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वायवीय संहिता · अध्याय 72

योग-गति का वर्णन

अध्याय 71अध्याय-सूचीअध्याय 73

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.72.1)

श्रीकृष्ण उवाच । ज्ञाने क्रियायां चर्यायां सारमुद्धृत्य सङ्ग्रहात् । उक्तं भगवता सर्वं श्रुतं श्रुतिसमं मया

śrīkṛṣṇa uvāca | jñāne kriyāyāṃ caryāyāṃ sāramuddhṛtya saṅgrahāt | uktaṃ bhagavatā sarvaṃ śrutaṃ śrutisamaṃ mayā

श्रीकृष्ण ने कहा - ज्ञान, क्रिया और चर्या में जो कुछ सार है, उसे संक्षेप में निकालकर आपने, हे भगवन्, सब कुछ मुझसे कहा है; मैंने उसे वेद के समान सुना है।

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.72.2)

इदानीं श्रोतुमिच्छामि योगं परमदुर्लभम् । साधिकारं च साङ्गं च सविधिं सप्रयोजनम्

idānīṃ śrotumicchāmi yogaṃ paramadurlabham | sādhikāraṃ ca sāṅgaṃ ca savidhiṃ saprayojanam

अब मैं अत्यंत दुर्लभ योग को सुनना चाहता हूँ - उसके अधिकारी, अंगों, विधि और प्रयोजन सहित।

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.72.3)

यद्यस्ति मरणं पूर्वं योगाद्यनुपमर्दतः । सद्यः साधयितुं शक्यं येन स्यान्नात्महा नरः

yadyasti maraṇaṃ pūrvaṃ yogādyanupamardataḥ | sadyaḥ sādhayituṃ śakyaṃ yena syānnātmahā naraḥ

यदि योग की साधना के मध्य में, बिना उसे भंग किए, मृत्यु को तुरन्त सिद्ध करने का कोई उपाय है, जिससे मनुष्य आत्महत्यारा न कहलाए -

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.72.4)

तच्च तत्कारणं चैव तत्कालकरणानि च । तद्भेदतारतम्यं च वक्तुमर्हसि तत्त्वतः

tacca tatkāraṇaṃ caiva tatkālakaraṇāni ca | tadbhedatāratamyaṃ ca vaktumarhasi tattvataḥ

तो उसका कारण, उसका उचित काल और साधन, तथा उसके भेद और तारतम्य को भी आप यथार्थ रूप से मुझसे कहें।

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.72.5)

उपमन्युरुवाच । स्थाने पृष्टं त्वया कृष्ण सर्वप्रश्नार्थवेदिना । ततः क्रमेण तत्सर्वं वक्ष्ये शृणु समाहितः

upamanyuruvāca | sthāne pṛṣṭaṃ tvayā kṛṣṇa sarvapraśnārthavedinā | tataḥ krameṇa tatsarvaṃ vakṣye śṛṇu samāhitaḥ

उपमन्यु ने कहा - हे कृष्ण! समस्त प्रश्नों के अर्थ को जानने वाले आपने उचित ही पूछा है; अब मैं वह सब क्रमशः कहूँगा, एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.72.6)

निरुद्धवृत्त्यन्तरस्य शिवे चित्तस्य निश्चला । या वृत्तिः सा समासेन योगः स खलु पञ्चधा

niruddhavṛttyantarasya śive cittasya niścalā | yā vṛttiḥ sā samāsena yogaḥ sa khalu pañcadhā

अन्य समस्त वृत्तियों का निरोध होने पर, चित्त की जो निश्चल वृत्ति शिव में स्थिर होती है, वही संक्षेप में योग है, और वह निश्चय ही पाँच प्रकार का है।

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.72.7)

मन्त्रयोगः स्पर्शयोगो भावयोगस्तथापरः । अभावयोगः सर्वेभ्यो महायोगः परो मतः

mantrayogaḥ sparśayogo bhāvayogastathāparaḥ | abhāvayogaḥ sarvebhyo mahāyogaḥ paro mataḥ

मन्त्रयोग, स्पर्शयोग, तथा भावयोग; अभावयोग; और इन सबसे श्रेष्ठ माना गया परम महायोग।

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.72.8)

मन्त्राभ्यासवशेनैव मन्त्रवाच्यार्थगोचरः । अव्याक्षेपा मनोवृत्तिर्मन्त्रयोग उदाहृतः

mantrābhyāsavaśenaiva mantravācyārthagocaraḥ | avyākṣepā manovṛttirmantrayoga udāhṛtaḥ

मन्त्र के अभ्यास के बल से ही मन्त्र के वाच्य अर्थ में जो अविक्षिप्त मनोवृत्ति स्थिर होती है, वह मन्त्रयोग कहलाता है।

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.72.9)

