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वायवीय संहिता · अध्याय 75

नैमिषेय ऋषियों की यात्रा

अध्याय 74अध्याय-सूचीअध्याय 76

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.75.1)

सूत उवाच । इति स विजितमन्योर्यादवेनोपमन्यो\- रधिगतमभिधाय ज्ञानयोगं मुनिभ्यः । प्रणतिमुपगतेभ्यस्तेभ्य उद्भावितात्मा सपदि वियति वायुः सायमन्तर्हितोऽभूत्

sūta uvāca | iti sa vijitamanyoryādavenopamanyo\- radhigatamabhidhāya jñānayogaṃ munibhyaḥ | praṇatimupagatebhyastebhya udbhāvitātmā sapadi viyati vāyuḥ sāyamantarhito'bhūt

सूत ने कहा - इस प्रकार, यादव कृष्ण को - जिनका मोह पहले ही दूर हो चुका था - उपमन्यु से प्राप्त ज्ञान-योग को मुनियों से कहकर, तथा प्रणाम करने वाले उन मुनियों के समक्ष अपना स्वरूप प्रकट करके, वायु सन्ध्या-समय आकाश में तत्काल अन्तर्धान हो गए।

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.75.2)

ततः प्रभातसमये नैमिषीयास्तपोधनाः । सत्रान्तेऽवभृथं कर्तुं सर्व एव समुद्ययुः

tataḥ prabhātasamaye naimiṣīyāstapodhanāḥ | satrānte'vabhṛthaṃ kartuṃ sarva eva samudyayuḥ

तत्पश्चात् प्रातःकाल नैमिषवासी तपस्वी सभी लोग यज्ञ-सत्र के अन्त में अवभृथ-स्नान करने के लिए तत्पर हो गए।

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.75.3)

तदा ब्रह्मसमादेशाद्देवी साक्षात्सरस्वती । प्रसन्ना स्वादुसलिला प्रावर्तत नदी शुभा

tadā brahmasamādeśāddevī sākṣātsarasvatī | prasannā svādusalilā prāvartata nadī śubhā

तब ब्रह्मा की आज्ञा से साक्षात् सरस्वती देवी, प्रसन्न, मधुर जल वाली, वहाँ एक शुभ नदी के रूप में प्रवाहित हुईं।

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.75.4)

सरस्वतीं नदीं दृष्ट्वा मुनयो हृष्टमानसाः । समाप्य सत्रं प्रारब्धं चक्रुस्तत्रावगाहनम्

sarasvatīṃ nadīṃ dṛṣṭvā munayo hṛṣṭamānasāḥ | samāpya satraṃ prārabdhaṃ cakrustatrāvagāhanam

सरस्वती नदी को देखकर प्रसन्नचित्त मुनियों ने अपने चिरारम्भ यज्ञ-सत्र को पूर्ण करके वहाँ उसमें स्नान किया।

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.75.5)

अथ सन्तर्प्य देवादींस्तदीयैः सलिलैः शिवैः । स्मरन्तः पूर्ववृत्तान्तं ययुर्वाराणसीं प्रति

atha santarpya devādīṃstadīyaiḥ salilaiḥ śivaiḥ | smarantaḥ pūrvavṛttāntaṃ yayurvārāṇasīṃ prati

फिर उसके मंगलमय जल से देवताओं आदि को तृप्त करके, पूर्व की घटनाओं का स्मरण करते हुए, वे वाराणसी की ओर चल पड़े।

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.75.6)

तदा ते हिमवत्पादात्पन्ततीं दक्षिणामुखीम् । दृष्ट्वा भागीरथीं तत्र स्नात्वा तत्तीरतो ययुः

tadā te himavatpādātpantatīṃ dakṣiṇāmukhīm | dṛṣṭvā bhāgīrathīṃ tatra snātvā tattīrato yayuḥ

वहाँ उन्होंने हिमालय के पाद-भाग से दक्षिणाभिमुख बहती हुई भागीरथी को देखा; उसमें स्नान करके वे उसके तट से आगे बढ़े।

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.75.7)

