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वायवीय संहिता · अध्याय 48

पंचाक्षर माहात्म्य वर्णन (द्वितीय भाग)

अध्याय 47अध्याय-सूचीअध्याय 49

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.48.1)

देव्युवाच । कलौ कलुषिते काले दुर्जये दुरतिक्रमे । अपुण्यतमसाच्छन्ने लोके धर्मपराङ्मुखे

devyuvāca | kalau kaluṣite kāle durjaye duratikrame | apuṇyatamasācchanne loke dharmaparāṅmukhe

देवी ने कहा — कलिकाल में, जब समय कलुषित, दुर्जेय और दुरतिक्रम्य हो जाए; जब लोक अपुण्य के अंधकार से आच्छन्न होकर धर्म से विमुख हो जाए —

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.48.2)

क्षीणे वर्णाश्रमाचारे सङ्कटे समुपस्थिते । सर्वाधिकारे सन्दिग्धे निश्चिते वापि पर्यये

kṣīṇe varṇāśramācāre saṅkaṭe samupasthite | sarvādhikāre sandigdhe niścite vāpi paryaye

जब वर्णाश्रम का आचार क्षीण हो जाए, संकट उपस्थित हो, सब अधिकार सन्दिग्ध हो जाएँ अथवा युग-परिवर्तन निश्चित हो जाए —

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.48.3)

तदोपदेशे विहते गुरुशिष्यक्रमे गते । केनोपायेन मुच्यन्ते भक्तास्तव महेश्वर

tadopadeśe vihate guruśiṣyakrame gate | kenopāyena mucyante bhaktāstava maheśvara

तब उपदेश नष्ट हो जाने पर तथा गुरु-शिष्य परम्परा के लुप्त हो जाने पर, हे महेश्वर! आपके भक्त किस उपाय से मुक्त होते हैं?

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.48.4)

ईश्वर उवाच । आश्रित्य परमां विद्यां हृद्यां पञ्चाक्षरीं मम । भक्त्या च भावितात्मानो मुच्यन्ते कलिजा नराः

īśvara uvāca | āśritya paramāṁ vidyāṁ hṛdyāṁ pañcākṣarīṁ mama | bhaktyā ca bhāvitātmāno mucyante kalijā narāḥ

ईश्वर ने कहा — मेरी परम, हृदय को प्रिय, पंचाक्षरी विद्या की शरण लेकर तथा भक्तिपूर्वक भावित-आत्मा होकर कलियुग में उत्पन्न मनुष्य मुक्त हो जाते हैं।

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.48.5)

मनोवाक्कायजैर्दोषैर्वक्तुं स्मर्तुमगोचरैः । दूषितानां कृतघ्नानां निन्दकानां छलात्मनाम्

manovākkāyajairdoṣairvaktuṁ smartumagocaraiḥ | dūṣitānāṁ kṛtaghnānāṁ nindakānāṁ chalātmanām

मन-वचन-काया से उत्पन्न, कहने-स्मरण करने के अगोचर दोषों से दूषित, कृतघ्न, निन्दक तथा छलात्मा —

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.48.6)

लुब्धानां वक्रमनसामपि मत्प्रवणात्मनाम् । मम पञ्चाक्षरी विद्या संसारभयतारिणी

lubdhānāṁ vakramanasāmapi matpravaṇātmanām | mama pañcākṣarī vidyā saṁsārabhayatāriṇī

लोभी, वक्र-मन वाले भी, यदि मुझमें प्रवृत्त हों, तो उनके लिए भी मेरी पंचाक्षरी विद्या संसार-भय से तारने वाली है।

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.48.7)

मयैवमसकृद्देवि प्रतिज्ञातं धरातले । पतितोऽपि विमुच्येत मद्भक्तो विद्ययाऽनया

mayaivamasakṛddevi pratijñātaṁ dharātale | patito'pi vimucyeta madbhakto vidyayā'nayā

हे देवी! मैंने पृथ्वी पर बार-बार यह प्रतिज्ञा की है — पतित होने पर भी मेरा भक्त इस विद्या से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.48.8)

देव्युवाच । कर्मायोग्यो भवेन्मर्त्यः पतितो यदि सर्वथा । कर्मायोगेन यत्कर्म कृतं च नरकाय हि । ततः कथं विमुच्येत पतितो विद्ययाऽनया

devyuvāca | karmāyogyo bhavenmartyaḥ patito yadi sarvathā | karmāyogena yatkarma kṛtaṁ ca narakāya hi | tataḥ kathaṁ vimucyeta patito vidyayā'nayā

देवी ने कहा — यदि मनुष्य सर्वथा पतित होकर कर्म के अयोग्य हो जाए, और जो कर्म बिना योग के किया जाए वह नरक के लिए ही होता है, तो फिर पतित व्यक्ति इस विद्या से कैसे मुक्त हो सकता है?

