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वायवीय संहिता · अध्याय 42

शिवतत्त्वकथन

अध्याय 41अध्याय-सूचीअध्याय 43

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.42.1)

उपमन्युरुवच । शक्तिः स्वाभविकी तस्य विद्या विश्वविलक्षणा । एकानेकस्य रूपेण भाति भानोरिव प्रभा

upamanyuruvaca | śaktiḥ svābhavikī tasya vidyā viśvavilakṣaṇā | ekānekasya rūpeṇa bhāti bhānoriva prabhā

उपमन्यु ने कहा — उसकी स्वाभाविक शक्ति ही विद्या है, जो विश्व से विलक्षण है; वह एक और अनेक — दोनों रूपों में इस प्रकार प्रकाशित होती है, जैसे सूर्य से उसकी प्रभा।

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.42.2)

अनन्ताः शक्तयो यस्या इच्छाज्ञानक्रियादयः । मायाद्याश्चाभवन्वह्नोर्विस्फुलिङ्गा यथा तथा

anantāḥ śaktayo yasyā icchājñānakriyādayaḥ | māyādyāścābhavanvahnorvisphuliṅgā yathā tathā

उससे इच्छा, ज्ञान, क्रिया आदि अनन्त शक्तियाँ तथा माया आदि उत्पन्न हुईं, ठीक वैसे ही जैसे अग्नि से चिनगारियाँ उत्पन्न होती हैं।

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.42.3)

सदाशिवेश्वराद्या हि विद्याविद्येश्वरादयः । अभवन् पुरुषाश्चास्याः प्रकृतिश्च परात्परा

sadāśiveśvarādyā hi vidyāvidyeśvarādayaḥ | abhavan puruṣāścāsyāḥ prakṛtiśca parātparā

सदाशिव, ईश्वर आदि, तथा विद्येश्वर-अविद्येश्वर आदि, समस्त पुरुष, तथा परात्परा प्रकृति भी उसी से उत्पन्न हुए।

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.42.4)

महदादिविशेषान्तास्त्वजाद्याश्चापि मूर्तयः । यच्चान्यदस्ति तत्सर्वं तस्याः कार्यं न संशयः

mahadādiviśeṣāntāstvajādyāścāpi mūrtayaḥ | yaccānyadasti tatsarvaṁ tasyāḥ kāryaṁ na saṁśayaḥ

महत् से लेकर विशेष तत्त्वों तक, तथा अज आदि समस्त मूर्तियाँ भी — और जो कुछ भी अन्य है, वह सब उसी का कार्य है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.42.5)

सा शक्तिः सर्वगा सूक्ष्मा प्रबोधानन्दरूपिणी । शक्तिमानुच्यते देवः शिवः शीतांशुभूषणः

sā śaktiḥ sarvagā sūkṣmā prabodhānandarūpiṇī | śaktimānucyate devaḥ śivaḥ śītāṁśubhūṣaṇaḥ

वह शक्ति सर्वव्यापिनी, सूक्ष्म, ज्ञान-आनन्द-स्वरूपिणी है; शक्तिमान् उस देव को कहा जाता है, चन्द्रभूषण शिव को।

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.42.6)

वेद्यः शिवः शिवा विद्या प्रज्ञा चैव श्रुतिः स्मृतिः । धृतिरेषा स्थितिर्निष्ठा ज्ञानेच्छाकर्मशक्तयः

vedyaḥ śivaḥ śivā vidyā prajñā caiva śrutiḥ smṛtiḥ | dhṛtireṣā sthitirniṣṭhā jñānecchākarmaśaktayaḥ

शिव ज्ञेय हैं, और शिवा विद्या, प्रज्ञा, श्रुति, स्मृति, धृति, स्थिति, निष्ठा तथा ज्ञान-इच्छा-क्रिया की शक्तियाँ हैं।

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.42.7)

आज्ञा चैव परं ब्रह्म द्वे विद्ये च परापरे । शुद्धविद्या शुद्धकला सर्वं शक्तिकृतं यतः

ājñā caiva paraṁ brahma dve vidye ca parāpare | śuddhavidyā śuddhakalā sarvaṁ śaktikṛtaṁ yataḥ

आज्ञा, परब्रह्म, पर और अपर दोनों विद्याएँ, शुद्धविद्या तथा शुद्धकला — यह सब, चूँकि सब कुछ शक्ति के द्वारा किया गया है, उसी के रूप हैं।

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.42.8)

माया च प्रकृतिर्जीवो विकारो विकृतिस्तथा । असच्च सच्च यत्किञ्चित्तया सर्वमिदं ततम्

māyā ca prakṛtirjīvo vikāro vikṛtistathā | asacca sacca yatkiñcittayā sarvamidaṁ tatam

