तम् । यस्त्वन्तरं किञ्चिदपि कुरुते सोऽतिभीतिभाक्
saptadhaivābhimantryātha praṇavena punaśca tam | yastvantaraṁ kiñcidapi kurute so'tibhītibhāk
फिर प्रणव से उसे सात बार अभिमंत्रित करें — 'जो कोई भी थोड़ा-सा भी भेद करता है, वह अत्यन्त भय का भागी होता है' —
श्लोक 36 (shiva.kailasa.19.36)
इत्याह श्रुतिसत्तत्त्वं दृढात्मा गतभीर्भव । इत्याभाष्य स्वयं शिष्यं देवं ध्यायन् समर्चयेत्
ityāha śrutisattattvaṁ dṛḍhātmā gatabhīrbhava | ityābhāṣya svayaṁ śiṣyaṁ devaṁ dhyāyan samarcayet
— ऐसा श्रुति का सत्य तत्त्व कहता है — 'दृढ़ आत्मा वाले बनो, निर्भय बनो' — ऐसा शिष्य से कहकर, स्वयं देवता का ध्यान करते हुए पूजा करें।
श्लोक 37 (shiva.kailasa.19.37)
शिष्यासनं सम्प्रपूज्य षडुत्थापनमार्गतः । शिवासनं च सङ्कल्प्य शिवमूर्तिं प्रकल्पयेत्
śiṣyāsanaṁ samprapūjya ṣaḍutthāpanamārgataḥ | śivāsanaṁ ca saṅkalpya śivamūrtiṁ prakalpayet
षडुत्थापन-विधि से शिष्य के आसन की भलीभाँति पूजा कर, शिवासन का संकल्प करके शिव की मूर्ति की कल्पना करें।
श्लोक 38 (shiva.kailasa.19.38)
पञ्च ब्रह्माणि विन्यस्य शिरः पादावसानकम् । मुण्डवक्त्रकलाभेदैः प्रणवस्य कला अपि
pañca brahmāṇi vinyasya śiraḥ pādāvasānakam | muṇḍavaktrakalābhedaiḥ praṇavasya kalā api
सिर से पैर तक पंच ब्रह्म-मंत्रों को स्थापित कर, तथा मुण्ड-वक्त्र की कलाओं के भेद से प्रणव की कलाओं को भी —
श्लोक 39 (shiva.kailasa.19.39)
अष्टत्रिंशन्मन्त्ररूपाः शिष्यदेहेऽथ मस्तके । समावाह्य शिवं मुद्राः स्थापनीयाः प्रदर्शयेत्
aṣṭatriṁśanmantrarūpāḥ śiṣyadehe'tha mastake | samāvāhya śivaṁ mudrāḥ sthāpanīyāḥ pradarśayet
— अड़तीस मंत्र-रूपों को शिष्य के शरीर और सिर पर आवाहन कर, शिव को स्थापित करने योग्य मुद्राएँ दिखाएँ।
श्लोक 40 (shiva.kailasa.19.40)
ततश्चाङ्गानि विन्यस्य सर्वज्ञानीत्यनुक्रमात् । कल्पयेदुपचारांश्च षोडशासनपूर्वकाम्
tataścāṅgāni vinyasya sarvajñānītyanukramāt | kalpayedupacārāṁśca ṣoḍaśāsanapūrvakām
फिर 'सर्वज्ञ' आदि क्रम से अंगों को स्थापित कर, सोलह आसन आदि उपचारों की कल्पना करें।
श्लोक 41 (shiva.kailasa.19.41)
पायसान्नं च नैवेद्यं समर्प्योमग्निजायया । गण्डूषाचमनार्घ्यादि धूपदीपादिकं क्रमात्
pāyasānnaṁ ca naivedyaṁ samarpyomagnijāyayā | gaṇḍūṣācamanārghyādi dhūpadīpādikaṁ kramāt
खीर का नैवेद्य अग्नि-मंत्र से अर्पित कर, क्रमशः गण्डूष, आचमन, अर्घ्य आदि तथा धूप-दीप आदि अर्पित करें।
श्लोक 42 (shiva.kailasa.19.42)
नामाष्टकेन सम्पूज्य ब्राह्मणैर्वेदपारगैः । जपेद् ब्रह्मविदाप्नोति भृगुर्वै वारुणिस्ततः
nāmāṣṭakena sampūjya brāhmaṇairvedapāragaiḥ | japed brahmavidāpnoti bhṛgurvai vāruṇistataḥ
