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वायवीय संहिता · अध्याय 41

शिवतत्त्ववर्णन

अध्याय 40अध्याय-सूचीअध्याय 42

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.41.1)

उपमन्युरुवाच । न शिवस्याणवो बन्धः कार्यो मायेय एव वा । प्राकृतो वाथ बोद्धा वा ह्यहङ्कारात्मकस्तथा

upamanyuruvāca | na śivasyāṇavo bandhaḥ kāryo māyeya eva vā | prākṛto vātha boddhā vā hyahaṅkārātmakastathā

उपमन्यु ने कहा — शिव को न तो आणव बन्धन है, न कार्य बन्धन, न मायीय बन्धन; न प्राकृत बन्धन, न बुद्धि-सम्बन्धी, न अहंकार-स्वरूप बन्धन।

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.41.2)

नैवास्य मानसो बन्धो न चैत्तो नेन्द्रियात्मकः । न च तन्मात्रबन्धोऽपि भूतबन्धो न कश्चन

naivāsya mānaso bandho na caitto nendriyātmakaḥ | na ca tanmātrabandho'pi bhūtabandho na kaścana

उसे न मन-सम्बन्धी बन्धन है, न चित्त-सम्बन्धी, न इन्द्रिय-स्वरूप बन्धन; न तन्मात्रा-बन्धन है, और न ही किसी प्रकार का भूत-बन्धन है।

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.41.3)

न च कालः कला चैव नाविद्या नियतिस्तथा । न रागो न च विद्वेषः शम्भोरमिततेजसः

na ca kālaḥ kalā caiva nāvidyā niyatistathā | na rāgo na ca vidveṣaḥ śambhoramitatejasaḥ

अपरिमित तेजस्वी शम्भु को न काल का बन्धन है, न कला का, न अविद्या का, न नियति का; न राग है, और न ही द्वेष है।

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.41.4)

न चास्त्यभिनिवेशोऽस्य कुशलाकुशलान्यपि । कर्माणि तद्विपाकश्च सुखदुःखे च तत्फले

na cāstyabhiniveśo'sya kuśalākuśalānyapi | karmāṇi tadvipākaśca sukhaduḥkhe ca tatphale

उसे न तो जीवन-आसक्ति है, न शुभ-अशुभ कर्म हैं, न उनका फल है, और न ही सुख-दुःख रूप उनका परिणाम है।

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.41.5)

आशयैर्नापि सम्बन्धः संस्कारैः कर्मणामपि । भोगैश्च भोगसंस्कारैः कालत्रितयगोचरैः

āśayairnāpi sambandhaḥ saṁskāraiḥ karmaṇāmapi | bhogaiśca bhogasaṁskāraiḥ kālatritayagocaraiḥ

उसका न तो मनोवृत्तियों से सम्बन्ध है, न कर्मों के संस्कारों से, न ही तीनों कालों में विद्यमान भोगों तथा भोग-संस्कारों से।

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.41.6)

न तस्य कारणं कर्ता नादिरन्तस्तथान्तरम् । न कर्म करणं वापि नाकार्यं कार्यमेव च

na tasya kāraṇaṁ kartā nādirantastathāntaram | na karma karaṇaṁ vāpi nākāryaṁ kāryameva ca

उसका न तो कोई कारण है, न कर्ता, न आदि, न अन्त, न ही मध्य; न कोई कर्म है, न करण, न अकार्य और न ही कार्य।

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.41.7)

नास्य बन्धुरबन्धुर्वा नियन्ता प्रेरकोऽपि वा । न पतिर्न गुरुस्त्राता नाधिको न समस्तथा

nāsya bandhurabandhurvā niyantā prerako'pi vā | na patirna gurustrātā nādhiko na samastathā

उसका न तो कोई बन्धु है, न अबन्धु, न कोई नियन्ता है, न प्रेरक; न कोई स्वामी है, न गुरु, न रक्षक; न कोई उससे अधिक है, और न ही कोई उसके समान है।

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.41.8)

न जन्ममरणे तस्य न काङ्क्षितमकाङ्क्षितम् । न विधिर्न निषेधश्च न मुक्तिर्न च बन्धनम्

na janmamaraṇe tasya na kāṅkṣitamakāṅkṣitam | na vidhirna niṣedhaśca na muktirna ca bandhanam

उसे न जन्म है, न मरण; न कुछ वांछित है, न अवांछित; न कोई विधि है, न निषेध; न मुक्ति है, और न ही बन्धन।

