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वायवीय संहिता · अध्याय 39

गौरी-शंकर विभूतियोग

अध्याय 38अध्याय-सूचीअध्याय 40

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.39.1)

श्रीकृष्ण उवाच । भगवन् परमेशस्य शर्वस्यामिततेजसः । मूर्तिभिर्विश्वमेवेदं यथा व्याप्तं तथा श्रुतम्

śrīkṛṣṇa uvāca | bhagavan parameśasya śarvasyāmitatejasaḥ | mūrtibhirviśvamevedaṁ yathā vyāptaṁ tathā śrutam

श्रीकृष्ण ने कहा — हे भगवन्! अपरिमित तेज वाले परमेश शर्व के रूपों से यह सम्पूर्ण विश्व जिस प्रकार व्याप्त है, वह मैंने सुन लिया।

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.39.2)

अथैतत् ज्ञातुमिच्छामि याथात्म्यं परमेशयोः । स्त्रीपुम्भावात्मकं चेदं ताभ्यां कथमधिष्ठितम्

athaitat jñātumicchāmi yāthātmyaṁ parameśayoḥ | strīpumbhāvātmakaṁ cedaṁ tābhyāṁ kathamadhiṣṭhitam

अब मैं परमेश्वर-दम्पति के वास्तविक स्वरूप को जानना चाहता हूँ — यह स्त्री-पुरुष भावात्मक विश्व उन दोनों के द्वारा कैसे अधिष्ठित है?

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.39.3)

उपमन्युरुवाच । श्रीमद्विभूतिं शिवयोर्याथात्म्यं च समासतः । वक्ष्ये तद्विस्तराद्वक्तुं भवेनापि न शक्यते

upamanyuruvāca | śrīmadvibhūtiṁ śivayoryāthātmyaṁ ca samāsataḥ | vakṣye tadvistarādvaktuṁ bhavenāpi na śakyate

उपमन्यु ने कहा — शिव-शक्ति की उस श्रीमती विभूति तथा वास्तविक स्वरूप को मैं संक्षेप में कहूँगा; उसे विस्तार से कहना तो स्वयं शिव के लिए भी सम्भव नहीं है।

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.39.4)

शक्ति साक्षान्महादेवी महादेवश्च शक्तिमान् । तयोर्विभूतिलेशो वै सर्वमेतच्चराचरम्

śakti sākṣānmahādevī mahādevaśca śaktimān | tayorvibhūtileśo vai sarvametaccarācaram

शक्ति साक्षात् महादेवी हैं, और महादेव शक्तिमान् हैं; उन्हीं दोनों की विभूति के अंशमात्र से यह सम्पूर्ण चराचर जगत् है।

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.39.5)

वस्तु किञ्चिदचिद्रूपं किञ्चिद्वस्तु चिदात्मकम् । द्वयं शुद्धमशुद्धं च परं चापरमेव च

vastu kiñcidacidrūpaṁ kiñcidvastu cidātmakam | dvayaṁ śuddhamaśuddhaṁ ca paraṁ cāparameva ca

कोई वस्तु अचित्-स्वरूप है, कोई वस्तु चित्-स्वरूप है; इस प्रकार शुद्ध और अशुद्ध, तथा पर और अपर — यह द्वैत है।

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.39.6)

यत्संसरति चिच्चक्रमचिच्चक्रसमन्वितम् । तदेवाशुद्धमपरमितरं तु परं शुभम्

yatsaṁsarati ciccakramaciccakrasamanvitam | tadevāśuddhamaparamitaraṁ tu paraṁ śubham

जो चित्-चक्र अचित्-चक्र से युक्त होकर संसरण करता है, वही अशुद्ध और अपर है; इसके विपरीत जो शेष है, वही शुद्ध और पर है।

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.39.7)

अपरं च परं चैव द्वयं चिदचिदात्मकम् । शिवस्य च शिवायाश्च स्वाम्यं चैतत्स्वभावतः

aparaṁ ca paraṁ caiva dvayaṁ cidacidātmakam | śivasya ca śivāyāśca svāmyaṁ caitatsvabhāvataḥ

यह लौकिक और अलौकिक, चित्-अचित् दोनों प्रकार का जो द्वैत है, वह स्वभावतः शिव और शिवा का ही स्वामित्व है।

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.39.8)

शिवयोर्वै वशे विश्वं न विश्वस्य वशे शिवौ । ईशितव्यमिदं यस्मात्तस्माद्विश्वेश्वरौ शिवौ

śivayorvai vaśe viśvaṁ na viśvasya vaśe śivau | īśitavyamidaṁ yasmāttasmādviśveśvarau śivau

यह विश्व शिव-शिवा के ही वश में है, शिव-शिवा विश्व के वश में नहीं हैं; चूँकि यह शासित होने योग्य है, इसलिए शिव-शिवा ही विश्वेश्वर हैं।

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.39.9)

यथा शिवस्तथा देवी यथा देवी तथा शिवः । नानयोरन्तरं विद्याच्चन्द्रचन्द्रिकयोरिव

yathā śivastathā devī yathā devī tathā śivaḥ | nānayorantaraṁ vidyāccandracandrikayoriva

जैसे शिव हैं, वैसी ही देवी हैं; जैसी देवी हैं, वैसे ही शिव हैं; उन दोनों में उतना ही अन्तर जानना चाहिए, जितना चन्द्रमा और चन्द्रिका में है।

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.39.10)

चन्द्रो न खलु भात्येष यथा चन्द्रिकया विना । न भाति विद्यमानोऽपि तथा शक्त्या विना शिवः

candro na khalu bhātyeṣa yathā candrikayā vinā | na bhāti vidyamāno'pi tathā śaktyā vinā śivaḥ

जैसे यह चन्द्रमा चन्द्रिका के बिना प्रकाशित नहीं होता, उसी प्रकार विद्यमान होते हुए भी शिव शक्ति के बिना प्रकाशित नहीं होते।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.39.11)

प्रभया हि विना यद्वद्भानुरेष न विद्यते । प्रभा च भानुना तेन सुतरां तदुपाश्रया

prabhayā hi vinā yadvadbhānureṣa na vidyate | prabhā ca bhānunā tena sutarāṁ tadupāśrayā

जैसे यह सूर्य प्रभा के बिना विद्यमान नहीं है, और प्रभा भी उस सूर्य पर ही अत्यन्त आश्रित है —

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.39.12)

एवं परस्परापेक्षा शक्तिशक्तिमतोः स्थिता । न शिवेन विना शक्तिर्न शक्त्या च विना शिवः

evaṁ parasparāpekṣā śaktiśaktimatoḥ sthitā | na śivena vinā śaktirna śaktyā ca vinā śivaḥ