ततो वाराणसीं प्राप्य मुदिताः सर्व एव ते । तदोत्तरप्रवाहायां गङ्गायामवगाह्य च

tato vārāṇasīṃ prāpya muditāḥ sarva eva te | tadottarapravāhāyāṃ gaṅgāyāmavagāhya ca

फिर वाराणसी पहुँचकर, सब लोग प्रसन्न होकर, वहाँ उत्तर-दिशा में बहती गंगा में स्नान करके,

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.75.8)

अविमुक्तेश्वरं लिङ्गं दृष्ट्वाभ्यर्च्य विधानतः । प्रयातुमुद्यतास्तत्र ददृशुर्दिवि भास्वरम्

avimukteśvaraṃ liṅgaṃ dṛṣṭvābhyarcya vidhānataḥ | prayātumudyatāstatra dadṛśurdivi bhāsvaram

अविमुक्तेश्वर लिंग के दर्शन करके और विधिपूर्वक उनकी पूजा करके, जब वहाँ से जाने के लिए उद्यत हुए, तब उन्होंने आकाश में एक प्रकाशमान वस्तु देखी,

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.75.9)

सूर्यकोटिप्रतीकाशं तेजोदिव्यं महाद्भुतम् । आत्मप्रभावितानेन व्याप्तसर्वदिगन्तरम्

sūryakoṭipratīkāśaṃ tejodivyaṃ mahādbhutam | ātmaprabhāvitānena vyāptasarvadigantaram

जो करोड़ों सूर्यों के समान, दिव्य, अत्यंत अद्भुत तेजोमय था, जिसकी अपनी ही प्रभा से समस्त दिशाएँ व्याप्त हो गई थीं।

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.75.10)

अथ पाशुपताः सिद्धाः भस्मसञ्छन्नविग्रहाः । मुनयोऽभ्येत्य शतशो लीनाः स्युस्तत्र तेजसि

atha pāśupatāḥ siddhāḥ bhasmasañchannavigrahāḥ | munayo'bhyetya śataśo līnāḥ syustatra tejasi

तब भस्म से आच्छादित शरीर वाले पाशुपत सिद्ध मुनि सैकड़ों की संख्या में आगे बढ़कर उस तेज में लीन हो गए।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.75.11)

तथा विलीयमानेषु तपस्विषु महात्मसु । सद्यस्तिरोदधे तेजस्तदद्भुतमिवाभवत्

tathā vilīyamāneṣu tapasviṣu mahātmasu | sadyastirodadhe tejastadadbhutamivābhavat

उन महात्मा तपस्वियों के इस प्रकार लीन हो जाने पर वह तेज तत्काल ही अन्तर्धान हो गया - यह मानो अद्भुत घटना थी।

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.75.12)

तद् दृष्ट्वा महदाश्चर्यं नैमिषीया महर्षयः । किमेतदित्यजानन्तो ययुर्ब्रह्मवनं प्रति

tad dṛṣṭvā mahadāścaryaṃ naimiṣīyā maharṣayaḥ | kimetadityajānanto yayurbrahmavanaṃ prati

इस महान् आश्चर्य को देखकर नैमिषवासी महर्षि, 'यह क्या है' यह न जानते हुए, ब्रह्मा के वन की ओर चल पड़े।

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.75.13)

प्रागेवैषां तु गमनात्पवनो लोकपावनः । दर्शनं नैमिषीयाणां संवादस्तैर्महात्मनः

prāgevaiṣāṃ tu gamanātpavano lokapāvanaḥ | darśanaṃ naimiṣīyāṇāṃ saṃvādastairmahātmanaḥ

किन्तु इनके पहुँचने से पहले ही लोकपावन पवन (वायु), नैमिषेय मुनियों के साथ हुई अपनी भेंट और वार्तालाप को -

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.75.14)

शुद्धां बुद्धिं ततस्तेषां साम्बे सानुचरे शिवे । समाप्तिं चापि सत्रस्य दीर्घपूर्वस्य सत्रिणाम्

śuddhāṃ buddhiṃ tatasteṣāṃ sāmbe sānucare śive | samāptiṃ cāpi satrasya dīrghapūrvasya satriṇām

तथा अनुचरों-सहित अम्बा-सहित शिव के विषय में उनकी शुद्ध हुई बुद्धि को, और सत्रकर्ताओं के दीर्घकालीन उस सत्र की समाप्ति को भी -