प्राणायाममुखा सैव स्पर्शेयोगोऽभिधीयते । स मन्त्रस्पर्शनिर्मुक्तो भावयोगः प्रकीर्तितः

prāṇāyāmamukhā saiva sparśeyogo'bhidhīyate | sa mantrasparśanirmukto bhāvayogaḥ prakīrtitaḥ

वही प्राणायाम-प्रधान होकर स्पर्शयोग कहलाता है; और मन्त्र तथा स्पर्श (प्राणायाम) दोनों से रहित वह भावयोग कहा गया है।

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.72.10)

विलीनावयवं विश्वं रूपं सम्भाव्यते यतः । अभावयोगः सम्प्रोक्तोऽनाभासाद्वस्तुनः सतः

vilīnāvayavaṃ viśvaṃ rūpaṃ sambhāvyate yataḥ | abhāvayogaḥ samprokto'nābhāsādvastunaḥ sataḥ

जिसमें विश्व के समस्त अवयव लीन हुए स्वरूप की भावना की जाती है, तथा जो अनाभास सत् वस्तु से उत्पन्न होता है, वह अभावयोग कहा गया है।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.72.11)

शिवस्वभाव एवैकश्चिन्त्यते निरुपाधिकः । यथा शैवमनोवृत्तिर्महायोग इहोच्यते

śivasvabhāva evaikaścintyate nirupādhikaḥ | yathā śaivamanovṛttirmahāyoga ihocyate

जिसमें उपाधि-रहित एक शिव-स्वभाव का ही चिन्तन किया जाता है, अर्थात् जो शैव मनोवृत्ति है, वही यहाँ महायोग कहलाता है।

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.72.12)

दृष्टे तथानुश्रविके विरक्तं विषये मनः । यस्य तस्याधिकारोऽस्ति योगे नान्यस्य कस्यचित्

dṛṣṭe tathānuśravike viraktaṃ viṣaye manaḥ | yasya tasyādhikāro'sti yoge nānyasya kasyacit

जिस पुरुष का मन दृष्ट (सांसारिक) और आनुश्रविक (शास्त्रोक्त स्वर्गादि) दोनों प्रकार के विषयों से विरक्त है, उसी को योग का अधिकार है, अन्य किसी को नहीं।

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.72.13)

विषयद्वयदोषाणां गुणानामीश्वरस्य च । दर्शनादेव सततं विरक्तं जायते मनः

viṣayadvayadoṣāṇāṃ guṇānāmīśvarasya ca | darśanādeva satataṃ viraktaṃ jāyate manaḥ

इन दोनों प्रकार के विषयों के दोषों को और ईश्वर के गुणों को निरन्तर देखते रहने से ही मन स्वाभाविक रूप से विरक्त हो जाता है।

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.72.14)

अष्टाङ्गो वा षडङ्गो वा सर्वयोगः समासतः । यमश्च नियमश्चैव स्वस्तिकाद्यं तथासनम्

aṣṭāṅgo vā ṣaḍaṅgo vā sarvayogaḥ samāsataḥ | yamaśca niyamaścaiva svastikādyaṃ tathāsanam

समस्त योग संक्षेप में अष्टांग अथवा षडंग होता है। यम, नियम, तथा स्वस्तिक आदि आसन,

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.72.15)

प्राणायामः प्रत्याहारो धारणा ध्यानमेव च । समाधिरिति योगाङ्गान्यष्टावुक्तानि सूरिभिः

prāṇāyāmaḥ pratyāhāro dhāraṇā dhyānameva ca | samādhiriti yogāṅgānyaṣṭāvuktāni sūribhiḥ

प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा और ध्यान, तथा समाधि - इन आठ को विद्वानों ने योग के अंग कहा है।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.72.16)

आसनं प्राणसंरोधः प्रत्याहारोऽथ धारणा । ध्यानं समाधिर्योगस्य षडङ्गानि समासतः

āsanaṃ prāṇasaṃrodhaḥ pratyāhāro'tha dhāraṇā | dhyānaṃ samādhiryogasya ṣaḍaṅgāni samāsataḥ

आसन, प्राण-निरोध, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि - ये संक्षेप में योग के छह अंग हैं।

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.72.17)

पृथग्लक्षणमेतेषां शिवशास्त्रे समीरितम् । शिवागमेषु चान्येषु विशेषात् कामिकादिषु

pṛthaglakṣaṇameteṣāṃ śivaśāstre samīritam | śivāgameṣu cānyeṣu viśeṣāt kāmikādiṣu

इनका पृथक्-पृथक् लक्षण शिव-शास्त्र में, तथा कामिक आदि अन्य शिवागमों में विशेष रूप से कहा गया है,

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.72.18)

योगशास्त्रेष्वपि तथा पुराणेष्वपि केषु च । अहिंसा सत्यमस्तेयं ब्रह्मचर्यापरिग्रहः । यम इत्युच्यते सद्भिः पञ्चावयवयोगतः

yogaśāstreṣvapi tathā purāṇeṣvapi keṣu ca | ahiṃsā satyamasteyaṃ brahmacaryāparigrahaḥ | yama ityucyate sadbhiḥ pañcāvayavayogataḥ