माया, प्रकृति, जीव, विकार तथा विकृति भी — जो कुछ भी सत् और असत् है, वह सब उसी के द्वारा व्याप्त है।

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.42.9)

सा देवी मायया सर्वं ब्रह्माण्डं सचराचरम् । मोहयत्यप्रयत्नेन मोचयत्यपि लीलया

sā devī māyayā sarvaṁ brahmāṇḍaṁ sacarācaram | mohayatyaprayatnena mocayatyapi līlayā

वह देवी अपनी माया से समस्त चराचर-सहित ब्रह्माण्ड को बिना किसी प्रयास के मोहित कर देती है, और अपनी ही लीला से मुक्त भी कर देती है।

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.42.10)

अनया सह सर्वेशः सप्तविंशप्रकारया । विश्वं व्याप्य स्थितस्तस्मात् मुक्तिरत्र प्रवर्तते

anayā saha sarveśaḥ saptaviṁśaprakārayā | viśvaṁ vyāpya sthitastasmāt muktiratra pravartate

सत्ताईस प्रकार वाली इसी शक्ति के साथ सर्वेश्वर विश्व में व्याप्त होकर स्थित हैं; इसलिए यहाँ मुक्ति सम्भव होती है।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.42.11)

मुमुक्षवः पुरा केचिन्मुनयो ब्रह्मवादिनः । संशयाविष्टमनसो विस्मृशन्ति यथातथम्

mumukṣavaḥ purā kecinmunayo brahmavādinaḥ | saṁśayāviṣṭamanaso vismṛśanti yathātatham

पूर्वकाल में कुछ ब्रह्मवादी मुमुक्षु मुनि, संशय से आविष्ट मन वाले होकर, यथार्थ रूप में विचार करते थे।

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.42.12)

किं कारणं कुतो जाता जीवामः केन वा वयम् । कुत्रास्माकं सम्प्रतिष्ठा केन वाधिष्ठिता वयम्

kiṁ kāraṇaṁ kuto jātā jīvāmaḥ kena vā vayam | kutrāsmākaṁ sampratiṣṭhā kena vādhiṣṭhitā vayam

क्या कारण है? हम कहाँ से उत्पन्न हुए? हम किसके द्वारा जीवित हैं? हमारी सुप्रतिष्ठा कहाँ है? हम किसके द्वारा अधिष्ठित हैं?

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.42.13)

केन वर्तामहे शश्वत्सुखेष्वन्येषु चानिशम् । अविलङ्घ्या च विश्वस्य व्यवस्था केन वा कृता

kena vartāmahe śaśvatsukheṣvanyeṣu cāniśam | avilaṅghyā ca viśvasya vyavasthā kena vā kṛtā

हम किसके द्वारा सदा सुखों में तथा अन्य अवस्थाओं में निरन्तर रहते हैं? विश्व की यह अलंघनीय व्यवस्था किसके द्वारा बनायी गयी है?

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.42.14)

कालस्य भावो नियतिर्यदृच्छा नात्र युज्यते । भूतानि योनिः पुरुषो योगी चैषां परोऽथवा

kālasya bhāvo niyatiryadṛcchā nātra yujyate | bhūtāni yoniḥ puruṣo yogī caiṣāṁ paro'thavā

क्या यह काल का स्वभाव है, नियति है? यहाँ आकस्मिकता उचित नहीं जान पड़ती। क्या पंचभूत ही योनि हैं, अथवा पुरुष, अथवा इनसे परे कोई योगी?

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.42.15)

अचेतनत्वात्कालादेश्चेतनत्वेऽपि चात्मनः । सुखदुःखानि भूतत्वादनीशत्वाद्विचार्यते

acetanatvātkālādeścetanatve'pi cātmanaḥ | sukhaduḥkhāni bhūtatvādanīśatvādvicāryate

काल आदि के अचेतन होने के कारण, तथा आत्मा के चेतन होने पर भी, प्राणी होने और अनीश होने के कारण सुख-दुःख का विचार किया जाता है।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.42.16)

तद्ध्यानयोगानुगताः प्रपश्यन् शक्तिमैश्वरीम् । पाशविच्छेदिकां साक्षान्निगूढां स्वगुणैर्भृशम्

taddhyānayogānugatāḥ prapaśyan śaktimaiśvarīm | pāśavicchedikāṁ sākṣānnigūḍhāṁ svaguṇairbhṛśam

