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कैलास संहिता · अध्याय 8

आवरण-पूजा का वर्णन

अध्याय 7अध्याय-सूचीअध्याय 9

श्लोक 1 (shiva.kailasa.8.1)

ईश्वर उवाच । अत्रास्ति च महादेवि खल्वावरणपंचकम् । पंचावरणपूजान्तु प्रारभेत यथाक्रमम्

īśvara uvāca atrāsti ca mahādevi khalvāvaraṇapaṁcakam paṁcāvaraṇapūjāntu prārabheta yathākramam

ईश्वर बोले — हे महादेवि! यहाँ निश्चय ही पाँच आवरण हैं; पाँचों आवरणों की पूजा यथाक्रम आरंभ करनी चाहिए।

श्लोक 2 (shiva.kailasa.8.2)

प्रथमम्पूजितौ यत्र तत्रैव क्रमशस्सुधीः । गन्धाद्यैरर्चयेत्पूर्वं देवौ हेरंबषण्मुखौ

prathamampūjitau yatra tatraiva kramaśassudhīḥ gandhādyairarcayetpūrvaṁ devau heraṁbaṣaṇmukhau

जहाँ पहले पूजा की गई थी, वहीं क्रमशः बुद्धिमान् पहले गंध आदि से हेरंब (गणेश) और षण्मुख (स्कन्द) — इन दोनों देवों की पूजा करे।

श्लोक 3 (shiva.kailasa.8.3)

पंच ब्रह्माणि परितो वृत्ते सम्पूजयेत्क्रमात् । ईशानदेशे पूर्वे च दक्षिणे चोत्तरे तथा

paṁca brahmāṇi parito vṛtte sampūjayetkramāt īśānadeśe pūrve ca dakṣiṇe cottare tathā

वृत्त के चारों ओर क्रमशः पाँच ब्रह्मों की पूजा करे — ईशान, पूर्व, दक्षिण और उत्तर में,

श्लोक 4 (shiva.kailasa.8.4)

पश्चिमे च ततस्तस्मिन्षडंगानि समर्चयेत । आग्नेये च तथैशाने नैर्ऋते वायुदेशके

paścime ca tatastasminṣaḍaṁgāni samarcayeta āgneye ca tathaiśāne nairṛte vāyudeśake

और पश्चिम में; फिर उसमें षडंगों की पूजा करे — आग्नेय, ईशान, नैर्ऋत्य और वायव्य दिशाओं में,

श्लोक 5 (shiva.kailasa.8.5)

मध्ये नेत्रन्तद्वदस्त्रम्पूर्वादिपरितः क्रमात् । प्रथमावरणम्प्रोक्तं द्वितीयावरणं शृणु

madhye netrantadvadastrampūrvādiparitaḥ kramāt prathamāvaraṇamproktaṁ dvitīyāvaraṇaṁ śṛṇu

मध्य में नेत्र-मंत्र, तथा उसी प्रकार अस्त्र-मंत्र को पूर्व आदि से चारों ओर क्रमशः। इस प्रकार प्रथम आवरण कहा गया; अब द्वितीय आवरण सुनो।

श्लोक 6 (shiva.kailasa.8.6)

अनन्तम्पूर्वदिक्पत्रे सूक्ष्मन्दक्षिणतस्तथा । शिवोत्तमं पश्चिमत एकनेत्रन्तथोत्तरे

anantampūrvadikpatre sūkṣmandakṣiṇatastathā śivottamaṁ paścimata ekanetrantathottare

पूर्व दिशा के दल में अनन्त, दक्षिण में सूक्ष्म, पश्चिम में शिवोत्तम, तथा उत्तर में एकनेत्र —

श्लोक 7 (shiva.kailasa.8.7)

एकरुद्रन्तथैशाने त्रिमूर्तिं वह्निदिग्दले । श्रीकण्ठं नैर्ऋते वायौ शिखण्डीशं समर्चयेत्

ekarudrantathaiśāne trimūrtiṁ vahnidigdale śrīkaṇṭhaṁ nairṛte vāyau śikhaṇḍīśaṁ samarcayet

और ईशान में एकरुद्र; आग्नेय दल में त्रिमूर्ति; नैर्ऋत्य में श्रीकण्ठ; तथा वायव्य में शिखण्डीश की पूजा करे।

श्लोक 8 (shiva.kailasa.8.8)

