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कैलास संहिता · अध्याय 4

संन्यास-आचार का वर्णन

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5

श्लोक 1 (shiva.kailasa.4.1)

ईश्वर उवाच । अतः परं प्रवक्ष्यामि संन्यासाह्निककर्म च । तव स्नेहान्महादेवि संप्रदायानुरोधतः

īśvara uvāca ataḥ paraṁ pravakṣyāmi saṁnyāsāhnikakarma ca tava snehānmahādevi saṁpradāyānurodhataḥ

ईश्वर बोले — हे महादेवि! अब मैं तुम्हारे स्नेहवश और सम्प्रदाय के अनुरोध से संन्यासी के आह्निक कर्म बताऊँगा।

श्लोक 2 (shiva.kailasa.4.2)

ब्राह्मे मुहूर्त्त उत्थाय शिरसि श्वेतपंकजे । सहस्रारे समासीनं गुरुं संचितयेद्यतिः

brāhme muhūrtta utthāya śirasi śvetapaṁkaje sahasrāre samāsīnaṁ guruṁ saṁcitayedyatiḥ

ब्राह्ममुहूर्त में उठकर, यति को सिर में स्थित श्वेत कमल, सहस्रार में विराजमान गुरु का ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 3 (shiva.kailasa.4.3)

शुद्धस्फटिकसंकाशं द्विनेत्रं वरदाभये । दधानं शिवसद्भावमेवात्मनि मनोहरम्

śuddhasphaṭikasaṁkāśaṁ dvinetraṁ varadābhaye dadhānaṁ śivasadbhāvamevātmani manoharam

शुद्ध स्फटिक के समान कान्तिमान्, दो नेत्रों वाला, वरद और अभय मुद्रा धारण करने वाला, अपने भीतर शिव के सद्भाव को मनोहर रूप से धारण करने वाला —

श्लोक 4 (shiva.kailasa.4.4)

भावोपनीतैः संपूज्य गन्धादिभिरनुक्रमात् । बद्धांजलिपुटो भूत्वा नमस्कुर्याद्गुरुं ततः

bhāvopanītaiḥ saṁpūjya gandhādibhiranukramāt baddhāṁjalipuṭo bhūtvā namaskuryādguruṁ tataḥ

भावपूर्वक लाए गए गंध आदि से क्रमशः पूजा करके, हाथ जोड़कर, फिर गुरु को नमस्कार करे।

श्लोक 5 (shiva.kailasa.4.5)

प्रातःप्रभृति सायान्ते सायादिप्रातरं ततः । यत्करोमि महादेव तदस्तु तव पूजनम्

prātaḥprabhṛti sāyānte sāyādiprātaraṁ tataḥ yatkaromi mahādeva tadastu tava pūjanam

(वह कहे —) 'हे महादेव! प्रातःकाल से सायंकाल तक और सायंकाल से पुनः प्रातःकाल तक मैं जो कुछ भी करता हूँ, वह सब आपकी ही पूजा हो।'

श्लोक 6 (shiva.kailasa.4.6)

प्रतिविज्ञाप्य गुरवे लब्धानुज्ञस्ततो गुरोः । निरुद्धप्राण आसीनो विजितात्मा जितेन्द्रियः

prativijñāpya gurave labdhānujñastato guroḥ niruddhaprāṇa āsīno vijitātmā jitendriyaḥ

गुरु को सूचित करके और उनकी अनुज्ञा प्राप्त करके, फिर प्राणों को रोककर, आत्मसंयमी और जितेन्द्रिय होकर आसन पर बैठे,

श्लोक 7 (shiva.kailasa.4.7)

मूलादिब्रह्मरंध्रांतं षट्चक्रं परिचिंतयेत् । विद्युत्कोटिसमप्रख्यं सर्वतेजोमयं परम्

mūlādibrahmaraṁdhrāṁtaṁ ṣaṭcakraṁ pariciṁtayet vidyutkoṭisamaprakhyaṁ sarvatejomayaṁ param

