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वैष्णव खण्ड · अध्याय 10

वराह-गुफा, वीरशर्मा-पत्नी-पुनर्जीवन एवं तोण्डमान की मुक्ति

अध्याय 9अध्याय-सूचीअध्याय 11

श्लोक 1 (skanda.2.10.1)

श्रीशुक उवाच । इदं पद्मसरोनाम राजन्पापप्रणाशनम् । कीर्तनात्स्मरणात्स्नानान्नृणां लक्ष्मीप्रदं भुवि । कृत्वा स्नानं त्वमप्यस्मिन्व्रज स्वपितुरंतिकम् ।

śrīśuka uvāca idaṁ padmasaronāma rājanpāpapraṇāśanam kīrtanātsmaraṇātsnānānnṛṇāṁ lakṣmīpradaṁ bhuvi kṛtvā snānaṁ tvamapyasminvraja svapituraṁtikam

श्री शुक ने कहा — हे राजन्! यह पद्मसरोवर पापों का नाश करने वाला है; इसके कीर्तन, स्मरण और स्नान से मनुष्यों को पृथ्वी पर लक्ष्मी प्राप्त होती है। तुम भी यहाँ स्नान करके अपने पिता के समीप जाओ।

श्लोक 2 (skanda.2.10.2)

श्रीवराह उवाच । एतच्छुकवचः श्रुत्वा स्नात्वा पद्मसरोवरे ।

śrīvarāha uvāca etacchukavacaḥ śrutvā snātvā padmasarovare

श्री वराह ने कहा — शुक के ये वचन सुनकर, पद्मसरोवर में स्नान करके,

श्लोक 3 (skanda.2.10.3)

तं नत्वा हयमारुह्य तोण्डमान्स्वपुरं ययौ । तं पिता युवराजानं कृत्वा त्रीन्वत्सरानथ ।

taṁ natvā hayamāruhya toṇḍamānsvapuraṁ yayau taṁ pitā yuvarājānaṁ kṛtvā trīnvatsarānatha

उन्हें प्रणाम करके, अश्व पर सवार होकर तोण्डमान अपनी नगरी को लौटा। पिता ने उसे युवराज बनाकर, तीन वर्षों तक,

श्लोक 4 (skanda.2.10.4)

रंजकत्वं च सामर्थ्यं शौर्यं वीर्यं सुशीलताम् । भक्तिं विप्रेषु पुत्रस्य वीक्ष्य राजा स्वमंत्रिभिः ।

raṁjakatvaṁ ca sāmarthyaṁ śauryaṁ vīryaṁ suśīlatām bhaktiṁ vipreṣu putrasya vīkṣya rājā svamaṁtribhiḥ

पुत्र की प्रजा-प्रियता, सामर्थ्य, शौर्य, पराक्रम, सुशीलता और ब्राह्मणों के प्रति भक्ति को देखकर, राजा ने अपने मंत्रियों सहित,

श्लोक 5 (skanda.2.10.5)

स्वपदे स्थापयामास स्वभिषिच्य विधानतः । अनुनीय सुतं पत्न्या सार्धं राजा वनं ययौ ।

svapade sthāpayāmāsa svabhiṣicya vidhānataḥ anunīya sutaṁ patnyā sārdhaṁ rājā vanaṁ yayau

विधिपूर्वक उसका अभिषेक करके उसे अपने पद पर स्थापित कर दिया। पुत्र को मनाकर, राजा अपनी पत्नी सहित वन को चला गया।

श्लोक 6 (skanda.2.10.6)

तोण्डमानपि साम्राज्यं लब्ध्वा राज्यं चकार ह । निषादस्य वने देवो वाराहं रूपमास्थितः ।

toṇḍamānapi sāmrājyaṁ labdhvā rājyaṁ cakāra ha niṣādasya vane devo vārāhaṁ rūpamāsthitaḥ

तोण्डमान ने भी साम्राज्य पाकर राज्य करना आरंभ किया। उस निषाद के वन में देव ने वराह रूप धारण किया था,

श्लोक 7 (skanda.2.10.7)

श्यामाकपक्वं भक्षित्वा रात्रौरात्रौ चचार ह । पदानि स वराहस्य चान्वियेष दिवादिवा ।

śyāmākapakvaṁ bhakṣitvā rātraurātrau cacāra ha padāni sa varāhasya cānviyeṣa divādivā

जो रात्रि-रात्रि में पका हुआ श्यामाक खाकर विचरण करता था; उस निषाद ने उस वराह के पदचिह्नों को दिन-प्रतिदिन खोजा।

श्लोक 8 (skanda.2.10.8)

अदृष्ट्वा तं वराहं स रात्रौ जाग्रद्धनुर्धरः । स्थितोऽपश्यच्चरन्तं तं चंद्रकोटिसमप्रभम् ।

adṛṣṭvā taṁ varāhaṁ sa rātrau jāgraddhanurdharaḥ sthito'paśyaccarantaṁ taṁ caṁdrakoṭisamaprabham

पर उस वराह को न पाकर, वह रात्रि में धनुष धारण किए जागता रहा; तभी स्थिर खड़े होकर उसने करोड़ों चंद्रमाओं के समान कांति वाले उस वराह को विचरण करते देखा,

श्लोक 9 (skanda.2.10.9)

वराहं सुभगाकारं श्यामाकवनमध्यतः । तं दृष्ट्वा धनुरादाय सिंहनादं चकार ह ।

varāhaṁ subhagākāraṁ śyāmākavanamadhyataḥ taṁ dṛṣṭvā dhanurādāya siṁhanādaṁ cakāra ha

उस सुंदर आकार वाले वराह को श्यामाक-वन के बीच में। उसे देखकर उसने धनुष उठाकर सिंहनाद किया।

श्लोक 10 (skanda.2.10.10)

वराहस्तद्ध्वनिं श्रुत्वा वनान्निष्क्रम्य सत्वरम् । ययौ तं चाप्यनुययौ वराहं स निषादपः ।

varāhastaddhvaniṁ śrutvā vanānniṣkramya satvaram yayau taṁ cāpyanuyayau varāhaṁ sa niṣādapaḥ

उस ध्वनि को सुनकर वराह शीघ्र ही वन से निकल भागा; वह चला और वह निषाद-मुखिया भी उस वराह के पीछे-पीछे चला।

श्लोक 11 (skanda.2.10.11)

रात्रिशेषमनुद्रुत्य वने चंद्रसमप्रभम् । वल्मीकं प्रविशन्तं च ददर्श स निषादपः ।

rātriśeṣamanudrutya vane caṁdrasamaprabham valmīkaṁ praviśantaṁ ca dadarśa sa niṣādapaḥ

रात्रि के शेष भाग में उस चंद्रमा के समान कांति वाले वराह का पीछा करते हुए, उस निषाद-मुखिया ने उसे एक बाँबी में प्रवेश करते देखा,

श्लोक 12 (skanda.2.10.12)

गच्छंतं पूर्णिमाचन्द्रमस्तं गिरिवरं यथा । विस्मितोऽखानयत्कोपाद्वल्मीकं स निषादपः ।

gacchaṁtaṁ pūrṇimācandramastaṁ girivaraṁ yathā vismito'khānayatkopādvalmīkaṁ sa niṣādapaḥ

मानो पूर्णिमा का चंद्रमा किसी श्रेष्ठ पर्वत में समा रहा हो। विस्मित होकर, क्रोधवश उस निषाद-मुखिया ने उस बाँबी को खोदना शुरू किया।

श्लोक 13 (skanda.2.10.13)

धरावराहो ददृशे मूर्च्छितोऽयं पपात ह । पितरं मूर्च्छितं दृष्ट्वा तत्पुत्रो भक्तिमांस्तदा ।

dharāvarāho dadṛśe mūrcchito'yaṁ papāta ha pitaraṁ mūrcchitaṁ dṛṣṭvā tatputro bhaktimāṁstadā

तब उसने पृथ्वी को धारण करने वाले वराह को देखा, और वह मूर्च्छित होकर गिर पड़ा। अपने पिता को मूर्च्छित देखकर, वह भक्तिमान पुत्र,

