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वायवीय संहिता · अध्याय 74

शैव-योग

अध्याय 73अध्याय-सूचीअध्याय 75

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.74.1)

उपमन्युरुवाच । श्रीकण्ठनाथं स्मरतां सद्यः सर्वार्थसिद्धयः । प्रसिध्यन्तीति मत्वैके तं वै ध्यायन्ति योगिनः

upamanyuruvāca | śrīkaṇṭhanāthaṃ smaratāṃ sadyaḥ sarvārthasiddhayaḥ | prasidhyantīti matvaike taṃ vai dhyāyanti yoginaḥ

उपमन्यु ने कहा - यह मानकर कि श्रीकण्ठनाथ का स्मरण करने वालों को समस्त प्रयोजनों की सिद्धि तत्काल प्राप्त होती है, कुछ योगीजन केवल उन्हीं का ध्यान करते हैं।

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.74.2)

स्थित्यर्थं मनसः केचित्स्थूलध्यानं प्रकुर्वते । स्थूले तु निश्चलं चेतो भवेत्सूक्ष्मे तु तत्स्थिरम्

sthityarthaṃ manasaḥ kecitsthūladhyānaṃ prakurvate | sthūle tu niścalaṃ ceto bhavetsūkṣme tu tatsthiram

मन की स्थिरता के लिए कुछ लोग स्थूल-ध्यान करते हैं; क्योंकि स्थूल में चित्त के निश्चल हो जाने पर ही वह सूक्ष्म में स्थिर हो पाता है।

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.74.3)

शिवे तु चिन्तिते साक्षात्सर्वाः सिध्यन्ति सिद्धयः । मूर्त्यन्तरेषु ध्यातेषु शिवरूपं विचिन्तयेत्

śive tu cintite sākṣātsarvāḥ sidhyanti siddhayaḥ | mūrtyantareṣu dhyāteṣu śivarūpaṃ vicintayet

साक्षात् शिव का चिन्तन करने पर समस्त सिद्धियाँ सिद्ध हो जाती हैं; अन्य मूर्तियों का ध्यान करते समय भी शिव के रूप का ही चिन्तन करना चाहिए।

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.74.4)

लक्षयेन्मनसः स्थैर्यं तत्तद्ध्यायेत्पुनः पुनः । ध्यानमादौ सविषयं ततो निर्विषयं जगुः

lakṣayenmanasaḥ sthairyaṃ tattaddhyāyetpunaḥ punaḥ | dhyānamādau saviṣayaṃ tato nirviṣayaṃ jaguḥ

मन की स्थिरता को देखकर उसी वस्तु का बार-बार ध्यान करना चाहिए। ध्यान को पहले 'सविषय' और तत्पश्चात् 'निर्विषय' कहा गया है।

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.74.5)

तत्र निर्विषयं ध्यानं नास्तीत्येव सतां मतम् । बुद्धेर्हि सन्ततिः काचिद्ध्यानमित्यभिधीयते

tatra nirviṣayaṃ dhyānaṃ nāstītyeva satāṃ matam | buddherhi santatiḥ kāciddhyānamityabhidhīyate

इसमें सन्तों का मत है कि 'निर्विषय ध्यान' वास्तव में है ही नहीं, क्योंकि ध्यान बुद्धि की एक प्रकार की सन्तति (प्रवाह) ही कहलाता है (जिसका कोई न कोई आलम्बन होना चाहिए)।

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.74.6)

तेन निर्विषया बुद्धिः केवलेह प्रवर्तते । तस्मात्सविषयं ध्यानं बालार्ककिरणाश्रयम्

tena nirviṣayā buddhiḥ kevaleha pravartate | tasmātsaviṣayaṃ dhyānaṃ bālārkakiraṇāśrayam

इसलिए यहाँ 'निर्विषय' बुद्धि केवल सीमित अर्थ में ही प्रवृत्त होती है। अतः सविषय ध्यान का आश्रय उदीयमान सूर्य की किरणों के समान (स्थूल) होता है;

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.74.7)

सूक्ष्माश्रयं निर्विषयं नापरं परमार्थतः । यद्वा सविषयं ध्यानं तत्साकारसमाश्रयम्

sūkṣmāśrayaṃ nirviṣayaṃ nāparaṃ paramārthataḥ | yadvā saviṣayaṃ dhyānaṃ tatsākārasamāśrayam

और निर्विषय ध्यान का आश्रय सूक्ष्म होता है - परमार्थतः वह भी आश्रय-रहित नहीं है। अथवा सविषय ध्यान साकार वस्तु के आश्रय पर होता है,

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.74.8)

