वायवीय संहिता · अध्याय 67
ऐहिक सिद्धि-कर्म-वर्णन
श्लोक 1 (shiva.vayaviya.67.1)
उपमन्युरुवाच । एतत्ते कथितं कृष्ण कर्मेहामुत्र सिद्धिदम् । क्रियातपोजपध्यानसमुच्चयमयं परम्
upamanyuruvāca | etatte kathitaṃ kṛṣṇa karmehāmutra siddhidam | kriyātapojapadhyānasamuccayamayaṃ param
उपमन्यु ने कहा — हे कृष्ण! मैंने तुम्हें यह कहा, जो इस लोक और परलोक दोनों में सिद्धि देने वाला, क्रिया-तप-जप-ध्यान के समुच्चय-रूप परम कर्म है।
श्लोक 2 (shiva.vayaviya.67.2)
अथ वक्ष्यामि शैवानामिहैव फलदं नृणाम् । पूजाहोमजपध्यानतपोदानमयं महत्
atha vakṣyāmi śaivānāmihaiva phaladaṃ nṛṇām | pūjāhomajapadhyānatapodānamayaṃ mahat
अब मैं शैवों के लिए इसी लोक में फलदायी, पूजा-होम-जप-ध्यान-तप-दान से युक्त महान कर्म का वर्णन करूँगा।
श्लोक 3 (shiva.vayaviya.67.3)
तत्र संसाधयेत्पूर्वं मन्त्रं मन्त्रार्थवित्तमः । दृष्टसिद्धिकरं कर्म नान्यथा फलदं यतः
tatra saṃsādhayetpūrvaṃ mantraṃ mantrārthavittamaḥ | dṛṣṭasiddhikaraṃ karma nānyathā phaladaṃ yataḥ
वहाँ मन्त्र के अर्थ का सर्वश्रेष्ठ ज्ञाता, पहले मन्त्र को सिद्ध करे; दृष्ट सिद्धि देने वाला ही कर्म करे, क्योंकि अन्यथा वह फलदायी नहीं होता।
श्लोक 4 (shiva.vayaviya.67.4)
सिद्धमन्त्रोऽप्यदृष्टेन प्रबलेन तु केनचित् । प्रतिबन्धफलं कर्म न कुर्यात्सहसा बुधः
siddhamantro'pyadṛṣṭena prabalena tu kenacit | pratibandhaphalaṃ karma na kuryātsahasā budhaḥ
मन्त्र सिद्ध होने पर भी, यदि किसी प्रबल अदृष्ट कारण से बाधा हो, तो बुद्धिमान व्यक्ति एकाएक बाधा-युक्त फल वाला कर्म न करे।
श्लोक 5 (shiva.vayaviya.67.5)
तस्य तु प्रतिबन्धस्य कर्तुं शक्येह निष्कृतिः । परीक्ष्य शकुनाद्यैस्तदादौ निष्कृतिमाचरेत्
tasya tu pratibandhasya kartuṃ śakyeha niṣkṛtiḥ | parīkṣya śakunādyaistadādau niṣkṛtimācaret
उस बाधा का निवारण यहाँ करना सम्भव है; शकुन आदि से परीक्षा कर, पहले उसका निवारण करे।
श्लोक 6 (shiva.vayaviya.67.6)
योऽन्यथा कुरुते मोहात्कर्मैहिकफलं नरः । न तेन फलभाक्स स्यात्प्राप्नुयाच्चोपहास्यताम्
yo'nyathā kurute mohātkarmaihikaphalaṃ naraḥ | na tena phalabhāksa syātprāpnuyāccopahāsyatām
जो मूढ़तावश अन्यथा विधि से इस लोक में फल देने वाला कर्म करता है, वह उसके फल का भागी नहीं बनता, और उपहास का पात्र बनता है।
श्लोक 7 (shiva.vayaviya.67.7)
अविस्रब्धो न कुर्वीत कर्म दृष्टफलं क्वचित् । स खल्वश्रद्धधानः स्यान्नाश्रद्धः फलमृच्छति
avisrabdho na kurvīta karma dṛṣṭaphalaṃ kvacit | sa khalvaśraddhadhānaḥ syānnāśraddhaḥ phalamṛcchati
अविश्वस्त मनुष्य कभी भी दृष्ट-फल वाला कर्म न करे; वह वास्तव में अश्रद्धावान होगा, और अश्रद्धावान फल प्राप्त नहीं करता।
श्लोक 8 (shiva.vayaviya.67.8)
नापराधोऽस्ति देवस्य कर्मण्यपि तु निष्फले । यथोक्तकारिणां पुंसामिहैव फलदर्शनात्
nāparādho'sti devasya karmaṇyapi tu niṣphale | yathoktakāriṇāṃ puṃsāmihaiva phaladarśanāt
देव का कोई अपराध नहीं है, यदि कर्म निष्फल हो जाए; क्योंकि यथोक्त विधि से कर्म करने वाले पुरुषों को इसी लोक में फल दिखाई देता है।
श्लोक 9 (shiva.vayaviya.67.9)
साधकः सिद्धमन्त्रश्च निरस्तप्रतिबन्धकः । विश्वस्तः श्रद्धधानश्च कुर्वन्नाप्नोति तत्फलम्
sādhakaḥ siddhamantraśca nirastapratibandhakaḥ | viśvastaḥ śraddhadhānaśca kurvannāpnoti tatphalam
साधक, सिद्ध-मन्त्र वाला, बाधाओं से रहित; विश्वासयुक्त और श्रद्धावान होकर कर्म करता हुआ, उसका फल अवश्य प्राप्त करता है।
श्लोक 10 (shiva.vayaviya.67.10)
अथवा तत्फलावाप्त्यै ब्रह्मचर्यरतो भवेत् । रात्रौ हविष्यमश्नीयात्पायसं वा फलानि वा
athavā tatphalāvāptyai brahmacaryarato bhavet | rātrau haviṣyamaśnīyātpāyasaṃ vā phalāni vā
अथवा, उस फल की प्राप्ति के लिए ब्रह्मचर्य में रत रहे; रात्रि में हविष्य अन्न खाए, अथवा खीर, अथवा फल।