उस ध्यान-योग का अनुसरण करते हुए वे उस ऐश्वरी शक्ति को साक्षात् देखने लगे, जो पाशों को काटने वाली है, तथा अपने ही गुणों से अत्यन्त गूढ़ है।

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.42.17)

तया विच्छिन्नपाशास्ते सर्वकारणकारणम् । शक्तिमन्तं महादेवमपश्यन्दिव्यचक्षुषा

tayā vicchinnapāśāste sarvakāraṇakāraṇam | śaktimantaṁ mahādevamapaśyandivyacakṣuṣā

उसके द्वारा पाशों से मुक्त हुए वे लोग सम्पूर्ण कारणों के भी कारण, शक्तिमान् महादेव को दिव्य दृष्टि से देखने लगे।

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.42.18)

यः कारणान्यशेषाणि कालात्मसहितानि च । अप्रमेयोऽनया शक्त्या सकलं योऽधितिष्ठति

yaḥ kāraṇānyaśeṣāṇi kālātmasahitāni ca | aprameyo'nayā śaktyā sakalaṁ yo'dhitiṣṭhati

वह अप्रमेय, इस शक्ति के साथ काल और आत्मा-सहित समस्त कारणों तथा सम्पूर्ण जगत् पर अधिष्ठित है।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.42.19)

ततः प्रसादयोगेन योगेन परमेण च । दृष्टेन भक्तियोगेन दिव्यां गतिमवाप्नुयुः

tataḥ prasādayogena yogena parameṇa ca | dṛṣṭena bhaktiyogena divyāṁ gatimavāpnuyuḥ

तत्पश्चात् कृपा-योग से, परम योग से, तथा साक्षात्कृत भक्तियोग से वे दिव्य गति को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.42.20)

तस्मात्सह तथा शक्त्या हृदि पश्यन्ति ये शिवम् । तेषां शाश्वतिकी शान्तिर्नैतरेषामिति श्रुतिः

tasmātsaha tathā śaktyā hṛdi paśyanti ye śivam | teṣāṁ śāśvatikī śāntirnaitareṣāmiti śrutiḥ

इसलिए जो उस शक्ति-सहित शिव को हृदय में देखते हैं, उन्हीं को शाश्वत शान्ति प्राप्त होती है, अन्य को नहीं — ऐसा श्रुति का कथन है।

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.42.21)

न हि शक्तिमतः शक्त्या विप्रयोगोऽस्ति जातुचित् । तस्मात् शक्तेः शक्तिमतस्तादात्म्यान्निर्वृतिर्द्वयोः

na hi śaktimataḥ śaktyā viprayogo'sti jātucit | tasmāt śakteḥ śaktimatastādātmyānnirvṛtirdvayoḥ

शक्तिमान् का शक्ति से वियोग कभी भी नहीं होता; इसलिए शक्ति और शक्तिमान् की एकात्मता के कारण दोनों की ही निर्वृत्ति होती है।

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.42.22)

क्रमो विवक्षितो नूनं विमुक्तौ ज्ञानकर्मणोः । प्रसादे सति सा मूर्तिर्यस्मात्करतले स्थिता

kramo vivakṣito nūnaṁ vimuktau jñānakarmaṇoḥ | prasāde sati sā mūrtiryasmātkaratale sthitā

मुक्ति में ज्ञान और कर्म का क्रम निश्चय ही अभिप्रेत है; क्योंकि कृपा हो जाने पर वह मूर्ति मानो हथेली पर ही स्थित हो जाती है।

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.42.23)

देवो वा दानवो वापि पशुर्वा विहगोऽपि वा । कीरो वाथ कृमिर्वापि मुच्यते तत्प्रसादतः

devo vā dānavo vāpi paśurvā vihago'pi vā | kīro vātha kṛmirvāpi mucyate tatprasādataḥ

चाहे देव हो, चाहे दानव हो, चाहे पशु हो, चाहे पक्षी हो, चाहे तोता हो, अथवा कीड़ा भी हो — उसकी कृपा से वह मुक्त हो जाता है।

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.42.24)

गर्भस्थो जायमानो वा बालो वा तरुणोऽपि वा । वृद्धो वा म्रियमाणो वा स्वर्गस्थो वाथ नारकी

garbhastho jāyamāno vā bālo vā taruṇo'pi vā | vṛddho vā mriyamāṇo vā svargastho vātha nārakī

चाहे गर्भस्थ हो, चाहे उत्पन्न हो रहा हो, चाहे बालक हो, चाहे युवा हो, चाहे वृद्ध हो, चाहे मरणासन्न हो, चाहे स्वर्ग में हो, अथवा नरक में हो —

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.42.25)

