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वायवीय संहिता · अध्याय 9

जगत् की सृष्टि, पालन और प्रलय

अध्याय 8अध्याय-सूचीअध्याय 10

श्लोक 1 (shiva.vayaviya.9.1)

मुनय ऊचुः । कथं जगदिदं कृत्स्नं विधाय च निधाय च । आज्ञया परमां क्रीडां करोति परमेश्वरः

munaya ūcuḥ | kathaṁ jagadidaṁ kṛtsnaṁ vidhāya ca nidhāya ca | ājñayā paramāṁ krīḍāṁ karoti parameśvaraḥ

मुनियों ने कहा — हे वायुदेव! परमेश्वर इस सम्पूर्ण जगत् को रचकर और स्थापित करके, अपनी आज्ञामात्र से किस प्रकार परम क्रीडा करते हैं?

श्लोक 2 (shiva.vayaviya.9.2)

किं तत्प्रथमसम्भूतं केनेदमखिलं ततम् । केन वा पुनरेवेदं ग्रस्यते पृथुकुक्षिणा

kiṁ tatprathamasambhūtaṁ kenedamakhilaṁ tatam | kena vā punarevedaṁ grasyate pṛthukukṣiṇā

वह क्या है जो सबसे पहले उत्पन्न हुआ? किसके द्वारा यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है? और किस विशाल उदर वाले के द्वारा यह पुनः निगल लिया जाता है?

श्लोक 3 (shiva.vayaviya.9.3)

वायुरुवाच । शक्तिः प्रथमसम्भूता शान्त्यतीतपदोत्तरा । ततो माया ततोऽव्यक्तं शिवाच्छक्तिमतः प्रभोः

vāyuruvāca | śaktiḥ prathamasambhūtā śāntyatītapadottarā | tato māyā tato'vyaktaṁ śivācchaktimataḥ prabhoḥ

वायु ने कहा — शक्ति ही सबसे पहले, शान्त्यतीत पद से भी परे, उत्पन्न हुई। उससे माया और उससे अव्यक्त उत्पन्न हुए — यह सब उन शक्तिमान प्रभु शिव से हुआ।

श्लोक 4 (shiva.vayaviya.9.4)

शान्त्यतीतपदं शक्तेस्ततः शान्तिपदं क्रमात् । ततो विद्यापदं तस्मात्प्रतिष्ठापदसम्भवः

śāntyatītapadaṁ śaktestataḥ śāntipadaṁ kramāt | tato vidyāpadaṁ tasmātpratiṣṭhāpadasambhavaḥ

शक्ति से शान्त्यतीत पद उत्पन्न हुआ, फिर क्रमशः शान्ति पद; उससे विद्या पद, और उससे प्रतिष्ठा पद की उत्पत्ति हुई।

श्लोक 5 (shiva.vayaviya.9.5)

निवृत्तिपदमुत्पन्नं प्रतिष्ठापदतः क्रमात् । एवमुक्ता समासेन सृष्टिरीश्वरचोदिता

nivṛttipadamutpannaṁ pratiṣṭhāpadataḥ kramāt | evamuktā samāsena sṛṣṭirīśvaracoditā

प्रतिष्ठा पद से क्रमशः निवृत्ति पद उत्पन्न हुआ। इस प्रकार संक्षेप में ईश्वर द्वारा प्रेरित सृष्टि का वर्णन किया गया।

श्लोक 6 (shiva.vayaviya.9.6)

आनुलोम्यात्तथैतेषां प्रातिलोम्येन संहृतिः । अस्मात्पञ्चपदोद्दिष्टात्परः स्रष्टा समिष्यते

ānulomyāttathaiteṣāṁ prātilomyena saṁhṛtiḥ | asmātpañcapadoddiṣṭātparaḥ sraṣṭā samiṣyate

जिस प्रकार इनका सीधे क्रम से प्रादुर्भाव होता है, उसी प्रकार उलटे क्रम से इनका संहार होता है। इन पाँचों पदों से परे एक श्रेष्ठ स्रष्टा माना जाता है।

श्लोक 7 (shiva.vayaviya.9.7)

कलाभिः पञ्चभिर्व्याप्तं तस्माद्विश्वमिदं जगत् । अव्यक्तं कारणं यत्तदात्मना समनुष्ठितम्

kalābhiḥ pañcabhirvyāptaṁ tasmādviśvamidaṁ jagat | avyaktaṁ kāraṇaṁ yattadātmanā samanuṣṭhitam

इन पाँचों कलाओं से यह सम्पूर्ण विश्व-जगत् व्याप्त है। जो अव्यक्त कारण है, वह भी उन्हीं परमात्मा द्वारा संचालित है।

श्लोक 8 (shiva.vayaviya.9.8)

महदादिविशेषान्तं सृजतीत्यपि सम्मतम् । किं तु तत्रापि कर्तृत्वं नाव्यक्तस्य न चात्मनः

mahadādiviśeṣāntaṁ sṛjatītyapi sammatam | kiṁ tu tatrāpi kartṛtvaṁ nāvyaktasya na cātmanaḥ

