वैष्णव खण्ड · अध्याय 8
लक्ष्मी-सखियों द्वारा देव-श्रृंगार एवं आकाशराज-नगरी में विवाह
श्लोक 1 (skanda.2.8.1)
श्रीवराह उवाच । ततो देवाधिदेवोऽपि लक्ष्मीमाहूय भामिनीम् । किं कार्यं वद कल्याणि विवाहार्थं सुलोचने ।
śrīvarāha uvāca tato devādhidevo'pi lakṣmīmāhūya bhāminīm kiṁ kāryaṁ vada kalyāṇi vivāhārthaṁ sulocane
श्री वराह ने कहा — तब देवाधिदेव ने भी लक्ष्मी उस भामिनी को बुलाकर कहा, 'हे कल्याणी, हे सुलोचने! विवाह के लिए क्या करना है, कहो।
श्लोक 2 (skanda.2.8.2)
आज्ञापयस्व स्वसखी रमे कार्यं कुरु प्रियम् । श्रीस्तु कृष्णवचः श्रुत्वा सखीराहूय चोदयत् ।
ājñāpayasva svasakhī rame kāryaṁ kuru priyam śrīstu kṛṣṇavacaḥ śrutvā sakhīrāhūya codayat
अपनी सखियों को आज्ञा दो, हे रमे! जो प्रिय कार्य हो वह करो।' कृष्ण के ये वचन सुनकर श्री ने अपनी सखियों को बुलाकर निर्देश दिया।
श्लोक 3 (skanda.2.8.3)
श्रियाज्ञप्ता ततः प्रीतिः सुगंधं तैलमाददौ । श्रुतिः क्षौमं समादाय तस्थौ देवस्य सन्निधौ ।
śriyājñaptā tataḥ prītiḥ sugaṁdhaṁ tailamādadau śrutiḥ kṣaumaṁ samādāya tasthau devasya sannidhau
श्री की आज्ञा से प्रीति ने सुगंधित तेल लाया; श्रुति ने रेशमी वस्त्र लेकर देव के समीप खड़ी हुई।
श्लोक 4 (skanda.2.8.4)
भूषणानि समादाय स्मृतिरप्याययौ मुदा । धृतिरादर्शमाधत्त शान्तिर्मृगमदं दधौ ।
bhūṣaṇāni samādāya smṛtirapyāyayau mudā dhṛtirādarśamādhatta śāntirmṛgamadaṁ dadhau
स्मृति भी हर्षपूर्वक आभूषण लेकर आई; धृति ने दर्पण थामा, शांति ने कस्तूरी धारण की।
श्लोक 5 (skanda.2.8.5)
यक्षकर्दममादाय ह्रीः स्थिता पुरतो हरेः । कीर्तिः कनकपट्टं च सरत्नं मुकुटं दधौ ।
yakṣakardamamādāya hrīḥ sthitā purato hareḥ kīrtiḥ kanakapaṭṭaṁ ca saratnaṁ mukuṭaṁ dadhau
ह्री ने यक्षकर्दम (सुगंधित लेप) लेकर हरि के सामने खड़ी होकर उसे धारण किया; कीर्ति ने सुवर्ण वस्त्र और रत्नजड़ित मुकुट धारण किया।
श्लोक 6 (skanda.2.8.6)
छत्रं दधौ तदेंद्राणी चामरं तु सरस्वती । द्वितीयं चामरं गौरी व्यजने विजयाजये ।
chatraṁ dadhau tadeṁdrāṇī cāmaraṁ tu sarasvatī dvitīyaṁ cāmaraṁ gaurī vyajane vijayājaye
तब इन्द्राणी ने छत्र धारण किया, सरस्वती ने चामर, गौरी ने दूसरा चामर, और विजया-अजया ने पंखे धारण किए।
श्लोक 7 (skanda.2.8.7)
आगतास्ताः समालोक्य श्रीरुत्थायाथ सत्वरा । सुगंधं तैलमादाय देवमभ्यज्य शीर्षतः ।
