वैष्णव खण्ड · अध्याय 9
वसु, रंगदास एवं राजा तोण्डमान की उत्पत्ति तथा पद्मसरोवर महिमा
श्लोक 1 (skanda.2.9.1)
धरण्युवाच । कलौ युगे भूमिधर केन त्वं द्रक्ष्यसे प्रिय । विमानं केन ते देव कार्यतेऽस्मिन्महीधरे ।
dharaṇyuvāca kalau yuge bhūmidhara kena tvaṁ drakṣyase priya vimānaṁ kena te deva kāryate'sminmahīdhare
धरणी ने कहा — हे भूमिधर (पर्वत को धारण करने वाले)! कलियुग में तुम्हें कौन देखेगा, हे प्रिय? इस पर्वत पर तुम्हारा विमान (मंदिर) किसके द्वारा बनाया जाएगा?
श्लोक 2 (skanda.2.9.2)
श्रीनिवासोऽपि केनैव द्रक्ष्यते सुभगाकृतिः । एतद्ब्रूहि मम प्रीत्या श्रोतुं कौतूहलं विभो ।
śrīnivāso'pi kenaiva drakṣyate subhagākṛtiḥ etadbrūhi mama prītyā śrotuṁ kautūhalaṁ vibho
श्रीनिवास, जिनका रूप इतना सुभग है, किसके द्वारा दर्शन पाएँगे? हे प्रभु! यह मुझे प्रेमपूर्वक बताइए, यह सुनने की मुझे उत्कंठा है।
श्लोक 3 (skanda.2.9.3)
श्रीवराह उवाच । वक्ष्यामि शृणु हे देवि भविष्यद्यद्वदामि ते । अस्मिन्महीधरे पुण्ये निषादो वसुनामकः ।
śrīvarāha uvāca vakṣyāmi śṛṇu he devi bhaviṣyadyadvadāmi te asminmahīdhare puṇye niṣādo vasunāmakaḥ
श्री वराह ने कहा — हे देवी! सुनो, मैं तुम्हें बताता हूँ जो होने वाला है। इस पवित्र पर्वत पर वसु नामक एक निषाद (शिकारी) रहता था,
श्लोक 4 (skanda.2.9.4)
श्यामाकवनपालोऽभूद्भक्तिमान्पुरुषोत्तमे । श्यामाकतंडुलान्पक्त्वा मधुना परिषिच्य च ।
śyāmākavanapālo'bhūdbhaktimānpuruṣottame śyāmākataṁḍulānpaktvā madhunā pariṣicya ca
जो श्यामाक (एक प्रकार का धान्य) के वन का रक्षक था और पुरुषोत्तम का भक्त था। वह श्यामाक के चावल पकाकर, मधु मिलाकर,
श्लोक 5 (skanda.2.9.5)
निवेद्य देवदेवाय श्रीभूमि सहिताय च । एवं भक्तिमतस्तस्य भार्या चित्रवती शुभा ।
nivedya devadevāya śrībhūmi sahitāya ca evaṁ bhaktimatastasya bhāryā citravatī śubhā
श्री और भूमि सहित देवाधिदेव को अर्पित करता था। इस प्रकार भक्तिमान उस निषाद की पत्नी, शुभ चित्रवती ने,
श्लोक 6 (skanda.2.9.6)
असूत तनयं बाला वीरनामानमुत्तमम् । वसुः पुत्रेण सहितो भार्यया पतिभक्तया ।
asūta tanayaṁ bālā vīranāmānamuttamam vasuḥ putreṇa sahito bhāryayā patibhaktayā
वीर नामक एक उत्तम पुत्र को जन्म दिया। एक दिन वसु अपने पति-भक्त पत्नी और पुत्र सहित,
श्लोक 7 (skanda.2.9.7)
कस्मिंश्चिद्दिवसे पुत्रं श्यामाकं पालयेति च । विसृज्य पत्न्या सहितो मध्वन्वेषणतत्परः ।
kasmiṁściddivase putraṁ śyāmākaṁ pālayeti ca visṛjya patnyā sahito madhvanveṣaṇatatparaḥ
पुत्र को श्यामाक की रखवाली करने को कहकर, पत्नी सहित मधु ढूँढ़ने में तत्पर होकर,
श्लोक 8 (skanda.2.9.8)
गतो वनान्तरं शीघ्रं मधुच्छत्रदिदृक्षया । बालः श्यामाकपक्वानि गृहीत्वाग्नौ निधाय च ।
gato vanāntaraṁ śīghraṁ madhucchatradidṛkṣayā bālaḥ śyāmākapakvāni gṛhītvāgnau nidhāya ca
शीघ्र ही मधुछत्ते की तलाश में वन के भीतर चला गया। उधर बालक ने पके श्यामाक के दाने लेकर, अग्नि में डालकर,
श्लोक 9 (skanda.2.9.9)
पिष्ट्वा निवेदयामास वृक्षमूले श्रियः पतेः । नैवेद्यं भक्षयित्वैव वीरस्त्वास सुखेन वै ।
piṣṭvā nivedayāmāsa vṛkṣamūle śriyaḥ pateḥ naivedyaṁ bhakṣayitvaiva vīrastvāsa sukhena vai
उन्हें पीसकर, वृक्ष की जड़ में श्री के पति को अर्पित किया। नैवेद्य ग्रहण करके ही वीर सुखपूर्वक बैठा रहा।
श्लोक 10 (skanda.2.9.10)
तदन्तरे वसुश्चापि मध्वादाय समागतः । श्यामाकान्भक्षितान्दृष्ट्वा संतर्ज्य सुतमात्मनः ।
tadantare vasuścāpi madhvādāya samāgataḥ śyāmākānbhakṣitāndṛṣṭvā saṁtarjya sutamātmanaḥ
इसी बीच वसु भी मधु लेकर लौट आया; अपने पुत्र को श्यामाक खाया हुआ देखकर उसे डाँटते हुए,
श्लोक 11 (skanda.2.9.11)
खड्गमादाय तं हन्तुं त्वरया हस्तमुद्दधौ ।
khaḍgamādāya taṁ hantuṁ tvarayā hastamuddadhau
खड्ग उठाकर उसे शीघ्र मार डालने के लिए हाथ उठाया।
श्लोक 12 (skanda.2.9.12)
तद्वृक्षस्थस्तदा विष्णुः खड्गं जग्राह पाणिना । खड्गो गृहीतः केनेति पश्यन्वृक्षं ददर्श सः ।
tadvṛkṣasthastadā viṣṇuḥ khaḍgaṁ jagrāha pāṇinā khaḍgo gṛhītaḥ keneti paśyanvṛkṣaṁ dadarśa saḥ
उस समय वृक्ष पर स्थित विष्णु ने अपने हाथ से वह खड्ग पकड़ लिया। 'यह खड्ग किसने पकड़ लिया?' यह देखने के लिए उसने वृक्ष की ओर देखा,
श्लोक 13 (skanda.2.9.13)
शङ्खचक्रगदापाणिं वृक्षारूढार्धविग्रहम् । मुक्त्वा वसुश्च तं खड्गं प्रणम्योवाच केशवम् ।
śaṅkhacakragadāpāṇiṁ vṛkṣārūḍhārdhavigraham muktvā vasuśca taṁ khaḍgaṁ praṇamyovāca keśavam
और शंख, चक्र, गदा हाथों में लिए, वृक्ष पर आधे शरीर से प्रकट उस रूप को देखा। वसु ने भी वह खड्ग छोड़कर प्रणाम करके केशव से कहा —
श्लोक 14 (skanda.2.9.14)
किमिदं देवदेवेश चेष्टितं क्रियते त्वया ।
kimidaṁ devadeveśa ceṣṭitaṁ kriyate tvayā
'हे देवाधिदेव! यह आपने क्या किया है?'