निराकारात्मसंवित्तिर्ध्यानं निर्विषयं मतम् । निर्बीजं च सबीजं च तदेव ध्यानमुच्यते

nirākārātmasaṃvittirdhyānaṃ nirviṣayaṃ matam | nirbījaṃ ca sabījaṃ ca tadeva dhyānamucyate

और निराकार आत्मा का ज्ञान ही निर्विषय ध्यान माना गया है। वही ध्यान 'निर्बीज' और 'सबीज' कहलाता है।

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.74.9)

निराकारश्रयत्वेन साकाराश्रयतस्तथा । तस्मात्सविषयं ध्यानमादौ कृत्वा सबीजकम्

nirākāraśrayatvena sākārāśrayatastathā | tasmātsaviṣayaṃ dhyānamādau kṛtvā sabījakam

यह क्रमशः निराकार और साकार के आश्रय के कारण है। इसलिए पहले सबीज सविषय ध्यान का अभ्यास करके,

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.74.10)

अन्ते निर्विषयं कुर्यान्निर्बीजं सर्वसिद्धये । प्राणायामेन सिध्यन्ति देव्याः शान्त्यादयः क्रमात्

ante nirviṣayaṃ kuryānnirbījaṃ sarvasiddhaye | prāṇāyāmena sidhyanti devyāḥ śāntyādayaḥ kramāt

अन्त में समस्त सिद्धि के लिए निर्बीज निर्विषय ध्यान करना चाहिए। प्राणायाम से क्रमशः शान्ति आदि देवियाँ सिद्ध होती हैं -

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.74.11)

शान्तिः प्रशान्तिर्दीप्तिश्च प्रसादश्च ततः परम् । शमः सर्वापदां चैव शान्तिरित्यभिधीयते

śāntiḥ praśāntirdīptiśca prasādaśca tataḥ param | śamaḥ sarvāpadāṃ caiva śāntirityabhidhīyate

शान्ति, प्रशान्ति, दीप्ति, और उससे आगे प्रसाद। समस्त आपत्तियों का शमन ही 'शान्ति' कहलाता है।

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.74.12)

तमसोऽन्तर्बहिर्नाशः प्रशान्तिः परिगीयते । बहिरन्तःप्रकाशो यो दीप्तिरित्यभिधीयते

tamaso'ntarbahirnāśaḥ praśāntiḥ parigīyate | bahirantaḥprakāśo yo dīptirityabhidhīyate

भीतर और बाहर के अन्धकार का नाश 'प्रशान्ति' कहलाती है। जो बाहर और भीतर दोनों में प्रकाश है, वह 'दीप्ति' कहलाता है।

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.74.13)

स्वस्थता या तु सा बुद्धेः प्रसादः परिकीर्तितः । कारणानि च सर्वाणि सबाह्याभ्यन्तराणि च

svasthatā yā tu sā buddheḥ prasādaḥ parikīrtitaḥ | kāraṇāni ca sarvāṇi sabāhyābhyantarāṇi ca

बुद्धि की जो स्वस्थता है, वह 'प्रसाद' कहलाती है। और बाह्य तथा आभ्यन्तर सभी कारण -

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.74.14)

बुद्धेः प्रसादतः क्षिप्रं प्रसन्नानि भवन्त्युत । ध्याता ध्यानं तथा ध्येयं यद्वा ध्यानप्रयोजनम् । एतच्चतुष्टयं ज्ञात्वा ध्याता ध्यानं समाचरेत्

buddheḥ prasādataḥ kṣipraṃ prasannāni bhavantyuta | dhyātā dhyānaṃ tathā dhyeyaṃ yadvā dhyānaprayojanam | etaccatuṣṭayaṃ jñātvā dhyātā dhyānaṃ samācaret

बुद्धि के प्रसाद से शीघ्र ही अनुकूल हो जाते हैं। ध्याता, ध्यान, ध्येय, तथा ध्यान का प्रयोजन - इन चारों को जानकर ध्याता को ध्यान करना चाहिए।

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.74.15)

ज्ञानवैराग्यसम्पन्नो नित्यमव्यग्रमानसः । श्रद्दधानः प्रसन्नात्मा ध्याता सद्भिरुदाहृतः

jñānavairāgyasampanno nityamavyagramānasaḥ | śraddadhānaḥ prasannātmā dhyātā sadbhirudāhṛtaḥ

ज्ञान और वैराग्य से सम्पन्न, नित्य अव्यग्रचित्त, श्रद्धावान् और प्रसन्नात्मा - ऐसा ही ध्याता सज्जनों द्वारा कहा गया है।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.74.16)