इसी प्रकार शक्ति और शक्तिमान् की परस्पर अपेक्षा है; शिव के बिना शक्ति नहीं, और शक्ति के बिना शिव नहीं।

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.39.13)

शक्तौ यया शिवो नित्यं भक्तौ मुक्तौ च देहिनाम् । आद्या सैका परा शक्तिश्चिन्मयी शिवसंश्रया

śaktau yayā śivo nityaṁ bhaktau muktau ca dehinām | ādyā saikā parā śaktiścinmayī śivasaṁśrayā

जिस शक्ति में शिव सदा प्रतिष्ठित हैं, वह जीवों की भक्ति और मुक्ति की भी हेतु है; वह आदि, एकमात्र, परा, चिन्मयी शक्ति शिव के आश्रय में रहती है।

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.39.14)

यामाहुरखिलेशस्य तैस्तैरनुगुणैर्गुणैः । समानधर्मिणीमेव शिवस्य परमात्मनः

yāmāhurakhileśasya taistairanuguṇairguṇaiḥ | samānadharmiṇīmeva śivasya paramātmanaḥ

जिसे उन-उन गुणों के अनुसार उस सर्वेश्वर परमात्मा शिव के समान-धर्मी ही कहा जाता है —

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.39.15)

सैका परा च चिद्रूपा शक्तिः प्रसवधर्मिणी । विभज्य बहुधा विश्वं विदधाति शिवेच्छया

saikā parā ca cidrūpā śaktiḥ prasavadharmiṇī | vibhajya bahudhā viśvaṁ vidadhāti śivecchayā

वह एकमात्र, परा, चेतन-स्वरूप, उत्पादन-स्वभाव वाली शक्ति शिव की इच्छा से विश्व को अनेक प्रकार से विभक्त करके रचती है।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.39.16)

सा मूलप्रकृतिर्माया त्रिगुणा च त्रिधा स्मृता । शिवया च विपर्यस्तं यया ततमिदं जगत्

sā mūlaprakṛtirmāyā triguṇā ca tridhā smṛtā | śivayā ca viparyastaṁ yayā tatamidaṁ jagat

वही मूलप्रकृति, माया, त्रिगुणात्मिका है, और तीन प्रकार की मानी गयी है; शिवा से विपरीत रूप में परिणत होकर उसी के द्वारा यह जगत् व्याप्त है।

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.39.17)

एकधा च द्विधा चैव तथा शतसहस्रधा । शक्तयः खलु भिद्यन्ते बहुधा व्यवहारतः

ekadhā ca dvidhā caiva tathā śatasahasradhā | śaktayaḥ khalu bhidyante bahudhā vyavahārataḥ

एक रूप में, दो रूपों में, तथा सैकड़ों-हजारों रूपों में — शक्तियाँ व्यवहार की दृष्टि से अनेक प्रकार से विभाजित होती हैं।

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.39.18)

शिवेच्छया पराशक्तिः शिवतत्त्वैकतां गता । ततः परिस्फुरत्यादौ सर्गे तैलं तिलादिव

śivecchayā parāśaktiḥ śivatattvaikatāṁ gatā | tataḥ parisphuratyādau sarge tailaṁ tilādiva

शिव की इच्छा से परा शक्ति शिवतत्त्व के साथ एकत्व को प्राप्त हो जाती है; फिर सृष्टि के आरम्भ में वह ऐसे प्रकट होती है, जैसे तिल से तेल।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.39.19)

ततः क्रियाख्यया शक्त्या शक्तौ शक्तिमदुत्थया । तस्यां विक्षोभ्यमाणायामादौ नादः समुद्बभौ

tataḥ kriyākhyayā śaktyā śaktau śaktimadutthayā | tasyāṁ vikṣobhyamāṇāyāmādau nādaḥ samudbabhau

तत्पश्चात् शक्ति में उस शक्तिमान् से उत्पन्न, क्रिया नामक शक्ति के द्वारा, उसके क्षुब्ध किये जाने पर, सबसे पहले नाद उत्पन्न हुआ।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.39.20)

नादाद्विनिःसृतो बिन्दुर्बिन्दोदेवः सदाशिवः । तस्मान् महेश्वरो जातः शुद्धविद्या महेश्वरात्

nādādviniḥsṛto bindurbindodevaḥ sadāśivaḥ | tasmān maheśvaro jātaḥ śuddhavidyā maheśvarāt

नाद से बिन्दु उत्पन्न हुआ, बिन्दु से सदाशिव देव उत्पन्न हुए; उनसे महेश्वर उत्पन्न हुए, और महेश्वर से शुद्धविद्या उत्पन्न हुई।

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.39.21)

सा वाचामीश्वरी शक्तिर्वागीशाख्या हि शूलिनः । या सा वर्णस्वरूपेण मातृकेऽपि विजृम्भते

sā vācāmīśvarī śaktirvāgīśākhyā hi śūlinaḥ | yā sā varṇasvarūpeṇa mātṛke'pi vijṛmbhate

वही शक्ति वाणी की स्वामिनी है, और त्रिशूलधारी की 'वागीश' नामक शक्ति कहलाती है; वही वर्ण-स्वरूप से मातृका-वर्णमाला में भी विस्तृत होती है।

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.39.22)

अथानन्तसमावेशान्माया कालमवासृजत् । नियतिं च कलां विद्यां कलातो रागपूरुषौ

athānantasamāveśānmāyā kālamavāsṛjat | niyatiṁ ca kalāṁ vidyāṁ kalāto rāgapūruṣau

तत्पश्चात् अनन्त-रूप में प्रवेश करके माया ने काल को, नियति को, कला को, विद्या को उत्पन्न किया; तथा कला से राग और पुरुष को।

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.39.23)

मायातः पुनरेवाभूदव्यक्तं त्रिगुणात्मकम् । त्रिगुणाच्च ततोऽव्यक्ताद्विभक्ताः स्युस्त्रयो गुणाः

māyātaḥ punarevābhūdavyaktaṁ triguṇātmakam | triguṇācca tato'vyaktādvibhaktāḥ syustrayo guṇāḥ

माया से पुनः त्रिगुणात्मक अव्यक्त उत्पन्न हुई; और उस त्रिगुणात्मक अव्यक्त से तीनों गुण पृथक्-पृथक् प्रकट हुए।

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.39.24)

सत्त्वं रजस्तमश्चेति यैर्व्याप्तमखिलं जगत् । गुणेभ्यः क्षोभ्यमाणेभ्यो गुणेशाख्यास्त्रिमूर्तयः

sattvaṁ rajastamaśceti yairvyāptamakhilaṁ jagat | guṇebhyaḥ kṣobhyamāṇebhyo guṇeśākhyāstrimūrtayaḥ