और उसी प्रकार योग-शास्त्रों में तथा कुछ पुराणों में भी। अहिंसा, सत्य, अस्तेय, ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह - इन पाँच अंगों के योग से सज्जनों ने इसे 'यम' कहा है।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.72.19)

शौचं तुष्टिस्तपश्चैव जपः प्रणिधिरेव च । इति पञ्च प्रभेदः स्यान्नियमः स्वांशभेदतः

śaucaṃ tuṣṭistapaścaiva japaḥ praṇidhireva ca | iti pañca prabhedaḥ syānniyamaḥ svāṃśabhedataḥ

शौच, सन्तोष, तप, जप और ईश्वर-प्रणिधान - इस प्रकार अपने पाँच भेदों से 'नियम' कहा जाता है।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.72.20)

स्वस्तिकं पद्ममध्येन्दुं वीरं योगं प्रसाधितम् । पर्यङ्कं च यथेष्टं च प्रोक्तमासनमष्टधा

svastikaṃ padmamadhyenduṃ vīraṃ yogaṃ prasādhitam | paryaṅkaṃ ca yatheṣṭaṃ ca proktamāsanamaṣṭadhā

स्वस्तिक, पद्म, अर्धेन्दु, वीर, सिद्ध योगासन, प्रसाधित, पर्यंक, तथा यथेष्ट (स्वेच्छानुसार) - इस प्रकार आसन आठ प्रकार का कहा गया है।

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.72.21)

प्राणः स्वदेहजो वायुस्तस्यायामो निरोधनम् । तद्रोचकं पूरकं च कुम्भकं च त्रिधोच्यते

prāṇaḥ svadehajo vāyustasyāyāmo nirodhanam | tadrocakaṃ pūrakaṃ ca kumbhakaṃ ca tridhocyate

अपने शरीर में उत्पन्न होने वाला वायु 'प्राण' है; उसका आयाम (नियमन) ही उसका निरोध है। वह रेचक, पूरक और कुम्भक के भेद से तीन प्रकार का कहा जाता है।

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.72.22)

नासिकापुटमङ्गुल्या पीड्यैकमपरेण तु । औदरं रेचयेद्वायुं तथायं रेचकः स्मृतः

nāsikāpuṭamaṅgulyā pīḍyaikamapareṇa tu | audaraṃ recayedvāyuṃ tathāyaṃ recakaḥ smṛtaḥ

एक नासिका-छिद्र को अंगुली से दबाकर दूसरे से पेट के वायु को बाहर निकालना चाहिए - यही रेचक कहा गया है।

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.72.23)

बाह्येन मरुता देहं दृतिवत्परिपूरयेत् । नासापुटेनापरेण पूरणात्पूरकं मतम्

bāhyena marutā dehaṃ dṛtivatparipūrayet | nāsāpuṭenāpareṇa pūraṇātpūrakaṃ matam

बाहर की वायु से शरीर को धौंकनी के समान परिपूर्ण करना चाहिए, दूसरी नासिका से - इस पूरण के कारण इसे पूरक माना गया है।

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.72.24)

न मुञ्चति न गृह्णाति वायुमन्तर्बहिः स्थितम् । सम्पूर्णं कुम्भवत्तिष्ठेदचलः स तु कुम्भकः

na muñcati na gṛhṇāti vāyumantarbahiḥ sthitam | sampūrṇaṃ kumbhavattiṣṭhedacalaḥ sa tu kumbhakaḥ

भीतर या बाहर स्थित वायु को न छोड़ते हुए और न ग्रहण करते हुए, घट के समान परिपूर्ण, अचल स्थिर रहना ही कुम्भक है।

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.72.25)

रेचकाद्यं त्रयमिदं न द्रुतं न विलम्बितम् । तद्यतः क्रमयोगेन त्वभ्यसेद्योगसाधकः

recakādyaṃ trayamidaṃ na drutaṃ na vilambitam | tadyataḥ kramayogena tvabhyasedyogasādhakaḥ

रेचक आदि यह त्रिविध क्रिया न शीघ्र होनी चाहिए और न विलम्बित; इसलिए योग-साधक को क्रमशः इसका अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.72.26)

रेचकादिषु योऽभ्यासो नाडीशोधनपूर्वकः । स्वेच्छोत्क्रमणपर्यन्तः प्रोक्तो योगानुशासने

recakādiṣu yo'bhyāso nāḍīśodhanapūrvakaḥ | svecchotkramaṇaparyantaḥ prokto yogānuśāsane

रेचक आदि में नाड़ी-शोधन-पूर्वक जो अभ्यास होता है, वह स्वेच्छापूर्वक (प्राण के) उत्क्रमण तक योग-अनुशासन में कहा गया है।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.72.27)