श्लोक 14 (skanda.2.10.14)

वराहदेवं तुष्टाव तेन प्रीतोऽभवद्धरिः । आविश्य पितरं तस्य प्रोवाच मधुसूदनः ।

varāhadevaṁ tuṣṭāva tena prīto'bhavaddhariḥ āviśya pitaraṁ tasya provāca madhusūdanaḥ

वराह देव की स्तुति करने लगा, जिससे हरि प्रसन्न हुए। उस पुत्र के पिता में प्रवेश कर मधुसूदन ने कहा —

श्लोक 15 (skanda.2.10.15)

श्रीभगवानुवाच । अहं वराह देवेशो नित्यमस्मिन्वसाम्यहम् । राज्ञे त्वमुक्त्वा मामत्र प्रतिष्ठाप्यैव पूजय ।

śrībhagavānuvāca ahaṁ varāha deveśo nityamasminvasāmyaham rājñe tvamuktvā māmatra pratiṣṭhāpyaiva pūjaya

श्री भगवान ने कहा — मैं देवाधिदेव वराह हूँ, मैं सदा यहीं निवास करता हूँ। तुम राजा से यह कहकर मुझे यहीं प्रतिष्ठित करके पूजो।

श्लोक 16 (skanda.2.10.16)

वल्मीकं कृष्णगोक्षीरैः क्षालयित्वा तदुत्थिते । शिलातले च वाराहमुद्धृत्य धरणीस्थितम् ।

valmīkaṁ kṛṣṇagokṣīraiḥ kṣālayitvā tadutthite śilātale ca vārāhamuddhṛtya dharaṇīsthitam

इस बाँबी को कृष्ण-गाय के दूध से धोकर, उसके उठ जाने पर, शिला के तल पर उस पृथ्वी में स्थित वराह को निकालकर,

श्लोक 17 (skanda.2.10.17)

कारयित्वा प्रतिष्ठाप्य विप्रैर्वैखानसैश्च माम् । पूजयेद्विविधैर्भोगैस्तोण्डमान्राजसत्तमः ।

kārayitvā pratiṣṭhāpya viprairvaikhānasaiśca mām pūjayedvividhairbhogaistoṇḍamānrājasattamaḥ

विधिवत निर्माण कराकर, वैखानस ब्राह्मणों द्वारा मुझे प्रतिष्ठित करके, तोण्डमान श्रेष्ठ राजा विविध भोगों से मेरी पूजा करे।

श्लोक 18 (skanda.2.10.18)

इत्युक्त्वा तं जहौ देवः स च स्वस्थो बभूव ह । सुखासीनं तु पितरं नमस्कृत्य निषादजः ।

ityuktvā taṁ jahau devaḥ sa ca svastho babhūva ha sukhāsīnaṁ tu pitaraṁ namaskṛtya niṣādajaḥ

ऐसा कहकर देव ने उसे छोड़ दिया, और वह स्वस्थ हो गया। सुखपूर्वक बैठे अपने पिता को प्रणाम करके निषाद-पुत्र ने,

श्लोक 19 (skanda.2.10.19)

न्यवेदयद्देववचः पित्रे सर्वं यथातथम् । स श्रुत्वा विस्मितो भूत्वा कृत्स्नं पुत्रवचः शुभम् ।

nyavedayaddevavacaḥ pitre sarvaṁ yathātatham sa śrutvā vismito bhūtvā kṛtsnaṁ putravacaḥ śubham

देव के वचन ज्यों के त्यों पिता को निवेदन कर दिए। यह सुनकर विस्मित होकर, पुत्र के इस समस्त शुभ वचन को,

श्लोक 20 (skanda.2.10.20)

राज्ञे वक्तुं ययौ शीघ्रं निषादः स्वानुगैः सह । वसुर्निषादाधिपती राजद्वारमुपागमत् ।

rājñe vaktuṁ yayau śīghraṁ niṣādaḥ svānugaiḥ saha vasurniṣādādhipatī rājadvāramupāgamat

राजा से कहने के लिए वह निषाद अपने अनुचरों सहित शीघ्र चला गया। निषादों के स्वामी वसु राजा के द्वार पर पहुँचा।

श्लोक 21 (skanda.2.10.21)

निषादाधिपमाज्ञाय द्वारपालैर्नृपोत्तमः । आहूय तं निषादेशं सभायां मंत्रिभिः सह ।

niṣādādhipamājñāya dvārapālairnṛpottamaḥ āhūya taṁ niṣādeśaṁ sabhāyāṁ maṁtribhiḥ saha

द्वारपालों से निषादाधिप के आने की सूचना पाकर, श्रेष्ठ राजा ने उस निषाद-मुखिया को मंत्रियों सहित सभा में बुलाया,

श्लोक 22 (skanda.2.10.22)

सत्कृत्य तं वसुं राजा सपुत्रं सपरिच्छदम् । पप्रच्छ प्रीतिमान्राजा वसुं तं वनगोचरम् । किमागमनकृत्यं ते वद त्वं वनगोचर ।

satkṛtya taṁ vasuṁ rājā saputraṁ saparicchadam papraccha prītimānrājā vasuṁ taṁ vanagocaram kimāgamanakṛtyaṁ te vada tvaṁ vanagocara

और पुत्र तथा परिवार सहित उस वसु का सत्कार करके, प्रसन्नचित्त राजा ने उस वन-निवासी वसु से पूछा, 'तुम्हारे आगमन का प्रयोजन क्या है, हे वनवासी? कहो।'

श्लोक 23 (skanda.2.10.23)

वसुरुवाच । राजन्मम वने दृष्टमाश्चर्यं शृणु भूपते ।

vasuruvāca rājanmama vane dṛṣṭamāścaryaṁ śṛṇu bhūpate

वसु ने कहा — हे राजन्! मेरे वन में एक आश्चर्य देखा गया है; हे भूपते! सुनिए।

श्लोक 24 (skanda.2.10.24)

कश्चिच्छ्वेतवराहस्तु श्यामाकमचरन्निशि । तं वराहं धनुष्पाणिरन्वधावमहं नृप ।

kaścicchvetavarāhastu śyāmākamacaranniśi taṁ varāhaṁ dhanuṣpāṇiranvadhāvamahaṁ nṛpa

कोई एक श्वेत वराह रात्रि में श्यामाक के खेत में विचरण करता था। उस वराह का पीछा मैंने धनुष हाथ में लेकर किया, हे राजन्,

श्लोक 25 (skanda.2.10.25)

अनुद्रुतो वायुवेगो गत्वा वल्मीकमाविशत् । स्वामिपुष्करिणीतीरे पश्यते मम भूपते ।

anudruto vāyuvego gatvā valmīkamāviśat svāmipuṣkariṇītīre paśyate mama bhūpate

और वायु के समान वेग से दौड़ते हुए वह जाकर एक बाँबी में घुस गया, स्वामिपुष्करिणी के तट पर, मेरे देखते-देखते, हे भूपते।

श्लोक 26 (skanda.2.10.26)

वल्मीकमखनं क्रोधान्मूर्च्छितो न्यपतं भुवि । मत्पुत्रोऽयं समागत्य मां दृष्ट्वा मूर्च्छितं भुवि ।

valmīkamakhanaṁ krodhānmūrcchito nyapataṁ bhuvi matputro'yaṁ samāgatya māṁ dṛṣṭvā mūrcchitaṁ bhuvi

क्रोधवश मैंने उस बाँबी को खोदा, और मैं मूर्च्छित होकर भूमि पर गिर पड़ा। मेरा यह पुत्र आकर, मुझे भूमि पर मूर्च्छित देखकर,

श्लोक 27 (skanda.2.10.27)

शुचिर्भूत्वा देवदेवं तुष्टाव मधुसूदनम् । ततो मयि समाविश्य वराहोऽध्यवदत्सुतम् ।

śucirbhūtvā devadevaṁ tuṣṭāva madhusūdanam tato mayi samāviśya varāho'dhyavadatsutam

