कैलास संहिता · अध्याय 9
नामाष्टक एवं प्रणव-साधना का वर्णन
श्लोक 1 (shiva.kailasa.9.1)
ईश्वर उवाच । शिवो महेश्वरश्चैव रुद्रो विष्णुः पितामहः । संसारवैद्यः सर्वज्ञः परमात्मेति मुख्यतः
īśvara uvāca | śivo maheśvaraścaiva rudro viṣṇuḥ pitāmahaḥ | saṁsāravaidyaḥ sarvajñaḥ paramātmeti mukhyataḥ
ईश्वर ने कहा — शिव, महेश्वर, रुद्र, विष्णु, पितामह, संसारवैद्य, सर्वज्ञ तथा परमात्मा — ये मुख्य रूप से मेरे आठ नाम हैं।
श्लोक 2 (shiva.kailasa.9.2)
नामाष्टकमिदं नित्यं शिवस्य प्रतिपादकम् । आद्यन्तपञ्चकं तत्र शान्त्यतीताद्यनुक्रमात्
nāmāṣṭakamidaṁ nityaṁ śivasya pratipādakam | ādyantapañcakaṁ tatra śāntyatītādyanukramāt
यह नित्य नामाष्टक शिव का प्रतिपादन करता है। इनमें से प्रथम पाँच नाम शान्त्यतीत आदि क्रम से हैं।
श्लोक 3 (shiva.kailasa.9.3)
संज्ञा सदाशिवादीनां पञ्चोपाधिपरिग्रहात् । उपाधिविनिवृत्तौ तु यथास्वं विनिवर्तते
saṁjñā sadāśivādīnāṁ pañcopādhiparigrahāt | upādhivinivṛttau tu yathāsvaṁ vinivartate
सदाशिव आदि की संज्ञाएँ पाँच उपाधियों के ग्रहण से होती हैं; उपाधि की निवृत्ति होने पर वह संज्ञा भी अपने-अपने अनुसार निवृत्त हो जाती है।
श्लोक 4 (shiva.kailasa.9.4)
पदमेव हि तं नित्यमनित्याः पदिनः स्मृताः । पदानां परिवृत्तिः स्यान्मुच्यन्ते पदिनो यतः
padameva hi taṁ nityamanityāḥ padinaḥ smṛtāḥ | padānāṁ parivṛttiḥ syānmucyante padino yataḥ
पद ही वास्तव में नित्य है; पद को धारण करने वाले अनित्य कहे गए हैं, क्योंकि पदों का परिवर्तन होता रहता है, जिससे पद धारण करने वाले मुक्त होते जाते हैं।
श्लोक 5 (shiva.kailasa.9.5)
परिवृत्त्यन्तरे त्वेवं भूयस्तस्याप्युपाधिना । आत्मान्तराभिधानं स्यात्पादाद्यं नामपञ्चकम्
parivṛttyantare tvevaṁ bhūyastasyāpyupādhinā | ātmāntarābhidhānaṁ syātpādādyaṁ nāmapañcakam
इस परिवर्तन के बीच पुनः उसी उपाधि के द्वारा अन्य आत्मा का अन्य नाम होता है — इस प्रकार पद से आरम्भ होने वाला यह नामपञ्चक है।
श्लोक 6 (shiva.kailasa.9.6)
अन्यत्तु त्रितयं नाम्नामुपादानादिभेदतः । त्रिविधोपाधिरचनाच्छिव एव तु वर्तते
anyattu tritayaṁ nāmnāmupādānādibhedataḥ | trividhopādhiracanācchiva eva tu vartate
किन्तु शेष तीन नाम उपादान आदि के भेद से हैं; त्रिविध उपाधि की रचना के होते हुए भी शिव ही वस्तुतः विद्यमान रहते हैं।
श्लोक 7 (shiva.kailasa.9.7)
अनादिमलसंश्लेषप्रागभावात्स्वभावतः । अत्यन्तपरिशुद्धात्मेत्यतोऽयं शिव उच्यते
anādimalasaṁśleṣaprāgabhāvātsvabhāvataḥ | atyantapariśuddhātmetyato'yaṁ śiva ucyate
अनादि मल के संश्लेष के प्रागभाव से, स्वभाव से ही अत्यन्त परिशुद्ध आत्मा होने के कारण, वे "शिव" कहलाते हैं।