मूलाधार से लेकर ब्रह्मरंध्र तक के छह चक्रों का ध्यान करे, जो करोड़ों बिजलियों के समान देदीप्यमान और सर्वथा परम तेजोमय हैं।

श्लोक 8 (shiva.kailasa.4.8)

तन्मध्ये चिंतयेन्मां च सच्चिदानन्दविग्रहम् । निर्गुणं परमं ब्रह्म सदाशिवमनामयम्

tanmadhye ciṁtayenmāṁ ca saccidānandavigraham nirguṇaṁ paramaṁ brahma sadāśivamanāmayam

उसके मध्य में मुझ सच्चिदानन्दस्वरूप, निर्गुण परब्रह्म, सदाशिव, रोगरहित का ध्यान करे।

श्लोक 9 (shiva.kailasa.4.9)

सोहमस्मीति मतिमान्म दैक्यमनुभूय च । बहिर्निर्गत्य च ततो दूरं गच्छेद्यथासुखम्

sohamasmīti matimānma daikyamanubhūya ca bahirnirgatya ca tato dūraṁ gacchedyathāsukham

'सोऽहम् अस्मि' (मैं वही हूँ) — ऐसा मानते हुए, बुद्धिमान् मेरे साथ अपनी एकता का अनुभव करके, फिर बाहर निकलकर सुखपूर्वक कुछ दूर जाए।

श्लोक 10 (shiva.kailasa.4.10)

वस्त्रेणाच्छाद्य मतिमाञ्छिरो नासिकया सह । विशोध्य देहं वि धिवत्तृणमाधाय भूतले

vastreṇācchādya matimāñchiro nāsikayā saha viśodhya dehaṁ vi dhivattṛṇamādhāya bhūtale

बुद्धिमान् व्यक्ति नाक सहित सिर को वस्त्र से ढककर, विधिपूर्वक शरीर-शुद्धि करके, भूमि पर तृण बिछाकर,

श्लोक 11 (shiva.kailasa.4.11)

गृहीतशिश्न उत्थाय ततो गच्छेज्जलाशयम् । उद्धृत्य वार्यथान्यायं शौचं कुर्यादतन्द्रितः

gṛhītaśiśna utthāya tato gacchejjalāśayam uddhṛtya vāryathānyāyaṁ śaucaṁ kuryādatandritaḥ

अपने अंग को पकड़कर उठे और फिर जलाशय की ओर जाए। जल निकालकर, आलस्यरहित होकर, विधिपूर्वक शौच करे।

श्लोक 12 (shiva.kailasa.4.12)

हस्तौ पादौ च संशोध्य द्विराचम्योमिति स्मरन् । उत्तराभिमुखो मौनी दन्तधावनमाचरेत्

hastau pādau ca saṁśodhya dvirācamyomiti smaran uttarābhimukho maunī dantadhāvanamācaret

हाथ-पैर शुद्ध करके, दो बार आचमन करके, 'ॐ' का स्मरण करते हुए, उत्तर की ओर मुख करके, मौन रहकर दंतधावन करे।

श्लोक 13 (shiva.kailasa.4.13)

तृणपर्णैः सदा कुर्यादमामेकादशी विना । अपां द्वादशगण्डूषैर्मुखं संशोधयेत्ततः

tṛṇaparṇaiḥ sadā kuryādamāmekādaśī vinā apāṁ dvādaśagaṇḍūṣairmukhaṁ saṁśodhayettataḥ

अमावस्या और एकादशी को छोड़कर सदा तृण या पत्तों से यह करे। तत्पश्चात् जल के बारह कुल्लों से मुख को शुद्ध करे।

श्लोक 14 (shiva.kailasa.4.14)

द्विराचम्य मृदा तोयैः कटिशौचं विधाय च । अरुणोदयकाले तु स्नानं कुर्यान्मृदा सह

dvirācamya mṛdā toyaiḥ kaṭiśaucaṁ vidhāya ca aruṇodayakāle tu snānaṁ kuryānmṛdā saha