पवित्र होकर देवाधिदेव मधुसूदन की स्तुति करने लगा। तब मुझमें प्रवेश करके वराह ने मेरे पुत्र से कहा —

श्लोक 28 (skanda.2.10.28)

राज्ञे निवेदय क्षिप्रं मच्चरित्रं निषादप । कृष्णगोक्षीरसेकेन वल्मीकं क्षालयेन्नृपः ।

rājñe nivedaya kṣipraṁ maccaritraṁ niṣādapa kṛṣṇagokṣīrasekena valmīkaṁ kṣālayennṛpaḥ

'हे निषाद-पुत्र! राजा से शीघ्र मेरा यह वृत्तांत निवेदन करो। राजा को चाहिए कि इस बाँबी को कृष्ण-गाय के दूध से धोए,

श्लोक 29 (skanda.2.10.29)

दृश्यते च शिला काचिद्वल्मीकस्था सुशोभना । वामांकस्थभुवं मां च वराहवदनं स्थितम् ।

dṛśyate ca śilā kācidvalmīkasthā suśobhanā vāmāṁkasthabhuvaṁ māṁ ca varāhavadanaṁ sthitam

और उस बाँबी में एक अत्यंत शोभन शिला दिखाई देगी, जिसमें मैं वराह-मुख वाला, वाम अंक पर पृथ्वी को धारण किए हुए स्थित हूँ।

श्लोक 30 (skanda.2.10.30)

कारयित्वा शिल्पिनाथ प्रतिष्ठाप्य मुनीश्वरैः । वैखानसैर्मुनिवरैरर्चयेत्तोण्डमानपि ।

kārayitvā śilpinātha pratiṣṭhāpya munīśvaraiḥ vaikhānasairmunivarairarcayettoṇḍamānapi

हे मुनीश्वर! शिल्पी से उसे निकलवाकर, मुनियों द्वारा प्रतिष्ठा कराकर, वैखानस मुनिश्रेष्ठों द्वारा तोण्डमान भी मेरी पूजा कराए,

श्लोक 31 (skanda.2.10.31)

कपिलाकृष्णगोक्षीरसेचनैः क्षालयेच्छनैः ।

kapilākṛṣṇagokṣīrasecanaiḥ kṣālayecchanaiḥ

कपिला और कृष्ण-गाय के दूध से सिंचन करते हुए धीरे-धीरे उसे धोए।

श्लोक 32 (skanda.2.10.32)

आपादपीठपर्यंतं क्षालयित्वा दिनेदिने । कुर्यात्प्राकारमुभयोरुत्तरे दक्षिणे तथा ।

āpādapīṭhaparyaṁtaṁ kṣālayitvā dinedine kuryātprākāramubhayoruttare dakṣiṇe tathā

पैरों से लेकर पीठिका तक प्रतिदिन धोकर, उसके उत्तर और दक्षिण दोनों ओर एक प्राकार बनवाए।

श्लोक 33 (skanda.2.10.33)

इत्युक्त्वा चैव माऽमुंचद्देवः स्वस्थोऽभवं नृप । इदं ते वक्तुमायातो देवदेवचिकीर्षितम् ।

ityuktvā caiva mā'muṁcaddevaḥ svastho'bhavaṁ nṛpa idaṁ te vaktumāyāto devadevacikīrṣitam

ऐसा कहकर देव ने मुझे छोड़ दिया, और मैं स्वस्थ हो गया, हे राजन्। यह देवाधिदेव की इच्छा कहने ही मैं यहाँ आया हूँ।

श्लोक 34 (skanda.2.10.34)

श्रीवराह उवाच । तोण्डमानपि तच्छ्रुत्वा सुप्रीतो विस्मितोऽभवत् । ततः कार्यं विनिश्चित्य मन्त्रिभिः पुष्करादिभिः ।

śrīvarāha uvāca toṇḍamānapi tacchrutvā suprīto vismito'bhavat tataḥ kāryaṁ viniścitya mantribhiḥ puṣkarādibhiḥ

श्री वराह ने कहा — यह सुनकर तोण्डमान अत्यंत प्रसन्न और विस्मित हुआ। तब पुष्कर आदि मंत्रियों के साथ निश्चय करके,

श्लोक 35 (skanda.2.10.35)

वेकटाद्रिं जिगमिषुर्गोपानाहूय सर्वशः । कृष्णाश्च कपिला गावो याः काश्चित्संति मामिकाः ।

vekaṭādriṁ jigamiṣurgopānāhūya sarvaśaḥ kṛṣṇāśca kapilā gāvo yāḥ kāścitsaṁti māmikāḥ

वेंकटाद्रि जाने की इच्छा से उसने सभी ग्वालों को बुलाकर कहा, 'मेरी जितनी भी काली और कपिला गायें हों,

श्लोक 36 (skanda.2.10.36)

ताः सवत्सा आनयध्वं वेंकटाद्रिसमीपतः । इत्याज्ञाप्य नृपो गोपाञ्छ्वो यात्रेति च मन्त्रिणः ।

tāḥ savatsā ānayadhvaṁ veṁkaṭādrisamīpataḥ ityājñāpya nṛpo gopāñchvo yātreti ca mantriṇaḥ

उन सबको उनके बछड़ों सहित वेंकटाद्रि के निकट ले आओ।' इस प्रकार गोपों को आज्ञा देकर, मंत्रियों से 'कल यात्रा है' कहकर,

श्लोक 37 (skanda.2.10.37)

विसृज्य प्रकृतीः सर्वा विवेशांतःपुरं वशी । उक्त्वा कथां तां पत्नीभ्यः सुष्वाप निशि पार्थिवः ।

visṛjya prakṛtīḥ sarvā viveśāṁtaḥpuraṁ vaśī uktvā kathāṁ tāṁ patnībhyaḥ suṣvāpa niśi pārthivaḥ

राजा ने सभी प्रजाजनों को विदा करके अपने अंतःपुर में प्रवेश किया। यह वृत्तांत अपनी पत्नियों को बताकर राजा रात्रि में सो गया।

श्लोक 38 (skanda.2.10.38)

तं स्वप्ने श्रीनिवासोऽपि बिलमार्गं ह्यदर्शयत् । स्वपुरादाबिलं मार्गे पल्लवानसृजद्धरिः ।

taṁ svapne śrīnivāso'pi bilamārgaṁ hyadarśayat svapurādābilaṁ mārge pallavānasṛjaddhariḥ

स्वप्न में श्रीनिवास ने उसे गुफा का मार्ग दिखाया; अपने निवास से गुफा तक के मार्ग में हरि ने कोमल पल्लव बिखेर दिए।

श्लोक 39 (skanda.2.10.39)

एवं स्वप्नं नृपो दृष्ट्वा प्रातरुत्थाय सत्वरः । आहूय मन्त्रिणः सर्वान्प्रकृतीर्ब्राह्मणानपि ।

evaṁ svapnaṁ nṛpo dṛṣṭvā prātarutthāya satvaraḥ āhūya mantriṇaḥ sarvānprakṛtīrbrāhmaṇānapi

इस प्रकार स्वप्न देखकर राजा प्रातः शीघ्र उठा; सभी मंत्रियों, प्रजाजनों और ब्राह्मणों को बुलाकर,

श्लोक 40 (skanda.2.10.40)

स्वप्नं तथाविधं चोक्त्वाऽपश्यद्द्वारेऽथ पल्लवान् । युक्ते मुहूर्ते प्रययौ हयमारुह्य तोण्डमान् ।

svapnaṁ tathāvidhaṁ coktvā'paśyaddvāre'tha pallavān yukte muhūrte prayayau hayamāruhya toṇḍamān

उसने वह स्वप्न सुनाया, और द्वार पर उन्हीं पल्लवों को [बिखरा] देखा। शुभ मुहूर्त में तोण्डमान अश्व पर सवार होकर चल पड़ा,

श्लोक 41 (skanda.2.10.41)

