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वायवीय संहिता · अध्याय 66

शिव-महास्तोत्र-वर्णन

अध्याय 65अध्याय-सूचीअध्याय 67

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.66.1)

उपमन्युरुवाच । स्तोत्रं वक्ष्यामि ते कृष्ण पञ्चावरणमार्गतः । योगेश्वरमिदं पुण्यं कर्म येन समाप्यते

upamanyuruvāca | stotraṃ vakṣyāmi te kṛṣṇa pañcāvaraṇamārgataḥ | yogeśvaramidaṃ puṇyaṃ karma yena samāpyate

उपमन्यु ने कहा — हे कृष्ण! मैं तुम्हें पंचावरण मार्ग से यह स्तोत्र कहूँगा; यह पुण्यमय योगेश्वर कर्म इसी से सम्पन्न होता है।

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.66.2)

जय जय जगदेकनाथ शम्भो, प्रकृतिमनोहर नित्यचित्स्वभाव । अतिगतकलुषप्रपञ्चवाचामपि मनसां पदवीमतीततत्त्वम्

jaya jaya jagadekanātha śambho, prakṛtimanohara nityacitsvabhāva | atigatakaluṣaprapañcavācāmapi manasāṃ padavīmatītatattvam

जय हो, जय हो, जगत् के एकमात्र स्वामी शम्भो! स्वभाव से मनोहर, नित्य चित्-स्वरूप! अत्यंत निर्मल, वाणी के मलिन प्रपंच से भी परे, तथा मन की गति से भी अतीत तत्त्व!

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.66.3)

स्वभावनिर्मलाभोग जय सुन्दरचेष्टित । स्वात्मतुल्यमहाशक्ते जय शुद्धगुणार्णव

svabhāvanirmalābhoga jaya sundaraceṣṭita | svātmatulyamahāśakte jaya śuddhaguṇārṇava

स्वभाव से निर्मल भोग वाले! जय हो, सुन्दर चेष्टा वाले! अपनी आत्मा के समान महाशक्ति वाले! जय हो, शुद्ध गुणों के सागर!

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.66.4)

अनन्तकान्तिसम्पन्न जयासदृशविग्रह । अतर्क्यमहिमाधार जयानाकुलमङ्गल

anantakāntisampanna jayāsadṛśavigraha | atarkyamahimādhāra jayānākulamaṅgala

अनन्त कान्ति से सम्पन्न! जय हो, अतुलनीय स्वरूप वाले! अतर्क्य महिमा के आधार! जय हो, निराकुल मंगल-स्वरूप!

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.66.5)

निरञ्जन निराधार जय निष्कारणोदय । निरन्तरपरानन्द जय निर्वृतिकारण

nirañjana nirādhāra jaya niṣkāraṇodaya | nirantaraparānanda jaya nirvṛtikāraṇa

निरंजन! निराधार! जय हो, बिना किसी कारण के उदय होने वाले! निरन्तर परमानन्द-स्वरूप! जय हो, मुक्ति के कारण!

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.66.6)

जयातिपरमैश्वर्य जयातिकरुणास्पद । जय स्वतन्त्रसर्वस्व जयासदृशवैभव

jayātiparamaiśvarya jayātikaruṇāspada | jaya svatantrasarvasva jayāsadṛśavaibhava

जय हो, अत्यंत परम ऐश्वर्य वाले! जय हो, अत्यंत करुणा के आश्रय! जय हो, स्वतंत्र सर्वस्व! जय हो, अतुलनीय वैभव वाले!

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.66.7)

जयावृतमहाविश्व जयानावृत केनचित् । जयोत्तर समस्तस्य जयात्यन्तनिरुत्तर

jayāvṛtamahāviśva jayānāvṛta kenacit | jayottara samastasya jayātyantaniruttara

जय हो, समस्त महाविश्व को घेरने वाले! जय हो, किसी के द्वारा भी न घिरने वाले! जय हो, सबसे परे! जय हो, अत्यंत अनुत्तर!

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.66.8)

जयाद्भुत जयाक्षुद्र जयाक्षत जयाव्यय । जयामेय जयामाय जयाभाव जयामल

jayādbhuta jayākṣudra jayākṣata jayāvyaya | jayāmeya jayāmāya jayābhāva jayāmala

जय हो, अद्भुत! जय हो, अक्षुद्र! जय हो, अक्षत! जय हो, अव्यय! जय हो, अमेय! जय हो, अमाय! जय हो, अभाव! जय हो, अमल!

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.66.9)

महाभुज महासार महागुण महाकथ । महाबल महामाय महारस महारथ

mahābhuja mahāsāra mahāguṇa mahākatha | mahābala mahāmāya mahārasa mahāratha

महाभुज! महासार! महागुण! महाकथ! महाबल! महामाय! महारस! महारथ!

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.66.10)

नमः परमदेवाय नमः परमहेतवे । नमः शिवाय शान्ताय नमः शिवतराय ते

namaḥ paramadevāya namaḥ paramahetave | namaḥ śivāya śāntāya namaḥ śivatarāya te

परमदेव को नमस्कार! परम-कारण को नमस्कार! शान्त शिव को नमस्कार! हे शिव! आपको, सबसे अधिक शिव (कल्याणकारी) को नमस्कार!

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.66.11)

त्वदधीनमिदं कृत्स्नं जगद्धि ससुरासुरम्

tvadadhīnamidaṃ kṛtsnaṃ jagaddhi sasurāsuram

यह सम्पूर्ण जगत्, देवों और असुरों सहित, आपके ही अधीन है।

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.66.12)

अतस्त्वद्विहितामाज्ञां क्षमते कोऽतिवर्तितुम्

atastvadvihitāmājñāṃ kṣamate ko'tivartitum

इसलिए, आपके द्वारा दी गई आज्ञा का उल्लंघन करने में कौन समर्थ है?

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.66.13)

अयं पुनर्जनो नित्यं भवदेकसमाश्रयः । भवानतोऽनुगृह्यास्मै प्रार्थितं सम्प्रयच्छतु

ayaṃ punarjano nityaṃ bhavadekasamāśrayaḥ | bhavānato'nugṛhyāsmai prārthitaṃ samprayacchatu

यह प्राणी भी नित्य केवल आपका ही आश्रय लेने वाला है; हे भवान्! कृपा कर, इसकी प्रार्थित वस्तु इसे प्रदान करें।

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.66.14)

जयाम्बिके जगन्मातर्जय सर्वजगन्मयि । जयानवधिकैश्वर्ये जयानुपमविग्रहे

jayāmbike jaganmātarjaya sarvajaganmayi | jayānavadhikaiśvarye jayānupamavigrahe

जय हो, हे अम्बिके! हे जगन्माता! जय हो, समस्त जगत्-स्वरूपिणी! जय हो, अपरिमित ऐश्वर्य वाली! जय हो, अनुपम स्वरूप वाली!

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.66.15)

जय वाङ्मनसातीते जयाचिद्ध्वान्तभञ्जिके । जय जन्मजराहीने जय कालोत्तरोत्तरे

jaya vāṅmanasātīte jayāciddhvāntabhañjike | jaya janmajarāhīne jaya kālottarottare

जय हो, वाणी और मन से अतीत! जय हो, चित्-रूपी अंधकार को नष्ट करने वाली! जय हो, जन्म और जरा से रहित! जय हो, काल से भी परे की परा!

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.66.16)

जयानेकविधानस्थे जय विश्वेश्वरप्रिये । जय विश्वसुराराध्ये जय विश्वविजृम्भिणि

jayānekavidhānasthe jaya viśveśvarapriye | jaya viśvasurārādhye jaya viśvavijṛmbhiṇi

जय हो, अनेक विधानों में स्थित! जय हो, विश्वेश्वर की प्रिय! जय हो, विश्व और देवताओं द्वारा आराध्य! जय हो, विश्व का विस्तार करने वाली!

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.66.17)

जय मङ्गलदिव्याङ्गि जय मङ्गलदीपिके । जय मङ्गलचारित्रे जय मङ्गलदायिनि

jaya maṅgaladivyāṅgi jaya maṅgaladīpike | jaya maṅgalacāritre jaya maṅgaladāyini

जय हो, मंगलमय दिव्य अंगों वाली! जय हो, मंगल की दीपिका! जय हो, मंगलमय चरित्र वाली! जय हो, मंगल प्रदान करने वाली!

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.66.18)

नमः परमकल्याणगुणसञ्चयमूर्तये । त्वत्तः खलु समुत्पन्नं जगत्त्वय्येव लीयते

namaḥ paramakalyāṇaguṇasañcayamūrtaye | tvattaḥ khalu samutpannaṃ jagattvayyeva līyate

परम कल्याणकारी गुणों के समूह की साक्षात् मूर्ति को नमस्कार! आपसे ही यह जगत् उत्पन्न हुआ है, और आप में ही यह लीन हो जाता है।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.66.19)

त्वद्विनातः फलं दातुमीश्वरोऽपि न शक्नुयात् । जन्मप्रभृति देवेशि जनोऽयं त्वदुपाश्रितः

tvadvinātaḥ phalaṃ dātumīśvaro'pi na śaknuyāt | janmaprabhṛti deveśi jano'yaṃ tvadupāśritaḥ

आपके बिना, ईश्वर भी फल देने में समर्थ नहीं है; हे देवेशी! जन्म से ही यह जन आपके आश्रय में है।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.66.20)

अतोऽस्य तव भक्तस्य निर्वर्तय मनोरथम् । पञ्चवक्त्रो दशभुजः शुद्धस्फटिकसन्निभः

ato'sya tava bhaktasya nirvartaya manoratham | pañcavaktro daśabhujaḥ śuddhasphaṭikasannibhaḥ

इसलिए, अपने इस भक्त का मनोरथ पूर्ण करें; पाँच मुखों वाले, दस भुजाओं वाले, शुद्ध स्फटिक के समान —

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.66.21)

वर्णब्रह्मकलादेहो देवः सकलनिष्कलः । शिवमूर्तिसमारूढः शान्त्यतीतः सदाशिवः । भक्त्या मयार्चितो मह्यं प्रार्थितं शं प्रयच्छतु

varṇabrahmakalādeho devaḥ sakalaniṣkalaḥ | śivamūrtisamārūḍhaḥ śāntyatītaḥ sadāśivaḥ | bhaktyā mayārcito mahyaṃ prārthitaṃ śaṃ prayacchatu

वर्ण-ब्रह्म की कला-रूप देह वाले, सकल और निष्कल दोनों रूपों वाले देव; शिव-मूर्ति पर आरूढ़, शान्त्यतीत सदाशिव — मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक पूजित होकर, मुझे प्रार्थित कल्याण प्रदान करें।

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.66.22)

सदाशिवाङ्कमारूढा शक्तिरिच्छा शिवाह्वया । जननी सर्वलोकानां प्रयच्छतु मनोरथम्

sadāśivāṅkamārūḍhā śaktiricchā śivāhvayā | jananī sarvalokānāṃ prayacchatu manoratham

सदाशिव की गोद पर आरूढ़, इच्छा-शक्ति, शिवा नाम वाली; समस्त लोकों की जननी, मेरा मनोरथ प्रदान करें।

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.66.23)

शिवयोर्दयितौ पुत्रौ देवौ हेरम्बषण्मुखौ । शिवानुभावौ सर्वज्ञौ शिवज्ञानामृताशिनौ

śivayordayitau putrau devau herambaṣaṇmukhau | śivānubhāvau sarvajñau śivajñānāmṛtāśinau

शिव-शिवा के प्रिय दोनों पुत्र, हेरम्ब और षण्मुख देव; शिव के प्रभाव-स्वरूप, सर्वज्ञ, शिव-ज्ञान-रूपी अमृत का पान करने वाले —

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.66.24)

तृप्तौ परस्परं स्निग्धौ शिवाभ्यां नित्यसत्कृतौ । सत्कृतौ च सदा देवौ ब्रह्माद्यैस्त्रिदशैरपि

tṛptau parasparaṃ snigdhau śivābhyāṃ nityasatkṛtau | satkṛtau ca sadā devau brahmādyaistridaśairapi

परस्पर तृप्त, स्नेहयुक्त, शिव-शिवा द्वारा नित्य सत्कृत; तथा ब्रह्मा आदि तेतीस देवताओं द्वारा भी सदा सत्कृत —

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.66.25)

सर्वलोकपरित्राणं कर्तुमभ्युदितौ सदा । स्वेच्छावतारं कुर्वन्तौ स्वांशभेदैरनेकशः

sarvalokaparitrāṇaṃ kartumabhyuditau sadā | svecchāvatāraṃ kurvantau svāṃśabhedairanekaśaḥ

समस्त लोकों की रक्षा करने के लिए सदा तत्पर, अपनी इच्छा से अनेक बार अपने ही अंश-भेदों द्वारा अवतार लेने वाले —

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.66.26)