कन्यकादिक्रमवशात् प्राणायामनिरोधनम् । तच्चतुर्द्धोपदिष्टं स्यान्मात्रागुणविभागतः

kanyakādikramavaśāt prāṇāyāmanirodhanam | taccaturddhopadiṣṭaṃ syānmātrāguṇavibhāgataḥ

'कन्यक' आदि क्रम के अनुसार प्राणायाम का निरोध मात्रा-भेद से चार प्रकार का बताया गया है।

श्लोक 28 (shiva.vayaviya.72.28)

कन्यकस्तु चतुर्द्धा स्यात्स च द्वादशमात्रकः । मध्यमस्तु द्विरुद्धातश्चतुर्विंशतिमात्रकः

kanyakastu caturddhā syātsa ca dvādaśamātrakaḥ | madhyamastu dviruddhātaścaturviṃśatimātrakaḥ

'कन्यक' चार आवृत्तियों वाला होता है और बारह मात्राओं का होता है; 'मध्यम' दो बार निरुद्ध, चौबीस मात्राओं का होता है;

श्लोक 29 (shiva.vayaviya.72.29)

उत्तमस्तु त्रिरुद्धातः षड्विंशन् मात्रकः परः । स्वेदकम्पादिजनकः प्राणायामस्तदुत्तरः

uttamastu triruddhātaḥ ṣaḍviṃśan mātrakaḥ paraḥ | svedakampādijanakaḥ prāṇāyāmastaduttaraḥ

'उत्तम' तीन बार निरुद्ध, छब्बीस मात्राओं का श्रेष्ठ होता है; उससे आगे का प्राणायाम पसीना और कम्पन आदि उत्पन्न करने वाला होता है।

श्लोक 30 (shiva.vayaviya.72.30)

आनन्दोद्भवरोमाञ्चनेत्राश्रूणां विमोचनम् । जल्पभ्रमणमूर्छाद्यं जायते योगिनः परम्

ānandodbhavaromāñcanetrāśrūṇāṃ vimocanam | jalpabhramaṇamūrchādyaṃ jāyate yoginaḥ param

आनन्द से उत्पन्न रोमांच, नेत्रों से अश्रुओं का बहना, अस्पष्ट बोलना, भ्रमण और मूर्च्छा आदि - ये सब योगी में तब सर्वोत्तम रूप से प्रकट होते हैं।

श्लोक 31 (shiva.vayaviya.72.31)

जानुं प्रदक्षिणीकृत्य न द्रुतं न विलम्बितम् । अङ्गुलीस्फोटनं कुर्यात्सा मात्रेति प्रकीर्तिता

jānuṃ pradakṣiṇīkṛtya na drutaṃ na vilambitam | aṅgulīsphoṭanaṃ kuryātsā mātreti prakīrtitā

घुटने का प्रदक्षिणा करके, न शीघ्र न विलम्बित रूप से, अंगुलियों को चटकाना चाहिए - इसे 'मात्रा' कहा गया है।

श्लोक 32 (shiva.vayaviya.72.32)

मात्रा क्रमेण विज्ञेयाश्चोद्घातक्रमयोगतः । नाडीविशुद्धिपूर्वं तु प्राणायामं समाचरेत्

mātrā krameṇa vijñeyāścodghātakramayogataḥ | nāḍīviśuddhipūrvaṃ tu prāṇāyāmaṃ samācaret

मात्राएँ क्रमशः 'उद्घात' नामक क्रम-विधि से जाननी चाहिए; परन्तु नाड़ी-शुद्धि के पश्चात् ही प्राणायाम का अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक 33 (shiva.vayaviya.72.33)

अगर्भश्च सगर्भश्च प्राणायामो द्विधा स्मृतः । जपं ध्यानं विनागर्भः सगर्भस्तत्समन्वयात्

agarbhaśca sagarbhaśca prāṇāyāmo dvidhā smṛtaḥ | japaṃ dhyānaṃ vināgarbhaḥ sagarbhastatsamanvayāt

प्राणायाम अगर्भ और सगर्भ - दो प्रकार का माना गया है। जप और ध्यान से रहित अगर्भ है, और उनसे युक्त सगर्भ है।

श्लोक 34 (shiva.vayaviya.72.34)

अगर्भाद्गर्भसंयुक्तः प्राणायामः शताधिकः । तस्मात्सगर्भं कुर्वन्ति योगिनः प्राणसंयमम्

agarbhādgarbhasaṃyuktaḥ prāṇāyāmaḥ śatādhikaḥ | tasmātsagarbhaṃ kurvanti yoginaḥ prāṇasaṃyamam

अगर्भ की अपेक्षा जप-युक्त सगर्भ प्राणायाम सौ गुना अधिक फलदायी है; इसीलिए योगीजन सगर्भ प्राण-संयम ही करते हैं।

श्लोक 35 (shiva.vayaviya.72.35)

