वैष्णव खण्ड · अध्याय 7
बकुलमालिका द्वारा धरणी को श्रीनिवास-कमलालया वाग्दान वृत्तांत
श्लोक 1 (skanda.2.7.1)
धरण्युवाच । कैषा बत वरा कन्या युष्माभिः संगता कुतः । किमर्थमागता चेह पूज्यैषा प्रतिभाति मे ।
dharaṇyuvāca kaiṣā bata varā kanyā yuṣmābhiḥ saṁgatā kutaḥ kimarthamāgatā ceha pūjyaiṣā pratibhāti me
धरणी ने कहा — यह कौन सी श्रेष्ठ कन्या है, जो तुम सबके साथ आई है, कहाँ से आई है? यह यहाँ किस प्रयोजन से आई है? मुझे तो यह पूज्य प्रतीत होती है।
श्लोक 2 (skanda.2.7.2)
कन्यका ऊचुः । एषा दिव्याङ्गना देवी त्वयि कार्यार्थमागता । देवालये सङ्गतेयमस्माभिः शिवसन्निधौ ।
kanyakā ūcuḥ eṣā divyāṅganā devī tvayi kāryārthamāgatā devālaye saṅgateyamasmābhiḥ śivasannidhau
कन्याओं ने कहा — यह दिव्य अंगों वाली देवी तुम्हारे पास किसी कार्य से आई है। यह देवालय में शिव जी की समीपता में हमसे मिली।
श्लोक 3 (skanda.2.7.3)
पृष्टावदच्च भवतीं द्रष्टुमेवागतेति वै । शक्या द्रष्टुं राजगृहे मया राज्ञी सुखेन वा ।
pṛṣṭāvadacca bhavatīṁ draṣṭumevāgateti vai śakyā draṣṭuṁ rājagṛhe mayā rājñī sukhena vā
पूछे जाने पर उसने कहा कि वह केवल तुम्हें देखने के लिए ही आई है — 'क्या राजगृह में मुझे रानी सुखपूर्वक दिखाई दे सकती हैं?'
श्लोक 4 (skanda.2.7.4)
एवं पृष्टास्ततो ब्रूमः सहास्माभिश्च गम्यताम् । वयं तु धरणीदास्यो गमिष्यामो नृपालयम् ।
evaṁ pṛṣṭāstato brūmaḥ sahāsmābhiśca gamyatām vayaṁ tu dharaṇīdāsyo gamiṣyāmo nṛpālayam
इस प्रकार पूछे जाने पर हमने कहा, 'हमारे साथ चलो'; क्योंकि हम तो धरणी की दासियाँ हैं, हम राजमहल जाने वाली थीं।
श्लोक 5 (skanda.2.7.5)
इत्युक्तास्माभिरायाता त्वत्समीपं वसुन्धरे । भवत्या पृच्छयतामेषा किमित्यागमनं तव ।
ityuktāsmābhirāyātā tvatsamīpaṁ vasundhare bhavatyā pṛcchayatāmeṣā kimityāgamanaṁ tava
हमारे इस प्रकार कहने पर, हे वसुन्धरे, यह तुम्हारे पास आई है। इससे स्वयं पूछ लो कि इसका आगमन किस लिए हुआ है।
श्लोक 6 (skanda.2.7.6)
श्रीवराह उवाच । इति तासां वचः श्रुत्वा तामपृच्छद्वसुन्धरा ।
śrīvarāha uvāca iti tāsāṁ vacaḥ śrutvā tāmapṛcchadvasundharā
श्री वराह ने कहा — उन कन्याओं के ये वचन सुनकर वसुन्धरा ने उससे पूछा।
श्लोक 7 (skanda.2.7.7)
धरण्युवाच । कुतस्त्वमागता देवि किं वा कार्यं मया तव । ब्रूहि सत्यं करिष्यामि त्वदागमनकारणम् ।
dharaṇyuvāca kutastvamāgatā devi kiṁ vā kāryaṁ mayā tava brūhi satyaṁ kariṣyāmi tvadāgamanakāraṇam
धरणी ने कहा — हे देवी! तुम कहाँ से आई हो? मुझसे तुम्हें क्या कार्य है? सत्य कहो, मैं तुम्हारे आगमन का कारण पूरा करूँगी।
श्लोक 8 (skanda.2.7.8)
बकुलमालिकोवाच । वेङ्कटाद्रेः समायाता नाम्ना बकुलमालिका ।
