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वायवीय संहिता · अध्याय 16

देवी की शक्ति का उद्भव

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.16.1)

वायुरुवाच । अथ देवो महादेवो महाजलदनादया । वाचा मधुरगम्भीरशिवदश्लक्ष्णवर्णया

vāyuruvāca | atha devo mahādevo mahājaladanādayā | vācā madhuragambhīraśivadaślakṣṇavarṇayā

वायु ने कहा -- तब देव महादेव ने, महामेघ की गर्जना के समान, मधुर-गम्भीर, मंगलमय, सुस्पष्ट उच्चारण वाली वाणी में,

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.16.2)

अर्थसम्पन्नपदया राजलक्षणयुक्तया । अशेषविषयारम्भरक्षाविमलयदक्षया

arthasampannapadayā rājalakṣaṇayuktayā | aśeṣaviṣayārambharakṣāvimalayadakṣayā

-- अर्थ से परिपूर्ण, राजोचित लक्षणों से युक्त, समस्त विषयों को आरम्भ करने और उनकी रक्षा करने में निपुण एवं निर्मल वाणी में,

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.16.3)

मनोहरतरोदारमधुरस्मितपूर्वया । सम्बभाषेसुसम्प्रीतो विश्वकर्माणमीश्वरः

manoharatarodāramadhurasmitapūrvayā | sambabhāṣesusamprīto viśvakarmāṇamīśvaraḥ

-- तथा अत्यन्त मनोहर, उदार, मधुर मुस्कान से युक्त होकर, ईश्वर ने अत्यन्त प्रसन्न होकर विश्वकर्मा ब्रह्मा से बात की।

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.16.4)

ईश्वर उवाच । वत्स वत्स महाभाग मम पुत्र पितामह । ज्ञातमेव मया सर्वं तव वाक्यस्य गौरवम्

īśvara uvāca | vatsa vatsa mahābhāga mama putra pitāmaha | jñātameva mayā sarvaṁ tava vākyasya gauravam

ईश्वर ने कहा -- 'हे वत्स, वत्स, महाभाग्यशाली मेरे पुत्र पितामह! मैंने तुम्हारे वचन का सारा महत्त्व जान लिया है।'

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.16.5)

प्रजानामेव वृद्ध्यर्थं तपस्तप्तं त्वयाधुना । तपसानेन तुष्टोऽस्मि ददामि च तवेप्सितम्

prajānāmeva vṛddhyarthaṁ tapastaptaṁ tvayādhunā | tapasānena tuṣṭo'smi dadāmi ca tavepsitam

'तुमने अभी जो तप किया, वह केवल प्रजा की वृद्धि के लिए किया। इस तप से मैं प्रसन्न हूँ, और तुम्हें अभीष्ट वस्तु प्रदान करता हूँ।'

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.16.6)

इत्युक्त्वा परमोदारं स्वभावमधुरं वचः । ससर्ज वपुषो भागाद्देवीं देववरो हरः

ityuktvā paramodāraṁ svabhāvamadhuraṁ vacaḥ | sasarja vapuṣo bhāgāddevīṁ devavaro haraḥ

इस प्रकार अत्यन्त उदार, स्वभाव से मधुर वचन कहकर देवश्रेष्ठ हर ने अपने शरीर के एक भाग से देवी को उत्पन्न किया,

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.16.7)

यामाहुर्ब्रह्मविद्वांसो देवीं दिव्यगुणान्विताम् । परस्य परमां शक्तिं भवस्य परमात्मनः

yāmāhurbrahmavidvāṁso devīṁ divyaguṇānvitām | parasya paramāṁ śaktiṁ bhavasya paramātmanaḥ

-- जिन्हें ब्रह्मविद् विद्वान् दिव्य गुणों से युक्त देवी कहते हैं, जो परे स्थित परमात्मा भव की परम शक्ति हैं,

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.16.8)

