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वायवीय संहिता · अध्याय 18

सती का देहत्याग

अध्याय 17अध्याय-सूचीअध्याय 19

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.18.1)

ऋषय ऊचुः । देवी दक्षस्य तनया त्यक्त्वा दाक्षायणीं तनुम् । कथं हिमवतः पुत्री मेनायामभवत्पुरा

ṛṣaya ūcuḥ | devī dakṣasya tanayā tyaktvā dākṣāyaṇīṁ tanum | kathaṁ himavataḥ putrī menāyāmabhavatpurā

ऋषियों ने कहा — देवी, जो दक्ष की पुत्री थी, अपना दाक्षायणी शरीर त्यागकर, हे मरुत्! पूर्वकाल में हिमवान् की पुत्री के रूप में मेना के गर्भ से कैसे उत्पन्न हुई?

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.18.2)

कथं च निन्दितो रुद्रो दक्षेण च महात्मना । निमित्तमपि किं तत्र येन स्यान्निन्दितो भवः

kathaṁ ca nindito rudro dakṣeṇa ca mahātmanā | nimittamapi kiṁ tatra yena syānnindito bhavaḥ

और महात्मा दक्ष के द्वारा रुद्र की निन्दा कैसे हुई? उसमें ऐसा कौन-सा कारण था, जिससे शिव की निन्दा हुई?

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.18.3)

उत्पन्नश्च कथं दक्षो ह्यभिशापाद्भवस्य तु । चाक्षुषस्यान्तरे पूर्वं मनोः प्रब्रूहि मारुत

utpannaśca kathaṁ dakṣo hyabhiśāpādbhavasya tu | cākṣuṣasyāntare pūrvaṁ manoḥ prabrūhi māruta

और शिव के शाप से दक्ष पूर्वकाल में चाक्षुष मन्वन्तर में कैसे उत्पन्न हुआ? हे मरुत्! यह सब कहिए।

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.18.4)

वायुरुवाव शृण्वन्तु कथयिष्यामि दक्षस्य लघुचेतसः । वृत्तं पापात् प्रमादाच्च विश्वामरविदूषणम्

vāyuruvāva śṛṇvantu kathayiṣyāmi dakṣasya laghucetasaḥ | vṛttaṁ pāpāt pramādācca viśvāmaravidūṣaṇam

वायु ने कहा — सुनो, मैं क्षुद्रचित्त दक्ष के उस पापपूर्ण और प्रमादवश हुए वृत्तान्त को कहूँगा, जिसमें उसने समस्त देवताओं को दूषित किया था।

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.18.5)

पुरा सुरासुराः सर्वे सिद्धाश्च परमर्षयः । कदाचिद् द्रष्टुमीशानं हिमवच्छिखरं ययुः

purā surāsurāḥ sarve siddhāśca paramarṣayaḥ | kadācid draṣṭumīśānaṁ himavacchikharaṁ yayuḥ

पूर्वकाल में एक बार सभी सुर, असुर, सिद्ध और परम ऋषिगण ईशान (शिव) के दर्शन के लिए हिमालय के शिखर पर गए।

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.18.6)

तदा देवश्च देवी च दिव्यासनगतावुभौ । दर्शनं ददतुस्तेषां देवादीनां द्विजोत्तमाः

tadā devaśca devī ca divyāsanagatāvubhau | darśanaṁ dadatusteṣāṁ devādīnāṁ dvijottamāḥ

हे द्विजोत्तमो! उस समय दिव्य आसन पर विराजमान देव और देवी दोनों ने उन देवादिकों को दर्शन दिया।

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.18.7)

तदानीमेव दक्षोऽपि गतस्तत्र सहामरैः । जामातरं हरं द्रष्टुं देवीं चात्मसुतां सतीम्

tadānīmeva dakṣo'pi gatastatra sahāmaraiḥ | jāmātaraṁ haraṁ draṣṭuṁ devīṁ cātmasutāṁ satīm

उसी समय दक्ष भी देवताओं के साथ वहाँ अपने जामाता हर तथा अपनी पुत्री देवी सती के दर्शन के लिए गया।

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.18.8)

तदात्मगौरवाद्देवो देव्या दक्षे समागते । देवादिभ्यो विशेषेण न कदाचिदभूत्स्मृतिः

tadātmagauravāddevo devyā dakṣe samāgate | devādibhyo viśeṣeṇa na kadācidabhūtsmṛtiḥ