पतितो वापि धर्मात्मा पण्डितो मूढ एव वा । प्रसादे तत्क्षणादेव मुच्यते नात्र संशयः

patito vāpi dharmātmā paṇḍito mūḍha eva vā | prasāde tatkṣaṇādeva mucyate nātra saṁśayaḥ

चाहे पतित हो, चाहे धर्मात्मा हो, चाहे पण्डित हो, अथवा मूढ़ ही हो — कृपा होने पर वह उसी क्षण मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.42.26)

अयोग्यानां च कारुण्याद्भक्तानां परमेश्वरः । प्रसीदति न सन्देहो विगृह्य विविधान् मलान्

ayogyānāṁ ca kāruṇyādbhaktānāṁ parameśvaraḥ | prasīdati na sandeho vigṛhya vividhān malān

अयोग्य होने पर भी, करुणावश, अपने भक्तों पर परमेश्वर उनके विविध मलों को दूर करके प्रसन्न होते हैं, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.42.27)

प्रसदादेव सा भक्तिः प्रसादो भक्तिसम्भवः । अवस्थाभेदमुत्प्रेक्ष्य विद्वांस्तत्र न मुह्यति

prasadādeva sā bhaktiḥ prasādo bhaktisambhavaḥ | avasthābhedamutprekṣya vidvāṁstatra na muhyati

कृपा से ही भक्ति उत्पन्न होती है, और भक्ति से कृपा उत्पन्न होती है; इस अवस्था-भेद को देखकर विद्वान् व्यक्ति उसमें मोहित नहीं होता।

श्लोक 28 (shiva.vayaviya.42.28)

प्रसादपूर्विका येयं भुक्तिमुक्तिविधायिनी । नैव सा शक्यते प्राप्तुं नरैरेकेन जन्मना

prasādapūrvikā yeyaṁ bhuktimuktividhāyinī | naiva sā śakyate prāptuṁ narairekena janmanā

कृपा से पूर्वित यह भोग और मोक्ष दोनों को देने वाली भक्ति, मनुष्यों के द्वारा केवल एक ही जन्म में प्राप्त नहीं की जा सकती।

श्लोक 29 (shiva.vayaviya.42.29)

अनेकजन्मसिद्धानां श्रौतस्मार्तानुवर्तिनाम् । विरक्तानां प्रबुद्धानां प्रसीदति महेश्वरः

anekajanmasiddhānāṁ śrautasmārtānuvartinām | viraktānāṁ prabuddhānāṁ prasīdati maheśvaraḥ

अनेक जन्मों में सिद्ध हुए, श्रुति-स्मृति का अनुसरण करने वाले, विरक्त तथा जागृत साधकों पर ही महेश्वर प्रसन्न होते हैं।

श्लोक 30 (shiva.vayaviya.42.30)

प्रसन्ने सति देवेशे पशौ तस्मिन् प्रवर्तते । अस्ति नाथो ममेत्यल्पा भक्तिर्बुद्धिपुरःसरा

prasanne sati deveśe paśau tasmin pravartate | asti nātho mametyalpā bhaktirbuddhipuraḥsarā

देवेश के प्रसन्न होने पर उस पशु में "मेरा स्वामी है" — इस बुद्धि से युक्त अल्प भक्ति उत्पन्न होती है।

श्लोक 31 (shiva.vayaviya.42.31)

तपसा विविधैः शैवैर्धर्मैः संयुज्यते नरः । तत्त्रयोगे तदभ्यासस्ततो भक्तिः परा भवेत्

tapasā vividhaiḥ śaivairdharmaiḥ saṁyujyate naraḥ | tattrayoge tadabhyāsastato bhaktiḥ parā bhavet

तप से मनुष्य विविध शैव धर्मों से युक्त हो जाता है; उनके संयोग से उनका अभ्यास होता है, और उससे परा भक्ति उत्पन्न होती है।

श्लोक 32 (shiva.vayaviya.42.32)

परया च तया भक्त्या प्रसादो लभ्यते परः । प्रसादात्सर्वपाशेभ्यो मुक्तिर्मुक्तस्य निर्वृतिः

parayā ca tayā bhaktyā prasādo labhyate paraḥ | prasādātsarvapāśebhyo muktirmuktasya nirvṛtiḥ

उस परा भक्ति से परम कृपा प्राप्त होती है; कृपा से समस्त पाशों से मुक्ति मिलती है, और मुक्त व्यक्ति को शान्ति मिलती है।

श्लोक 33 (shiva.vayaviya.42.33)