सत्त्व, रज और तम — जिनसे सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है; उन क्षुब्ध किये गये गुणों से 'गुणेश' नामक तीन मूर्तियाँ —

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.39.25)

अभवन् महदादीनि तत्त्वानि च यथाक्रमम् । तेभ्यः स्युरण्डपिण्डानि त्वसङ्ख्यानि शिवाज्ञया । अधिष्ठितान्यनन्ताद्यैर्विद्येशैश्चक्रवर्तिभिः

abhavan mahadādīni tattvāni ca yathākramam | tebhyaḥ syuraṇḍapiṇḍāni tvasaṅkhyāni śivājñayā | adhiṣṭhitānyanantādyairvidyeśaiścakravartibhiḥ

और उनसे क्रमशः महत् आदि तत्त्व उत्पन्न हुए; उनसे शिव की आज्ञा से असंख्य ब्रह्माण्ड-पिण्ड उत्पन्न होते हैं, जो अनन्त आदि सम्राट् विद्येश्वरों से अधिष्ठित हैं।

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.39.26)

शरीरान्तरभेदेन शक्तेर्भेदाः प्रकीर्तिताः । नानारूपास्तु विज्ञेयाः स्थूलसूक्ष्मविभेदतः

śarīrāntarabhedena śakterbhedāḥ prakīrtitāḥ | nānārūpāstu vijñeyāḥ sthūlasūkṣmavibhedataḥ

शरीर के भेद से शक्ति के भेद कहे गये हैं; स्थूल और सूक्ष्म के भेद से उन्हें अनेक रूपों में जानना चाहिए।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.39.27)

रुद्रस्य रौद्री सा शक्तिर्विष्णौर्वै वैष्णवी मता । ब्रह्माणी ब्रह्मणः प्रोक्ता चेन्द्रस्यैन्द्रीति कथ्यते

rudrasya raudrī sā śaktirviṣṇaurvai vaiṣṇavī matā | brahmāṇī brahmaṇaḥ proktā cendrasyaindrīti kathyate

रुद्र की शक्ति 'रौद्री' मानी गयी है, विष्णु की 'वैष्णवी' मानी गयी है; ब्रह्मा की 'ब्रह्माणी' कही गयी है, और इन्द्र की 'ऐन्द्री' कही जाती है।

श्लोक 28 (shiva.vayaviya.39.28)

किमत्र बहुनोक्तेन यद्विश्वमिति कीर्तितम् । शक्यात्मनैव तद्व्याप्तं यथा देहेऽन्तरात्मना

kimatra bahunoktena yadviśvamiti kīrtitam | śakyātmanaiva tadvyāptaṁ yathā dehe'ntarātmanā

यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ — जो कुछ भी 'विश्व' कहा गया है, वह सब शक्ति के स्वरूप से ही व्याप्त है, जैसे देह अन्तरात्मा से व्याप्त है।

श्लोक 29 (shiva.vayaviya.39.29)

तस्माच्छक्तिमयं सर्वं जगत्स्थावरजङ्गमम् । कला या परमा शक्तिः कथिता परमात्मनः

tasmācchaktimayaṁ sarvaṁ jagatsthāvarajaṅgamam | kalā yā paramā śaktiḥ kathitā paramātmanaḥ

इसलिए स्थावर-जंगम सहित यह सम्पूर्ण जगत् शक्तिमय ही है; जो परमात्मा की एक कला-मात्र है, वही परम शक्ति कही गयी है।

श्लोक 30 (shiva.vayaviya.39.30)

एवमेषा परा शक्तिरीश्वरेच्छानुयायिनी । स्थिरं चरं च यद्विश्वं सृजतीति विनिश्चयः

evameṣā parā śaktirīśvarecchānuyāyinī | sthiraṁ caraṁ ca yadviśvaṁ sṛjatīti viniścayaḥ

इस प्रकार यह परा शक्ति, ईश्वर की इच्छा का अनुसरण करती हुई, स्थावर और जंगम — दोनों प्रकार के इस विश्व की रचना करती है — यह निश्चय है।

श्लोक 31 (shiva.vayaviya.39.31)

ज्ञानक्रिया चिकीर्षाभिस्तिसृभिः स्वात्मशक्तिभिः । शक्तिमानीश्वरः शश्वत् विश्वं व्याप्याधितिष्ठति

jñānakriyā cikīrṣābhistisṛbhiḥ svātmaśaktibhiḥ | śaktimānīśvaraḥ śaśvat viśvaṁ vyāpyādhitiṣṭhati

ज्ञान, क्रिया तथा चिकीर्षा — इन अपनी तीन शक्तियों के द्वारा शक्तिमान् ईश्वर सदा इस विश्व में व्याप्त होकर उस पर अधिष्ठित रहते हैं।

श्लोक 32 (shiva.vayaviya.39.32)

इदमित्थमिदं नेत्थं भवेदित्येवमात्मिका । इच्छाशक्तिर्महेशस्य नित्या कार्यनियामिका

idamitthamidaṁ netthaṁ bhavedityevamātmikā | icchāśaktirmaheśasya nityā kāryaniyāmikā

"यह ऐसे हो, यह ऐसे न हो" — इस स्वरूप वाली महेश की नित्य इच्छाशक्ति ही कार्य की नियामिका है।

श्लोक 33 (shiva.vayaviya.39.33)

ज्ञानशक्तिस्तु तत्कार्यं करणं कारणं तथा । प्रयोजनं च तत्त्वेन बुद्धिरूपाध्यवस्यति

jñānaśaktistu tatkāryaṁ karaṇaṁ kāraṇaṁ tathā | prayojanaṁ ca tattvena buddhirūpādhyavasyati

ज्ञानशक्ति ही, बुद्धि-रूप में, उस कार्य, कारण, साधन तथा प्रयोजन का वास्तविक रूप में निश्चय करती है।

श्लोक 34 (shiva.vayaviya.39.34)

यथेप्सितं क्रियाशक्तिर्यथाध्यवसितं जगत् । कल्पयत्यखिलं कार्यं क्षणात्सङ्कल्परूपिणी

yathepsitaṁ kriyāśaktiryathādhyavasitaṁ jagat | kalpayatyakhilaṁ kāryaṁ kṣaṇātsaṅkalparūpiṇī

क्रियाशक्ति, संकल्प-स्वरूप होकर, जिस प्रकार वांछित हो, जिस प्रकार निश्चित हो, उसी प्रकार क्षणमात्र में सम्पूर्ण जगत् और समस्त कार्य की रचना कर देती है।

श्लोक 35 (shiva.vayaviya.39.35)