श्लोक 15 (skanda.2.9.15)
श्रीभगवानुवाच । वसो शृणु वचो मे त्वं पुत्रस्ते भक्तिमान्मयि । त्वत्तोऽपि मे प्रियतमस्तस्मात्प्रत्यक्षमागतः ।
śrībhagavānuvāca vaso śṛṇu vaco me tvaṁ putraste bhaktimānmayi tvatto'pi me priyatamastasmātpratyakṣamāgataḥ
श्री भगवान ने कहा — हे वसु! मेरी बात सुनो। तुम्हारा पुत्र मेरा भक्त है; वह मुझे तुमसे भी अधिक प्रिय है, इसीलिए मैं प्रत्यक्ष प्रकट हुआ।
श्लोक 16 (skanda.2.9.16)
अस्य सर्वत्र तिष्ठामि तव स्वामिसरस्तटे । इति देववचः श्रुत्वा प्रीतिमानभवद्वसुः ।
asya sarvatra tiṣṭhāmi tava svāmisarastaṭe iti devavacaḥ śrutvā prītimānabhavadvasuḥ
मैं सर्वत्र हूँ, परन्तु यहाँ तुम्हारे स्वामी सरोवर के तट पर सदा निवास करता हूँ।' देव के ये वचन सुनकर वसु अत्यंत प्रसन्न हुआ।
श्लोक 17 (skanda.2.9.17)
एतस्मिन्नेव काले तु पांड्यदेशात्समागतः । बाल्यात्प्रभृति शूद्रोऽपि विष्णुभक्तिसमन्वितः ।
etasminneva kāle tu pāṁḍyadeśātsamāgataḥ bālyātprabhṛti śūdro'pi viṣṇubhaktisamanvitaḥ
इसी समय पांड्य देश से एक शूद्र आया, जो बचपन से ही विष्णु-भक्ति से युक्त था।
श्लोक 18 (skanda.2.9.18)
नारायणपुरीं प्राप्य श्रीवराहं प्रणम्य च । तत्र श्रुत्वा श्रीनिवासं वेंकटाद्रिनिवासिनम् ।
nārāyaṇapurīṁ prāpya śrīvarāhaṁ praṇamya ca tatra śrutvā śrīnivāsaṁ veṁkaṭādrinivāsinam
नारायणपुरी पहुँचकर, श्री वराह को प्रणाम करके, वहाँ वेंकटाद्रि-निवासी श्रीनिवास का वृत्तांत सुनकर,
श्लोक 19 (skanda.2.9.19)
स्वयंभुवं देवदेवसेवितं प्रययौ ततः । सुवर्णमुखरीं प्राप्य स्नात्वा चोत्तीर्य तत्तटे ।
svayaṁbhuvaṁ devadevasevitaṁ prayayau tataḥ suvarṇamukharīṁ prāpya snātvā cottīrya tattaṭe
स्वयंभू, देवाधिदेव द्वारा सेवित, उन्हीं की ओर चल पड़ा। सुवर्णमुखरी नदी तक पहुँचकर, वहाँ स्नान करके, तट पर उतरकर,
श्लोक 20 (skanda.2.9.20)
कमलाख्ये सरसि च स्नात्वा पुण्यप्रदायिनि । तत्तीरवासिनं देवं कृष्णं रामेण संवृतम् ।
kamalākhye sarasi ca snātvā puṇyapradāyini tattīravāsinaṁ devaṁ kṛṣṇaṁ rāmeṇa saṁvṛtam
कमला नामक पुण्यदायी सरोवर में स्नान करके, वहाँ तट पर बलराम सहित विराजमान श्रीकृष्ण को,
श्लोक 21 (skanda.2.9.21)
नमस्कृत्य ततः प्रायाद्वनं गजघटायुतम् । शनैः संप्राप्य शेषाद्रिं निर्झरं संददर्श ह ।
namaskṛtya tataḥ prāyādvanaṁ gajaghaṭāyutam śanaiḥ saṁprāpya śeṣādriṁ nirjharaṁ saṁdadarśa ha
प्रणाम करके, फिर हाथियों के झुंड से भरे वन की ओर चला। धीरे-धीरे शेषाद्रि पहुँचकर उसने एक झरना देखा,
श्लोक 22 (skanda.2.9.22)
तत्समीपं समासाद्य कपिलापूजितं शिवम् । तत्पुरश्चक्रतीर्थं तदगाधं पापनाशनम् ।
tatsamīpaṁ samāsādya kapilāpūjitaṁ śivam tatpuraścakratīrthaṁ tadagādhaṁ pāpanāśanam
उसके निकट कपिला (गाय) द्वारा पूजित शिव को, और उनके सामने चक्रतीर्थ नामक गहरा पापनाशक तीर्थ को देखा।
श्लोक 23 (skanda.2.9.23)
तत्र स्नात्वा ततोऽगच्छद्वेंकटाद्रिं शनैःशनैः । आराद्धुं गच्छता मार्गे युक्तो वैखानसेन च ।
tatra snātvā tato'gacchadveṁkaṭādriṁ śanaiḥśanaiḥ ārāddhuṁ gacchatā mārge yukto vaikhānasena ca
वहाँ स्नान करके वह धीरे-धीरे वेंकटाद्रि की ओर बढ़ा; आराधना के लिए जाते हुए मार्ग में वैखानस मुनि से भेंट हुई,
श्लोक 24 (skanda.2.9.24)
रंगदासस्त्वारुरोह बालो द्वादशवार्षिकः । स्वामिपुष्करिणीं प्राय स्नात्वा भक्तिसमन्वितः ।
raṁgadāsastvāruroha bālo dvādaśavārṣikaḥ svāmipuṣkariṇīṁ prāya snātvā bhaktisamanvitaḥ
और साथ ही बारह वर्ष का बालक रंगदास भी उस मार्ग में सम्मिलित हुआ। स्वामिपुष्करिणी पहुँचकर, स्नान करके, भक्तिभाव से युक्त होकर,
श्लोक 25 (skanda.2.9.25)
वैखानसेन मुनिना गोपीनाथेन पूजितम् । वनमध्ये तरोर्मूले स्वामिपुष्करिणीतटे ।
vaikhānasena muninā gopīnāthena pūjitam vanamadhye tarormūle svāmipuṣkariṇītaṭe
वैखानस मुनि गोपीनाथ द्वारा पूजित, वन के बीच एक वृक्ष के नीचे, स्वामिपुष्करिणी के तट पर,
श्लोक 26 (skanda.2.9.26)
तिष्ठन्तं पुण्डरीकाक्षं श्रीभूमिसहितं हरिम् । आकाशस्थं संददर्श पीतनीलाकृतिं शुभम् ।
tiṣṭhantaṁ puṇḍarīkākṣaṁ śrībhūmisahitaṁ harim ākāśasthaṁ saṁdadarśa pītanīlākṛtiṁ śubham
आकाश में स्थित, पुण्डरीकाक्ष हरि को, श्री और भूमि सहित, पीत-नील वर्ण के शुभ रूप में विराजमान देखा।
श्लोक 27 (skanda.2.9.27)
पार्श्वस्थशंखचक्राभ्यां गदासिभ्यां निषेवितम् । पक्षौ विस्तार्य चाकाशे देवमूर्ध्नि वितानवत् ।
pārśvasthaśaṁkhacakrābhyāṁ gadāsibhyāṁ niṣevitam pakṣau vistārya cākāśe devamūrdhni vitānavat
वे पार्श्व में शंख, चक्र, गदा, तलवार से सेवित थे; आकाश में पंख फैलाए गरुड़ उनके मस्तक पर छत्र के समान स्थित थे,
श्लोक 28 (skanda.2.9.28)
स्थितं च गरुडेशानं पश्चाच्छार्ङ्गं शरं तथा ।
sthitaṁ ca garuḍeśānaṁ paścācchārṅgaṁ śaraṁ tathā
और उनके पीछे शार्ङ्ग धनुष तथा बाण भी उपस्थित थे।
श्लोक 29 (skanda.2.9.29)
अथ श्रीनिवासार्थं रंगदासकृतदिव्योद्यानमण्डपादिनिर्माणानि । एवं दृष्ट्वा श्रीनिवासं विस्मितो रंगदासकः । अस्य देवस्य चारामं करिष्यामीत्यचिन्तयत् ।
atha śrīnivāsārthaṁ raṁgadāsakṛtadivyodyānamaṇḍapādinirmāṇāni evaṁ dṛṣṭvā śrīnivāsaṁ vismito raṁgadāsakaḥ asya devasya cārāmaṁ kariṣyāmītyacintayat
इस प्रकार श्रीनिवास को देखकर रंगदास विस्मित हो गया; उसने सोचा, 'मैं इस देव के लिए एक उद्यान बनाऊँगा।'
श्लोक 30 (skanda.2.9.30)