अल्पभावोऽपि यो मर्त्यः सोऽपि जन्मत्रयात्परम् । न योनियन्त्रपीडायै भवेन्नैवात्र संशयः

alpabhāvo'pi yo martyaḥ so'pi janmatrayātparam | na yoniyantrapīḍāyai bhavennaivātra saṁśayaḥ

थोड़ी-सी भी भावना रखने वाला मरणधर्मा भी तीन जन्मों के पश्चात् योनि-यन्त्र की पीड़ा को कभी नहीं भोगता, इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 34 (shiva.vayaviya.42.34)

साङ्गानङ्गा च या सेवा सा भक्तिरिति कथ्यते । सा पुनर्भिद्यते त्रेधा मनोवाक्कायसाधनैः

sāṅgānaṅgā ca yā sevā sā bhaktiriti kathyate | sā punarbhidyate tredhā manovākkāyasādhanaiḥ

जो सेवा साधनों-सहित अथवा साधनरहित होती है, वही भक्ति कहलाती है; वह पुनः मन, वाणी और शरीर के साधनों से तीन प्रकार में विभाजित होती है।

श्लोक 35 (shiva.vayaviya.42.35)

शिवरूपादिचिन्ता या सा सेवा मानसी स्मृता । जपादिर्वाचिकी सेवा कर्मपूजादि कायिकी

śivarūpādicintā yā sā sevā mānasī smṛtā | japādirvācikī sevā karmapūjādi kāyikī

शिव के स्वरूप आदि का चिन्तन मानसी सेवा कही जाती है; जप आदि वाचिकी सेवा है; कर्म-पूजा आदि कायिकी सेवा है।

श्लोक 36 (shiva.vayaviya.42.36)

सेयं त्रिसाधना सेवा शिवधर्मश्च कथ्यते । स तु पञ्चविधः प्रोक्तः शिवेन परमात्मना

seyaṁ trisādhanā sevā śivadharmaśca kathyate | sa tu pañcavidhaḥ proktaḥ śivena paramātmanā

यही तीन साधनों वाली सेवा 'शिवधर्म' भी कही जाती है; वह परमात्मा शिव द्वारा पाँच प्रकार का बताया गया है।

श्लोक 37 (shiva.vayaviya.42.37)

तपः कर्म जपो ध्यानं ज्ञानं चेति समासतः । कर्म लिङ्गार्चनाद्यं च तपश्चान्द्रायणादिकम्

tapaḥ karma japo dhyānaṁ jñānaṁ ceti samāsataḥ | karma liṅgārcanādyaṁ ca tapaścāndrāyaṇādikam

संक्षेप में — तप, कर्म, जप, ध्यान तथा ज्ञान; कर्म का अर्थ है लिंग-अर्चना आदि, और तप का अर्थ है चान्द्रायण आदि व्रत।

श्लोक 38 (shiva.vayaviya.42.38)

जपस्त्रिधा शिवाभ्यासश्चिन्ता ध्यानं शिवस्य तु । शिवागमोक्तं यज्ज्ञानं तदत्र ज्ञानमुच्यते

japastridhā śivābhyāsaścintā dhyānaṁ śivasya tu | śivāgamoktaṁ yajjñānaṁ tadatra jñānamucyate

जप तीन प्रकार का है — शिव का अभ्यास; शिव का चिन्तन ही ध्यान है; तथा शिवागम में कहा गया जो ज्ञान है, वही यहाँ ज्ञान कहा जाता है।

श्लोक 39 (shiva.vayaviya.42.39)

श्रीकण्ठेन शिवेनोक्तं शिवायै च शिवागमः । शिवाश्रितानां कारुण्याच्छ्रेयसामेकसाधनम्

śrīkaṇṭhena śivenoktaṁ śivāyai ca śivāgamaḥ | śivāśritānāṁ kāruṇyācchreyasāmekasādhanam

श्रीकण्ठ शिव द्वारा शिवा को कहा गया यह शिवागम, शिव के आश्रित भक्तों के प्रति करुणावश, कल्याण का एकमात्र साधन है।

श्लोक 40 (shiva.vayaviya.42.40)

तस्माद्विवर्धयेद्भक्तिं शिवे परमकारणे । त्यजेच्च विषयासङ्गं श्रेयोऽर्थी मतिमान्नरः

tasmādvivardhayedbhaktiṁ śive paramakāraṇe | tyajecca viṣayāsaṅgaṁ śreyo'rthī matimānnaraḥ

इसलिए कल्याण का इच्छुक बुद्धिमान् मनुष्य शिव, उस परम कारण, में अपनी भक्ति बढ़ाये, और विषयों की आसक्ति को त्याग दे।

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