यथाशक्ति त्रयोत्थानं शक्तिप्रसवधर्मिणी । शक्त्या परमया नुन्ना प्रसूते सकलं जगत्

yathāśakti trayotthānaṁ śaktiprasavadharmiṇī | śaktyā paramayā nunnā prasūte sakalaṁ jagat

इस प्रकार तीनों शक्तियों का उदय होने पर, प्रसव-स्वभाव वाली वह शक्ति, परम शक्ति से प्रेरित होकर, सम्पूर्ण जगत् को जन्म देती है।

श्लोक 36 (shiva.vayaviya.39.36)

एवं शक्तिसमायोगात् शक्तिमानुच्यते शिवः । शक्तिशक्तिमदुत्थं तु शाक्तं शैवमिदं जगत्

evaṁ śaktisamāyogāt śaktimānucyate śivaḥ | śaktiśaktimadutthaṁ tu śāktaṁ śaivamidaṁ jagat

इस प्रकार शक्ति के संयोग से ही शिव को 'शक्तिमान्' कहा जाता है; शक्ति और शक्तिमान् से उत्पन्न यह जगत् शाक्त भी है और शैव भी है।

श्लोक 37 (shiva.vayaviya.39.37)

यथा न जायते पुत्रः पितरं मातरं विना । तथा भवं भवानीं च विना नैतच्चराचरम्

yathā na jāyate putraḥ pitaraṁ mātaraṁ vinā | tathā bhavaṁ bhavānīṁ ca vinā naitaccarācaram

जैसे पिता और माता के बिना पुत्र उत्पन्न नहीं होता, वैसे ही भव और भवानी के बिना यह चराचर जगत् उत्पन्न नहीं होता।

श्लोक 38 (shiva.vayaviya.39.38)

स्त्रीपुंसप्रभवं विश्वं स्त्रीपुंसात्मकमेव च स्त्रीपुंसयोर्विभूतिश्च स्त्रीपुंसाभ्यामधिष्ठितम्

strīpuṁsaprabhavaṁ viśvaṁ strīpuṁsātmakameva ca strīpuṁsayorvibhūtiśca strīpuṁsābhyāmadhiṣṭhitam

यह विश्व स्त्री-पुरुष से उत्पन्न है, स्त्री-पुरुष-स्वरूप ही है, स्त्री-पुरुष की ही विभूति है, और स्त्री-पुरुष के द्वारा ही अधिष्ठित है।

श्लोक 39 (shiva.vayaviya.39.39)

परमात्मा शिवः प्रोक्तः शिवा सा च प्रकीर्तिता शिवः सदाशिवः प्रोक्तः शिवा सा च मनोन्मनी । शिवो महेश्वरो ज्ञेयः शिवा मायेति कथ्यते

paramātmā śivaḥ proktaḥ śivā sā ca prakīrtitā śivaḥ sadāśivaḥ proktaḥ śivā sā ca manonmanī | śivo maheśvaro jñeyaḥ śivā māyeti kathyate

परमात्मा को 'शिव' कहा गया है, और वह देवी 'शिवा' कहलायी हैं; शिव को 'सदाशिव' कहा गया है, और वह देवी 'मनोन्मनी' कहलायी हैं; शिव को 'महेश्वर' जानना चाहिए, और वह देवी 'माया' कही जाती हैं।

श्लोक 40 (shiva.vayaviya.39.40)

पुरुषः परमेशानः प्रकृतिः परमेश्वरी । रुद्रो महेश्वरः साक्षाद् रुद्राणी रुद्रवल्लभा

puruṣaḥ parameśānaḥ prakṛtiḥ parameśvarī | rudro maheśvaraḥ sākṣād rudrāṇī rudravallabhā

पुरुष परमेश्वर हैं, और प्रकृति परमेश्वरी हैं; रुद्र साक्षात् महेश्वर हैं, और रुद्र की प्रिया रुद्राणी हैं।

श्लोक 41 (shiva.vayaviya.39.41)

विष्णुर्विश्वेश्वरो देवो लक्ष्मीर्विश्वेश्वरप्रिया । ब्रह्मा शिवो यदा स्रष्टा ब्रह्माणी ब्रह्मणः प्रिया

viṣṇurviśveśvaro devo lakṣmīrviśveśvarapriyā | brahmā śivo yadā sraṣṭā brahmāṇī brahmaṇaḥ priyā

विष्णु विश्वेश्वर देव हैं, और लक्ष्मी विश्वेश्वर की प्रिया हैं; जब शिव ही सृष्टिकर्ता ब्रह्मा हैं, तब ब्रह्माणी ब्रह्मा की प्रिया हैं।

श्लोक 42 (shiva.vayaviya.39.42)

भास्करो भगवान् शम्भुः प्रभा भगवती शिवा । महेन्द्रो मन्मथारातिः शची शैलेन्द्रकन्यका

bhāskaro bhagavān śambhuḥ prabhā bhagavatī śivā | mahendro manmathārātiḥ śacī śailendrakanyakā

भास्कर भगवान् शम्भु ही हैं, और प्रभा भगवती शिवा ही हैं; कामदेव के शत्रु ही महेन्द्र हैं, और गिरिराज-पुत्री ही शची हैं।

श्लोक 43 (shiva.vayaviya.39.43)

जातवेदा महादेवः स्वाहा शर्वार्धदेहिनी । यमस्त्रियम्बको देवस्तत्प्रिया गिरिकन्यका

jātavedā mahādevaḥ svāhā śarvārdhadehinī | yamastriyambako devastatpriyā girikanyakā

जातवेदा महादेव ही हैं, और स्वाहा शर्व के अर्धदेह-स्वरूपिणी हैं; यम त्र्यम्बक देव ही हैं, और उनकी प्रिया गिरिकन्या हैं।

श्लोक 44 (shiva.vayaviya.39.44)

निरृतिर्भगवानीशो नैरृती नगनन्दिनी । वरुणो भगवान् रुद्रो वारुणी भूधरात्मजा

nirṛtirbhagavānīśo nairṛtī naganandinī | varuṇo bhagavān rudro vāruṇī bhūdharātmajā

निर्ऋति भगवान् ईश ही हैं, और नैर्ऋती पर्वत-पुत्री ही हैं; वरुण भगवान् रुद्र ही हैं, और वारुणी पर्वत की पुत्री ही हैं।

श्लोक 45 (shiva.vayaviya.39.45)

बालेन्दुशेखरो वायुः शिवा शिवमनोहरा । यक्षो यज्ञशिरोहर्ता ऋद्धिर्हिमगिरीन्द्रजा

bālenduśekharo vāyuḥ śivā śivamanoharā | yakṣo yajñaśirohartā ṛddhirhimagirīndrajā