श्लोक 11 (shiva.vayaviya.67.11)
हिंसादि यन्निषिद्धं स्यान्न कुर्यान्मनसापि तत् । सदा भस्मानुलिप्ताङ्गः सुवेषश्च शुचिर्भवेत्
hiṃsādi yanniṣiddhaṃ syānna kuryānmanasāpi tat | sadā bhasmānuliptāṅgaḥ suveṣaśca śucirbhavet
जो कुछ भी हिंसा आदि निषिद्ध हो, उसे मन से भी न करे; सदा भस्म से अंगों को लेपित रखे, सुसज्जित और शुद्ध रहे।
श्लोक 12 (shiva.vayaviya.67.12)
इत्थमाचारवान्भूत्वा स्वानुकूले शुभेऽहनि । पूर्वोक्तलक्षणे देशे पुष्पदामाद्यलङ्कृते
itthamācāravānbhūtvā svānukūle śubhe'hani | pūrvoktalakṣaṇe deśe puṣpadāmādyalaṅkṛte
इस प्रकार आचारवान होकर, अपने अनुकूल शुभ दिन में; पूर्वोक्त लक्षणों वाले स्थान में, पुष्प-माला आदि से अलंकृत —
श्लोक 13 (shiva.vayaviya.67.13)
आलिप्य शकृता भूमिं हस्तमानावरां यथा । विलिखेत्कमले भद्रे दीप्यमानं स्वतेजसा
ālipya śakṛtā bhūmiṃ hastamānāvarāṃ yathā | vilikhetkamale bhadre dīpyamānaṃ svatejasā
गोबर से भूमि को लीपकर, एक हाथ से कुछ कम मापी हुई; सुन्दर कमल पर, जो अपने ही तेज से प्रकाशमान हो, उसे अंकित करे।
श्लोक 14 (shiva.vayaviya.67.14)
तप्तजाम्बूनदमयमष्टपत्रं सकेसरम् । मध्ये कर्णिकया युक्तं सर्वरत्नैरलङ्कृतम्
taptajāmbūnadamayamaṣṭapatraṃ sakesaram | madhye karṇikayā yuktaṃ sarvaratnairalaṅkṛtam
तपाए हुए शुद्ध स्वर्ण से बना, आठ पंखुड़ियों वाला, केसर सहित; मध्य में कर्णिका से युक्त, सभी रत्नों से अलंकृत —
श्लोक 15 (shiva.vayaviya.67.15)
स्वाकारसदृशेनैव नालेन च समन्वितम् । तादृशे स्वर्णनिर्माणे कन्दे सम्यग्विधानतः
svākārasadṛśenaiva nālena ca samanvitam | tādṛśe svarṇanirmāṇe kande samyagvidhānataḥ
अपने ही आकार के अनुरूप नाल से युक्त; उस प्रकार के स्वर्ण-निर्माण में, कन्द (जड़-भाग) में, भलीभाँति विधिपूर्वक —
श्लोक 16 (shiva.vayaviya.67.16)
तत्राणिमादिकं सर्वं सङ्कल्प्य मनसा पुनः । रत्नजं वाथ सौवर्णं स्फटिकं वा सलक्षणम् । लिङ्गं सवेदिकं चैव स्थापयित्वा विधानतः
tatrāṇimādikaṃ sarvaṃ saṅkalpya manasā punaḥ | ratnajaṃ vātha sauvarṇaṃ sphaṭikaṃ vā salakṣaṇam | liṅgaṃ savedikaṃ caiva sthāpayitvā vidhānataḥ
वहाँ अणिमा आदि सभी सिद्धियों का पुनः मन से संकल्प कर; रत्न से बना, अथवा स्वर्ण से बना, अथवा लक्षणयुक्त स्फटिक से बना लिंग वेदी सहित विधिपूर्वक स्थापित करे।
श्लोक 17 (shiva.vayaviya.67.17)
तत्रावाह्य यजेद्देवं साम्बं सगणमव्ययम् । तत्र माहेश्वरी कल्प्या मूर्तिर्मूर्तिमतः प्रभोः
tatrāvāhya yajeddevaṃ sāmbaṃ sagaṇamavyayam | tatra māheśvarī kalpyā mūrtirmūrtimataḥ prabhoḥ
वहाँ देव का आवाहन कर, सांब (उमा-सहित), गणों सहित, अविनाशी शिव का पूजन करे; वहाँ प्रभु की मूर्तिमान शक्ति के रूप में माहेश्वरी की कल्पना करे।
श्लोक 18 (shiva.vayaviya.67.18)
चतुर्भुजा चतुर्वक्त्रा सर्वाभरणभूषिता । शार्दूलचर्मवसना किञ्चिद्विहसितानना
caturbhujā caturvaktrā sarvābharaṇabhūṣitā | śārdūlacarmavasanā kiñcidvihasitānanā
चार भुजाओं वाली, चार मुखों वाली, सर्व-आभूषणों से विभूषित; व्याघ्र-चर्म वस्त्र धारण किए, कुछ हँसते हुए मुख वाली —
श्लोक 19 (shiva.vayaviya.67.19)
वरदाभयहस्ता च मृगटङ्कधरा तथा । अथवाष्टभुजा चिन्त्या चिन्तकस्य यथारुचि
varadābhayahastā ca mṛgaṭaṅkadharā tathā | athavāṣṭabhujā cintyā cintakasya yathāruci
वरद और अभय हस्त-मुद्रा वाली, तथा मृग और टंक धारण करने वाली; अथवा आठ भुजाओं वाली भी, ध्यान करने वाले की रुचि के अनुसार कल्पना योग्य —
श्लोक 20 (shiva.vayaviya.67.20)
तदा त्रिशूलपरशुखड्गवज्राणि दक्षिणे । वामे पाशाङ्कुशौ तद्वत्खेटं नागं च बिभ्रती
tadā triśūlaparaśukhaḍgavajrāṇi dakṣiṇe | vāme pāśāṅkuśau tadvatkheṭaṃ nāgaṃ ca bibhratī
तब दाहिनी ओर त्रिशूल, परशु, खड्ग, वज्र; बायीं ओर पाश, अंकुश, तथा उसी प्रकार ढाल और सर्प धारण किए हुए —
श्लोक 21 (shiva.vayaviya.67.21)