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.75.15)

विज्ञाप्य जगतां धात्रे ब्रह्मणे ब्रह्मयोनये । स्वकार्ये तदनुज्ञातो जगाम स्वपुरं प्रति

vijñāpya jagatāṃ dhātre brahmaṇe brahmayonaye | svakārye tadanujñāto jagāma svapuraṃ prati

जगत के धाता, वेद के मूल-स्रोत ब्रह्मा को निवेदित करके, और अपने कार्य के लिए उनकी अनुमति प्राप्त करके, वे अपने ही नगर की ओर चले गए थे।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.75.16)

अथ स्थानगतो ब्रह्मा तुम्बुरोर्नारदस्य च । परस्परं स्पर्द्धितयोर्गाने विवदमानयोः

atha sthānagato brahmā tumburornāradasya ca | parasparaṃ sparddhitayorgāne vivadamānayoḥ

उस समय अपने ही स्थान में स्थित ब्रह्मा, तुम्बुरु और नारद को - जो गान में परस्पर स्पर्धा करते हुए विवाद कर रहे थे -

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.75.17)

तदुद्भावितगानोत्थरसैर्माध्यस्थमाचरन् । गन्धर्वैरप्सरोभिश्च सुखमास्ते निषेवितः

tadudbhāvitagānottharasairmādhyasthamācaran | gandharvairapsarobhiśca sukhamāste niṣevitaḥ

उनके गान से उत्पन्न रसों के मध्य निष्पक्ष मध्यस्थ बनकर, गन्धर्वों और अप्सराओं से सेवित होकर सुखपूर्वक विराजमान थे।

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.75.18)

तदानवसरादेव द्वाःस्थैर्द्वारि निवारिताः । मुनयो ब्रह्मभवनाद्बहिः पार्श्वमुपाविशन्

tadānavasarādeva dvāḥsthairdvāri nivāritāḥ | munayo brahmabhavanādbahiḥ pārśvamupāviśan

उस समय उचित अवसर न होने के कारण द्वारपालों ने मुनियों को द्वार पर ही रोक दिया, और वे ब्रह्मा के भवन के बाहर एक ओर बैठ गए।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.75.19)

अथ तुम्बुरुणा गाने समतां प्राप्य नारदः । साहचर्येष्वनुज्ञातो ब्रह्मणा परमेष्ठिना

atha tumburuṇā gāne samatāṃ prāpya nāradaḥ | sāhacaryeṣvanujñāto brahmaṇā parameṣṭhinā

तब गान में तुम्बुरु के साथ समता प्राप्त करके, तथा परमेष्ठी ब्रह्मा से (उसके साथ) सहवास की अनुमति पाकर, नारद ने -

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.75.20)

त्यक्त्वा परस्परस्पर्द्धां मैत्रीं च परमां गतः । सह तेनाप्सरोभिश्च गन्धर्वैश्च समावृतः

tyaktvā parasparasparddhāṃ maitrīṃ ca paramāṃ gataḥ | saha tenāpsarobhiśca gandharvaiśca samāvṛtaḥ

परस्पर स्पर्धा त्यागकर परम मैत्री प्राप्त कर ली; और उसके साथ, अप्सराओं तथा गन्धर्वों से घिरे हुए,

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.75.21)

उपवीणयितुं देवं नकुलीश्वरमीश्वरम् । भवनान्निर्ययौ धातुर्जलदादंशुमानिव

upavīṇayituṃ devaṃ nakulīśvaramīśvaram | bhavanānniryayau dhāturjaladādaṃśumāniva

नकुलीश्वर देव ईश्वर की वीणा-वादन-सहित सेवा करने के लिए, ब्रह्मा के भवन से मेघ से निकलते सूर्य के समान बाहर निकले।

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.75.22)

तं दृष्ट्वा षट्कुलीयास्ते नारदं मुनिगोवृषम् । प्रणम्यावसरं शम्भोः पप्रच्छुः परमादरात्

taṃ dṛṣṭvā ṣaṭkulīyāste nāradaṃ munigovṛṣam | praṇamyāvasaraṃ śambhoḥ papracchuḥ paramādarāt