द्वितीयावरणे चैव पूज्यास्ते चक्रवर्तिनः । पूर्वद्वारस्य मध्ये तु वृषेशानम्प्रपूजयेत्

dvitīyāvaraṇe caiva pūjyāste cakravartinaḥ pūrvadvārasya madhye tu vṛṣeśānamprapūjayet

ये चक्रवर्ती देव द्वितीय आवरण में पूज्य हैं। पूर्व द्वार के मध्य में वृषेशान (नन्दी) की पूजा करे।

श्लोक 9 (shiva.kailasa.8.9)

तद्दक्षिणे नन्दिनञ्च महाकालन्तदुत्तरे । भृंगीशन्दक्षिणद्वारपश्चिमे सम्प्रपूजयेत्

taddakṣiṇe nandinañca mahākālantaduttare bhṛṁgīśandakṣiṇadvārapaścime samprapūjayet

उसके दाहिनी ओर नन्दी, तथा बाईं ओर महाकाल; और दक्षिण द्वार के पश्चिम में भृंगीश की भलीभाँति पूजा करे।

श्लोक 10 (shiva.kailasa.8.10)

तत्पूर्वकोष्ठे गन्धाद्यैस्सम्प्रपूज्य विनायकम् । पश्चिमोत्तरकोष्ठे च वृषभन्दक्षिणे गुहम्

tatpūrvakoṣṭhe gandhādyaissamprapūjya vināyakam paścimottarakoṣṭhe ca vṛṣabhandakṣiṇe guham

उसके पूर्व कोष्ठ में गंध आदि से विनायक की भलीभाँति पूजा करके, पश्चिमोत्तर (वायव्य) कोष्ठ में वृषभ की, तथा दक्षिण में गुह (कार्तिकेय) की पूजा करे,

श्लोक 11 (shiva.kailasa.8.11)

उत्तरद्वारपूर्वे तु प्रदक्षिणविधानतः । नामाष्टकविधानेन पूजयेदुच्यते हि तत्

uttaradvārapūrve tu pradakṣiṇavidhānataḥ nāmāṣṭakavidhānena pūjayeducyate hi tat

और उत्तर द्वार के पूर्व में, प्रदक्षिणा-विधि से, नामाष्टक-विधान द्वारा पूजा करे — वह अब कहा जाता है।

श्लोक 12 (shiva.kailasa.8.12)

भवं शर्वं तथेशानं रुद्रम्पशुपतिम्पुनः । उग्रम्भीमम्महादेवन्तृतीयावरणन्त्विदम्

bhavaṁ śarvaṁ tatheśānaṁ rudrampaśupatimpunaḥ ugrambhīmammahādevantṛtīyāvaraṇantvidam

भव, शर्व, ईशान, रुद्र, पशुपति, उग्र, भीम और महादेव — यही तृतीय आवरण है।

श्लोक 13 (shiva.kailasa.8.13)

यो वेदादौ स्वर इति समावाह्य महेश्वरम् । पूजयेत्पूर्वदिग्भागे कमले कर्णिकोपरि

yo vedādau svara iti samāvāhya maheśvaram pūjayetpūrvadigbhāge kamale karṇikopari

'यो वेदादौ स्वरः' इस मंत्र से महेश्वर का आवाहन करके, कमल की कर्णिका के ऊपर, पूर्व दिशा में उनकी पूजा करे।

श्लोक 14 (shiva.kailasa.8.14)

ईश्वरम्पूर्वदिक्पत्रे विश्वेशन्दक्षिणे ततः । सौम्ये तु परमेशानं सर्वेशम्प श्चिमे यजेत्

īśvarampūrvadikpatre viśveśandakṣiṇe tataḥ saumye tu parameśānaṁ sarveśampa ścime yajet

पूर्व दिशा के दल में ईश्वर, फिर दक्षिण में विश्वेश; उत्तर में परमेशान, तथा पश्चिम में सर्वेश की पूजा करे।

श्लोक 15 (shiva.kailasa.8.15)

दक्षिणे तु यजेद्रुद्रमावोराजानमित्यृचा । आवाह्य गन्धपुष्पाद्यैः कर्णिकायान्दलेषु च

dakṣiṇe tu yajedrudramāvorājānamityṛcā āvāhya gandhapuṣpādyaiḥ karṇikāyāndaleṣu ca

दक्षिण में 'आवो राजानम्' ऋचा से आवाहन करके रुद्र की, गंध-पुष्प आदि से कर्णिका पर और दलों में पूजा करे।

श्लोक 16 (shiva.kailasa.8.16)