बालार्कसदृशप्रख्या प्रतिवक्त्रं त्रिलोचना । तस्याः पूर्वमुखं सौम्यं स्वाकारसदृशप्रभम्
bālārkasadṛśaprakhyā prativaktraṃ trilocanā | tasyāḥ pūrvamukhaṃ saumyaṃ svākārasadṛśaprabham
बाल-सूर्य के समान कान्ति वाली, प्रत्येक मुख में तीन नेत्रों वाली; उसका पूर्व मुख सौम्य, अपने ही आकार के अनुरूप कान्ति वाला —
श्लोक 22 (shiva.vayaviya.67.22)
दक्षिणं नीलजीमूतसदृशं घोरदर्शनम् । उत्तरं विद्रुमप्रख्यं नीलालकविभूषितम्
dakṣiṇaṃ nīlajīmūtasadṛśaṃ ghoradarśanam | uttaraṃ vidrumaprakhyaṃ nīlālakavibhūṣitam
दक्षिण मुख नीले मेघ के समान, भयानक दर्शन वाला; उत्तर मुख मूँगे के समान, नीली अलकों से विभूषित —
श्लोक 23 (shiva.vayaviya.67.23)
पश्चिमं पूर्णचन्द्राभं सौम्यमिन्दुकलाधरम् । तदङ्कमण्डलारूढा शक्तिर्माहेश्वरी परा
paścimaṃ pūrṇacandrābhaṃ saumyamindukalādharam | tadaṅkamaṇḍalārūḍhā śaktirmāheśvarī parā
पश्चिम मुख पूर्ण चन्द्रमा के समान, सौम्य, चन्द्र-कला धारण किए हुए; उसके गोद-मण्डल पर आरूढ़ परम शक्ति माहेश्वरी —
श्लोक 24 (shiva.vayaviya.67.24)
महालक्ष्मीरिति ख्याता श्यामा सर्वमनोहरा । मूर्तिं कृत्वैवमाकारां सकलीकृत्य च क्रमात्
mahālakṣmīriti khyātā śyāmā sarvamanoharā | mūrtiṃ kṛtvaivamākārāṃ sakalīkṛtya ca kramāt
महालक्ष्मी नाम से विख्यात, श्याम वर्ण वाली, सर्व-मनोहर; इस प्रकार के आकार वाली मूर्ति बनाकर, क्रमशः सकलीकरण (अंग-न्यास) कर —
श्लोक 25 (shiva.vayaviya.67.25)
मूर्तिमन्तमथावाह्य यजेत्परमकारणम् । स्नानार्थे कल्पयेत्तत्र पञ्चगव्यं तु कापिलम्
mūrtimantamathāvāhya yajetparamakāraṇam | snānārthe kalpayettatra pañcagavyaṃ tu kāpilam
मूर्तिमान देव का आवाहन कर, परम कारण का पूजन करे; वहाँ स्नान के लिए कपिला गाय का पंचगव्य तैयार करे।
श्लोक 26 (shiva.vayaviya.67.26)
पञ्चामृतं च पूर्णानि बीजानि च विशेषतः । पुरस्तान्मण्डलं कृत्वा रत्नचूर्णाद्यलङ्कृतम्
pañcāmṛtaṃ ca pūrṇāni bījāni ca viśeṣataḥ | purastānmaṇḍalaṃ kṛtvā ratnacūrṇādyalaṅkṛtam
पंचामृत, तथा पूर्ण अन्न के बीज विशेष रूप से; सामने मण्डल बनाकर, रत्न-चूर्ण आदि से अलंकृत —
श्लोक 27 (shiva.vayaviya.67.27)
कर्णिकायां प्रविन्यस्येदीशानकलशं पुनः । सद्यादिकलशान्पश्चात्परितस्तस्य कल्पयेत्
karṇikāyāṃ pravinyasyedīśānakalaśaṃ punaḥ | sadyādikalaśānpaścātparitastasya kalpayet
कर्णिका में ईशान-कलश को रखकर पुनः; सद्य आदि कलशों को तत्पश्चात् उसके चारों ओर स्थापित करे।
श्लोक 28 (shiva.vayaviya.67.28)
ततो विद्येशकलशानष्टौ पूर्वादिवत्क्रमात् । तीर्थाम्बुपूरितान्कृत्वा सूत्रेणावेष्ट्य पूर्ववत्
tato vidyeśakalaśānaṣṭau pūrvādivatkramāt | tīrthāmbupūritānkṛtvā sūtreṇāveṣṭya pūrvavat
तत्पश्चात् आठों विद्येश-कलशों को, पूर्व आदि क्रम से यथाक्रम; तीर्थ-जल से भरकर, पूर्ववत् सूत्र से लपेटकर —
श्लोक 29 (shiva.vayaviya.67.29)
पुण्यद्रव्याणि निक्षिप्य समन्त्रं सविधानकम् । दुकूलाद्येन वस्त्रेण समाच्छाद्य समन्ततः
puṇyadravyāṇi nikṣipya samantraṃ savidhānakam | dukūlādyena vastreṇa samācchādya samantataḥ
पवित्र द्रव्यों को, मन्त्र और विधि सहित, उनमें डालकर; तत्पश्चात् उन्हें दुकूल आदि वस्त्र से चारों ओर ढककर —
श्लोक 30 (shiva.vayaviya.67.30)
सर्वत्र मन्त्रं विन्यस्य तत्तन्मन्त्रपुरः सरम् । स्नानकाले तु सम्प्राप्ते सर्वमङ्गलनिःस्वनैः
sarvatra mantraṃ vinyasya tattanmantrapuraḥ saram | snānakāle tu samprāpte sarvamaṅgalaniḥsvanaiḥ
सर्वत्र मन्त्र स्थापित कर, उस-उस मन्त्र को आगे रखकर; स्नान का समय आने पर, समस्त मंगल-ध्वनियों के साथ —
श्लोक 31 (shiva.vayaviya.67.31)
पञ्चगव्यादिभिश्चैव स्नापयेत्परमेश्वरम् । ततः कुशोदकाद्यानि स्वर्णरत्नोदकान्यपि
pañcagavyādibhiścaiva snāpayetparameśvaram | tataḥ kuśodakādyāni svarṇaratnodakānyapi
पंचगव्य आदि से परमेश्वर को स्नान कराए; तत्पश्चात् कुश-जल आदि, स्वर्ण-रत्न-जल भी —