bakulamālikovāca veṅkaṭādreḥ samāyātā nāmnā bakulamālikā
बकुलमालिका ने कहा — मैं वेंकटाद्रि से आई हूँ, मेरा नाम बकुलमालिका है।
श्लोक 9 (skanda.2.7.9)
स्वामी नारायणोऽस्माकमास्ते श्रीवेंकटाचले । कदाचिद्धयमारुह्य हंसशुक्लं मनोजवम् ।
svāmī nārāyaṇo'smākamāste śrīveṁkaṭācale kadāciddhayamāruhya haṁsaśuklaṁ manojavam
हमारे स्वामी नारायण श्री वेंकटाचल पर निवास करते हैं। एक बार वे अपने वेगवान श्वेत अश्व हंसशुक्ल पर सवार होकर,
श्लोक 10 (skanda.2.7.10)
मृगयार्थं गतो राज्ञो वेंकटाद्रेः समीपतः । वनानि विचरन्काले शोभने कुसुमाकरे ।
mṛgayārthaṁ gato rājño veṁkaṭādreḥ samīpataḥ vanāni vicarankāle śobhane kusumākare
राजा के समान वेंकटाद्रि के निकट शिकार के लिए गए, वसन्त ऋतु के उस मनोहर समय में वनों में विचरण करते हुए।
श्लोक 11 (skanda.2.7.11)
पश्यन्मृगान्गजान्सिंहान्गवयाञ्छरभान्रुरून् । शुकान्पारावतान्हंसान्पत्रिणोऽन्यान्वनान्तरे ।
paśyanmṛgāngajānsiṁhāngavayāñcharabhānrurūn śukānpārāvatānhaṁsānpatriṇo'nyānvanāntare
वे मृग, हाथी, सिंह, गवय, शरभ, रुरु, तोते, कबूतर, हंस और वन के अन्य पक्षियों को देखते हुए,
श्लोक 12 (skanda.2.7.12)
गजराजं तत्र कञ्चिद्यूथपं मदवर्षिणम् । करेणुसहितं तुंगमन्वगच्छत्सुरोत्तमः ।
gajarājaṁ tatra kañcidyūthapaṁ madavarṣiṇam kareṇusahitaṁ tuṁgamanvagacchatsurottamaḥ
वहाँ मद से भरे एक गजराज का, जो झुंड का स्वामी था और अपनी हथिनी के साथ ऊँचा खड़ा था, वे देवश्रेष्ठ पीछा करने लगे।
श्लोक 13 (skanda.2.7.13)
वनाद्वनान्तरं गत्वा नृपं शंखमुपागमत् । तपस्यन्तं बृहच्छैले प्रतिष्ठाप्य जनार्दनम् ।
vanādvanāntaraṁ gatvā nṛpaṁ śaṁkhamupāgamat tapasyantaṁ bṛhacchaile pratiṣṭhāpya janārdanam
एक वन से दूसरे वन में जाते हुए वे राजा शंख के पास पहुँचे, जो बड़े पर्वत पर जनार्दन (भगवान) को प्रतिष्ठित करके तप कर रहे थे,
श्लोक 14 (skanda.2.7.14)
श्रीभूमिसहितं नित्यमर्चयन्तं च भक्तितः । शंखनागबिलंनाम सरः पावनमुत्तमम् ।
śrībhūmisahitaṁ nityamarcayantaṁ ca bhaktitaḥ śaṁkhanāgabilaṁnāma saraḥ pāvanamuttamam
और भक्तिपूर्वक नित्य श्री और भूमि सहित उनकी पूजा करते हुए, शंखनागबिल नामक अत्यंत पवित्र सरोवर के निकट रहते थे।
श्लोक 15 (skanda.2.7.15)
तत्सरस्तीरमासाद्य तुरंगादवरुह्य च । राजवेषं समासाद्य तमपृच्छन्नृपोत्तमम् ।
tatsarastīramāsādya turaṁgādavaruhya ca rājaveṣaṁ samāsādya tamapṛcchannṛpottamam
उस सरोवर के तट पर पहुँचकर, अश्व से उतरकर, राजा का वेश धारण करके, उन्होंने उस श्रेष्ठ राजा से पूछा —
श्लोक 16 (skanda.2.7.16)
क्रियते किं नृपश्रेष्ठ पादेऽस्मिच्छेषभूभृतः ।
kriyate kiṁ nṛpaśreṣṭha pāde'smiccheṣabhūbhṛtaḥ
'हे राजश्रेष्ठ! इस शेष पर्वत के चरण में यह क्या किया जा रहा है?'