निश्चित्य मनसा सर्वं तरुमूलेऽवसत्सुधीः । कृत्वा वैखानसाद्विष्णोर्नैवेद्यं च दिनेदिने ।
niścitya manasā sarvaṁ tarumūle'vasatsudhīḥ kṛtvā vaikhānasādviṣṇornaivedyaṁ ca dinedine
मन में यह सब निश्चय करके वह बुद्धिमान वृक्ष की जड़ में रहने लगा; प्रतिदिन वैखानस से विष्णु का नैवेद्य [सीखकर] बनाता,
श्लोक 31 (skanda.2.9.31)
शनैश्छित्त्वा वनं घोरं वृक्षांश्चिच्छेद पार्श्वगान् । आस्थानचिञ्चां देवस्य रमायाश्चम्पकं तरुम् ।
śanaiśchittvā vanaṁ ghoraṁ vṛkṣāṁściccheda pārśvagān āsthānaciñcāṁ devasya ramāyāścampakaṁ tarum
और धीरे-धीरे घने वन को काटकर, आसपास के वृक्षों को छाँटकर, देव की चिंचा (इमली) और रमा की चंपक वृक्ष को छोड़कर,
श्लोक 32 (skanda.2.9.32)
देवाज्ञप्तो वर्जयित्वा तावुभौ देवसेवितौ । देवस्यपरितो भूमौ शिलाकुड्यं तदाकरोत् ।
devājñapto varjayitvā tāvubhau devasevitau devasyaparito bhūmau śilākuḍyaṁ tadākarot
जो देव की आज्ञा से देव-सेवित थे — उन दोनों को छोड़कर देव के चारों ओर की भूमि पर उसने पत्थर की दीवार बनाई,
श्लोक 33 (skanda.2.9.33)
तत्कुड्यस्यैव परितः पुष्पारामांश्चकार ह । मल्लिकाकरवीराब्जकुन्दमंदारमालतीः ।
tatkuḍyasyaiva paritaḥ puṣpārāmāṁścakāra ha mallikākaravīrābjakundamaṁdāramālatīḥ
और उस दीवार के भीतर सब ओर फूलों के बगीचे बनाए — मल्लिका, कनेर, कमल, कुंद, मंदार और मालती के,
श्लोक 34 (skanda.2.9.34)
तुलसीचम्पकानां तु वनान्येव चकार ह । खनित्वा तत्र कूपं तु वर्धयंस्तज्जलैर्वनम् ।
tulasīcampakānāṁ tu vanānyeva cakāra ha khanitvā tatra kūpaṁ tu vardhayaṁstajjalairvanam
तथा तुलसी और चंपक के वन भी बनाए। वहाँ एक कुआँ खोदकर, उसके जल से वन को सींचते हुए,
श्लोक 35 (skanda.2.9.35)
आरामपुष्पाण्यादाय स्वयं दामान्यथाकरोत् । विचित्राणि तदा बद्ध्वा पूजकस्य करे ददौ ।
ārāmapuṣpāṇyādāya svayaṁ dāmānyathākarot vicitrāṇi tadā baddhvā pūjakasya kare dadau
वह बगीचे के फूल लेकर स्वयं ही माला गूँथता था। इस प्रकार विविध मालाएँ गूँथकर वह पूजक (गोपीनाथ) के हाथों में दे देता था।
श्लोक 36 (skanda.2.9.36)
आदाय पूजकस्तानि स्कन्धे मूर्ध्नि बबन्ध च । श्रीनिवासस्य देवस्य श्रीभूमिसहितस्य च ।
ādāya pūjakastāni skandhe mūrdhni babandha ca śrīnivāsasya devasya śrībhūmisahitasya ca
पूजक उन्हें लेकर श्रीभूमि सहित श्रीनिवास देव के कंधे और मस्तक पर धारण कराता था।
श्लोक 37 (skanda.2.9.37)
एवं देवस्य कैंकर्यं कुर्वंस्तस्थावुदारधीः । तस्यैवं वर्तमानस्य समास्त्वा सप्ततेर्गताः ।
evaṁ devasya kaiṁkaryaṁ kurvaṁstasthāvudāradhīḥ tasyaivaṁ vartamānasya samāstvā saptatergatāḥ
इस प्रकार देव की सेवा करते हुए वह उदार बुद्धि वाला वहीं रहा। इस प्रकार सेवारत उसके सत्तर वर्ष बीत गए।
श्लोक 38 (skanda.2.9.38)
कुर्वाणे पुष्पावचयं रंगदासे महात्मनि ।
kurvāṇe puṣpāvacayaṁ raṁgadāse mahātmani
एक दिन जब वह महात्मा रंगदास फूल चुन रहा था,
श्लोक 39 (skanda.2.9.39)
आरामे सरसि स्नातुं गन्धर्वः कश्चिदाययौ । गन्धर्वराजकन्याभिस्तरुणीभिः समन्वितः ।
ārāme sarasi snātuṁ gandharvaḥ kaścidāyayau gandharvarājakanyābhistaruṇībhiḥ samanvitaḥ
बगीचे के सरोवर में स्नान करने कोई गंधर्व आया, जो युवा गंधर्व-राजकुमारियों के साथ था।
श्लोक 40 (skanda.2.9.40)
जलक्रीडां करोति स्म दिवि स्थाप्य विमानकम् । सुरूपाभिश्च सहितं क्रीडन्तं कमलाकरे ।
jalakrīḍāṁ karoti sma divi sthāpya vimānakam surūpābhiśca sahitaṁ krīḍantaṁ kamalākare
आकाश में अपना विमान रखकर, वह सुरूपा स्त्रियों के साथ कमल-सरोवर में जलक्रीड़ा करने लगा।
श्लोक 41 (skanda.2.9.41)
पश्यञ्छ्रीरंगदासोऽयं व्यस्मरन्माल्यसञ्चयम् । जितेन्द्रियोऽपि तत्कक्रीडां पश्यन्रेतः ससर्ज ह ।
paśyañchrīraṁgadāso'yaṁ vyasmaranmālyasañcayam jitendriyo'pi tatkakrīḍāṁ paśyanretaḥ sasarja ha
यह देखकर श्री रंगदास फूलों की टोकरी भूल गया; इंद्रियों को वश में रखने वाला होते हुए भी, उस क्रीड़ा को देखकर उसका वीर्यस्खलन हो गया।
श्लोक 42 (skanda.2.9.42)
पश्यतस्तस्य सरसः समुत्तीर्य मनोहरम् । दिव्यवस्त्राणि चाच्छाद्य कान्ताभिः सह सस्मितम् ।
paśyatastasya sarasaḥ samuttīrya manoharam divyavastrāṇi cācchādya kāntābhiḥ saha sasmitam
उसे देखते हुए ही वह गंधर्व मनोहर सरोवर से बाहर निकलकर, दिव्य वस्त्र धारण कर, मुस्कुराती प्रियाओं के साथ,
श्लोक 43 (skanda.2.9.43)
अधिरुह्य विमानं तु ययौ स धनदालयम् । गते गन्धर्वराजे तु रंगदासो विमोहितः ।
adhiruhya vimānaṁ tu yayau sa dhanadālayam gate gandharvarāje tu raṁgadāso vimohitaḥ
अपने विमान पर चढ़कर कुबेर के लोक को चला गया। गंधर्वराज के चले जाने पर रंगदास अत्यंत मोहित होकर,
श्लोक 44 (skanda.2.9.44)
त्यक्त्वा च तानि माल्यानि स्नात्वा सरसि लज्जितः । पुनराहृत्य पुष्पाणि शनैर्देवालयं ययौ ।
tyaktvā ca tāni mālyāni snātvā sarasi lajjitaḥ punarāhṛtya puṣpāṇi śanairdevālayaṁ yayau
उन मालाओं को छोड़कर, सरोवर में स्नान करके, लज्जित होकर, फिर से फूल लेकर, धीरे-धीरे देवालय की ओर गया।
श्लोक 45 (skanda.2.9.45)
वैखानसस्तु तं दृष्ट्वा पूजाकालमतीत्य च । आगतं किमिति प्राह सखेऽतिक्रम्य चागतः ।
vaikhānasastu taṁ dṛṣṭvā pūjākālamatītya ca āgataṁ kimiti prāha sakhe'tikramya cāgataḥ
वैखानस ने उसे पूजा का समय बीत जाने पर आया देखकर पूछा, 'हे मित्र! तुम पूजा का समय बीता कर आए, ऐसा क्यों हुआ?