श्लोक 32 (shiva.vayaviya.67.32)
गन्धपुष्पादिसिद्धानि मन्त्रसिद्धानि च क्रमात् । उद्धृत्योद्धृत्य मन्त्रेण तैस्तैः स्नाप्य महेश्वरम्
gandhapuṣpādisiddhāni mantrasiddhāni ca kramāt | uddhṛtyoddhṛtya mantreṇa taistaiḥ snāpya maheśvaram
गन्ध-पुष्प आदि से सिद्ध, तथा मन्त्र से सिद्ध जल भी, क्रमशः; एक-एक कर उठाते हुए, मन्त्र से उन-उन जलों से महेश्वर को स्नान कराए।
श्लोक 33 (shiva.vayaviya.67.33)
गन्धपुष्पादिदीपांश्च पूजाकर्म समाचरेत् । पलावरः स्यादालेप एकादशपलोत्तरः
gandhapuṣpādidīpāṃśca pūjākarma samācaret | palāvaraḥ syādālepa ekādaśapalottaraḥ
गन्ध, पुष्प आदि, तथा दीपों से पूजा-कर्म सम्पन्न करे; लेप एक पल से लेकर ग्यारह पल तक हो सकता है।
श्लोक 34 (shiva.vayaviya.67.34)
सुवर्णरत्नपुष्पाणि शुभानि सुरभीणि च । नीलोत्पलाद्युत्पलानि बिल्वपत्राण्यनेकशः
suvarṇaratnapuṣpāṇi śubhāni surabhīṇi ca | nīlotpalādyutpalāni bilvapatrāṇyanekaśaḥ
स्वर्ण-रत्न जैसे पुष्प, शुभ और सुगन्धित; नील-कमल आदि उत्पल, बिल्व-पत्र अनेक प्रकार के —
श्लोक 35 (shiva.vayaviya.67.35)
कमलानि च रक्तानि श्वेतान्यपि च शम्भवे । कृष्णागुरूद्भवो धूपः सकर्पूराज्यगुग्गुलः
kamalāni ca raktāni śvetānyapi ca śambhave | kṛṣṇāgurūdbhavo dhūpaḥ sakarpūrājyaguggulaḥ
लाल कमल, तथा श्वेत कमल भी शम्भु के लिए; कृष्णागुरु से उत्पन्न धूप, कर्पूर-घृत-गुग्गुल सहित —
श्लोक 36 (shiva.vayaviya.67.36)
कपिलाघृतसंसिद्धा दीपाः कर्पूरवर्तिजाः । पञ्च ब्रह्मषडङ्गानि पूज्यान्यावरणानि च
kapilāghṛtasaṃsiddhā dīpāḥ karpūravartijāḥ | pañca brahmaṣaḍaṅgāni pūjyānyāvaraṇāni ca
कपिला गाय के घी से सिद्ध किए गए, कर्पूर की बत्ती से बने दीप; ब्रह्म-मन्त्र और छहों अंग-मन्त्र, तथा आवरण-देवता भी पूज्य हैं।
श्लोक 37 (shiva.vayaviya.67.37)
नैवेद्यः पयसा सिद्धः स गुडाज्यो महाचरुः । पाटलोत्पलपद्माद्यैः पानीयं च सुगन्धितम्
naivedyaḥ payasā siddhaḥ sa guḍājyo mahācaruḥ | pāṭalotpalapadmādyaiḥ pānīyaṃ ca sugandhitam
दूध से सिद्ध किया गया नैवेद्य, गुड़-घी सहित महाचरु; पाटला, उत्पल, कमल आदि से सुगन्धित जल —
श्लोक 38 (shiva.vayaviya.67.38)
पञ्चसौगन्धिकोपेतं ताम्बूलं च सुसंस्कृतम् । सुवर्णरत्नसिद्धानि भूषणानि विशेषतः
pañcasaugandhikopetaṃ tāmbūlaṃ ca susaṃskṛtam | suvarṇaratnasiddhāni bhūṣaṇāni viśeṣataḥ
पाँच सुगन्धित द्रव्यों से युक्त, भलीभाँति तैयार किया गया तांबूल; विशेष रूप से स्वर्ण-रत्नों से बने आभूषण —
श्लोक 39 (shiva.vayaviya.67.39)
वासांसि च विचित्राणि सूक्ष्माणि च नवानि च । दर्शनीयानि देयानि गानवाद्यादिभिः सह
vāsāṃsi ca vicitrāṇi sūkṣmāṇi ca navāni ca | darśanīyāni deyāni gānavādyādibhiḥ saha
विचित्र, सूक्ष्म, तथा नए वस्त्र; दर्शनीय वस्तुएँ, गीत-वाद्य आदि के साथ अर्पित करने योग्य।
श्लोक 40 (shiva.vayaviya.67.40)
जपश्च मूलमन्त्रस्य लक्षः परमसङ्ख्यया । एकावरा त्र्युत्तरा च पूजा फलवशादिह
japaśca mūlamantrasya lakṣaḥ paramasaṅkhyayā | ekāvarā tryuttarā ca pūjā phalavaśādiha
मूल-मन्त्र का जप, परम संख्या में एक लाख; एक कम, तीन अधिक — फल के अनुसार यहाँ पूजा की संख्या होती है।
श्लोक 41 (shiva.vayaviya.67.41)
दशसङ्ख्यावरो होमः प्रतिद्रव्यं शतोत्तरः । घोररूपश्शिवश्चिन्त्यो मारणोच्चाटनादिषु
daśasaṅkhyāvaro homaḥ pratidravyaṃ śatottaraḥ | ghorarūpaśśivaścintyo māraṇoccāṭanādiṣu
दस की संख्या न्यूनतम होम है, प्रत्येक द्रव्य के लिए सौ अधिक; मारण-उच्चाटन आदि में शिव का घोर रूप ध्यान करने योग्य है।
श्लोक 42 (shiva.vayaviya.67.42)
शिवलिङ्गे शिवाग्नौ च ह्यन्यासु प्रतिमासु च । चिन्त्यः सौम्यतनुः शम्भुः कार्ये शान्तिकपौष्टिके
śivaliṅge śivāgnau ca hyanyāsu pratimāsu ca | cintyaḥ saumyatanuḥ śambhuḥ kārye śāntikapauṣṭike