ताविमौ शिवयोः पार्श्वे नित्यमित्थं मयार्चितौ । तयोराज्ञां पुरस्कृत्य प्रार्थितं मे प्रयच्छताम्

tāvimau śivayoḥ pārśve nityamitthaṃ mayārcitau | tayorājñāṃ puraskṛtya prārthitaṃ me prayacchatām

वे दोनों, शिव के पार्श्व में स्थित, इस प्रकार मेरे द्वारा नित्य पूजित; उन दोनों की आज्ञा को आगे रखकर, मुझे प्रार्थित वस्तु प्रदान करें।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.66.27)

शुद्धस्फटिकसङ्काशमीशानाख्यं सदाशिवम् । मूर्धाभिमानिनी मूर्तिः शिवस्य परमात्मनः

śuddhasphaṭikasaṅkāśamīśānākhyaṃ sadāśivam | mūrdhābhimāninī mūrtiḥ śivasya paramātmanaḥ

शुद्ध स्फटिक के समान, ईशान नामक सदाशिव; परमात्मा शिव की मूर्धा (शीर्ष) का अभिमान रखने वाली मूर्ति —

श्लोक 28 (shiva.vayaviya.66.28)

शिवार्चनरतं शान्तं शान्त्यतीतं खमास्थितम् । पञ्चाक्षरान्तिमं बीजं कलाभिः पञ्चभिर्युतम्

śivārcanarataṃ śāntaṃ śāntyatītaṃ khamāsthitam | pañcākṣarāntimaṃ bījaṃ kalābhiḥ pañcabhiryutam

शिव-पूजन में रत, शान्त, शान्त्यतीत, आकाश में स्थित; पंचाक्षर का अंतिम बीज, पाँचों कलाओं से युक्त —

श्लोक 29 (shiva.vayaviya.66.29)

प्रथमावरणे पूर्वं शक्त्या सह समर्चितम् । पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु

prathamāvaraṇe pūrvaṃ śaktyā saha samarcitam | pavitraṃ paramaṃ brahma prārthitaṃ me prayacchatu

प्रथम आवरण में पूर्व दिशा में शक्ति सहित पूजित; वह पवित्र परम ब्रह्म मुझे प्रार्थित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 30 (shiva.vayaviya.66.30)

बालसूर्यप्रतीकाशं पुरुषाख्यं पुरातनम् । पूर्ववक्त्राभिमानं च शिवस्य परमेष्ठिनः

bālasūryapratīkāśaṃ puruṣākhyaṃ purātanam | pūrvavaktrābhimānaṃ ca śivasya parameṣṭhinaḥ

बाल-सूर्य के समान, पुरुष नामक पुरातन देव; परमेष्ठी शिव के पूर्व-मुख का अभिमान रखने वाला —

श्लोक 31 (shiva.vayaviya.66.31)

शान्त्यात्मकं मरुत्संस्थं शम्भोः पादार्चने रतम् । प्रथमं शिवबीजेषु कलासु च चतुष्कलम्

śāntyātmakaṃ marutsaṃsthaṃ śambhoḥ pādārcane ratam | prathamaṃ śivabījeṣu kalāsu ca catuṣkalam

शान्ति-स्वरूप, वायु में स्थित, शम्भु के चरणों की पूजा में रत; शिव के बीजों में प्रथम, तथा कलाओं में चार कलाओं वाला —

श्लोक 32 (shiva.vayaviya.66.32)

पूर्वभागे मया भक्त्या शक्त्या सह समर्चितम् । पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु

pūrvabhāge mayā bhaktyā śaktyā saha samarcitam | pavitraṃ paramaṃ brahma prārthitaṃ me prayacchatu

पूर्व भाग में मेरे द्वारा भक्तिपूर्वक शक्ति सहित पूजित; वह पवित्र परम ब्रह्म मुझे प्रार्थित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 33 (shiva.vayaviya.66.33)

अञ्जनादिप्रतीकाशमघोरं घोरविग्रहम् । देवस्य दक्षिणं वक्त्रं देवदेवपदार्चकम्

añjanādipratīkāśamaghoraṃ ghoravigraham | devasya dakṣiṇaṃ vaktraṃ devadevapadārcakam

काजल के समान काले, अघोर नामक, भयानक स्वरूप वाले; देव के दक्षिण मुख, देवों के देव के पद के आराधक —

श्लोक 34 (shiva.vayaviya.66.34)

विद्यापादं समारूढं वह्निमण्डलमध्यगम् । द्वितीयं शिवबीजेषु कलास्वष्टकलान्वितम्

vidyāpādaṃ samārūḍhaṃ vahnimaṇḍalamadhyagam | dvitīyaṃ śivabījeṣu kalāsvaṣṭakalānvitam

विद्या-पाद पर आरूढ़, अग्नि-मण्डल के मध्य में स्थित; शिव के बीजों में द्वितीय, आठ कलाओं से युक्त —

श्लोक 35 (shiva.vayaviya.66.35)

शम्भोर्दक्षिणदिग्भागे शक्त्या सह समर्चितम् । पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु

śambhordakṣiṇadigbhāge śaktyā saha samarcitam | pavitraṃ paramaṃ brahma prārthitaṃ me prayacchatu

शम्भु के दक्षिण दिशा-भाग में शक्ति सहित पूजित; वह पवित्र परम ब्रह्म मुझे प्रार्थित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 36 (shiva.vayaviya.66.36)

कुङ्कुमक्षोदसङ्काशं वामाख्यं वरवेषधृक् । वक्त्रमुत्तरमीशस्य प्रतिष्ठायां प्रतिष्ठितम्

kuṅkumakṣodasaṅkāśaṃ vāmākhyaṃ varaveṣadhṛk | vaktramuttaramīśasya pratiṣṭhāyāṃ pratiṣṭhitam

कुंकुम के चूर्ण के समान लाल, वामा नामक, उत्तम वेष धारण करने वाला; ईश के उत्तर मुख, प्रतिष्ठा कला में प्रतिष्ठित —

श्लोक 37 (shiva.vayaviya.66.37)

वारिमण्डलमध्यस्थं महादेवार्चने रतम् । तुरीयं शिवबीजेषु त्रयोदशकलान्वितम्

vārimaṇḍalamadhyasthaṃ mahādevārcane ratam | turīyaṃ śivabījeṣu trayodaśakalānvitam

जल-मण्डल के मध्य में स्थित, महादेव की पूजा में रत; शिव के बीजों में चतुर्थ, तेरह कलाओं से युक्त —

श्लोक 38 (shiva.vayaviya.66.38)

देवस्योत्तरदिग्भागे शक्त्या सह समर्चितम् । पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु

devasyottaradigbhāge śaktyā saha samarcitam | pavitraṃ paramaṃ brahma prārthitaṃ me prayacchatu

देव के उत्तर दिशा-भाग में शक्ति सहित पूजित; वह पवित्र परम ब्रह्म मुझे प्रार्थित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 39 (shiva.vayaviya.66.39)

शङ्खकुन्देन्दुधवलं सद्याख्यं सौम्यलक्षणम् । शिवस्य पश्चिमं वक्त्रं शिवपादार्चने रतम्

śaṅkhakundendudhavalaṃ sadyākhyaṃ saumyalakṣaṇam | śivasya paścimaṃ vaktraṃ śivapādārcane ratam

शंख, कुंद-पुष्प, और चन्द्रमा के समान श्वेत, सद्य नामक, सौम्य लक्षणों वाला; शिव का पश्चिम मुख, शिव के चरणों की पूजा में रत —

श्लोक 40 (shiva.vayaviya.66.40)

निवृत्तिपदनिष्ठं च पृथिव्यां समवस्थितम् । तृतीयं शिवबीजेषु कलाभिश्चाष्टभिर्युतम्

nivṛttipadaniṣṭhaṃ ca pṛthivyāṃ samavasthitam | tṛtīyaṃ śivabījeṣu kalābhiścāṣṭabhiryutam

निवृत्ति-पद में स्थित, पृथ्वी में स्थित; शिव के बीजों में तृतीय, आठ कलाओं से युक्त —

श्लोक 41 (shiva.vayaviya.66.41)

देवस्य पश्चिमे भागे शक्त्या सह समर्चितम् । पवित्रं परमं ब्रह्म प्रार्थितं मे प्रयच्छतु

devasya paścime bhāge śaktyā saha samarcitam | pavitraṃ paramaṃ brahma prārthitaṃ me prayacchatu

देव के पश्चिम भाग में शक्ति सहित पूजित; वह पवित्र परम ब्रह्म मुझे प्रार्थित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 42 (shiva.vayaviya.66.42)

शिवस्य तु शिवायाश्च हृन्मूर्त्ती शिवभाविते । तयोराज्ञां पुरस्कृत्य ते मे कामं प्रयच्छताम्

śivasya tu śivāyāśca hṛnmūrttī śivabhāvite | tayorājñāṃ puraskṛtya te me kāmaṃ prayacchatām

शिव और शिवा की, शिव-भाव से युक्त दोनों हृदय-मूर्तियाँ; उन दोनों की आज्ञा को आगे रखकर, मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करें।

श्लोक 43 (shiva.vayaviya.66.43)

शिवस्य च शिवायाश्च शिवामूर्त्ती शिवाश्रिते । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम्

śivasya ca śivāyāśca śivāmūrttī śivāśrite | satkṛtya śivayorājñāṃ te me kāmaṃ prayacchatām

शिव और शिवा की, शिव में आश्रित दोनों शिर-मूर्तियाँ; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करें।

श्लोक 44 (shiva.vayaviya.66.44)

शिवस्य च शिवायाश्च वर्मणी शिवभाविते । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम्

śivasya ca śivāyāśca varmaṇī śivabhāvite | satkṛtya śivayorājñāṃ te me kāmaṃ prayacchatām

शिव और शिवा की, शिव-भाव से युक्त दोनों कवच-मूर्तियाँ; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करें।

श्लोक 45 (shiva.vayaviya.66.45)

शिवस्य च शिवायाश्च नेत्रमूर्त्ती शिवाश्रिते । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम्

śivasya ca śivāyāśca netramūrttī śivāśrite | satkṛtya śivayorājñāṃ te me kāmaṃ prayacchatām

शिव और शिवा की, शिव में आश्रित दोनों नेत्र-मूर्तियाँ; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करें।

श्लोक 46 (shiva.vayaviya.66.46)

अस्त्रमूर्ती च शिवयोर्नित्यमर्चनतत्परे । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं प्रयच्छताम्

astramūrtī ca śivayornityamarcanatatpare | satkṛtya śivayorājñāṃ te me kāmaṃ prayacchatām

शिव-शिवा दोनों की अस्त्र-मूर्तियाँ, नित्य पूजन-परायण; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करें।

श्लोक 47 (shiva.vayaviya.66.47)

वामो ज्येष्ठस्तथा रुद्रः कालो विकरणस्तथा । बलो विकरणश्चैव बलप्रमथनः परः

vāmo jyeṣṭhastathā rudraḥ kālo vikaraṇastathā | balo vikaraṇaścaiva balapramathanaḥ paraḥ

वाम, ज्येष्ठ, तथा रुद्र, काल, विकरण, तथा बल, विकरण, तथा श्रेष्ठ बलप्रमथन —

श्लोक 48 (shiva.vayaviya.66.48)

सर्वभूतस्य दमनस्तादृशाश्चाष्टशक्तयः । प्रार्थितं मे प्रयच्छन्तु शिवयोरेव शासनात्

sarvabhūtasya damanastādṛśāścāṣṭaśaktayaḥ | prārthitaṃ me prayacchantu śivayoreva śāsanāt

सर्वभूत का दमन करने वाला — इस प्रकार आठ शक्तियाँ हैं; शिव-शिवा की ही आज्ञा से, मेरी प्रार्थित वस्तु प्रदान करें।

श्लोक 49 (shiva.vayaviya.66.49)

अथानन्तश्च सूक्ष्मश्च शिवश्चाप्येकनेत्रकः । एकरुद्रस्त्रिमूर्तिश्च श्रीकण्ठश्च शिखण्डिकः

athānantaśca sūkṣmaśca śivaścāpyekanetrakaḥ | ekarudrastrimūrtiśca śrīkaṇṭhaśca śikhaṇḍikaḥ

तत्पश्चात् अनन्त, तथा सूक्ष्म, शिव, तथा एकनेत्रक भी; एकरुद्र, त्रिमूर्ति, तथा श्रीकण्ठ, और शिखण्डिक —

श्लोक 50 (shiva.vayaviya.66.50)

तथाष्टौ शक्तयस्तेषां द्वितीयावरणेऽर्चिताः । ते मे कामं प्रयच्छन्तु शिवयोरेव शासनात्

tathāṣṭau śaktayasteṣāṃ dvitīyāvaraṇe'rcitāḥ | te me kāmaṃ prayacchantu śivayoreva śāsanāt

तथा उनकी आठों शक्तियाँ, जो द्वितीय आवरण में पूजित हैं; शिव-शिवा की ही आज्ञा से, मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करें।

श्लोक 51 (shiva.vayaviya.66.51)