छह कुलों वाले उन (नैमिषेय मुनियों) ने मुनियों में श्रेष्ठ उन नारद को देखकर उन्हें प्रणाम किया और अत्यंत आदरपूर्वक शम्भु के दर्शन के अवसर के विषय में पूछा।

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.75.23)

स चावसर एवायमितोऽन्तर्गम्यतामिति । वदन्ययावन्यपरस्त्वरया परया युतः

sa cāvasara evāyamito'ntargamyatāmiti | vadanyayāvanyaparastvarayā parayā yutaḥ

और वे अत्यंत उतावले, कहीं अन्यत्र जाने में व्यस्त नारद बोले - 'यही अवसर है, यहीं से भीतर जाओ' - इतना कहकर वे अपने मार्ग चले गए।

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.75.24)

ततो द्वारि स्थिता ये वै ब्रह्मणे तान्न्यवेदयन् । तेन ते विविशुर्वेश्म पिण्डीभूयाण्डजन्मनः

tato dvāri sthitā ye vai brahmaṇe tānnyavedayan | tena te viviśurveśma piṇḍībhūyāṇḍajanmanaḥ

तब द्वार पर स्थित द्वारपालों ने उन्हें ब्रह्मा को निवेदित किया; उनकी अनुमति से वे सब एकत्र होकर अण्डज (ब्रह्मा) के भवन में प्रविष्ट हुए।

श्लोक 25 (shiva.vayaviya.75.25)

प्रविश्य दूरतो देवं प्रणम्य भुवि दण्डवत् । समीपे तदनुज्ञाताः परिवृत्योपतस्थिरे

praviśya dūrato devaṃ praṇamya bhuvi daṇḍavat | samīpe tadanujñātāḥ parivṛtyopatasthire

प्रवेश करके, दूर से ही देव को दण्डवत् प्रणाम करके, उनकी अनुमति पाकर वे निकट आए और उन्हें घेरकर खड़े हो गए।

श्लोक 26 (shiva.vayaviya.75.26)

तांस्तत्रावस्थितान् पृष्ट्वा कुशलं कमलासनः । वृत्तान्तं वो मया ज्ञातं वायुरेवाह नो यतः

tāṃstatrāvasthitān pṛṣṭvā kuśalaṃ kamalāsanaḥ | vṛttāntaṃ vo mayā jñātaṃ vāyurevāha no yataḥ

वहाँ स्थित उन सबकी कुशल पूछकर कमलासन ब्रह्मा ने कहा - 'तुम्हारा सम्पूर्ण वृत्तान्त मुझे ज्ञात है, क्योंकि वायु ने ही हमें यह सब कहा है।

श्लोक 27 (shiva.vayaviya.75.27)

भवद्भिः किं कृतं पश्चान्मारुतेऽन्तर्हिते सति । इत्युक्तवति देवेशे मुनयोऽवभृथात्परम्

bhavadbhiḥ kiṃ kṛtaṃ paścānmārute'ntarhite sati | ityuktavati deveśe munayo'vabhṛthātparam

मारुत के अन्तर्धान हो जाने के बाद तुमने क्या किया?' देवेश के इस प्रकार कहने पर, मुनियों ने अवभृथ-स्नान से आगे की बात -

श्लोक 28 (shiva.vayaviya.75.28)

गङ्गातीर्थेऽस्य गमनं यात्रां वाराणसीं प्रति । दर्शनं तत्र लिङ्गानां स्थापितानां सुरेश्वरैः

gaṅgātīrthe'sya gamanaṃ yātrāṃ vārāṇasīṃ prati | darśanaṃ tatra liṅgānāṃ sthāpitānāṃ sureśvaraiḥ

गंगा-तीर्थ में जाना, वाराणसी की यात्रा, वहाँ देवताओं द्वारा स्थापित लिंगों के दर्शन,

श्लोक 29 (shiva.vayaviya.75.29)

अविमुक्तेश्वरस्यापि लिङ्गस्याभ्यर्चनं सकृत् । आकाशे महतस्तस्य तेजोराशेश्च दर्शनम्

avimukteśvarasyāpi liṅgasyābhyarcanaṃ sakṛt | ākāśe mahatastasya tejorāśeśca darśanam