श्लोक 8 (shiva.kailasa.9.8)
अथवाशेषकल्याणगुणैकघन ईश्वरः । शिव इत्युच्यते सद्भिः शिवतत्त्वार्थवेदिभिः
athavāśeṣakalyāṇaguṇaikaghana īśvaraḥ | śiva ityucyate sadbhiḥ śivatattvārthavedibhiḥ
अथवा समस्त कल्याण-गुणों के एकमात्र सघन रूप ईश्वर होने से, शिवतत्त्व के अर्थ को जानने वाले सज्जन उन्हें "शिव" कहते हैं।
श्लोक 9 (shiva.kailasa.9.9)
त्रयोविंशतितत्वेभ्यः परा प्रकृतिरुच्यते । प्रकृतेस्तु परं प्राहुः पुरुषं पञ्चविंशकम्
trayoviṁśatitatvebhyaḥ parā prakṛtirucyate | prakṛtestu paraṁ prāhuḥ puruṣaṁ pañcaviṁśakam
तेईस तत्वों से परे प्रकृति कही जाती है; प्रकृति से भी परे पच्चीसवें तत्व पुरुष को कहा गया है।
श्लोक 10 (shiva.kailasa.9.10)
यद्वेदादौ स्वरं प्राहुर्वाच्यवाचकभावतः । वेदैकवेद्यं याथात्म्याद्वेदान्ते च प्रतिष्ठितम्
yadvedādau svaraṁ prāhurvācyavācakabhāvataḥ | vedaikavedyaṁ yāthātmyādvedānte ca pratiṣṭhitam
जिसे वेद के आरम्भ में वाच्य-वाचक भाव से स्वर (ओंकार) कहा गया है, जो वेद के द्वारा ही अपने यथार्थ स्वरूप में जाना जाता है तथा वेदान्त में प्रतिष्ठित है।
श्लोक 11 (shiva.kailasa.9.11)
स एव प्रकृतौ लीनो भोक्ता यः प्रकृतेर्यतः । तस्य प्रकृतिलीनस्य यः परः स महेश्वरः
sa eva prakṛtau līno bhoktā yaḥ prakṛteryataḥ | tasya prakṛtilīnasya yaḥ paraḥ sa maheśvaraḥ
वही भोक्ता जो प्रकृति में लीन है, प्रकृति से उत्पन्न होने के कारण [पुरुष कहलाता है]; उस प्रकृति-लीन पुरुष से जो परे है, वे महेश्वर हैं।
श्लोक 12 (shiva.kailasa.9.12)
तदधीनप्रवृत्तित्त्वात्प्रकृतेः पुरुषस्य च । अथवा त्रिगुणं तत्त्वं मायेयमिदमव्ययम्
tadadhīnapravṛttittvātprakṛteḥ puruṣasya ca | athavā triguṇaṁ tattvaṁ māyeyamidamavyayam
क्योंकि प्रकृति और पुरुष दोनों की प्रवृत्ति उन्हीं के अधीन है; अथवा यह अव्यय माया ही त्रिगुणात्मक तत्त्व है [जो उनके अधीन है]।
श्लोक 13 (shiva.kailasa.9.13)
मायां तु प्रकृतिं विद्यान्मायिनं तु महेश्वरम् । मायाविमोचकोऽनन्तो महेश्वरसमन्वयात्
māyāṁ tu prakṛtiṁ vidyānmāyinaṁ tu maheśvaram | māyāvimocako'nanto maheśvarasamanvayāt
माया को प्रकृति जानना चाहिए और मायापति को महेश्वर; वे अनन्त माया से मुक्त करने वाले हैं, क्योंकि वे महेश्वर-भाव से युक्त हैं।
श्लोक 14 (shiva.kailasa.9.14)
रुद्दुःखं दुःखहेतुर्वा तद् द्रावयति यः प्रभुः । रुद्र इत्युच्यते तस्माच्छिवः परमकारणम्
rudduḥkhaṁ duḥkhaheturvā tad drāvayati yaḥ prabhuḥ | rudra ityucyate tasmācchivaḥ paramakāraṇam
"रु" अर्थात् दुःख को या दुःख के हेतु को जो प्रभु द्रवित (नष्ट) कर देते हैं, इसलिए वह परम कारण शिव "रुद्र" कहलाते हैं।
श्लोक 15 (shiva.kailasa.9.15)