शिव-लिंग में, शिव-अग्नि में, तथा अन्य प्रतिमाओं में भी; शान्ति और पुष्टि के कार्य में शम्भु का सौम्य शरीर ध्यान करने योग्य है।
श्लोक 43 (shiva.vayaviya.67.43)
आयसौ स्रुक्स्रुवौ कार्यौ मारणादिसु कर्मसु । तदन्यत्र तु सौवर्णौ शान्तिकाद्येषु कृत्स्नशः
āyasau sruksruvau kāryau māraṇādisu karmasu | tadanyatra tu sauvarṇau śāntikādyeṣu kṛtsnaśaḥ
मारण आदि कर्मों में लौह के स्रुक्-स्रुव प्रयुक्त होने चाहिए; उनके अतिरिक्त, शान्ति आदि कर्मों में सर्वत्र स्वर्ण के स्रुक्-स्रुव प्रयुक्त होने चाहिए।
श्लोक 44 (shiva.vayaviya.67.44)
दूर्वया घृतगोक्षीरमिश्रया मधुना तथा । चरुणा सघृतेनैव केवलं पयसापि वा
dūrvayā ghṛtagokṣīramiśrayā madhunā tathā | caruṇā saghṛtenaiva kevalaṃ payasāpi vā
दूर्वा को घी-गाय के दूध से मिश्रित कर, तथा मधु से भी; चरु से, घी सहित ही, अथवा केवल दूध से भी —
श्लोक 45 (shiva.vayaviya.67.45)
जुहुयान्मृत्युविजये तिलै रोगोपशान्तये । घृतेन पयसा चैव कमलैर्वाथ केवलैः
juhuyānmṛtyuvijaye tilai rogopaśāntaye | ghṛtena payasā caiva kamalairvātha kevalaiḥ
मृत्यु पर विजय के लिए हवन करे, रोगों की शान्ति के लिए तिलों से; घी से, तथा दूध से भी, अथवा केवल कमलों से भी —
श्लोक 46 (shiva.vayaviya.67.46)
समृद्धिकामो जुहुयान्महादारिद्र्यशान्तये । जातीपुष्पेण वश्यार्थी जुहुयात्सघृतेन तु
samṛddhikāmo juhuyānmahādāridryaśāntaye | jātīpuṣpeṇa vaśyārthī juhuyātsaghṛtena tu
समृद्धि चाहने वाला हवन करे, महान दरिद्रता की शान्ति के लिए; जाति-पुष्प (चमेली) से, वश्य चाहने वाला घी सहित हवन करे।
श्लोक 47 (shiva.vayaviya.67.47)
घृतेन करवीरैश्च कुर्यादाकर्षणं द्विजः । तैलेनोच्चाटनं कुर्यात्स्तम्भनं मधुना पुनः
ghṛtena karavīraiśca kuryādākarṣaṇaṃ dvijaḥ | tailenoccāṭanaṃ kuryātstambhanaṃ madhunā punaḥ
घी और करवीर (कनेर) के फूलों से द्विज आकर्षण करे; तेल से उच्चाटन करे, तथा पुनः मधु से स्तम्भन करे।
श्लोक 48 (shiva.vayaviya.67.48)
स्तम्भनं सर्षपेणापि लशुनेन तु पातनम् । ताडनं रुधिरेण स्यात्खरस्योष्ट्रस्य चोभयोः
stambhanaṃ sarṣapeṇāpi laśunena tu pātanam | tāḍanaṃ rudhireṇa syātkharasyoṣṭrasya cobhayoḥ
सरसों से भी स्तम्भन हो सकता है, लहसुन से पतन (गिराना); गधे और ऊँट दोनों के रक्त से ताड़न (प्रहार) होता है।
श्लोक 49 (shiva.vayaviya.67.49)
मारणोच्चाटने कुर्याद्रोहिबीजैस्तिलान्वितैः । विद्वेषणं च तैलेन कुर्याल्लाङ्गलकस्य तु
māraṇoccāṭane kuryādrohibījaistilānvitaiḥ | vidveṣaṇaṃ ca tailena kuryāllāṅgalakasya tu
मारण-उच्चाटन में रोहि-बीज तिलों सहित प्रयोग करे; विद्वेषण तेल से, तथा हल के काष्ठ से करे।
श्लोक 50 (shiva.vayaviya.67.50)
बन्धनं रोहिबीजेन सेनास्तम्भनमेव च । रक्तसर्षपसम्मिश्रैर्होमद्रव्यैरशेषतः
bandhanaṃ rohibījena senāstambhanameva ca | raktasarṣapasammiśrairhomadravyairaśeṣataḥ
बन्धन रोहि-बीज से हो, तथा सेना का स्तम्भन भी; लाल सरसों से मिश्रित होम-द्रव्यों से, सम्पूर्ण रूप से —
श्लोक 51 (shiva.vayaviya.67.51)
हस्तयन्त्रोद्भवैस्तैलैर्जुहुयादाभिचारिके । कटुकीतुषसंयुक्तैः कार्पासास्थिभिरेव च
hastayantrodbhavaistailairjuhuyādābhicārike | kaṭukītuṣasaṃyuktaiḥ kārpāsāsthibhireva ca
हस्त-यन्त्र से उत्पन्न तेलों से अभिचार (मारक क्रिया) में हवन करे; कड़वे बीजों की भूसी सहित, तथा कपास के बीजों से भी —
श्लोक 52 (shiva.vayaviya.67.52)
सर्षपैस्तैलसम्मिश्रैर्जुहुयादाभिचारिके । ज्वरोपशान्तिदं क्षीरं सौभाग्यफलदं तथा
sarṣapaistailasammiśrairjuhuyādābhicārike | jvaropaśāntidaṃ kṣīraṃ saubhāgyaphaladaṃ tathā
सरसों को तेल में मिलाकर अभिचार में हवन करे; ज्वर की शान्ति देने वाला दूध है, तथा सौभाग्य देने वाला भी।
श्लोक 53 (shiva.vayaviya.67.53)
सर्वसिद्धिकरो होमः क्षौद्राज्यदधिभिर्युतैः । क्षीरेण तन्दुलैश्चैव चरुणा केवलेन वा
sarvasiddhikaro homaḥ kṣaudrājyadadhibhiryutaiḥ | kṣīreṇa tandulaiścaiva caruṇā kevalena vā
