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वायवीय संहिता · अध्याय 36

कृष्ण-पुत्रप्राप्तिवर्णन

अध्याय 35अध्याय-सूचीअध्याय 37

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.36.1)

ॐ नमः समस्त संसारचक्रभ्रमणहेतवे । गौरीकुचतटद्वन्द्वकुङ्कुमाङ्कितवक्षसे

oṁ namaḥ samasta saṁsāracakrabhramaṇahetave | gaurīkucataṭadvandvakuṅkumāṅkitavakṣase

ॐ, समस्त संसार-चक्र के भ्रमण के हेतुभूत, तथा गौरी के दोनों कुच-तटों के कुंकुम से अंकित वक्षस्थल वाले शिव को नमस्कार।

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.36.2)

सूत उवाच । उक्त्वा भगवतो लब्धं प्रसादादुपमन्युना । नियमादुत्थितो वायुर्मध्ये प्राप्ते दिवाकरे

sūta uvāca | uktvā bhagavato labdhaṁ prasādādupamanyunā | niyamādutthito vāyurmadhye prāpte divākare

सूत ने कहा — उपमन्यु द्वारा भगवान् की कृपा से जो कुछ प्राप्त हुआ था, उसे कहकर, सूर्य के मध्याह्न में पहुँचने पर वायु अपने नियम से उठे।

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.36.3)

ऋषयश्चापि ते सर्वे नैमिषारण्यवासिनः । अथायमर्थः प्रष्टव्य इति कृत्वा विनिश्चयम्

ṛṣayaścāpi te sarve naimiṣāraṇyavāsinaḥ | athāyamarthaḥ praṣṭavya iti kṛtvā viniścayam

नैमिषारण्य में निवास करने वाले वे सभी ऋषि भी, यह विषय अवश्य पूछना चाहिए — ऐसा निश्चय करके —

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.36.4)

कृत्वा यथा स्वकं कृत्यं प्रत्यहं ते यथा पुरा । भगवन्तमुपायान्तं समीक्ष्य समुपाविशन्

kṛtvā yathā svakaṁ kṛtyaṁ pratyahaṁ te yathā purā | bhagavantamupāyāntaṁ samīkṣya samupāviśan

प्रतिदिन की भाँति अपना नित्यकर्म पूर्ण करके, पूर्ववत् आते हुए उन भगवान् वायु को देखकर उनके निकट बैठ गये।

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.36.5)

अथासौ नियमस्यान्ते भगवानम्बरोद्भवः । मध्ये मुनिसभायास्तु भेजे कॢप्तं वरासनम्

athāsau niyamasyānte bhagavānambarodbhavaḥ | madhye munisabhāyāstu bheje kḷptaṁ varāsanam

तत्पश्चात् अपने नियम की समाप्ति पर, आकाश से उत्पन्न वे भगवान् वायु मुनियों की सभा के मध्य में तैयार किये गये उत्तम आसन पर विराजमान हुए।

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.36.6)

सुखासनोपविष्टश्च वायुर्लोकनमस्कृतः । श्रीमद्विभूतिमीशस्य हृदि कृत्वेदमब्रवीत्

sukhāsanopaviṣṭaśca vāyurlokanamaskṛtaḥ | śrīmadvibhūtimīśasya hṛdi kṛtvedamabravīt

सुखासन पर बैठे हुए, लोक-नमस्कृत वायु ने ईश्वर की श्रीमती विभूति को अपने हृदय में धारण करके यह कहा।

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.36.7)

तं प्रपद्ये महादेवं सर्वज्ञमपराजितम् । विभूतिः सकलं यस्य चराचरमिदं जगत्

taṁ prapadye mahādevaṁ sarvajñamaparājitam | vibhūtiḥ sakalaṁ yasya carācaramidaṁ jagat

मैं उन महादेव की शरण लेता हूँ, जो सर्वज्ञ और अपराजित हैं, जिनकी विभूति यह सम्पूर्ण चराचर जगत् है।

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.36.8)