पश्यन्पल्लवभंगांश्च शनैः प्रीतो ययौ बिलम् । दृष्ट्वा विस्मयमापन्नो निर्ममे तत्र पत्तनम् ।

paśyanpallavabhaṁgāṁśca śanaiḥ prīto yayau bilam dṛṣṭvā vismayamāpanno nirmame tatra pattanam

उन बिखरे पल्लवों को देखते हुए वह प्रसन्नतापूर्वक धीरे-धीरे गुफा तक पहुँचा। उसे देखकर विस्मित होकर, उसने वहाँ एक नगर की रचना की।

श्लोक 42 (skanda.2.10.42)

बिलमंतःपुरे कृत्वा प्राकारं चाप्यकारयत् । वसंस्तत्र नृपेन्द्रोऽसौ निर्जित्य पृथिवीमिमाम् ।

bilamaṁtaḥpure kṛtvā prākāraṁ cāpyakārayat vasaṁstatra nṛpendro'sau nirjitya pṛthivīmimām

गुफा को अंतःपुर में सम्मिलित करके उसने एक प्राकार भी बनवाया। वहाँ निवास करते हुए वह श्रेष्ठ राजा इस पृथ्वी को जीतकर,

श्लोक 43 (skanda.2.10.43)

यथोक्तं देवदेवेन क्षीरप्रक्षालनादिकम् । कृत्वा प्राकारनिर्माणं कर्तुमुद्योगमाययौ ।

yathoktaṁ devadevena kṣīraprakṣālanādikam kṛtvā prākāranirmāṇaṁ kartumudyogamāyayau

देवाधिदेव द्वारा कहे अनुसार दूध से प्रक्षालन आदि कराकर, प्राकार-निर्माण करने के प्रयास में लग गया।

श्लोक 44 (skanda.2.10.44)

तदानीं देवदेवेन स्वयमाज्ञापितो नृपः । तिंतिणीं चंपकं चोभौ पालयैतौ नगोत्तमौ ।

tadānīṁ devadevena svayamājñāpito nṛpaḥ tiṁtiṇīṁ caṁpakaṁ cobhau pālayaitau nagottamau

उसी समय देवाधिदेव ने स्वयं राजा को आज्ञा दी — 'तिंतिणी (इमली) और चंपक, इन दोनों श्रेष्ठ वृक्षों को छोड़ देना,

श्लोक 45 (skanda.2.10.45)

मम चास्थानिकी चिंचा लक्ष्म्याः स्थानं च चंपकः । नमस्कार्यौ नृपैस्तौ हि ऋषिदेवनरैः सदा ।

mama cāsthānikī ciṁcā lakṣmyāḥ sthānaṁ ca caṁpakaḥ namaskāryau nṛpaistau hi ṛṣidevanaraiḥ sadā

क्योंकि चिंचा मेरा स्थान है, और चंपक लक्ष्मी का स्थान है। राजाओं, ऋषियों, देवताओं और मनुष्यों को सदा इन दोनों को प्रणाम करना चाहिए।

श्लोक 46 (skanda.2.10.46)

संस्थाप्यैतौ नृपश्रेष्ठ च्छेदयान्यान्नगोत्तमान् । प्राकारमात्रं कुरु मे द्वारगोपुरसंयुतम् ।

saṁsthāpyaitau nṛpaśreṣṭha cchedayānyānnagottamān prākāramātraṁ kuru me dvāragopurasaṁyutam

हे श्रेष्ठ राजन्! इन दोनों को यथावत छोड़कर, अन्य सभी वृक्षों को काटकर, केवल मेरे लिए द्वार और गोपुर सहित एक प्राकार बनवाओ।

श्लोक 47 (skanda.2.10.47)

विमानं तु भवद्वंश्यो नाम्ना नारायणो नृपः । कारयिष्यति मद्भक्तः स्वर्णेनालंकरिष्यति ।

vimānaṁ tu bhavadvaṁśyo nāmnā nārāyaṇo nṛpaḥ kārayiṣyati madbhaktaḥ svarṇenālaṁkariṣyati

किन्तु विमान (मंदिर-भवन) तो तुम्हारे ही वंश में जन्मे नारायण नामक राजा, जो मेरा भक्त होगा, बनवाएगा, और उसे स्वर्ण से सुसज्जित करेगा।

श्लोक 48 (skanda.2.10.48)

श्रीवराह उवाच । एवमुक्त्वा तोण्डमानं विरराम श्रियः पतिः ।

śrīvarāha uvāca evamuktvā toṇḍamānaṁ virarāma śriyaḥ patiḥ

श्री वराह ने कहा — तोण्डमान से इतना कहकर श्री के पति चुप हो गए।

श्लोक 49 (skanda.2.10.49)

एवं देववचः श्रुत्वा कृत्वा प्राकारमेव च । पूजयामास मुनिभिर्वैखानसकुलोद्भवैः ।

evaṁ devavacaḥ śrutvā kṛtvā prākārameva ca pūjayāmāsa munibhirvaikhānasakulodbhavaiḥ

देव के इन वचनों को सुनकर, प्राकार बनवाकर, राजा ने वैखानस-कुल में जन्मे मुनियों द्वारा उनकी पूजा कराई।

श्लोक 50 (skanda.2.10.50)

नित्यं बिलेन चागत्य देवं नत्वा नृपोत्तमः । राज्यं चकार धर्मेण भुंजानो भोगमुत्तमम् ।

nityaṁ bilena cāgatya devaṁ natvā nṛpottamaḥ rājyaṁ cakāra dharmeṇa bhuṁjāno bhogamuttamam

वह श्रेष्ठ राजा प्रतिदिन गुफा से होकर आकर देव को प्रणाम करके, धर्मपूर्वक राज्य करते हुए उत्तम भोगों का उपभोग करता रहा।

श्लोक 51 (skanda.2.10.51)

एतस्मिन्नेव काले तु दाक्षिणात्यो द्विजोत्तमः ।

etasminneva kāle tu dākṣiṇātyo dvijottamaḥ

इसी समय दक्षिण देश का एक श्रेष्ठ ब्राह्मण,

श्लोक 52 (skanda.2.10.52)

गंगास्नानाय गच्छन्वै सदारः प्रययौ पुरात् । मार्गेऽथ गर्भिणी जाता ब्राह्मणी ब्राह्मणः स च ।

gaṁgāsnānāya gacchanvai sadāraḥ prayayau purāt mārge'tha garbhiṇī jātā brāhmaṇī brāhmaṇaḥ sa ca

गंगा-स्नान के लिए अपनी पत्नी सहित नगर से निकला। मार्ग में वह ब्राह्मणी गर्भवती हो गई,

श्लोक 53 (skanda.2.10.53)

तां तु गर्भवतीं दृष्ट्वा स्वात्मानुगमनेऽक्षमाम् । राजानं द्रष्टुकामोऽसौ राजद्वारमुपागमत् ।

tāṁ tu garbhavatīṁ dṛṣṭvā svātmānugamane'kṣamām rājānaṁ draṣṭukāmo'sau rājadvāramupāgamat

और उसे यात्रा में साथ चलने में असमर्थ देखकर, उस राजा से मिलने की इच्छा से वह ब्राह्मण राजद्वार पर पहुँचा।

श्लोक 54 (skanda.2.10.54)

द्वाःस्थेनाज्ञापितो राजा तमाहूय द्विजोत्तमम् । पूजयित्वा तु विधिवत्पप्रच्छ कुशलं द्विजम् ।

dvāḥsthenājñāpito rājā tamāhūya dvijottamam pūjayitvā tu vidhivatpapraccha kuśalaṁ dvijam

द्वारपाल से सूचना पाकर राजा ने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को बुलाया, और विधिपूर्वक उसका सत्कार करके उससे कुशल-क्षेम पूछा।

श्लोक 55 (skanda.2.10.55)

राजोवाच । किमागमनकृत्यं ते किं करिष्याम्यहं द्विज । ब्राह्मण उवाच । वासिष्ठो वीरशर्माहं सामवेदी नृपोत्तम ।

rājovāca kimāgamanakṛtyaṁ te kiṁ kariṣyāmyahaṁ dvija brāhmaṇa uvāca vāsiṣṭho vīraśarmāhaṁ sāmavedī nṛpottama