अविमुक्तेश्वर लिंग की भी विधिवत् पूजा, और आकाश में उस विशाल तेज-राशि के दर्शन,

श्लोक 30 (shiva.vayaviya.75.30)

मुनीनां विलयं तत्र निरोधं तेजसस्ततः । याथात्म्यवेदनं तस्य चिन्तितस्यापि चात्मभिः

munīnāṃ vilayaṃ tatra nirodhaṃ tejasastataḥ | yāthātmyavedanaṃ tasya cintitasyāpi cātmabhiḥ

वहाँ मुनियों का लय, फिर उस तेज का अचानक अन्तर्धान होना, और अपने-आप विचार करने पर भी उसके यथार्थ स्वरूप का ज्ञान न होना -

श्लोक 31 (shiva.vayaviya.75.31)

सर्वं सविस्तरं तस्मै प्रणम्याहुर्मुहुर्मुहुः । मुनिभिः कथितं श्रुत्वा विश्वकर्मा चतुर्मुखः

sarvaṃ savistaraṃ tasmai praṇamyāhurmuhurmuhuḥ | munibhiḥ kathitaṃ śrutvā viśvakarmā caturmukhaḥ

यह सब विस्तार से बार-बार प्रणाम करते हुए उन्हें बताया। मुनियों द्वारा कहे गए इस वृत्तान्त को सुनकर चतुर्मुख विश्वकर्मा (ब्रह्मा) ने -

श्लोक 32 (shiva.vayaviya.75.32)

कम्पयित्वा शिरः किञ्चित्प्राह गम्भीरया गिरा । प्रत्यासीदति युष्माकं सिद्धिरामुष्मिकी परा

kampayitvā śiraḥ kiñcitprāha gambhīrayā girā | pratyāsīdati yuṣmākaṃ siddhirāmuṣmikī parā

अपना सिर थोड़ा हिलाकर गम्भीर वाणी में कहा - 'तुम्हारी परम पारलौकिक सिद्धि अब निकट आ रही है।

श्लोक 33 (shiva.vayaviya.75.33)

भवद्भिर्दीर्घसत्रेण चिरमाराधितः प्रभुः । प्रसादाभिमुखो भूत इति भूतार्थसूचितम्

bhavadbhirdīrghasatreṇa ciramārādhitaḥ prabhuḥ | prasādābhimukho bhūta iti bhūtārthasūcitam

तुम लोगों ने दीर्घ यज्ञ-सत्र से बहुत समय तक जिनकी आराधना की, वे प्रभु अब तुम पर कृपा करने की ओर उन्मुख हो गए हैं - यह इस घटना से सूचित होता है।

श्लोक 34 (shiva.vayaviya.75.34)

वाराणस्यां तु युष्माभिर्यद् दृष्टं दिवि दीप्तिमत् । तल्लिङ्गसंज्ञितं साक्षात्तेजो माहेश्वरं परम्

vārāṇasyāṃ tu yuṣmābhiryad dṛṣṭaṃ divi dīptimat | talliṅgasaṃjñitaṃ sākṣāttejo māheśvaraṃ param

वाराणसी में तुमने जो आकाश में चमकता हुआ देखा, वह साक्षात् 'लिंग' नाम से प्रसिद्ध महेश्वर का ही परम तेज था।

श्लोक 35 (shiva.vayaviya.75.35)

तत्र लीनाश्च मुनयः श्रौतपाशुपतव्रताः । मुक्ता बभूवुः स्वस्थाश्च नैष्ठिका दग्धकिल्बिषाः

tatra līnāśca munayaḥ śrautapāśupatavratāḥ | muktā babhūvuḥ svasthāśca naiṣṭhikā dagdhakilbiṣāḥ

वहाँ जो श्रौत-पाशुपत-व्रतधारी मुनि लीन हुए, वे मुक्त हो गए, अपने स्वरूप में स्थित, निष्ठावान् और पाप-रहित।

श्लोक 36 (shiva.vayaviya.75.36)