बालचन्द्रशेखर ही वायु हैं, और मन को हरने वाली शिवा ही उनकी प्रिया हैं; यज्ञ का सिर हरने वाले ही यक्ष हैं, और ऋद्धि हिमगिरीन्द्र-पुत्री ही हैं।

श्लोक 46 (shiva.vayaviya.39.46)

चन्द्रार्धशेखरश्चन्द्रो रोहिणी रुद्रवल्लभा । ईशानः परमेशानस्तदार्या परमेश्वरी

candrārdhaśekharaścandro rohiṇī rudravallabhā | īśānaḥ parameśānastadāryā parameśvarī

अर्धचन्द्रशेखर ही चन्द्रमा हैं, और रोहिणी रुद्र की प्रिया ही हैं; ईशान परमेश्वर ही हैं, और वह आर्या परमेश्वरी ही हैं।

श्लोक 47 (shiva.vayaviya.39.47)

अनन्तवलयोऽनन्तो ह्यनन्तानन्तवल्लभा । कालाग्निरुद्रः कालारिः काली कालान्तकप्रिया

anantavalayo'nanto hyanantānantavallabhā | kālāgnirudraḥ kālāriḥ kālī kālāntakapriyā

अनन्त-वलय वाले ही अनन्त हैं, और अनन्त की प्रिया अनन्ता देवी ही हैं; कालाग्निरुद्र ही काल के शत्रु हैं, और काली काल के अन्तक की प्रिया हैं।

श्लोक 48 (shiva.vayaviya.39.48)

पुरुषाख्यो मनुः शम्भुः शतरूपा शिवप्रिया । दक्षः साक्षान्महादेवः प्रसूतिः परमेश्वरी

puruṣākhyo manuḥ śambhuḥ śatarūpā śivapriyā | dakṣaḥ sākṣānmahādevaḥ prasūtiḥ parameśvarī

पुरुष नामक मनु शम्भु ही हैं, और शतरूपा शिव की प्रिया ही हैं; दक्ष साक्षात् महादेव ही हैं, और प्रसूति परमेश्वरी ही हैं।

श्लोक 49 (shiva.vayaviya.39.49)

रुचिर्भवो भवानी च बुधैराकूतिरुच्यते । भृगुर्भगाक्षिहा देवः ख्यातिस्त्रिनयनप्रिया

rucirbhavo bhavānī ca budhairākūtirucyate | bhṛgurbhagākṣihā devaḥ khyātistrinayanapriyā

रुचि भव ही हैं, और आकूति को विद्वानों ने भवानी कहा है; भृगु भग के नेत्र को नष्ट करने वाले देव ही हैं, और ख्याति त्रिनेत्र की प्रिया ही हैं।

श्लोक 50 (shiva.vayaviya.39.50)

मरीचिर्भगवान् रुद्रः सम्भूतिः शर्ववल्लभा । गङ्गाधरोऽङ्गिरा ज्ञेयः स्मृतिः साक्षादुमा स्मृता

marīcirbhagavān rudraḥ sambhūtiḥ śarvavallabhā | gaṅgādharo'ṅgirā jñeyaḥ smṛtiḥ sākṣādumā smṛtā

मरीचि भगवान् रुद्र ही हैं, और सम्भूति शर्व की प्रिया हैं; गंगाधर को ही अंगिरा जानना चाहिए, और स्मृति साक्षात् उमा ही मानी गयी है।

श्लोक 51 (shiva.vayaviya.39.51)

पुलस्त्यः शशभृन्मौलिः प्रीतिः कान्ता पिनाकिनः । पुलहस्त्रिपुरध्वंसी तत्प्रिया तु शिवप्रिया

pulastyaḥ śaśabhṛnmauliḥ prītiḥ kāntā pinākinaḥ | pulahastripuradhvaṁsī tatpriyā tu śivapriyā

शशिधारी मस्तक वाले ही पुलस्त्य हैं, और प्रीति पिनाकधारी की प्रिया हैं; त्रिपुर-नाशक ही पुलह हैं, और उनकी प्रिया शिवप्रिया ही है।

श्लोक 52 (shiva.vayaviya.39.52)

क्रतुध्वंसी क्रतुः प्रोक्तः सन्नतिर्दयिता विभोः । त्रिनेत्रोऽत्रिरुमा साक्षादनसूया स्मृता बुधैः

kratudhvaṁsī kratuḥ proktaḥ sannatirdayitā vibhoḥ | trinetro'trirumā sākṣādanasūyā smṛtā budhaiḥ

यज्ञ-नाशक ही क्रतु कहे गये हैं, और सन्नति उस विभु की प्रिया हैं; त्रिनेत्र ही अत्रि हैं, और साक्षात् उमा को ही विद्वानों ने अनसूया माना है।

श्लोक 53 (shiva.vayaviya.39.53)

कश्यपः कालहा देवो देवमाता महेश्वरी । वसिष्ठो मन्मथारातिर्देवी साक्षादरुन्धती

kaśyapaḥ kālahā devo devamātā maheśvarī | vasiṣṭho manmathārātirdevī sākṣādarundhatī

काल का नाश करने वाले देव ही कश्यप हैं, और देवताओं की माता माहेश्वरी ही हैं; कामदेव के शत्रु ही वसिष्ठ हैं, और देवी साक्षात् अरुन्धती ही हैं।

श्लोक 54 (shiva.vayaviya.39.54)

शङ्करः पुरुषाः सर्वे स्त्रियः सर्वा महेश्वरी । सर्वे स्त्रीपुरुषास्तस्मात्तयोरेव विभूतयः

śaṅkaraḥ puruṣāḥ sarve striyaḥ sarvā maheśvarī | sarve strīpuruṣāstasmāttayoreva vibhūtayaḥ

सभी पुरुष शंकर ही हैं, और सभी स्त्रियाँ माहेश्वरी ही हैं; इसलिए समस्त स्त्री-पुरुष उन्हीं दोनों की विभूतियाँ हैं।

श्लोक 55 (shiva.vayaviya.39.55)

विषयी भगवानीशो विषयः परमेश्वरी । श्राव्यं सर्वमुमारूपं श्रोता शूलवरायुधः

viṣayī bhagavānīśo viṣayaḥ parameśvarī | śrāvyaṁ sarvamumārūpaṁ śrotā śūlavarāyudhaḥ

भगवान् ईश ही विषयी हैं, और परमेश्वरी ही विषय हैं; जो कुछ भी श्रवण योग्य है, वह सब उमा-स्वरूप है, और श्रोता श्रेष्ठ त्रिशूल-धारी शिव हैं।

श्लोक 56 (shiva.vayaviya.39.56)