प्राणस्य विजयादेव जीयन्ते देहवायवः । प्राणोऽपानः समानश्च ह्युदानो व्यान एव च

prāṇasya vijayādeva jīyante dehavāyavaḥ | prāṇo'pānaḥ samānaśca hyudāno vyāna eva ca

प्राण की विजय से ही शरीर के अन्य समस्त वायु जीत लिए जाते हैं - प्राण, अपान, समान, उदान, और व्यान -

श्लोक 36 (shiva.vayaviya.72.36)

नागः कूर्मश्च कृकलो देवदत्तो धनञ्जयः । प्रयाणं कुरुते यस्मात्तस्मात्प्राणोऽभिधीयते

nāgaḥ kūrmaśca kṛkalo devadatto dhanañjayaḥ | prayāṇaṃ kurute yasmāttasmātprāṇo'bhidhīyate

तथा नाग, कूर्म, कृकल, देवदत्त और धनञ्जय। जो सबसे पहले प्रयाण (गमन) करता है, इसीलिए वह प्राण कहलाता है।

श्लोक 37 (shiva.vayaviya.72.37)

अवाङ्नयत्यपानाख्यो यदाहारादि भुज्यते । व्यानो व्यान शयत्यङ्गान्यशेषाणि विवर्धयन्

avāṅnayatyapānākhyo yadāhārādi bhujyate | vyāno vyāna śayatyaṅgānyaśeṣāṇi vivardhayan

जो खाया हुआ आहार आदि नीचे की ओर ले जाता है, वह 'अपान' कहलाता है; 'व्यान' समस्त अंगों में व्याप्त होकर उन्हें पुष्ट करता है;

श्लोक 38 (shiva.vayaviya.72.38)

उद्वेजयति मर्माणीत्युदानो वायुरीरितः । समं नयति सर्वाङ्गं समानस्तेन गीयते

udvejayati marmāṇītyudāno vāyurīritaḥ | samaṃ nayati sarvāṅgaṃ samānastena gīyate

जो मर्मस्थलों को उद्वेलित करता है, वह 'उदान' वायु कहा गया है; जो समस्त अंगों में समान रूप से गति करता है, इसीलिए वह 'समान' कहलाता है।

श्लोक 39 (shiva.vayaviya.72.39)

उद्गारे नाग आख्यातः कूर्म उन्मीलने स्थितः । कृकलः क्षवथौ ज्ञेयो देवदत्तो विजृम्भणे

udgāre nāga ākhyātaḥ kūrma unmīlane sthitaḥ | kṛkalaḥ kṣavathau jñeyo devadatto vijṛmbhaṇe

डकार में 'नाग' कहा गया है, नेत्र खोलने में 'कूर्म' स्थित है; छींकने में 'कृकल' जानना चाहिए, जँभाई में 'देवदत्त';

श्लोक 40 (shiva.vayaviya.72.40)

न जहाति मृतं चापि सर्वव्यापी धनञ्जयः । क्रमेणाभ्यस्यमानोऽयं प्राणायामः प्रमाणवान्

na jahāti mṛtaṃ cāpi sarvavyāpī dhanañjayaḥ | krameṇābhyasyamāno'yaṃ prāṇāyāmaḥ pramāṇavān

और सर्वव्यापी 'धनञ्जय' मृत शरीर को भी नहीं छोड़ता। क्रमशः अभ्यास किया गया यह प्रमाणयुक्त प्राणायाम -

श्लोक 41 (shiva.vayaviya.72.41)

निर्दहत्यखिलं दोषं कर्तुर्देहं च रक्षति । प्राणे तु विजिते सम्यक् तच्चिह्नान्युपलक्षयेत्

nirdahatyakhilaṃ doṣaṃ karturdehaṃ ca rakṣati | prāṇe tu vijite samyak taccihnānyupalakṣayet

साधक के समस्त दोषों को भस्म कर देता है और उसके शरीर की रक्षा करता है। प्राण के सम्यक् विजित होने पर इसके चिह्न पहचानने चाहिए -

श्लोक 42 (shiva.vayaviya.72.42)

विण्मूत्रश्लेष्मणां तावदल्पभावः प्रजायते । बहुभोजनसामर्थ्यं चिरादुच्छ्वासनं तथा

viṇmūtraśleṣmaṇāṃ tāvadalpabhāvaḥ prajāyate | bahubhojanasāmarthyaṃ cirāducchvāsanaṃ tathā

मल, मूत्र और कफ का अल्प होना, बहुत भोजन करने का सामर्थ्य, तथा दीर्घ श्वास लेना -

श्लोक 43 (shiva.vayaviya.72.43)

लघुत्वं शीघ्रगामित्वमुत्साहः स्वरसौष्ठवम् । सर्वरोगक्षयश्चैव बलं तेजः सुरूपता

laghutvaṃ śīghragāmitvamutsāhaḥ svarasauṣṭhavam | sarvarogakṣayaścaiva balaṃ tejaḥ surūpatā