तब देवी के आगमन पर, अपने गौरव के कारण, देव को दक्ष के प्रति देवताओं आदि से विशेष कोई आदर कभी नहीं हुआ।

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.18.9)

तस्य तस्याः परं भावमज्ञातुश्चापि केवलम् । पुत्रीत्येवं विमूढस्य तस्यां वैरमजायत

tasya tasyāḥ paraṁ bhāvamajñātuścāpi kevalam | putrītyevaṁ vimūḍhasya tasyāṁ vairamajāyata

उनके सर्वोच्च स्वरूप को न जानते हुए, केवल "यह मेरी पुत्री है" — ऐसा मानने वाले मूढ़ दक्ष के मन में उनके प्रति वैर उत्पन्न हो गया।

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.18.10)

ततस्तेनैव वैरेण विधिना च प्रचोदितः । नाजुवाह भवं दक्षो दीक्षितस्तामपि द्विषन्

tatastenaiva vaireṇa vidhinā ca pracoditaḥ | nājuvāha bhavaṁ dakṣo dīkṣitastāmapi dviṣan

तत्पश्चात् उसी वैर से और विधि से प्रेरित होकर, दक्ष ने भव (शिव) को आदरपूर्वक आमंत्रित नहीं किया; अपने यज्ञ में दीक्षित होकर उस देवी से भी द्वेष करने लगा।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.18.11)

अन्याञ्जामातरः सर्वानाहूय स यथाक्रमम् । शतशः पुष्कलामर्चाञ्चकार च पृथक् पृथक्

anyāñjāmātaraḥ sarvānāhūya sa yathākramam | śataśaḥ puṣkalāmarcāñcakāra ca pṛthak pṛthak

उसने अपने अन्य सभी जामाताओं को यथाक्रम बुलाकर, प्रत्येक की सैकड़ों प्रकार से पृथक्-पृथक् समृद्ध पूजा की।

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.18.12)

तथा तान्सङ्गतान् श्रुत्वा नारदस्य मुखात्तदा । ययौ रुद्राय रुद्राणी विज्ञाप्य भवनं पितुः

tathā tānsaṅgatān śrutvā nāradasya mukhāttadā | yayau rudrāya rudrāṇī vijñāpya bhavanaṁ pituḥ

तब नारद के मुख से उन सबके एकत्रित होने की बात सुनकर, रुद्राणी (सती) ने रुद्र से निवेदन कर अपने पिता के भवन जाने की अनुमति ली।

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.18.13)

अथ सन्निहितं दिव्यं विमानं विश्वतोमुखम् । लक्षणाढ्यं सुखारोहमतिमात्रं मनोहरम्

atha sannihitaṁ divyaṁ vimānaṁ viśvatomukham | lakṣaṇāḍhyaṁ sukhārohamatimātraṁ manoharam

तब समीप उपस्थित हुआ वह दिव्य विमान, जो चारों ओर मुख वाला, शुभ लक्षणों से युक्त, सुखपूर्वक आरोहण योग्य और अत्यन्त मनोहर था।

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.18.14)

तप्तजाम्बूनदप्रख्यं चित्ररत्नपरिष्कृतम् । मुक्तामयवितानाग्न्यं स्रग्दामसमलङ्कृतम्

taptajāmbūnadaprakhyaṁ citraratnapariṣkṛtam | muktāmayavitānāgnyaṁ sragdāmasamalaṅkṛtam

वह तपाए हुए स्वर्ण के समान दीप्तिमान्, विचित्र रत्नों से सुसज्जित, मोतियों से बने चंदोवे और अग्रभाग वाला, तथा माला-दामों से अलंकृत था।

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.18.15)

तप्तकञ्चननिर्व्यूहं रत्नस्तम्भशतावृतम् । वज्रकल्पितसोपानं विद्रुमस्तम्भतोरणम्

taptakañcananirvyūhaṁ ratnastambhaśatāvṛtam | vajrakalpitasopānaṁ vidrumastambhatoraṇam

उसकी बाहरी संरचना तपे हुए सोने की थी, वह सैकड़ों रत्नजड़ित स्तम्भों से घिरा था, उसकी सीढ़ियाँ वज्र से बनी थीं, और तोरण मूँगे के स्तम्भों से युक्त था।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.18.16)

पुष्पपट्टपरिस्तीर्णं चित्ररत्नमहासनम् । वज्रजालकिरच्छिद्रमच्छिद्रमणिकुट्टिमम्

puṣpapaṭṭaparistīrṇaṁ citraratnamahāsanam | vajrajālakiracchidramacchidramaṇikuṭṭimam