शिवतत्त्वादिभूम्यन्तं शरीरादि घटादि च । व्याप्याधितिष्ठति शिवस्तमाद्विष्णुरुदाहृतः
śivatattvādibhūmyantaṁ śarīrādi ghaṭādi ca | vyāpyādhitiṣṭhati śivastamādviṣṇurudāhṛtaḥ
शिवतत्त्व से लेकर पृथ्वी-पर्यन्त, शरीर आदि तथा घट आदि सबमें व्याप्त होकर जो अधिष्ठित रहते हैं, इसीलिए शिव को "विष्णु" कहा गया है।
श्लोक 16 (shiva.kailasa.9.16)
जगतः पितृभूतानां शिवो मूर्त्यात्मनामपि । पितृभावेन सर्वेषां पितामह उदीरितः
jagataḥ pitṛbhūtānāṁ śivo mūrtyātmanāmapi | pitṛbhāvena sarveṣāṁ pitāmaha udīritaḥ
जगत् के पितृभूत जनों के तथा समस्त मूर्त आत्माओं के भी, पितृभाव से शिव ही सबके "पितामह" कहे गए हैं।
श्लोक 17 (shiva.kailasa.9.17)
निदानज्ञो यथा वैद्यो रोगस्य विनिवर्तकः । उपायैर्भेषजैस्तद्वल्लयभोगाधिकारकः
nidānajño yathā vaidyo rogasya vinivartakaḥ | upāyairbheṣajaistadvallayabhogādhikārakaḥ
जैसे रोग का निदान जानने वाला वैद्य उपायों और औषधियों से रोग को दूर करता है, वैसे ही वे लय और भोग के अधिकारी हैं —
श्लोक 18 (shiva.kailasa.9.18)
संसारस्येश्वरो नित्यं स्थूलस्य विनिवर्तकः । संसारवैद्य इत्युक्तः सर्वतत्त्वार्थवेदिभिः
saṁsārasyeśvaro nityaṁ sthūlasya vinivartakaḥ | saṁsāravaidya ityuktaḥ sarvatattvārthavedibhiḥ
संसार के नित्य ईश्वर तथा स्थूल [दुःख] के निवारक होने से, समस्त तत्त्वार्थ के ज्ञाताओं द्वारा वे "संसारवैद्य" कहे गए हैं।
श्लोक 19 (shiva.kailasa.9.19)
दशार्द्धज्ञानसिद्ध्यर्थमिन्द्रियेषु च सत्स्वपि । त्रिकालभाविनो भावान्स्थूलान्सूक्ष्मानशेषतः
daśārddhajñānasiddhyarthamindriyeṣu ca satsvapi | trikālabhāvino bhāvānsthūlānsūkṣmānaśeṣataḥ
इन्द्रियों के रहते हुए भी दश-अर्ध (पाँच) की ज्ञान-सिद्धि के लिए, त्रिकालभावी स्थूल-सूक्ष्म भावों को सम्पूर्ण रूप से —
श्लोक 20 (shiva.kailasa.9.20)
अणवो नैव जानन्ति मायार्णवमलावृताः । असत्स्वपि च सर्वेषु सिद्धसर्वार्थवेदिषु
aṇavo naiva jānanti māyārṇavamalāvṛtāḥ | asatsvapi ca sarveṣu siddhasarvārthavediṣu
मायार्णव के मल से आवृत अणु (जीव) कभी नहीं जानते, चाहे वे विद्यमान हों या न हों, किन्तु सर्वार्थ के ज्ञाता सिद्धों में [वे शिव सदा जानते हैं]।
श्लोक 21 (shiva.kailasa.9.21)
यद्यथावस्थितं वस्तु तत्तथैव सदाशिवः । अयत्नेनैव जानाति तस्मात्सर्वज्ञ उच्यते
yadyathāvasthitaṁ vastu tattathaiva sadāśivaḥ | ayatnenaiva jānāti tasmātsarvajña ucyate
जो वस्तु जिस रूप में स्थित है, सदाशिव उसे उसी रूप में बिना किसी प्रयत्न के जानते हैं, इसलिए वे "सर्वज्ञ" कहे जाते हैं।
श्लोक 22 (shiva.kailasa.9.22)
सर्वात्मा परमैरेभिर्गुणैर्नित्यसमन्वयात् । स्वस्मात्परात्मविरहात्परमात्मा शिवः स्वयम्