भवाद्या मूर्तयश्चाष्टौ तासामपि च शक्तयः । महादेवादयश्चान्ये तथैकादशमूर्तयः

bhavādyā mūrtayaścāṣṭau tāsāmapi ca śaktayaḥ | mahādevādayaścānye tathaikādaśamūrtayaḥ

भव आदि आठों मूर्तियाँ, तथा उनकी भी शक्तियाँ; तथा महादेव आदि अन्य, उसी प्रकार ग्यारह मूर्तियाँ —

श्लोक 52 (shiva.vayaviya.66.52)

शक्तिभिः सहिताः सर्वे तृतीयावरणे स्थिताः । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां दिशन्तु फलमीप्सितम्

śaktibhiḥ sahitāḥ sarve tṛtīyāvaraṇe sthitāḥ | satkṛtya śivayorājñāṃ diśantu phalamīpsitam

शक्तियों सहित, सभी तृतीय आवरण में स्थित; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, इच्छित फल प्रदान करें।

श्लोक 53 (shiva.vayaviya.66.53)

वृषराजो महातेजा महामेघसमस्वनः । मेरुमन्दरकैलासहिमाद्रिशिखरोपमः

vṛṣarājo mahātejā mahāmeghasamasvanaḥ | merumandarakailāsahimādriśikharopamaḥ

वृषराज (नन्दी), महातेजस्वी, महामेघ के समान गर्जना वाला; मेरु, मन्दर, कैलास, हिमाद्रि के शिखर के समान —

श्लोक 54 (shiva.vayaviya.66.54)

सिताभ्रशिखराकारः ककुदा परिशोभितः । महाभोगीन्द्रकल्पेन वालेन च विराजितः

sitābhraśikharākāraḥ kakudā pariśobhitaḥ | mahābhogīndrakalpena vālena ca virājitaḥ

श्वेत मेघ के शिखर के समान आकार वाला, कूबड़ से सुशोभित; महान सर्पराज के समान पूँछ से सुशोभित —

श्लोक 55 (shiva.vayaviya.66.55)

रक्तास्यशृङ्गचरणो रक्तप्रायविलोचनः । पीवरोन्नतसर्वाङ्गः सुचारुगमनोज्ज्वलः

raktāsyaśṛṅgacaraṇo raktaprāyavilocanaḥ | pīvaronnatasarvāṅgaḥ sucārugamanojjvalaḥ

लाल मुख, सींग और पैरों वाला, प्रायः लाल नेत्रों वाला; पुष्ट, उन्नत सर्वांगों वाला, सुन्दर गति से उज्ज्वल —

श्लोक 56 (shiva.vayaviya.66.56)

प्रशस्तलक्षणः श्रीमान् प्रज्वलन्मणिभूषणः । शिवप्रियः शिवासक्तः शिवयोर्ध्वजवाहनः

praśastalakṣaṇaḥ śrīmān prajvalanmaṇibhūṣaṇaḥ | śivapriyaḥ śivāsaktaḥ śivayordhvajavāhanaḥ

प्रशस्त लक्षणों वाला, श्रीसम्पन्न, प्रज्वलित मणियों के आभूषणों वाला; शिव-प्रिय, शिव-आसक्त, शिव-शिवा की ध्वजा को धारण करने वाला —

श्लोक 57 (shiva.vayaviya.66.57)

तथा तच्चरणन्यासपावितापरविग्रहः । गोराजपुरुषः श्रीमान् श्रीमच्छूलवरायुधः । तयोराज्ञां पुरस्कृत्य स मे कामं प्रयच्छतु

tathā taccaraṇanyāsapāvitāparavigrahaḥ | gorājapuruṣaḥ śrīmān śrīmacchūlavarāyudhaḥ | tayorājñāṃ puraskṛtya sa me kāmaṃ prayacchatu

तथा उन दोनों के चरण-न्यास से पवित्र किए गए श्रेष्ठ स्वरूप वाला; गोराज-पुरुष, श्रीसम्पन्न, श्रीमान् शूल-आयुध धारण करने वाला — उन दोनों की आज्ञा को आगे रखकर, वह मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 58 (shiva.vayaviya.66.58)

नन्दीश्वरो महातेजा नगेन्द्रतनयात्मजः । सनारायणकैर्देवैर्नित्यमभ्यर्च्य वन्दितः

nandīśvaro mahātejā nagendratanayātmajaḥ | sanārāyaṇakairdevairnityamabhyarcya vanditaḥ

नन्दीश्वर, महातेजस्वी, पर्वतराज की पुत्री का पालित पुत्र; नारायण सहित देवताओं द्वारा नित्य पूजित, वंदित —

श्लोक 59 (shiva.vayaviya.66.59)

शर्वस्यान्तःपुरद्वारि सार्धं परिजनैः स्थितः । सर्वेश्वरसमप्रख्यः सर्वासुरविमर्दनः

śarvasyāntaḥpuradvāri sārdhaṃ parijanaiḥ sthitaḥ | sarveśvarasamaprakhyaḥ sarvāsuravimardanaḥ

शर्व (शिव) के अन्तःपुर के द्वार पर परिजनों सहित स्थित; सर्वेश्वर के समान प्रभाव वाला, समस्त असुरों का विनाश करने वाला —

श्लोक 60 (shiva.vayaviya.66.60)

सर्वेषां शिवधर्माणामध्यक्षत्वेऽभिषेचितः । शिवप्रियः शिवासक्तः श्रीमच्छूलवरायुधः

sarveṣāṃ śivadharmāṇāmadhyakṣatve'bhiṣecitaḥ | śivapriyaḥ śivāsaktaḥ śrīmacchūlavarāyudhaḥ

समस्त शिव-धर्मों के अध्यक्ष-पद पर अभिषिक्त; शिव-प्रिय, शिव-आसक्त, श्रीमान् शूल-आयुध धारण करने वाला —

श्लोक 61 (shiva.vayaviya.66.61)

शिवाश्रितेषु संसक्तस्त्वनुरक्तश्च तैरपि । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे कामं प्रयच्छतु

śivāśriteṣu saṃsaktastvanuraktaśca tairapi | satkṛtya śivayorājñāṃ sa me kāmaṃ prayacchatu

शिव के आश्रितों में अनुरक्त, तथा उनके द्वारा भी अनुरक्त; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, वह मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 62 (shiva.vayaviya.66.62)

महाकालो महाबाहुर्महादेव इवापरः । महादेवाश्रितानां तु नित्यमेवाभिरक्षतु

mahākālo mahābāhurmahādeva ivāparaḥ | mahādevāśritānāṃ tu nityamevābhirakṣatu

महाकाल, महाबाहु, मानो दूसरा महादेव ही; महादेव के आश्रितों की सदा रक्षा करे।

श्लोक 63 (shiva.vayaviya.66.63)

शिवप्रियः शिवासक्तः शिवयोरर्चकः सदा । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम्

śivapriyaḥ śivāsaktaḥ śivayorarcakaḥ sadā | satkṛtya śivayorājñāṃ sa me diśatu kāṅkṣitam

शिव-प्रिय, शिव-आसक्त, सदा शिव-शिवा का पूजक; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, वह मुझे वांछित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 64 (shiva.vayaviya.66.64)

सर्वशास्त्रार्थतत्त्वज्ञः शास्ता विष्णोः परा तनुः । महामोहात्मतनयो मधुमांसासवप्रियः । तयोराज्ञां पुरस्कृत्य स मे कामं प्रयच्छतु

sarvaśāstrārthatattvajñaḥ śāstā viṣṇoḥ parā tanuḥ | mahāmohātmatanayo madhumāṃsāsavapriyaḥ | tayorājñāṃ puraskṛtya sa me kāmaṃ prayacchatu

समस्त शास्त्रों के अर्थ-तत्त्व का ज्ञाता शास्ता, विष्णु का ही परम शरीर; महामोह की अपनी संतान, मधु-मांस-आसव प्रिय — उन दोनों की आज्ञा को आगे रखकर, वह मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 65 (shiva.vayaviya.66.65)

ब्रह्माणी चैव माहेशी कौमारी वैष्णवी तथा । वाराही चैव माहेन्द्री चामुण्डा चण्डविक्रमा

brahmāṇī caiva māheśī kaumārī vaiṣṇavī tathā | vārāhī caiva māhendrī cāmuṇḍā caṇḍavikramā

ब्राह्मी, तथा माहेश्वरी, कौमारी, उसी प्रकार वैष्णवी; वाराही, तथा माहेन्द्री, चामुण्डा, प्रचण्ड पराक्रम वाली —

श्लोक 66 (shiva.vayaviya.66.66)

एता वै मातरः सप्त सर्वलोकस्य मातरः । प्रार्थितं मे प्रयच्छन्तु परमेश्वरशासनात्

etā vai mātaraḥ sapta sarvalokasya mātaraḥ | prārthitaṃ me prayacchantu parameśvaraśāsanāt

ये सातों माताएँ, समस्त लोक की माताएँ; परमेश्वर की आज्ञा से मुझे प्रार्थित वस्तु प्रदान करें।

श्लोक 67 (shiva.vayaviya.66.67)

मत्तमातङ्गवदनो गङ्गोमाशङ्करात्मजः । आकाशदेहो दिग्बाहुः सोमसूर्याग्निलोचनः

mattamātaṅgavadano gaṅgomāśaṅkarātmajaḥ | ākāśadeho digbāhuḥ somasūryāgnilocanaḥ

मतवाले हाथी के मुख वाला, गंगा-उमा-शंकर का पुत्र; आकाश-देह वाला, दिशाओं को भुजा बनाने वाला, चन्द्र-सूर्य-अग्नि नेत्रों वाला —

श्लोक 68 (shiva.vayaviya.66.68)

ऐरावतादिभिर्दिव्यैर्दिग्गजैर्नित्यमर्चितः । शिवज्ञानमदोद्भिन्नस्त्रिदशानामविघ्नकृत्

airāvatādibhirdivyairdiggajairnityamarcitaḥ | śivajñānamadodbhinnastridaśānāmavighnakṛt

ऐरावत आदि दिव्य दिग्गजों द्वारा नित्य पूजित; शिव-ज्ञान के मद से उन्मत्त, तेतीस देवताओं के विघ्नों को दूर करने वाला —

श्लोक 69 (shiva.vayaviya.66.69)

विघ्नकृच्चासुरादीनां विघ्नेशः शिवभावितः । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम्

vighnakṛccāsurādīnāṃ vighneśaḥ śivabhāvitaḥ | satkṛtya śivayorājñāṃ sa me diśatu kāṅkṣitam

असुर आदि के लिए विघ्नकारी, विघ्नेश, शिव-भाव से युक्त; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, वह मुझे वांछित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 70 (shiva.vayaviya.66.70)

षण्मुखः शिवसम्भूतः शक्तिवज्रधरः प्रभुः । अग्नेश्च तनयो देवो ह्यपर्णातनयः पुनः

ṣaṇmukhaḥ śivasambhūtaḥ śaktivajradharaḥ prabhuḥ | agneśca tanayo devo hyaparṇātanayaḥ punaḥ

षण्मुख, शिव से उत्पन्न, शक्ति और वज्र धारण करने वाला प्रभु; अग्नि का पुत्र, तथा पुनः अपर्णा (पार्वती) का भी पुत्र —

श्लोक 71 (shiva.vayaviya.66.71)

गङ्गायाश्च गणाम्बायाः कृत्तिकानां तथैव च । विशाखेन च शाखेन नैगमेयेन चावृतः

gaṅgāyāśca gaṇāmbāyāḥ kṛttikānāṃ tathaiva ca | viśākhena ca śākhena naigameyena cāvṛtaḥ

गंगा का, गणाम्बा का, तथा कृत्तिकाओं का भी पुत्र; विशाख, शाख, तथा नैगमेय से घिरा हुआ —

श्लोक 72 (shiva.vayaviya.66.72)

इन्द्रजिच्चन्द्रसेनानीस्तारकासुरजित्तथा । शैलानां मेरुमुख्यानां वेधकश्च स्वतेजसा

indrajiccandrasenānīstārakāsurajittathā | śailānāṃ merumukhyānāṃ vedhakaśca svatejasā

इन्द्रजित्, चन्द्रसेनानी, तारकासुर का विजेता; मेरु आदि प्रधान पर्वतों को भी अपने तेज से बींधने वाला —

श्लोक 73 (shiva.vayaviya.66.73)

तप्तचामीकरप्रख्यः शतपत्रदलेक्षणः । कुमारः सुकुमाराणां रूपोदाहरणं महत्

taptacāmīkaraprakhyaḥ śatapatradalekṣaṇaḥ | kumāraḥ sukumārāṇāṃ rūpodāharaṇaṃ mahat

तपाए हुए स्वर्ण के समान, सौ पंखुड़ियों वाले कमल-दल के समान नेत्रों वाला; कुमार, सुकुमारों में महान रूप का उदाहरण —

श्लोक 74 (shiva.vayaviya.66.74)

शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपदार्चकः सदा । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम्

śivapriyaḥ śivāsaktaḥ śivapadārcakaḥ sadā | satkṛtya śivayorājñāṃ sa me diśatu kāṅkṣitam