यस्यां न खलु विद्यन्ते जन्ममृत्युजरादयः । या भवानी भवस्याङ्गात्समाविरभवत्किल

yasyāṁ na khalu vidyante janmamṛtyujarādayaḥ | yā bhavānī bhavasyāṅgātsamāvirabhavatkila

-- जिनमें जन्म, मृत्यु, जरा आदि कुछ भी नहीं है; जो भवानी भव के अंग से प्रत्यक्ष प्रकट हुईं,

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.16.9)

यस्या वाचो निवर्तन्ते मनसा चेन्द्रियैः सह । सा भर्तुर्वपुषो भागाज्जातेव समदृश्यत

yasyā vāco nivartante manasā cendriyaiḥ saha | sā bharturvapuṣo bhāgājjāteva samadṛśyata

-- जिनसे वाणी मन और इन्द्रियों सहित लौट आती है, वे मानो अपने पति के शरीर के एक भाग से उत्पन्न हुई-सी दिखाई दीं,

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.16.10)

या सा जगदिदं कृत्स्नं महिम्ना व्याप्य तिष्ठति । शरीरिणीव स देवी विचित्रं समलक्ष्यत

yā sā jagadidaṁ kṛtsnaṁ mahimnā vyāpya tiṣṭhati | śarīriṇīva sa devī vicitraṁ samalakṣyata

-- जो अपनी महिमा से इस सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त होकर स्थित रहती हैं, वह देवी मानो शरीरधारिणी के रूप में विचित्र दिखाई दीं।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.16.11)

सर्वं जगदिदं चैषा सम्मोहयति मायया । ईश्वरात्सैव जाताऽभूदजाता परमार्थतः

sarvaṁ jagadidaṁ caiṣā sammohayati māyayā | īśvarātsaiva jātā'bhūdajātā paramārthataḥ

यह देवी अपनी माया से इस सम्पूर्ण जगत् को मोहित कर देती हैं; वे ईश्वर से उत्पन्न हुई प्रतीत होकर भी, वास्तव में अजन्मा हैं।

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.16.12)

न यस्याः परमो भावः सुराणामपि गोचरः । विश्वामरेश्वरी चैव विभक्ता भर्तुरङ्गतः

na yasyāḥ paramo bhāvaḥ surāṇāmapi gocaraḥ | viśvāmareśvarī caiva vibhaktā bharturaṅgataḥ

जिनका परम भाव देवताओं की भी पहुँच से परे है, वह विश्व के देवताओं की स्वामिनी अपने पति के शरीर से पृथक् हो गईं।

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.16.13)

तां दृष्ट्वा परमेशानीं सर्वलोकमहेश्वरीम् । सर्वज्ञां सर्वगां सूक्ष्मां सदसद्व्यक्तिवर्जिताम्

tāṁ dṛṣṭvā parameśānīṁ sarvalokamaheśvarīm | sarvajñāṁ sarvagāṁ sūkṣmāṁ sadasadvyaktivarjitām

उन परमेश्वरी, सम्पूर्ण लोकों की महेश्वरी, सर्वज्ञ, सर्वव्यापी, सूक्ष्म, सत्-असत् की प्रकट अवस्था से रहित देवी को देखकर,

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.16.14)

परमां निखिलं भासा भासयन्तीमिदं जगत् । प्रणिपत्य महादेवीं प्रार्थयामास वै विराट्

paramāṁ nikhilaṁ bhāsā bhāsayantīmidaṁ jagat | praṇipatya mahādevīṁ prārthayāmāsa vai virāṭ

-- परम, अपनी ही प्रभा से इस सम्पूर्ण जगत् को प्रकाशित करने वाली महादेवी के सम्मुख विराट् ब्रह्मा ने साष्टांग प्रणाम करके यह प्रार्थना की --

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.16.15)

ब्रह्मोवाच । देवि देवेन सृष्टोऽहमादौ सर्वजगन्मयि । प्रजासर्गे नियुक्तश्च सृजामि सकलं जगत्

brahmovāca | devi devena sṛṣṭo'hamādau sarvajaganmayi | prajāsarge niyuktaśca sṛjāmi sakalaṁ jagat