राजा ने कहा — हे द्विज! आपके आगमन का प्रयोजन क्या है? मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ? ब्राह्मण ने कहा — हे श्रेष्ठ राजन्! मैं वसिष्ठ-गोत्री, सामवेदी वीरशर्मा हूँ।

श्लोक 56 (skanda.2.10.56)

सदारो निर्गतो राक्तगंगास्नानाय सादरः । मार्गे च गर्भिणी चेयं कौशिकी पुण्यशालिनी ।

sadāro nirgato rāktagaṁgāsnānāya sādaraḥ mārge ca garbhiṇī ceyaṁ kauśikī puṇyaśālinī

मैं आदरपूर्वक अपनी पत्नी सहित गंगा-स्नान के लिए निकला हूँ। मार्ग में यह पुण्यशालिनी कौशिकी गर्भवती हो गई है,

श्लोक 57 (skanda.2.10.57)

नाम्ना लक्ष्मीरिति ख्याता शीला च पतिव्रता । संस्थाप्यैनां तव गृहे व्रतं निर्वर्तयाम्यहम् ।

nāmnā lakṣmīriti khyātā śīlā ca pativratā saṁsthāpyaināṁ tava gṛhe vrataṁ nirvartayāmyaham

जो लक्ष्मी नाम से प्रसिद्ध, शीलवती और पतिव्रता है। इसे आपके घर में ठहराकर मैं अपना व्रत पूरा करना चाहता हूँ।

श्लोक 58 (skanda.2.10.58)

तस्माद्राजन्प्रयच्छास्यै यथेष्टं भक्तवेतने । तावच्च रक्ष्यतां लक्ष्मीर्यावदागमनं मम ।

tasmādrājanprayacchāsyai yatheṣṭaṁ bhaktavetane tāvacca rakṣyatāṁ lakṣmīryāvadāgamanaṁ mama

इसलिए, हे राजन्! इसे जो भी भरण-पोषण उचित हो, वह दीजिए। जब तक मैं न लौटूँ, तब तक लक्ष्मी की रक्षा कीजिए।

श्लोक 59 (skanda.2.10.59)

श्रीवराह उवाच । राजा तस्य वचः श्रुत्वा तंडुलानि धनान्यपि । दत्त्वा षण्मासपर्यन्तं गृहमंतःपुरे ददौ ।

śrīvarāha uvāca rājā tasya vacaḥ śrutvā taṁḍulāni dhanānyapi dattvā ṣaṇmāsaparyantaṁ gṛhamaṁtaḥpure dadau

श्री वराह ने कहा — राजा ने उसके वचन सुनकर, चावल और धन देकर, छह महीने तक के लिए अंतःपुर में एक घर उसे दे दिया।

श्लोक 60 (skanda.2.10.60)

तां न्यस्य ब्राह्मणः प्रीतो गंगास्नानाय निर्ययौ । गत्वा भागीरथीं गंगां प्रयागे क्षेत्र उत्तमे ।

tāṁ nyasya brāhmaṇaḥ prīto gaṁgāsnānāya niryayau gatvā bhāgīrathīṁ gaṁgāṁ prayāge kṣetra uttame

उसे वहाँ छोड़कर, प्रसन्न ब्राह्मण गंगा-स्नान के लिए निकल पड़ा। भागीरथी गंगा तक जाकर, उत्तम तीर्थ प्रयाग में,

श्लोक 61 (skanda.2.10.61)

स्नात्वा काशीं ततो गत्वा तत्रोषित्वा दिनत्रयम् । गयां प्राप्य पितृश्राद्धमकरोद्ब्राह्मणोत्तमः ।

snātvā kāśīṁ tato gatvā tatroṣitvā dinatrayam gayāṁ prāpya pitṛśrāddhamakarodbrāhmaṇottamaḥ

स्नान करके, फिर काशी जाकर, वहाँ तीन दिन ठहरकर, गया पहुँचकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने पितरों का श्राद्ध किया।

श्लोक 62 (skanda.2.10.62)

गत्वायोध्यामपि पुरीं प्रययौ बदरीवनम् । सालग्रामं ततो गत्वा स्वदेशं प्रति निर्ययौ ।

gatvāyodhyāmapi purīṁ prayayau badarīvanam sālagrāmaṁ tato gatvā svadeśaṁ prati niryayau

फिर अयोध्या नगरी जाकर, बदरीवन गया; फिर शालग्राम जाकर, अपने देश की ओर लौट चला।

श्लोक 63 (skanda.2.10.63)

संवत्सरद्वयेऽतीते चैत्रे मासि शुभे दिने । निवृत्तोऽसौ द्विजश्रेष्ठः शनैरागत्य माधवे ।

saṁvatsaradvaye'tīte caitre māsi śubhe dine nivṛtto'sau dvijaśreṣṭhaḥ śanairāgatya mādhave

दो वर्ष बीत जाने पर, चैत्र मास के एक शुभ दिन, वह श्रेष्ठ ब्राह्मण धीरे-धीरे लौटता हुआ माधव (वेंकटाद्रि) पहुँचा,

श्लोक 64 (skanda.2.10.64)

एकादश्यां शुक्लपक्षे पुना राजानमाययौ । राजा तु विस्मृत्य तदा ब्राह्मणीं नास्मरन्नृपः ।

ekādaśyāṁ śuklapakṣe punā rājānamāyayau rājā tu vismṛtya tadā brāhmaṇīṁ nāsmarannṛpaḥ

और शुक्ल पक्ष की एकादशी को पुनः राजा के पास पहुँचा। किन्तु राजा तो सब कुछ भूलकर उस ब्राह्मणी को याद ही नहीं कर पाया था।

श्लोक 65 (skanda.2.10.65)

ब्राह्मणी मानिनी गेहे मृता शुष्का बभूव ह । वीरशर्मा ततो विप्रो गंगातोयकरंडकम् ।

brāhmaṇī māninī gehe mṛtā śuṣkā babhūva ha vīraśarmā tato vipro gaṁgātoyakaraṁḍakam

वह मानिनी ब्राह्मणी घर में ही मृत होकर सूख गई थी। तब विप्र वीरशर्मा ने गंगाजल का एक पात्र लेकर,

श्लोक 66 (skanda.2.10.66)

विमुच्य बन्धनं त्वेकं गंगांभःकरकं शुभम् । प्रादाय राज्ञे पप्रच्छ पत्नी कुशलिनीति मे ।

vimucya bandhanaṁ tvekaṁ gaṁgāṁbhaḥkarakaṁ śubham prādāya rājñe papraccha patnī kuśalinīti me

उसका एक बंधन खोलकर, वह शुभ गंगाजल राजा को भेंट करते हुए पूछा, 'मेरी पत्नी कुशल तो है न?'