इत्याकर्ण्य शुभां वाणीं ऋषयः क्षीणकल्मषाः । विभूतिविस्तरं श्रोतुमूचुस्ते परमं वचः

ityākarṇya śubhāṁ vāṇīṁ ṛṣayaḥ kṣīṇakalmaṣāḥ | vibhūtivistaraṁ śrotumūcuste paramaṁ vacaḥ

यह शुभ वाणी सुनकर, पापरहित हो चुके उन ऋषियों ने उस विभूति के विस्तार को सुनने के लिए यह परम वचन कहा।

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.36.9)

ऋषय ऊचुः । उक्तं भगवता वृत्तमुपमन्योर्महात्मनः । क्षीरार्थेनापि तपसा यत्प्राप्तं परमेश्वरात्

ṛṣaya ūcuḥ | uktaṁ bhagavatā vṛttamupamanyormahātmanaḥ | kṣīrārthenāpi tapasā yatprāptaṁ parameśvarāt

ऋषियों ने कहा — आपने महात्मा उपमन्यु का वह वृत्तान्त बताया, जो दूध के निमित्त किये गये तप से भी परमेश्वर से प्राप्त हुआ।

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.36.10)

दृष्टोऽसौ वासुदेवेन कृष्णेनाक्लिष्टकर्मणा । धौम्याग्रजस्ततस्तेन कृत्वा पाशुपतं व्रतम्

dṛṣṭo'sau vāsudevena kṛṣṇenākliṣṭakarmaṇā | dhaumyāgrajastatastena kṛtvā pāśupataṁ vratam

उसे वासुदेव कृष्ण ने देखा, जिनके कर्म कभी विफल नहीं होते; तत्पश्चात् धौम्य के उस अग्रज ने उन्हें पाशुपत व्रत कराया।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.36.11)

प्राप्तं च परमं ज्ञानमिति प्रागेव शुश्रुम । कथं स लब्धवान् कृष्णो ज्ञानं पाशुपतं परम्

prāptaṁ ca paramaṁ jñānamiti prāgeva śuśruma | kathaṁ sa labdhavān kṛṣṇo jñānaṁ pāśupataṁ param

यह हमने पहले ही सुना है कि उन्होंने परम ज्ञान प्राप्त किया; परन्तु कृष्ण ने वह परम पाशुपत ज्ञान कैसे प्राप्त किया?

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.36.12)

वायुरुवाच । स्वेच्छया ह्यवतीर्णोऽपि वासुदेवः सनातनः । निन्दयन्निव मानुष्यं देहशुद्धिं चकार सः

vāyuruvāca | svecchayā hyavatīrṇo'pi vāsudevaḥ sanātanaḥ | nindayanniva mānuṣyaṁ dehaśuddhiṁ cakāra saḥ

वायु ने कहा — सनातन वासुदेव, यद्यपि अपनी इच्छा से अवतीर्ण हुए थे, तथापि मानो मनुष्यत्व की निन्दा करते हुए, उन्होंने अपनी देह-शुद्धि की।

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.36.13)

पुत्रार्थं हि तपस्तप्तुं गतस्तस्य महामुनेः । आश्रमं मुनिभिर्दृष्टं दृष्टवांस्तत्र वै मुनिम्

putrārthaṁ hi tapastaptuṁ gatastasya mahāmuneḥ | āśramaṁ munibhirdṛṣṭaṁ dṛṣṭavāṁstatra vai munim

पुत्र-प्राप्ति के निमित्त तप करने गये हुए, उन्होंने उस महामुनि के, मुनियों द्वारा दर्शनीय आश्रम में, वहाँ उस मुनि को देखा।

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.36.14)

भस्मावदातं सर्वाङ्गं त्रिपुण्ड्राङ्कितमस्तकम् । रुद्राक्षमालाभरणं जटामण्डलमण्डितम्

bhasmāvadātaṁ sarvāṅgaṁ tripuṇḍrāṅkitamastakam | rudrākṣamālābharaṇaṁ jaṭāmaṇḍalamaṇḍitam