ध्यै चिन्तायां स्मृतो धातुः शिवचिन्ता मुहुर्मुहुः

dhyai cintāyāṃ smṛto dhātuḥ śivacintā muhurmuhuḥ

'ध्यै' धातु चिन्ता के अर्थ में स्मृत है; बार-बार शिव का चिन्तन ही (ध्यान है)।

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.74.17)

योगाभ्यासस्तथाल्पोऽपि यथा पापं विनाशयेत् । ध्यायतः क्षणमात्रं वा श्रद्धया परमेश्वरम्

yogābhyāsastathālpo'pi yathā pāpaṃ vināśayet | dhyāyataḥ kṣaṇamātraṃ vā śraddhayā parameśvaram

अल्प योगाभ्यास भी जैसे पाप का नाश कर देता है, उसी प्रकार श्रद्धापूर्वक क्षणभर भी परमेश्वर का ध्यान करने से -

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.74.18)

अव्याक्षिप्तेन मनसा ध्यानमित्यभिधीयते

avyākṣiptena manasā dhyānamityabhidhīyate

अविक्षिप्त मन से जो होता है, वही ध्यान कहलाता है।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.74.19)

बुद्धिप्रवाहरूपस्य ध्यानस्यास्यावलम्बनम् । ध्येयमित्युच्यते सद्भिस्तच्च साम्बः स्वयं शिवः

buddhipravāharūpasya dhyānasyāsyāvalambanam | dhyeyamityucyate sadbhistacca sāmbaḥ svayaṃ śivaḥ

बुद्धि के प्रवाह-स्वरूप इस ध्यान का जो आलम्बन है, उसे सज्जन 'ध्येय' कहते हैं; और वह साक्षात् अम्बा-सहित शिव ही हैं।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.74.20)

विमुक्तिप्रत्ययं पूर्णमैश्वर्यं चाणिमादिकम् । शिवध्यानस्य पूर्णस्य साक्षादुक्तं प्रयोजनम्

vimuktipratyayaṃ pūrṇamaiśvaryaṃ cāṇimādikam | śivadhyānasya pūrṇasya sākṣāduktaṃ prayojanam

मुक्ति पहला फल है, और अणिमा आदि पूर्ण ऐश्वर्य दूसरा - यही पूर्ण शिव-ध्यान का साक्षात् प्रयोजन कहा गया है।

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.74.21)

यस्मात्सौख्यं च मोक्षं च ध्यानादुभयमाप्नुयात् । तस्मात्सर्वं परित्यज्य ध्यानयुक्तो भवेन्नरः

yasmātsaukhyaṃ ca mokṣaṃ ca dhyānādubhayamāpnuyāt | tasmātsarvaṃ parityajya dhyānayukto bhavennaraḥ

चूँकि ध्यान से सुख और मोक्ष दोनों ही प्राप्त होते हैं, इसलिए सब कुछ त्यागकर मनुष्य को ध्यान में लगे रहना चाहिए।

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.74.22)

नास्ति ध्यानं विना ज्ञानं नास्ति ध्यानमयोगिनः । ध्यानं ज्ञानं च यस्यास्ति तीर्णस्तेन भवार्णवः

nāsti dhyānaṃ vinā jñānaṃ nāsti dhyānamayoginaḥ | dhyānaṃ jñānaṃ ca yasyāsti tīrṇastena bhavārṇavaḥ

ध्यान के बिना ज्ञान नहीं होता, अयोगी के लिए ध्यान नहीं होता; जिसके पास ध्यान और ज्ञान दोनों हैं, उसी के द्वारा यह भव-सागर तिर लिया जाता है।

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.74.23)

ज्ञानं प्रसन्नमेकाग्रमशेषोपाधिवर्जितम् । योगाभ्यासेन युक्तस्य योगिनस्वेव सिध्यति

jñānaṃ prasannamekāgramaśeṣopādhivarjitam | yogābhyāsena yuktasya yoginasveva sidhyati

प्रसन्न, एकाग्र और समस्त उपाधियों से रहित ज्ञान, योगाभ्यास में लगे योगी को ही सिद्ध होता है।

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.74.24)

प्रक्षीणाशेषपापानां ज्ञाने ध्याने भवेन्मतिः । पापोपहतबुद्धीनां तद्वार्तापि सुदुर्लभा

prakṣīṇāśeṣapāpānāṃ jñāne dhyāne bhavenmatiḥ | pāpopahatabuddhīnāṃ tadvārtāpi sudurlabhā

जिनके समस्त पाप क्षीण हो चुके हैं, उन्हीं की बुद्धि ज्ञान और ध्यान में लगती है; पाप से आहत बुद्धि वालों के लिए तो इसकी चर्चा भी अत्यंत दुर्लभ है।