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.48.9)

ईश्वर उवाच । तथ्यमेतत्त्वया प्रोक्तं तथा हि शृणु सुन्दरि । रहस्यमिति मत्वैतद्गोपितं यन्मया पुरा

īśvara uvāca | tathyametattvayā proktaṁ tathā hi śṛṇu sundari | rahasyamiti matvaitadgopitaṁ yanmayā purā

ईश्वर ने कहा — हे सुन्दरि! तुमने जो कहा वह सत्य है; अब उसका कारण सुनो। यह रहस्य समझकर मैंने पहले इसे छिपा रखा था।

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.48.10)

समन्त्रकं मां पतितः पूजयेद्यदि मोहितः । नारकी स्यान्न सन्देहो मम पञ्चाक्षरं विना

samantrakaṁ māṁ patitaḥ pūjayedyadi mohitaḥ | nārakī syānna sandeho mama pañcākṣaraṁ vinā

यदि पतित मनुष्य मोहवश किसी अन्य मन्त्र सहित मेरी पूजा करे, किन्तु मेरे पंचाक्षर के बिना, तो वह अवश्य नारकी होगा — इसमें सन्देह नहीं।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.48.11)

अब्भक्षा वायुभक्षाश्च ये चान्ये व्रतकर्शिताः । तेषामेतैर्व्रतैर्नास्ति मम लोकसमागमः

abbhakṣā vāyubhakṣāśca ye cānye vratakarśitāḥ | teṣāmetairvratairnāsti mama lokasamāgamaḥ

जल पर जीने वाले, वायु पर जीने वाले तथा अन्य व्रतों से कृश हुए लोगों को भी, इन व्रतों मात्र से मेरे लोक की प्राप्ति नहीं होती।

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.48.12)

भक्त्या पञ्चाक्षरेणैव यो हि मां सकृदर्चयेत् । सोऽपि गच्छेन्मम स्थानं मन्त्रस्यास्यैव गौरवात्

bhaktyā pañcākṣareṇaiva yo hi māṁ sakṛdarcayet | so'pi gacchenmama sthānaṁ mantrasyāsyaiva gauravāt

परन्तु जो भक्तिपूर्वक केवल पंचाक्षर से मेरी एक बार भी अर्चना करे, वह भी इस मन्त्र के गौरव मात्र से मेरे धाम को प्राप्त होता है।

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.48.13)

तस्मात्तपांसि यज्ञाश्च व्रतानि नियमास्तथा । पञ्चाक्षरार्चनस्यैते कोट्यंशेनापि नो समः

tasmāttapāṁsi yajñāśca vratāni niyamāstathā | pañcākṣarārcanasyaite koṭyaṁśenāpi no samaḥ

अतः तप, यज्ञ, व्रत तथा नियम — ये सब पंचाक्षर-पूजन के करोड़वें अंश के भी बराबर नहीं हैं।

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.48.14)

बद्धो वाप्यथ मुक्तो वा पाशात्पञ्चाक्षरेण यः । पूजयेन्मां स मुच्येत नात्र कार्या विचारणा

baddho vāpyatha mukto vā pāśātpañcākṣareṇa yaḥ | pūjayenmāṁ sa mucyeta nātra kāryā vicāraṇā

चाहे बद्ध हो या पाश से मुक्त, जो पंचाक्षर से मेरी पूजा करे, वह मुक्त हो जाता है — इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं।

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.48.15)

अरुद्रो वा सरुद्रो वा सकृत्पञ्चाक्षरेण यः । पूजयेत्पतितो वापि मूढो वा मुच्यते नरः

arudro vā sarudro vā sakṛtpañcākṣareṇa yaḥ | pūjayetpatito vāpi mūḍho vā mucyate naraḥ

चाहे रुद्र-दीक्षारहित हो या रुद्र-दीक्षायुक्त, जो एक बार भी पंचाक्षर से पूजा करे — चाहे वह पतित हो या मूढ़ — वह मनुष्य मुक्त हो जाता है।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.48.16)