श्लोक 46 (skanda.2.9.46)
न बद्धा मालिकाश्चापि त्वयाऽऽरामे च किं कृतम् ।
na baddhā mālikāścāpi tvayā''rāme ca kiṁ kṛtam
तुमने मालाएँ भी नहीं गूँथीं, और बगीचे में क्या किया?'
श्लोक 47 (skanda.2.9.47)
श्रीवराहउवाच । इत्थं पृष्टो रंगदासो नावदल्लज्जया ततः । लज्जितं रंगदासं तं प्रोवाच मधुसूदनः ।
śrīvarāhauvāca itthaṁ pṛṣṭo raṁgadāso nāvadallajjayā tataḥ lajjitaṁ raṁgadāsaṁ taṁ provāca madhusūdanaḥ
श्री वराह ने कहा — इस प्रकार पूछे जाने पर रंगदास लज्जा से कुछ न बोल सका। तब मधुसूदन ने उस लज्जित रंगदास से कहा —
श्लोक 48 (skanda.2.9.48)
श्रीभगवानुवाच । लज्जया किं रंगदास मया त्वं मोहितो ह्यसि । त्वं तावज्जितकामोऽसि धीरो भव महामते ।
śrībhagavānuvāca lajjayā kiṁ raṁgadāsa mayā tvaṁ mohito hyasi tvaṁ tāvajjitakāmo'si dhīro bhava mahāmate
श्री भगवान ने कहा — 'हे रंगदास! लज्जा किस बात की? मैंने ही तुम्हें मोहित किया है। तुमने अपनी इंद्रियों को सचमुच जीत रखा है, इसलिए धैर्य रखो, हे महामते!
श्लोक 49 (skanda.2.9.49)
गन्धर्वराजवद्राजा भवितासि महीतले । तत्र भुक्त्वा महाभोगान्भक्तिमान्मयि सर्वदा ।
gandharvarājavadrājā bhavitāsi mahītale tatra bhuktvā mahābhogānbhaktimānmayi sarvadā
तुम इस भूतल पर गंधर्वराज के समान राजा बनोगे। वहाँ महान भोगों का उपभोग करते हुए, सदा मुझमें भक्ति रखते हुए,
श्लोक 50 (skanda.2.9.50)
प्राकारं च विमानं च कारयिष्यसि मे तदा । तत्र मुक्तिं प्रदास्यामि प्रीत्या परमया युतः ।
prākāraṁ ca vimānaṁ ca kārayiṣyasi me tadā tatra muktiṁ pradāsyāmi prītyā paramayā yutaḥ
तुम मेरे लिए प्राकार और विमान (मंदिर-भवन) बनवाओगे। तब मैं परम प्रीति सहित तुम्हें मुक्ति प्रदान करूँगा।
श्लोक 51 (skanda.2.9.51)
अत्रैव कुरु सेवां त्वमाशरीरविमोक्षणात् । मद्भक्तानां सकामानामेवं मुक्तिर्भविष्यति ।
atraiva kuru sevāṁ tvamāśarīravimokṣaṇāt madbhaktānāṁ sakāmānāmevaṁ muktirbhaviṣyati
यहीं देह-त्याग तक तुम मेरी सेवा करते रहो। इस प्रकार मेरे भक्तों को, चाहे वे सकाम ही क्यों न हों, मुक्ति प्राप्त होगी।'
श्लोक 52 (skanda.2.9.52)
इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुः पुनर्नोवाच किंचन । श्रुत्वा तद्रंगदासोऽपि चकाराराममुत्तमम् ।
ityuktvā bhagavānviṣṇuḥ punarnovāca kiṁcana śrutvā tadraṁgadāso'pi cakārārāmamuttamam
ऐसा कहकर भगवान विष्णु फिर कुछ न बोले। यह सुनकर रंगदास ने भी उस बगीचे को अत्यंत उत्तम बना दिया।
श्लोक 53 (skanda.2.9.53)
साग्रं शताब्दं सेवित्वा गतः स्वर्गममन्दधीः । जातः सोमकुले तुंगे तोण्डमानिति विश्रुतः ।
sāgraṁ śatābdaṁ sevitvā gataḥ svargamamandadhīḥ jātaḥ somakule tuṁge toṇḍamāniti viśrutaḥ
शतवर्ष के लगभग सेवा करके वह प्रबुद्ध पुरुष स्वर्ग को गया। फिर सोम-वंश में उत्तम रूप में जन्म लेकर वह तोण्डमान नाम से विख्यात हुआ,
श्लोक 54 (skanda.2.9.54)
सुवीरतनयो वीरो नन्दिनीगर्भसंभवः । स पंचवर्षादुद्भूतविष्णुभक्तिः स्वयं सुधीः । सौशील्यशौर्यवीर्यादिगुणानामाकरो महान् ।
suvīratanayo vīro nandinīgarbhasaṁbhavaḥ sa paṁcavarṣādudbhūtaviṣṇubhaktiḥ svayaṁ sudhīḥ sauśīlyaśauryavīryādiguṇānāmākaro mahān
राजा सुवीर का पुत्र, नंदिनी के गर्भ से उत्पन्न वीर। वह स्वयं बुद्धिमान, पाँच वर्ष की आयु से ही विष्णु-भक्ति से युक्त,
श्लोक 55 (skanda.2.9.55)
पाण्ड्यस्य तनयां पद्मामुपयेमे मनोहराम् । ततो राजा शतं कन्या नानादेश्याः स्वयंवराः ।
pāṇḍyasya tanayāṁ padmāmupayeme manoharām tato rājā śataṁ kanyā nānādeśyāḥ svayaṁvarāḥ
शील, शौर्य और पराक्रम आदि गुणों की महान खान था। उसने पांड्य राजा की मनोहर पुत्री पद्मा से विवाह किया। फिर उस राजा ने अनेक देशों की सौ कन्याओं का स्वयंवर [जीतकर विवाह किया],
श्लोक 56 (skanda.2.9.56)
रेमे देवेंद्रवद्भूमौ नारायणपुरे वसन् । अनुज्ञां प्राप्य पितृतः पुत्रः पंचास्यविक्रमः ।
reme deveṁdravadbhūmau nārāyaṇapure vasan anujñāṁ prāpya pitṛtaḥ putraḥ paṁcāsyavikramaḥ