प्राप्यानेन यथा मुक्तिरचिराद्भवतामपि । स चायमर्थः सूच्येत युष्मद्दृष्टेन तेजसा

prāpyānena yathā muktiracirādbhavatāmapi | sa cāyamarthaḥ sūcyeta yuṣmaddṛṣṭena tejasā

इसी प्रकार शीघ्र ही तुम लोगों को भी इससे मुक्ति प्राप्त होगी; तुम्हारे द्वारा देखा गया वह तेज इसी अर्थ को सूचित करता है।

श्लोक 37 (shiva.vayaviya.75.37)

तत्र वः काल एवैष दैवादुपनतः स्वयम् । प्रयात दक्षिणं मेरोः शिखरं देवसेवितम्

tatra vaḥ kāla evaiṣa daivādupanataḥ svayam | prayāta dakṣiṇaṃ meroḥ śikharaṃ devasevitam

यही तुम्हारे लिए वह काल है, जो स्वयं दैवयोग से उपस्थित हुआ है। तुम मेरु के दक्षिण शिखर पर जाओ, जो देवताओं द्वारा सेवित है,

श्लोक 38 (shiva.vayaviya.75.38)

सनत्कुमारो यत्रास्ते मम पुत्रः परो मुनिः । प्रतीक्ष्यागमनं साक्षाद्भूतनाथस्य नन्दिनः

sanatkumāro yatrāste mama putraḥ paro muniḥ | pratīkṣyāgamanaṃ sākṣādbhūtanāthasya nandinaḥ

जहाँ मेरे पुत्र, परम मुनि सनत्कुमार, भूतनाथ नन्दी के साक्षात् आगमन की प्रतीक्षा करते हुए विराजमान हैं।

श्लोक 39 (shiva.vayaviya.75.39)

पुरा सनत्कुमारोऽपि दृष्ट्वापि परमेश्वरम् । अज्ञानात्सर्वयोगीन्द्रमानी विनयदूषितः

purā sanatkumāro'pi dṛṣṭvāpi parameśvaram | ajñānātsarvayogīndramānī vinayadūṣitaḥ

पूर्वकाल में सनत्कुमार ने भी परमेश्वर के दर्शन कर लेने पर भी, अज्ञानवश स्वयं को समस्त योगीन्द्रों में श्रेष्ठ मान लिया, और इस प्रकार उनकी विनम्रता दूषित हो गई -

श्लोक 40 (shiva.vayaviya.75.40)

अभ्युत्थानादिकं युक्तमकुर्वन्नतिनिर्भयः । ततोऽपराधात्क्रुद्धेन महोष्ट्रो नन्दिना कृतः

abhyutthānādikaṃ yuktamakurvannatinirbhayaḥ | tato'parādhātkruddhena mahoṣṭro nandinā kṛtaḥ

और अत्यंत निर्भय होकर उन्होंने अभ्युत्थान आदि उचित शिष्टाचार नहीं किया। इस अपराध के कारण क्रुद्ध नन्दी ने उन्हें विशाल ऊँट बना दिया।

श्लोक 41 (shiva.vayaviya.75.41)

अथ कालेन महता तदर्थे शोचता मया । उपास्य देवं देवीं च नन्दिनं चानुनीय वै

atha kālena mahatā tadarthe śocatā mayā | upāsya devaṃ devīṃ ca nandinaṃ cānunīya vai

फिर बहुत समय बाद, इस बात से दुःखी होकर, मैंने देव और देवी की उपासना की और नन्दी को मनाया,

श्लोक 42 (shiva.vayaviya.75.42)

कथञ्चिद् दुष्टता तस्य प्रयत्नेन निवारिता । प्रापितो हि यथापूर्वं सनत्पूर्वां कुमारताम्

kathañcid duṣṭatā tasya prayatnena nivāritā | prāpito hi yathāpūrvaṃ sanatpūrvāṃ kumāratām

और किसी प्रकार बड़े प्रयत्न से उनकी अप्रसन्नता दूर हुई, और (सनत्कुमार) को उनकी पूर्व सनातन कुमार-अवस्था पुनः प्राप्त हुई।

श्लोक 43 (shiva.vayaviya.75.43)