षडक्षरेण वा देवि तथा पञ्चाक्षरेण वा । स ब्रह्माङ्गेन मां भक्त्या पूजयेद्यदि मुच्यते

ṣaḍakṣareṇa vā devi tathā pañcākṣareṇa vā | sa brahmāṅgena māṁ bhaktyā pūjayedyadi mucyate

हे देवी! षडक्षर से हो या पंचाक्षर से, जो ब्रह्माङ्ग सहित भक्तिपूर्वक मेरी पूजा करे, वह मुक्त हो जाता है।

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.48.17)

पतितोऽपतितो वापि मन्त्रेणानेन पूजयेत् । मम भक्तो जितक्रोधो सलब्धोऽलब्ध एव वा

patito'patito vāpi mantreṇānena pūjayet | mama bhakto jitakrodho salabdho'labdha eva vā

पतित हो या अपतित, इसी मन्त्र से पूजा करे — क्रोध पर विजय पाया मेरा भक्त, चाहे उसे कुछ प्राप्त हुआ हो या न हुआ हो।

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.48.18)

अलब्धाल्लब्ध एवेह कोटिकोटिगुणाधिकः । तस्मात् लब्ध्वैव मां देवि मन्त्रेणानेन पूजयेत्

alabdhāllabdha eveha koṭikoṭiguṇādhikaḥ | tasmāt labdhvaiva māṁ devi mantreṇānena pūjayet

अप्राप्ति की अपेक्षा प्राप्ति करोड़ों गुना श्रेष्ठ है; अतः हे देवी! मुझे प्राप्त करके ही इस मन्त्र से पूजा करनी चाहिए।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.48.19)

लब्ध्वा सम्पूजयेद्यस्तु मैत्र्यादिगुणसंयुतः । ब्रह्मचर्यरतो भक्त्या मत्सादृश्यमवाप्नुयात्

labdhvā sampūjayedyastu maitryādiguṇasaṁyutaḥ | brahmacaryarato bhaktyā matsādṛśyamavāpnuyāt

जो प्राप्त करके मैत्री आदि गुणों से युक्त तथा ब्रह्मचर्य में रत होकर भक्तिपूर्वक पूजा करता है, वह मेरे सादृश्य को प्राप्त करता है।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.48.20)

किमत्र बहुनोक्तेन भक्ताः सर्वेऽधिकारिणः । मम पञ्चाक्षरे मन्त्रे तस्मात् श्रेष्ठतरो हि सः

kimatra bahunoktena bhaktāḥ sarve'dhikāriṇaḥ | mama pañcākṣare mantre tasmāt śreṣṭhataro hi saḥ

अधिक कहने से क्या लाभ? सभी भक्त मेरे पंचाक्षर मन्त्र के अधिकारी हैं; अतः वही सर्वश्रेष्ठ है।

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.48.21)

पञ्चाक्षरप्रभावेण लोकवेदमहर्षयः । तिष्ठन्ति शाश्वता धर्मा देवाः सर्वमिदं जगत्

pañcākṣaraprabhāveṇa lokavedamaharṣayaḥ | tiṣṭhanti śāśvatā dharmā devāḥ sarvamidaṁ jagat

पंचाक्षर के प्रभाव से ही लोक, वेद, महर्षि, शाश्वत धर्म, देवता तथा यह सम्पूर्ण जगत् स्थित है।

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.48.22)

प्रलये समनुप्राप्ते नष्टे स्थावरजङ्गमे । सर्वं प्रकृतिमापन्नं तत्र संलयमेष्यति

pralaye samanuprāpte naṣṭe sthāvarajaṅgame | sarvaṁ prakṛtimāpannaṁ tatra saṁlayameṣyati

प्रलय के आने पर, स्थावर-जंगम के नष्ट हो जाने पर, सब कुछ अपनी प्रकृति को प्राप्त होकर उसी में लय को प्राप्त होगा।

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.48.23)

एकोऽहं संस्थितो देवि न द्वितीयोऽस्ति कुत्रचित् । तदा वेदाश्च शास्त्राणि सर्वे पञ्चाक्षरे स्थिताः

eko'haṁ saṁsthito devi na dvitīyo'sti kutracit | tadā vedāśca śāstrāṇi sarve pañcākṣare sthitāḥ

हे देवी! उस समय मैं अकेला ही स्थित रहता हूँ, कहीं कोई दूसरा नहीं होता; तब वेद और शास्त्र सब पंचाक्षर में ही स्थित रहते हैं।