और नारायणपुरी में रहकर देवेंद्र के समान पृथ्वी पर आनंद भोगने लगा। पिता से अनुमति पाकर, सिंह के समान पराक्रमी वह पुत्र,
श्लोक 57 (skanda.2.9.57)
उद्दिश्य मृगयां वीरो वेङ्कटाद्रेः समीपतः ।
uddiśya mṛgayāṁ vīro veṅkaṭādreḥ samīpataḥ
वेंकटाद्रि के निकट शिकार के उद्देश्य से गया।
श्लोक 58 (skanda.2.9.58)
पादचारेण विचरन्परिवारैः समन्वितः । मदधारां विमुंचंतं ददर्श गजयूथपम् ।
pādacāreṇa vicaranparivāraiḥ samanvitaḥ madadhārāṁ vimuṁcaṁtaṁ dadarśa gajayūthapam
वह अपने अनुचरों सहित पैदल विचरण करते हुए, मद की धारा बहाते हुए एक गजयूथपति को देखा।
श्लोक 59 (skanda.2.9.59)
तं दृष्ट्वा विस्मितो भूत्वा ग्रहीतुं तमनुद्रुतः । सुवर्णमुखरीं तीर्त्वा ब्रह्माष शुकमुत्तमम् ।
taṁ dṛṣṭvā vismito bhūtvā grahītuṁ tamanudrutaḥ suvarṇamukharīṁ tīrtvā brahmāṣa śukamuttamam
उसे देखकर विस्मित होकर, उसे पकड़ने के लिए दौड़ते हुए, सुवर्णमुखरी नदी को पार करके, उसने ब्रह्मा द्वारा [पूजित] एक उत्तम तोता देखा।
श्लोक 60 (skanda.2.9.60)
नमस्कृत्याभ्यनुज्ञातस्ततोऽगच्छद्वनाद्वनम् । ददर्श रेणुकां देवीं वल्मीकाकारसंस्थिताम् ।
namaskṛtyābhyanujñātastato'gacchadvanādvanam dadarśa reṇukāṁ devīṁ valmīkākārasaṁsthitām
प्रणाम करके अनुमति पाकर वह वन से वन में जाने लगा। उसने रेणुका देवी को एक बाँबी के आकार में स्थित देखा,
श्लोक 61 (skanda.2.9.61)
इष्टदामिष्टभक्तानां दिव्यारामनिवासिनीम् । परिवारैः सदोपेतां पूजितां त्रिदशैरपि ।
iṣṭadāmiṣṭabhaktānāṁ divyārāmanivāsinīm parivāraiḥ sadopetāṁ pūjitāṁ tridaśairapi
जो अपने प्रिय भक्तों की इच्छाएँ पूर्ण करने वाली और एक दिव्य उद्यान में निवास करने वाली थी, सदा परिवार सहित रहने वाली, देवताओं द्वारा भी पूजित।
श्लोक 62 (skanda.2.9.62)
तोण्डमानपि तां नत्वा ततः पश्चान्मुखो ययौ ।
toṇḍamānapi tāṁ natvā tataḥ paścānmukho yayau
तोण्डमान ने भी उसे प्रणाम करके फिर पश्चिम दिशा की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 63 (skanda.2.9.63)
पंचवर्णं शुकं दृष्ट्वा तं जिघृक्षुरनुद्रुतः । स वदञ्छ्रीनिवासेति गिरिं शीघ्रतरं ययौ ।
paṁcavarṇaṁ śukaṁ dṛṣṭvā taṁ jighṛkṣuranudrutaḥ sa vadañchrīnivāseti giriṁ śīghrataraṁ yayau
पंचवर्णी तोते को देखकर उसे पकड़ने की इच्छा से दौड़ते हुए, वह तोता 'श्रीनिवास' कहता हुआ शीघ्रता से पर्वत की ओर उड़ गया।
श्लोक 64 (skanda.2.9.64)
अनुद्रवन्स राजापि गिरिराजं समारुहत् । दरीश्च विविधाः पश्यञ्छिखराणि समंततः ।
anudravansa rājāpi girirājaṁ samāruhat darīśca vividhāḥ paśyañchikharāṇi samaṁtataḥ
राजा भी उसका पीछा करते हुए पर्वतराज पर चढ़ गया, चारों ओर विविध गुफाओं और शिखरों को देखता हुआ।
श्लोक 65 (skanda.2.9.65)
शुकमन्वेषमाणोऽसौ श्यामाकवनमेयिवान् । तमदृष्ट्वा शुकवरं वनपालं ददर्श ह ।
śukamanveṣamāṇo'sau śyāmākavanameyivān tamadṛṣṭvā śukavaraṁ vanapālaṁ dadarśa ha
तोते को खोजते हुए वह श्यामाक के वन में पहुँचा; उस श्रेष्ठ तोते को न पाकर उसने वन-रक्षक को देखा।
श्लोक 66 (skanda.2.9.66)
तं तु राजानमायांतं प्रत्युद्गच्छन्स सत्वरः । प्रणम्य विनयोपेतः कृताञ्जलिपुटः स्थितः ।
taṁ tu rājānamāyāṁtaṁ pratyudgacchansa satvaraḥ praṇamya vinayopetaḥ kṛtāñjalipuṭaḥ sthitaḥ
राजा को आते देखकर वह शीघ्रता से आगे बढ़ा, प्रणाम कर विनयपूर्वक हाथ जोड़कर खड़ा हो गया।
श्लोक 67 (skanda.2.9.67)
तोण्डमानपि संपूज्य तं पप्रच्छ वनेचरम् । पंचवर्णः शुकः कश्चिद्दृष्टश्चात्रागतस्त्वया ।
toṇḍamānapi saṁpūjya taṁ papraccha vanecaram paṁcavarṇaḥ śukaḥ kaściddṛṣṭaścātrāgatastvayā
तोण्डमान ने भी उसका सम्मान करके उस वनवासी से पूछा, 'क्या तुमने यहाँ कोई पंचवर्णी तोता देखा है?
श्लोक 68 (skanda.2.9.68)
श्रीनिवासेति च वदन्क्व गतोऽसौ वनेचर ।
śrīnivāseti ca vadankva gato'sau vanecara
वह 'श्रीनिवास' कहता हुआ कहाँ गया, हे वनवासी?