āgatāstāḥ samālokya śrīrutthāyātha satvarā sugaṁdhaṁ tailamādāya devamabhyajya śīrṣataḥ
उन सबको आया देखकर श्री शीघ्र उठीं; सुगंधित तेल लेकर उन्होंने देव को सिर से लेकर अभ्यंजन किया।
श्लोक 8 (skanda.2.8.8)
उद्वर्तितं गंधचूर्णैर्देवांगं परिमृज्य च । आनीतान्करिभिस्तोयकलशान्कांचनाञ्छतम् ।
udvartitaṁ gaṁdhacūrṇairdevāṁgaṁ parimṛjya ca ānītānkaribhistoyakalaśānkāṁcanāñchatam
सुगंधित चूर्णों से उबटन लगाकर देव के अंग को पोंछकर, हाथियों द्वारा लाए गए सौ स्वर्ण जलकलश,
श्लोक 9 (skanda.2.8.9)
वियद्गंगादितीर्थेभ्यः कर्पूरादिसुवासितान् । एकमेकं समादाय त्वभ्यषिंचद्रमा हरिम् ।
viyadgaṁgāditīrthebhyaḥ karpūrādisuvāsitān ekamekaṁ samādāya tvabhyaṣiṁcadramā harim
आकाशगंगा आदि तीर्थों से भरे, कपूर आदि से सुवासित, उन्हें एक-एक करके लेकर रमा ने हरि का अभिषेक किया।
श्लोक 10 (skanda.2.8.10)
संधूप्य केशान्धूपेन तानाश्यामान्बबंध च । सुगंधेनानुलिप्यांगं स्वर्णवर्णेन तद्विभोः ।
saṁdhūpya keśāndhūpena tānāśyāmānbabaṁdha ca sugaṁdhenānulipyāṁgaṁ svarṇavarṇena tadvibhoḥ
धूप से केशों को सुवासित करके उन्हें सजाकर बाँधा, और सुगंध से उस प्रभु के स्वर्ण-वर्ण अंग को लेपित किया।
श्लोक 11 (skanda.2.8.11)
पीतकौशेयकं बद्ध्वा कट्यां कांचीसमन्वितम् । मुकुटादिविभूषाभिर्भूषयामास चेन्दिरा ।
pītakauśeyakaṁ baddhvā kaṭyāṁ kāṁcīsamanvitam mukuṭādivibhūṣābhirbhūṣayāmāsa cendirā
कमर में करधनी सहित पीत रेशमी वस्त्र बाँधकर, इंदिरा ने मुकुट आदि आभूषणों से उन्हें सुसज्जित किया।
श्लोक 12 (skanda.2.8.12)
अंगुलीयकरत्नानि सर्वास्वेवांगुलीषु च । आदर्शं दर्शयामास धृतिर्देवस्य सन्निधौ ।
aṁgulīyakaratnāni sarvāsvevāṁgulīṣu ca ādarśaṁ darśayāmāsa dhṛtirdevasya sannidhau
सभी अंगुलियों में रत्नजड़ित अंगूठियाँ पहनाकर, धृति ने देव के समक्ष दर्पण दिखाया।
श्लोक 13 (skanda.2.8.13)
दृष्ट्वादर्शं देवदेवो ह्यूर्ध्वपुंड्रं स्वयं दधौ । आरुह्य गरुडं पश्चात्स्वयं लक्ष्मीसमन्वितः ।
dṛṣṭvādarśaṁ devadevo hyūrdhvapuṁḍraṁ svayaṁ dadhau āruhya garuḍaṁ paścātsvayaṁ lakṣmīsamanvitaḥ
दर्पण देखकर देवाधिदेव ने स्वयं ऊर्ध्वपुण्ड्र (तिलक) धारण किया; फिर गरुड़ पर सवार होकर, स्वयं लक्ष्मी सहित,
श्लोक 14 (skanda.2.8.14)
ब्रह्मेशवज्रिवरुणयमयक्षेशसेवितः । वसिष्ठाद्यैर्मुनींद्रैश्च सनकाद्यैश्च योगिभिः ।