मधु, घी, तथा दही से युक्त होम सर्व-सिद्धि देने वाला है; दूध से, तथा चावलों से, अथवा केवल चरु से भी —
श्लोक 54 (shiva.vayaviya.67.54)
शान्तिकं पौष्टिकं वापि सप्तभिः समिदादिभिः । द्रव्यैर्विशेषतो होमे वश्यमाकर्षणं तथा
śāntikaṃ pauṣṭikaṃ vāpi saptabhiḥ samidādibhiḥ | dravyairviśeṣato home vaśyamākarṣaṇaṃ tathā
शान्ति अथवा पुष्टि के लिए सात समिधाओं आदि द्रव्यों से विशेष रूप से; होम में वश्य और आकर्षण भी किए जा सकते हैं।
श्लोक 55 (shiva.vayaviya.67.55)
वश्यमाकर्षणं चैव श्रीपदं च विशेषतः । बिल्वपत्रैस्तु हवनं शत्रोर्विजयदं तथा
vaśyamākarṣaṇaṃ caiva śrīpadaṃ ca viśeṣataḥ | bilvapatraistu havanaṃ śatrorvijayadaṃ tathā
वश्य और आकर्षण भी, तथा विशेष रूप से श्री-पद (समृद्धि) के लिए भी; बिल्व-पत्रों से हवन शत्रु पर विजय देने वाला है।
श्लोक 56 (shiva.vayaviya.67.56)
समिधः शान्तिकार्येषु पालाशखदिरादिकाः । करवीरार्कजाः क्रौर्ये कण्टकिन्यश्च विग्रहे
samidhaḥ śāntikāryeṣu pālāśakhadirādikāḥ | karavīrārkajāḥ kraurye kaṇṭakinyaśca vigrahe
शान्ति-कार्यों में पलाश और खदिर आदि की समिधाएँ उपयुक्त हैं; क्रूर कर्मों में करवीर और अर्क से उत्पन्न, विग्रह में काँटेदार वृक्षों की समिधाएँ।
श्लोक 57 (shiva.vayaviya.67.57)
प्रशान्तः शान्तिकं कुर्यात्पौष्टिकं च विशेषतः । निर्घृणः क्रुद्धचित्तस्तु प्रकुर्यादाभिचारिकम्
praśāntaḥ śāntikaṃ kuryātpauṣṭikaṃ ca viśeṣataḥ | nirghṛṇaḥ kruddhacittastu prakuryādābhicārikam
शान्त-चित्त व्यक्ति शान्ति-कर्म करे, तथा विशेष रूप से पुष्टि-कर्म भी; निर्दय, क्रुद्ध-चित्त व्यक्ति ही अभिचार-कर्म करे।
श्लोक 58 (shiva.vayaviya.67.58)
अतीव दुरवस्थायां प्रतीकारान्तरं न चेत् । आततायिनमुद्दिश्य प्रकुर्यादाभिचारिकम्
atīva duravasthāyāṃ pratīkārāntaraṃ na cet | ātatāyinamuddiśya prakuryādābhicārikam
अत्यंत दुरवस्था में, यदि कोई अन्य उपाय न हो, तो आततायी (अत्याचारी) को लक्ष्य बनाकर ही अभिचार-कर्म करे।
श्लोक 59 (shiva.vayaviya.67.59)
स्वराष्ट्रपतिमुद्दिश्य न कुर्यादाभिचारिकम् । यद्यास्तिकः सुधर्मिष्ठो मान्यो वा योऽपि कोऽपि वा
svarāṣṭrapatimuddiśya na kuryādābhicārikam | yadyāstikaḥ sudharmiṣṭho mānyo vā yo'pi ko'pi vā
अपने राष्ट्र के राजा को लक्ष्य बनाकर अभिचार-कर्म न करे; यदि वह आस्तिक, सुधर्मिष्ठ, अथवा माननीय, या जो भी कोई हो —
श्लोक 60 (shiva.vayaviya.67.60)
तमुद्दिश्यापि नो कुर्यादाततायिनमप्युत । मनसा कर्मणा वाचा योऽपि कोऽपि शिवाश्रितः
tamuddiśyāpi no kuryādātatāyinamapyuta | manasā karmaṇā vācā yo'pi ko'pi śivāśritaḥ
उसे लक्ष्य बनाकर भी न करे, चाहे वह आततायी ही क्यों न हो; मन, कर्म, अथवा वाणी से, जो भी कोई शिव का आश्रित हो —
श्लोक 61 (shiva.vayaviya.67.61)
स्वराष्ट्रपतिमुद्दिश्य शिवा श्रितमथापि वा । कृत्वाभिचारिकं कर्म सद्यो विनिपतेन्नरः
svarāṣṭrapatimuddiśya śivā śritamathāpi vā | kṛtvābhicārikaṃ karma sadyo vinipatennaraḥ
अपने राष्ट्र के राजा को, अथवा शिव के आश्रित व्यक्ति को भी लक्ष्य बनाकर अभिचार-कर्म करने वाला मनुष्य तत्काल विनष्ट हो जाता है।
श्लोक 62 (shiva.vayaviya.67.62)
स्वराष्ट्रपालकं तस्माच्छिवभक्तं च कञ्चन । न हिंस्यादभिचाराद्यैर्यदीच्छेत्सुखमात्मनः
svarāṣṭrapālakaṃ tasmācchivabhaktaṃ ca kañcana | na hiṃsyādabhicārādyairyadīcchetsukhamātmanaḥ
इसलिए, अपने राष्ट्र के रक्षक को, तथा किसी भी शिव-भक्त को; अभिचार आदि से हिंसा न करे, यदि वह अपने सुख की कामना करता हो।
श्लोक 63 (shiva.vayaviya.67.63)
अन्यं कमपि चोद्दिश्य कृत्वा वै मारणादिकम् । पश्चात्तापेन संयुक्तः प्रायश्चित्तं समाचरेत्
anyaṃ kamapi coddiśya kṛtvā vai māraṇādikam | paścāttāpena saṃyuktaḥ prāyaścittaṃ samācaret
किसी अन्य को लक्ष्य बनाकर मारण आदि कर्म करके भी; पश्चात्ताप से युक्त होकर, प्रायश्चित्त करे।