ब्रह्मा ने कहा -- 'हे देवी, हे सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त! मैं आरम्भ में देव द्वारा उत्पन्न किया गया, और प्रजा-सृष्टि में नियुक्त होकर सम्पूर्ण जगत् की रचना करता हूँ।'

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.16.16)

मनसा निर्मिताः सर्वे देवि देवादयो मया । न वृद्धिमुपगच्छन्ति सृज्यमानाः पुनः पुनः

manasā nirmitāḥ sarve devi devādayo mayā | na vṛddhimupagacchanti sṛjyamānāḥ punaḥ punaḥ

'हे देवी, मेरे द्वारा मन से रचे गए देव आदि सभी बार-बार उत्पन्न किए जाने पर भी वृद्धि को प्राप्त नहीं होते।'

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.16.17)

मिथुनप्रभवामेव कृत्वा सृष्टिमतः परम् । संवर्धयितुमिच्छामि सर्वा एव मम प्रजाः

mithunaprabhavāmeva kṛtvā sṛṣṭimataḥ param | saṁvardhayitumicchāmi sarvā eva mama prajāḥ

'इसलिए अब मैं केवल मैथुन से उत्पन्न होने वाली सृष्टि करके अपनी सभी प्रजाओं को बढ़ाना चाहता हूँ।'

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.16.18)

न निर्गतं पुरा त्वत्तो नारीणां कुलमव्ययम् । तेन नारीकुलं स्रष्टुं शक्तिर्मम न विद्यते

na nirgataṁ purā tvatto nārīṇāṁ kulamavyayam | tena nārīkulaṁ sraṣṭuṁ śaktirmama na vidyate

'परन्तु चूँकि आपसे अभी तक नारियों का अविनाशी कुल प्रकट नहीं हुआ है, इसलिए मुझमें नारी-कुल उत्पन्न करने की शक्ति नहीं है।'

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.16.19)

सर्वासामेव शक्तीनां त्वत्तः खलु समुद्भवः । तस्मात्सर्वत्र सर्वेषां सर्वशक्तिप्रदायिनीम्

sarvāsāmeva śaktīnāṁ tvattaḥ khalu samudbhavaḥ | tasmātsarvatra sarveṣāṁ sarvaśaktipradāyinīm

'सभी शक्तियों की उत्पत्ति निश्चय ही आपसे होती है। इसलिए सर्वत्र, सबको सर्व-शक्ति प्रदान करने वाली --'

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.16.20)

त्वामेव वरदां मायां प्रार्थयामि सुरेश्वरीम् । चराचरविवृद्ध्यर्थमंशेनैकेन सर्वगे

tvāmeva varadāṁ māyāṁ prārthayāmi sureśvarīm | carācaravivṛddhyarthamaṁśenaikena sarvage

'-- हे वरदायिनी माया, हे सुरेश्वरी, आपसे ही मैं प्रार्थना करता हूँ -- हे सर्वव्यापिनी, चराचर की वृद्धि के लिए अपने एक अंश से --'

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.16.21)

दक्षस्य मम पुत्रस्य पुत्री भव भवार्दिनि । एवं सा याचिता देवी ब्रह्मणा ब्रह्मयोनिना

dakṣasya mama putrasya putrī bhava bhavārdini | evaṁ sā yācitā devī brahmaṇā brahmayoninā

'-- हे भव-पीड़ा-हारिणी, मेरे पुत्र दक्ष की पुत्री बन जाइए।' इस प्रकार ब्रह्मयोनि ब्रह्मा द्वारा प्रार्थना किए जाने पर, उस देवी ने --

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.16.22)

शक्तिमेकां भ्रुवोर्मध्यात् ससर्जात्मसमप्रभाम् । तामाह प्रहसन् प्रेक्ष्य देवदेववरो हरः

śaktimekāṁ bhruvormadhyāt sasarjātmasamaprabhām | tāmāha prahasan prekṣya devadevavaro haraḥ