प्रष्टव्यं वस्तुजातं तु धत्ते शङ्करवल्लभा । प्रष्टा स एव विश्वात्मा बालचन्द्रावतंसकः

praṣṭavyaṁ vastujātaṁ tu dhatte śaṅkaravallabhā | praṣṭā sa eva viśvātmā bālacandrāvataṁsakaḥ

पूछे जाने योग्य समस्त वस्तुओं को शंकर की प्रिया ही धारण करती हैं, और पूछने वाला वही बालचन्द्र-भूषित विश्वात्मा शिव हैं।

श्लोक 57 (shiva.vayaviya.39.57)

द्रष्टव्यं वस्तुरूपं तु बिभर्ति भववल्लभा । द्रष्टा विश्वेश्वरो देवः शशिखण्डशिखामणिः

draṣṭavyaṁ vasturūpaṁ tu bibharti bhavavallabhā | draṣṭā viśveśvaro devaḥ śaśikhaṇḍaśikhāmaṇiḥ

जो कुछ भी देखने योग्य वस्तु-स्वरूप है, उसे भव की प्रिया ही धारण करती हैं, और देखने वाले चन्द्रकला-मुकुटमणि विश्वेश्वर देव हैं।

श्लोक 58 (shiva.vayaviya.39.58)

रसजातं महादेवी देवो रसयिता शिवः । प्रेयजातं च गिरिजा प्रेयांश्चैव गराशनः

rasajātaṁ mahādevī devo rasayitā śivaḥ | preyajātaṁ ca girijā preyāṁścaiva garāśanaḥ

समस्त रस-जाति महादेवी ही हैं, और रस का अनुभव करने वाले देव शिव हैं; समस्त प्रिय पदार्थ गिरिजा ही हैं, और उन्हें प्रिय मानने वाले विषभक्षक हैं।

श्लोक 59 (shiva.vayaviya.39.59)

मन्तव्यवस्तुतां धत्ते सदा देवी महेश्वरी । मन्ता स एव विश्वात्मा महादेवो महेश्वरः

mantavyavastutāṁ dhatte sadā devī maheśvarī | mantā sa eva viśvātmā mahādevo maheśvaraḥ

विचारणीय वस्तु का स्वरूप देवी माहेश्वरी सदा धारण करती हैं, और विचार करने वाले वही विश्वात्मा महादेव माहेश्वर हैं।

श्लोक 60 (shiva.vayaviya.39.60)

बोद्धव्यवस्तुरूपं तु बिभर्ति भववल्लभा । देवः स एव भगवान् बोद्धा मुग्धेन्दुशेखरः

boddhavyavasturūpaṁ tu bibharti bhavavallabhā | devaḥ sa eva bhagavān boddhā mugdhenduśekharaḥ

जो कुछ भी जानने योग्य वस्तु-स्वरूप है, उसे भव की प्रिया ही धारण करती हैं, और जानने वाले वही भगवान् देव, चन्द्रशेखर हैं।

श्लोक 61 (shiva.vayaviya.39.61)

प्राणः पिनाकी सर्वेषां प्राणिनां भगवान् प्रभुः । प्राणस्थितिस्तु सर्वेषामम्बिका चाम्बुरूपिणी

prāṇaḥ pinākī sarveṣāṁ prāṇināṁ bhagavān prabhuḥ | prāṇasthitistu sarveṣāmambikā cāmburūpiṇī

पिनाकधारी भगवान् प्रभु ही समस्त प्राणियों के प्राण हैं, और अम्बिका ही जल-स्वरूप होकर सबके प्राणों की स्थिति हैं।

श्लोक 62 (shiva.vayaviya.39.62)

बिभर्ति क्षेत्रतां देवी त्रिपुरान्तकवल्लभा । क्षेत्रज्ञत्वं तदा धत्ते भगवानन्तकान्तकः

bibharti kṣetratāṁ devī tripurāntakavallabhā | kṣetrajñatvaṁ tadā dhatte bhagavānantakāntakaḥ

त्रिपुरान्तक की प्रिया देवी ही क्षेत्र-भाव को धारण करती हैं, और यम के भी अन्तक भगवान् ही तब क्षेत्रज्ञ-भाव को धारण करते हैं।

श्लोक 63 (shiva.vayaviya.39.63)

अहः शूलायुधो देवः शूलपाणिप्रिया निशा । आकाशः शङ्करो देवः पृथिवी शङ्करप्रिया

ahaḥ śūlāyudho devaḥ śūlapāṇipriyā niśā | ākāśaḥ śaṅkaro devaḥ pṛthivī śaṅkarapriyā

दिन त्रिशूलधारी देव ही हैं, और रात्रि त्रिशूलपाणि की प्रिया हैं; आकाश देव शंकर ही हैं, और पृथ्वी शंकर की प्रिया हैं।

श्लोक 64 (shiva.vayaviya.39.64)

समुद्रो भगवानीशो वेला शैलेन्द्रकन्यका । वृक्षो वृषध्वजो देवो लता विश्वेश्वरप्रिया

samudro bhagavānīśo velā śailendrakanyakā | vṛkṣo vṛṣadhvajo devo latā viśveśvarapriyā

समुद्र भगवान् ईश ही हैं, और वेला गिरिराज-पुत्री ही हैं; वृक्ष वृषभध्वज देव ही हैं, और लता विश्वेश्वर की प्रिया हैं।

श्लोक 65 (shiva.vayaviya.39.65)

पुँल्लिङ्गमखिलं धत्ते भगवान् पुरशासनः । स्त्रिलिङ्गं चाखिलं धत्ते देवी देवमनोरमा

pu~lliṅgamakhilaṁ dhatte bhagavān puraśāsanaḥ | striliṅgaṁ cākhilaṁ dhatte devī devamanoramā

भगवान् पुरशासन ही समस्त पुल्लिंग वस्तुओं को धारण करते हैं, और देव को मनोहर लगने वाली देवी ही समस्त स्त्रीलिंग वस्तुओं को धारण करती हैं।

श्लोक 66 (shiva.vayaviya.39.66)

शब्दजालमशेषं तु धत्ते सर्वस्य वल्लभा । अर्थस्वरूपमखिलं धत्ते मुग्धेन्दुशेखरः

śabdajālamaśeṣaṁ tu dhatte sarvasya vallabhā | arthasvarūpamakhilaṁ dhatte mugdhenduśekharaḥ

समस्त शब्द-समूह को सबकी प्रिया ही धारण करती हैं, और समस्त अर्थ-स्वरूप को चन्द्रशेखर धारण करते हैं।

श्लोक 67 (shiva.vayaviya.39.67)