श्लोक 64 (shiva.vayaviya.67.64)
बाणलिङ्गेऽपि वा कुर्यान्निर्धनो धनवानपि । स्वयम्भूतेऽथ वा लिङ्गे आर्षके वैदिकेऽपि वा
bāṇaliṅge'pi vā kuryānnirdhano dhanavānapi | svayambhūte'tha vā liṅge ārṣake vaidike'pi vā
बाण-लिंग में भी निर्धन अथवा धनवान भी यह कर सकता है; अथवा स्वयंभू लिंग में, अथवा आर्ष अथवा वैदिक लिंग में भी।
श्लोक 65 (shiva.vayaviya.67.65)
अभावे हेमरत्नानामशक्तौ च तदर्जने । मनसैवाचरेदेतद् द्रव्यैर्वा प्रतिरूपकैः
abhāve hemaratnānāmaśaktau ca tadarjane | manasaivācaredetad dravyairvā pratirūpakaiḥ
स्वर्ण-रत्नों के अभाव में, तथा उन्हें प्राप्त करने में असमर्थता होने पर; इसे केवल मन से भी करे, अथवा प्रतिरूप द्रव्यों से भी।
श्लोक 66 (shiva.vayaviya.67.66)
क्वचिदंशे तु यः शक्तस्त्वशक्तः क्वचिदंशके । सोऽपि शक्त्यनुसारेण कुर्वंश्चेत्फलमृच्छति
kvacidaṃśe tu yaḥ śaktastvaśaktaḥ kvacidaṃśake | so'pi śaktyanusāreṇa kurvaṃścetphalamṛcchati
जो किसी अंश में समर्थ हो, और किसी अंश में असमर्थ; वह भी अपनी सामर्थ्य के अनुसार करते हुए फल प्राप्त करता है।
श्लोक 67 (shiva.vayaviya.67.67)
कर्मण्यनुष्ठितेऽप्यस्मिन्फलं यत्र न दृश्यते । द्विस्त्रिर्वावर्तयेत्तत्र सर्वथा दृश्यते फलम्
karmaṇyanuṣṭhite'pyasminphalaṃ yatra na dṛśyate | dvistrirvāvartayettatra sarvathā dṛśyate phalam
इस कर्म का अनुष्ठान करने पर भी, जहाँ फल दिखाई न दे; वहाँ इसे दो या तीन बार दोहराए — फल सब प्रकार से दिखाई देता है।
श्लोक 68 (shiva.vayaviya.67.68)
पूजोपयुक्तं यद् द्रव्यं हेमरत्नाद्यनुत्तमम् । तत्सर्वं गुरवे दद्याद् दक्षिणां च ततः पृथक्
pūjopayuktaṃ yad dravyaṃ hemaratnādyanuttamam | tatsarvaṃ gurave dadyād dakṣiṇāṃ ca tataḥ pṛthak
पूजा में उपयोग किए गए स्वर्ण-रत्न आदि उत्तम द्रव्य, वह सब गुरु को दे, तथा उससे अलग दक्षिणा भी दे।
श्लोक 69 (shiva.vayaviya.67.69)
स चेन्नेच्छति तत्सर्वं शिवाय विनिवेदयेत् । अथवा शिवभक्तेभ्यो नान्येभ्यस्तु प्रदीयते
sa cennecchati tatsarvaṃ śivāya vinivedayet | athavā śivabhaktebhyo nānyebhyastu pradīyate
यदि वह न चाहे, तो वह सब शिव को ही निवेदित कर दे; अथवा शिव-भक्तों को दे, अन्य किसी को नहीं दिया जाता।
श्लोक 70 (shiva.vayaviya.67.70)
यः स्वयं साधयेच्छक्त्या गुर्वादिनिरपेक्षया । सोऽप्येवमाचरेदत्र न गृह्णीयात्स्वयं पुनः
yaḥ svayaṃ sādhayecchaktyā gurvādinirapekṣayā | so'pyevamācaredatra na gṛhṇīyātsvayaṃ punaḥ
जो स्वयं अपनी सामर्थ्य से, गुरु आदि की अपेक्षा किए बिना, यह सम्पन्न करे; उसे भी इसी प्रकार आचरण करना चाहिए, स्वयं पुनः उसे ग्रहण न करे।
श्लोक 71 (shiva.vayaviya.67.71)
स्वयं गृह्णाति यो लोभात्पूजाङ्गद्रव्यमुत्तमम् । काङ्क्षितं न लभेन्मूढो नात्र कार्या विचारणा
svayaṃ gṛhṇāti yo lobhātpūjāṅgadravyamuttamam | kāṅkṣitaṃ na labhenmūḍho nātra kāryā vicāraṇā
जो लोभवश स्वयं पूजा के उत्तम अंग-द्रव्य को ग्रहण कर लेता है; वह मूढ़ अपनी वांछित वस्तु प्राप्त नहीं करता, इसमें कोई सन्देह नहीं करना चाहिए।
श्लोक 72 (shiva.vayaviya.67.72)
अर्चितं यत्तु तल्लिङ्गं गृह्णीयाद्वा न वा स्वयम् । गृह्णीयाद्यदि तन्नित्यं स्वयं वान्योऽपि वार्चयेत्
arcitaṃ yattu talliṅgaṃ gṛhṇīyādvā na vā svayam | gṛhṇīyādyadi tannityaṃ svayaṃ vānyo'pi vārcayet
पूजित उस लिंग को स्वयं ग्रहण करे अथवा न करे; यदि ग्रहण करे, तो उसका नित्य पूजन करे, अथवा उसे स्वयं या अन्य कोई पूजे।
श्लोक 73 (shiva.vayaviya.67.73)
यथोक्तमेव कर्मैतदाचरेद्योऽनपायतः । फलं व्यभिचरेन्नैवमित्यतः किं प्ररोचकम्
yathoktameva karmaitadācaredyo'napāyataḥ | phalaṃ vyabhicarennaivamityataḥ kiṃ prarocakam
जो कोई इस कर्म का ठीक वैसे ही आचरण करता है जैसा कहा गया है, बिना किसी त्रुटि के; उसका फल कभी विफल नहीं होता — इसलिए इससे बढ़कर और क्या प्रेरक हो सकता है?