शिव-प्रिय, शिव-आसक्त, सदा शिव के चरणों का पूजक; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, वह मुझे वांछित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 75 (shiva.vayaviya.66.75)

ज्येष्ठा वरिष्ठा वरदा शिवयोर्यजने रता । तयोराज्ञां पुरस्कृत्य सा मे दिशतु काङ्क्षितम्

jyeṣṭhā variṣṭhā varadā śivayoryajane ratā | tayorājñāṃ puraskṛtya sā me diśatu kāṅkṣitam

ज्येष्ठा, सबसे श्रेष्ठ, वरदान देने वाली, शिव-शिवा के यजन में रत; उन दोनों की आज्ञा को आगे रखकर, वह मुझे वांछित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 76 (shiva.vayaviya.66.76)

त्रैलोक्यवन्दिता साक्षादुल्काकारा गणाम्बिका । जगत्सृष्टिविवृद्ध्यर्थं ब्रह्मणाभ्यर्थिता शिवात्

trailokyavanditā sākṣādulkākārā gaṇāmbikā | jagatsṛṣṭivivṛddhyarthaṃ brahmaṇābhyarthitā śivāt

तीनों लोकों द्वारा वंदित, साक्षात् उल्का के समान आकार वाली गणाम्बिका; जगत् की सृष्टि की वृद्धि के लिए ब्रह्मा द्वारा शिव से प्रार्थित —

श्लोक 77 (shiva.vayaviya.66.77)

शिवायाः प्रविभक्ताया भ्रुवोरन्तरनिःसृताः । दाक्षायणी सती मेना तथा हैमवती ह्युमा

śivāyāḥ pravibhaktāyā bhruvorantaraniḥsṛtāḥ | dākṣāyaṇī satī menā tathā haimavatī hyumā

शिवा के विभाजित रूप से, भौंहों के मध्य से निकली हुई; दाक्षायणी, सती, मेना, तथा हैमवती, उमा —

श्लोक 78 (shiva.vayaviya.66.78)

कौशिक्याश्चैव जननी भद्रकाल्यास्तथैव च । अपर्णायाश्च जननी पाटलायास्तथैव च

kauśikyāścaiva jananī bhadrakālyāstathaiva ca | aparṇāyāśca jananī pāṭalāyāstathaiva ca

कौशिकी की भी जननी, तथा उसी प्रकार भद्रकाली की भी; अपर्णा की जननी, तथा उसी प्रकार पाटला की भी —

श्लोक 79 (shiva.vayaviya.66.79)

शिवार्चनरता नित्यं रुद्राणी रुद्रवल्लभा । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां सा मे दिशतु काङ्क्षितम्

śivārcanaratā nityaṃ rudrāṇī rudravallabhā | satkṛtya śivayorājñāṃ sā me diśatu kāṅkṣitam

नित्य शिव-अर्चन में रत, रुद्राणी, रुद्र की प्रिया; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, वह मुझे वांछित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 80 (shiva.vayaviya.66.80)

चण्डः सर्वगणेशानः शम्भोर्वदनसम्भवः । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु काङ्क्षितम्

caṇḍaḥ sarvagaṇeśānaḥ śambhorvadanasambhavaḥ | satkṛtya śivayorājñāṃ sa me diśatu kāṅkṣitam

चण्ड, समस्त गणों के स्वामी, शम्भु के मुख से उत्पन्न; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, वह मुझे वांछित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 81 (shiva.vayaviya.66.81)

पिङ्गलो गणपः श्रीमान् शिवासक्तः शिवप्रियः । आज्ञया शिवयोरेव स मे कामं प्रयच्छतु

piṅgalo gaṇapaḥ śrīmān śivāsaktaḥ śivapriyaḥ | ājñayā śivayoreva sa me kāmaṃ prayacchatu

पिंगल, गणपति, श्रीसम्पन्न, शिव-आसक्त, शिव-प्रिय; शिव-शिवा की ही आज्ञा से, वह मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 82 (shiva.vayaviya.66.82)

भृङ्गीशो नाम गणपः शिवराधनतत्परः । प्रयच्छतु स मे कामं पत्युराज्ञापुरःसरम्

bhṛṅgīśo nāma gaṇapaḥ śivarādhanatatparaḥ | prayacchatu sa me kāmaṃ patyurājñāpuraḥsaram

भृंगीश नामक गणपति, शिव की आराधना में तत्पर; अपने स्वामी की आज्ञा को आगे रखकर, वह मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 83 (shiva.vayaviya.66.83)

वीरभद्रो महातेजा हिमकुन्देन्दुसन्निभः । भद्रकालीप्रियो नित्यं मातृणां चाभिरक्षिता

vīrabhadro mahātejā himakundendusannibhaḥ | bhadrakālīpriyo nityaṃ mātṛṇāṃ cābhirakṣitā

वीरभद्र, महातेजस्वी, हिम, कुन्द-पुष्प, और चन्द्रमा के समान श्वेत; भद्रकाली का सदा प्रिय, माताओं (मातृकाओं) का रक्षक —

श्लोक 84 (shiva.vayaviya.66.84)

यज्ञस्य च शिरोहर्ता दक्षस्य च दुरात्मनः । उपेन्द्रेन्द्रयमादीनां देवानामङ्गतक्षकः

yajñasya ca śirohartā dakṣasya ca durātmanaḥ | upendrendrayamādīnāṃ devānāmaṅgatakṣakaḥ

यज्ञ का शिर काटने वाला, तथा दुष्ट आत्मा दक्ष का भी; उपेन्द्र, इन्द्र, यम आदि देवताओं के अंगों को क्षत-विक्षत करने वाला —

श्लोक 85 (shiva.vayaviya.66.85)

शिवस्यानुचरः श्रीमान् शिवशासनपालकः । शिवयोः शासनादेव स मे दिशतु काङ्क्षितम्

śivasyānucaraḥ śrīmān śivaśāsanapālakaḥ | śivayoḥ śāsanādeva sa me diśatu kāṅkṣitam

शिव का अनुचर, श्रीसम्पन्न, शिव-शासन का पालक; शिव-शिवा के शासन से ही, वह मुझे वांछित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 86 (shiva.vayaviya.66.86)

सरस्वती महेशस्य वाक्सरोजसमुद्भवा । शिवयोः पूजने सक्ता स मे दिशतु काङ्क्षितम्

sarasvatī maheśasya vāksarojasamudbhavā | śivayoḥ pūjane saktā sa me diśatu kāṅkṣitam

सरस्वती, महेश की वाणी के कमल से उत्पन्न; शिव-शिवा के पूजन में रत, वह मुझे वांछित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 87 (shiva.vayaviya.66.87)

विष्णोर्वक्षःस्थिता लक्ष्मीः शिवयोः पूजने रता । शिवयोः शासनादेव सा मे दिशतु काङ्क्षितम्

viṣṇorvakṣaḥsthitā lakṣmīḥ śivayoḥ pūjane ratā | śivayoḥ śāsanādeva sā me diśatu kāṅkṣitam

विष्णु के वक्षःस्थल में स्थित लक्ष्मी, शिव-शिवा के पूजन में रत; शिव-शिवा के शासन से ही, वह मुझे वांछित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 88 (shiva.vayaviya.66.88)

महामोटी महादेव्याः पादपूजापरायणा । तस्या एव नियोगेन सा मे दिशतु काङ्क्षितम्

mahāmoṭī mahādevyāḥ pādapūjāparāyaṇā | tasyā eva niyogena sā me diśatu kāṅkṣitam

महामोटी, महादेवी के चरणों की पूजा में तत्पर; उन्हीं (महादेवी) के नियोग से, वह मुझे वांछित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 89 (shiva.vayaviya.66.89)

कौशिकी सिंहमारूढा पार्वत्याः परमा सुता । विष्णोर्निद्रा महामाया महामहिषमर्दिनी

kauśikī siṃhamārūḍhā pārvatyāḥ paramā sutā | viṣṇornidrā mahāmāyā mahāmahiṣamardinī

कौशिकी, सिंह पर आरूढ़, पार्वती की परम पुत्री; विष्णु की निद्रा, महामाया, महिषासुर का विनाश करने वाली —

श्लोक 90 (shiva.vayaviya.66.90)

निशम्भशुम्भसंहर्त्री मधुमांसासवप्रिया । सत्कृत्य शासनं मातुः सा मे दिशतु काङ्क्षितम्

niśambhaśumbhasaṃhartrī madhumāṃsāsavapriyā | satkṛtya śāsanaṃ mātuḥ sā me diśatu kāṅkṣitam

निशुम्भ और शुम्भ का संहार करने वाली, मधु-मांस-आसव प्रिय; अपनी माता की आज्ञा का सत्कार कर, वह मुझे वांछित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 91 (shiva.vayaviya.66.91)

रुद्रा रुद्रसमप्रख्याः प्रमथाः प्रथितौजसः । भूताख्याश्च महावीर्या महादेवसमप्रभाः

rudrā rudrasamaprakhyāḥ pramathāḥ prathitaujasaḥ | bhūtākhyāśca mahāvīryā mahādevasamaprabhāḥ

रुद्र के समान तेजस्वी रुद्र-गण, प्रमथ-गण, विख्यात तेज वाले; भूत नामक गण भी, महापराक्रमी, महादेव के समान प्रभा वाले —

श्लोक 92 (shiva.vayaviya.66.92)

नित्यमुक्ता निरुपमा निर्द्वन्द्वा निरुपप्लवाः । सशक्तयः सानुचराः सर्वलोकनमस्कृताः

nityamuktā nirupamā nirdvandvā nirupaplavāḥ | saśaktayaḥ sānucarāḥ sarvalokanamaskṛtāḥ

नित्य मुक्त, अनुपम, द्वन्द्व-रहित, विपत्ति-रहित; शक्तियों सहित, अनुचरों सहित, समस्त लोक द्वारा नमस्कृत —

श्लोक 93 (shiva.vayaviya.66.93)

सर्वेषामेव लोकानां सृष्टिसंहरणक्षमाः । परस्परानुरक्ताश्च परस्परमनुव्रताः

sarveṣāmeva lokānāṃ sṛṣṭisaṃharaṇakṣamāḥ | parasparānuraktāśca parasparamanuvratāḥ

समस्त लोकों की सृष्टि और संहार करने में समर्थ; परस्पर अनुरक्त, तथा परस्पर एक-दूसरे के प्रति समर्पित —

श्लोक 94 (shiva.vayaviya.66.94)

परस्परमतिस्निग्धाः परस्परनमस्कृताः । शिवप्रियतमा नित्यं शिवलक्षणलक्षिताः

parasparamatisnigdhāḥ parasparanamaskṛtāḥ | śivapriyatamā nityaṃ śivalakṣaṇalakṣitāḥ

परस्पर अत्यंत स्नेहयुक्त, परस्पर नमस्कार करने वाले; नित्य शिव के अत्यंत प्रिय, शिव के लक्षणों से युक्त —

श्लोक 95 (shiva.vayaviya.66.95)

सौम्या घोरास्तथा मिश्राश्चान्तरालद्वयात्मिकाः । विरूपाश्च सुरूपाश्च नानारूपधरास्तथा

saumyā ghorāstathā miśrāścāntarāladvayātmikāḥ | virūpāśca surūpāśca nānārūpadharāstathā

सौम्य, तथा घोर, तथा मिश्रित, दोनों के मध्य के स्वरूप वाले भी; विरूप भी, सुरूप भी, नाना रूप धारण करने वाले भी —

श्लोक 96 (shiva.vayaviya.66.96)

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां ते मे कामं दिशन्तु वै । देव्या प्रियसखीवर्गो देवीलक्षणलक्षितः

satkṛtya śivayorājñāṃ te me kāmaṃ diśantu vai | devyā priyasakhīvargo devīlakṣaṇalakṣitaḥ

शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, वे मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करें; देवी की प्रिय सखियों का समूह, देवी के ही लक्षणों से युक्त —

श्लोक 97 (shiva.vayaviya.66.97)

सहितो रुद्रकन्याभिः शक्तिभिश्चाप्यनेकशः । तृतीयावरणे शम्भोर्भक्त्या नित्यं समर्चितः

sahito rudrakanyābhiḥ śaktibhiścāpyanekaśaḥ | tṛtīyāvaraṇe śambhorbhaktyā nityaṃ samarcitaḥ

रुद्र-कन्याओं सहित, तथा अनेक शक्तियों सहित भी; तृतीय आवरण में शम्भु द्वारा भक्तिपूर्वक नित्य पूजित —

श्लोक 98 (shiva.vayaviya.66.98)

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु मङ्गलम् । दिवाकरो महेशस्य मूर्तिर्दीप्तिसुमण्डलः

satkṛtya śivayorājñāṃ sa me diśatu maṅgalam | divākaro maheśasya mūrtirdīptisumaṇḍalaḥ

शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, वह मुझे मंगल प्रदान करे; दिवाकर (सूर्य), महेश की सुव्यवस्थित तेजोमय मूर्ति —

