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वायवीय संहिता · अध्याय 28

भस्म-तत्त्व का वर्णन

अध्याय 27अध्याय-सूचीअध्याय 29

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.28.1)

ऋषय ऊचुः । देवीं समादधानेन देवेनेदं किमीरितम् । अग्निषोमात्मकं विश्वं वागर्थात्मकमित्यपि

ṛṣaya ūcuḥ | devīṁ samādadhānena devenedaṁ kimīritam | agniṣomātmakaṁ viśvaṁ vāgarthātmakamityapi

ऋषियों ने कहा — देवी को समझाते हुए देव ने यह क्या कहा कि विश्व अग्नि-सोम के स्वरूप वाला है, और वागर्थ (वाणी-अर्थ) के स्वरूप वाला भी है?

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.28.2)

आज्ञैकसारमैश्वर्यमाज्ञात्वमिति चोदितम् । तदिदं श्रोतुमिच्छामो यथावदनुपूर्वशः

ājñaikasāramaiśvaryamājñātvamiti coditam | tadidaṁ śrotumicchāmo yathāvadanupūrvaśaḥ

यह भी कहा गया कि ऐश्वर्य का सार केवल आज्ञा है, और आज्ञा-रूप ही (शक्ति का) स्वभाव है — इसे हम यथावत् क्रमशः सुनना चाहते हैं।

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.28.3)

वायुरुवाच । अग्निरित्युच्यते रौद्री घोरा या तैजसी तनुः । सोमः शाक्तोऽमृतमयः शक्तेः शान्तिकरी तनुः

vāyuruvāca | agnirityucyate raudrī ghorā yā taijasī tanuḥ | somaḥ śākto'mṛtamayaḥ śakteḥ śāntikarī tanuḥ

वायु ने कहा — रुद्र का जो घोर, तेजोमय शरीर है, वह अग्नि कहलाता है; शक्ति का अमृतमय, शांतिदायक शरीर सोम कहलाता है।

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.28.4)

अमृतं यत्प्रतिष्ठा सा तेजो विद्या कला स्वयम् । भूतसूक्ष्मेषु सर्वेषु त एव रसतेजसी

amṛtaṁ yatpratiṣṭhā sā tejo vidyā kalā svayam | bhūtasūkṣmeṣu sarveṣu ta eva rasatejasī

जो अमृत की प्रतिष्ठा है, वही स्वयं तेज, विद्या और कला है। समस्त सूक्ष्म भूतों में यही दोनों रस और तेज के रूप में विद्यमान हैं।

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.28.5)

द्विविधा तेजसो वृत्तिः सूर्यात्मा चानलात्मिका । तथैव रसवृत्तिश्च सोमात्मा च जलात्मिका

dvividhā tejaso vṛttiḥ sūryātmā cānalātmikā | tathaiva rasavṛttiśca somātmā ca jalātmikā

तेज की वृत्ति दो प्रकार की है — सूर्यात्मक और अग्न्यात्मक; इसी प्रकार रस की वृत्ति भी दो प्रकार की है — सोमात्मक और जलात्मक।

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.28.6)

विद्युदादिमयं तेजो मधुरादिमयो रसः । तेजोरसविभेदैस्तु धृतमेतच्चराचरम्

vidyudādimayaṁ tejo madhurādimayo rasaḥ | tejorasavibhedaistu dhṛtametaccarācaram

बिजली आदि तेज के रूप हैं, माधुर्य आदि रस के रूप हैं। तेज और रस के इन्हीं भेदों से यह संपूर्ण चराचर जगत् धारण किया गया है।

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.28.7)

अग्नेरमृतनिष्पत्तिरमृतेनाग्निरेधते । अत एव हि विक्रान्तमग्नीषोमं जगद्धितम्

agneramṛtaniṣpattiramṛtenāgniredhate | ata eva hi vikrāntamagnīṣomaṁ jagaddhitam

अग्नि से अमृत की उत्पत्ति होती है, और अमृत से अग्नि बढ़ती है। इसीलिए अग्नि और सोम का यह प्रबल मिलन जगत् के हित के लिए है।