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.48.24)

ते नाशं नैव सम्प्राप्ता मच्छक्त्या ह्यनुपालिताः । ततः सृष्टिरभून्मत्तः प्रकृत्यात्मप्रभेदतः

te nāśaṁ naiva samprāptā macchaktyā hyanupālitāḥ | tataḥ sṛṣṭirabhūnmattaḥ prakṛtyātmaprabhedataḥ

मेरी शक्ति से पालित होने के कारण वे नाश को प्राप्त नहीं होते। तत्पश्चात् मुझसे ही प्रकृति के आत्म-भेद से सृष्टि होती है —

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.48.25)

गुणमूर्त्यात्मनां चैव ततोऽवान्तरसंहृतिः । तदा नारायणः शेते देवो मायामयीं तनुम्

guṇamūrtyātmanāṁ caiva tato'vāntarasaṁhṛtiḥ | tadā nārāyaṇaḥ śete devo māyāmayīṁ tanum

तीनों गुणों की मूर्तियों वाले प्राणियों की, फिर उसकी आंशिक संहृति होती है। तब देव नारायण मायामय शरीर धारण कर —

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.48.26)

आस्थाय भोगिपर्यङ्कशयने तोयमध्यगः । तन्नाभिपङ्कजाज्जातः पञ्चवक्त्रः पितामहः

āsthāya bhogiparyaṅkaśayane toyamadhyagaḥ | tannābhipaṅkajājjātaḥ pañcavaktraḥ pitāmahaḥ

जल के मध्य शेषनाग की शय्या पर लेट जाते हैं; उनकी नाभि-कमल से पंचमुख पितामह ब्रह्मा उत्पन्न होते हैं।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.48.27)

सिसृक्षमाणो लोकांस्त्रीन्न सक्तो ह्यसहायवान् । मुनीन्दश ससर्जादौ मानसानमितौजसः

sisṛkṣamāṇo lokāṁstrīnna sakto hyasahāyavān | munīndaśa sasarjādau mānasānamitaujasaḥ

तीनों लोकों की सृष्टि करने की इच्छा से, आसक्तिरहित तथा सहायरहित होकर, उन्होंने पहले अमित तेजस्वी दस मानस मुनियों को उत्पन्न किया।

श्लोक 28 (shiva.vayaviya.48.28)

तेषां सिद्धिविवृद्ध्यर्थं मां प्रोवाच पितामहः । मत्पुत्राणां महादेव शक्तिं देहि महेश्वर

teṣāṁ siddhivivṛddhyarthaṁ māṁ provāca pitāmahaḥ | matputrāṇāṁ mahādeva śaktiṁ dehi maheśvara

उनकी सिद्धि की वृद्धि के लिए पितामह ने मुझसे कहा — हे महादेव! हे महेश्वर! मेरे पुत्रों को शक्ति प्रदान कीजिए।

श्लोक 29 (shiva.vayaviya.48.29)

इत्येवं प्रार्थितस्तेन पञ्चवक्त्रधरो ह्यहम् । पञ्चाक्षराणि क्रमशः प्रोक्तवान् पद्मयोनये

ityevaṁ prārthitastena pañcavaktradharo hyaham | pañcākṣarāṇi kramaśaḥ proktavān padmayonaye

इस प्रकार उनके द्वारा प्रार्थित होकर, पंचमुख धारण किये हुए मैंने कमल-योनि ब्रह्मा को क्रमशः पाँचों अक्षर बताये।

श्लोक 30 (shiva.vayaviya.48.30)

स पञ्चवदनैस्तानि गृह्णँल्लोकपितामहः । वाच्यवाचकभावेन ज्ञातवान्मां महेश्वरम्

sa pañcavadanaistāni gṛhṇa~llokapitāmahaḥ | vācyavācakabhāvena jñātavānmāṁ maheśvaram

उन लोक-पितामह ने उन्हें अपने पाँचों मुखों से ग्रहण करते हुए वाच्य-वाचक भाव से मुझ महेश्वर को जान लिया।

श्लोक 31 (shiva.vayaviya.48.31)

ज्ञात्वा प्रयोगं विधिवत् सिद्धमन्त्रः प्रजापतिः । पुत्रेभ्यः प्रददौ मन्त्रं मन्त्रार्थं च यथातथम्

jñātvā prayogaṁ vidhivat siddhamantraḥ prajāpatiḥ | putrebhyaḥ pradadau mantraṁ mantrārthaṁ ca yathātatham