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.41.9)

नास्ति यद्यदकल्याणं तत्तदस्य कदाचन । कल्याणं सकलं चास्ति परमात्मा शिवो यतः

nāsti yadyadakalyāṇaṁ tattadasya kadācana | kalyāṇaṁ sakalaṁ cāsti paramātmā śivo yataḥ

जो कुछ भी अकल्याणकारी है, वह उसमें कभी विद्यमान नहीं है; और जो भी कल्याणकारी है, वह सब उसमें विद्यमान है, क्योंकि वह परमात्मा शिव ही है।

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.41.10)

स शिवः सर्वमेवेदमधिष्ठाय स्वशक्तिभिः । अप्रच्युतः स्वतो भावः स्थितः स्थाणुरतः स्मृतः

sa śivaḥ sarvamevedamadhiṣṭhāya svaśaktibhiḥ | apracyutaḥ svato bhāvaḥ sthitaḥ sthāṇurataḥ smṛtaḥ

वह शिव अपनी शक्तियों के द्वारा इस सम्पूर्ण जगत् पर अधिष्ठित होकर भी, अपने स्वभाव से कभी च्युत नहीं होता; इसलिए वह 'स्थाणु' कहा गया है।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.41.11)

शिवेनाधिष्ठितं यस्मात् जगत्स्थावरजङ्गमम् । सर्वरूपः स्मृतः शर्वस्तथा ज्ञात्वा न मुह्यति

śivenādhiṣṭhitaṁ yasmāt jagatsthāvarajaṅgamam | sarvarūpaḥ smṛtaḥ śarvastathā jñātvā na muhyati

चूँकि यह सम्पूर्ण स्थावर-जंगम जगत् शिव द्वारा ही अधिष्ठित है, इसलिए शर्व को ही सर्वरूप माना गया है; इस प्रकार जानकर व्यक्ति मोहित नहीं होता।

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.41.12)

शर्वो रुद्रो नमस्तस्मै पुरुषः सत्परो महान् । हिरण्यबाहुर्भगवान् हिरण्यपतिरीश्वरः

śarvo rudro namastasmai puruṣaḥ satparo mahān | hiraṇyabāhurbhagavān hiraṇyapatirīśvaraḥ

शर्व, रुद्र — उन्हें नमस्कार है; वे पुरुष, सत्, पर, महान्, हिरण्यबाहु, भगवान्, हिरण्यपति तथा ईश्वर हैं।

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.41.13)

अम्बिकापतिरीशानः पिनाकी वृषवाहनः । एको रुद्रः परं ब्रह्म पुरुषः कृष्णपिङ्गलः

ambikāpatirīśānaḥ pinākī vṛṣavāhanaḥ | eko rudraḥ paraṁ brahma puruṣaḥ kṛṣṇapiṅgalaḥ

अम्बिका के पति, ईशान, पिनाकधारी, वृषभवाहन; वह एक ही रुद्र परब्रह्म, पुरुष तथा कृष्ण-पिंगल वर्ण वाले हैं।

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.41.14)

बालाग्रमात्रो हृन्मध्ये विचिन्त्यो दहरान्तरे । हिरण्यकेशः पद्माक्षो ह्यरुणस्ताम्र एव च

bālāgramātro hṛnmadhye vicintyo daharāntare | hiraṇyakeśaḥ padmākṣo hyaruṇastāmra eva ca

वह हृदय के मध्य में बालाग्र-मात्र रूप में, हृदय-आकाश के भीतर ध्यान करने योग्य है; उसके स्वर्णिम केश हैं, कमल-नेत्र हैं, वह अरुण और ताम्रवर्ण भी है।

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.41.15)

योऽवसर्पत्यसौ देवो नीलग्रीवो हिरण्मयः । सौम्योऽघोरस्तथा मिश्रश्चाक्षारश्चामृतोऽव्ययः

yo'vasarpatyasau devo nīlagrīvo hiraṇmayaḥ | saumyo'ghorastathā miśraścākṣāraścāmṛto'vyayaḥ

वह देव, जो नीलकण्ठ और स्वर्णिम रूप में अवतरित होते हैं, सौम्य भी हैं, अघोर भी, मिश्र-स्वरूप भी, अक्षर, अमृत तथा अविनाशी भी हैं।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.41.16)

स पुंविशेषः परमो भगवानन्तकान्तकः । चेतनाचेतनोन्मुक्तः प्रपञ्चाच्च परात्परः

sa puṁviśeṣaḥ paramo bhagavānantakāntakaḥ | cetanācetanonmuktaḥ prapañcācca parātparaḥ