श्लोक 67 (skanda.2.10.67)

स्मृत्वाथ राजा विप्रं तं स्थीयतामिति चाब्रवीत् । अन्तःपुरं ततो गत्वा तामपश्यन्मृतां गृहे ।

smṛtvātha rājā vipraṁ taṁ sthīyatāmiti cābravīt antaḥpuraṁ tato gatvā tāmapaśyanmṛtāṁ gṛhe

तब स्मरण करके राजा ने उस ब्राह्मण से कहा, 'यहीं ठहरो।' फिर अंतःपुर जाकर उसने उसे घर में मृत पाया।

श्लोक 68 (skanda.2.10.68)

अनुक्त्वा ब्रह्मणे तस्मै प्रविश्य बिलमुत्तमम् । श्रीनृसिंहं नमस्कृत्य पुनः प्राप्य बिलोत्तमम् ।

anuktvā brahmaṇe tasmai praviśya bilamuttamam śrīnṛsiṁhaṁ namaskṛtya punaḥ prāpya bilottamam

उस ब्राह्मण को कुछ बताए बिना, राजा उत्तम गुफा में प्रवेश कर, श्रीनृसिंह को प्रणाम करके, फिर से उस उत्तम गुफा में पहुँचकर,

श्लोक 69 (skanda.2.10.69)

श्रीनिवासं ययौ द्रष्टुं श्रीभूमिसहितं परम् । तं दृष्ट्वा सहसायांतं जुगूहाते धरारमे ।

śrīnivāsaṁ yayau draṣṭuṁ śrībhūmisahitaṁ param taṁ dṛṣṭvā sahasāyāṁtaṁ jugūhāte dharārame

श्री और भूमि सहित उन परम श्रीनिवास के दर्शन के लिए गया। उसे अचानक आया देखकर, धरा और रमा ने उसे छिपा लिया,

श्लोक 70 (skanda.2.10.70)

प्रणमन्तमवोचत्तं किमकाले नृपागतः । नृपोऽवदत्प्रणम्येशं भीतोऽथ ब्राह्मणीं मृताम् ।

praṇamantamavocattaṁ kimakāle nṛpāgataḥ nṛpo'vadatpraṇamyeśaṁ bhīto'tha brāhmaṇīṁ mṛtām

और जब वह प्रणाम कर रहा था तो उन्होंने पूछा, 'असमय राजा क्यों आए हो?' राजा ने भी प्रभु को प्रणाम करके, भयभीत होकर, ब्राह्मणी की मृत्यु के विषय में बताया।

श्लोक 71 (skanda.2.10.71)

तच्छ्रुत्वा देवदेवोऽपि मा भै राजन्द्विजोत्तमात् । आन्दोलिकां तामारोप्य स्त्रीभिः स्वाभिः समन्विताम् ।

tacchrutvā devadevo'pi mā bhai rājandvijottamāt āndolikāṁ tāmāropya strībhiḥ svābhiḥ samanvitām

यह सुनकर देवाधिदेव ने कहा, 'हे राजन्, ब्राह्मण से मत डरो। इस स्त्री को पालकी पर बिठाकर, अपनी ही स्त्रियों सहित,

श्लोक 72 (skanda.2.10.72)

मदालयात्पूर्वभागे द्वादश्यां स्नापय प्रभो । अस्थिनाम्नि सरस्यस्मिन्नपमृत्युनिवारणे ।

madālayātpūrvabhāge dvādaśyāṁ snāpaya prabho asthināmni sarasyasminnapamṛtyunivāraṇe

मेरे मंदिर से पूर्व दिशा में द्वादशी के दिन उसे स्नान कराओ, हे प्रभु, अस्थि नामक उस सरोवर में, जो अकाल-मृत्यु का निवारण करता है।

श्लोक 73 (skanda.2.10.73)

प्राप्तजीवा समं स्त्रीभिर्ब्राह्मणेन च योक्ष्यते । शीघ्रं याहि नृपश्रेष्ठ यथोक्तं वचनं कुरु ।

prāptajīvā samaṁ strībhirbrāhmaṇena ca yokṣyate śīghraṁ yāhi nṛpaśreṣṭha yathoktaṁ vacanaṁ kuru

वह जीवन पाकर स्त्रियों और उस ब्राह्मण के साथ फिर से मिल जाएगी। शीघ्र जाओ, हे श्रेष्ठ राजन्, जैसा कहा गया है वैसा करो।

श्लोक 74 (skanda.2.10.74)

इति देववचः श्रुत्वा प्रययौ स्वपुरं नृपः । आन्दोलिकासु रम्यासु स्त्रिय आरोप्य तामपि ।

iti devavacaḥ śrutvā prayayau svapuraṁ nṛpaḥ āndolikāsu ramyāsu striya āropya tāmapi

देव के ये वचन सुनकर राजा अपनी नगरी को गया। सुंदर पालकियों में स्त्रियों को बिठाकर, उसे भी बिठाकर,

श्लोक 75 (skanda.2.10.75)

ब्राह्मणं च पुरस्कृत्य द्रष्टुं देवं ययौ नृपः । अस्थिकूटसरः प्राप्य स्नापयामास ताः स्त्रियः ।

brāhmaṇaṁ ca puraskṛtya draṣṭuṁ devaṁ yayau nṛpaḥ asthikūṭasaraḥ prāpya snāpayāmāsa tāḥ striyaḥ

और उस ब्राह्मण को आगे करके, देव के दर्शन हेतु राजा चल पड़ा। अस्थिकूट सरोवर पहुँचकर उसने उन स्त्रियों को स्नान कराया।

श्लोक 76 (skanda.2.10.76)

त्वगस्थिरूपा सा चापि ताभिः क्षिप्ता सरोवरे । प्राप्तजीवा यथापूर्वं सुव्यंजितशरीरजा ।

tvagasthirūpā sā cāpi tābhiḥ kṣiptā sarovare prāptajīvā yathāpūrvaṁ suvyaṁjitaśarīrajā

त्वचा और हड्डी मात्र शेष रह गई वह भी उनके द्वारा उस सरोवर में डाली गई, और पहले की भाँति ही, अपने पूर्ण, सुडौल शरीर सहित, वह जीवन पाकर,

श्लोक 77 (skanda.2.10.77)

उत्थिता सरसः स्नात्वा राज्ञीभिः सहमंगला । प्राप्ता च ब्राह्मणं प्रीता भर्तारं पुनरागतम् ।

utthitā sarasaḥ snātvā rājñībhiḥ sahamaṁgalā prāptā ca brāhmaṇaṁ prītā bhartāraṁ punarāgatam

सरोवर से उठकर, स्नान करके, रानियों सहित मंगलमयी होकर, प्रसन्नतापूर्वक अपने पति ब्राह्मण से फिर मिल गई, जो [स्वयं] लौट आया था।

श्लोक 78 (skanda.2.10.78)

राजा हरिं पूजयित्वा ब्राह्मणाय धनं ददौ । सहस्रनिष्कपर्यंतं वस्त्राणि विविधानि च ।

rājā hariṁ pūjayitvā brāhmaṇāya dhanaṁ dadau sahasraniṣkaparyaṁtaṁ vastrāṇi vividhāni ca

राजा ने हरि की पूजा करके ब्राह्मण को धन दिया — एक हज़ार स्वर्ण-मुद्राओं तक, और विविध वस्त्र भी,

श्लोक 79 (skanda.2.10.79)

स्वदेशगमनायैव सादरं विससर्ज ह । विप्रः श्रुत्वा स्त्रियो वृत्तं प्रभावं वेंकटेशितुः ।

svadeśagamanāyaiva sādaraṁ visasarja ha vipraḥ śrutvā striyo vṛttaṁ prabhāvaṁ veṁkaṭeśituḥ

और आदरपूर्वक उसे अपने देश जाने के लिए विदा कर दिया। ब्राह्मण, स्त्रियों से वेंकटेश्वर के इस प्रभाव का वृत्तांत सुनकर,

श्लोक 80 (skanda.2.10.80)

आशीः प्रयुज्य राज्ञेऽथ स्वदेशं प्रययौ द्विजः । विप्रे गते श्रीनिवासो राजानं पुनरब्रवीत् ।

āśīḥ prayujya rājñe'tha svadeśaṁ prayayau dvijaḥ vipre gate śrīnivāso rājānaṁ punarabravīt

राजा को आशीर्वाद देकर अपने देश चला गया। ब्राह्मण के जाने के बाद श्रीनिवास ने राजा से फिर कहा —

श्लोक 81 (skanda.2.10.81)

दिनेदिने च मध्याह्ने नैवेद्यानेतरं नृप । आगत्य मामर्चयित्वा यथेष्टं स्वर्णपंकजैः ।

dinedine ca madhyāhne naivedyānetaraṁ nṛpa āgatya māmarcayitvā yatheṣṭaṁ svarṇapaṁkajaiḥ

'हे राजन्! प्रतिदिन मध्याह्न में नैवेद्य लेकर, स्वयं आकर, स्वर्ण-कमलों से यथेच्छ मेरी पूजा करके,