विधिपूर्वक प्रयोग जानकर, सिद्ध-मन्त्र प्रजापति ने अपने पुत्रों को मन्त्र तथा मन्त्र का अर्थ यथावत् प्रदान किया।

श्लोक 32 (shiva.vayaviya.48.32)

ते च लब्ध्वा मन्त्ररत्नं साक्षात् लोकपितामहात् । तदाज्ञप्तेन मार्गेण मदाराधनकाङ्क्षिणः

te ca labdhvā mantraratnaṁ sākṣāt lokapitāmahāt | tadājñaptena mārgeṇa madārādhanakāṅkṣiṇaḥ

वे भी लोक-पितामह से साक्षात् मन्त्र-रत्न प्राप्त करके, उसी आज्ञप्त मार्ग से मेरी आराधना की इच्छा से —

श्लोक 33 (shiva.vayaviya.48.33)

मेरोस्तु शिखरे रम्ये मुञ्जवान्नाम पर्वतः । मत्प्रियः सततं श्रीमान्मद्भक्तै रक्षितः सदा

merostu śikhare ramye muñjavānnāma parvataḥ | matpriyaḥ satataṁ śrīmānmadbhaktai rakṣitaḥ sadā

मेरु के रमणीय शिखर पर स्थित मुंजवान् नामक पर्वत पर गये, जो मुझे सदा प्रिय, श्रीमान् तथा सदा मेरे भक्तों द्वारा रक्षित है।

श्लोक 34 (shiva.vayaviya.48.34)

तस्याभ्याशे तपस्तीव्रं लोकं स्रष्टुं समुत्सुकाः । दिव्यं वर्षसहस्रं तु वायुभक्षाः समाचरन्

tasyābhyāśe tapastīvraṁ lokaṁ sraṣṭuṁ samutsukāḥ | divyaṁ varṣasahasraṁ tu vāyubhakṣāḥ samācaran

उसके निकट, लोक की सृष्टि करने के लिए उत्सुक होकर, उन्होंने एक दिव्य सहस्र वर्ष तक केवल वायु का भक्षण करते हुए तीव्र तप किया।

श्लोक 35 (shiva.vayaviya.48.35)

तेषां भक्तिमहं दृष्ट्वा सद्यः प्रत्यक्षतामियाम् । ऋषिं छन्दश्च कीलं च बीजशक्तिं च दैवतम्

teṣāṁ bhaktimahaṁ dṛṣṭvā sadyaḥ pratyakṣatāmiyām | ṛṣiṁ chandaśca kīlaṁ ca bījaśaktiṁ ca daivatam

उनकी भक्ति देखकर मैं तत्काल उनके समक्ष प्रत्यक्ष हो गया, और उन्हें ऋषि, छन्द, कील, बीज-शक्ति, देवता —

श्लोक 36 (shiva.vayaviya.48.36)

न्यासं षडङ्गं दिग्बन्धं विनियोगमशेषतः । प्रोक्तवानहमार्याणां जगत्सृष्टिविवृद्धये

nyāsaṁ ṣaḍaṅgaṁ digbandhaṁ viniyogamaśeṣataḥ | proktavānahamāryāṇāṁ jagatsṛṣṭivivṛddhaye

न्यास, षडंग, दिग्बन्ध तथा सम्पूर्ण विनियोग — मैंने उन आर्यों को जगत् की सृष्टि की वृद्धि के लिए बताया।

श्लोक 37 (shiva.vayaviya.48.37)

ततस्ते मन्त्रमाहात्म्याद् ऋषयस्तपसौधिताः । सृष्टिं वितन्वते सम्यक् सदेवासुरमानुषीम्

tataste mantramāhātmyād ṛṣayastapasaudhitāḥ | sṛṣṭiṁ vitanvate samyak sadevāsuramānuṣīm

तत्पश्चात् वे ऋषि, मन्त्र के माहात्म्य से तथा तप से पुष्ट होकर, देवों-असुरों-मनुष्यों सहित सृष्टि का सम्यक् विस्तार करते हैं।

श्लोक 38 (shiva.vayaviya.48.38)

अस्याः परमविद्यायाः स्वरूपमधुनोच्यते । आदौ नमः प्रयोक्तव्यं शिवाय तु ततः परम्

asyāḥ paramavidyāyāḥ svarūpamadhunocyate | ādau namaḥ prayoktavyaṁ śivāya tu tataḥ param