वह पुरुष-विशेष, परम भगवान्, यम का भी अन्त करने वाला है; वह चेतन-अचेतन दोनों से मुक्त है, और सृष्टि-प्रपंच से भी परे, परम से भी परे है।

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.41.17)

शिवेनातिशयत्वेन ज्ञानैश्वर्ये विलोकिते । लोकेशातिशयत्वेन स्थितं प्राहुर्मनीषिणः

śivenātiśayatvena jñānaiśvarye vilokite | lokeśātiśayatvena sthitaṁ prāhurmanīṣiṇaḥ

शिव में अतिशयरूप से देखे गये ज्ञान और ऐश्वर्य के कारण, विद्वान् लोग कहते हैं कि वह लोकेशों से भी अतिशयरूप से स्थित है।

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.41.18)

प्रतिसर्गप्रसूतानां ब्रह्मणां शास्त्रविस्तरम् । उपदेष्टा स एवादौ कालावच्छेदवर्तिनाम्

pratisargaprasūtānāṁ brahmaṇāṁ śāstravistaram | upadeṣṭā sa evādau kālāvacchedavartinām

प्रत्येक सृष्टि में उत्पन्न होने वाले, काल-सीमा में रहने वाले ब्रह्माओं को शास्त्र का विस्तार सिखाने वाले वही आदि उपदेष्टा हैं।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.41.19)

कालावच्छेदयुक्तानां गुरूणामप्यसौ गुरुः । सर्वेषामेव सर्वेशः कालावच्छेदवर्जितः

kālāvacchedayuktānāṁ gurūṇāmapyasau guruḥ | sarveṣāmeva sarveśaḥ kālāvacchedavarjitaḥ

काल-सीमा में रहने वाले गुरुओं के भी वे गुरु हैं; वे काल-सीमा से रहित होकर समस्त प्राणियों के सर्वेश्वर हैं।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.41.20)

शुद्धा स्वाभाविकी तस्य शक्तिः सर्वातिशायिनी । ज्ञानमप्रतिमं नित्यं वपुरत्यन्तनिर्मिलम्

śuddhā svābhāvikī tasya śaktiḥ sarvātiśāyinī | jñānamapratimaṁ nityaṁ vapuratyantanirmilam

उसकी शक्ति शुद्ध, स्वाभाविक तथा सबसे अतिशय है; उसका ज्ञान अनुपम है, नित्य है, और उसका शरीर अत्यन्त निर्मल है।

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.41.21)

ऐश्वर्यमप्रतिद्वन्द्वं सुखमात्यन्तिकं बलम् । तेजःप्रभावो वीर्यं च क्षमा कारुण्यमेव च

aiśvaryamapratidvandvaṁ sukhamātyantikaṁ balam | tejaḥprabhāvo vīryaṁ ca kṣamā kāruṇyameva ca

उसका ऐश्वर्य अद्वितीय है, सुख चरम है, बल है, तेज-प्रभाव है, वीर्य है, क्षमा है और करुणा भी है।

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.41.22)

परिपूर्णस्य सर्गाद्यैर्नात्मनोऽस्ति प्रयोजनम् । परानुग्रह एवास्य फलं सर्वस्य कर्मणः

paripūrṇasya sargādyairnātmano'sti prayojanam | parānugraha evāsya phalaṁ sarvasya karmaṇaḥ

परिपूर्ण होने के कारण उसे सृष्टि आदि से अपने लिए कोई प्रयोजन नहीं है; उसके समस्त कर्म का फल केवल दूसरों पर अनुग्रह करना ही है।

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.41.23)

प्रणवो वाचकस्तस्य शिवस्य परमात्मनः । शिवरुद्रादिशब्दानां प्रणवो हि परः स्मृतः

praṇavo vācakastasya śivasya paramātmanaḥ | śivarudrādiśabdānāṁ praṇavo hi paraḥ smṛtaḥ

प्रणव उस परमात्मा शिव का वाचक है; शिव, रुद्र आदि शब्दों में प्रणव को ही सर्वश्रेष्ठ माना गया है।

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.41.24)

शम्भोः प्रणववाच्यस्य भवनात्तज्जपादपि । या सिद्धिः सा परा प्राप्या भवत्येव न संशयः