तदाह च महादेवः स्मयन्निव गणाधिपम् । अवज्ञाय हि मामेव तथाहङ्कृतवान्मुनिः

tadāha ca mahādevaḥ smayanniva gaṇādhipam | avajñāya hi māmeva tathāhaṅkṛtavānmuniḥ

तब महादेव ने मानो मुस्कुराते हुए गणाधिप (नन्दी) से कहा - 'मुझ ही की अवज्ञा करके यह मुनि इतना अहंकारी हो गया था -

श्लोक 44 (shiva.vayaviya.75.44)

अतस्त्वमेव याथात्म्यं ममास्मै कथयानघ । ब्रह्मणः पूर्वजः पुत्रो मां मूढमिव संस्मरन्

atastvameva yāthātmyaṃ mamāsmai kathayānagha | brahmaṇaḥ pūrvajaḥ putro māṃ mūḍhamiva saṃsmaran

इसलिए हे निष्पाप! तुम ही इसे मेरा यथार्थ स्वरूप बताओ, क्योंकि ब्रह्मा का यह ज्येष्ठ पुत्र मुझे मूढ़ के समान समझ बैठा था।

श्लोक 45 (shiva.vayaviya.75.45)

मयैव शिष्यस्ते दत्तो मम ज्ञानप्रवर्तकः । धर्माध्यक्षाभिषेकं च तव निर्वर्त्तयिष्यति

mayaiva śiṣyaste datto mama jñānapravartakaḥ | dharmādhyakṣābhiṣekaṃ ca tava nirvarttayiṣyati

मैं ही इसे तुम्हारा शिष्य बनाकर देता हूँ, जो मेरे विषय में ज्ञान का प्रवर्तक होगा; और यह तुम्हारे धर्माध्यक्ष-पद के अभिषेक को भी सम्पन्न करेगा।'

श्लोक 46 (shiva.vayaviya.75.46)

स एवं व्याहृतो भूयः सर्वभूतगणाग्रणीः । यत्पुराज्ञापनं मूर्ध्ना प्राप्य प्रतिगृहीतवान्

sa evaṃ vyāhṛto bhūyaḥ sarvabhūtagaṇāgraṇīḥ | yatpurājñāpanaṃ mūrdhnā prāpya pratigṛhītavān

समस्त भूत-गणों के अग्रणी नन्दी ने इस प्रकार पुनः कहे जाने पर, पहले की भाँति ही उस आज्ञा को अपने मस्तक पर धारण करके स्वीकार किया।

श्लोक 47 (shiva.vayaviya.75.47)

तथा सनत्कुमारोऽपि मेरौ मदनुशासनात् । प्रसादार्थं गणस्यास्य तपश्चरति दुश्चरम्

tathā sanatkumāro'pi merau madanuśāsanāt | prasādārthaṃ gaṇasyāsya tapaścarati duścaram

उसी प्रकार सनत्कुमार भी, मेरे ही अनुशासन से, मेरु पर इस गणाधिप की प्रसन्नता के लिए अत्यंत दुष्कर तप कर रहे हैं।

श्लोक 48 (shiva.vayaviya.75.48)

द्रष्टव्यश्चेति युष्माभिः प्राग्गणेशसमागमात् । तत्प्रसादार्थमचिरान्नन्दी तत्रागमिष्यति

draṣṭavyaśceti yuṣmābhiḥ prāggaṇeśasamāgamāt | tatprasādārthamacirānnandī tatrāgamiṣyati

गणेश (नन्दी) के मिलन से पहले ही तुम लोगों को उनके दर्शन करने चाहिए; उनकी प्रसन्नता के लिए नन्दी शीघ्र ही वहाँ पधारेंगे।'

श्लोक 49 (shiva.vayaviya.75.49)

इति सत्वरमादिश्य प्रेषिता विश्वयोगिना । कुमारशिखरं मेरोर्दक्षिणं मुनयो ययुः

iti satvaramādiśya preṣitā viśvayoginā | kumāraśikharaṃ merordakṣiṇaṃ munayo yayuḥ

इस प्रकार विश्वयोगी ब्रह्मा द्वारा शीघ्रतापूर्वक आदेश देकर भेजे गए मुनि मेरु के दक्षिण कुमार-शिखर की ओर चल पड़े।

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