brahmeśavajrivaruṇayamayakṣeśasevitaḥ vasiṣṭhādyairmunīṁdraiśca sanakādyaiśca yogibhiḥ
ब्रह्मा, शिव, इन्द्र, वरुण, यम और कुबेर द्वारा सेवित होकर, वसिष्ठ आदि मुनीन्द्रों और सनक आदि योगियों सहित,
श्लोक 15 (skanda.2.8.15)
भक्तैर्भागवतैर्युक्तो नारायणपुरीं ययौ । जगुर्गन्धर्वपतयो ननृतुश्चाप्सरोगणाः ।
bhaktairbhāgavatairyukto nārāyaṇapurīṁ yayau jagurgandharvapatayo nanṛtuścāpsarogaṇāḥ
भक्तों और भागवतों सहित वे नारायणपुरी गए। गंधर्वपति गान करने लगे, अप्सराओं के समूह नाचने लगे।
श्लोक 16 (skanda.2.8.16)
देवदुंदुभयो नेदुस्तदा देवस्य सन्निधौ । जपन्तः स्वस्तिसूक्तानि मुनयस्तं समन्वयुः ।
devaduṁdubhayo nedustadā devasya sannidhau japantaḥ svastisūktāni munayastaṁ samanvayuḥ
तब देव के समीप दिव्य दुन्दुभियाँ बज उठीं; मुनिजन स्वस्ति-सूक्तों का जप करते हुए उनके साथ चले।
श्लोक 17 (skanda.2.8.17)
देवो देवगणैर्युक्तो विष्वक्सेनादिपार्षदैः । सखीभिस्स्यंदनस्थाभिर्बकुलाद्याभिरन्वितः । आकाशराजस्य पुरमाससाद स्वलंकृतम् ।
devo devagaṇairyukto viṣvaksenādipārṣadaiḥ sakhībhissyaṁdanasthābhirbakulādyābhiranvitaḥ ākāśarājasya puramāsasāda svalaṁkṛtam
देवगणों और विष्वक्सेन आदि पार्षदों सहित, तथा रथों में बैठी बकुला आदि सखियों सहित, देव आकाशराज की सुसज्जित नगरी में पहुँचे।
श्लोक 18 (skanda.2.8.18)
देवमागतमालोक्य कन्यामैरावतस्थिताम् । पुरीं प्रदक्षणीकृत्य गोपुरद्वारमागताम् ।
devamāgatamālokya kanyāmairāvatasthitām purīṁ pradakṣaṇīkṛtya gopuradvāramāgatām
देव को आया देखकर, ऐरावत के समान गज पर बैठी वह कन्या नगर की प्रदक्षिणा करके नगर द्वार पर आई।
श्लोक 19 (skanda.2.8.19)
आलोक्याकाशराजोऽपि समानीय वधूवरौ । बन्धुभिः सहितस्तस्थौ देवमालोक्य केशवम् ।
ālokyākāśarājo'pi samānīya vadhūvarau bandhubhiḥ sahitastasthau devamālokya keśavam
आकाशराज ने भी यह देखकर वर-वधू को साथ लाकर, बंधुजनों सहित खड़े होकर केशव देव को निहारा।
श्लोक 20 (skanda.2.8.20)
विष्णुर्मालां स्वकंठस्थां हस्तेनादाय सस्मितः । कमलायाः स्कन्धदेशे मुमोच सुमनश्चिताम् ।
viṣṇurmālāṁ svakaṁṭhasthāṁ hastenādāya sasmitaḥ kamalāyāḥ skandhadeśe mumoca sumanaścitām
विष्णु ने मुस्कुराते हुए अपने कंठ की माला हाथ से लेकर पुष्पों से गुंथी वह माला कमला के कंधे पर डाल दी।
श्लोक 21 (skanda.2.8.21)
आदाय मल्लिकामाला साऽस्य कंठे समर्पयत् । एवं त्रिवारं तौ कृत्वा वाहनादवरुह्य च ।