श्लोक 99 (shiva.vayaviya.66.99)

निर्गुणो गुणसङ्कीर्णस्तथैव गुणकेवलः । अविकारात्मकश्चाद्य एकः सामान्यविक्रियः

nirguṇo guṇasaṅkīrṇastathaiva guṇakevalaḥ | avikārātmakaścādya ekaḥ sāmānyavikriyaḥ

गुण-रहित भी, गुणों से युक्त भी, तथा उसी प्रकार केवल गुण-स्वरूप भी; विकार-रहित-स्वरूप, प्रथम, एक, तथा साधारण विकार वाला भी —

श्लोक 100 (shiva.vayaviya.66.100)

असाधारणकर्मा च सृष्टिस्थितिलयक्रमात् । एवं त्रिधा चतुर्धा च विभक्ताः पञ्चधा पुनः

asādhāraṇakarmā ca sṛṣṭisthitilayakramāt | evaṃ tridhā caturdhā ca vibhaktāḥ pañcadhā punaḥ

विशिष्ट कर्म करने वाला, सृष्टि-स्थिति-लय के क्रम से; इस प्रकार तीन प्रकार से, चार प्रकार से, तथा पुनः पाँच प्रकार से विभक्त —

श्लोक 101 (shiva.vayaviya.66.101)

चतुर्थावरणे शम्भोः पूजितश्चानुगैः सह । शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चने रतः

caturthāvaraṇe śambhoḥ pūjitaścānugaiḥ saha | śivapriyaḥ śivāsaktaḥ śivapādārcane rataḥ

शम्भु के चतुर्थ आवरण में अपने अनुचरों सहित पूजित; शिव-प्रिय, शिव-आसक्त, शिव के चरणों की पूजा में रत —

श्लोक 102 (shiva.vayaviya.66.102)

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु मङ्गलम् । दिवाकरषडङ्गानि दीप्ताद्याश्चाष्टशक्तयः

satkṛtya śivayorājñāṃ sa me diśatu maṅgalam | divākaraṣaḍaṅgāni dīptādyāścāṣṭaśaktayaḥ

शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, वह मुझे मंगल प्रदान करे; दिवाकर के छह अंग, तथा दीप्ता आदि आठ शक्तियाँ —

श्लोक 103 (shiva.vayaviya.66.103)

आदित्यो भास्करो भानू रविश्चेत्यनुपूर्वशः । अर्को ब्रह्मा तथा रुद्रो विष्नुश्चादित्यमूर्तयः

ādityo bhāskaro bhānū raviścetyanupūrvaśaḥ | arko brahmā tathā rudro viṣnuścādityamūrtayaḥ

आदित्य, भास्कर, भानु, तथा रवि — इस क्रम से; अर्क, ब्रह्मा, तथा रुद्र, और विष्णु — ये आदित्य की मूर्तियाँ हैं।

श्लोक 104 (shiva.vayaviya.66.104)

विस्तरा सुतरा बोधिन्याप्यायिन्यपराः पुनः । उषा प्रभा तथा प्राज्ञा सन्ध्या चेत्यपि शक्तयः

vistarā sutarā bodhinyāpyāyinyaparāḥ punaḥ | uṣā prabhā tathā prājñā sandhyā cetyapi śaktayaḥ

विस्तरा, सुतरा, बोधिनी, तथा आप्यायिनी, फिर अन्य; उषा, प्रभा, तथा प्राज्ञा, और संध्या — ये भी शक्तियाँ हैं।

श्लोक 105 (shiva.vayaviya.66.105)

सोमादिकेतुपर्यन्ता ग्रहाश्च शिवभाविताः । शिवयोराज्ञया नुन्ना मङ्गलं प्रदिशन्तु मे

somādiketuparyantā grahāśca śivabhāvitāḥ | śivayorājñayā nunnā maṅgalaṃ pradiśantu me

सोम से लेकर केतु पर्यन्त ग्रह, शिव-भाव से युक्त; शिव-शिवा की आज्ञा से प्रेरित होकर, मुझे मंगल प्रदान करें।

श्लोक 106 (shiva.vayaviya.66.106)

अथवा द्वादशादित्यास्तथा द्वादश शक्तयः । ऋषयो देवगन्धर्वाः पन्नगाप्सरसां गणाः

athavā dvādaśādityāstathā dvādaśa śaktayaḥ | ṛṣayo devagandharvāḥ pannagāpsarasāṃ gaṇāḥ

अथवा बारह आदित्य, तथा बारह शक्तियाँ; ऋषि, देव, गन्धर्व, नाग, अप्सराओं के समूह —

श्लोक 107 (shiva.vayaviya.66.107)

ग्रामण्यश्च तथा यक्षा राक्षसाश्च सुरास्तथा । सप्त सप्तगणाश्चैते सप्तच्छन्दोमया हयाः

grāmaṇyaśca tathā yakṣā rākṣasāśca surāstathā | sapta saptagaṇāścaite saptacchandomayā hayāḥ

ग्रामणी, तथा यक्ष, राक्षस, तथा देवगण भी; सात-सात के सात गण, तथा सात छन्दों के रूप वाले अश्व —

श्लोक 108 (shiva.vayaviya.66.108)

वालखिल्यादयश्चैव सर्वे शिवपदार्चकाः । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां मङ्गलं प्रदिशन्तु मे

vālakhilyādayaścaiva sarve śivapadārcakāḥ | satkṛtya śivayorājñāṃ maṅgalaṃ pradiśantu me

वालखिल्य आदि सभी, शिव के चरणों के आराधक; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, मुझे मंगल प्रदान करें।

श्लोक 109 (shiva.vayaviya.66.109)

ब्रह्माथ देवदेवस्य मूर्तिर्भूमण्डलाधिपः । चतुःषष्टिगुणैश्वर्यो बुद्धितत्त्वे प्रतिष्ठितः

brahmātha devadevasya mūrtirbhūmaṇḍalādhipaḥ | catuḥṣaṣṭiguṇaiśvaryo buddhitattve pratiṣṭhitaḥ

ब्रह्मा, देवों के देव की मूर्ति, भूमण्डल के अधिपति; चौंसठ गुणों के ऐश्वर्य वाले, बुद्धि-तत्त्व में प्रतिष्ठित —

श्लोक 110 (shiva.vayaviya.66.110)

निर्गुणो गुणसङ्कीर्णस्तथैव गुणकेवलः । अविकारात्मको देवस्ततः साधारणः पुरः

nirguṇo guṇasaṅkīrṇastathaiva guṇakevalaḥ | avikārātmako devastataḥ sādhāraṇaḥ puraḥ

गुण-रहित भी, गुणों से युक्त भी, तथा उसी प्रकार केवल गुण-स्वरूप भी; विकार-रहित-स्वरूप देव, तत्पश्चात् साधारण, प्रथम —

श्लोक 111 (shiva.vayaviya.66.111)

असाधारणकर्मा च सृष्टिस्थितिलयक्रमात् । एवं त्रिधा चतुर्धा च विभक्तः पञ्चधा पुनः

asādhāraṇakarmā ca sṛṣṭisthitilayakramāt | evaṃ tridhā caturdhā ca vibhaktaḥ pañcadhā punaḥ

विशिष्ट कर्म करने वाला, सृष्टि-स्थिति-लय के क्रम से; इस प्रकार तीन प्रकार से, चार प्रकार से, तथा पुनः पाँच प्रकार से विभक्त —

श्लोक 112 (shiva.vayaviya.66.112)

चतुर्थावरणे शम्भोः पूजितश्च सहानुगैः । शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चने रतः

caturthāvaraṇe śambhoḥ pūjitaśca sahānugaiḥ | śivapriyaḥ śivāsaktaḥ śivapādārcane rataḥ

शम्भु के चतुर्थ आवरण में अपने अनुचरों सहित पूजित; शिव-प्रिय, शिव-आसक्त, शिव के चरणों की पूजा में रत —

श्लोक 113 (shiva.vayaviya.66.113)

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु मङ्गलम् । हिरण्यगर्भो लोकेशो विराट् कालश्च पूरुषः

satkṛtya śivayorājñāṃ sa me diśatu maṅgalam | hiraṇyagarbho lokeśo virāṭ kālaśca pūruṣaḥ

शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, वह मुझे मंगल प्रदान करे; हिरण्यगर्भ, लोकेश, विराट्, काल, तथा पुरुष —

श्लोक 114 (shiva.vayaviya.66.114)

सनत्कुमारः सनकः सनन्दश्च सनातनः । प्रजानां पतयश्चैव दक्षाद्या ब्रह्मसूनवः

sanatkumāraḥ sanakaḥ sanandaśca sanātanaḥ | prajānāṃ patayaścaiva dakṣādyā brahmasūnavaḥ

सनत्कुमार, सनक, तथा सनन्द, और सनातन; प्रजापति भी, दक्ष आदि ब्रह्मा के मानस-पुत्र —

श्लोक 115 (shiva.vayaviya.66.115)

एकादश सपत्नीका धर्मः सङ्कल्प एव च । शिवार्चनरताश्चैते शिवभक्तिपरायणाः

ekādaśa sapatnīkā dharmaḥ saṅkalpa eva ca | śivārcanaratāścaite śivabhaktiparāyaṇāḥ

ग्यारह, अपनी-अपनी पत्नियों सहित, तथा धर्म और संकल्प भी; ये सब शिव-अर्चन में रत, शिव-भक्ति में परायण —

श्लोक 116 (shiva.vayaviya.66.116)

शिवाज्ञावशगाः सर्वे दिशन्तु मम मङ्गलम् । चत्वारश्च तथा वेदाः सेतिहासपुराणकाः

śivājñāvaśagāḥ sarve diśantu mama maṅgalam | catvāraśca tathā vedāḥ setihāsapurāṇakāḥ

शिव की आज्ञा के वशवर्ती सभी, मुझे मंगल प्रदान करें; तथा चारों वेद, इतिहास और पुराणों सहित —

श्लोक 117 (shiva.vayaviya.66.117)

धर्मशास्त्राणि विद्याभिर्वैदिकीभिः समन्विताः । परस्पराविरुद्धार्थाः शिवप्रकृतिपादकाः

dharmaśāstrāṇi vidyābhirvaidikībhiḥ samanvitāḥ | parasparāviruddhārthāḥ śivaprakṛtipādakāḥ

वैदिक विद्याओं से युक्त धर्मशास्त्र; परस्पर अविरुद्ध अर्थ वाले, शिव-प्रकृति के आधार —

श्लोक 118 (shiva.vayaviya.66.118)

सत्कृत्य शिवयोराज्ञां मङ्गलं प्रदिशन्तु मे । अथ रुद्रो महादेवः शम्भोर्मूर्तिर्गरीयसी

satkṛtya śivayorājñāṃ maṅgalaṃ pradiśantu me | atha rudro mahādevaḥ śambhormūrtirgarīyasī

शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, मुझे मंगल प्रदान करें; तत्पश्चात् रुद्र, महादेव, शम्भु की अत्यंत गरिमामयी मूर्ति —

श्लोक 119 (shiva.vayaviya.66.119)

वाह्नेयमण्डलाधीशः पौरुषैश्वर्यवान् प्रभुः । शिवाभिमानसम्पन्नो निर्गुणस्त्रिगुणात्मकः

vāhneyamaṇḍalādhīśaḥ pauruṣaiśvaryavān prabhuḥ | śivābhimānasampanno nirguṇastriguṇātmakaḥ

आग्नेय-मण्डल का अधिपति, पौरुष ऐश्वर्य से युक्त प्रभु; शिव-अभिमान से सम्पन्न, गुण-रहित भी, तीन गुणों वाला भी —

श्लोक 120 (shiva.vayaviya.66.120)

केवलं सात्त्विकश्चापि राजसश्चैव तामसः । अविकाररतः पूर्वं ततस्तु समविक्रियः

kevalaṃ sāttvikaścāpi rājasaścaiva tāmasaḥ | avikārarataḥ pūrvaṃ tatastu samavikriyaḥ

केवल सात्त्विक भी, तथा राजस भी, तामस भी; पहले विकार-रहित रत, तत्पश्चात् साधारण विकार वाला —

श्लोक 121 (shiva.vayaviya.66.121)

असाधारणकर्मा च सृष्ट्यादिकरणात्पृथक् । ब्रह्मणोऽपि शिरश्छेत्ता जनकस्तस्य तत्सुतः

asādhāraṇakarmā ca sṛṣṭyādikaraṇātpṛthak | brahmaṇo'pi śiraśchettā janakastasya tatsutaḥ

विशिष्ट कर्म करने वाला, सृष्टि आदि के कारण से पृथक्; ब्रह्मा का भी शिर काटने वाला, उसका जनक, उसी का पुत्र —

श्लोक 122 (shiva.vayaviya.66.122)

जनकस्तनयश्चापि विष्णोरपि नियामकः । बोधकश्च तयोर्नित्यमनुग्रहकरः प्रभुः

janakastanayaścāpi viṣṇorapi niyāmakaḥ | bodhakaśca tayornityamanugrahakaraḥ prabhuḥ