यस्य यस्य पदार्थस्य या या शक्तिरुदाहृता । सा सा विश्वेश्वरी देवी स स सर्वो महेश्वरः

yasya yasya padārthasya yā yā śaktirudāhṛtā | sā sā viśveśvarī devī sa sa sarvo maheśvaraḥ

जिस-जिस पदार्थ की जो-जो शक्ति कही गयी है, वह-वह सब विश्वेश्वरी देवी ही है, और वह सब ही सर्वस्वरूप माहेश्वर है।

श्लोक 68 (shiva.vayaviya.39.68)

यत्परं यत्पवित्रं च यत्पुण्यं यच्च मङ्गलम् । तत्तदाह महाभागास्तयोस्तेजोविजृम्भितम्

yatparaṁ yatpavitraṁ ca yatpuṇyaṁ yacca maṅgalam | tattadāha mahābhāgāstayostejovijṛmbhitam

जो कुछ भी परम है, जो कुछ भी पवित्र है, जो कुछ भी पुण्यमय है, और जो कुछ भी मंगलमय है — महाभाग्यशाली मुनि कहते हैं कि वह सब उन्हीं दोनों के तेज का विस्तार है।

श्लोक 69 (shiva.vayaviya.39.69)

यथा दीपस्य दीप्तस्य शिखा दीपयते गृहम् । तथा तेजस्तयोरेतद् व्याप्य दीपयते जगत्

yathā dīpasya dīptasya śikhā dīpayate gṛham | tathā tejastayoretad vyāpya dīpayate jagat

जैसे प्रज्वलित दीपक की शिखा घर को प्रकाशित करती है, वैसे ही उन दोनों का यह तेज सम्पूर्ण जगत् में व्याप्त होकर उसे प्रकाशित करता है।

श्लोक 70 (shiva.vayaviya.39.70)

तृणादिशिवमूर्त्यन्तं विश्वख्यातिशयक्रमः । सन्निकर्षक्रमवशात्तयोरिति परा श्रुतिः

tṛṇādiśivamūrtyantaṁ viśvakhyātiśayakramaḥ | sannikarṣakramavaśāttayoriti parā śrutiḥ

तिनके से लेकर शिव की मूर्ति तक जो विश्व में महिमा का क्रमिक अन्तर है, वह उन दोनों की समीपता के क्रम के अनुसार ही है — ऐसा परम श्रुति का कथन है।

श्लोक 71 (shiva.vayaviya.39.71)

सर्वाकारात्मकावेतौ सर्वश्रेयोविधायिनौ । पूजनीयौ नमस्कार्यौ चिन्तनीयौ च सर्वदा

sarvākārātmakāvetau sarvaśreyovidhāyinau | pūjanīyau namaskāryau cintanīyau ca sarvadā

ये दोनों सर्वस्वरूप हैं, समस्त कल्याण के विधाता हैं; वे सदा पूजनीय, नमस्कार करने योग्य तथा चिन्तन करने योग्य हैं।

श्लोक 72 (shiva.vayaviya.39.72)

यथाप्रज्ञमिदं कृष्ण याथात्म्यं परमेशयोः । कथितं हि मया तेऽद्य न तु तावदियत्तया

yathāprajñamidaṁ kṛṣṇa yāthātmyaṁ parameśayoḥ | kathitaṁ hi mayā te'dya na tu tāvadiyattayā

हे कृष्ण! परमेश्वर-दम्पति का यह वास्तविक स्वरूप मैंने आज तुम्हें अपनी बुद्धि के अनुसार बताया है, परन्तु उतने मात्र में ही सीमित नहीं है।

श्लोक 73 (shiva.vayaviya.39.73)

तत्कथं शक्यते वक्तुं याथात्म्यं परमेशयोः । महतामपि सर्वेषां मनसोऽपि बहिर्गतम्

tatkathaṁ śakyate vaktuṁ yāthātmyaṁ parameśayoḥ | mahatāmapi sarveṣāṁ manaso'pi bahirgatam

फिर उस परमेश्वर-दम्पति के वास्तविक स्वरूप को कैसे कहा जा सकता है, जो बड़े-बड़े महात्माओं के मन से भी परे है?

श्लोक 74 (shiva.vayaviya.39.74)

अन्तर्गतमनन्यानामीश्वरार्पितचेतसाम् । अन्येषां बुद्ध्यनारूढमारूढं च यथैव तत्

antargatamananyānāmīśvarārpitacetasām | anyeṣāṁ buddhyanārūḍhamārūḍhaṁ ca yathaiva tat

वह अनन्य भक्तों के, जिनका चित्त ईश्वर को समर्पित है, अन्तःकरण में प्रविष्ट है; परन्तु वह अन्य लोगों की बुद्धि में उसी प्रकार नहीं चढ़ता।

श्लोक 75 (shiva.vayaviya.39.75)

येयमुक्ता विभूतिर्वै प्राकृती सा परा मता । अप्राकृतां परामन्यां गुह्यां गुह्यविदो विदुः

yeyamuktā vibhūtirvai prākṛtī sā parā matā | aprākṛtāṁ parāmanyāṁ guhyāṁ guhyavido viduḥ

जो यह विभूति कही गयी है, वह प्राकृत मानी गयी है — यद्यपि वह भी परा है; इससे भिन्न, अप्राकृत, गुह्यतर परा विभूति को रहस्य-वेत्ता ही जानते हैं।

श्लोक 76 (shiva.vayaviya.39.76)

यतो वाचो निवर्तन्ते मनसा चेन्द्रियैः सह । अप्राकृती परा चैषा विभूतिः पारमेश्वरी

yato vāco nivartante manasā cendriyaiḥ saha | aprākṛtī parā caiṣā vibhūtiḥ pārameśvarī

जिससे वाणी मन और इन्द्रियों-सहित लौट आती है — वही यह अप्राकृत, परा, पारमेश्वरी विभूति है।

श्लोक 77 (shiva.vayaviya.39.77)

सैवेह परमं धाम सैवेह परमा गतिः । सैवेह परमा काष्ठा विभूतिः परमेष्ठिनः

saiveha paramaṁ dhāma saiveha paramā gatiḥ | saiveha paramā kāṣṭhā vibhūtiḥ parameṣṭhinaḥ

वही यहाँ परम धाम है, वही परम गति है, वही परमेष्ठी की परम पराकाष्ठा-रूप विभूति है।

श्लोक 78 (shiva.vayaviya.39.78)

तां प्राप्तुं प्रयतन्तेऽत्र जितश्वासा जितेन्द्रियाः । गर्भकारागृहद्वारं निश्छिद्रं घटितं यथा

tāṁ prāptuṁ prayatante'tra jitaśvāsā jitendriyāḥ | garbhakārāgṛhadvāraṁ niśchidraṁ ghaṭitaṁ yathā