ādāya mallikāmālā sā'sya kaṁṭhe samarpayat evaṁ trivāraṁ tau kṛtvā vāhanādavaruhya ca
उसने भी मल्लिका की माला लेकर उनके कंठ में पहनाई। इस प्रकार तीन बार करके, वाहनों से उतरकर,
श्लोक 22 (skanda.2.8.22)
स्थित्वा पीठे क्षणं पश्चाद्गृहं विविशतुः शुभम् । ब्रह्मादिदेवयूथैश्च सहितौ भूमिजाहरी ।
sthitvā pīṭhe kṣaṇaṁ paścādgṛhaṁ viviśatuḥ śubham brahmādidevayūthaiśca sahitau bhūmijāharī
वे दोनों क्षण भर सिंहासन पर खड़े रहकर फिर शुभ भवन में प्रविष्ट हुए, ब्रह्मा आदि देवगणों सहित — भूमिजा और हरि दोनों।
श्लोक 23 (skanda.2.8.23)
मांगल्यसूत्रबंधादि सांकुरार्पणमब्जजः । वैवाहिकं कारयित्वा लाजहोमान्तमेव च ।
māṁgalyasūtrabaṁdhādi sāṁkurārpaṇamabjajaḥ vaivāhikaṁ kārayitvā lājahomāntameva ca
ब्रह्मा ने मंगलसूत्र-बंधन और अंकुरार्पण आदि विवाह-विधि लाजहोम तक सम्पन्न कराकर,
श्लोक 24 (skanda.2.8.24)
व्रतादेशं समाज्ञाय शयितौ कमलाहरी । चतुर्थे दिवसे सर्वं समापय्य चतुर्मुखः ।
vratādeśaṁ samājñāya śayitau kamalāharī caturthe divase sarvaṁ samāpayya caturmukhaḥ
व्रत का आदेश देकर, कमला और हरि को विश्राम कराया। चौथे दिन सब कुछ सम्पन्न कराकर चतुर्मुख ब्रह्मा ने,
श्लोक 25 (skanda.2.8.25)
अनुज्ञाप्य वियद्राजमारोप्य गरुडे हरिम् । देवीभ्यां सहितं देवं देवैर्गन्तुं प्रचक्रमे ।
anujñāpya viyadrājamāropya garuḍe harim devībhyāṁ sahitaṁ devaṁ devairgantuṁ pracakrame
वियद्राज से अनुमति लेकर, हरि को दोनों देवियों सहित गरुड़ पर बिठाकर, देवताओं सहित प्रस्थान करने लगे।
श्लोक 26 (skanda.2.8.26)
दिव्यदुन्दुभिर्निर्घोषैः संप्राप्य वृषभाचलम् । तुष्टुवुर्देवदेवेशं ब्रह्माद्या देवतागणाः ।
divyadundubhirnirghoṣaiḥ saṁprāpya vṛṣabhācalam tuṣṭuvurdevadeveśaṁ brahmādyā devatāgaṇāḥ
दिव्य दुन्दुभियों के निनाद के साथ वृषभाचल पहुँचकर, ब्रह्मा आदि देवगणों ने देवाधिदेव की स्तुति की।
श्लोक 27 (skanda.2.8.27)
शुकादयो मुनिगणास्तुष्टुवुः पुरुषोत्तमम् । स्तूयमानोऽथ देवोऽपि विवेश मणिमंडपम् ।
śukādayo munigaṇāstuṣṭuvuḥ puruṣottamam stūyamāno'tha devo'pi viveśa maṇimaṁḍapam
शुक आदि मुनिगणों ने पुरुषोत्तम की स्तुति की। इस प्रकार स्तुति किए जाते हुए देव मणिमंडप में प्रविष्ट हुए,
श्लोक 28 (skanda.2.8.28)
रमाधरणिजाभ्यां च तत्र सिंहासनं ययौ ।