जनक भी, तथा पुत्र भी, विष्णु का भी नियामक; उन दोनों का सदा बोधक, अनुग्रह करने वाला प्रभु —

श्लोक 123 (shiva.vayaviya.66.123)

अण्डस्यान्तर्बहिर्वर्ती रुद्रो लोकद्वयाधिपः । शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चने रतः

aṇḍasyāntarbahirvartī rudro lokadvayādhipaḥ | śivapriyaḥ śivāsaktaḥ śivapādārcane rataḥ

ब्रह्माण्ड के भीतर और बाहर दोनों में विद्यमान, दोनों लोकों का अधिपति रुद्र; शिव-प्रिय, शिव-आसक्त, शिव के चरणों की पूजा में रत —

श्लोक 124 (shiva.vayaviya.66.124)

शिवस्याज्ञां पुरस्कृत्य स मे दिशतु मङ्गलम् । तस्य ब्रह्म षडङ्गानि विद्येशानां तथाष्टकम्

śivasyājñāṃ puraskṛtya sa me diśatu maṅgalam | tasya brahma ṣaḍaṅgāni vidyeśānāṃ tathāṣṭakam

शिव की आज्ञा को आगे रखकर, वह मुझे मंगल प्रदान करे; उसके ब्रह्म-मन्त्र और छह अंग, तथा विद्येश्वरों के आठ भी —

श्लोक 125 (shiva.vayaviya.66.125)

चत्वारो मूर्तिभेदाश्च शिवपूर्वाः शिवार्चकाः । शिवो भवो हरश्चैव मृडश्चैव तथापरः । शिवस्याज्ञां पुरस्कृत्य मङ्गलं प्रदिशन्तु मे

catvāro mūrtibhedāśca śivapūrvāḥ śivārcakāḥ | śivo bhavo haraścaiva mṛḍaścaiva tathāparaḥ | śivasyājñāṃ puraskṛtya maṅgalaṃ pradiśantu me

चार मूर्ति-भेद भी, शिव-पूर्वक, शिव के आराधक; शिव, भव, तथा हर, और उसी प्रकार अन्य मृड — शिव की आज्ञा को आगे रखकर, मुझे मंगल प्रदान करें।

श्लोक 126 (shiva.vayaviya.66.126)

अथ विष्णुर्महेशस्य शिवस्यैव परा तनुः । वारितत्त्वाधिपः साक्षादव्यक्तपदसंस्थितः

atha viṣṇurmaheśasya śivasyaiva parā tanuḥ | vāritattvādhipaḥ sākṣādavyaktapadasaṃsthitaḥ

तत्पश्चात् विष्णु, महेश का, शिव का ही परम शरीर; जल-तत्त्व का अधिपति, साक्षात् अव्यक्त-पद में स्थित —

श्लोक 127 (shiva.vayaviya.66.127)

निर्गुणः सत्त्वबहुलस्तथैव गुणकेवलः । अविकाराभिमानी च त्रिसाधारणविक्रियः

nirguṇaḥ sattvabahulastathaiva guṇakevalaḥ | avikārābhimānī ca trisādhāraṇavikriyaḥ

गुण-रहित, सत्त्व-प्रधान, तथा उसी प्रकार केवल गुण-स्वरूप; विकार-रहित रत, तीनों गुणों के साधारण विकार वाला —

श्लोक 128 (shiva.vayaviya.66.128)

असाधारणकर्मा च सृष्ट्यादिकरणात्पृथक् । दक्षिणाङ्गभवेनापि स्पर्धमानः स्वयम्भुवा

asādhāraṇakarmā ca sṛṣṭyādikaraṇātpṛthak | dakṣiṇāṅgabhavenāpi spardhamānaḥ svayambhuvā

विशिष्ट कर्म करने वाला, सृष्टि आदि के कारण से पृथक्; दक्षिण अंग से उत्पन्न होकर भी स्वयंभू (ब्रह्मा) से स्पर्धा करने वाला —

श्लोक 129 (shiva.vayaviya.66.129)

आद्येन ब्रह्मणा साक्षात्सृष्टः स्रष्टा च तस्य तु । अण्डस्यान्तर्बहिर्वर्ती विष्णुर्लोकद्वयाधिपः

ādyena brahmaṇā sākṣātsṛṣṭaḥ sraṣṭā ca tasya tu | aṇḍasyāntarbahirvartī viṣṇurlokadvayādhipaḥ

आदि ब्रह्मा द्वारा साक्षात् सृष्ट, तथा स्वयं भी अन्यों का स्रष्टा; ब्रह्माण्ड के भीतर और बाहर विद्यमान विष्णु, दोनों लोकों का अधिपति —

श्लोक 130 (shiva.vayaviya.66.130)

असुरान्तकरश्चक्री शक्रस्यापि तथानुजः । प्रादुर्भूतश्च दशधा भृगुशापच्छलादिह

asurāntakaraścakrī śakrasyāpi tathānujaḥ | prādurbhūtaśca daśadhā bhṛguśāpacchalādiha

असुरों का अन्त करने वाला, चक्रधारी, इन्द्र का भी अनुज (कनिष्ठ भ्राता); भृगु के शाप के बहाने यहाँ दस रूपों में प्रकट हुआ —

श्लोक 131 (shiva.vayaviya.66.131)

भूभारनिग्रहार्थाय स्वेच्छयावातरत् क्षितौ । अप्रमेयबलो मायी मायया मोहयन् जगत्

bhūbhāranigrahārthāya svecchayāvātarat kṣitau | aprameyabalo māyī māyayā mohayan jagat

पृथ्वी का भार दूर करने के लिए अपनी इच्छा से भूमि पर अवतरित हुआ; अपरिमित बल वाला, मायावी, माया से जगत् को मोहित करने वाला —

श्लोक 132 (shiva.vayaviya.66.132)

मूर्तिं कृत्वा महाविष्णुं सदाशिष्णुमथापि वा । वैष्णवैः पूजितो नित्यं मूर्तित्रयमयासने

mūrtiṃ kṛtvā mahāviṣṇuṃ sadāśiṣṇumathāpi vā | vaiṣṇavaiḥ pūjito nityaṃ mūrtitrayamayāsane

महाविष्णु, अथवा सदाविष्णु की मूर्ति बनाकर; वैष्णवों द्वारा नित्य पूजित, तीन मूर्तियों वाले आसन पर —

श्लोक 133 (shiva.vayaviya.66.133)

शिवप्रियः शिवासक्तः शिवपादार्चने रतः । शिवस्याज्ञां पुरस्कृत्य स मे दिशतु मङ्गलम्

śivapriyaḥ śivāsaktaḥ śivapādārcane rataḥ | śivasyājñāṃ puraskṛtya sa me diśatu maṅgalam

शिव-प्रिय, शिव-आसक्त, शिव के चरणों की पूजा में रत; शिव की आज्ञा को आगे रखकर, वह मुझे मंगल प्रदान करे।

श्लोक 134 (shiva.vayaviya.66.134)

वासुदेवोऽनिरुद्धश्च प्रद्युम्नश्च ततः परः । सङ्कर्षणः समाख्याताश्चतस्रो मूर्तयो हरेः

vāsudevo'niruddhaśca pradyumnaśca tataḥ paraḥ | saṅkarṣaṇaḥ samākhyātāścatasro mūrtayo hareḥ

वासुदेव, अनिरुद्ध, तथा तत्पश्चात् प्रद्युम्न; संकर्षण — इस प्रकार हरि की चार मूर्तियाँ कही गई हैं।

श्लोक 135 (shiva.vayaviya.66.135)

मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नारसिंहोऽथ वामनः । रामत्रयं तथा कृष्णो विष्णुस्तुरगवक्त्रकः

matsyaḥ kūrmo varāhaśca nārasiṃho'tha vāmanaḥ | rāmatrayaṃ tathā kṛṣṇo viṣṇusturagavaktrakaḥ

मत्स्य, कूर्म, वराह, तथा नरसिंह, फिर वामन; तीन राम, तथा कृष्ण, विष्णु का अश्व-मुख रूप (हयग्रीव) भी —

श्लोक 136 (shiva.vayaviya.66.136)

चक्रं नारायणस्यास्त्रं पाञ्चजन्यं च शार्ङ्गकम् । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां मङ्गलं प्रदिशन्तु मे

cakraṃ nārāyaṇasyāstraṃ pāñcajanyaṃ ca śārṅgakam | satkṛtya śivayorājñāṃ maṅgalaṃ pradiśantu me

चक्र, नारायण का अस्त्र, पांचजन्य शंख, तथा शार्ङ्ग धनुष; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, मुझे मंगल प्रदान करें।

श्लोक 137 (shiva.vayaviya.66.137)

प्रभा सरस्वती गौरी लक्ष्मीश्च शिवभाविता । शिवयोः शासनादेता मङ्गलं प्रदिशन्तु मे

prabhā sarasvatī gaurī lakṣmīśca śivabhāvitā | śivayoḥ śāsanādetā maṅgalaṃ pradiśantu me

प्रभा, सरस्वती, गौरी, तथा लक्ष्मी, शिव-भाव से युक्त; शिव-शिवा के शासन से, ये मुझे मंगल प्रदान करें।

श्लोक 138 (shiva.vayaviya.66.138)

इन्द्रोऽग्निश्च यमश्चैव निरृतिर्वरुणस्तथा । वायुः सोमः कुबेरश्च तथेशानस्त्रिशूलधृक्

indro'gniśca yamaścaiva nirṛtirvaruṇastathā | vāyuḥ somaḥ kuberaśca tatheśānastriśūladhṛk

इन्द्र, अग्नि, तथा यम, निर्ऋति, वरुण; वायु, सोम, कुबेर, तथा त्रिशूलधारी ईशान —

श्लोक 139 (shiva.vayaviya.66.139)

सर्वे शिवार्चनरताः शिवसद्भावभाविताः । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां मङ्गलं प्रदिशन्तु मे

sarve śivārcanaratāḥ śivasadbhāvabhāvitāḥ | satkṛtya śivayorājñāṃ maṅgalaṃ pradiśantu me

सभी शिव-अर्चन में रत, शिव के सद्भाव से युक्त; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, मुझे मंगल प्रदान करें।

श्लोक 140 (shiva.vayaviya.66.140)

त्रिशूलमथ वज्रं च तथा परशुसायकौ । खड्गपाशाङ्कुशाश्चैव पिनाकश्चायुधोत्तमः

triśūlamatha vajraṃ ca tathā paraśusāyakau | khaḍgapāśāṅkuśāścaiva pinākaścāyudhottamaḥ

त्रिशूल, तत्पश्चात् वज्र, तथा परशु और बाण; खड्ग, पाश, अंकुश, तथा पिनाक — श्रेष्ठ आयुध —

श्लोक 141 (shiva.vayaviya.66.141)

दिव्यायुधानि देवस्य देव्याश्चैतानि नित्यशः । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां रक्षां कुर्वन्तु मे सदा

divyāyudhāni devasya devyāścaitāni nityaśaḥ | satkṛtya śivayorājñāṃ rakṣāṃ kurvantu me sadā

देव और देवी के ये नित्य दिव्य आयुध; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, सदा मेरी रक्षा करें।

श्लोक 142 (shiva.vayaviya.66.142)

वृषरूपधरो देवः सौरभेयो महाबलः । वडवाख्यानलस्पर्द्धी पञ्चगोमातृभिर्वृतः

vṛṣarūpadharo devaḥ saurabheyo mahābalaḥ | vaḍavākhyānalasparddhī pañcagomātṛbhirvṛtaḥ

वृष-रूपधारी देव, सुरभि-पुत्र, महाबली; वडवा नामक अग्नि से स्पर्धा करने वाला, पाँच गौ-माताओं से घिरा हुआ —

श्लोक 143 (shiva.vayaviya.66.143)

वाहनत्वमनुप्राप्तस्तपसा परमेशयोः । तयोराज्ञां पुरस्कृत्य स मे कामं प्रयच्छतु

vāhanatvamanuprāptastapasā parameśayoḥ | tayorājñāṃ puraskṛtya sa me kāmaṃ prayacchatu

तपस्या के द्वारा परमेश्वर-दम्पति के वाहन-पद को प्राप्त; उन दोनों की आज्ञा को आगे रखकर, वह मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करे।

श्लोक 144 (shiva.vayaviya.66.144)

नन्दा सुनन्दा सुरभिः सुशीला सुमनास्तथा । पञ्च गोमातरस्त्वेताः शिवलोके व्यवस्थिताः

nandā sunandā surabhiḥ suśīlā sumanāstathā | pañca gomātarastvetāḥ śivaloke vyavasthitāḥ

नन्दा, सुनन्दा, सुरभि, सुशीला, तथा सुमना; ये पाँचों गौ-माताएँ शिवलोक में स्थित हैं।

श्लोक 145 (shiva.vayaviya.66.145)