अष्ट नामों से पूजा कर, वेदपारंगत ब्राह्मणों के साथ जप करें — 'ब्रह्मविद् परम को प्राप्त करता है' [इस वाक्य से], फिर 'भृगुर्वै वारुणिः' [भृगुवल्ली] से —
श्लोक 43 (shiva.kailasa.19.43)
यो देवानामुपक्रम्य यः परः स महेश्वरः । इत्यन्तं तस्य पुरतः कह्लारादिविनिर्मिताम्
yo devānāmupakramya yaḥ paraḥ sa maheśvaraḥ | ityantaṁ tasya purataḥ kahlārādivinirmitām
— 'जो देवों में...' से आरम्भ कर 'जो परम है, वह महेश्वर है' तक — उसके सामने कह्लार आदि से निर्मित [माला] —
श्लोक 44 (shiva.kailasa.19.44)
आदाय मालामुत्थाय श्रीविरूपाक्षनिर्मिते । शास्त्रे पञ्चास्यके रूपे सिद्धिस्कन्धं जपेच्छनैः
ādāya mālāmutthāya śrīvirūpākṣanirmite | śāstre pañcāsyake rūpe siddhiskandhaṁ japecchanaiḥ
— माला लेकर, उठकर, श्रीविरूपाक्ष द्वारा रचित शास्त्र में पंचमुख रूप के समक्ष, धीरे-धीरे सिद्धि-स्कन्ध का जप करें।
श्लोक 45 (shiva.kailasa.19.45)
ख्यातिः पूर्णोऽहमित्यन्तं सानुकूलेन चेतसा । देशिकस्तस्य शिष्यस्य कण्ठदेशे समर्पयेत्
khyātiḥ pūrṇo'hamityantaṁ sānukūlena cetasā | deśikastasya śiṣyasya kaṇṭhadeśe samarpayet
'ख्याति पूर्णोऽहम्' तक — अनुकूल चित्त से आचार्य उस शिष्य के गले में [माला] अर्पित करें।
श्लोक 46 (shiva.kailasa.19.46)
तिलकं चन्दनेनाथ सर्वाङ्गालेपनं पुनः । स्वसम्प्रदायानुगुणं कारयेच्च यथाविधि
tilakaṁ candanenātha sarvāṅgālepanaṁ punaḥ | svasampradāyānuguṇaṁ kārayecca yathāvidhi
फिर चन्दन से तिलक लगाकर, पुनः सम्पूर्ण अंगों का लेपन अपनी परम्परा के अनुसार विधिवत् कराएँ।
श्लोक 47 (shiva.kailasa.19.47)
ततश्च देशिकः प्रीत्या नाम श्रीपादसंज्ञितम् । छत्रं च पादुकां दद्याद् दूर्वाकल्पविकल्पनम्
tataśca deśikaḥ prītyā nāma śrīpādasaṁjñitam | chatraṁ ca pādukāṁ dadyād dūrvākalpavikalpanam
फिर आचार्य प्रेमपूर्वक उसे 'श्रीपाद' नामक संज्ञा से नामकरण करें, तथा छत्र, पादुका और दूर्वा-कल्प का विकल्प भी दें।
श्लोक 48 (shiva.kailasa.19.48)
व्याख्यातृत्वं च कर्मादि गुर्वासनपरिग्रहम् । अनुगृह्य गुरुस्तस्मै शिष्याय शिवरूपिणे
vyākhyātṛtvaṁ ca karmādi gurvāsanaparigraham | anugṛhya gurustasmai śiṣyāya śivarūpiṇe
व्याख्याता होने का अधिकार, कर्म आदि, और गुर्वासन ग्रहण करने का अधिकार — शिव-स्वरूप उस शिष्य को अनुगृहीत करके गुरु —
श्लोक 49 (shiva.kailasa.19.49)
शिवोऽहमस्मीति सदा समाधिस्थो भवेति तम् । सम्प्रोच्याथ स्वयं तस्मै नमस्कारं समाचरेत्
śivo'hamasmīti sadā samādhistho bhaveti tam | samprocyātha svayaṁ tasmai namaskāraṁ samācaret
— 'सदा यह भावना रखते हुए समाधिस्थ रहो कि मैं शिव हूँ' — ऐसा कहकर, स्वयं उसे नमस्कार करें।
श्लोक 50 (shiva.kailasa.19.50)
सम्प्रदायानुगुण्येन नमस्कुर्युस्तथापरे । शिष्यस्तदा समुत्थाय नमस्कुर्याद् गुरुं तथा । गुरोरपि गुरुं तस्य शिष्यांश्च स्वगुरोरपि