श्लोक 82 (skanda.2.10.82)

गत्वा पुरीं स्वधर्मेण राज्यं कुरु नराधिप । यद्यदिष्टं तव नृप भविष्यति न संशयः ।

gatvā purīṁ svadharmeṇa rājyaṁ kuru narādhipa yadyadiṣṭaṁ tava nṛpa bhaviṣyati na saṁśayaḥ

अपनी नगरी जाकर धर्मपूर्वक राज्य करो, हे नराधिप। हे राजन्! तुम्हारी जो भी इच्छा होगी, वह निश्चय ही पूर्ण होगी।

श्लोक 83 (skanda.2.10.83)

नागंतव्यमकाले तु त्वया नृप कदाचन । एवं कालार्चनं कृत्वा गत्वा त्वं स्वपुरं वस ।

nāgaṁtavyamakāle tu tvayā nṛpa kadācana evaṁ kālārcanaṁ kṛtvā gatvā tvaṁ svapuraṁ vasa

किन्तु, हे राजन्, तुम्हें कभी भी असमय यहाँ नहीं आना चाहिए। इस प्रकार नियत समय पर पूजा करके, अपनी नगरी में जाकर निवास करो।'

श्लोक 84 (skanda.2.10.84)

राजोवाच । तथा करिष्ये देवेश मध्याह्ने चार्चयाम्यहम् । इति देवाज्ञया नित्यमर्चयन्स्वर्णपंकजैः ।

rājovāca tathā kariṣye deveśa madhyāhne cārcayāmyaham iti devājñayā nityamarcayansvarṇapaṁkajaiḥ

राजा ने कहा — देवेश! मैं वैसा ही करूँगा, मध्याह्न में ही पूजा करूँगा। इस प्रकार देव की आज्ञा से नित्य स्वर्ण-कमलों से पूजा करते हुए,

श्लोक 85 (skanda.2.10.85)

तदूर्ध्वं तुलसीपुष्पं जात्त्वपश्यत्स मृण्मयम् ।

tadūrdhvaṁ tulasīpuṣpaṁ jāttvapaśyatsa mṛṇmayam

उसके बाद उसने तुलसी के फूल के साथ मिट्टी के भी कमल-फूल पड़े हुए देखे।

श्लोक 86 (skanda.2.10.86)

विस्मितो देवदेवेशमपृच्छन्नृपसत्तमः । राजोवाच । केनार्च्यसे मृन्मयैश्च कमलैस्तुलसीसमैः ।

vismito devadeveśamapṛcchannṛpasattamaḥ rājovāca kenārcyase mṛnmayaiśca kamalaistulasīsamaiḥ

विस्मित होकर उस श्रेष्ठ राजा ने देवाधिदेव से पूछा — राजा ने कहा — मिट्टी के, तुलसी जैसे इन कमलों से आपकी पूजा कौन करता है?

श्लोक 87 (skanda.2.10.87)

राज्ञा पृष्टो देवदेवः स्मृत्वा राजानमब्रवीत् । कश्चित्कुलालो मद्भक्तः कुर्वग्रामे वसत्यसौ ।

rājñā pṛṣṭo devadevaḥ smṛtvā rājānamabravīt kaścitkulālo madbhaktaḥ kurvagrāme vasatyasau

राजा द्वारा पूछे जाने पर देवाधिदेव ने राजा को स्मरण करते हुए कहा, 'कुर्वग्राम में रहने वाला मेरा एक कुम्हार-भक्त है,

श्लोक 88 (skanda.2.10.88)

स्वगृहेऽर्चयते राजंस्तदंगीक्रियते मया । इति देववचः श्रुत्वा तं द्रष्टुं प्रययौ नृपः ।

svagṛhe'rcayate rājaṁstadaṁgīkriyate mayā iti devavacaḥ śrutvā taṁ draṣṭuṁ prayayau nṛpaḥ

जो अपने ही घर में मेरी पूजा करता है, हे राजन्; और मैं उसे स्वीकार करता हूँ।' देव के इन वचनों को सुनकर राजा उसे देखने के लिए चला गया।

श्लोक 89 (skanda.2.10.89)

गत्वा कुर्वपुरं तस्य कुलालस्य गृहं ययौ । राजानमागतं दृष्ट्वा प्रणम्यैवाग्रतः स्थितः ।

gatvā kurvapuraṁ tasya kulālasya gṛhaṁ yayau rājānamāgataṁ dṛṣṭvā praṇamyaivāgrataḥ sthitaḥ

कुर्वपुर जाकर वह उस कुम्हार के घर पहुँचा। राजा को आया देखकर, कुम्हार प्रणाम करके सामने खड़ा हो गया।

श्लोक 90 (skanda.2.10.90)

स्थितं तं भीमनामानं पप्रच्छ नृपसत्तमः । तोण्डमानुवाच । भीम पूजयसे देवं कथं वद कुलोत्तम ।

sthitaṁ taṁ bhīmanāmānaṁ papraccha nṛpasattamaḥ toṇḍamānuvāca bhīma pūjayase devaṁ kathaṁ vada kulottama

वहाँ खड़े उस भीम नामक कुम्हार से श्रेष्ठ राजा ने पूछा — तोण्डमान ने कहा — हे भीम, हे कुलश्रेष्ठ! बताओ, तुम देव की पूजा किस प्रकार करते हो?

श्लोक 91 (skanda.2.10.91)

श्रीवराह उवाच । पृष्टः प्राह कुलालोऽपि जातु जाने न चार्चनम् । केनोक्तं नृपतिश्रेष्ठ कुलालोऽर्चयतीति हि ।

śrīvarāha uvāca pṛṣṭaḥ prāha kulālo'pi jātu jāne na cārcanam kenoktaṁ nṛpatiśreṣṭha kulālo'rcayatīti hi

श्री वराह ने कहा — पूछे जाने पर वह कुम्हार भी बोला, 'मैं तो कभी कोई पूजा जानता ही नहीं। किसने कहा, हे श्रेष्ठ राजन्, कि यह कुम्हार पूजा करता है?'

श्लोक 92 (skanda.2.10.92)

तोण्डमानुवाच । देवेन श्रीनिवासेन ममोक्तं हि त्वदर्चनम् । स तु श्रुत्वा नृपवचः स्मृत्वा देववरं पुरा ।

toṇḍamānuvāca devena śrīnivāsena mamoktaṁ hi tvadarcanam sa tu śrutvā nṛpavacaḥ smṛtvā devavaraṁ purā

तोण्डमान ने कहा — देव श्रीनिवास ने ही मुझे तुम्हारी पूजा के विषय में बताया है। यह सुनकर उसने पूर्वकाल में देव द्वारा दिए गए वर को स्मरण किया —

श्लोक 93 (skanda.2.10.93)

भीम उवाच । यदा प्रकाशिता पूजा यदा राजा समागतः । तोण्डमांस्तेन संवादस्तदा मोक्षं गमिष्यसि ।

bhīma uvāca yadā prakāśitā pūjā yadā rājā samāgataḥ toṇḍamāṁstena saṁvādastadā mokṣaṁ gamiṣyasi

भीम ने कहा — 'जब तुम्हारी पूजा प्रकट हो जाएगी, और जब राजा स्वयं आएगा, तोण्डमान से यह संवाद होते ही तुम मोक्ष को प्राप्त हो जाओगे।'

श्लोक 94 (skanda.2.10.94)

इति पूर्वं वरं देवो दत्तवान्वेकटेश्वरः ।

iti pūrvaṁ varaṁ devo dattavānvekaṭeśvaraḥ

इस प्रकार वेंकटेश्वर देव ने पहले ही यह वर दिया था।

श्लोक 95 (skanda.2.10.95)

इत्युक्त्वाथ कुलालोऽपि पत्न्या सार्धं तथैव च । विमानमागतं दृष्ट्वा देवं दृष्ट्वा जनार्दनम् ।

ityuktvātha kulālo'pi patnyā sārdhaṁ tathaiva ca vimānamāgataṁ dṛṣṭvā devaṁ dṛṣṭvā janārdanam