-- अपनी भौंहों के मध्य से अपने ही समान तेजस्वी एक शक्ति को उत्पन्न किया। उसे देखकर देवाधिदेवश्रेष्ठ हर ने हँसते हुए कहा --

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.16.23)

ब्रह्माणं तपसाराध्य कुरु तस्य यथेप्सितम् । तामाज्ञां परमेशस्य शिरसा प्रतिगृह्य सा

brahmāṇaṁ tapasārādhya kuru tasya yathepsitam | tāmājñāṁ parameśasya śirasā pratigṛhya sā

'ब्रह्मा ने तप से तुम्हें प्रसन्न किया है, उनके लिए वही करो जो वे चाहते हैं।' परमेश्वर की उस आज्ञा को सिर झुकाकर स्वीकार करके उसने --

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.16.24)

ब्रह्मणो वचनाद्देवी दक्षस्य दुहिताऽभवत् । दत्त्वैवमतुलां शक्तिं ब्रह्मणे ब्रह्मरूपिणीम्

brahmaṇo vacanāddevī dakṣasya duhitā'bhavat | dattvaivamatulāṁ śaktiṁ brahmaṇe brahmarūpiṇīm

-- ब्रह्मा के वचन से देवी दक्ष की पुत्री बनीं। इस प्रकार उस अनुपम, ब्रह्मरूपिणी शक्ति को ब्रह्मा को प्रदान करके,

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.16.25)

विवेश देहं देवस्य देवश्चान्तरधीयत । तदाप्रभृति लोकेऽस्मिन् स्त्रियां भोगः प्रतिष्ठितः

viveśa dehaṁ devasya devaścāntaradhīyata | tadāprabhṛti loke'smin striyāṁ bhogaḥ pratiṣṭhitaḥ

वह देव के शरीर में प्रविष्ट हो गई, और देव अन्तर्धान हो गए। उसी समय से इस लोक में स्त्री में भोग-सामर्थ्य प्रतिष्ठित हुआ,

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.16.26)

प्रजासृष्टिश्च विप्रेन्द्रा मैथुनेन प्रवर्तते । ब्रह्मापि प्राप सानन्दं सन्तोषं मुनिपुङ्गवाः

prajāsṛṣṭiśca viprendrā maithunena pravartate | brahmāpi prāpa sānandaṁ santoṣaṁ munipuṅgavāḥ

और हे विप्रेन्द्रो, तभी से मैथुन द्वारा प्रजा की सृष्टि चलने लगी। हे मुनिश्रेष्ठो, ब्रह्मा को भी इससे आनन्दमय सन्तोष प्राप्त हुआ।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.16.27)

एतद्वः सर्वमाख्यातं देव्याः शक्तिसमुद्भवम् । पुण्यवृद्धिकरं श्राव्यं भूतसर्गानुषङ्गतः

etadvaḥ sarvamākhyātaṁ devyāḥ śaktisamudbhavam | puṇyavṛddhikaraṁ śrāvyaṁ bhūtasargānuṣaṅgataḥ

यह सब मैंने तुम्हें बताया -- देवी की शक्ति की उत्पत्ति की यह कथा, जो पुण्य बढ़ाने वाली, सुनने योग्य, तथा प्राणियों की सृष्टि से जुड़ी हुई है।

श्लोक 28 (shiva.vayaviya.16.28)

य इदं कीर्तयेन्नित्यं देव्याः शक्तिसमुद्भवम् । पुण्यं सर्वमवाप्नोति पुत्रांश्च लभते शुभान्

ya idaṁ kīrtayennityaṁ devyāḥ śaktisamudbhavam | puṇyaṁ sarvamavāpnoti putrāṁśca labhate śubhān

जो कोई भी देवी की शक्ति की इस उत्पत्ति-कथा का नित्य कीर्तन करता है, वह सम्पूर्ण पुण्य प्राप्त करता है, तथा शुभ पुत्रों को पाता है।

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