शिवभक्तिपरा नित्यं शिवार्चनपरायणाः । शिवयोः शासनादेव दिशन्तु मम वाञ्छितम्

śivabhaktiparā nityaṃ śivārcanaparāyaṇāḥ | śivayoḥ śāsanādeva diśantu mama vāñchitam

नित्य शिव-भक्ति में परायण, शिव-अर्चन में तत्पर; शिव-शिवा के शासन से ही, मेरी वांछित वस्तु प्रदान करें।

श्लोक 146 (shiva.vayaviya.66.146)

क्षेत्रपालो महातेजा नीलजीमूतसन्निभः । दंष्ट्राकरालवदनः स्फुरद्रक्ताधरोज्ज्वलः

kṣetrapālo mahātejā nīlajīmūtasannibhaḥ | daṃṣṭrākarālavadanaḥ sphuradraktādharojjvalaḥ

क्षेत्रपाल, महातेजस्वी, नीले मेघ के समान; दाढ़ों से विकराल मुख वाला, कँपकँपाते हुए लाल अधरों से उज्ज्वल —

श्लोक 147 (shiva.vayaviya.66.147)

रक्तोर्ध्वमूर्धजः श्रीमान् भृकुटीकुटिलेक्षणः । रक्तवृत्तत्रिनयनः शशिपन्नगभूषणः

raktordhvamūrdhajaḥ śrīmān bhṛkuṭīkuṭilekṣaṇaḥ | raktavṛttatrinayanaḥ śaśipannagabhūṣaṇaḥ

लाल, ऊर्ध्व-केश वाला, श्रीसम्पन्न, टेढ़ी भौंहों और नेत्रों वाला; लाल गोल तीन नेत्रों वाला, चन्द्र और सर्प के आभूषण वाला —

श्लोक 148 (shiva.vayaviya.66.148)

नग्नस्त्रिशूलपाशासिकपालोद्यतपाणिकः । भैरवो भैरवैः सिद्धैर्योगिनीभिश्च संवृतः

nagnastriśūlapāśāsikapālodyatapāṇikaḥ | bhairavo bhairavaiḥ siddhairyoginībhiśca saṃvṛtaḥ

नग्न, त्रिशूल, पाश, खड्ग, तथा कपाल हाथ में उठाए हुए; भैरव, भैरवों, सिद्धों, तथा योगिनियों से घिरा हुआ —

श्लोक 149 (shiva.vayaviya.66.149)

क्षेत्रे क्षेत्रे समासीनः स्थितो यो रक्षकः सताम् । शिवप्रणामपरमः शिवसद्भावभावितः

kṣetre kṣetre samāsīnaḥ sthito yo rakṣakaḥ satām | śivapraṇāmaparamaḥ śivasadbhāvabhāvitaḥ

प्रत्येक क्षेत्र (मन्दिर-भूमि) में विराजमान, सज्जनों का रक्षक; शिव को सर्वप्रथम प्रणाम करने वाला, शिव के सद्भाव से युक्त —

श्लोक 150 (shiva.vayaviya.66.150)

शिवाश्रितान् विशेषेण रक्षन् पुत्रानिवौरसान् । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां स मे दिशतु मङ्गलम्

śivāśritān viśeṣeṇa rakṣan putrānivaurasān | satkṛtya śivayorājñāṃ sa me diśatu maṅgalam

शिव के आश्रितों की विशेष रूप से रक्षा करने वाला, मानो अपने ही औरस पुत्रों की तरह; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, वह मुझे मंगल प्रदान करे।

श्लोक 151 (shiva.vayaviya.66.151)

तालजङ्घादयस्तस्य प्रथमावरणेऽर्चिताः । सत्कृत्य शिवयोराज्ञां चत्वारः समवन्तु माम्

tālajaṅghādayastasya prathamāvaraṇe'rcitāḥ | satkṛtya śivayorājñāṃ catvāraḥ samavantu mām

तालजंघ आदि उसके प्रथम आवरण में पूजित; शिव-शिवा की आज्ञा का सत्कार कर, वे चारों मेरी सहायता करें।

श्लोक 152 (shiva.vayaviya.66.152)

भैरवाद्याश्च ये चान्ये समन्तात्तस्य वेष्टिताः । तेऽपि मामनुगृह्णन्तु शिवशासनगौरवात्

bhairavādyāśca ye cānye samantāttasya veṣṭitāḥ | te'pi māmanugṛhṇantu śivaśāsanagauravāt

भैरव आदि जो अन्य भी, चारों ओर उससे घिरे हुए; वे भी शिव-शासन के गौरव से, मुझ पर अनुग्रह करें।

श्लोक 153 (shiva.vayaviya.66.153)

नारदाद्याश्च मुनयो दिव्या देवैश्च पूजिताः । साध्या नागाश्च ये देवा जनलोकनिवासिनः

nāradādyāśca munayo divyā devaiśca pūjitāḥ | sādhyā nāgāśca ye devā janalokanivāsinaḥ

नारद आदि मुनि, दिव्य, देवताओं द्वारा पूजित; साध्य, तथा नाग-देव, जनलोक के निवासी —

श्लोक 154 (shiva.vayaviya.66.154)

विनिवृत्ताधिकाराश्च महर्लोकनिवासिनः । सप्तर्षयस्तथान्ये वै वैमानिकगुणैः सह

vinivṛttādhikārāśca maharlokanivāsinaḥ | saptarṣayastathānye vai vaimānikaguṇaiḥ saha

अधिकार से निवृत्त, महर्लोक के निवासी; सप्तर्षि भी, तथा अन्य विमान-गुणों से युक्त देव —

श्लोक 155 (shiva.vayaviya.66.155)

सर्वे शिवार्चनरताः शिवाज्ञावशवर्तिनः । शिवयोराज्ञया मह्यं दिशन्तु समकाङ्क्षितम्

sarve śivārcanaratāḥ śivājñāvaśavartinaḥ | śivayorājñayā mahyaṃ diśantu samakāṅkṣitam

सभी शिव-अर्चन में रत, शिव की आज्ञा के वशवर्ती; शिव-शिवा की आज्ञा से मुझे समान रूप से इच्छित वस्तु प्रदान करें।

श्लोक 156 (shiva.vayaviya.66.156)

गन्धर्वाद्याः पिशाचान्ताश्चतस्रो देवयोनयः । सिद्धा विद्याधराद्याश्च येऽपि चान्ये नभश्चराः

gandharvādyāḥ piśācāntāścatasro devayonayaḥ | siddhā vidyādharādyāśca ye'pi cānye nabhaścarāḥ

गन्धर्व आदि से पिशाच पर्यन्त, चारों देव-योनियाँ; सिद्ध, तथा विद्याधर आदि, तथा जो अन्य आकाश-चारी भी हैं —

श्लोक 157 (shiva.vayaviya.66.157)

असुरा राक्षसाश्चैव पातालतलवासिनः । अनन्ताद्याश्च नागेन्द्रा वैनतेयादयो द्विजाः

asurā rākṣasāścaiva pātālatalavāsinaḥ | anantādyāśca nāgendrā vainateyādayo dvijāḥ

असुर, तथा राक्षस भी, पाताल-तल के निवासी; अनन्त आदि नागेन्द्र, वैनतेय (गरुड़) आदि पक्षी —

श्लोक 158 (shiva.vayaviya.66.158)

कूष्माण्डाः प्रेतवेताला ग्रहा भूतगणाः परे । डाकिन्यश्चापि योगिन्यः शाकिन्यश्चापि तादृशाः

kūṣmāṇḍāḥ pretavetālā grahā bhūtagaṇāḥ pare | ḍākinyaścāpi yoginyaḥ śākinyaścāpi tādṛśāḥ

कूष्माण्ड, प्रेत, वेताल, ग्रह, तथा अन्य भूत-गण; डाकिनियाँ भी, योगिनियाँ, तथा उसी प्रकार शाकिनियाँ भी —

श्लोक 159 (shiva.vayaviya.66.159)

क्षेत्रारामगृहादीनि तीर्थान्यायतनानि च । द्वीपाः समुद्रा नद्यश्च नदाश्चान्ये सरांसि च

kṣetrārāmagṛhādīni tīrthānyāyatanāni ca | dvīpāḥ samudrā nadyaśca nadāścānye sarāṃsi ca

क्षेत्र, उद्यान, गृह आदि, तीर्थ, तथा मन्दिर; द्वीप, समुद्र, नदियाँ, तथा अन्य नद, सरोवर भी —

श्लोक 160 (shiva.vayaviya.66.160)

गिरयश्च सुमेर्वाद्याः काननानि समन्ततः । पशवः पक्षिणो वृक्षाः कृमिकीटादयो मृगाः

girayaśca sumervādyāḥ kānanāni samantataḥ | paśavaḥ pakṣiṇo vṛkṣāḥ kṛmikīṭādayo mṛgāḥ

मेरु आदि पर्वत, तथा चारों ओर के वन; पशु, पक्षी, वृक्ष, कीट आदि, तथा मृग —

श्लोक 161 (shiva.vayaviya.66.161)

भुवनान्यपि सर्वाणि भुवनानामधीश्वराः । अण्डान्यावरणैः सार्धमासाश्च दश दिग्गजाः

bhuvanānyapi sarvāṇi bhuvanānāmadhīśvarāḥ | aṇḍānyāvaraṇaiḥ sārdhamāsāśca daśa diggajāḥ

समस्त भुवन भी, तथा भुवनों के अधीश्वर; ब्रह्माण्ड, आवरणों सहित, तथा दिशाओं के दस दिग्गज —

श्लोक 162 (shiva.vayaviya.66.162)

वर्णाः पदानि मन्त्राश्च तत्त्वान्यपि सहाधिपैः । ब्रह्माण्डधारका रुद्रा रुद्राश्चान्ये सशक्तिकाः

varṇāḥ padāni mantrāśca tattvānyapi sahādhipaiḥ | brahmāṇḍadhārakā rudrā rudrāścānye saśaktikāḥ

वर्ण, पद, मन्त्र, तथा तत्त्व भी, अपने-अपने अधिपतियों सहित; ब्रह्माण्ड को धारण करने वाले रुद्र, तथा शक्तियों सहित अन्य रुद्र —

श्लोक 163 (shiva.vayaviya.66.163)

यच्च किञ्चिज्जगत्यस्मिन्दृष्टं चानुमितं श्रुतम् । सर्वे कामं प्रयच्छन्तु शिवयोरेव शासनात्

yacca kiñcijjagatyasmindṛṣṭaṃ cānumitaṃ śrutam | sarve kāmaṃ prayacchantu śivayoreva śāsanāt

इस जगत् में जो कुछ भी दृष्ट, अनुमित, अथवा श्रुत है; वे सब, शिव-शिवा की ही आज्ञा से, मुझे इच्छित वस्तु प्रदान करें।

श्लोक 164 (shiva.vayaviya.66.164)

अथ विद्या परा शैवी पशुपाशविमोचिनी । पञ्चार्थसंज्ञिता दिव्या पशुविद्याबहिष्कृता

atha vidyā parā śaivī paśupāśavimocinī | pañcārthasaṃjñitā divyā paśuvidyābahiṣkṛtā

तत्पश्चात्, परा शैवी विद्या, पशु-पाश से मुक्त करने वाली; पंचार्थ नाम वाली, दिव्य, पशु-विद्या से परे —

श्लोक 165 (shiva.vayaviya.66.165)

शास्त्रं च शिवधर्माख्यं धर्माख्यं च तदुत्तरम् । शैवाख्यं शिवधर्माख्यं पुराणं श्रुतिसम्मितम्

śāstraṃ ca śivadharmākhyaṃ dharmākhyaṃ ca taduttaram | śaivākhyaṃ śivadharmākhyaṃ purāṇaṃ śrutisammitam

शिवधर्म नामक शास्त्र, तथा उसके बाद का धर्म-शास्त्र भी; शैव नामक, शिवधर्म नामक पुराण, श्रुति के समान —

श्लोक 166 (shiva.vayaviya.66.166)

शैवागमाश्च ये चान्ये कामिकाद्याश्चतुर्विधाः । शिवाभ्यामविशेषेण सत्कृत्येह समर्चिताः

śaivāgamāśca ye cānye kāmikādyāścaturvidhāḥ | śivābhyāmaviśeṣeṇa satkṛtyeha samarcitāḥ

तथा अन्य जो भी शैवागम हैं, कामिक आदि चार प्रकार के; शिव-शिवा द्वारा समान रूप से, यहाँ भलीभाँति पूजित —

श्लोक 167 (shiva.vayaviya.66.167)

ताभ्यामेव समाज्ञाता ममाभिप्रेतसिद्धये । कर्मेदमनुमन्यन्तां सफलं साध्वनुष्ठितम्

tābhyāmeva samājñātā mamābhipretasiddhaye | karmedamanumanyantāṃ saphalaṃ sādhvanuṣṭhitam

उन दोनों द्वारा ही सम्यक् रूप से आज्ञप्त, मेरे अभीष्ट की सिद्धि के लिए; इस सम्यक् अनुष्ठित, सफल कर्म को वे स्वीकार करें।