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.28.8)

हविषे सस्यसम्पत्तिर्वृष्टिः सस्याभिवृद्धये । वृष्टेरेव हविस्तस्मादग्नीषोमधृतं जगत्

haviṣe sasyasampattirvṛṣṭiḥ sasyābhivṛddhaye | vṛṣṭereva havistasmādagnīṣomadhṛtaṁ jagat

हवि से अन्न की समृद्धि होती है, वृष्टि से अन्न की वृद्धि होती है, और वृष्टि हवि से ही होती है — इसलिए जगत् अग्नि और सोम द्वारा धारण किया गया है।

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.28.9)

अग्निरूर्ध्वं ज्वलत्येष यावत्सौम्यं परामृतम् । यावदग्न्यास्पदं सौम्यममृतं च स्रवत्यधः

agnirūrdhvaṁ jvalatyeṣa yāvatsaumyaṁ parāmṛtam | yāvadagnyāspadaṁ saumyamamṛtaṁ ca sravatyadhaḥ

यह अग्नि तब तक ऊपर की ओर जलती है जब तक कि सोम-संबंधी परम अमृत तक न पहुँचे; और सौम्य अमृत तब तक नीचे बहता है जब तक अग्नि के स्थान तक न पहुँचे।

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.28.10)

अत एव हि कालाग्निरधस्ताच्छक्तिरूर्ध्वतः । यावदादहनं चोर्ध्वमधश्चाप्लावनं भवेत्

ata eva hi kālāgniradhastācchaktirūrdhvataḥ | yāvadādahanaṁ cordhvamadhaścāplāvanaṁ bhavet

इसीलिए कालाग्नि नीचे और शक्ति ऊपर स्थित है, जिससे ऊपर दहन और नीचे प्लावन (सिंचन) होता रहे।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.28.11)

आधारशक्त्यैव धृतः कालाग्निरयमूर्ध्वगः । तथैव निम्नगः सोमः शिवशक्तिपदास्पदः

ādhāraśaktyaiva dhṛtaḥ kālāgnirayamūrdhvagaḥ | tathaiva nimnagaḥ somaḥ śivaśaktipadāspadaḥ

ऊपर की ओर जाने वाली यह कालाग्नि आधार-शक्ति द्वारा ही धारण की जाती है; इसी प्रकार नीचे की ओर बहने वाला सोम शिव-शक्ति के पद का आश्रय लेता है।

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.28.12)

शिवश्चोर्ध्वमधः शक्तिरूर्ध्वं शक्तिरधः शिवः । तदित्थं शिवशक्तिभ्यां नाव्याप्तमिह किञ्चन

śivaścordhvamadhaḥ śaktirūrdhvaṁ śaktiradhaḥ śivaḥ | taditthaṁ śivaśaktibhyāṁ nāvyāptamiha kiñcana

शिव ऊपर और शक्ति नीचे, फिर शक्ति ऊपर और शिव नीचे — इस प्रकार यहाँ शिव और शक्ति द्वारा अव्याप्त कुछ भी नहीं है।

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.28.13)

असकृच्चाग्निना दग्धं जगद्यद्भस्मसात्कृतम् । अग्नेर्वीर्यमिदं चाहुस्तद्वीर्यं भस्म यत्ततः

asakṛccāgninā dagdhaṁ jagadyadbhasmasātkṛtam | agnervīryamidaṁ cāhustadvīryaṁ bhasma yattataḥ

जो जगत् बार-बार अग्नि से दग्ध होकर भस्म-रूप बना है, उसे ही अग्नि का वीर्य (सामर्थ्य) कहा जाता है, और उससे प्राप्त वह भस्म ही उसका (आगे का) वीर्य है।

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.28.14)