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.74.25)

यथा वह्निर्महादीप्तः शुष्कमार्द्रं च निर्दहेत् । तथा शुभाशुभं कर्म ध्यानाग्निर्दहते क्षणात्

yathā vahnirmahādīptaḥ śuṣkamārdraṃ ca nirdahet | tathā śubhāśubhaṃ karma dhyānāgnirdahate kṣaṇāt

जैसे प्रज्वलित अग्नि सूखी और गीली दोनों वस्तुओं को जला देती है, उसी प्रकार ध्यान की अग्नि शुभ और अशुभ दोनों प्रकार के कर्मों को क्षणभर में भस्म कर देती है।

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.74.26)

अत्यल्पोऽपि यथा दीपः सुमहन्नाशयेत्तमः । योगाभ्यासस्तथाल्पोऽपि महापापं विनाशयेत्

atyalpo'pi yathā dīpaḥ sumahannāśayettamaḥ | yogābhyāsastathālpo'pi mahāpāpaṃ vināśayet

जैसे अत्यंत छोटा दीपक भी घनघोर अन्धकार का नाश कर देता है, उसी प्रकार अल्प योगाभ्यास भी महापाप का नाश कर देता है।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.74.27)

ध्यायतः क्षणमात्रं वा श्रद्धया परमेश्वरम् । यद्भवेत् सुमहच्छ्रेयस्तस्यान्तो नैव विद्यते

dhyāyataḥ kṣaṇamātraṃ vā śraddhayā parameśvaram | yadbhavet sumahacchreyastasyānto naiva vidyate

श्रद्धापूर्वक क्षणभर भी परमेश्वर का ध्यान करने वाले को जो महान् कल्याण प्राप्त होता है, उसका सचमुच कोई अन्त नहीं है।

श्लोक 28 (shiva.vayaviya.74.28)

नास्ति ध्यानसमं तीर्थं नास्ति ध्यानसमं तपः । नास्ति ध्यानसमो यज्ञस्तस्माद्ध्यानं समाचरेत्

nāsti dhyānasamaṃ tīrthaṃ nāsti dhyānasamaṃ tapaḥ | nāsti dhyānasamo yajñastasmāddhyānaṃ samācaret

ध्यान के समान कोई तीर्थ नहीं है, ध्यान के समान कोई तप नहीं है, ध्यान के समान कोई यज्ञ नहीं है - इसलिए ध्यान का ही आचरण करना चाहिए।

श्लोक 29 (shiva.vayaviya.74.29)

तीर्थानि तोयपूर्णानि देवान्पाषाणमृण्मयान् । योगिनो न प्रपद्यन्ते स्वात्मप्रत्ययकारणात्

tīrthāni toyapūrṇāni devānpāṣāṇamṛṇmayān | yogino na prapadyante svātmapratyayakāraṇāt

योगीजन अपनी आत्मा के साक्षात् अनुभव के कारण, केवल जल से भरे तीर्थों की तथा पत्थर-मिट्टी से बने देवताओं की शरण नहीं लेते।

श्लोक 30 (shiva.vayaviya.74.30)

योगिनां च वपुः सूक्ष्मं भवेत्प्रत्यक्षमैश्वरम् । यथा स्थूलमयुक्तानां मृत्काष्ठाद्यैः प्रकल्पितम्

yogināṃ ca vapuḥ sūkṣmaṃ bhavetpratyakṣamaiśvaram | yathā sthūlamayuktānāṃ mṛtkāṣṭhādyaiḥ prakalpitam

योगियों के लिए ईश्वर का सूक्ष्म रूप उतना ही प्रत्यक्ष होता है, जितना अयुक्त लोगों के लिए मिट्टी-काष्ठ आदि से बनाया गया स्थूल रूप।

श्लोक 31 (shiva.vayaviya.74.31)

यथेहान्तश्चरा राज्ञः प्रियाः स्युर्न बहिश्चराः । तथान्तर्ध्याननिरताः प्रियाश्शम्भोर्न कर्मिणः

yathehāntaścarā rājñaḥ priyāḥ syurna bahiścarāḥ | tathāntardhyānaniratāḥ priyāśśambhorna karmiṇaḥ

जैसे राजा के अन्तःपुर में विचरण करने वाले ही उसे प्रिय होते हैं, बाहर विचरण करने वाले नहीं, उसी प्रकार भीतर ध्यान में रत रहने वाले ही शम्भु को प्रिय हैं, कर्मकाण्डी नहीं।