दो बार आचमन करके और मिट्टी तथा जल से कटिशुद्धि करके, अरुणोदय काल में मिट्टी सहित स्नान करे।

श्लोक 15 (shiva.kailasa.4.15)

गुरुं संस्मृत्य मां चैव स्नानसंध्याद्यमाचरेत् । विस्तारभयतो नोक्तमत्र द्रष्टव्यमन्यतः

guruṁ saṁsmṛtya māṁ caiva snānasaṁdhyādyamācaret vistārabhayato noktamatra draṣṭavyamanyataḥ

गुरु का तथा मेरा स्मरण करते हुए, स्नान, संध्या आदि करे। विस्तारभय से यहाँ नहीं कहा गया, इसे अन्यत्र देखना चाहिए।

श्लोक 16 (shiva.kailasa.4.16)

आबध्य शंखमुद्रां च प्रणवेनाभिषेचयेत् । शिरसि द्वादशावृत्त्या तदर्धं वा तदर्धकम्

ābadhya śaṁkhamudrāṁ ca praṇavenābhiṣecayet śirasi dvādaśāvṛttyā tadardhaṁ vā tadardhakam

शंखमुद्रा बनाकर, प्रणव-मंत्र से सिर पर बारह बार, अथवा उसके आधे या उसके चौथाई बार अभिषेक करे।

श्लोक 17 (shiva.kailasa.4.17)

तीरमागत्य कौपीनं प्रक्षाल्याचम्य च द्विधा । प्रोक्षयेत्प्रणवेनैव वस्त्रमंगोपमार्जनम्

tīramāgatya kaupīnaṁ prakṣālyācamya ca dvidhā prokṣayetpraṇavenaiva vastramaṁgopamārjanam

तट पर आकर, कौपीन धोकर और दो बार आचमन करके, अंग पोंछने के वस्त्र को केवल प्रणव-मंत्र से प्रोक्षित करे।

श्लोक 18 (shiva.kailasa.4.18)

मुखम्प्रथमतो मृज्य शिर आरभ्य सर्वतः । तेनैव मार्जयेद्देहं स्थित्वा च गुरुसन्निधौ

mukhamprathamato mṛjya śira ārabhya sarvataḥ tenaiva mārjayeddehaṁ sthitvā ca gurusannidhau

पहले मुख पोंछकर, फिर सिर से आरंभ करके सर्वत्र, उसी वस्त्र से शरीर को पोंछे, गुरु की उपस्थिति में रहते हुए।

श्लोक 19 (shiva.kailasa.4.19)

आबध्याद्वामतः शुद्धं कौपीनं च सडोरकम् । ततः संधारयेद्भस्म तद्विधिः प्रोच्यतेऽद्रिजे

ābadhyādvāmataḥ śuddhaṁ kaupīnaṁ ca saḍorakam tataḥ saṁdhārayedbhasma tadvidhiḥ procyate ’drije

बाईं ओर डोरी सहित शुद्ध कौपीन बाँधे। फिर भस्म धारण करे — हे पर्वतपुत्री! उसकी विधि अब कही जाती है।

श्लोक 20 (shiva.kailasa.4.20)

द्विराचम्य समादाय भस्म सद्यादिमंत्रतः । अग्निरित्यादिभिर्मंत्रैरभिमंत्र्य स्पृशेत्तनुम्

dvirācamya samādāya bhasma sadyādimaṁtrataḥ agnirityādibhirmaṁtrairabhimaṁtrya spṛśettanum

दो बार आचमन करके, 'सद्योजातम्' आदि मंत्र से भस्म लेकर, 'अग्निरिति' आदि मंत्रों से अभिमंत्रित करके शरीर का स्पर्श करे।

श्लोक 21 (shiva.kailasa.4.21)

आपोवेत्यभिमंत्र्याथ जलं तेनैव सेचयेत् । ओमापोज्योतिरित्युक्त्वा मानस्तोकेति मंत्रतः

āpovetyabhimaṁtryātha jalaṁ tenaiva secayet omāpojyotirityuktvā mānastoketi maṁtrataḥ