यह भी मान्य है कि महत् आदि से लेकर विशेष स्थूल भूतों तक की सृष्टि प्रकृति द्वारा होती है; परन्तु वहाँ भी कर्तृत्व न तो अव्यक्त का है और न पुरुष का।

श्लोक 9 (shiva.vayaviya.9.9)

अचेतनत्वात्प्रकृतेरज्ञत्वात्पुरुषस्य च । प्रधानपरमाण्वादि यावत्किञ्चिदचेतनम्

acetanatvātprakṛterajñatvātpuruṣasya ca | pradhānaparamāṇvādi yāvatkiñcidacetanam

क्योंकि प्रकृति अचेतन है और पुरुष कर्तृत्व की दृष्टि से अज्ञ है — प्रधान, परमाणु आदि जो कुछ भी अचेतन है, वह स्वयं कुछ नहीं कर सकता।

श्लोक 10 (shiva.vayaviya.9.10)

तत्कर्तृकं स्वयं दृष्टं बुद्धिमत्कारणं विना । जगच्च कर्तृसापेक्षं कार्यं सावयवं यतः

tatkartṛkaṁ svayaṁ dṛṣṭaṁ buddhimatkāraṇaṁ vinā | jagacca kartṛsāpekṣaṁ kāryaṁ sāvayavaṁ yataḥ

क्योंकि बिना बुद्धिमान् कारण के कोई भी कार्य स्वयं कर्तायुक्त नहीं देखा जाता, और यह जगत् अवयवों से युक्त कार्य होने के कारण अवश्य ही किसी कर्ता की अपेक्षा रखता है।

श्लोक 11 (shiva.vayaviya.9.11)

तस्माच्छक्तः स्वतन्त्रो यः सर्वशक्तिश्च सर्ववित् । अनादिनिधनश्चायं महदैश्वर्यसंयुतः

tasmācchaktaḥ svatantro yaḥ sarvaśaktiśca sarvavit | anādinidhanaścāyaṁ mahadaiśvaryasaṁyutaḥ

इसलिए वह एक सामर्थ्यवान् और स्वतन्त्र सत्ता है, जो सर्वशक्तिमान् और सर्वज्ञ है; जो अनादि-अनन्त है और महान् ऐश्वर्य से युक्त है।

श्लोक 12 (shiva.vayaviya.9.12)

स एव जगतः कर्ता महादेवो महेश्वरः । पाता हर्ता च सर्वस्य ततः पृथगनन्वयः

sa eva jagataḥ kartā mahādevo maheśvaraḥ | pātā hartā ca sarvasya tataḥ pṛthagananvayaḥ

वही जगत् का कर्ता है — महादेव, महेश्वर; वही सबका पालक और संहारक है, और इसीलिए वह जगत् से पृथक् तथा उससे असम्बद्ध है।

श्लोक 13 (shiva.vayaviya.9.13)

परिणामः प्रधानस्य प्रवृत्तिः पुरुषस्य च । सर्वं सत्यव्रतस्यैव शासनेन प्रवर्तते

pariṇāmaḥ pradhānasya pravṛttiḥ puruṣasya ca | sarvaṁ satyavratasyaiva śāsanena pravartate

प्रधान (प्रकृति) का परिणमन और पुरुष की प्रवृत्ति — यह सब उन्हीं सत्यस्वरूप परमेश्वर के शासन से ही होता है।

श्लोक 14 (shiva.vayaviya.9.14)

इतीयं शाश्वती निष्ठा सतां मनसि वर्तते । न चैनं पक्षमाश्रित्य वर्तते स्वल्पचेतनः

itīyaṁ śāśvatī niṣṭhā satāṁ manasi vartate | na cainaṁ pakṣamāśritya vartate svalpacetanaḥ

यह शाश्वत निष्ठा सत्पुरुषों के मन में सदैव स्थित रहती है; परन्तु अल्पबुद्धि वाला व्यक्ति इस मत का आश्रय लेकर नहीं रहता।

श्लोक 15 (shiva.vayaviya.9.15)

यावदादिसमारम्भो यावद्यः प्रलयो महान् । तावदप्येति सकलं ब्रह्मणः शारदां शतम्

yāvadādisamārambho yāvadyaḥ pralayo mahān | tāvadapyeti sakalaṁ brahmaṇaḥ śāradāṁ śatam

सृष्टि के आरम्भ से लेकर महाप्रलय तक जो समय है, वह सम्पूर्ण काल ब्रह्मा की सौ शरद् वर्षों के बराबर होता है।

श्लोक 16 (shiva.vayaviya.9.16)

परमित्यायुषो नाम ब्रह्मणोऽव्यक्तजन्मनः । तत्पराख्यं तदर्द्धं च परार्धमभिधीयते

paramityāyuṣo nāma brahmaṇo'vyaktajanmanaḥ | tatparākhyaṁ tadarddhaṁ ca parārdhamabhidhīyate

अव्यक्त से उत्पन्न ब्रह्मा की इस पूर्ण आयु को पर कहा जाता है, और उसका आधा भाग परार्ध कहलाता है।