श्लोक 32 (shiva.vayaviya.74.32)

बहिष्करा यथा लोके नातीव फलभोगिनः । दृष्ट्वा नरेन्द्रभवने तद्वदत्रापि कर्मिणः

bahiṣkarā yathā loke nātīva phalabhoginaḥ | dṛṣṭvā narendrabhavane tadvadatrāpi karmiṇaḥ

जैसे राजभवन में देखा जाता है कि बाहर सेवा करने वाले अत्यधिक फल नहीं पाते, उसी प्रकार यहाँ भी कर्मकाण्डी (उतना फल नहीं पाते)।

श्लोक 33 (shiva.vayaviya.74.33)

यद्यन्तरा विपद्यन्ते ज्ञानयोगार्थमुद्यतः । योगस्योद्योगमात्रेण रुद्रलोकं गमिष्यति

yadyantarā vipadyante jñānayogārthamudyataḥ | yogasyodyogamātreṇa rudralokaṃ gamiṣyati

यदि ज्ञान-योग के लिए उद्यत व्यक्ति मध्य में ही मृत्यु को प्राप्त हो जाए, तो योग के लिए किए गए उद्यम मात्र से ही वह रुद्रलोक को प्राप्त होगा।

श्लोक 34 (shiva.vayaviya.74.34)

अनुभूय सुखं तत्र स जातो योगिनां कुले । ज्ञानयोगं पुनर्लब्ध्वा संसारमतिवर्तते

anubhūya sukhaṃ tatra sa jāto yogināṃ kule | jñānayogaṃ punarlabdhvā saṃsāramativartate

वहाँ सुख का अनुभव करके वह योगियों के कुल में जन्म लेता है; और पुनः ज्ञान-योग प्राप्त करके संसार को सर्वथा पार कर जाता है।

श्लोक 35 (shiva.vayaviya.74.35)

जिज्ञासुरपि योगस्य यां गतिं लभते नरः । न तां गतिमवाप्नोति सर्वैरपि महामखैः

jijñāsurapi yogasya yāṃ gatiṃ labhate naraḥ | na tāṃ gatimavāpnoti sarvairapi mahāmakhaiḥ

योग को जानने की इच्छा मात्र से भी मनुष्य जिस गति को प्राप्त करता है, वह गति समस्त महान् यज्ञों से भी प्राप्त नहीं होती।

श्लोक 36 (shiva.vayaviya.74.36)

द्विजानां वेदविदुषां कोटिं सम्पूज्य यत्फलम् । भिक्षामात्रप्रदानेन तत्फलं शिवयोगिने

dvijānāṃ vedaviduṣāṃ koṭiṃ sampūjya yatphalam | bhikṣāmātrapradānena tatphalaṃ śivayogine

वेदवेत्ता करोड़ों द्विजों की विधिवत् पूजा करने से जो फल मिलता है, वह फल केवल एक शिव-योगी को भिक्षा देने मात्र से मिल जाता है।

श्लोक 37 (shiva.vayaviya.74.37)

यज्ञाग्निहोत्रदानेषु तीर्थहोमेषु यत्फलम् । योगिनामन्नदानेन तत्समस्तं फलं लभेत्

yajñāgnihotradāneṣu tīrthahomeṣu yatphalam | yogināmannadānena tatsamastaṃ phalaṃ labhet

यज्ञ, अग्निहोत्र, दान, तीर्थ और होम में जो फल है, वह सम्पूर्ण फल योगियों को अन्न-दान करने से प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 38 (shiva.vayaviya.74.38)

ये चापवादं कुर्वन्ति विमूढाः शिवयोगिनाम् । श्रोतृभिस्ते प्रपद्यन्ते नरकेष्वामहीक्षयात्

ye cāpavādaṃ kurvanti vimūḍhāḥ śivayoginām | śrotṛbhiste prapadyante narakeṣvāmahīkṣayāt

जो मूढ़ लोग शिव-योगियों की निन्दा करते हैं, वे उसे सुनने वालों सहित पृथ्वी के रहने तक नरकों में पड़े रहते हैं।

श्लोक 39 (shiva.vayaviya.74.39)

सति श्रोतरि वक्ता स्यादपवादस्य योगिनाम् । तस्माच्छ्रोता च पापीयान्दण्ड्यः सुमहतां मतः । ये पुनः सततं भक्त्या भजन्ति शवयोगिनः

sati śrotari vaktā syādapavādasya yoginām | tasmācchrotā ca pāpīyāndaṇḍyaḥ sumahatāṃ mataḥ | ye punaḥ satataṃ bhaktyā bhajanti śavayoginaḥ