ramādharaṇijābhyāṁ ca tatra siṁhāsanaṁ yayau
और वहाँ रमा और धरणी की पुत्री (पद्मावती) सहित सिंहासन पर विराजमान हुए।
श्लोक 29 (skanda.2.8.29)
आकाशराजोऽपि तदा महेन्द्रादिसुरैः सह । पुत्रीविष्ण्वोः प्रियार्थं तु प्राभृतं कतुमुद्यतः ।
ākāśarājo'pi tadā mahendrādisuraiḥ saha putrīviṣṇvoḥ priyārthaṁ tu prābhṛtaṁ katumudyataḥ
तब आकाशराज ने भी महेन्द्र आदि देवताओं सहित, अपनी पुत्री और विष्णु की प्रसन्नता के लिए उपहार (प्राभृत) देने को तत्पर होकर,
श्लोक 30 (skanda.2.8.30)
सौवर्णेषु कटाहेषु तंडुलाञ्छालिसंभवान् । मुद्गपात्राण्यनेकानि घृतकुम्भशतानि च ।
sauvarṇeṣu kaṭāheṣu taṁḍulāñchālisaṁbhavān mudgapātrāṇyanekāni ghṛtakumbhaśatāni ca
स्वर्ण के कटाहों में उत्तम धान से उपजे चावल, अनेक मूँग के पात्र, और घी से भरे सैकड़ों घड़े,
श्लोक 31 (skanda.2.8.31)
पयोघटसहस्राणि दधिभाण्डान्यनेकशः । दिव्यानि चूतकदलीनारिकेलफलानि च ।
payoghaṭasahasrāṇi dadhibhāṇḍānyanekaśaḥ divyāni cūtakadalīnārikelaphalāni ca
दूध के हज़ारों घड़े, दही के अनेक पात्र, दिव्य आम, केले और नारियल के फल,
श्लोक 32 (skanda.2.8.32)
धात्रीफलानि कूष्माडराजरंभाफलानि च । पनसान्मातुलुंगांश्च शर्करापूरितान्घटान् ।
dhātrīphalāni kūṣmāḍarājaraṁbhāphalāni ca panasānmātuluṁgāṁśca śarkarāpūritānghaṭān
आँवले के फल, कुम्हड़े और श्रेष्ठ केले, कटहल और चकोतरे, तथा शक्कर से भरे घड़े,
श्लोक 33 (skanda.2.8.33)
सुवर्णमणिमुक्ताश्च क्षौमकोट्यंबराणि च । दासीदाससहस्राणि कोटिशो गास्तथैव च ।
suvarṇamaṇimuktāśca kṣaumakoṭyaṁbarāṇi ca dāsīdāsasahasrāṇi koṭiśo gāstathaiva ca
सोना, मणि, मोती, करोड़ों की संख्या में रेशमी वस्त्र, हज़ारों दास-दासियाँ, और करोड़ों गायें,
श्लोक 34 (skanda.2.8.34)
हंसेन्दुशुक्लवर्णानां हयानामयुतं ददौ । तुंगानां नित्यमत्तानां गजानामधिकं शतात् ।
haṁsenduśuklavarṇānāṁ hayānāmayutaṁ dadau tuṁgānāṁ nityamattānāṁ gajānāmadhikaṁ śatāt
हंस और चन्द्रमा के समान श्वेत वर्ण के दस हज़ार अश्व दिए, और सौ से अधिक विशाल, सदा मदमत्त रहने वाले हाथी,
श्लोक 35 (skanda.2.8.35)
अंतःपुरचरा नारीर्नृत्तगीतविशारदाः । ददौ चतुःसहस्राणि श्रीनिवासाय विष्णवे । दत्त्वा चैतानि सर्वाणि तस्थौ देवपुरो विभुः ।
aṁtaḥpuracarā nārīrnṛttagītaviśāradāḥ dadau catuḥsahasrāṇi śrīnivāsāya viṣṇave dattvā caitāni sarvāṇi tasthau devapuro vibhuḥ