अब इस परम विद्या के स्वरूप का वर्णन किया जाता है — पहले 'नमः' का प्रयोग करना चाहिए, फिर उसके बाद 'शिवाय'।

श्लोक 39 (shiva.vayaviya.48.39)

सैषा पञ्चाक्षरी विद्या सर्वश्रुतिशिरोगता । सर्वजातस्य सर्वस्य बीजभूता सनातनी

saiṣā pañcākṣarī vidyā sarvaśrutiśirogatā | sarvajātasya sarvasya bījabhūtā sanātanī

यह पंचाक्षरी विद्या ही समस्त श्रुतियों के शिखर पर स्थित है, तथा सम्पूर्ण उत्पन्न जगत् का सनातन बीज है।

श्लोक 40 (shiva.vayaviya.48.40)

प्रथमं मन्मुखोद्गीर्णा सा ममैवास्ति वाचिका । तप्तचामीकरप्रख्या पीनोन्नतपयोधरा

prathamaṁ manmukhodgīrṇā sā mamaivāsti vācikā | taptacāmīkaraprakhyā pīnonnatapayodharā

पहले मेरे ही मुख से उच्चरित होने के कारण यह मेरी ही वाणी है — तपाये हुए सुवर्ण के समान कान्तिमयी, स्थूल-उन्नत स्तनों वाली,

श्लोक 41 (shiva.vayaviya.48.41)

चतुर्भुजा त्रिनयना बालेन्दुकृतशेखरा । पद्मोत्पलकरा सौम्या वरदाभयपाणिका

caturbhujā trinayanā bālendukṛtaśekharā | padmotpalakarā saumyā varadābhayapāṇikā

चार भुजाओं वाली, तीन नेत्रों वाली, बाल-चन्द्र से शोभित शिखर वाली; कमल और नीलकमल हाथों में धारण करने वाली, सौम्य, वरद और अभय मुद्रा वाली,

श्लोक 42 (shiva.vayaviya.48.42)

सर्वलक्षणसम्पन्ना सर्वाभरणभूषिता । सितपद्मासनासीना नीलकुञ्चितीमूर्द्धजा

sarvalakṣaṇasampannā sarvābharaṇabhūṣitā | sitapadmāsanāsīnā nīlakuñcitīmūrddhajā

सर्व-लक्षणों से सम्पन्न, सर्व-आभूषणों से विभूषित, श्वेत-कमलासन पर विराजमान, नीले घुँघराले केशों वाली है।

श्लोक 43 (shiva.vayaviya.48.43)

अस्याः पञ्चविधा वर्णाः प्रस्फुरद् रश्मिमण्डलाः । पीतः कृष्णस्तथा धूम्रः स्वर्णाभो रक्त एव च

asyāḥ pañcavidhā varṇāḥ prasphurad raśmimaṇḍalāḥ | pītaḥ kṛṣṇastathā dhūmraḥ svarṇābho rakta eva ca

इसके पाँच वर्णों के पाँच रंग हैं, प्रत्येक चमकते किरण-मण्डल से युक्त — पीत, कृष्ण, धूम्र, सुवर्ण-आभ तथा रक्त।

श्लोक 44 (shiva.vayaviya.48.44)

पृथक् प्रयोज्या यद्येते बिन्दुनादविभूषिताः । अर्द्धचन्द्रनिभो बिन्दुर्नादो दीपशिखाकृतिः

pṛthak prayojyā yadyete bindunādavibhūṣitāḥ | arddhacandranibho bindurnādo dīpaśikhākṛtiḥ

यदि इन्हें पृथक्-पृथक् प्रयोग करना हो, तो इन्हें बिन्दु और नाद से विभूषित करना चाहिए; बिन्दु अर्ध-चन्द्र के समान तथा नाद दीपशिखा के आकार का है।

श्लोक 45 (shiva.vayaviya.48.45)

बीजं द्वितीयं बीजेषु मन्त्रस्यास्य वरानने । दीर्घपूर्वं तुरीयस्य पञ्चमं शक्तिमादिशेत्

bījaṁ dvitīyaṁ bījeṣu mantrasyāsya varānane | dīrghapūrvaṁ turīyasya pañcamaṁ śaktimādiśet

हे वरानने! इस मन्त्र के बीजों में दूसरा बीज है; चौथे के पहले दीर्घ स्वर लगे, तथा पाँचवें को शक्ति-बीज कहना चाहिए।