वह पुष्पों की चादरों से बिछा हुआ था, उसमें विचित्र रत्नों का महान् आसन था, वज्र की जाली से छिद्रयुक्त था, और उसका फर्श निर्दोष मणियों से जड़ा था।

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.18.17)

मणिदण्डमनोज्ञेन महावृषभलक्ष्मणा । अलङ्कृतपुरोभागमभ्रशुभ्रेण केतुना

maṇidaṇḍamanojñena mahāvṛṣabhalakṣmaṇā | alaṅkṛtapurobhāgamabhraśubhreṇa ketunā

मणि के मनोहर दण्ड पर स्थित, विशाल वृषभ के चिह्न वाली, आकाश के समान श्वेत ध्वजा से उसका अग्रभाग अलंकृत था।

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.18.18)

रत्नकञ्चुकगुप्ताङ्गैश्चित्रवेत्रैकपाणिभिः । अधिष्ठितमहाद्वारमप्रधृष्यैर्गणेश्वरैः

ratnakañcukaguptāṅgaiścitravetraikapāṇibhiḥ | adhiṣṭhitamahādvāramapradhṛṣyairgaṇeśvaraiḥ

उसका महाद्वार, रत्नजटित कवचों से ढके अंगों वाले तथा एक हाथ में विचित्र बेंत लिए हुए अजेय गणेश्वरों द्वारा रक्षित था।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.18.19)

मृदङ्गतालगीतादिवेणुवीणाविशारदैः । विदग्धवेषभूषैश्च बहुभिः स्त्रीजनैर्वृतम्

mṛdaṅgatālagītādiveṇuvīṇāviśāradaiḥ | vidagdhaveṣabhūṣaiśca bahubhiḥ strījanairvṛtam

वह मृदंग, ताल, गीत, वेणु और वीणा में निपुण, तथा सुरुचिपूर्ण वेश-भूषा वाली अनेक स्त्रियों से घिरा हुआ था।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.18.20)

आरुरोह महादेवी सह प्रियसखीजनैः । चामारव्यजने तस्या वज्रदण्डमनोहरे

āruroha mahādevī saha priyasakhījanaiḥ | cāmāravyajane tasyā vajradaṇḍamanohare

महादेवी अपनी प्रिय सखियों के साथ उस विमान पर आरूढ़ हुईं; उनके वज्रदण्ड से सुशोभित मनोहर चामरों को —

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.18.21)

गृहीत्वा रुद्रकन्ये द्वे विवीजतुरुभे शुभे । तदा चामरयोर्मध्ये देव्या वदनमाबभौ

gṛhītvā rudrakanye dve vivījaturubhe śubhe | tadā cāmarayormadhye devyā vadanamābabhau

रुद्र की दो शुभ कन्याओं ने ग्रहण कर, दोनों ओर से हिलाया; उस समय दोनों चामरों के मध्य देवी का मुख शोभित हुआ,

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.18.22)

अन्योऽन्यं युध्यतोर्मध्ये हंसयोरिव पङ्कजम् । छत्रं शशिनिभं तस्याश्चूडोपरि सुमालिनी

anyo'nyaṁ yudhyatormadhye haṁsayoriva paṅkajam | chatraṁ śaśinibhaṁ tasyāścūḍopari sumālinī

जैसे परस्पर लड़ते हुए दो हंसों के मध्य कमल शोभित होता है। उनके सिर के ऊपर चन्द्रमा के समान श्वेत छत्र —

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.18.23)

धृतमुक्तापरिक्षिप्तं बभार प्रेमनिर्भरा । तच्छत्रमुज्ज्वलं देव्या रुरुचे वदनोपरि

dhṛtamuktāparikṣiptaṁ babhāra premanirbharā | tacchatramujjvalaṁ devyā ruruce vadanopari

मोतियों से घिरा हुआ, प्रेम से भरी एक सखी ने धारण किया। देवी के मुख के ऊपर वह उज्ज्वल छत्र ऐसे सुशोभित हुआ,

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.18.24)

उपर्यमृतभाण्डस्य मण्डलं शशिनो यथा । अथ चाग्रे समासीना सुस्मितास्या शुभावती

uparyamṛtabhāṇḍasya maṇḍalaṁ śaśino yathā | atha cāgre samāsīnā susmitāsyā śubhāvatī