उसे प्राप्त करने के लिए वे साधक, जिन्होंने श्वास और इन्द्रियों को जीत लिया है, यहाँ प्रयत्न करते हैं — जैसे गर्भरूपी कारागृह का द्वार छिद्ररहित बन्द कर दिया गया हो।

श्लोक 79 (shiva.vayaviya.39.79)

संसाराशीविषालीढमृतसञ्जीवनौषधम् । विभूतिं शिवयोर्विद्वान्न बिभेति कुतश्चन

saṁsārāśīviṣālīḍhamṛtasañjīvanauṣadham | vibhūtiṁ śivayorvidvānna bibheti kutaścana

संसाररूपी सर्प द्वारा डँसे हुए के लिए सत्य-संजीवनी औषधि के समान शिव-शक्ति की उस विभूति को जानने वाला विद्वान् कहीं से भी भयभीत नहीं होता।

श्लोक 80 (shiva.vayaviya.39.80)

यः परामपरां चैव विभूतिं वेत्ति तत्त्वतः । सोऽपरां भूतिमुल्लङ्घ्य परां भूतिं समश्नुते

yaḥ parāmaparāṁ caiva vibhūtiṁ vetti tattvataḥ | so'parāṁ bhūtimullaṅghya parāṁ bhūtiṁ samaśnute

जो पर और अपर, दोनों प्रकार की विभूति को तत्त्वतः जानता है, वह अपर विभूति को लांघकर परा विभूति को प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 81 (shiva.vayaviya.39.81)

एतत्ते कथितं कृष्ण याथात्म्यं परमात्मनोः । रहस्यमपि योग्योऽसि भर्गभक्तो भवानिति

etatte kathitaṁ kṛṣṇa yāthātmyaṁ paramātmanoḥ | rahasyamapi yogyo'si bhargabhakto bhavāniti

हे कृष्ण! तुम्हें परमात्मा-दम्पति का यह वास्तविक स्वरूप बता दिया गया; तुम भर्ग के भक्त हो, इसलिए यह रहस्य भी बताने योग्य पात्र हो।

श्लोक 82 (shiva.vayaviya.39.82)

नाशिष्येभ्योऽप्यशैवेभ्यो नाभक्तेभ्यः कदाचन । व्याहरेदीशयोर्भूतिमिति वेदानुशासनम्

nāśiṣyebhyo'pyaśaivebhyo nābhaktebhyaḥ kadācana | vyāharedīśayorbhūtimiti vedānuśāsanam

शिष्यों के अतिरिक्त, अशैवों को, तथा अभक्तों को यह कभी नहीं कहना चाहिए; ईश्वर-दम्पति की इस विभूति के विषय में यही वेद का अनुशासन है।

श्लोक 83 (shiva.vayaviya.39.83)

तस्मात्त्वमतिकल्याण परेभ्यः कथयेन्न हि । त्वादृशेभ्योऽनुरूपेभ्यः कथयैतन्न चान्यथा

tasmāttvamatikalyāṇa parebhyaḥ kathayenna hi | tvādṛśebhyo'nurūpebhyaḥ kathayaitanna cānyathā

इसलिए, हे परम कल्याणकारी! तुम इसे अन्य लोगों को मत कहो; इसे केवल अपने ही समान योग्य पात्रों को कहो, अन्यथा नहीं।

श्लोक 84 (shiva.vayaviya.39.84)

विभूतिमेतां शिवयोर्योग्येभ्यो यः प्रदापयेत् । संसारसागरान् मुक्तः शिवसायुज्यमाप्नुयात्

vibhūtimetāṁ śivayoryogyebhyo yaḥ pradāpayet | saṁsārasāgarān muktaḥ śivasāyujyamāpnuyāt

जो कोई इस शिव-शक्ति की विभूति को योग्य पात्रों को प्रदान करता है, वह संसार-सागर से मुक्त होकर शिव-सायुज्य को प्राप्त करता है।

श्लोक 85 (shiva.vayaviya.39.85)

कीर्तनादस्य नश्यन्ति महान्त्यः पापकोटयः । त्रिश्चतुर्धा समभ्यस्तैर्विनश्यन्ति ततोऽधिकाः

kīrtanādasya naśyanti mahāntyaḥ pāpakoṭayaḥ | triścaturdhā samabhyastairvinaśyanti tato'dhikāḥ

इसके कीर्तन से करोड़ों महान् पाप भी नष्ट हो जाते हैं; तीन-चार बार अभ्यास करने से उससे भी अधिक पाप नष्ट होते हैं।

श्लोक 86 (shiva.vayaviya.39.86)

नश्यन्त्यनिष्टरिपवो वर्धन्ते सुहृदस्तथा । विद्या च वर्धते शैवी मतिः सत्ये प्रवर्तते

naśyantyaniṣṭaripavo vardhante suhṛdastathā | vidyā ca vardhate śaivī matiḥ satye pravartate

अनिष्टकारी शत्रु नष्ट हो जाते हैं, और मित्र बढ़ते हैं; शैव विद्या बढ़ती है, तथा बुद्धि सत्य में प्रवृत्त होती है।

श्लोक 87 (shiva.vayaviya.39.87)

भक्तिः पराः शिवे साम्बे सानुगे सपरिच्छिदे । यद्यदिष्टतमं चान्यत्तत्तदाप्नोत्यसंशयम्

bhaktiḥ parāḥ śive sāmbe sānuge saparicchide | yadyadiṣṭatamaṁ cānyattattadāpnotyasaṁśayam

अम्बा-सहित, गणों-सहित, सीमारहित शिव में परम भक्ति प्राप्त होती है, और जो-जो अन्य अभीष्ट वस्तु हो, वह भी निःसंशय प्राप्त हो जाती है।

श्लोक 88 (shiva.vayaviya.39.88)

अन्तःशुचिः शिवे भक्तो विस्रब्धः कीर्तयेद्यदि । प्रबलैः कर्मभिः पूर्वैः फलं चेत्प्रतिबध्यते । पुनः पुनः समभ्यस्येत्तस्य नास्तीह दुर्लभम्

antaḥśuciḥ śive bhakto visrabdhaḥ kīrtayedyadi | prabalaiḥ karmabhiḥ pūrvaiḥ phalaṁ cetpratibadhyate | punaḥ punaḥ samabhyasyettasya nāstīha durlabham

यदि अन्तःशुद्ध, शिव-भक्त, विश्वस्त होकर कोई इसका कीर्तन करे, और यदि पूर्वजन्म के प्रबल कर्मों से फल में बाधा उत्पन्न हो, तो उसे बार-बार अभ्यास करना चाहिए — उसके लिए इस संसार में कुछ भी दुर्लभ नहीं है।

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