शरीर की हल्कापन, शीघ्रगामिता, उत्साह, स्वर की सुन्दरता, समस्त रोगों का क्षय, बल, तेज और सुन्दर रूप -

श्लोक 44 (shiva.vayaviya.72.44)

धृतिर्मेधा युवत्वं च स्थिरता च प्रसन्नता । तपांसि पापक्षयता यज्ञदानव्रतादयः

dhṛtirmedhā yuvatvaṃ ca sthiratā ca prasannatā | tapāṃsi pāpakṣayatā yajñadānavratādayaḥ

धैर्य, बुद्धि, युवावस्था, स्थिरता और प्रसन्नता। तप, पापों का क्षय, यज्ञ, दान, व्रत आदि -

श्लोक 45 (shiva.vayaviya.72.45)

प्राणायामस्य तस्यैते कलां नार्हन्ति षोडशीम् । इन्द्रियाणि प्रसक्तानि यथास्वं विषयेष्विह

prāṇāyāmasya tasyaite kalāṃ nārhanti ṣoḍaśīm | indriyāṇi prasaktāni yathāsvaṃ viṣayeṣviha

इस प्राणायाम की सोलहवीं कला के भी योग्य नहीं हैं। इन्द्रियाँ जो यहाँ अपने-अपने विषयों में आसक्त रहती हैं,

श्लोक 46 (shiva.vayaviya.72.46)

आहत्य यन्निगृह्णाति स प्रत्याहार उच्यते । मनःपूर्वाणीन्द्रियाणि स्वर्गं नरकमेव च

āhatya yannigṛhṇāti sa pratyāhāra ucyate | manaḥpūrvāṇīndriyāṇi svargaṃ narakameva ca

उन्हें प्रहार करके जो निग्रह किया जाता है, वह 'प्रत्याहार' कहलाता है। मन के अधीन इन्द्रियाँ स्वर्ग और नरक दोनों -

श्लोक 47 (shiva.vayaviya.72.47)

निगृहीतनिसृष्टानि स्वर्गाय नरकाय च । तस्मात्सुखार्थी मतिमान् ज्ञानवैराग्यमास्थितः

nigṛhītanisṛṣṭāni svargāya narakāya ca | tasmātsukhārthī matimān jñānavairāgyamāsthitaḥ

निग्रह और अनिग्रह के अनुसार, स्वर्ग और नरक की ओर ले जाती हैं। इसलिए सुख चाहने वाला बुद्धिमान् पुरुष ज्ञान और वैराग्य पर स्थित होकर -

श्लोक 48 (shiva.vayaviya.72.48)

इन्द्रियाश्वान्निगृह्याशु स्वात्मनात्मानमुद्धरेत् । धारणा नाम चित्तस्य स्थानबन्धः समासतः

indriyāśvānnigṛhyāśu svātmanātmānamuddharet | dhāraṇā nāma cittasya sthānabandhaḥ samāsataḥ

इन्द्रिय-रूपी घोड़ों को शीघ्र वश में कर, अपने द्वारा अपने आत्मा का उद्धार करे। धारणा नाम है - चित्त का किसी स्थान में संक्षेप से बन्धन।

श्लोक 49 (shiva.vayaviya.72.49)

स्थानं च शिव एवैको नान्यद्दोषत्रयं यतः । कालं कं चावधीकृत्य स्थानेऽवस्थापितं मनः

sthānaṃ ca śiva evaiko nānyaddoṣatrayaṃ yataḥ | kālaṃ kaṃ cāvadhīkṛtya sthāne'vasthāpitaṃ manaḥ

और वह स्थान एकमात्र शिव ही है, अन्य कोई नहीं, क्योंकि अन्य में तीनों दोष होते हैं। किसी निश्चित काल की सीमा बाँधकर उस स्थान में स्थापित किया गया मन -

श्लोक 50 (shiva.vayaviya.72.50)

न तु प्रच्यवते लक्ष्याद्धारणा स्यान्न चान्यथा । मनसः प्रथमं स्थैर्यं धारणातः प्रजायते

na tu pracyavate lakṣyāddhāraṇā syānna cānyathā | manasaḥ prathamaṃ sthairyaṃ dhāraṇātaḥ prajāyate

जब लक्ष्य से विचलित नहीं होता, तभी धारणा होती है, अन्यथा नहीं। मन की प्रथम स्थिरता धारणा से ही उत्पन्न होती है।

श्लोक 51 (shiva.vayaviya.72.51)

तस्माद्धीरं मनः कुर्याद्धारणाभ्यासयोगतः । ध्यै चिन्तायां स्मृतो धातुः शिवचिन्ता मुहुर्मुहुः

tasmāddhīraṃ manaḥ kuryāddhāraṇābhyāsayogataḥ | dhyai cintāyāṃ smṛto dhātuḥ śivacintā muhurmuhuḥ