'आपो हि ष्ठा' मंत्र से जल को अभिमंत्रित करके उसी से सिंचन करे। 'ॐ आपो ज्योतिः' कहकर तथा 'मा नस्तोके' मंत्र से,

श्लोक 22 (shiva.kailasa.4.22)

समद्य कमलद्वन्द्वं कुर्या केकं तु पंचधा । शिरोवदनहृद्गुह्यपादेषु परमेश्वरि

samadya kamaladvandvaṁ kuryā kekaṁ tu paṁcadhā śirovadanahṛdguhyapādeṣu parameśvari

हे परमेश्वरि! दोनों करकमलों को जोड़कर, उसे पाँच भागों में विभक्त कर सिर, मुख, हृदय, गुह्य भाग और पैरों पर करे।

श्लोक 23 (shiva.kailasa.4.23)

ईशानादिसमारभ्य सद्यान्तं पंचभिः क्रमात् । उद्धूल्य कवलं पश्चात्प्रणवेनाभिषेचयेत्

īśānādisamārabhya sadyāntaṁ paṁcabhiḥ kramāt uddhūlya kavalaṁ paścātpraṇavenābhiṣecayet

ईशान से आरंभ कर सद्योजात तक पाँचों मंत्रों से क्रमशः चूर्ण (भस्म) बिखेरकर, फिर प्रणव से अभिषिक्त करे।

श्लोक 24 (shiva.kailasa.4.24)

सर्वांगं च ततो हस्तौ प्रक्षाल्यान्यत्समाहरेत् समर्च्य पूर्वत्तत्तु त्रिपुण्ड्रांस्तेन धारयेत्

sarvāṁgaṁ ca tato hastau prakṣālyānyatsamāharet samarcya pūrvattattu tripuṇḍrāṁstena dhārayet

फिर सम्पूर्ण अंग और हाथों को धोकर और अधिक भस्म एकत्रित करे। पूर्ववत् पूजा करके उससे त्रिपुण्ड्र धारण करे।

श्लोक 25 (shiva.kailasa.4.25)

त्रियायुषैस्त्र्यम्बकैश्च प्रणवेन शिवेन च । शिरस्यथ ललाटे च वक्षसि स्कन्ध एव च

triyāyuṣaistryambakaiśca praṇavena śivena ca śirasyatha lalāṭe ca vakṣasi skandha eva ca

त्र्यायुष, त्र्यंबक, प्रणव तथा शिव-मंत्र से, सिर पर, फिर ललाट पर, वक्षस्थल पर तथा कंधों पर,

श्लोक 26 (shiva.kailasa.4.26)

नाभौ बाह्वौः संधिषु च पृष्ठ चैव यथाक्रमम् । प्रक्षाल्य हस्तौ च ततो द्विराचम्य यथाविधि

nābhau bāhvauḥ saṁdhiṣu ca pṛṣṭha caiva yathākramam prakṣālya hastau ca tato dvirācamya yathāvidhi

नाभि पर, भुजाओं पर, जोड़ों पर तथा पीठ पर भी क्रमशः (त्रिपुण्ड्र धारण करे); फिर हाथ धोकर और विधिपूर्वक दो बार आचमन करके,

श्लोक 27 (shiva.kailasa.4.27)

पंचीकरणमुच्चार्य भावयेत्स्वगुरुं बुधः । वक्ष्यमाणप्रकारेण प्राणायामान्षडाचरेत्

paṁcīkaraṇamuccārya bhāvayetsvaguruṁ budhaḥ vakṣyamāṇaprakāreṇa prāṇāyāmānṣaḍācaret

पंचीकरण-मंत्र का उच्चारण करके, बुद्धिमान् अपने गुरु का ध्यान करे; आगे बताई जाने वाली विधि से छह प्राणायाम करे।

श्लोक 28 (shiva.kailasa.4.28)