श्रोता के होने पर ही योगियों की निन्दा करने वाला वक्ता उत्पन्न होता है; इसलिए श्रोता को भी महर्षियों ने वक्ता से भी अधिक पापी और दण्डनीय माना है। परन्तु जो लोग सदा भक्तिपूर्वक शिव-योगियों की सेवा करते हैं -

श्लोक 40 (shiva.vayaviya.74.40)

ते विदन्ति महाभोगानन्ते योगं च शाङ्करम् । भोगार्थिभिर्नरैस्तस्मात्सम्पूज्याः शिवयोगिनः

te vidanti mahābhogānante yogaṃ ca śāṅkaram | bhogārthibhirnaraistasmātsampūjyāḥ śivayoginaḥ

वे इस लोक में महान् भोगों को जानते हैं और अन्त में शांकर योग को भी प्राप्त करते हैं। इसलिए भोग चाहने वाले मनुष्यों को भी शिव-योगियों की पूजा करनी चाहिए -

श्लोक 41 (shiva.vayaviya.74.41)

प्रतिश्रयान्नपानाद्यैः शय्याप्रावरणादिभिः । योगधर्मः ससारत्वादभेद्यः पापमुद्गरैः

pratiśrayānnapānādyaiḥ śayyāprāvaraṇādibhiḥ | yogadharmaḥ sasāratvādabhedyaḥ pāpamudgaraiḥ

आश्रय, अन्न-पान आदि, शय्या और आच्छादन आदि से। योग-धर्म अपने सारभूत स्वभाव के कारण पाप के मुद्गरों से भी अभेद्य है,

श्लोक 42 (shiva.vayaviya.74.42)

वज्रतन्दुलवज्ज्ञेयं तथा पापेन योगिनः । न लिप्यन्ते च तापौघैः पद्मपत्रं यथाम्भसा

vajratandulavajjñeyaṃ tathā pāpena yoginaḥ | na lipyante ca tāpaughaiḥ padmapatraṃ yathāmbhasā

जैसे हीरे का चावल (वज्र-कण) अभेद्य होता है। उसी प्रकार योगीजन पाप से लिप्त नहीं होते, जैसे कमल-पत्र जल से गीला नहीं होता।

श्लोक 43 (shiva.vayaviya.74.43)

यस्मिन्देशे वसेन्नित्यं शिवयोगरतो मुनिः । सोऽपि देशो भवेत्पूतः स पूत इति किं पुनः

yasmindeśe vasennityaṃ śivayogarato muniḥ | so'pi deśo bhavetpūtaḥ sa pūta iti kiṃ punaḥ

जिस देश में शिव-योग में रत कोई मुनि नित्य निवास करता हो, वह देश भी पवित्र हो जाता है - फिर वह स्वयं पवित्र हो, इसमें क्या कहना!

श्लोक 44 (shiva.vayaviya.74.44)

तस्मात्सर्वं परित्यज्य कृत्यमन्यद्विचक्षणः । सर्वदुःखप्रहाणाय शिवयोगं समभ्यसेत्

tasmātsarvaṃ parityajya kṛtyamanyadvicakṣaṇaḥ | sarvaduḥkhaprahāṇāya śivayogaṃ samabhyaset

इसलिए विवेकी पुरुष को अन्य समस्त कर्तव्य त्यागकर, समस्त दुःखों के नाश के लिए शिव-योग का ही अभ्यास करना चाहिए।

श्लोक 45 (shiva.vayaviya.74.45)

सिद्धयोगफलो योगी लोकानां हितकाम्यया । भोगान्भुक्त्वा यथाकामं विहरेद्वात्र वर्तताम्

siddhayogaphalo yogī lokānāṃ hitakāmyayā | bhogānbhuktvā yathākāmaṃ viharedvātra vartatām

योग-सिद्धि के फल को प्राप्त योगी, लोक-हित की कामना से, इच्छानुसार भोगों को भोगकर विचरण भी कर सकता है अथवा यहीं (एकान्त में) निवास कर सकता है।

श्लोक 46 (shiva.vayaviya.74.46)

अथवा क्षुद्रमित्येव मत्वा वैषयिकं सुखम् । त्यक्त्वा विरागयोगेन स्वेच्छया कर्म मुच्यताम्

athavā kṣudramityeva matvā vaiṣayikaṃ sukham | tyaktvā virāgayogena svecchayā karma mucyatām

अथवा विषय-सुख को तुच्छ मानकर, वैराग्य-योग से उसे त्यागकर, अपनी इच्छा से ही कर्मों से मुक्त हो जाए।

श्लोक 47 (shiva.vayaviya.74.47)