जैसे अमृत-कलश के ऊपर चन्द्रमा का मण्डल हो। तब आगे बैठी हुई, मन्द मुसकान वाली, शुभलक्षणा एक सखी —

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.18.25)

अक्षद्यूतविनोदेन रमयामास वै सतीम् । सुयशाः पादुके देव्याः शुभे रत्नपरिष्कृते

akṣadyūtavinodena ramayāmāsa vai satīm | suyaśāḥ pāduke devyāḥ śubhe ratnapariṣkṛte

पासों के खेल से सती का मनोरंजन करने लगी। सुयशा नामक एक सखी ने देवी की रत्नजड़ित शुभ पादुकाओं को —

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.18.26)

स्तनयोरन्तरे कृत्वा तदा देवीमसेवत । अन्या काञ्चनचार्वङ्गी दीप्तं जग्राह दर्पणम्

stanayorantare kṛtvā tadā devīmasevata | anyā kāñcanacārvaṅgī dīptaṁ jagrāha darpaṇam

अपने वक्षस्थल से लगाकर देवी की सेवा की। स्वर्ण के समान सुन्दर अंगों वाली एक अन्य सखी ने चमकता हुआ दर्पण उठाया।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.18.27)

अपरा तालवृन्तं च परा ताम्बूलपेटिकाम् । काचित्क्रीडाशुकं चारु करेऽकुरुत भामिनी

aparā tālavṛntaṁ ca parā tāmbūlapeṭikām | kācitkrīḍāśukaṁ cāru kare'kuruta bhāminī

दूसरी ने पंखा, तीसरी ने ताम्बूल की पेटी ली; एक सुन्दरी ने अपने हाथ में सुन्दर क्रीड़ा-शुक ले लिया।

श्लोक 28 (shiva.vayaviya.18.28)

काचित्तु सुमनोज्ञानि पुष्पाणि सुरभीणि च । काचिदाभरणाधारं बभार कमलेक्षणा

kācittu sumanojñāni puṣpāṇi surabhīṇi ca | kācidābharaṇādhāraṁ babhāra kamalekṣaṇā

किसी ने सुन्दर सुगन्धित पुष्प लिए, तो कमलनयनी किसी सखी ने आभूषणों का पात्र धारण किया।

श्लोक 29 (shiva.vayaviya.18.29)

काचिच्च पुनरालेपं सुप्रसूनं शुभाञ्जनम् । अन्याश्च सदृशास्तास्ता यथास्वमुचितक्रियाः

kācicca punarālepaṁ suprasūnaṁ śubhāñjanam | anyāśca sadṛśāstāstā yathāsvamucitakriyāḥ

किसी ने अंगराग, सुन्दर पुष्प और शुभ अंजन लिया; और भी वैसी ही अनेक सखियाँ अपने-अपने उचित कार्यों में लगी थीं।

श्लोक 30 (shiva.vayaviya.18.30)

आवृत्य तां महादेवीमसेवन्त समन्ततः । अतीव शुशुभे तासामन्तरे परमेश्वरी

āvṛtya tāṁ mahādevīmasevanta samantataḥ | atīva śuśubhe tāsāmantare parameśvarī

उन सबने महादेवी को चारों ओर से घेरकर सेवा की। उन सबके मध्य परमेश्वरी अत्यन्त शोभायमान हुईं,

श्लोक 31 (shiva.vayaviya.18.31)

तारापरिषदो मध्ये चन्द्रलेखेव शारदी । ततः शङ्खसमुत्थस्य नादस्य समनन्तरम्

tārāpariṣado madhye candralekheva śāradī | tataḥ śaṅkhasamutthasya nādasya samanantaram

जैसे तारागणों के मध्य शरद्ऋतु की चन्द्ररेखा शोभित होती है। तत्पश्चात् शंखध्वनि होते ही, तुरन्त —

श्लोक 32 (shiva.vayaviya.18.32)

प्रास्थानिको महानादः पटहः समताड्यत । ततो मधुरवाद्यानि सह तालोद्यतैः स्वनैः

prāsthāniko mahānādaḥ paṭahaḥ samatāḍyata | tato madhuravādyāni saha tālodyataiḥ svanaiḥ

प्रस्थान का महान् नगाड़ा बज उठा। तत्पश्चात् मधुर वाद्य ताल के साथ मिलकर बजने लगे,

श्लोक 33 (shiva.vayaviya.18.33)