श्लोक 69 (skanda.2.9.69)
वनेचर उवाच । स पंचवर्णो राजेंद्र श्रीनिवासप्रियः सदा । पार्श्ववर्ती सदा तस्य श्रीभूमिभ्यां विवर्धितः ।
vanecara uvāca sa paṁcavarṇo rājeṁdra śrīnivāsapriyaḥ sadā pārśvavartī sadā tasya śrībhūmibhyāṁ vivardhitaḥ
वनवासी ने कहा — हे राजेन्द्र! वह पंचवर्णी तोता सदा श्रीनिवास का प्रिय है; वह सदा उन्हीं के पास रहता है, श्री और भूमि द्वारा पाला गया,
श्लोक 70 (skanda.2.9.70)
स्वामिपुष्करिणीतीरे सदास्ते देवसन्निधौ । ग्रहीतुं स शुकः श्रीमान्न तु केनापि शक्यते ।
svāmipuṣkariṇītīre sadāste devasannidhau grahītuṁ sa śukaḥ śrīmānna tu kenāpi śakyate
और स्वामिपुष्करिणी के तट पर सदा देव के समीप रहता है। हे श्रीमान्! उस तोते को किसी के लिए भी पकड़ना संभव नहीं है,
श्लोक 71 (skanda.2.9.71)
विहृत्य स्वेच्छया नित्यमस्मिन्गिरिवरे शुभे । दिनांते देवमासाद्य तत्समीपे वसत्ययम् ।
vihṛtya svecchayā nityamasmingirivare śubhe dināṁte devamāsādya tatsamīpe vasatyayam
क्योंकि वह प्रतिदिन अपनी इच्छा से इस शुभ पर्वत पर विचरण करता है; दिन के अंत में देव के पास पहुँचकर उन्हीं के समीप निवास करता है।
श्लोक 72 (skanda.2.9.72)
तं देवमाराधयितुं गमिष्यामि नृपात्मज । विश्रम्यतां वृक्षमूले यावदागमनं मम ।
taṁ devamārādhayituṁ gamiṣyāmi nṛpātmaja viśramyatāṁ vṛkṣamūle yāvadāgamanaṁ mama
हे राजकुमार! मैं भी उन्हीं देव की आराधना करने जाऊँगा। तब तक तुम इस वृक्ष की जड़ में विश्राम करो, जब तक मैं न लौटूँ,
श्लोक 73 (skanda.2.9.73)
पुत्रेणानेन सहितो विहर त्वं यथासुखम् ।
putreṇānena sahito vihara tvaṁ yathāsukham
इस पुत्र के साथ तुम सुखपूर्वक विचरण करो।
श्लोक 74 (skanda.2.9.74)
राजोवाच । त्वया सहागमिष्यामि द्रष्टुं देवं जनार्दनम् । त्वं मे दर्शय देवेशं वेंकटाद्रिनिवासिनम् ।
rājovāca tvayā sahāgamiṣyāmi draṣṭuṁ devaṁ janārdanam tvaṁ me darśaya deveśaṁ veṁkaṭādrinivāsinam
राजा ने कहा — मैं भी तुम्हारे साथ जनार्दन देव के दर्शन करने चलूँगा। तुम मुझे भी वेंकटाद्रि-निवासी देवाधिदेव के दर्शन कराओ।
श्लोक 75 (skanda.2.9.75)
तस्य राज्ञो वचः श्रुत्वा श्यामाकं मधुमिश्रितम् । चूतपत्रपुटे क्षिप्त्वा राज्ञा सह ययौ हरिम् ।
tasya rājño vacaḥ śrutvā śyāmākaṁ madhumiśritam cūtapatrapuṭe kṣiptvā rājñā saha yayau harim
राजा के ये वचन सुनकर, मधु मिश्रित श्यामाक को आम के पत्ते के दोने में रखकर, वह निषाद राजा के साथ हरि की ओर चला।
श्लोक 76 (skanda.2.9.76)
गत्वा सुदूरमध्वानं पश्यन्तौ तौ शिलातलम् । मुहूर्तादेव संप्राप्तौ स्वामिपुष्करिणीं शुभाम् ।
gatvā sudūramadhvānaṁ paśyantau tau śilātalam muhūrtādeva saṁprāptau svāmipuṣkariṇīṁ śubhām
बहुत दूर तक चलकर, चट्टानी भूमि को पार करते हुए वे दोनों, मुहूर्त भर में ही शुभ स्वामिपुष्करिणी पहुँच गए।
श्लोक 77 (skanda.2.9.77)
स्नात्वा तत्र विधानेन राज्ञा सह निषादपः । दर्शयामास देवशं राज्ञस्तस्य महात्मनः ।
snātvā tatra vidhānena rājñā saha niṣādapaḥ darśayāmāsa devaśaṁ rājñastasya mahātmanaḥ
वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके, वह निषाद-मुखिया राजा सहित, उस महात्मा राजा को देव के दर्शन कराने ले गया।
श्लोक 78 (skanda.2.9.78)
स्वामिपुष्करिणीतीरे स्थितं श्रीवृक्षमूलके । अतसीपुष्पसंकाशमंबुजायतलोचनम् ।
svāmipuṣkariṇītīre sthitaṁ śrīvṛkṣamūlake atasīpuṣpasaṁkāśamaṁbujāyatalocanam
स्वामिपुष्करिणी के तट पर श्री वृक्ष की जड़ में विराजमान, अलसी के फूल के समान वर्ण वाले, कमल के समान विशाल नेत्रों वाले,
श्लोक 79 (skanda.2.9.79)
चतुर्भुजमुदाराङ्गमीषत्स्मितमुखांबुजम् । दिव्यपीतांबरधरं किरीटकटकोज्ज्वलम् ।
caturbhujamudārāṅgamīṣatsmitamukhāṁbujam divyapītāṁbaradharaṁ kirīṭakaṭakojjvalam
चार भुजाओं वाले, विशाल अंगों वाले, मुख पर हल्की मुस्कान वाले कमल-मुख, दिव्य पीत वस्त्र धारण किए, मुकुट और कड़ों से देदीप्यमान,
श्लोक 80 (skanda.2.9.80)
पार्श्वस्थाभ्यां सुरूपाभ्यां श्रीभूमिभ्यां समन्वितम् । परितः शंखचक्रासिगदाशार्ङ्गेषुसेवितम् ।
pārśvasthābhyāṁ surūpābhyāṁ śrībhūmibhyāṁ samanvitam paritaḥ śaṁkhacakrāsigadāśārṅgeṣusevitam
पार्श्व में सुरूपा श्री और भूमि सहित, चारों ओर शंख, चक्र, तलवार, गदा, शार्ङ्ग धनुष और बाण से सेवित,
श्लोक 81 (skanda.2.9.81)
अन्यैर्दिव्यायुधैश्चापि दिव्यमाल्यैर्निषेवितम् । स्कन्देनाराध्यमानं तं त्रिसन्ध्यं पुरुषोत्तमम् ।
anyairdivyāyudhaiścāpi divyamālyairniṣevitam skandenārādhyamānaṁ taṁ trisandhyaṁ puruṣottamam
अन्य दिव्य आयुधों और दिव्य मालाओं से भी सेवित, तीनों संध्याओं में स्कंद द्वारा पूजित उस पुरुषोत्तम को,
श्लोक 82 (skanda.2.9.82)
वल्मीकगूढपादाब्जमाजानुपुरुषोत्तमम् । ततो दृष्ट्वा मुदा देवं प्रणेमतुरुभौ तदा ।
valmīkagūḍhapādābjamājānupuruṣottamam tato dṛṣṭvā mudā devaṁ praṇematurubhau tadā
जिनके चरणकमल बाँबी में छिपे हुए थे और जो घुटनों तक पुरुष के रूप में दिखाई देते थे — उसे देखकर दोनों ने हर्षपूर्वक प्रणाम किया।
श्लोक 83 (skanda.2.9.83)
राजा तु प्रांजलिर्भूत्वा विस्मयोत्फुल्ललोचनः । आनंदलहरीं प्राप्य न प्राज्ञायत किंचन ।
rājā tu prāṁjalirbhūtvā vismayotphullalocanaḥ ānaṁdalaharīṁ prāpya na prājñāyata kiṁcana
राजा तो हाथ जोड़े, विस्मय से खिले नेत्रों वाला होकर, आनंद की लहर में डूबकर कुछ भी समझ न सका।
श्लोक 84 (skanda.2.9.84)