यश्चेत्थं भस्मसद्भावं ज्ञात्वा स्नाति च भस्मना । अग्निरित्यादिभिर्मन्त्रैर्बद्धः पाशात्प्रमुच्यते

yaścetthaṁ bhasmasadbhāvaṁ jñātvā snāti ca bhasmanā | agnirityādibhirmantrairbaddhaḥ pāśātpramucyate

जो इस प्रकार भस्म के सत्य स्वरूप को जानकर "अग्निः" इत्यादि मंत्रों से भस्म द्वारा स्नान करता है, वह बंधन में होते हुए भी पाश से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.28.15)

अग्नेर्वीर्यं तु यद्भस्म सोमेनाप्लावितं पुनः । अयोगयुक्त्या प्रकृतेरधिकाराय कल्पते

agnervīryaṁ tu yadbhasma somenāplāvitaṁ punaḥ | ayogayuktyā prakṛteradhikārāya kalpate

किंतु अग्नि का जो वीर्य-रूप भस्म है, यदि उसे योग-विधि के बिना पुनः सोम से सींचा जाए, तो वह प्रकृति के अधिकार के अधीन ही रखता है।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.28.16)

योगयुक्त्या तु तद्भस्म प्लाव्यमानं समन्ततः । शाक्तेनामृतवर्षेण चाधिकारान्निवर्तयेत्

yogayuktyā tu tadbhasma plāvyamānaṁ samantataḥ | śāktenāmṛtavarṣeṇa cādhikārānnivartayet

किंतु उसी भस्म को यदि योग-विधि से चारों ओर से शक्ति की अमृत-वर्षा द्वारा सींचा जाए, तो वह उस अधिकार से (आत्मा को) मुक्त कर देता है।

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.28.17)

अतो मृत्युञ्जयायेत्थममृतप्लावनं सदा । शिवशक्त्यमृतस्पर्शे लब्धं येन कुतो मृतिः

ato mṛtyuñjayāyetthamamṛtaplāvanaṁ sadā | śivaśaktyamṛtasparśe labdhaṁ yena kuto mṛtiḥ

इसलिए मृत्यु पर विजय पाने के लिए सदा इस प्रकार अमृत-प्लावन करना चाहिए; शिव-शक्ति के अमृत का स्पर्श जिसे प्राप्त हो गया, उसे मृत्यु कहाँ से आएगी?

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.28.18)

यो वेद दहनं गुह्यं प्लावनं च यथोदितम् । अग्नीषोमपदं हित्वा न स भूयोऽभिजायते

yo veda dahanaṁ guhyaṁ plāvanaṁ ca yathoditam | agnīṣomapadaṁ hitvā na sa bhūyo'bhijāyate

जो इस गुह्य दहन और यथोक्त प्लावन को जानता है, वह अग्नि-सोम की अवस्था को त्यागकर फिर जन्म नहीं लेता।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.28.19)

शिवाग्निना तनुं दग्ध्वा शक्तिसौम्यामृतेन यः । प्लावयेद्योगमार्गेण सोऽमृतत्वाय कल्पते

śivāgninā tanuṁ dagdhvā śaktisaumyāmṛtena yaḥ | plāvayedyogamārgeṇa so'mṛtatvāya kalpate

जो शिव-अग्नि से शरीर को दग्ध करके फिर योग-मार्ग से उसे शक्ति के सौम्य अमृत से सींचता है, वह अमरत्व के योग्य हो जाता है।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.28.20)

हृदि कृत्वेममर्थं वै देवेन समुदाहृतम् । अग्नीषोमात्मकं विश्वं जगदित्यनुरूपतः

hṛdi kṛtvemamarthaṁ vai devena samudāhṛtam | agnīṣomātmakaṁ viśvaṁ jagadityanurūpataḥ

देव द्वारा कहे गए इस अर्थ को हृदय में धारण करके — कि यह अग्नि-सोम के स्वरूप वाला विश्व, यह जगत्, इसी प्रकार का है —

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