sarvātmā paramairebhirguṇairnityasamanvayāt | svasmātparātmavirahātparamātmā śivaḥ svayam
इन परम गुणों के साथ नित्य समन्वय होने से वे सर्वात्मा हैं, और अपने से परे किसी अन्य आत्मा के न होने से शिव स्वयं ही "परमात्मा" हैं।
श्लोक 23 (shiva.kailasa.9.23)
इति स्तुत्वा महादेवं प्रणवात्मानमव्ययम् । अर्घ्यं पाद्यं पुरो दत्त्वा पश्चादीशानमस्तके
iti stutvā mahādevaṁ praṇavātmānamavyayam | arghyaṁ pādyaṁ puro dattvā paścādīśānamastake
इस प्रकार अव्यय प्रणवस्वरूप महादेव की स्तुति करके, आगे अर्घ्य और पाद्य अर्पित करके, फिर ईशान [मुख] के मस्तक पर [जल चढ़ाकर] —
श्लोक 24 (shiva.kailasa.9.24)
पुनरभ्यर्च्य देवेशं प्रणवेन समाहितः । हस्तेन बद्धाञ्जलिना पूजापुष्पं प्रगृह्य च
punarabhyarcya deveśaṁ praṇavena samāhitaḥ | hastena baddhāñjalinā pūjāpuṣpaṁ pragṛhya ca
पुनः प्रणव से समाहित होकर देवेश की पूजा करके तथा दोनों हाथ जोड़कर पूजा-पुष्प ग्रहण करके —
श्लोक 25 (shiva.kailasa.9.25)
उन्मन्यन्तं शिवं नीत्वा वामनासापुटाध्वना । देवीमुद्वास्य च ततो दक्षनासापुटाध्वना
unmanyantaṁ śivaṁ nītvā vāmanāsāpuṭādhvanā | devīmudvāsya ca tato dakṣanāsāpuṭādhvanā
वाम नासापुट के मार्ग से शिव को उन्मनी अवस्था तक ले जाकर, फिर दक्षिण नासापुट के मार्ग से देवी को विसर्जित करके —
श्लोक 26 (shiva.kailasa.9.26)
शिव एवाहमस्मीति तदैक्यमनुभूय च । सर्वावरणदेवांश्च पुनरुद्वासयेद् हृदि
śiva evāhamasmīti tadaikyamanubhūya ca | sarvāvaraṇadevāṁśca punarudvāsayed hṛdi
"मैं शिव ही हूँ" इस प्रकार उस ऐक्य का अनुभव करके, पुनः समस्त आवरण-देवताओं को हृदय में विसर्जित कर दे।
श्लोक 27 (shiva.kailasa.9.27)
विद्यापूजां गुरोःपूजां कृत्वा पश्चाद्यथाक्रमम् । शङ्खार्घपात्रमन्त्रांश्च हृदये विन्यसेत्क्रमात्
vidyāpūjāṁ guroḥpūjāṁ kṛtvā paścādyathākramam | śaṅkhārghapātramantrāṁśca hṛdaye vinyasetkramāt
विद्या-पूजा और गुरु-पूजा यथाक्रम करके, फिर शंख, अर्घ्य-पात्र आदि के मन्त्रों को क्रमशः हृदय में स्थापित करे।
श्लोक 28 (shiva.kailasa.9.28)
निर्माल्यं च समर्प्याथ चण्डीशायेशगोचरे । पुनश्च संयतप्राण ऋष्यादिकमथोच्चरेत्
nirmālyaṁ ca samarpyātha caṇḍīśāyeśagocare | punaśca saṁyataprāṇa ṛṣyādikamathoccaret
फिर निर्माल्य अर्पित करके ईश के समीप चण्डीश की पूजा करके, फिर प्राण को संयत करके ऋषि आदि का उच्चारण करे।
श्लोक 29 (shiva.kailasa.9.29)
कैलासप्रस्तरो नाम मण्डलं परिभाषितम् । अर्चयेन्नित्यमेवैतत्पक्षे वा मासि मासि वा
kailāsaprastaro nāma maṇḍalaṁ paribhāṣitam | arcayennityamevaitatpakṣe vā māsi māsi vā
"कैलासप्रस्तर" नामक मण्डल कहा गया है; इसकी पूजा नित्य ही, अथवा पक्ष में, अथवा प्रतिमास करनी चाहिए —