शिवः पूर्वे दक्षिणतो हर उत्तरतो मृडः । भवः पश्चिमदिक्पत्रे पूज्या एते यथाक्रमम्

śivaḥ pūrve dakṣiṇato hara uttarato mṛḍaḥ bhavaḥ paścimadikpatre pūjyā ete yathākramam

पूर्व में शिव, दक्षिण में हर, उत्तर में मृड, तथा पश्चिम दल में भव — ये सब यथाक्रम पूज्य हैं।

श्लोक 17 (shiva.kailasa.8.17)

उत्तरे विष्णुमावाह्य गन्धपुष्पादिभिर्यजेत् । प्रतद्विष्णुरिति प्रोच्य कर्णिकायान्दलेषु च

uttare viṣṇumāvāhya gandhapuṣpādibhiryajet pratadviṣṇuriti procya karṇikāyāndaleṣu ca

उत्तर में विष्णु का आवाहन करके, 'प्र तद्विष्णुः' कहकर, गंध-पुष्प आदि से कर्णिका पर और दलों में उनकी पूजा करे।

श्लोक 18 (shiva.kailasa.8.18)

वासुदेवम्पूर्वभागे दक्षिणे चानिरुद्धकम् । सौम्ये संकर्षणञ्चैव प्रद्युम्नम्पश्चिमे यजेत्

vāsudevampūrvabhāge dakṣiṇe cāniruddhakam saumye saṁkarṣaṇañcaiva pradyumnampaścime yajet

पूर्व भाग में वासुदेव, दक्षिण में अनिरुद्ध, उत्तर में संकर्षण, तथा पश्चिम में प्रद्युम्न की पूजा करे।

श्लोक 19 (shiva.kailasa.8.19)

ब्रह्माणम्पश्चिमे पद्मे समावाह्य समर्चयेत् । हिरण्यगर्भः समवर्तत इति मंत्रेण मंत्रवित्

brahmāṇampaścime padme samāvāhya samarcayet hiraṇyagarbhaḥ samavartata iti maṁtreṇa maṁtravit

पश्चिम कमल में ब्रह्मा का भलीभाँति आवाहन करके, मंत्रज्ञ 'हिरण्यगर्भः समवर्तत' मंत्र से उनकी पूजा करे।

श्लोक 20 (shiva.kailasa.8.20)

हिरण्यगर्भं पूर्वस्यां विराजन्दक्षिणे ततः । उत्तरे पुष्करञ्चैव कालम्पश्चिमतो यजेत्

hiraṇyagarbhaṁ pūrvasyāṁ virājandakṣiṇe tataḥ uttare puṣkarañcaiva kālampaścimato yajet

पूर्व में हिरण्यगर्भ, फिर दक्षिण में विराज; उत्तर में पुष्कर, तथा पश्चिम में काल की पूजा करे।

श्लोक 21 (shiva.kailasa.8.21)

सर्वोर्द्ध्वपंक्तौ पूर्वादिप्रदक्षिणविधानतः । तत्तत्स्थानेषु संपूज्य लोकपालाननुक्रमात्

sarvorddhvapaṁktau pūrvādipradakṣiṇavidhānataḥ tattatsthāneṣu saṁpūjya lokapālānanukramāt

सबसे ऊपर की पंक्ति में, पूर्व आदि से प्रदक्षिणा-विधि से, उन-उन स्थानों में क्रमशः लोकपालों की पूजा करके,

श्लोक 22 (shiva.kailasa.8.22)

रान्तंपान्तं तथा ज्ञान्तं लान्तं लान्तमपूर्वकम् । षान्तं सान्तञ्च वेदाद्यं श्रीबीजञ्च दशक्रमात्

rāntaṁpāntaṁ tathā jñāntaṁ lāntaṁ lāntamapūrvakam ṣāntaṁ sāntañca vedādyaṁ śrībījañca daśakramāt

रकारांत, पकारांत, तथा ज्ञकारांत, लकारांत, पुनः लकारांत; षकारांत, सकारांत; तथा वेदादि (ॐ) और श्रीबीज — इस दशक्रम से,

श्लोक 23 (shiva.kailasa.8.23)

बीजानि लोकपालानामेतैरेतान्समर्चयेत् । नैर्ऋते चोत्तरे तद्वदीशानस्य च दक्षिणे

bījāni lokapālānāmetairetānsamarcayet nairṛte cottare tadvadīśānasya ca dakṣiṇe

ये लोकपालों के बीजाक्षर हैं; इनसे उनकी पूजा करे — इसी प्रकार नैर्ऋत्य में, उत्तर में तथा ईशान के दक्षिण में,