श्लोक 46 (shiva.vayaviya.48.46)

वामदेवो नाम ऋषिः पङ्क्तिश्छन्द उदाहृतम् । देवता शिव एवाहं मन्त्रस्यास्य वरानने

vāmadevo nāma ṛṣiḥ paṅktiśchanda udāhṛtam | devatā śiva evāhaṁ mantrasyāsya varānane

हे वरानने! इस मन्त्र का ऋषि वामदेव नामक है, छन्द पंक्ति कहा गया है, तथा देवता स्वयं मैं शिव हूँ।

श्लोक 47 (shiva.vayaviya.48.47)

गौतमोऽत्रिर्वरारोहे विश्वामित्रस्तथाङ्गिराः । भरद्वाजश्च वर्णानां क्रमशश्चर्षयः स्मृताः

gautamo'trirvarārohe viśvāmitrastathāṅgirāḥ | bharadvājaśca varṇānāṁ kramaśaścarṣayaḥ smṛtāḥ

हे वरारोहे! गौतम, अत्रि, विश्वामित्र, अंगिरा तथा भरद्वाज — क्रमशः इन वर्णों के ऋषि माने गये हैं।

श्लोक 48 (shiva.vayaviya.48.48)

गायत्र्यनुष्टुप् त्रिष्टुप् च छन्दांसि बृहती विराट् । इन्द्रो रुद्रो हरिर्ब्रह्मा स्कन्दस्तेषां च देवताः

gāyatryanuṣṭup triṣṭup ca chandāṁsi bṛhatī virāṭ | indro rudro harirbrahmā skandasteṣāṁ ca devatāḥ

गायत्री, अनुष्टुप्, त्रिष्टुप्, बृहती तथा विराट् इनके छन्द हैं; इन्द्र, रुद्र, हरि, ब्रह्मा तथा स्कन्द इनके देवता हैं।

श्लोक 49 (shiva.vayaviya.48.49)

मम पञ्चमुखान्याहुः स्थाने तेषां वरानने । पूर्वादेश्चोर्ध्वपर्यन्तं नकारादि यथाक्रमम्

mama pañcamukhānyāhuḥ sthāne teṣāṁ varānane | pūrvādeścordhvaparyantaṁ nakārādi yathākramam

हे वरानने! उनके स्थान पर मेरे पाँचों मुख कहे जाते हैं — पूर्व मुख से लेकर ऊपर तक, 'न' आदि क्रमशः।

श्लोक 50 (shiva.vayaviya.48.50)

उदात्तः प्रथमो वर्णश्चतुर्थश्च द्वितीयकः । पञ्चमः स्वरितश्चैव तृतीयो निहितः स्मृतः

udāttaḥ prathamo varṇaścaturthaśca dvitīyakaḥ | pañcamaḥ svaritaścaiva tṛtīyo nihitaḥ smṛtaḥ

पहला वर्ण उदात्त है, चौथा दूसरे के समान है; पाँचवाँ स्वरित है, तथा तीसरा निहित माना गया है।

श्लोक 51 (shiva.vayaviya.48.51)

मूलविद्या शिवं शैवं सूत्रं पञ्चाक्षरं तथा । नामान्यस्य विजानीयाच्छैवं मे हृदयं महत्

mūlavidyā śivaṁ śaivaṁ sūtraṁ pañcākṣaraṁ tathā | nāmānyasya vijānīyācchaivaṁ me hṛdayaṁ mahat

'मूलविद्या', 'शिव', 'शैव', 'सूत्र' तथा 'पंचाक्षर' — इसके ये नाम जानने चाहिए; यह मेरा ही महान् शैव हृदय है।

श्लोक 52 (shiva.vayaviya.48.52)

नकारः शिर उच्येत मकारस्तु शिखोच्यते । शिकारः कवचं तद्वद्वकारो नेत्रमुच्यते

nakāraḥ śira ucyeta makārastu śikhocyate | śikāraḥ kavacaṁ tadvadvakāro netramucyate

'न' अक्षर को शिर कहा जाता है, 'म' अक्षर को शिखा कहा जाता है; इसी प्रकार 'शि' कवच है, तथा 'व' नेत्र कहा जाता है।

श्लोक 53 (shiva.vayaviya.48.53)

यकारोऽस्त्रं नमः स्वाहा वषट् हुं वौषडित्यपि । फडित्यपि च वर्णानामन्तेऽङ्गत्वं यदा तदा

yakāro'straṁ namaḥ svāhā vaṣaṭ huṁ vauṣaḍityapi | phaḍityapi ca varṇānāmante'ṅgatvaṁ yadā tadā