अनाहतानि सन्नेदुः काहलानां शतानि च । सायुधानां गणेशानां महेशसमतेजसाम्

anāhatāni sanneduḥ kāhalānāṁ śatāni ca | sāyudhānāṁ gaṇeśānāṁ maheśasamatejasām

और बिना आघात के भी सैकड़ों काहल (रणतुरही) बज उठीं — महेश के समान तेजस्वी, शस्त्रधारी गणेश्वरों की।

श्लोक 34 (shiva.vayaviya.18.34)

सहस्राणि शतान्यष्टौ तदानीं पुरतो ययुः । तेषां मध्ये वृषारूढो गजारूढो यथा गुरुः

sahasrāṇi śatānyaṣṭau tadānīṁ purato yayuḥ | teṣāṁ madhye vṛṣārūḍho gajārūḍho yathā guruḥ

उस समय आठ लाख गण आगे-आगे चले; उनके बीच वृषभ पर आरूढ़ नन्दीश्वर ऐसे शोभित हुए जैसे गजारूढ़ गुरु (बृहस्पति) हों।

श्लोक 35 (shiva.vayaviya.18.35)

जगाम गणपः श्रीमान् सोमनन्दीश्वरार्चितः । देवदुन्दुभयो नेदुर्दिवि दिव्यसुखा घनाः

jagāma gaṇapaḥ śrīmān somanandīśvarārcitaḥ | devadundubhayo nedurdivi divyasukhā ghanāḥ

वह श्रीमान् गणपति (नन्दीश्वर), जो सोम से पूजित था, आगे चला। आकाश में देवताओं के दुन्दुभि बज उठे और मेघ दिव्य सुख देने वाले हो गए।

श्लोक 36 (shiva.vayaviya.18.36)

ननृतुर्मुनयः सर्वे मुमुदुः सिद्धयोगिनः । ससृजुः पुष्पवृष्टिं च वितानोपरि वारिदाः

nanṛturmunayaḥ sarve mumuduḥ siddhayoginaḥ | sasṛjuḥ puṣpavṛṣṭiṁ ca vitānopari vāridāḥ

सभी मुनि नाचने लगे, सिद्ध और योगीजन आनन्दित हुए, और मेघों ने चंदोवे के ऊपर पुष्पों की वर्षा की।

श्लोक 37 (shiva.vayaviya.18.37)

तदा देवगणैश्चान्यैः पथि सर्वत्र सङ्गताः । क्षणादिव पितुर्गेहं प्रविवेश महेश्वरी

tadā devagaṇaiścānyaiḥ pathi sarvatra saṅgatāḥ | kṣaṇādiva piturgehaṁ praviveśa maheśvarī

तब मार्ग में सर्वत्र अन्य देवगणों से मिलती हुई, महेश्वरी क्षणभर में ही अपने पिता के घर में प्रविष्ट हुईं।

श्लोक 38 (shiva.vayaviya.18.38)

तां दृष्ट्वा कुपितो दक्षश्चात्मनः क्षयकारणात् । तस्या यवीयसीभ्योऽपि चक्रे पूजामसत्कृताम्

tāṁ dṛṣṭvā kupito dakṣaścātmanaḥ kṣayakāraṇāt | tasyā yavīyasībhyo'pi cakre pūjāmasatkṛtām

उसे देखकर, अपने ही विनाश के कारणवश, दक्ष क्रुद्ध हो उठा, और उसने उसकी छोटी बहनों से भी घटिया सत्कार उसका किया।

श्लोक 39 (shiva.vayaviya.18.39)

तदा शशिमुखी देवी पितरं सदसि स्थितम् । अम्बिका युक्तमव्यग्रमुवाचाकृपणं वचः

tadā śaśimukhī devī pitaraṁ sadasi sthitam | ambikā yuktamavyagramuvācākṛpaṇaṁ vacaḥ

तब चन्द्रमुखी देवी अम्बिका ने सभा में बैठे अपने पिता से युक्तियुक्त, अव्याकुल तथा निर्भीक वचन कहे।

श्लोक 40 (shiva.vayaviya.18.40)

देव्युवाच । ब्रह्मादयः पिशाचान्ता यस्याज्ञावशवर्तिनः । स देवः साम्प्रतं तात विधिना नार्चितः किल

devyuvāca | brahmādayaḥ piśācāntā yasyājñāvaśavartinaḥ | sa devaḥ sāmprataṁ tāta vidhinā nārcitaḥ kila

देवी ने कहा — हे तात! जिनकी आज्ञा के अधीन ब्रह्मा से लेकर पिशाच तक सब हैं, उन्हीं देव का आपने विधिपूर्वक पूजन नहीं किया।