श्लोक 30 (shiva.kailasa.9.30)
षण्मासे वत्सरे वापि चातुर्मास्यादिपर्वणि । अवश्यं च समभ्यर्चेन्नित्यं मल्लिङ्गमास्तिकः
ṣaṇmāse vatsare vāpi cāturmāsyādiparvaṇi | avaśyaṁ ca samabhyarcennityaṁ malliṅgamāstikaḥ
अथवा छह महीने में, अथवा वर्ष में, अथवा चातुर्मास्य आदि पर्वों पर; और आस्तिक को नित्य मेरे लिंग की पूजा अवश्य करनी चाहिए।
श्लोक 31 (shiva.kailasa.9.31)
तस्मिन्क्रमे महादेवि विशेषः कोऽपि कथ्यते । उपदेशदिने लिङ्गं पूजितं गुरुणा सह
tasminkrame mahādevi viśeṣaḥ ko'pi kathyate | upadeśadine liṅgaṁ pūjitaṁ guruṇā saha
हे महादेवि! उस क्रम में एक विशेष बात कही जाती है — उपदेश के दिन गुरु के साथ लिंग की पूजा करके —
श्लोक 32 (shiva.kailasa.9.32)
गृह्णीयादर्चयिष्यामि शिवमाप्राणसङ्क्षयम् । एवं त्रिवारमुच्चार्य शपथं गुरुसन्निधौ
gṛhṇīyādarcayiṣyāmi śivamāprāṇasaṅkṣayam | evaṁ trivāramuccārya śapathaṁ gurusannidhau
"मैं शिव की पूजा प्राणान्त तक करूँगा" — गुरु की उपस्थिति में तीन बार इस प्रतिज्ञा-वचन का उच्चारण करके ग्रहण करे।
श्लोक 33 (shiva.kailasa.9.33)
ततः समर्चयेन्नित्यं पूर्वोक्तविधिना प्रिये । अर्घं समर्पयेल्लिङ्गमूर्द्धन्यर्घ्योदकेन च
tataḥ samarcayennityaṁ pūrvoktavidhinā priye | arghaṁ samarpayelliṅgamūrddhanyarghyodakena ca
हे प्रिये! फिर पूर्वोक्त विधि से नित्य पूजा करे, तथा लिंग के मस्तक पर अर्घ्योदक से अर्घ्य समर्पित करे।
श्लोक 34 (shiva.kailasa.9.34)
प्रणवेन समभ्यर्च्य धूपदीपौ समर्पयेत् । ऐशान्यां चण्डमाराध्य निर्माल्यं च निवेदयेत्
praṇavena samabhyarcya dhūpadīpau samarpayet | aiśānyāṁ caṇḍamārādhya nirmālyaṁ ca nivedayet
प्रणव से पूजा करके धूप-दीप समर्पित करे; ईशान दिशा में चण्ड की आराधना करके निर्माल्य निवेदित करे।
श्लोक 35 (shiva.kailasa.9.35)
प्रक्षाल्य लिङ्गं वेदीं च वस्त्रपूतैर्जलैस्ततः । निःक्षिप्य पुष्पं शिरसि लिङ्गस्य प्रणवेन तु
prakṣālya liṅgaṁ vedīṁ ca vastrapūtairjalaistataḥ | niḥkṣipya puṣpaṁ śirasi liṅgasya praṇavena tu
फिर वस्त्र से पवित्र किए गए जल से लिंग और वेदी को धोकर, प्रणव के साथ लिंग के शिर पर पुष्प रखकर —
श्लोक 36 (shiva.kailasa.9.36)
आधारशक्तिमारभ्य शुद्धविद्यासनावधि । विभाव्य सर्वं मनसा स्थापयेत्परमेश्वरम्
ādhāraśaktimārabhya śuddhavidyāsanāvadhi | vibhāvya sarvaṁ manasā sthāpayetparameśvaram
आधारशक्ति से लेकर शुद्धविद्या-आसन तक सबका मन से ध्यान करके परमेश्वर की स्थापना करे।
श्लोक 37 (shiva.kailasa.9.37)
पञ्चगव्यादिभिर्द्रव्यैर्यथाविभवसम्भृतैः । केवलैर्वा जलैः शुद्धैः सुरभिद्रव्यवासितैः