'य' अस्त्र है; तथा 'नमः', 'स्वाहा', 'वषट्', 'हुं', 'वौषट्' तथा 'फट्' — जब ये वर्णों के अन्त में लगते हैं, तब वे अंग बनते हैं।

श्लोक 54 (shiva.vayaviya.48.54)

तत्रापि मूलमन्त्रोऽयं किञ्चिद्भेदसमन्वयात् । तत्रापि पञ्चमो वर्णो द्वादशस्वरभूषितः

tatrāpi mūlamantro'yaṁ kiñcidbhedasamanvayāt | tatrāpi pañcamo varṇo dvādaśasvarabhūṣitaḥ

वहाँ भी यह मूल मन्त्र कुछ भेद के साथ ही सम्बद्ध रहता है; वहाँ भी पाँचवाँ वर्ण बारह स्वरों से अलंकृत होता है।

श्लोक 55 (shiva.vayaviya.48.55)

तस्मादनेन मन्त्रेण मनोवाक्कायभेदतः । आवयोरर्चनं कुर्य्याज्जपहोमादिकं तथा

tasmādanena mantreṇa manovākkāyabhedataḥ | āvayorarcanaṁ kuryyājjapahomādikaṁ tathā

अतः इसी मन्त्र से, मन-वचन-काया के भेद से, हम दोनों की अर्चना, जप-होम आदि करनी चाहिए —

श्लोक 56 (shiva.vayaviya.48.56)

यथाप्रज्ञं यथाकालं यथाशास्त्रं यथामति । यथाशक्ति यथासम्पद्यथायोगं यथारति

yathāprajñaṁ yathākālaṁ yathāśāstraṁ yathāmati | yathāśakti yathāsampadyathāyogaṁ yathārati

यथा-बुद्धि, यथा-काल, यथा-शास्त्र, यथा-मति; यथा-शक्ति, यथा-सम्पत्ति, यथा-योग, यथा-रुचि —

श्लोक 57 (shiva.vayaviya.48.57)

यदा कदापि वा भक्त्या यत्र कुत्रापि वा कृता । येन केनापि वा देवि पूजा मुक्तिं नयिष्यति

yadā kadāpi vā bhaktyā yatra kutrāpi vā kṛtā | yena kenāpi vā devi pūjā muktiṁ nayiṣyati

हे देवी! जब भी, भक्तिपूर्वक, जहाँ भी, जिस किसी भी उपाय से की गई पूजा मुक्ति की ओर ले जाएगी।

श्लोक 58 (shiva.vayaviya.48.58)

मय्यासक्तेन मनसा यत्कृतं मम सुन्दरि । मत्प्रियं च शिवं चैव क्रमेणाप्यक्रमेण वा

mayyāsaktena manasā yatkṛtaṁ mama sundari | matpriyaṁ ca śivaṁ caiva krameṇāpyakrameṇa vā

हे सुन्दरि! मुझमें आसक्त मन से जो कुछ भी किया जाए, वह क्रम से हो या अक्रम से, मुझे प्रिय और कल्याणकारी ही है।

श्लोक 59 (shiva.vayaviya.48.59)

तथापि मम भक्ता ये नात्यन्तविवशाः पुनः । तेषां सर्वेषु शास्त्रेषु मयैव नियमः कृतः

tathāpi mama bhaktā ye nātyantavivaśāḥ punaḥ | teṣāṁ sarveṣu śāstreṣu mayaiva niyamaḥ kṛtaḥ

फिर भी जो मेरे भक्त सर्वथा विवश नहीं हैं, उनके लिए सभी शास्त्रों में मैंने ही यह नियम बनाया है।

श्लोक 60 (shiva.vayaviya.48.60)

तत्रादौ सम्प्रवक्ष्यामि मन्त्रसङ्ग्रहणं शुभम् । यं विना निष्फलं जाप्यं येन वा सफलं भवेत्

tatrādau sampravakṣyāmi mantrasaṅgrahaṇaṁ śubham | yaṁ vinā niṣphalaṁ jāpyaṁ yena vā saphalaṁ bhavet

वहाँ पहले मैं मन्त्र-संग्रहण की शुभ विधि बताऊँगा, जिसके बिना जप निष्फल होता है, और जिससे वह सफल होता है।

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