sampradāyānuguṇyena namaskuryustathāpare | śiṣyastadā samutthāya namaskuryād guruṁ tathā | gurorapi guruṁ tasya śiṣyāṁśca svagurorapi
परम्परा के अनुसार अन्य लोग भी नमस्कार करें; तब शिष्य उठकर गुरु को, गुरु के गुरु को, तथा अपने गुरु के अन्य शिष्यों को भी नमस्कार करे।
श्लोक 51 (shiva.kailasa.19.51)
एवं कृतनमस्कारं शिष्यं दद्याद् गुरुः स्वयम् । सुशीलं यतवाचं तं विनयावनतं स्थितम्
evaṁ kṛtanamaskāraṁ śiṣyaṁ dadyād guruḥ svayam | suśīlaṁ yatavācaṁ taṁ vinayāvanataṁ sthitam
इस प्रकार नमस्कार कर चुके, सुशील, वाणी को संयत रखने वाले, विनयपूर्वक झुके खड़े उस शिष्य को गुरु स्वयं यह उपदेश दें —
श्लोक 52 (shiva.kailasa.19.52)
अद्य प्रभृति लोकानामनुग्रहपरो भव । परीक्ष्य वत्सरं शिष्यमङ्गीकुरु विधानतः
adya prabhṛti lokānāmanugrahaparo bhava | parīkṣya vatsaraṁ śiṣyamaṅgīkuru vidhānataḥ
'आज से लोगों पर अनुग्रह करने वाले बनो; एक वर्ष तक परीक्षा लेकर विधिपूर्वक शिष्य को स्वीकार करो।'
श्लोक 53 (shiva.kailasa.19.53)
रागादिदोषान्सन्त्यज्य शिवध्यानपरो भव । सत्सम्प्रदायसंसिद्धैः सङ्गं कुरु न चेतरैः
rāgādidoṣānsantyajya śivadhyānaparo bhava | satsampradāyasaṁsiddhaiḥ saṅgaṁ kuru na cetaraiḥ
'राग आदि दोषों को त्यागकर शिवध्यान में तत्पर बनो; सत्सम्प्रदाय में सिद्ध पुरुषों की संगति करो, अन्य की नहीं।'
श्लोक 54 (shiva.kailasa.19.54)
अनभ्यर्च्य शिवं जातु मा भुङ्क्ष्वाप्राण सङ्क्षयम् । गुरुभक्तिं समास्थाय सुखी भव सुखी भव
anabhyarcya śivaṁ jātu mā bhuṅkṣvāprāṇa saṅkṣayam | gurubhaktiṁ samāsthāya sukhī bhava sukhī bhava
'शिव की पूजा किए बिना कभी भोजन मत करो, चाहे प्राण संकट में पड़ जाएँ; गुरुभक्ति में स्थिर रहकर सुखी रहो, सुखी रहो।'
श्लोक 55 (shiva.kailasa.19.55)
इति क्रमाद् गुरुवरो दयालुर्ज्ञानसागरः । सानुकूलेन चित्तेन समं शिष्यं समाचरेत्
iti kramād guruvaro dayālurjñānasāgaraḥ | sānukūlena cittena samaṁ śiṣyaṁ samācaret
इस प्रकार क्रमशः वह दयालु, ज्ञान-सागर श्रेष्ठ गुरु अनुकूल चित्त से शिष्य के साथ समान व्यवहार करें।
श्लोक 56 (shiva.kailasa.19.56)
तव स्नेहान्मयायं वै वामदेव मुनीश्वर । योगपट्टप्रकारस्ते प्रोक्तो गुह्यतरोऽपि हि
tava snehānmayāyaṁ vai vāmadeva munīśvara | yogapaṭṭaprakāraste prokto guhyataro'pi hi
हे वामदेव मुनीश्वर, तुम्हारे प्रेम के कारण मैंने तुम्हें यह योगपट्ट की विधि, जो अत्यन्त गुह्य है, बताई है।
श्लोक 57 (shiva.kailasa.19.57)
इत्युक्त्वा षण्मुखस्तस्मै क्षौरस्नानविधिक्रमम् । वक्तुमारभते प्रीत्या यतीनां कृपया शुभम्
ityuktvā ṣaṇmukhastasmai kṣaurasnānavidhikramam | vaktumārabhate prītyā yatīnāṁ kṛpayā śubham
ऐसा कहकर षडानन [स्कन्द] यतियों के प्रति प्रेम और कृपा से उन्हें क्षौर-स्नान की विधि का क्रम बताने लगे।