इसलिए धारणा के अभ्यास-योग से मन को धैर्यवान बनाना चाहिए। 'ध्यै' धातु चिन्ता के अर्थ में स्मृत है - बार-बार शिव का चिन्तन,

श्लोक 52 (shiva.vayaviya.72.52)

अव्याक्षिप्तेन मनसा ध्यानं नाम तदुच्यते । ध्येयावस्थितचित्तस्य सदृशः प्रत्ययश्च यः

avyākṣiptena manasā dhyānaṃ nāma taducyate | dhyeyāvasthitacittasya sadṛśaḥ pratyayaśca yaḥ

अविक्षिप्त मन से, वही 'ध्यान' कहलाता है। ध्येय में स्थित चित्त की जो सदृश (एकरस) प्रतीति है -

श्लोक 53 (shiva.vayaviya.72.53)

प्रत्ययान्तरनिर्मुक्तः प्रवाहो ध्यानमुच्यते । सर्वमन्यत्परित्यज्य शिव एव शिवङ्करः

pratyayāntaranirmuktaḥ pravāho dhyānamucyate | sarvamanyatparityajya śiva eva śivaṅkaraḥ

अन्य किसी प्रतीति से मुक्त उस प्रवाह को ध्यान कहा जाता है। अन्य सब कुछ त्यागकर, कल्याणकारी शिव ही -

श्लोक 54 (shiva.vayaviya.72.54)

परो ध्येयोऽधिदेवेशः समाप्ताथर्वणी श्रुतिः । तथा शिवा परा ध्येया सर्वभूतगतौ शिवौ

paro dhyeyo'dhideveśaḥ samāptātharvaṇī śrutiḥ | tathā śivā parā dhyeyā sarvabhūtagatau śivau

देवताओं के परम अधिपति ध्येय हैं - यहाँ अथर्व-श्रुति समाप्त हुई। उसी प्रकार परम शिवा भी ध्येय हैं; शिव और शिवा दोनों समस्त प्राणियों में व्याप्त हैं -

श्लोक 55 (shiva.vayaviya.72.55)

तौ श्रुतौ स्मृतिशास्त्रेभ्यः सर्वगौ सर्वदोदितौ । सर्वज्ञौ सततं ध्येयौ नानारूपविभेदतः

tau śrutau smṛtiśāstrebhyaḥ sarvagau sarvadoditau | sarvajñau satataṃ dhyeyau nānārūpavibhedataḥ

श्रुति और स्मृति-शास्त्रों में दोनों को सर्वव्यापी और सर्वत्र उदित कहा गया है; उन दोनों सर्वज्ञों का, चाहे नाना रूपों के भेद से हो या अभेद से, निरन्तर ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 56 (shiva.vayaviya.72.56)

विमुक्तिः प्रत्ययः पूर्वः प्रत्ययश्चाणिमादिकम् । इत्येतद् द्विविधं ज्ञेयं ध्यानस्यास्य प्रयोजनम्

vimuktiḥ pratyayaḥ pūrvaḥ pratyayaścāṇimādikam | ityetad dvividhaṃ jñeyaṃ dhyānasyāsya prayojanam

मुक्ति पहला फल है, और अणिमा आदि सिद्धियाँ दूसरा फल हैं - इस प्रकार ध्यान का यह प्रयोजन दो प्रकार का जानना चाहिए।

श्लोक 57 (shiva.vayaviya.72.57)

ध्याता ध्यानं तथा ध्येयं यच्च ध्यानप्रयोजनम् । एतच्चतुष्टयं ज्ञात्वा योगं युञ्जीत योगवित्

dhyātā dhyānaṃ tathā dhyeyaṃ yacca dhyānaprayojanam | etaccatuṣṭayaṃ jñātvā yogaṃ yuñjīta yogavit

ध्याता, ध्यान, ध्येय, तथा ध्यान का प्रयोजन - इन चारों को जानकर ही योगवेत्ता को योग का अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक 58 (shiva.vayaviya.72.58)

ज्ञानवैराग्यसम्पन्नः श्रद्दधानः क्षमान्वितः । निर्ममश्च सदोत्साही ध्यातेत्थं पुरुषः स्मृतः

jñānavairāgyasampannaḥ śraddadhānaḥ kṣamānvitaḥ | nirmamaśca sadotsāhī dhyātetthaṃ puruṣaḥ smṛtaḥ

ज्ञान और वैराग्य से सम्पन्न, श्रद्धावान्, क्षमा से युक्त, ममता-रहित और सदा उत्साही - ऐसा पुरुष ही ध्याता कहा गया है।

श्लोक 59 (shiva.vayaviya.72.59)

जपाच्छ्रान्तः पुनर्ध्यायेद्ध्यानाच्छ्रान्तः पुनर्जपेत् । जपध्यनाभियुक्तस्य क्षिप्रं योगः प्रसिद्ध्यति

japācchrāntaḥ punardhyāyeddhyānācchrāntaḥ punarjapet | japadhyanābhiyuktasya kṣipraṃ yogaḥ prasiddhyati