यस्त्वासन्नां मृतिं मर्त्यो दृष्ट्वारिष्टं च भूयसा । स योगारम्भनिरतः शिवक्षेत्रं समाश्रयेत्

yastvāsannāṃ mṛtiṃ martyo dṛṣṭvāriṣṭaṃ ca bhūyasā | sa yogārambhanirataḥ śivakṣetraṃ samāśrayet

परन्तु जो मरणशील पुरुष अपनी निकट आती मृत्यु को और उसके अशुभ लक्षणों को स्पष्ट रूप से देख ले, वह योग आरम्भ करने में रत होकर शिव-क्षेत्र की शरण ले।

श्लोक 48 (shiva.vayaviya.74.48)

स तत्र निवसन्नेव यदि धीरमना नरः । प्राणान् विनापि रोगाद्यैः स्वयमेव परित्यजेत्

sa tatra nivasanneva yadi dhīramanā naraḥ | prāṇān vināpi rogādyaiḥ svayameva parityajet

वहाँ निवास करते हुए यदि वह धैर्यवान् पुरुष रोग आदि के बिना ही हो, तो वह स्वयं ही अपने प्राणों का त्याग कर सकता है।

श्लोक 49 (shiva.vayaviya.74.49)

कृत्वाप्यनशनं चैव हुत्वा चाङ्गं शिवानले । क्षिप्त्वा वा शिवतीर्थेषु स्वदेहमवगाहनात्

kṛtvāpyanaśanaṃ caiva hutvā cāṅgaṃ śivānale | kṣiptvā vā śivatīrtheṣu svadehamavagāhanāt

अनशन करके, अथवा अपने अंग को शिव की अग्नि में आहुति देकर, अथवा शिव-तीर्थों में अपने शरीर को डुबोकर,

श्लोक 50 (shiva.vayaviya.74.50)

शिवशास्त्रोक्तविधिवत्प्राणान्यस्तु परित्यजेत् । सद्य एव विमुच्येत नात्र कार्या विचारणा

śivaśāstroktavidhivatprāṇānyastu parityajet | sadya eva vimucyeta nātra kāryā vicāraṇā

जो शिव-शास्त्रोक्त विधि के अनुसार अपने प्राणों का त्याग करता है, वह तत्काल ही मुक्त हो जाता है - इसमें कोई विचार करने की आवश्यकता नहीं है।

श्लोक 51 (shiva.vayaviya.74.51)

रोगाद्यैर्वाथ विवशः शिवक्षेत्रं समाश्रितः । म्रियते यदि सोऽप्येवं मुच्यते नात्र संशयः

rogādyairvātha vivaśaḥ śivakṣetraṃ samāśritaḥ | mriyate yadi so'pyevaṃ mucyate nātra saṃśayaḥ

अथवा यदि रोग आदि से विवश होकर, शिव-क्षेत्र की शरण लिया हुआ वह पुरुष वहीं मर जाए, तो वह भी इसी प्रकार मुक्त होता है - इसमें कोई संशय नहीं।

श्लोक 52 (shiva.vayaviya.74.52)

यथा हि मरणं श्रेष्ठमुशन्त्यनशनादिभिः । शास्त्रविश्रम्भधीरेण मनसा क्रियते यतः

yathā hi maraṇaṃ śreṣṭhamuśantyanaśanādibhiḥ | śāstraviśrambhadhīreṇa manasā kriyate yataḥ

क्योंकि अनशन आदि से होने वाली मृत्यु को श्रेष्ठ माना गया है, जो शास्त्रों में विश्वासपूर्ण धैर्यवान् मन से की जाती है।

श्लोक 53 (shiva.vayaviya.74.53)

शिवनिन्दारतं हत्वा पीडितः स्वयमेव वा । यस्त्यजेद्दुस्त्यजान्प्राणान्न स भूयः प्रजायते

śivanindārataṃ hatvā pīḍitaḥ svayameva vā | yastyajeddustyajānprāṇānna sa bhūyaḥ prajāyate

जो व्यक्ति शिव-निन्दा में रत किसी को मारकर, अथवा स्वयं (उसके द्वारा) पीड़ित होकर, अपने दुष्त्याज्य प्राणों का त्याग करता है, वह पुनः जन्म नहीं लेता।

श्लोक 54 (shiva.vayaviya.74.54)

शिवनिन्दारतं हन्तुमशक्तो यः स्वयं मृतः । सद्य एव प्रमुच्येत त्रिःसप्तकुलसंयुतः

śivanindārataṃ hantumaśakto yaḥ svayaṃ mṛtaḥ | sadya eva pramucyeta triḥsaptakulasaṃyutaḥ