श्लोक 41 (shiva.vayaviya.18.41)

तदास्तां मम ज्यायस्याः पुत्र्याः पूजां किमीदृशीम् । असत्कृतामवज्ञाय कृतवानसि गर्हितम्

tadāstāṁ mama jyāyasyāḥ putryāḥ pūjāṁ kimīdṛśīm | asatkṛtāmavajñāya kṛtavānasi garhitam

तो फिर उनकी सबसे ज्येष्ठ पुत्री मेरी ऐसी पूजा किस बात की? आपने अनादरपूर्वक अवज्ञा करके निन्दनीय कार्य किया है।

श्लोक 42 (shiva.vayaviya.18.42)

एवमुक्तोऽब्रवीदेनां दक्षः क्रोधादमर्षितः । त्वत्तः श्रेष्ठा विशिष्टाश्च पूज्या बालाः सुता मम

evamukto'bravīdenāṁ dakṣaḥ krodhādamarṣitaḥ | tvattaḥ śreṣṭhā viśiṣṭāśca pūjyā bālāḥ sutā mama

ऐसा कहे जाने पर क्रोध से अनियन्त्रित दक्ष ने उससे कहा — मेरी अन्य छोटी पुत्रियाँ तुझसे श्रेष्ठ और विशिष्ट हैं, वे ही पूजनीय हैं।

श्लोक 43 (shiva.vayaviya.18.43)

तासां तु ये च भर्त्तारस्ते मे बहुमता मुदा । गुणैश्चाप्यधिकाः सर्वे भर्तुस्ते त्र्यम्बकादपि

tāsāṁ tu ye ca bharttāraste me bahumatā mudā | guṇaiścāpyadhikāḥ sarve bhartuste tryambakādapi

उनके जो पति हैं, वे मुझे प्रसन्नतापूर्वक अत्यन्त सम्मानित हैं, और वे सब गुणों में भी तेरे पति त्र्यंबक से भी अधिक हैं।

श्लोक 44 (shiva.vayaviya.18.44)

स्तब्धात्मा तामसः शर्वः त्वमिमं समुपाश्रिता । तेन त्वामवमन्येऽहं प्रतिकूलो हि मे भवः

stabdhātmā tāmasaḥ śarvaḥ tvamimaṁ samupāśritā | tena tvāmavamanye'haṁ pratikūlo hi me bhavaḥ

शर्व अभिमानी और तामसी है, और तूने उसी का आश्रय ग्रहण किया है; इसीलिए मैं तेरा अनादर करता हूँ, क्योंकि भव मेरे प्रतिकूल है।

श्लोक 45 (shiva.vayaviya.18.45)

तथोक्ता पितरं दक्षं क्रुद्धा देवी तमब्रवीत् । शृण्वतामेव सर्वेषां ये यज्ञसदसि स्थिताः

tathoktā pitaraṁ dakṣaṁ kruddhā devī tamabravīt | śṛṇvatāmeva sarveṣāṁ ye yajñasadasi sthitāḥ

ऐसा कहे जाने पर, क्रुद्ध हुई देवी ने अपने पिता दक्ष से, यज्ञसभा में उपस्थित उन सभी लोगों के सुनते हुए, यह कहा —

श्लोक 46 (shiva.vayaviya.18.46)

अकस्मान्मम भर्तारमजाताशेषदूषणम् । वाचा दूषयसे दक्ष साक्षाल्लोकमहेश्वरम्

akasmānmama bhartāramajātāśeṣadūṣaṇam | vācā dūṣayase dakṣa sākṣāllokamaheśvaram

हे दक्ष! तू बिना किसी कारण के, समस्त दोषों से रहित, साक्षात् लोकों के महेश्वर मेरे पति की वाणी से निन्दा करता है।

श्लोक 47 (shiva.vayaviya.18.47)

विद्याचौरो गुरुद्रोही वेदेश्वरविदूषकः । त एते बहुपाप्मानः सर्वे दण्ड्या इति श्रुतिः

vidyācauro gurudrohī vedeśvaravidūṣakaḥ | ta ete bahupāpmānaḥ sarve daṇḍyā iti śrutiḥ

विद्या का चोर, गुरु का द्रोही, और वेदों के स्वामी की निन्दा करने वाला — ये सब महापापी दण्डनीय हैं, ऐसा श्रुति कहती है।

श्लोक 48 (shiva.vayaviya.18.48)