उसका सम्पूर्ण शरीर भस्म से उज्ज्वल था, मस्तक त्रिपुण्ड्र से अंकित था, वह रुद्राक्ष-माला से अलंकृत तथा जटाओं के मण्डल से सुशोभित था।

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.36.15)

तच्छिष्यभूतैर्मुनिभिः शास्त्रैर्वेदमिवावृतम् । शिवध्यानरतं शान्तमुपमन्युं महाद्युतिम्

tacchiṣyabhūtairmunibhiḥ śāstrairvedamivāvṛtam | śivadhyānarataṁ śāntamupamanyuṁ mahādyutim

वह अपने शिष्यभूत मुनियों से घिरा हुआ था, जैसे शास्त्रों से वेद घिरा रहता है; वह शिव-ध्यान में लीन, शान्त तथा महातेजस्वी उपमन्यु था।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.36.16)

नमश्चकार तं दृष्ट्वा हृष्टसर्वतनूरुहः । बहुमानेन कृष्णोऽसौ त्रिः कृत्वा तु प्रदक्षिणाम् । स्तुतिं चकार सुप्रीत्या नतस्कन्धः कृताञ्जलिः

namaścakāra taṁ dṛṣṭvā hṛṣṭasarvatanūruhaḥ | bahumānena kṛṣṇo'sau triḥ kṛtvā tu pradakṣiṇām | stutiṁ cakāra suprītyā nataskandhaḥ kṛtāñjaliḥ

उसे देखकर, समस्त रोमावली हर्षित होकर, कृष्ण ने अत्यन्त सम्मानपूर्वक तीन बार प्रदक्षिणा करके नमस्कार किया; झुके हुए कन्धों तथा हाथ जोड़कर उन्होंने प्रीतिपूर्वक स्तुति की।

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.36.17)

तस्यावलोकनादेव मुनेः कृष्णस्य धीमतः । नष्टमासीन्मलं सर्वं मायाजं कार्ममेव च

tasyāvalokanādeva muneḥ kṛṣṇasya dhīmataḥ | naṣṭamāsīnmalaṁ sarvaṁ māyājaṁ kārmameva ca

उस मुनि के दर्शनमात्र से ही, बुद्धिमान् कृष्ण का माया से उत्पन्न तथा कर्मजन्य समस्त मल नष्ट हो गया।

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.36.18)

ततः क्षीणमलं कृष्णमुपमन्युर्यथाविधि । भस्मनोद्धूल्य तं मन्त्रैरग्निरित्यादिभिः क्रमात्

tataḥ kṣīṇamalaṁ kṛṣṇamupamanyuryathāvidhi | bhasmanoddhūlya taṁ mantrairagnirityādibhiḥ kramāt

तत्पश्चात् मलरहित हुए कृष्ण को उपमन्यु ने विधिपूर्वक "अग्निः" इत्यादि मंत्रों से क्रमशः भस्म से धूलित किया।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.36.19)

अथ पाशुपतं साक्षाद् व्रतं द्वादशमासिकम् । कारयित्वा मुनिस्तस्मै प्रददौ ज्ञानमुत्तमम्

atha pāśupataṁ sākṣād vrataṁ dvādaśamāsikam | kārayitvā munistasmai pradadau jñānamuttamam

तत्पश्चात् उस मुनि ने उन्हें साक्षात् बारह महीनों का पाशुपत व्रत कराकर, उन्हें उत्तम ज्ञान प्रदान किया।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.36.20)

तदाप्रभृति तं कृष्णं मुनयश्शंसितव्रताः । दिव्याः पाशुपताः सर्वे परिवृत्योपतस्थिरे

tadāprabhṛti taṁ kṛṣṇaṁ munayaśśaṁsitavratāḥ | divyāḥ pāśupatāḥ sarve parivṛtyopatasthire

तब से समस्त दिव्य पाशुपत मुनि, जिनके व्रत सिद्ध हो चुके थे, कृष्ण को घेरकर उनकी सेवा में उपस्थित रहने लगे।