श्लोक 17 (shiva.vayaviya.9.17)

परार्द्धद्वयकालान्ते प्रलये समुपस्थिते । अव्यक्तमात्मनः कार्यमादायात्मनि तिष्ठति

parārddhadvayakālānte pralaye samupasthite | avyaktamātmanaḥ kāryamādāyātmani tiṣṭhati

दोनों परार्धों की समाप्ति पर, प्रलय उपस्थित होने पर, वह परमात्मा अपने कार्यरूप अव्यक्त को अपने में समेटकर स्थित हो जाता है।

श्लोक 18 (shiva.vayaviya.9.18)

आत्मन्यवस्थितेऽव्यक्ते विकारे प्रतिसंहृते । साधर्म्येणाधितिष्ठेते प्रधानपुरुषावुभौ

ātmanyavasthite'vyakte vikāre pratisaṁhṛte | sādharmyeṇādhitiṣṭhete pradhānapuruṣāvubhau

जब अव्यक्त आत्मा में स्थित हो जाता है और उसके विकार समेट लिए जाते हैं, तब प्रकृति और पुरुष दोनों समान धर्म से स्थित रहते हैं।

श्लोक 19 (shiva.vayaviya.9.19)

तमः सत्त्वगुणावेतौ समत्वेन व्यवस्थितौ । अनुद्रिक्तावनूनौ तावोतप्रोतौ परस्परम्

tamaḥ sattvaguṇāvetau samatvena vyavasthitau | anudriktāvanūnau tāvotaprotau parasparam

ये तमोगुण और सत्त्वगुण दोनों समत्व में स्थित रहते हैं, न घटते हैं न बढ़ते हैं, और परस्पर एक-दूसरे में ओत-प्रोत रहते हैं।

श्लोक 20 (shiva.vayaviya.9.20)

गुणसाम्ये तदा तस्मिन्नविभागे तमोदये । शान्तवातैकनीरे च न प्राज्ञायत किञ्चन

guṇasāmye tadā tasminnavibhāge tamodaye | śāntavātaikanīre ca na prājñāyata kiñcana

गुणों की उस साम्यावस्था में, अविभाजित रूप में, तम की प्रधानता में — मानो वायुरहित शान्त जल के समान — कुछ भी दिखाई नहीं देता था।

श्लोक 21 (shiva.vayaviya.9.21)

अप्रज्ञाते जगत्यस्मिन्नेक एव महेश्वरः । उपास्य रजनीं कृत्स्नां परां माहेश्वरीं ततः

aprajñāte jagatyasminneka eva maheśvaraḥ | upāsya rajanīṁ kṛtsnāṁ parāṁ māheśvarīṁ tataḥ

जब यह जगत् इस प्रकार अप्रकट था, तब एक मात्र महेश्वर ही विद्यमान थे। उस सम्पूर्ण महेश्वरी परम रात्रि को व्यतीत करने के पश्चात् —

श्लोक 22 (shiva.vayaviya.9.22)

प्रभातायां तु शर्वर्यां प्रधानपुरुषावुभौ । प्रविश्य क्षोभयामास मायायोगान्महेश्वरः

prabhātāyāṁ tu śarvaryāṁ pradhānapuruṣāvubhau | praviśya kṣobhayāmāsa māyāyogānmaheśvaraḥ

— जब वह रात्रि प्रभात हुई, तब महेश्वर ने माया-योग द्वारा प्रकृति और पुरुष दोनों में प्रवेश करके उन्हें क्षुब्ध कर दिया।

श्लोक 23 (shiva.vayaviya.9.23)

ततः पुनरशेषाणां भूतानां प्रभवाप्ययात् । अव्यक्तादभवत्सृष्टिराज्ञया परमेष्ठिनः

tataḥ punaraśeṣāṇāṁ bhūtānāṁ prabhavāpyayāt | avyaktādabhavatsṛṣṭirājñayā parameṣṭhinaḥ

तत्पश्चात् उस परमेष्ठी परमेश्वर की आज्ञा से, समस्त प्राणियों की उत्पत्ति और लय के कारणभूत उस अव्यक्त से पुनः सृष्टि हुई।

श्लोक 24 (shiva.vayaviya.9.24)

विश्वोत्तरोत्तरविचित्रमनोरथस्य यस्यैकशक्तिशकले सकलः समाप्तः । आत्मानमध्वपतिमध्वविदो वदन्ति तस्मै नमः सकललोकविलक्षणाय

viśvottarottaravicitramanorathasya yasyaikaśaktiśakale sakalaḥ samāptaḥ | ātmānamadhvapatimadhvavido vadanti tasmai namaḥ sakalalokavilakṣaṇāya

जिनकी विश्व के प्रति उत्तरोत्तर विचित्र इच्छाएँ हैं, जिनकी एक ही शक्ति के अंशमात्र में सम्पूर्ण सृष्टि समाहित हो जाती है — मार्ग के ज्ञाता जिन्हें आत्मा और अध्वपति कहते हैं — उन सम्पूर्ण लोकों से विलक्षण परमात्मा को नमस्कार है।

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