pañcagavyādibhirdravyairyathāvibhavasambhṛtaiḥ | kevalairvā jalaiḥ śuddhaiḥ surabhidravyavāsitaiḥ
यथाशक्ति संगृहीत पञ्चगव्य आदि द्रव्यों से, अथवा केवल सुगन्धित द्रव्यों से वासित शुद्ध जल से —
श्लोक 38 (shiva.kailasa.9.38)
पावमानेन रुद्रेण नीलेन त्वरितेन च । ऋग्भिश्च सामभिर्वापि ब्रह्मभिश्चैव पञ्चभिः
pāvamānena rudreṇa nīlena tvaritena ca | ṛgbhiśca sāmabhirvāpi brahmabhiścaiva pañcabhiḥ
पावमान, रुद्र, नील और त्वरित सूक्तों से, अथवा ऋचाओं या साम-मन्त्रों से, अथवा पाँच ब्रह्म-मन्त्रों से —
श्लोक 39 (shiva.kailasa.9.39)
स्नापयेद्देवदेवेशं प्रणवेन शिवेन च । विशेषार्घ्योदकेनापि प्रणवेनाभिषेचयेत्
snāpayeddevadeveśaṁ praṇavena śivena ca | viśeṣārghyodakenāpi praṇavenābhiṣecayet
देवदेवेश को प्रणव तथा "शिवेन" मन्त्र से स्नान कराए, तथा विशेष अर्घ्योदक से भी प्रणव द्वारा अभिषेक करे।
श्लोक 40 (shiva.kailasa.9.40)
विशोध्य वाससा पुष्पं लिङ्गमूर्धनि विन्यसेत् । पीठे लिङ्गं समारोप्य सूर्याद्यर्चां समाचरेत्
viśodhya vāsasā puṣpaṁ liṅgamūrdhani vinyaset | pīṭhe liṅgaṁ samāropya sūryādyarcāṁ samācaret
वस्त्र से पोंछकर लिंग के मस्तक पर पुष्प रखे; लिंग को पीठ पर आरोपित करके सूर्य आदि की पूजा करे।
श्लोक 41 (shiva.kailasa.9.41)
आधारशक्त्यनन्तौ द्वौ पीठाधस्तात्समर्चयेत् । सिंहासनं तदूर्ध्वं तु समभ्यर्च्य यथाक्रमम्
ādhāraśaktyanantau dvau pīṭhādhastātsamarcayet | siṁhāsanaṁ tadūrdhvaṁ tu samabhyarcya yathākramam
पीठ के नीचे आधारशक्ति और अनन्त दोनों की पूजा करे, तथा उसके ऊपर सिंहासन की यथाक्रम पूजा करे।
श्लोक 42 (shiva.kailasa.9.42)
अथोर्ध्वच्छदनम्पीठपादे स्कन्दं समर्चयेत् । लिङ्गे मूर्तिं समाकल्प्य मां त्वया सह पूजयेत्
athordhvacchadanampīṭhapāde skandaṁ samarcayet | liṅge mūrtiṁ samākalpya māṁ tvayā saha pūjayet
फिर ऊर्ध्व-छादन में पीठ के पाद में स्कन्द की पूजा करे; लिंग पर मूर्ति की कल्पना करके तुम्हारे साथ मेरी पूजा करे।
श्लोक 43 (shiva.kailasa.9.43)
सम्यग् भक्त्या विधानेन यतिर्मद्ध्यानतत्परः । एवं मया ते कथितमतिगुह्यमिदं प्रिये
samyag bhaktyā vidhānena yatirmaddhyānatatparaḥ | evaṁ mayā te kathitamatiguhyamidaṁ priye
इस प्रकार भली-भाँति भक्ति और विधान से मेरे ध्यान में तत्पर यति को पूजा करनी चाहिए। हे प्रिये! इस प्रकार यह अत्यन्त गुह्य विषय मैंने तुमसे कहा।
श्लोक 44 (shiva.kailasa.9.44)
गोपनीयं प्रयत्नेन न देयं यस्य कस्यचित् । मम भक्ताय दातव्यं यतये वीतरागिणे
gopanīyaṁ prayatnena na deyaṁ yasya kasyacit | mama bhaktāya dātavyaṁ yataye vītarāgiṇe
यह प्रयत्नपूर्वक गोपनीय रखने योग्य है, यह जिस-किसी को नहीं देना चाहिए; यह केवल मेरे भक्त को, वीतराग यति को देने योग्य है —