श्लोक 168 (shiva.vayaviya.66.168)

श्वेताद्या नकुलीशान्ताः सशिष्याश्चापि देशिकाः । तत्सन्ततीया गुरवो विशेषाद् गुरवो मम

śvetādyā nakulīśāntāḥ saśiṣyāścāpi deśikāḥ | tatsantatīyā guravo viśeṣād guravo mama

श्वेत आदि से नकुलीश पर्यन्त, शिष्यों सहित आचार्य; उनकी परम्परा के गुरु, विशेष रूप से मेरे गुरु —

श्लोक 169 (shiva.vayaviya.66.169)

शैवा माहेश्वराश्चैव ज्ञानकर्मपरायणाः । कर्मेदमनुमन्यन्तां सफलं साध्वनुष्ठितम्

śaivā māheśvarāścaiva jñānakarmaparāyaṇāḥ | karmedamanumanyantāṃ saphalaṃ sādhvanuṣṭhitam

शैव और माहेश्वर, ज्ञान और कर्म में परायण; इस सम्यक् अनुष्ठित, सफल कर्म को वे स्वीकार करें।

श्लोक 170 (shiva.vayaviya.66.170)

लौकिका ब्राह्मणाः सर्वे क्षत्रियाश्च विशः क्रमात् । वेदवेदाङ्गतत्त्वज्ञाः सर्वशास्त्रविशारदाः

laukikā brāhmaṇāḥ sarve kṣatriyāśca viśaḥ kramāt | vedavedāṅgatattvajñāḥ sarvaśāstraviśāradāḥ

लौकिक ब्राह्मण सभी, तथा क्षत्रिय और वैश्य क्रमशः; वेद-वेदांग के तत्त्वज्ञ, समस्त शास्त्रों में निपुण —

श्लोक 171 (shiva.vayaviya.66.171)

साङ्ख्या वैशेषिकाश्चैव यौगा नैयायिका नराः । सौरा ब्रह्मास्तथा रौद्रा वैष्णवाश्चापरे नराः

sāṅkhyā vaiśeṣikāścaiva yaugā naiyāyikā narāḥ | saurā brahmāstathā raudrā vaiṣṇavāścāpare narāḥ

सांख्य, तथा वैशेषिक, योग, तथा नैयायिक मनुष्य; सौर, ब्रह्म, तथा रौद्र, वैष्णव, तथा अन्य सम्प्रदायों के मनुष्य —

श्लोक 172 (shiva.vayaviya.66.172)

शिष्टाः सर्वे विशिष्टाश्च शिवशासनयन्त्रिताः । कर्मेदमनुमन्यन्तां ममाभिप्रेतसाधकम्

śiṣṭāḥ sarve viśiṣṭāśca śivaśāsanayantritāḥ | karmedamanumanyantāṃ mamābhipretasādhakam

सभी शिष्ट और विशिष्ट, शिव-शासन से नियंत्रित; इस, मेरे अभीष्ट को सिद्ध करने वाले कर्म को वे स्वीकार करें।

श्लोक 173 (shiva.vayaviya.66.173)

शैवाः सिद्धान्तमार्गस्थाः शैवाः पाशुपतास्तथा । शैवा महाव्रतधराः शैवाः कापालिकाः परे

śaivāḥ siddhāntamārgasthāḥ śaivāḥ pāśupatāstathā | śaivā mahāvratadharāḥ śaivāḥ kāpālikāḥ pare

शैव सिद्धान्त-मार्ग में स्थित, तथा शैव पाशुपत भी; शैव महाव्रतधारी, तथा अन्य शैव कापालिक —

श्लोक 174 (shiva.vayaviya.66.174)

शिवाज्ञापालकाः पूज्या ममापि शिवशासनात् । सर्वे ममानुगृह्णन्तु शंसन्तु सफलक्रियाम्

śivājñāpālakāḥ pūjyā mamāpi śivaśāsanāt | sarve mamānugṛhṇantu śaṃsantu saphalakriyām

शिव की आज्ञा के पालक, पूजनीय, मेरे लिए भी शिव-शासन से; वे सभी मुझ पर अनुग्रह करें, इस सफल क्रिया की प्रशंसा करें।

श्लोक 175 (shiva.vayaviya.66.175)

दक्षिणज्ञाननिष्ठाश्च दक्षिणोत्तरमार्गगाः । अविरोधेन वर्तन्तां मन्त्रं श्रेयोऽर्थिनो मम

dakṣiṇajñānaniṣṭhāśca dakṣiṇottaramārgagāḥ | avirodhena vartantāṃ mantraṃ śreyo'rthino mama

दक्षिण-ज्ञान में निष्ठा रखने वाले, तथा दक्षिण-उत्तर मार्ग में चलने वाले; बिना विरोध के रहें, मुझ कल्याण-चाहने वाले के इस मन्त्र में।

श्लोक 176 (shiva.vayaviya.66.176)

नास्तिकाश्च शठाश्चैव कृतघ्नाश्चैव तामसाः । पाषण्डाश्चातिपापाश्च वर्तन्तां दूरतो मम

nāstikāśca śaṭhāścaiva kṛtaghnāścaiva tāmasāḥ | pāṣaṇḍāścātipāpāśca vartantāṃ dūrato mama

नास्तिक, तथा धूर्त भी, कृतघ्न भी, तामसिक भी; पाखण्डी, तथा अत्यंत पापी — मुझसे दूर ही रहें।

श्लोक 177 (shiva.vayaviya.66.177)

बहुभिः किं स्तुतैरत्र येऽपि केऽपि चिदास्तिकाः । सर्वे मामनुगृह्णन्तु सन्तः शंसन्तु मङ्गलम्

bahubhiḥ kiṃ stutairatra ye'pi ke'pi cidāstikāḥ | sarve māmanugṛhṇantu santaḥ śaṃsantu maṅgalam

यहाँ अनेक स्तुतियों से क्या लाभ? जो भी कोई आस्तिक जन हैं; वे सभी मुझ पर अनुग्रह करें, सज्जन इस मंगल की प्रशंसा करें।

श्लोक 178 (shiva.vayaviya.66.178)

नमः शिवाय साम्बाय ससुतायादिहेतवे । पञ्चावरणरूपेण प्रपञ्चेनावृताय ते

namaḥ śivāya sāmbāya sasutāyādihetave | pañcāvaraṇarūpeṇa prapañcenāvṛtāya te

सांब (उमा-सहित), पुत्र (गणेश-कार्तिकेय) सहित, आदि-कारण शिव को नमस्कार! जो पंचावरण-रूपी विस्तार से आवृत हैं, आपको नमस्कार!

श्लोक 179 (shiva.vayaviya.66.179)

इत्युक्त्वा दण्डवद् भूमौ प्रणिपत्य शिवं शिवाम् । जपेत्पञ्चाक्षरीं विद्यामष्टोत्तरशतावराम्

ityuktvā daṇḍavad bhūmau praṇipatya śivaṃ śivām | japetpañcākṣarīṃ vidyāmaṣṭottaraśatāvarām

ऐसा कहकर, भूमि पर दण्ड के समान गिरकर शिव-शिवा को प्रणाम कर, एक सौ आठ बार पंचाक्षरी विद्या का जप करे।

श्लोक 180 (shiva.vayaviya.66.180)

तथैव शक्तिविद्यां च जपित्वा तत्समर्पणम् । कृत्वा तं क्षमयित्वेशं पूजाशेषं समापयेत्

tathaiva śaktividyāṃ ca japitvā tatsamarpaṇam | kṛtvā taṃ kṣamayitveśaṃ pūjāśeṣaṃ samāpayet

उसी प्रकार शक्ति-विद्या का भी जप कर, उसका अर्पण कर; ईश (शिव) को क्षमा-याचना कर, पूजा के शेष भाग को समाप्त करे।

श्लोक 181 (shiva.vayaviya.66.181)

एतत्पुण्यतमं स्तोत्रं शिवयोर्हृदयङ्गमम् । सर्वाभीष्टप्रदं साक्षाद्भुक्तिमुक्त्यैकसाधनम्

etatpuṇyatamaṃ stotraṃ śivayorhṛdayaṅgamam | sarvābhīṣṭapradaṃ sākṣādbhuktimuktyaikasādhanam

यह अत्यंत पुण्यमय स्तोत्र, शिव-शिवा के हृदय को प्रिय; समस्त इच्छाओं को पूर्ण करने वाला, साक्षात् भोग और मोक्ष दोनों का एकमात्र साधन।

श्लोक 182 (shiva.vayaviya.66.182)

य इदं कीर्तयेन्नित्यं शृणुयाद्वा समाहितः । स विधूयाशु पापानि शिवसायुज्यमाप्नुयात्

ya idaṃ kīrtayennityaṃ śṛṇuyādvā samāhitaḥ | sa vidhūyāśu pāpāni śivasāyujyamāpnuyāt

जो इसका नित्य कीर्तन करता है, अथवा एकाग्रचित्त होकर सुनता है, वह शीघ्र ही अपने पापों को धोकर शिव-सायुज्य को प्राप्त करता है।

श्लोक 183 (shiva.vayaviya.66.183)

गोघ्नश्चैव कृतघ्नश्च वीरहा भ्रूणहापि वा । शरणागतघाती च मित्रविश्रम्भघातकः

goghnaścaiva kṛtaghnaśca vīrahā bhrūṇahāpi vā | śaraṇāgataghātī ca mitraviśrambhaghātakaḥ

गौ-हत्यारा, तथा कृतघ्न, वीर-हत्यारा, या भ्रूण-हत्यारा भी; शरण में आए हुए का घातक, तथा मित्र के विश्वास का हनन करने वाला —

श्लोक 184 (shiva.vayaviya.66.184)

दुष्टपापसमाचारो मातृहा पितृहापि वा । स्तवेनानेन जप्तेन तत्तत्पापात् प्रमुच्यते

duṣṭapāpasamācāro mātṛhā pitṛhāpi vā | stavenānena japtena tattatpāpāt pramucyate

दुष्ट पापाचार वाला, माता या पिता का हत्यारा भी — इस स्तोत्र के जप से, वह उस-उस पाप से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 185 (shiva.vayaviya.66.185)

दुःस्वप्नादिमहानर्थसूचकेषु भयेषु च । यदि सङ्कीर्तयेदेतन्न ततोऽनर्थभाग्भवेत्

duḥsvapnādimahānarthasūcakeṣu bhayeṣu ca | yadi saṅkīrtayedetanna tato'narthabhāgbhavet

दुःस्वप्न आदि महान अनर्थ का संकेत देने वाले भयों में, यदि इसका संकीर्तन करे, तो उससे अनर्थ का भागी नहीं होता।

श्लोक 186 (shiva.vayaviya.66.186)

आयुरारोग्यमैश्वर्यं यच्चान्यदपि वाञ्छितम् । स्तोत्रस्यास्य जपे तिष्ठंस्तत्सर्वं लभते नरः

āyurārogyamaiśvaryaṃ yaccānyadapi vāñchitam | stotrasyāsya jape tiṣṭhaṃstatsarvaṃ labhate naraḥ

आयु, आरोग्य, ऐश्वर्य, तथा जो भी अन्य वांछित वस्तु हो; इस स्तोत्र के जप में स्थित रहने वाला मनुष्य वह सब प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 187 (shiva.vayaviya.66.187)

असम्पूज्य शिवस्तोत्रं जपात्फलमुदाहृतम् । सम्पूज्य च जपे तस्य फलं वक्तुं न शक्यते

asampūjya śivastotraṃ japātphalamudāhṛtam | sampūjya ca jape tasya phalaṃ vaktuṃ na śakyate

बिना देव को पूजे, केवल जप से जो फल कहा गया है; परन्तु पूजा करके, उसके जप का फल कहा नहीं जा सकता।

श्लोक 188 (shiva.vayaviya.66.188)

आस्तामियं फलावाप्तिरस्मिन् सङ्कीर्तिते सति । सार्धमम्बिकया देवः श्रुत्यैवं दिवि तिष्ठति

āstāmiyaṃ phalāvāptirasmin saṅkīrtite sati | sārdhamambikayā devaḥ śrutyaivaṃ divi tiṣṭhati

इस फल की प्राप्ति तो दूर रहे — जब यह संकीर्तित होता है, तो देव, अम्बिका सहित, इस श्रुति (वेद-वाणी) से ही आकाश में स्थित हो जाते हैं।

श्लोक 189 (shiva.vayaviya.66.189)

तस्मान्नभसि सम्पूज्य देवदेवं सहोमया । कृताञ्जलिपुटस्तिष्ठन् स्तोत्रमेतदुदीरयेत्

tasmānnabhasi sampūjya devadevaṃ sahomayā | kṛtāñjalipuṭastiṣṭhan stotrametadudīrayet

इसलिए, आकाश में उमा सहित देवों के देव का सम्यक् पूजन कर, हाथ जोड़े हुए खड़े होकर, इस स्तोत्र का उच्चारण करे।

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