दक्षहस्तेन संगृह्य जलं वामेन पाणिना । समाच्छाद्य द्विषड्वारं प्रणवे नाभिमंत्रयेत्

dakṣahastena saṁgṛhya jalaṁ vāmena pāṇinā samācchādya dviṣaḍvāraṁ praṇave nābhimaṁtrayet

दाहिने हाथ से जल लेकर और बाएँ हाथ से ढककर, बारह बार प्रणव-मंत्र से उसे अभिमंत्रित करे।

श्लोक 29 (shiva.kailasa.4.29)

एवं त्रिवारं संप्रोक्ष्य शिरसि त्रिः पिबेत्ततः । समाहितेन मनसा ध्यायन्नोंकारमीश्वरम्

evaṁ trivāraṁ saṁprokṣya śirasi triḥ pibettataḥ samāhitena manasā dhyāyannoṁkāramīśvaram

इस प्रकार सिर पर तीन बार प्रोक्षण करके, फिर एकाग्रचित्त होकर, ॐकाररूप ईश्वर का ध्यान करते हुए, तीन बार उसे पिए,

श्लोक 30 (shiva.kailasa.4.30)

सौरमण्डलमध्यस्थं सर्वतेजोमयं परम् । अष्टबाहुं चतुर्वक्त्रमर्द्धनारीकमद्भुतम्

sauramaṇḍalamadhyasthaṁ sarvatejomayaṁ param aṣṭabāhuṁ caturvaktramarddhanārīkamadbhutam

जो सूर्यमण्डल के मध्य में स्थित, सर्वथा परम तेजोमय, आठ भुजाओं वाला, चार मुखों वाला और अद्भुत अर्द्धनारीश्वर रूप है।

श्लोक 31 (shiva.kailasa.4.31)

सर्वाश्चर्य्यगुणोपेतं सर्वालंकारशोभितम् । एवं ध्यात्वाथ विधिवद्दद्यादर्घ्यत्रयं ततः

sarvāścaryyaguṇopetaṁ sarvālaṁkāraśobhitam evaṁ dhyātvātha vidhivaddadyādarghyatrayaṁ tataḥ

समस्त अद्भुत गुणों से युक्त, समस्त अलंकारों से सुशोभित — इस प्रकार ध्यान करके, फिर विधिपूर्वक तीन बार अर्घ्य दे।

श्लोक 32 (shiva.kailasa.4.32)

अष्टोत्तरशतं जप्त्वा द्विषड्वारं तु तर्पयेत् । पुनराचम्य विधिवत्प्राणायामत्रयं चरेत्

aṣṭottaraśataṁ japtvā dviṣaḍvāraṁ tu tarpayet punarācamya vidhivatprāṇāyāmatrayaṁ caret

एक सौ आठ बार जप करके बारह बार तर्पण करे। फिर विधिपूर्वक आचमन करके तीन प्राणायाम करे।

श्लोक 33 (shiva.kailasa.4.33)

पूजासदनमागच्छेन्मनसा संस्मरञ्च्छिवम् । द्वारमासाद्य प्रक्षाल्य पादौ मौनी द्विराचमेत्

pūjāsadanamāgacchenmanasā saṁsmarañcchivam dvāramāsādya prakṣālya pādau maunī dvirācamet

मन में शिव का स्मरण करते हुए पूजागृह में आए। द्वार पर पहुँचकर, पैर धोकर, मौन रहते हुए दो बार आचमन करे।

श्लोक 34 (shiva.kailasa.4.34)

प्रविशेद्विधिना तत्र दक्षपादपुरस्स रम् । मण्डपान्तस्सुधीस्तत्र मण्डलं रचयेत्क्रमात्

praviśedvidhinā tatra dakṣapādapurassa ram maṇḍapāntassudhīstatra maṇḍalaṁ racayetkramāt

वहाँ विधिपूर्वक दाहिना पैर आगे बढ़ाते हुए प्रवेश करे। वह बुद्धिमान् वहाँ मण्डप के भीतर क्रमशः मण्डल की रचना करे।

अध्याय 3अध्याय-सूचीअध्याय 5