श्लोक 45 (shiva.kailasa.9.45)
गुरुभक्ताय शान्ताय मदर्थे योगभागिने । ममाज्ञामतिलङ्घ्यैतद्यो ददाति विमूढधीः
gurubhaktāya śāntāya madarthe yogabhāgine | mamājñāmatilaṅghyaitadyo dadāti vimūḍhadhīḥ
गुरुभक्त, शान्त तथा मेरे लिए योग में लगे हुए को। जो मूढ़बुद्धि मेरी आज्ञा का उल्लंघन करके इसे [अपात्र को] देता है —
श्लोक 46 (shiva.kailasa.9.46)
स नारकी मम द्रोही भविष्यति न संशयः । मद्भक्तदानाद्देवेशि मत्प्रियश्च भवेद् ध्रुवम् । इह भुक्त्वाखिलान्भोगान्मत्सान्निध्यमवाप्नुयात्
sa nārakī mama drohī bhaviṣyati na saṁśayaḥ | madbhaktadānāddeveśi matpriyaśca bhaved dhruvam | iha bhuktvākhilānbhogānmatsānnidhyamavāpnuyāt
वह निश्चय ही नारकी और मेरा द्रोही होगा। हे देवेशि! किन्तु मेरे भक्त को देने से वह निश्चय ही मेरा प्रिय हो जाएगा; इस लोक में समस्त भोगों को भोगकर वह मेरा सान्निध्य प्राप्त करेगा।
श्लोक 47 (shiva.kailasa.9.47)
व्यास उवाच । एतच्छ्रुत्वा महादेवी महादेवेन भाषितम् । स्तुत्वा तु विविधैः स्तोत्रैर्देवं वेदार्थगर्भितैः
vyāsa uvāca | etacchrutvā mahādevī mahādevena bhāṣitam | stutvā tu vividhaiḥ stotrairdevaṁ vedārthagarbhitaiḥ
व्यास ने कहा — महादेव द्वारा कहे गए इस वचन को सुनकर महादेवी ने वेदार्थ से पूर्ण विविध स्तोत्रों से स्तुति करके —
श्लोक 48 (shiva.kailasa.9.48)
श्रीमत्पादाब्जयोः पत्युः प्रणामं परमेश्वरी । अतिप्रहृष्टहृदया मुमोद मुनिसत्तमाः
śrīmatpādābjayoḥ patyuḥ praṇāmaṁ parameśvarī | atiprahṛṣṭahṛdayā mumoda munisattamāḥ
परमेश्वरी ने अपने श्रीमान् पति के चरणकमलों में प्रणाम किया; हे मुनिश्रेष्ठो! वे अत्यन्त प्रसन्न हृदय से आनन्दित हुईं।
श्लोक 49 (shiva.kailasa.9.49)
अतिगुह्यमिदं विप्राः प्रणवार्थप्रकाशकम् । शिवज्ञानपरं ह्येतद्भवतामार्तिनाशनम्
atiguhyamidaṁ viprāḥ praṇavārthaprakāśakam | śivajñānaparaṁ hyetadbhavatāmārtināśanam
हे विप्रो! प्रणव के अर्थ को प्रकाशित करने वाला यह अत्यन्त गुह्य विषय शिवज्ञान में परम है और तुम्हारी पीड़ा का नाशक है।
श्लोक 50 (shiva.kailasa.9.50)
सूत उवाच । इत्युक्त्वा मुनिशार्दूलः पाराशर्यो महातपाः । पूजितः परया भक्त्या मुनिभिर्वेदवादिभिः
sūta uvāca | ityuktvā muniśārdūlaḥ pārāśaryo mahātapāḥ | pūjitaḥ parayā bhaktyā munibhirvedavādibhiḥ
सूत ने कहा — ऐसा कहकर महातपस्वी मुनिश्रेष्ठ पाराशर्य [व्यास], वेदवादी मुनियों द्वारा परम भक्ति से पूजित होकर —
श्लोक 51 (shiva.kailasa.9.51)
कैलासाद्रिमनुस्मृत्य ययौ तस्मात्तपोवनात् । तेऽपि प्रहृष्टहृदयाः सत्रान्ते परमेश्वरम्
kailāsādrimanusmṛtya yayau tasmāttapovanāt | te'pi prahṛṣṭahṛdayāḥ satrānte parameśvaram