इतना कहकर, वह कुम्हार अपनी पत्नी सहित उसी क्षण, आकाश में विमान को आया देखकर, जनार्दन देव को साक्षात् देखकर,

श्लोक 96 (skanda.2.10.96)

प्रणमन्प्रजहौ प्राणान्सदारो भक्तसत्तमः । पश्यतो राजराजस्य विमानमधिरुह्य च ।

praṇamanprajahau prāṇānsadāro bhaktasattamaḥ paśyato rājarājasya vimānamadhiruhya ca

प्रणाम करते हुए अपने प्राण त्याग दिए — वह श्रेष्ठ भक्त अपनी पत्नी सहित, राजाओं के राजा के देखते-देखते ही, विमान पर सवार होकर,

श्लोक 97 (skanda.2.10.97)

दिव्यरूपधरो देव्या सार्धं विष्णुपदं ययौ । दृष्ट्वा राजाद्भुतं तत्र स्वपुरं प्राप्य हर्षितः ।

divyarūpadharo devyā sārdhaṁ viṣṇupadaṁ yayau dṛṣṭvā rājādbhutaṁ tatra svapuraṁ prāpya harṣitaḥ

दिव्य रूप धारण करके देवी (लक्ष्मी) सहित विष्णु के धाम को चला गया। वहाँ यह अद्भुत घटना देखकर राजा प्रसन्नतापूर्वक अपनी नगरी को लौटा।

श्लोक 98 (skanda.2.10.98)

स्वपुत्रं श्रीनिवासाख्यमभिषिच्य विधानतः । परिपालय धर्मेण मानवांश्च वसुन्धराम् ।

svaputraṁ śrīnivāsākhyamabhiṣicya vidhānataḥ paripālaya dharmeṇa mānavāṁśca vasundharām

अपने पुत्र, जिसका नाम श्रीनिवास था, को विधिपूर्वक अभिषिक्त करके, [उससे कहा] 'धर्मपूर्वक मनुष्यों और इस पृथ्वी की रक्षा करो,'

श्लोक 99 (skanda.2.10.99)

इत्याज्ञाप्य सुतं धीमांस्तताप परमं तपः । तप्यतस्तस्य देवोऽपि प्रत्यक्षमभवद्धरिः ।

ityājñāpya sutaṁ dhīmāṁstatāpa paramaṁ tapaḥ tapyatastasya devo'pi pratyakṣamabhavaddhariḥ

पुत्र को इस प्रकार आज्ञा देकर उस बुद्धिमान राजा ने परम तप करना आरंभ किया। उसके तप करते ही देव हरि उसके समक्ष प्रत्यक्ष प्रकट हुए,

श्लोक 100 (skanda.2.10.100)

आरुह्य गरुडं देवो रमाभूमिसमन्वितः ।

āruhya garuḍaṁ devo ramābhūmisamanvitaḥ

गरुड़ पर सवार, रमा और भूमि सहित देव।

श्लोक 101 (skanda.2.10.101)

श्रीभगवानुवाच । किं करोमि नृपश्रेष्ठ तपसा तोषितस्तव । इत्युक्तो देवदेवेन तोण्डमानपि राजराट् ।

śrībhagavānuvāca kiṁ karomi nṛpaśreṣṭha tapasā toṣitastava ityukto devadevena toṇḍamānapi rājarāṭ

श्री भगवान ने कहा — हे श्रेष्ठ राजन्! तुम्हारे तप से प्रसन्न होकर, मैं तुम्हारे लिए क्या करूँ? देवाधिदेव द्वारा यह पूछे जाने पर, वह राजाओं का राजा तोण्डमान,

श्लोक 102 (skanda.2.10.102)

प्रीतिमान्प्राञ्जलिर्भूत्वा सगद्गदमुवाच ह । त्वल्लोके वस्तुमिच्छामि जरामरणवर्जिते ।

prītimānprāñjalirbhūtvā sagadgadamuvāca ha tvalloke vastumicchāmi jarāmaraṇavarjite

प्रसन्नचित्त होकर, हाथ जोड़कर, गद्गद स्वर में बोला — 'मैं जरा-मरण से रहित आपके लोक में सदा वास करना चाहता हूँ।

श्लोक 103 (skanda.2.10.103)

इदमेव वरं देहि माधवैतन्ममेप्सितम् ।

idameva varaṁ dehi mādhavaitanmamepsitam

हे माधव! मुझे यही वर दीजिए, यही मेरी अभिलाषा है।'

श्लोक 104 (skanda.2.10.104)

श्रीवराह उवाच । इत्युक्त्वा निपपातोर्व्यां साष्टांगं देवसन्निधौ । तदा कलेवरं मुक्त्वा विमानं त्वारुरोह च ।

śrīvarāha uvāca ityuktvā nipapātorvyāṁ sāṣṭāṁgaṁ devasannidhau tadā kalevaraṁ muktvā vimānaṁ tvāruroha ca

श्री वराह ने कहा — इतना कहकर वह देव के समक्ष साष्टांग होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा; तभी अपनी देह त्यागकर वह विमान पर आरूढ़ हो गया,

श्लोक 105 (skanda.2.10.105)

गन्धर्वैः स्तूयमानोऽसौ सारूप्यं प्राप्य शार्ङ्गिणः । यच्छोकमोहहतं जरामरणवर्जितम् ।

gandharvaiḥ stūyamāno'sau sārūpyaṁ prāpya śārṅgiṇaḥ yacchokamohahataṁ jarāmaraṇavarjitam

गंधर्वों द्वारा स्तुति किए जाते हुए, शार्ङ्गधारी विष्णु के सारूप्य को प्राप्त करके, वह शोक-मोह से रहित, जरा-मरण से मुक्त,

श्लोक 106 (skanda.2.10.106)

पुनरावृत्तिरहितं तद्विष्णोः पदमाययौ ।

punarāvṛttirahitaṁ tadviṣṇoḥ padamāyayau

पुनरावृत्ति से रहित उस विष्णु-पद को प्राप्त हुआ।

श्लोक 107 (skanda.2.10.107)

अथैतन्माहात्म्यश्रवणपठनफलश्रुतिः । एतद्भविष्यं देवेशि मयोक्तं वरवर्णिनि । यः श्रावयेद्यः शृणुयाद्विष्णुलोकं स गच्छति ।

athaitanmāhātmyaśravaṇapaṭhanaphalaśrutiḥ etadbhaviṣyaṁ deveśi mayoktaṁ varavarṇini yaḥ śrāvayedyaḥ śṛṇuyādviṣṇulokaṁ sa gacchati

अब इस भावी वृत्तांत के श्रवण और पठन के फल का वर्णन सुनो — हे देवेशी, हे वरवर्णिनी! मैंने तुम्हें यह भविष्य कह सुनाया है; जो इसे दूसरों को सुनाता है, या जो इसे सुनता है, वह विष्णुलोक को प्राप्त होता है।

श्लोक 108 (skanda.2.10.108)

श्रीसूत उवाच । इत्युक्तं देवदेवेन सभविष्यं सहोत्तरम् । शृणुयाद्यः पठेद्भक्त्या कथां पुण्यां पुरातनीम् ।

śrīsūta uvāca ityuktaṁ devadevena sabhaviṣyaṁ sahottaram śṛṇuyādyaḥ paṭhedbhaktyā kathāṁ puṇyāṁ purātanīm

श्री सूत ने कहा — देवाधिदेव द्वारा भविष्य सहित इस प्रकार उत्तर सहित कहे जाने पर, जो कोई भी इस पवित्र, प्राचीन कथा को भक्तिपूर्वक सुनता या पढ़ता है,

श्लोक 109 (skanda.2.10.109)

स तु भुक्त्वाखिलान्कामानन्ते विष्णुपदं व्रजेत् ।

sa tu bhuktvākhilānkāmānante viṣṇupadaṁ vrajet

वह समस्त इच्छित भोगों का उपभोग करके, अंत में विष्णु-पद को प्राप्त होता है।

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