तस्मादत्युत्कटस्यास्य पापस्य सदृशो भृशम् । सहसा दारुणो दण्डस्तव दैवाद्भविष्यति

tasmādatyutkaṭasyāsya pāpasya sadṛśo bhṛśam | sahasā dāruṇo daṇḍastava daivādbhaviṣyati

इसलिए तेरे इस अत्यन्त उग्र पाप के अनुरूप ही अत्यन्त भयंकर दण्ड तुझे शीघ्र ही दैव के द्वारा प्राप्त होगा।

श्लोक 49 (shiva.vayaviya.18.49)

त्वया न पूजितो यस्माद्देवदेवस्त्रियम्बकः । तस्मात्तव कुलं दुष्टं नष्टमित्यवधारय

tvayā na pūjito yasmāddevadevastriyambakaḥ | tasmāttava kulaṁ duṣṭaṁ naṣṭamityavadhāraya

चूँकि तूने देवों के देव त्र्यंबक की पूजा नहीं की, इसलिए यह जान ले कि तेरा कुल दूषित होकर नष्ट हो जाएगा।

श्लोक 50 (shiva.vayaviya.18.50)

इत्युक्त्वा पितरं रुष्टा सती सन्त्यक्तसाध्वसा । तदीयां च तनुं त्यक्त्वा हिमवन्तं ययौ गिरिम्

ityuktvā pitaraṁ ruṣṭā satī santyaktasādhvasā | tadīyāṁ ca tanuṁ tyaktvā himavantaṁ yayau girim

अपने पिता से इस प्रकार कहकर, समस्त भय त्याग चुकी क्रुद्ध सती ने अपने उसी शरीर को त्यागकर हिमवान् पर्वत की ओर प्रयाण किया।

श्लोक 51 (shiva.vayaviya.18.51)

स पर्वतपरः श्रीमाँल्लब्धपुण्यफलोदयः । तदर्थमेव कृतवान् सुचिरं दुश्चरं तपः

sa parvataparaḥ śrīmā~llabdhapuṇyaphalodayaḥ | tadarthameva kṛtavān suciraṁ duścaraṁ tapaḥ

वह श्रीमान् पर्वतश्रेष्ठ हिमवान्, जिसने पहले ही पुण्यफल प्राप्त कर लिया था, इसी उद्देश्य से दीर्घकाल तक दुष्कर तपस्या कर चुका था।

श्लोक 52 (shiva.vayaviya.18.52)

तस्मात्तमनुगृह्णाति भूधरेश्वरमीश्वरी । स्वेच्छया पितरं चक्रे स्वात्मनो योगमायया

tasmāttamanugṛhṇāti bhūdhareśvaramīśvarī | svecchayā pitaraṁ cakre svātmano yogamāyayā

इसीलिए ईश्वरी ने अपनी इच्छा से, अपनी योगमाया से, उस पर्वतराज को अनुगृहीत करते हुए अपना पिता बना लिया।

श्लोक 53 (shiva.vayaviya.18.53)

यदा गता सती दक्षं विनिन्द्य भयविह्वलम् । तदा तिरोहिता मन्त्रा विहतश्च ततोऽध्वरः

yadā gatā satī dakṣaṁ vinindya bhayavihvalam | tadā tirohitā mantrā vihataśca tato'dhvaraḥ

जब सती दक्ष को भय से व्याकुल करके निन्दा करती हुई चली गई, तब उस यज्ञ के मन्त्र लुप्त हो गए और यज्ञ विफल हो गया।

श्लोक 54 (shiva.vayaviya.18.54)

तदुपश्रुत्य गमनं देव्यास्त्रिपुरुमर्दनः । दक्षाय च ऋषिभ्यश्च चुकोप च शशाप तान्

tadupaśrutya gamanaṁ devyāstripurumardanaḥ | dakṣāya ca ṛṣibhyaśca cukopa ca śaśāpa tān

देवी के इस प्रकार चले जाने का समाचार सुनकर त्रिपुरमर्दन (शिव) दक्ष और उन ऋषियों पर अत्यन्त क्रुद्ध हुए और उन्हें शाप दिया।

श्लोक 55 (shiva.vayaviya.18.55)

यस्मादवमता दक्षमत्कृतेऽनागसा सती । पूजिताश्चेतराः सर्वाः स्वसुता भर्तृभिः सह

yasmādavamatā dakṣamatkṛte'nāgasā satī | pūjitāścetarāḥ sarvāḥ svasutā bhartṛbhiḥ saha