śambhoḥ praṇavavācyasya bhavanāttajjapādapi | yā siddhiḥ sā parā prāpyā bhavatyeva na saṁśayaḥ

प्रणव द्वारा वाच्य उन शम्भु के ध्यान से, अथवा उनके जप से भी, जो परम सिद्धि प्राप्त होती है, वह अवश्य प्राप्त होती ही है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.41.25)

तस्मादेकाक्षरं देवमाहुरागमपारगाः । वाच्यवाचकयोरैक्यं मन्यमाना मनस्विनः

tasmādekākṣaraṁ devamāhurāgamapāragāḥ | vācyavācakayoraikyaṁ manyamānā manasvinaḥ

इसलिए आगमों के पारगामी विद्वान् उस एकाक्षर को ही देव कहते हैं, यह मानते हुए कि वाच्य और वाचक में एकत्व है।

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.41.26)

अस्य मात्राः समाख्याताश्चतस्रो वेदमूर्द्धनि । अकारश्चाप्युकारश्च मकारो नाद इत्यपि

asya mātrāḥ samākhyātāścatasro vedamūrddhani | akāraścāpyukāraśca makāro nāda ityapi

वेद के शिखर में इसकी चार मात्राएँ बतायी गयी हैं — अकार, उकार, मकार, तथा नाद भी।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.41.27)

अकारं बह्वृचं प्राहुरुकारो यजुरुच्यते । मकारः सामनादोऽस्य श्रुतिराथर्वणी स्मृता

akāraṁ bahvṛcaṁ prāhurukāro yajurucyate | makāraḥ sāmanādo'sya śrutirātharvaṇī smṛtā

अकार को बह्वृच कहा गया है, उकार को यजुर्वेद कहा जाता है; मकार सामनाद है, और इसकी श्रुति आथर्वणी मानी गयी है।

श्लोक 28 (shiva.vayaviya.41.28)

अकारश्च महाबीजं रजः स्रष्टा चतुर्मुखः । उकारः प्रकृतिर्योनिः सत्त्वं पालयिता हरिः

akāraśca mahābījaṁ rajaḥ sraṣṭā caturmukhaḥ | ukāraḥ prakṛtiryoniḥ sattvaṁ pālayitā hariḥ

अकार महाबीज है, रजोगुण है, तथा सृष्टिकर्ता चतुर्मुख ब्रह्मा है; उकार प्रकृति है, योनि है, सत्त्वगुण है, तथा पालनकर्ता विष्णु है।

श्लोक 29 (shiva.vayaviya.41.29)

मकारः पुरुषो बीजं तमः संहारको हरः । नादः परः पुमानीशो निर्गुणो निष्क्रियः शिवः

makāraḥ puruṣo bījaṁ tamaḥ saṁhārako haraḥ | nādaḥ paraḥ pumānīśo nirguṇo niṣkriyaḥ śivaḥ

मकार पुरुष है, बीज है, तमोगुण है, तथा संहारकर्ता हर है; नाद परम पुरुष, ईश्वर, गुणरहित, निष्क्रिय शिव है।

श्लोक 30 (shiva.vayaviya.41.30)

सर्वं तिसृभिरेवेदं मात्राभिर्निखिलं त्रिधा । अभिधाय शिवात्मानं बोधयत्यर्धमात्रया

sarvaṁ tisṛbhirevedaṁ mātrābhirnikhilaṁ tridhā | abhidhāya śivātmānaṁ bodhayatyardhamātrayā

उन तीनों मात्राओं के द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् तीन प्रकार से कहा जाता है; और अर्ध-मात्रा के द्वारा शिव-स्वरूप को बोध कराया जाता है।

श्लोक 31 (shiva.vayaviya.41.31)

यस्मात्परं नापरमस्ति किञ्चिद्\- यस्मान्नाणीयो न ज्यायोऽस्ति किञ्चित् । वृक्ष इव स्तब्धो दिवि तिष्ठत्येक\- स्तेनेदं पूर्णं पुरुषेण सर्वम्

yasmātparaṁ nāparamasti kiñcid\- yasmānnāṇīyo na jyāyo'sti kiñcit | vṛkṣa iva stabdho divi tiṣṭhatyeka\- stenedaṁ pūrṇaṁ puruṣeṇa sarvam

जिससे परे कुछ भी अन्य नहीं है, जिससे सूक्ष्मतर और महत्तर कुछ भी नहीं है — वह एक अकेला वृक्ष के समान अचल होकर आकाश में स्थित है; उसी पुरुष से यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है।

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