कैलास पर्वत का स्मरण करके उस तपोवन से चले गए; वे मुनि भी अत्यन्त प्रसन्न हृदय से, सत्र के अन्त में परमेश्वर —
श्लोक 52 (shiva.kailasa.9.52)
सम्पूज्य परया भक्त्या सोमं सोमार्धशेखरम् । यमादियोगनिरताः शिवध्यानपराभवन्
sampūjya parayā bhaktyā somaṁ somārdhaśekharam | yamādiyoganiratāḥ śivadhyānaparābhavan
सोमार्धशेखर [चन्द्रकला-धारी] सोम की परम भक्ति से पूजा करके, यम आदि योग में निरत होकर शिव के ध्यान में लीन हो गए।
श्लोक 53 (shiva.kailasa.9.53)
गुहाय कथितं ह्येतद्देव्या तेनापि नन्दिने । सनत्कुमारमुनये प्रोवाच भगवान् हि सः
guhāya kathitaṁ hyetaddevyā tenāpi nandine | sanatkumāramunaye provāca bhagavān hi saḥ
यह देवी द्वारा गुह [स्कन्द] को कहा गया, उसके द्वारा नन्दी को; और उन भगवान् [नन्दी] ने सनत्कुमार मुनि से कहा।
श्लोक 54 (shiva.kailasa.9.54)
तस्माल्लब्धं मद्गुरुणा व्यासेनामिततेजसा । तस्माल्लब्धमिदं पुण्यं मयापि मुनिपुङ्गवाः
tasmāllabdhaṁ madguruṇā vyāsenāmitatejasā | tasmāllabdhamidaṁ puṇyaṁ mayāpi munipuṅgavāḥ
उनसे यह मेरे गुरु अमित तेजस्वी व्यास ने प्राप्त किया; हे मुनिश्रेष्ठो! उन्हीं से मैंने भी यह पुण्य [ज्ञान] प्राप्त किया।
श्लोक 55 (shiva.kailasa.9.55)
मया वः श्रावितं ह्येतद् गुह्याद् गुह्यतरं परम् । ज्ञात्वा शिवप्रियान्भक्त्या भवतो गिरिशप्रियम्
mayā vaḥ śrāvitaṁ hyetad guhyād guhyataraṁ param | jñātvā śivapriyānbhaktyā bhavato giriśapriyam
यह गुह्य से भी परम गुह्यतर [ज्ञान] मैंने तुम्हें सुनाया है, यह जानकर कि तुम भक्ति से शिव के प्रिय, गिरीश के प्रिय हो।
श्लोक 56 (shiva.kailasa.9.56)
भवद्भिरपि दातव्यमेतद् गुह्यं शिवप्रियम् । यतिभ्यः शान्तचित्तेभ्यो भक्तेभ्यः शिवपादयोः
bhavadbhirapi dātavyametad guhyaṁ śivapriyam | yatibhyaḥ śāntacittebhyo bhaktebhyaḥ śivapādayoḥ
तुम्हें भी यह शिव-प्रिय गुह्य [ज्ञान] शान्तचित्त यतियों को, शिव के चरणों के भक्तों को देना चाहिए।
श्लोक 57 (shiva.kailasa.9.57)
एतदुक्त्वा महाभागः सूतः पौराणिकोत्तमः । तीर्थयात्राप्रसङ्गेन चचार पृथिवीमिमाम्
etaduktvā mahābhāgaḥ sūtaḥ paurāṇikottamaḥ | tīrthayātrāprasaṅgena cacāra pṛthivīmimām
यह कहकर महाभाग सूत, जो पुराणकथकों में श्रेष्ठ थे, तीर्थयात्रा के प्रसंग से इस पृथ्वी पर विचरण करने लगे।
श्लोक 58 (shiva.kailasa.9.58)
एतद्रहस्यं परमं लब्ध्वा सूतान्मुनीश्वराः । काश्यामेव समासीना मुक्ताः शिवपदं ययुः
etadrahasyaṁ paramaṁ labdhvā sūtānmunīśvarāḥ | kāśyāmeva samāsīnā muktāḥ śivapadaṁ yayuḥ
सूत से यह परम रहस्य प्राप्त करके मुनीश्वर काशी में ही स्थित होकर मुक्त हुए और शिवपद को प्राप्त हुए।