श्लोक 24 (shiva.kailasa.8.24)

ब्रह्म विष्णू च विधिना पूजयेदुपचारकैः । बाह्यरेखासु देवेशम्पञ्चमावरणे यजेत्

brahma viṣṇū ca vidhinā pūjayedupacārakaiḥ bāhyarekhāsu deveśampañcamāvaraṇe yajet

विधिपूर्वक उपचारों से ब्रह्मा और विष्णु की पूजा करे। बाह्य रेखाओं में पंचम आवरण में देवेश की पूजा करे।

श्लोक 25 (shiva.kailasa.8.25)

श्रीमत्त्रिशूलमीशाने वज्रं माहेन्द्रदिङ्मुखे । परशुं वह्निदिग्भागे याम्ये सायकमर्चयेत्

śrīmattriśūlamīśāne vajraṁ māhendradiṅmukhe paraśuṁ vahnidigbhāge yāmye sāyakamarcayet

ईशान में श्रीमान् त्रिशूल; इन्द्र दिशा (पूर्व) में वज्र; आग्नेय भाग में परशु; तथा यम दिशा (दक्षिण) में बाण की पूजा करे;

श्लोक 26 (shiva.kailasa.8.26)

नैर्ऋते तु यजेत्खड्गम्पाशं वरुणगोचरे । अंकुशं मारुते भागे पिनाकं चोत्तरे यजेत्

nairṛte tu yajetkhaḍgampāśaṁ varuṇagocare aṁkuśaṁ mārute bhāge pinākaṁ cottare yajet

नैर्ऋत्य में खड्ग की पूजा करे; वरुण दिशा (पश्चिम) में पाश; मारुत भाग (वायव्य) में अंकुश; तथा उत्तर में पिनाक धनुष की पूजा करे।

श्लोक 27 (shiva.kailasa.8.27)

पश्चिमाभिमुखं रौद्रं क्षेत्रपालं समर्चयेत् । यथाविधि विधानज्ञश्शिवप्रीत्यर्थमेव च

paścimābhimukhaṁ raudraṁ kṣetrapālaṁ samarcayet yathāvidhi vidhānajñaśśivaprītyarthameva ca

विधिज्ञ पुरुष यथाविधि, केवल शिव को प्रसन्न करने के लिए, पश्चिमाभिमुख रौद्र क्षेत्रपाल की पूजा करे।

श्लोक 28 (shiva.kailasa.8.28)

कृताञ्जलिपुटास्सर्वे चिन्त्याः स्मितमुखाम्बुजाः । सादरं प्रेक्षमाणाश्च देवं देवीञ्च सर्वदा

kṛtāñjalipuṭāssarve cintyāḥ smitamukhāmbujāḥ sādaraṁ prekṣamāṇāśca devaṁ devīñca sarvadā

ये सभी (परिवार देवता) हाथ जोड़े हुए, मुस्कुराते हुए मुखकमल वाले, सदा आदरपूर्वक देव और देवी को निहारते हुए चिंतन करने योग्य हैं।

श्लोक 29 (shiva.kailasa.8.29)

इत्थमावरणाभ्यर्चां कृत्वा विक्षेपशान्तये । पुनरभ्यर्च्य देवेशम्प्रणवं च शिवं वदेत्

itthamāvaraṇābhyarcāṁ kṛtvā vikṣepaśāntaye punarabhyarcya deveśampraṇavaṁ ca śivaṁ vadet

इस प्रकार आवरण-पूजा करके, विक्षेप की शांति के लिए, पुनः देवेश की पूजा करके, प्रणव और शिव का उच्चारण करे।

श्लोक 30 (shiva.kailasa.8.30)

एवमभ्यर्च्य विधिवद्गन्धाद्यैरुपचारकैः । उपचर्य्य ततो दद्यान्नैवेद्यं विधिसाधितम्

evamabhyarcya vidhivadgandhādyairupacārakaiḥ upacaryya tato dadyānnaivedyaṁ vidhisādhitam

इस प्रकार विधिपूर्वक गंध आदि उपचारों से पूजा और सेवा करके, फिर विधिपूर्वक तैयार किया गया नैवेद्य अर्पित करे।

श्लोक 31 (shiva.kailasa.8.31)