निषादोऽपि निवेद्यैव श्यामाकं मधुमिश्रितम् । राज्ञे तदर्धं दत्त्वैव शिष्टार्धं भुक्तवान्स्वयम् ।
niṣādo'pi nivedyaiva śyāmākaṁ madhumiśritam rājñe tadardhaṁ dattvaiva śiṣṭārdhaṁ bhuktavānsvayam
निषाद ने भी मधु मिश्रित श्यामाक अर्पित करके, उसका आधा भाग राजा को देकर, शेष आधा स्वयं खाया।
श्लोक 85 (skanda.2.9.85)
पीत्वा पुष्करिणीतोयं तेन राज्ञा समन्वितः । स पुनः श्यामकवने पुण्यां पर्णकुटीं ययौ ।
pītvā puṣkariṇītoyaṁ tena rājñā samanvitaḥ sa punaḥ śyāmakavane puṇyāṁ parṇakuṭīṁ yayau
पुष्करिणी का जल पीकर, राजा सहित वह पुनः श्यामाक-वन की पवित्र पर्णकुटी में लौट आया।
श्लोक 86 (skanda.2.9.86)
उषित्वा चैकरात्रं तु प्रातरुत्थाय भूमिपः । स्वसैन्येन समायुक्तो निवृत्तः स्वपुरं ययौ ।
uṣitvā caikarātraṁ tu prātarutthāya bhūmipaḥ svasainyena samāyukto nivṛttaḥ svapuraṁ yayau
वहाँ एक रात्रि बिताकर, प्रातः उठकर, राजा अपनी सेना सहित लौटकर अपनी नगरी को चला गया।
श्लोक 87 (skanda.2.9.87)
पुनर्देवीवनं गत्वा हयादवततार ह । चैत्रशुद्धनवम्यां तु पूजयामास रेणुकाम् ।
punardevīvanaṁ gatvā hayādavatatāra ha caitraśuddhanavamyāṁ tu pūjayāmāsa reṇukām
फिर देवी के वन में जाकर, अश्व से उतरकर, चैत्र शुक्ल नवमी के दिन उसने रेणुका देवी की पूजा की।
श्लोक 88 (skanda.2.9.88)
हविष्यं परमान्नं च सोपस्करमनेकशः । पशूपहारसहितं धूपदीपसमन्वितम् ।
haviṣyaṁ paramānnaṁ ca sopaskaramanekaśaḥ paśūpahārasahitaṁ dhūpadīpasamanvitam
हविष्य और उत्तम अन्न, विविध उपकरणों सहित, अनेक पशु-भेंट, धूप-दीप के साथ,
श्लोक 89 (skanda.2.9.89)
सुराघटीशतं दत्त्वा जातीकेसरवासितम् । एवं संपूजिता देवी प्रीता राज्ञे वरं ददौ ।
surāghaṭīśataṁ dattvā jātīkesaravāsitam evaṁ saṁpūjitā devī prītā rājñe varaṁ dadau
जायफल-केसर से सुवासित सुरा के सौ घड़े अर्पित करके, इस प्रकार पूजित देवी प्रसन्न होकर राजा को वर देने लगीं।
श्लोक 90 (skanda.2.9.90)
आविष्टः पुरुषः कश्चिदवदन्नृपसत्तमम् । शृणु राजन्भविष्यं ते राज्यं निहतकंटकम् ।
āviṣṭaḥ puruṣaḥ kaścidavadannṛpasattamam śṛṇu rājanbhaviṣyaṁ te rājyaṁ nihatakaṁṭakam
किसी पुरुष में आविष्ट होकर देवी ने उस श्रेष्ठ राजा से कहा, 'हे राजन्! सुनो, तुम्हारा राज्य आने वाले समय में शत्रुओं से रहित होगा।
श्लोक 91 (skanda.2.9.91)
राजंस्तवैव नाम्नात्र राजधानी भविष्यति । मत्समीपे महाराज चिरं राज्यं करिष्यसि ।
rājaṁstavaiva nāmnātra rājadhānī bhaviṣyati matsamīpe mahārāja ciraṁ rājyaṁ kariṣyasi
हे राजन्! तुम्हारे ही नाम पर यहाँ राजधानी बनेगी। हे महाराज! तुम मेरे निकट दीर्घकाल तक राज्य करोगे,
श्लोक 92 (skanda.2.9.92)
देवदेवप्रसादश्च भविष्यति तवानघ । इति दत्त्वा वरं तस्मा आविष्टः प्रकृतिं ययौ ।
devadevaprasādaśca bhaviṣyati tavānagha iti dattvā varaṁ tasmā āviṣṭaḥ prakṛtiṁ yayau
और हे निष्पाप! तुम्हें देवाधिदेव की कृपा भी प्राप्त होगी।' यह वर देकर, उस आविष्ट पुरुष ने अपनी सामान्य अवस्था पाई।
श्लोक 93 (skanda.2.9.93)
ततो लब्धवरो राजा ययौ शुकमुनिं पुनः ।
tato labdhavaro rājā yayau śukamuniṁ punaḥ
तब वर पाकर राजा फिर से शुक मुनि के पास गया।
श्लोक 94 (skanda.2.9.94)
अभिवाद्य मुनिं तेन पूजितो मुदितोऽभवत् । माहात्म्यं सरसो ब्रूहि कमलाख्यस्य मे मुने ।
abhivādya muniṁ tena pūjito mudito'bhavat māhātmyaṁ saraso brūhi kamalākhyasya me mune
मुनि को प्रणाम करके, उनके द्वारा सम्मानित होकर वह प्रसन्न हुआ, और बोला, 'हे मुने! मुझे इस कमल नामक सरोवर की महिमा बताइए।'
श्लोक 95 (skanda.2.9.95)
श्रीशुक उवाच । पुरा दुर्वाससः शापादवतीर्णा सुरालयात् । पद्मा पद्माक्षदयिता विष्णुना सहिता नृप ।
śrīśuka uvāca purā durvāsasaḥ śāpādavatīrṇā surālayāt padmā padmākṣadayitā viṣṇunā sahitā nṛpa
श्री शुक ने कहा — हे राजन्! प्राचीन काल में दुर्वासा के शाप से पद्मा (लक्ष्मी), जो पद्माक्ष (विष्णु) की प्रिया हैं, विष्णु सहित देवलोक से उतरकर,
श्लोक 96 (skanda.2.9.96)
सरः कांचनपद्माढ्यमिदं प्राप्य महेश्वरी । तपश्चकार वर्षाणां दिव्यानामयुतं रमा ।
saraḥ kāṁcanapadmāḍhyamidaṁ prāpya maheśvarī tapaścakāra varṣāṇāṁ divyānāmayutaṁ ramā
स्वर्ण-कमलों से भरे इस सरोवर को पाकर, वह महेश्वरी रमा दस हज़ार दिव्य वर्षों तक तप करती रहीं।
श्लोक 97 (skanda.2.9.97)
ततो देवा विचिन्वन्तः श्रियं विष्णुसमन्विताम् । पुरंदरेण संयुक्ता राजन्नस्मिन्सरोवरे ।
tato devā vicinvantaḥ śriyaṁ viṣṇusamanvitām puraṁdareṇa saṁyuktā rājannasminsarovare
तब देवगण विष्णु सहित श्री को खोजते हुए, हे राजन्, इंद्र सहित इस सरोवर में पहुँचे,
श्लोक 98 (skanda.2.9.98)
स्थिता सुवर्णकमले पुण्डरीकाक्षसंयुताम् । दृष्ट्वा प्रीतिसमायुक्ताः प्रणम्यांबुजधारिणीम् । कृताञ्जलिपुटाः सेन्द्रास्तुष्टुवुर्लोकमातरम् ।
sthitā suvarṇakamale puṇḍarīkākṣasaṁyutām dṛṣṭvā prītisamāyuktāḥ praṇamyāṁbujadhāriṇīm kṛtāñjalipuṭāḥ sendrāstuṣṭuvurlokamātaram
और उन्होंने उसे स्वर्ण-कमल पर पुण्डरीकाक्ष (विष्णु) सहित विराजमान देखा। उसे देखकर प्रसन्न होकर, कमलधारिणी देवी को प्रणाम करके, हाथ जोड़े इंद्र सहित देवताओं ने उस लोकमाता की स्तुति की।
श्लोक 99 (skanda.2.9.99)
देवा ऊचुः । नमः श्रियै लोकधात्र्यै ब्रह्ममात्रे नमोनमः । नमस्ते पद्मनेत्रायै पद्ममुख्यै नमोनमः ।