तथा नृत्य-गीत में निपुण अंतःपुर की चार हज़ार स्त्रियाँ, यह सब श्रीनिवास विष्णु को अर्पित किया। यह सब देकर वे प्रभु देवालय के द्वार पर खड़े रहे।
श्लोक 36 (skanda.2.8.36)
दृष्ट्वा देवोऽपि तत्सर्वं देवीभ्यां सहितो हरिः ।
dṛṣṭvā devo'pi tatsarvaṁ devībhyāṁ sahito hariḥ
यह सब देखकर देव हरि भी दोनों देवियों सहित,
श्लोक 37 (skanda.2.8.37)
सुप्रीतः प्राह राजानं श्वशुरं वेंकटेश्वरः । वरं वृणीष्व हे राजन्गुरो मत्तो यदीच्छसि ।
suprītaḥ prāha rājānaṁ śvaśuraṁ veṁkaṭeśvaraḥ varaṁ vṛṇīṣva he rājanguro matto yadīcchasi
अत्यंत प्रसन्न होकर श्वसुर राजा से वेंकटेश्वर ने कहा, 'हे राजन्, हे गुरु! मुझसे जो चाहो वर माँग लो।
श्लोक 38 (skanda.2.8.38)
त्वत्सेवैवेह देवैवं भूयादव्यभिचारिणी ।
tvatsevaiveha devaivaṁ bhūyādavyabhicāriṇī
[आकाशराज ने कहा —] हे देव! यहाँ आपकी यह सेवा सदा अव्यभिचारिणी (अटूट) बनी रहे,
श्लोक 39 (skanda.2.8.39)
मनस्त्वत्पादकमले त्वयि भक्तिर्ममास्तु वै ।
manastvatpādakamale tvayi bhaktirmamāstu vai
मेरा मन आपके चरणकमल में लगा रहे, आप में ही मेरी भक्ति सदा बनी रहे।'
श्लोक 40 (skanda.2.8.40)
श्रीभगवानुवाच । त्वया यदुक्तं राजेन्द्र सर्वमेतद्भविष्यति । इति दत्त्वा वरं तस्मै संमान्यैव यथोचितम् ।
śrībhagavānuvāca tvayā yaduktaṁ rājendra sarvametadbhaviṣyati iti dattvā varaṁ tasmai saṁmānyaiva yathocitam
श्री भगवान ने कहा — 'हे राजेन्द्र! तुमने जो कहा है, यह सब वैसा ही होगा।' इस प्रकार उसे वर देकर, यथोचित सम्मान करके,
श्लोक 41 (skanda.2.8.41)
ब्रह्मेशादिसुरान्सर्वान्समभ्यर्च्य यथोचितम् । स्वर्लोकगमनायैवमनुमेने मुदा हरिः । गतेषु तेषु सर्वेषु श्रिया भूमिजया युतः ।
brahmeśādisurānsarvānsamabhyarcya yathocitam svarlokagamanāyaivamanumene mudā hariḥ gateṣu teṣu sarveṣu śriyā bhūmijayā yutaḥ
ब्रह्मा, शिव आदि सभी देवताओं की यथोचित पूजा करके, हरि ने प्रसन्नतापूर्वक उन्हें स्वर्गलोक जाने की अनुमति दी। वे सब जाने पर, श्री और भूमिजा सहित,
श्लोक 42 (skanda.2.8.42)
विहरन्स यथापूर्वं स्वामिपुष्करिणीतटे । आस्ते दिव्यालये देवोप्यर्च्यमानो गुहेन वै ।
viharansa yathāpūrvaṁ svāmipuṣkariṇītaṭe āste divyālaye devopyarcyamāno guhena vai
पहले की भाँति स्वामिपुष्करिणी के तट पर विहार करते हुए वे देव उस दिव्य आलय में निवास करते हैं, गुह द्वारा भी पूजित होते हुए।