जप से थककर पुनः ध्यान करना चाहिए, ध्यान से थककर पुनः जप करना चाहिए; जप और ध्यान दोनों में लगे रहने वाले का योग शीघ्र सिद्ध हो जाता है।

श्लोक 60 (shiva.vayaviya.72.60)

धारणा द्वादशायामा ध्यानं द्वादशधारणम् । ध्यानद्वादशकं यावत्समाधिरभिधीयते

dhāraṇā dvādaśāyāmā dhyānaṃ dvādaśadhāraṇam | dhyānadvādaśakaṃ yāvatsamādhirabhidhīyate

बारह प्राणायाम की एक धारणा होती है, बारह धारणाओं का एक ध्यान होता है, और बारह ध्यानों का जो समुदाय है, वह समाधि कहलाता है।

श्लोक 61 (shiva.vayaviya.72.61)

समाधिर्नाम योगाङ्गमन्तिमं परिकीर्तितम् । समाधिना च सर्वत्र प्रज्ञालोकः प्रवर्तते

samādhirnāma yogāṅgamantimaṃ parikīrtitam | samādhinā ca sarvatra prajñālokaḥ pravartate

समाधि योग का अन्तिम अंग कहा गया है; और समाधि से ही सर्वत्र प्रज्ञा का प्रकाश फैलता है।

श्लोक 62 (shiva.vayaviya.72.62)

यदर्थमात्रनिर्भासं स्तिमितोदधिवत्स्थितम् । स्वरूपशून्यवद्भानं समाधिरभिधीयते

yadarthamātranirbhāsaṃ stimitodadhivatsthitam | svarūpaśūnyavadbhānaṃ samādhirabhidhīyate

जिसमें केवल ध्येय-वस्तु का ही प्रकाश हो, स्थिर सागर के समान स्थिति हो, मानो स्वयं का स्वरूप ही शून्य हो गया हो - ऐसी अवस्था समाधि कहलाती है।

श्लोक 63 (shiva.vayaviya.72.63)

ध्येये मनः समावेश्य पश्येदपि च सुस्थिरम् । निर्वाणानलवद्योगी समाधिस्थः प्रगीयते

dhyeye manaḥ samāveśya paśyedapi ca susthiram | nirvāṇānalavadyogī samādhisthaḥ pragīyate

ध्येय में मन को पूर्णतः लगाकर अत्यंत स्थिर होकर देखने वाला योगी, निर्वाण को प्राप्त अग्नि के समान, समाधिस्थ कहा जाता है।

श्लोक 64 (shiva.vayaviya.72.64)

न शृणोति न चाघ्राति न जल्पति न पश्यति । न च स्पर्शं विजानाति न सङ्कल्पयते मनः

na śṛṇoti na cāghrāti na jalpati na paśyati | na ca sparśaṃ vijānāti na saṅkalpayate manaḥ

वह न सुनता है, न सूँघता है, न बोलता है, न देखता है, न स्पर्श का ज्ञान करता है, और उसका मन कोई संकल्प नहीं करता -

श्लोक 65 (shiva.vayaviya.72.65)

न वाभिमन्यते किञ्चिद् बध्यते न च काष्ठवत् । एवं शिवे विलीनात्मा समाधिस्थ इहोच्यते

na vābhimanyate kiñcid badhyate na ca kāṣṭhavat | evaṃ śive vilīnātmā samādhistha ihocyate

और वह किसी बात का अभिमान नहीं करता, फिर भी लकड़ी के समान जड़ नहीं होता - इस प्रकार शिव में अपने आत्मा को विलीन करने वाला यहाँ समाधिस्थ कहलाता है।

श्लोक 66 (shiva.vayaviya.72.66)

यथा दीपो निवातस्थः स्पन्दते न कदाचन । तथा समाधिनिष्ठोऽपि तस्मान्न विचलेत्सुधीः

yathā dīpo nivātasthaḥ spandate na kadācana | tathā samādhiniṣṭho'pi tasmānna vicaletsudhīḥ

जैसे वायु-रहित स्थान में रखा हुआ दीपक कभी नहीं काँपता, उसी प्रकार समाधि में स्थित बुद्धिमान् भी उससे कभी विचलित नहीं होता।

श्लोक 67 (shiva.vayaviya.72.67)

एवमभ्यसतश्चारं योगिनो योगमुत्तमम् । तदन्तराया नश्यन्ति विज्ञाः सर्वे शनैःशनैः

evamabhyasataścāraṃ yogino yogamuttamam | tadantarāyā naśyanti vijñāḥ sarve śanaiḥśanaiḥ

इस प्रकार निरन्तर अभ्यास करने वाले योगी के लिए यह श्रेष्ठ योग जब सिद्ध होता चलता है, तब उसके सभी विघ्न धीरे-धीरे, जान-बूझकर, नष्ट हो जाते हैं।

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