devā ūcuḥ namaḥ śriyai lokadhātryai brahmamātre namonamaḥ namaste padmanetrāyai padmamukhyai namonamaḥ
देवताओं ने कहा — लोक की धात्री श्री को नमस्कार, ब्रह्म-स्वरूपा को बारंबार नमस्कार। कमल-नेत्रा को नमस्कार, कमल-मुखी को बारंबार नमस्कार।
श्लोक 100 (skanda.2.9.100)
प्रसन्नमुखपद्मायै पद्मकान्त्यै नमोनमः । नमो बिल्ववनस्थायै विष्णुपत्न्यै नमोनमः ।
prasannamukhapadmāyai padmakāntyai namonamaḥ namo bilvavanasthāyai viṣṇupatnyai namonamaḥ
प्रसन्न कमल-मुख वाली को, कमल-सी कांति वाली को बारंबार नमस्कार। बिल्व-वन में निवास करने वाली, विष्णु-पत्नी को बारंबार नमस्कार।
श्लोक 101 (skanda.2.9.101)
विचित्रक्षौमधारिण्यै पृथुश्रोण्यै नमोनमः । पक्वबिल्वफलापीनतुंगस्तन्यै नमोनमः ।
vicitrakṣaumadhāriṇyai pṛthuśroṇyai namonamaḥ pakvabilvaphalāpīnatuṁgastanyai namonamaḥ
विचित्र रेशमी वस्त्र धारण करने वाली, विशाल नितंबों वाली को नमस्कार। पके बिल्वफल के समान उन्नत स्तनों वाली को बारंबार नमस्कार।
श्लोक 102 (skanda.2.9.102)
सुरक्तपद्मपत्राभकरपादतले शुभे । सुरत्नांगदकेयूरकांचीनूपुरशोभिते । यक्षकर्दमसंलिप्तसर्वांगे कटकोज्ज्वले ।
suraktapadmapatrābhakarapādatale śubhe suratnāṁgadakeyūrakāṁcīnūpuraśobhite yakṣakardamasaṁliptasarvāṁge kaṭakojjvale
जिनके हाथ-पैरों के तलवे लाल कमल-पत्र के समान शुभ हैं, जो उत्तम रत्नों के बाजूबंद, केयूर, करधनी और नूपुर से सुशोभित हैं, जिनके समस्त अंग यक्षकर्दम से लिप्त हैं, जो कंगनों से देदीप्यमान हैं,
श्लोक 103 (skanda.2.9.103)
मांगल्याभरणैश्चित्रैर्मुक्ताहारैर्विभूषिते । ताटंकैरवतंसैश्च शोभमानमुखांबुजे ।
māṁgalyābharaṇaiścitrairmuktāhārairvibhūṣite tāṭaṁkairavataṁsaiśca śobhamānamukhāṁbuje
जो मांगलिक और विचित्र आभूषणों तथा मोतियों की मालाओं से विभूषित हैं, जिनका कमल-मुख कर्णफूल और शिरोभूषण से सुशोभित है —
श्लोक 104 (skanda.2.9.104)
पद्महस्ते नमस्तुभ्यं प्रसीद हरिवल्लभे । ऋग्यजुःसामरूपायै विद्यायै ते नमोनमः ।
padmahaste namastubhyaṁ prasīda harivallabhe ṛgyajuḥsāmarūpāyai vidyāyai te namonamaḥ
हे कमल-हस्ता! तुम्हें नमस्कार, हे हरि-वल्लभे! प्रसन्न हो। ऋग्, यजुः और साम के रूप वाली विद्या को तुम्हें बारंबार नमस्कार।
श्लोक 105 (skanda.2.9.105)
प्रसीदास्मान्कृपादृष्टिपातैरालोकयाब्धिजे । ये दृष्टास्ते त्वया ब्रह्मरुद्रेंद्रत्वं समाप्नुयुः ।
prasīdāsmānkṛpādṛṣṭipātairālokayābdhije ye dṛṣṭāste tvayā brahmarudreṁdratvaṁ samāpnuyuḥ
हे समुद्र-कन्या! हम पर प्रसन्न होकर अपनी कृपा-दृष्टि से हमें देखो। जिन्हें तुम देख लेती हो, वे ब्रह्मा, रुद्र और इंद्र पद को प्राप्त कर लेते हैं।
श्लोक 106 (skanda.2.9.106)
श्रीशुक उवाच । इति स्तुता तदा दैवैर्विष्णुवक्षःस्थलालया । विष्णुना सह संदृश्या रमा प्रीतावदत्सुरान् ।
śrīśuka uvāca iti stutā tadā daivairviṣṇuvakṣaḥsthalālayā viṣṇunā saha saṁdṛśyā ramā prītāvadatsurān
श्री शुक ने कहा — देवताओं द्वारा इस प्रकार स्तुति की गई, विष्णु के वक्षस्थल में निवास करने वाली रमा, विष्णु के साथ दृश्यमान होकर, प्रसन्नतापूर्वक देवताओं से बोलीं —
श्लोक 107 (skanda.2.9.107)
श्रीरुवाच । सुरारीन्सहसा हत्वा स्वपदानि गमिष्यथ । ये स्थानहीनाः स्वस्थानाद्भ्रंशिता ये नरा भुवि ।
śrīruvāca surārīnsahasā hatvā svapadāni gamiṣyatha ye sthānahīnāḥ svasthānādbhraṁśitā ye narā bhuvi
श्री ने कहा — तुम शीघ्र ही देव-शत्रुओं का वध करके अपने-अपने पद को प्राप्त करोगे। जो मनुष्य पृथ्वी पर स्थानहीन हैं, अपने स्थान से भ्रष्ट हैं,
श्लोक 108 (skanda.2.9.108)
ते मामनेन स्तोत्रेण स्तुत्वा स्थानमवाप्नुयुः । अखंडैर्बिल्वपत्रैर्मामर्चयंति नरा भुवि ।
te māmanena stotreṇa stutvā sthānamavāpnuyuḥ akhaṁḍairbilvapatrairmāmarcayaṁti narā bhuvi
वे इस स्तोत्र से मेरी स्तुति करके अपना स्थान पुनः प्राप्त करेंगे। जो मनुष्य पृथ्वी पर अखंडित बिल्वपत्रों से मेरी पूजा करते हैं,
श्लोक 109 (skanda.2.9.109)
स्तोत्रेणानेन ये देवा नरा युष्मत्कृतेन वै । धर्मार्थकाममोक्षाणामाकरास्ते भवन्ति वै ।
stotreṇānena ye devā narā yuṣmatkṛtena vai dharmārthakāmamokṣāṇāmākarāste bhavanti vai
और तुम्हारे द्वारा रचित इस स्तोत्र से जो देवता या मनुष्य [मेरी स्तुति करते हैं], वे धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की खान बन जाते हैं।
श्लोक 110 (skanda.2.9.110)
इदं पद्मसरो देवा ये केचन नरा भुवि । प्राप्य स्नानं करिष्यन्ति मां स्तुत्वा विष्णुवल्लभाम् ।
idaṁ padmasaro devā ye kecana narā bhuvi prāpya snānaṁ kariṣyanti māṁ stutvā viṣṇuvallabhām
पृथ्वी पर जो भी मनुष्य इस पद्म-सरोवर को पाकर, विष्णु-प्रिया मुझे स्तुति करते हुए स्नान करेंगे,
श्लोक 111 (skanda.2.9.111)
तेऽपि श्रियं दीर्घमायुर्विद्यां पुत्रान्सुवर्चसः । लब्ध्वा भोगांश्च भुक्त्वाऽन्ते नरा मोक्षमवाप्नुयुः ।
te'pi śriyaṁ dīrghamāyurvidyāṁ putrānsuvarcasaḥ labdhvā bhogāṁśca bhuktvā'nte narā mokṣamavāpnuyuḥ
वे भी श्री, दीर्घ आयु, विद्या, तेजस्वी पुत्र और भोगों को प्राप्त करके, अंत में मोक्ष को भी प्राप्त करेंगे।
श्लोक 112 (skanda.2.9.112)
इति दत्त्वा वरं देवी देवेन सह विष्णुना । आरुह्य गरुडेशानं वैकुण्ठस्थानमाययौ ।
iti dattvā varaṁ devī devena saha viṣṇunā āruhya garuḍeśānaṁ vaikuṇṭhasthānamāyayau
इस प्रकार वर देकर वह देवी, देव विष्णु सहित, गरुड़ पर सवार होकर वैकुण्ठधाम को चली गईं।