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.36.21)

ततो गुरुनियोगाद् वै कृष्णः परमशक्तिमान् । तपश्चकार पुत्रार्थं साम्बमुद्दिश्य शङ्करम्

tato guruniyogād vai kṛṣṇaḥ paramaśaktimān | tapaścakāra putrārthaṁ sāmbamuddiśya śaṅkaram

तत्पश्चात् गुरु की आज्ञा से ही, परम शक्तिशाली कृष्ण ने पुत्र-प्राप्ति के निमित्त अम्बा-सहित शंकर को लक्ष्य करके तप किया।

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.36.22)

तपसो तेन वर्षान्ते दृष्टोऽसौ परमेश्वरः । श्रिया परमया युक्तः साम्बश्च सगणः शिवः

tapaso tena varṣānte dṛṣṭo'sau parameśvaraḥ | śriyā paramayā yuktaḥ sāmbaśca sagaṇaḥ śivaḥ

उस तप के एक वर्ष पूर्ण होने पर, उन्हें परम शोभा से युक्त, अम्बा-सहित तथा गणों-सहित वे परमेश्वर शिव दिखाई दिये।

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.36.23)

वरार्थमाविर्भूतस्य हरस्य सुभगाकृतेः । स्तुतिं चकार नत्वाऽसौ कृष्णः सम्यक् कृताञ्जलिः

varārthamāvirbhūtasya harasya subhagākṛteḥ | stutiṁ cakāra natvā'sau kṛṣṇaḥ samyak kṛtāñjaliḥ

वर देने के लिए प्रकट हुए, सुन्दर स्वरूप वाले उन हर को प्रणाम करके, कृष्ण ने भलीभाँति हाथ जोड़कर स्तुति की।

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.36.24)

साम्बेन सगणेनापि लब्धवान् युत्रमात्मनः । तपसा तुष्टचित्तेन दत्तं विष्णोः शिवेन वै

sāmbena sagaṇenāpi labdhavān yutramātmanaḥ | tapasā tuṣṭacittena dattaṁ viṣṇoḥ śivena vai

गणों-सहित अम्बा से युक्त उन शिव ने, तप से प्रसन्नचित्त होकर, विष्णु को अपने ही समान पुत्र प्रदान किया।

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.36.25)

यस्मात्साम्बो महादेवः प्रददौ पुत्रमात्मनः । तस्माज्जाम्बवतीसूनुं साम्बं चक्रे स नामतः

yasmātsāmbo mahādevaḥ pradadau putramātmanaḥ | tasmājjāmbavatīsūnuṁ sāmbaṁ cakre sa nāmataḥ

चूँकि अम्बा-सहित महादेव ने उन्हें अपना पुत्र प्रदान किया, इसीलिए उन्होंने जाम्बवती के उस पुत्र का नाम साम्ब रखा।

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.36.26)

तदेतत्कथितं सर्वं कृष्णस्यामितकर्मणः । महर्षेर्ज्ञानलाभश्च पुत्रलाभश्च शङ्करात्

tadetatkathitaṁ sarvaṁ kṛṣṇasyāmitakarmaṇaḥ | maharṣerjñānalābhaśca putralābhaśca śaṅkarāt

कृष्ण, जिनके कर्म असीम हैं, तथा उस महर्षि से उन्हें ज्ञान की प्राप्ति और शंकर से पुत्र की प्राप्ति — यह सब वृत्तान्त कह दिया गया।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.36.27)

य इदं कीर्तयेन्नित्यं शृणुयाच्छ्रावयेत्तथा । स विष्णोर्ज्ञानमासाद्य तेनैव सह मोदते

ya idaṁ kīrtayennityaṁ śṛṇuyācchrāvayettathā | sa viṣṇorjñānamāsādya tenaiva saha modate

जो कोई इस वृत्तान्त का नित्य कीर्तन करता है, सुनता है अथवा सुनाता है, वह विष्णु के ज्ञान को प्राप्त करके उन्हीं के साथ आनन्दित होता है।

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