पुनराचमनीयं च दद्यादर्घ्यं यथा पुरा । ततो निवेद्य पानीयन्ताम्बूलं चोपदेशतः

punarācamanīyaṁ ca dadyādarghyaṁ yathā purā tato nivedya pānīyantāmbūlaṁ copadeśataḥ

पुनः आचमनीय जल और अर्घ्य पूर्ववत् अर्पित करे। फिर उपदेशानुसार पेयजल और ताम्बूल निवेदित करके,

श्लोक 32 (shiva.kailasa.8.32)

नीराजनादिकं कृत्वा पूजाशेषं समापयेत् । ध्यात्वा देवं च देवीञ्च मनुमष्टोत्तरं जपेत्

nīrājanādikaṁ kṛtvā pūjāśeṣaṁ samāpayet dhyātvā devaṁ ca devīñca manumaṣṭottaraṁ japet

नीराजन आदि करके पूजा का शेष कार्य पूर्ण करे। देव और देवी का ध्यान करके एक सौ आठ बार मंत्र-जप करे।

श्लोक 33 (shiva.kailasa.8.33)

तत उत्थाय रचितपुष्पाञ्जलिपुटः स्थितः । जपेद्ध्यात्वा महादेवं यो देवानामिति क्रमात्

tata utthāya racitapuṣpāñjalipuṭaḥ sthitaḥ japeddhyātvā mahādevaṁ yo devānāmiti kramāt

फिर उठकर, पुष्पांजलि लिए हुए खड़े होकर, महादेव का ध्यान करके 'यो देवानाम्' इत्यादि मंत्र का क्रमशः जप करे,

श्लोक 34 (shiva.kailasa.8.34)

यो वेदादौ स्वरः प्रोक्त इत्यंतम्परमेश्वरि । पुष्पाञ्जलिन्ततो दत्त्वा त्रिः प्रदक्षिणमाचरेत्

yo vedādau svaraḥ prokta ityaṁtamparameśvari puṣpāñjalintato dattvā triḥ pradakṣiṇamācaret

हे परमेश्वरि! 'यो वेदादौ स्वरः प्रोक्तः' पर्यंत। फिर पुष्पांजलि अर्पित करके तीन बार प्रदक्षिणा करे।

श्लोक 35 (shiva.kailasa.8.35)

साष्टांगम्प्रणमेत्तं स भक्त्या परमयान्वितः । पुनः प्रदक्षिणां कृत्वा प्रणमेत्पुनरेकधा

sāṣṭāṁgampraṇamettaṁ sa bhaktyā paramayānvitaḥ punaḥ pradakṣiṇāṁ kṛtvā praṇametpunarekadhā

परम भक्ति से युक्त होकर उन्हें साष्टांग प्रणाम करे। पुनः प्रदक्षिणा करके फिर एक बार प्रणाम करे।

श्लोक 36 (shiva.kailasa.8.36)

स्थित्वासने समभ्यर्च्य देवं नामाष्टकेन च । साधु वासाधु वा कर्म यद्यदाचरितं मया

sthitvāsane samabhyarcya devaṁ nāmāṣṭakena ca sādhu vāsādhu vā karma yadyadācaritaṁ mayā

आसन पर बैठकर, नामाष्टक से देव की पूजा करके, (वह कहे —) 'मैंने जो कुछ भी अच्छा अथवा बुरा कर्म किया है,

श्लोक 37 (shiva.kailasa.8.37)

तत्सर्वं भगवञ्छम्भो भवदाराधनम्परम् । इति शंखोदकेनैव सपुष्पेण समर्पयेत्

tatsarvaṁ bhagavañchambho bhavadārādhanamparam iti śaṁkhodakenaiva sapuṣpeṇa samarpayet

हे भगवन् शंभो! वह सब आपकी ही परम आराधना है।' इस प्रकार पुष्प सहित केवल शंख-जल से उसे अर्पित करे।

श्लोक 38 (shiva.kailasa.8.38)

पूज्यं पुनस्समभ्यर्च्य सार्थं नामाष्टकं जपेत् । तदेव शृणु देवेशि संब्रुवे तव भक्तितः

pūjyaṁ punassamabhyarcya sārthaṁ nāmāṣṭakaṁ japet tadeva śṛṇu deveśi saṁbruve tava bhaktitaḥ

पूज्य देव की पुनः पूजा करके, अर्थ सहित नामाष्टक का जप करे। हे देवेशि! उसे ही सुनो, मैं भक्तिपूर्वक तुम्हें बताता हूँ।

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