शिव ने कहा — चूँकि हे दक्ष! तूने मेरे कारण निर्दोष सती का अनादर किया, जबकि तेरी अन्य सभी पुत्रियाँ अपने-अपने पतियों सहित पूजित हुईं,

श्लोक 56 (shiva.vayaviya.18.56)

वैवस्वतेऽन्तरे तस्मात्तव जामातरस्त्वमी । उत्पत्स्यन्ते समं सर्वे ब्रह्मयज्ञेष्वयोनिजाः

vaivasvate'ntare tasmāttava jāmātarastvamī | utpatsyante samaṁ sarve brahmayajñeṣvayonijāḥ

इसलिए वैवस्वत मन्वन्तर में तेरे ये सभी जामाता ब्रह्मयज्ञों में योनि के बिना समान रूप से उत्पन्न होंगे,

श्लोक 57 (shiva.vayaviya.18.57)

भविता मानुषो राजा चाक्षुषस्य त्वमन्वये । प्राचीनबर्हिषः पौत्रः पुत्रश्चापि प्रचेतसः

bhavitā mānuṣo rājā cākṣuṣasya tvamanvaye | prācīnabarhiṣaḥ pautraḥ putraścāpi pracetasaḥ

और तू स्वयं चाक्षुष के वंश में एक मानव राजा बनेगा — प्राचीनबर्हि का पौत्र और प्रचेता का पुत्र।

श्लोक 58 (shiva.vayaviya.18.58)

अहं तत्रापि ते विघ्नमाचरिष्यामि दुर्मते । धर्मार्थकामयुक्तेषु कर्मस्वपि पुनः पुनः

ahaṁ tatrāpi te vighnamācariṣyāmi durmate | dharmārthakāmayukteṣu karmasvapi punaḥ punaḥ

हे दुर्बुद्धे! उस जन्म में भी मैं धर्म, अर्थ और काम से युक्त तेरे कर्मों में बार-बार विघ्न डालूँगा।

श्लोक 59 (shiva.vayaviya.18.59)

तेनैवं व्याहृतो दक्षो रुद्रेणामिततेजसा । स्वायम्भुवीं तनुं त्यक्त्वा पपात भुवि दुःखितः

tenaivaṁ vyāhṛto dakṣo rudreṇāmitatejasā | svāyambhuvīṁ tanuṁ tyaktvā papāta bhuvi duḥkhitaḥ

अपरिमित तेज वाले रुद्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, दक्ष ने अपना स्वायम्भुव शरीर त्यागकर, दुःखी होकर पृथ्वी पर गिरकर प्राण त्याग दिए।

श्लोक 60 (shiva.vayaviya.18.60)

ततः प्राचेतसो दक्षो जज्ञे वै चाक्षुषेऽन्तरे । प्राचीनबर्हिषः पौत्रः पुत्रश्चैव प्रचेतसाम्

tataḥ prācetaso dakṣo jajñe vai cākṣuṣe'ntare | prācīnabarhiṣaḥ pautraḥ putraścaiva pracetasām

तत्पश्चात् चाक्षुष मन्वन्तर में दक्ष प्राचीनबर्हि का पौत्र और प्रचेताओं का पुत्र बनकर उत्पन्न हुआ।

श्लोक 61 (shiva.vayaviya.18.61)

भृग्वादयोऽपि जाता वै मनोर्वैवस्वतस्य तु । अन्तरे ब्रह्मणो यज्ञे वारुणीं बिभ्रतस्तनुम्

bhṛgvādayo'pi jātā vai manorvaivasvatasya tu | antare brahmaṇo yajñe vāruṇīṁ bibhratastanum

भृगु आदि भी वैवस्वत मनु के मन्वन्तर में, ब्रह्मा के यज्ञ में वारुणी शरीर धारण करते हुए उत्पन्न हुए।

श्लोक 62 (shiva.vayaviya.18.62)

तदा दक्षस्य धर्मार्थं प्रवृत्तस्य दुरात्मनः । महेशः कृतवान् विघ्नं मनौ वैवस्वते सति

tadā dakṣasya dharmārthaṁ pravṛttasya durātmanaḥ | maheśaḥ kṛtavān vighnaṁ manau vaivasvate sati

तब दुरात्मा दक्ष के धर्मकार्य में प्रवृत्त होने पर भी, वैवस्वत मनु के मन्वन्तर में महेश ने उसमें विघ्न उत्पन्न किया।

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