श्लोक 74 (shiva.vayaviya.67.74)
तथाप्युद्देशतो वक्ष्ये कर्मणः सिद्धिमुत्तमाम् । अपि शत्रुभिराक्रान्तो व्याधिभिर्वाप्यनेकशः
tathāpyuddeśato vakṣye karmaṇaḥ siddhimuttamām | api śatrubhirākrānto vyādhibhirvāpyanekaśaḥ
फिर भी, संक्षेप में मैं इस कर्म की उत्तम सिद्धि का वर्णन करूँगा; शत्रुओं द्वारा घिरा हुआ भी, अथवा अनेक व्याधियों से पीड़ित भी —
श्लोक 75 (shiva.vayaviya.67.75)
मृत्योरास्यगतश्चापि मुच्यते निरपायतः । पूजायतेऽतिकृपणो रिक्तो वैश्रवणायते
mṛtyorāsyagataścāpi mucyate nirapāyataḥ | pūjāyate'tikṛpaṇo rikto vaiśravaṇāyate
मृत्यु के मुख में पड़ा हुआ भी, बिना किसी हानि के मुक्त हो जाता है; अत्यंत दरिद्र भी पूज्य के समान हो जाता है, निर्धन कुबेर के समान हो जाता है।
श्लोक 76 (shiva.vayaviya.67.76)
कामायते विरूपोऽपि वृद्धोऽपि तरुणायते । शत्रुर्मित्रायते सद्यो विरोधी किङ्करायते
kāmāyate virūpo'pi vṛddho'pi taruṇāyate | śatrurmitrāyate sadyo virodhī kiṅkarāyate
कुरूप भी कामदेव के समान हो जाता है, वृद्ध भी युवा के समान हो जाता है; शत्रु तत्काल मित्र के समान हो जाता है, विरोधी सेवक के समान हो जाता है।
श्लोक 77 (shiva.vayaviya.67.77)
विषायते यदमृतं विषमप्यमृतायते । स्थलायते समुद्रोऽपि स्थलमप्यर्णवायते
viṣāyate yadamṛtaṃ viṣamapyamṛtāyate | sthalāyate samudro'pi sthalamapyarṇavāyate
जो अमृत है वह शत्रु के लिए विष के समान हो जाता है, तथा विष भी भक्त के लिए अमृत के समान हो जाता है; समुद्र भी स्थल के समान हो जाता है, तथा स्थल भी सागर के समान हो जाता है।
श्लोक 78 (shiva.vayaviya.67.78)
महीधरायते श्वभ्रं स च श्वभ्रायते गिरिः । पद्माकरायते वह्निः सरो वैश्वानरायते
mahīdharāyate śvabhraṃ sa ca śvabhrāyate giriḥ | padmākarāyate vahniḥ saro vaiśvānarāyate
पर्वत भी गड्ढे के समान हो जाता है, और गड्ढा भी पर्वत के समान हो जाता है; अग्नि कमल-सरोवर के समान हो जाती है, और सरोवर अग्नि के समान हो जाता है।
श्लोक 79 (shiva.vayaviya.67.79)
वनायते यदुद्यानं तदुद्यानायते वनम् । सिंहायते मृगः क्षुद्रः सिंहः क्रीडामृगायते
vanāyate yadudyānaṃ tadudyānāyate vanam | siṃhāyate mṛgaḥ kṣudraḥ siṃhaḥ krīḍāmṛgāyate
जो वन है वह उद्यान के समान हो जाता है, और वह उद्यान वन के समान हो जाता है; क्षुद्र मृग सिंह के समान हो जाता है, और सिंह क्रीड़ा-मृग के समान हो जाता है।
श्लोक 80 (shiva.vayaviya.67.80)
स्त्रियोऽभिसारिकायन्ते लक्ष्मीः सुचरितायते । स्वैरप्रेष्यायते वाणी कीर्तिस्तु गणिकायते
striyo'bhisārikāyante lakṣmīḥ sucaritāyate | svairapreṣyāyate vāṇī kīrtistu gaṇikāyate
स्त्रियाँ उसके प्रति अभिसारिका के समान अनुरक्त हो जाती हैं, लक्ष्मी सदाचारिणी होकर उसका अनुसरण करती है; वाणी स्वेच्छा से सेवा करने वाली दासी के समान हो जाती है, और कीर्ति वेश्या के समान सर्वत्र उपलब्ध हो जाती है।
श्लोक 81 (shiva.vayaviya.67.81)
स्वैराचारायते मेधा वज्रसूचीयते मनः । महावातायते शक्तिर्बलं मत्तगजायते
svairācārāyate medhā vajrasūcīyate manaḥ | mahāvātāyate śaktirbalaṃ mattagajāyate
बुद्धि स्वेच्छाचारिणी के समान स्वतंत्र हो जाती है, मन वज्र की सुई के समान अत्यंत तीक्ष्ण हो जाता है; शक्ति महान वायु के समान हो जाती है, बल मतवाले हाथी के समान हो जाता है।
श्लोक 82 (shiva.vayaviya.67.82)
स्तम्भायते समुद्योगैः शत्रुपक्षे स्थिता क्रिया । शत्रुपक्षायतेऽरीणां सर्व एव सुहृज्जनः
stambhāyate samudyogaiḥ śatrupakṣe sthitā kriyā | śatrupakṣāyate'rīṇāṃ sarva eva suhṛjjanaḥ
शत्रु-पक्ष में स्थित समस्त प्रयत्न, चेष्टा करने पर भी, स्तम्भित हो जाते हैं; शत्रुओं के सभी मित्र-जन भी उनके विरोधी-पक्ष के समान हो जाते हैं।
श्लोक 83 (shiva.vayaviya.67.83)
शत्रवः कुणपायन्ते जीवन्तोऽपि सबान्धवाः । आपन्नोऽपि गतारिष्टः स्वयं खल्वमृतायते
śatravaḥ kuṇapāyante jīvanto'pi sabāndhavāḥ | āpanno'pi gatāriṣṭaḥ svayaṃ khalvamṛtāyate
शत्रु जीवित रहते हुए भी अपने बन्धुओं सहित शव के समान हो जाते हैं; विपत्ति में पड़ा हुआ भी, विनाश से बचकर, स्वयं मानो अमृत-तुल्य हो जाता है।
श्लोक 84 (shiva.vayaviya.67.84)
रसायनायते नित्यमपथ्यमपि सेवितम् । अनिशं क्रियमाणापि रतिस्त्वभिनवायते
rasāyanāyate nityamapathyamapi sevitam | aniśaṃ kriyamāṇāpi ratistvabhinavāyate
नित्य सेवन किया गया अपथ्य (हानिकारक भोजन) भी रसायन (अमृत-तुल्य औषधि) के समान हो जाता है; निरन्तर की जाने वाली रति भी सदा नवीन के समान प्रतीत होती है।
श्लोक 85 (shiva.vayaviya.67.85)
अनागतादिकं सर्वं करस्थामलकायते । यादृच्छिकफलायन्ते सिद्धयोऽप्यणिमादयः
anāgatādikaṃ sarvaṃ karasthāmalakāyate | yādṛcchikaphalāyante siddhayo'pyaṇimādayaḥ
भूत, भविष्य आदि सब कुछ हथेली पर रखे आँवले के समान स्पष्ट हो जाता है; अणिमा आदि सिद्धियाँ भी अपने-आप, बिना प्रयास के, फलरूप में प्राप्त हो जाती हैं।
श्लोक 86 (shiva.vayaviya.67.86)
बहुनात्र किमुक्तेन सर्वकामार्थसिद्धिषु । अस्मिन्कर्मणि निर्वृत्ते त्वनवाप्यं न विद्यते
bahunātra kimuktena sarvakāmārthasiddhiṣu | asminkarmaṇi nirvṛtte tvanavāpyaṃ na vidyate
यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ? समस्त कामनाओं और प्रयोजनों की सिद्धि में, इस कर्म के सम्पन्न होने पर, ऐसा कुछ भी नहीं है जो अप्राप्य रह जाए।