जो शिव-निन्दक को मारने में असमर्थ होकर स्वयं मर जाता है, वह तत्काल ही अपने इक्कीस कुलों सहित मुक्त हो जाता है।

श्लोक 55 (shiva.vayaviya.74.55)

शिवार्थे यस्त्यजेत्प्राणान् शिवभक्तार्थमेव वा । न तेन सदृशः कश्चिन्मुक्तिमार्गस्थितो नरः

śivārthe yastyajetprāṇān śivabhaktārthameva vā | na tena sadṛśaḥ kaścinmuktimārgasthito naraḥ

जो शिव के लिए अथवा शिव-भक्त के लिए अपने प्राणों का त्याग करता है, मुक्ति-मार्ग पर स्थित मनुष्यों में उसके समान कोई नहीं है।

श्लोक 56 (shiva.vayaviya.74.56)

तस्माच्छीघ्रतरा मुक्तिस्तस्य संसारमण्डलात् । एतेष्वन्यतमोपायं कथमप्यवलम्ब्य वा

tasmācchīghratarā muktistasya saṃsāramaṇḍalāt | eteṣvanyatamopāyaṃ kathamapyavalambya vā

इसलिए उसकी मुक्ति संसार-चक्र से अत्यंत शीघ्र होती है। अथवा इन उपायों में से किसी एक का किसी प्रकार अवलम्बन लेकर,

श्लोक 57 (shiva.vayaviya.74.57)

षडध्वशुद्धिं विधिवत्प्राप्तो वा म्रियते यदि । पशूनामिव तस्येह न कुर्यादौर्ध्वदैहिकम्

ṣaḍadhvaśuddhiṃ vidhivatprāpto vā mriyate yadi | paśūnāmiva tasyeha na kuryādaurdhvadaihikam

जो विधिवत् षडध्वा की शुद्धि प्राप्त कर चुका हो, यदि वह मर जाए, तो पशुओं की भाँति उसका ऊर्ध्वदैहिक (अन्त्येष्टि) संस्कार नहीं करना चाहिए।

श्लोक 58 (shiva.vayaviya.74.58)

नैवाशौचं प्रपद्येत तत्पुत्रादिर्विशेषतः । शिवचारार्थमथवा शिवविद्यार्थमेव वा । खनेद्वा भुवि तद्देहं दहेद्वा शुचिनाग्निना

naivāśaucaṃ prapadyeta tatputrādirviśeṣataḥ | śivacārārthamathavā śivavidyārthameva vā | khanedvā bhuvi taddehaṃ dahedvā śucināgninā

उसके पुत्र आदि को विशेष रूप से किसी प्रकार का अशौच (सूतक) नहीं मानना चाहिए। शिव-आचार अथवा शिव-विद्या के निमित्त, उसके शरीर को भूमि में गाड़ देना चाहिए, अथवा शुद्ध अग्नि से दाह-संस्कार करना चाहिए,

श्लोक 59 (shiva.vayaviya.74.59)

क्षिपेद्वाप्सु शिवास्वेव त्यजेद्वा काष्ठलोष्टवत् । अथैनमपि चोद्दिश्य कर्म चेत्कर्तुमीप्सितम्

kṣipedvāpsu śivāsveva tyajedvā kāṣṭhaloṣṭavat | athainamapi coddiśya karma cetkartumīpsitam

अथवा शिव के ही तीर्थ-जल में विसर्जित कर देना चाहिए, अथवा काष्ठ या मिट्टी के ढेले के समान त्याग देना चाहिए। और यदि उसके निमित्त कोई कर्म करना अभीष्ट हो,

श्लोक 60 (shiva.vayaviya.74.60)

कल्याणमेव कुर्वीत शक्त्या भक्तांश्च तर्पयेत् । धनं तस्य भजेच्छैवः शैवी चेत्तस्य सन्ततिः । नास्ति चेत्तच्छिवे दद्यान्नदद्यात्पशुसन्ततिः

kalyāṇameva kurvīta śaktyā bhaktāṃśca tarpayet | dhanaṃ tasya bhajecchaivaḥ śaivī cettasya santatiḥ | nāsti cettacchive dadyānnadadyātpaśusantatiḥ

तो केवल कल्याणकारी कर्म ही करना चाहिए और यथाशक्ति भक्तों को तृप्त करना चाहिए। उसके धन को शैव भक्त ही ग्रहण करे, यदि उसकी सन्तान शैव हो; यदि न हो तो वह शिव को ही अर्पित कर देना चाहिए, पशु-भाव वाली सन्तान को नहीं देना चाहिए।

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