श्लोक 17 (skanda.2.7.17)
शंख उवाच । अहं हैहयदेशीयः पुत्रः श्वेतस्य भूभृतः । महाविष्णोः प्रीतयेऽत्र कृतवानखिलान्क्रतून् ।
śaṁkha uvāca ahaṁ haihayadeśīyaḥ putraḥ śvetasya bhūbhṛtaḥ mahāviṣṇoḥ prītaye'tra kṛtavānakhilānkratūn
शंख ने कहा — मैं हैहय देश का हूँ, राजा श्वेत का पुत्र हूँ। यहाँ महाविष्णु की प्रसन्नता के लिए मैंने समस्त यज्ञ किए,
श्लोक 18 (skanda.2.7.18)
अदर्शनान्महाविष्णोर्निर्विण्णोहं नृपात्मज । तदानीमवदद्दिव्या वाणी सर्वार्त्तिनाशिनी ।
adarśanānmahāviṣṇornirviṇṇohaṁ nṛpātmaja tadānīmavadaddivyā vāṇī sarvārttināśinī
किन्तु महाविष्णु के दर्शन न होने से मैं विरक्त हो गया, हे राजकुमार। तभी सब पीड़ाओं को नष्ट करने वाली एक दिव्य वाणी ने कहा —
श्लोक 19 (skanda.2.7.19)
राजन्नात्र भविष्यामि प्रत्यक्षस्ते वचः शृणु । गच्छ नारायणाद्रिं त्वं तपः कुर्विति मां स्फुटम् ।
rājannātra bhaviṣyāmi pratyakṣaste vacaḥ śṛṇu gaccha nārāyaṇādriṁ tvaṁ tapaḥ kurviti māṁ sphuṭam
'हे राजन्! मैं यहाँ प्रकट नहीं होऊँगा। मेरे स्पष्ट वचन सुनो: तुम नारायणाद्रि जाओ और वहाँ तप करो' — ऐसा उसने स्पष्ट कहा।
श्लोक 20 (skanda.2.7.20)
ततो देशमहं त्यक्त्वा तपसाऽऽराधयाम्यहम् । अत्र देवं नृपाचिंत्यं प्रतिष्ठाप्य श्रियः पतिम् ।
tato deśamahaṁ tyaktvā tapasā''rādhayāmyaham atra devaṁ nṛpāciṁtyaṁ pratiṣṭhāpya śriyaḥ patim
तब मैंने अपना देश त्यागकर, हे राजन्, यहाँ श्री के स्वामी उस अचिंत्य देव को प्रतिष्ठित करके तप द्वारा उनकी आराधना की है,
श्लोक 21 (skanda.2.7.21)
अगस्त्यानुग्रहान्नित्यमर्चयामि विधानतः । इति तस्य वचः श्रुत्वा सोत्प्रासं प्राह तं विभुः ।
agastyānugrahānnityamarcayāmi vidhānataḥ iti tasya vacaḥ śrutvā sotprāsaṁ prāha taṁ vibhuḥ
और अगस्त्य मुनि के अनुग्रह से मैं नित्य विधिपूर्वक उनकी पूजा करता हूँ। उसके ये वचन सुनकर उस प्रभु ने उसे उपहासपूर्वक कहा —
श्लोक 22 (skanda.2.7.22)
गच्छ नारायणाद्रिं त्वमस्य पादे किमास्यते । आरुह्यानेन मार्गेण पश्चिमे शिखरे स्थितम् ।
gaccha nārāyaṇādriṁ tvamasya pāde kimāsyate āruhyānena mārgeṇa paścime śikhare sthitam
'नारायणाद्रि तो जाओ; इसके चरण में क्यों बैठे हो? इसी मार्ग से चढ़कर पश्चिम शिखर पर स्थित उन्हें जाओ।
श्लोक 23 (skanda.2.7.23)
प्रणम्य विष्वक्सेनं त्वं बालं न्यग्रोधमूलतः । स्वामिपुष्करिणीं गत्वा स्नात्वा तीरेऽथ पश्चिमे ।
praṇamya viṣvaksenaṁ tvaṁ bālaṁ nyagrodhamūlataḥ svāmipuṣkariṇīṁ gatvā snātvā tīre'tha paścime
विष्वक्सेन को और न्यग्रोध वृक्ष की जड़ के उस बालक को प्रणाम करके, स्वामिपुष्करिणी जाकर, वहाँ स्नान करके, फिर पश्चिम तट पर,
श्लोक 24 (skanda.2.7.24)
अश्वत्थं तत्र वल्मीकं द्रक्ष्यसे नृपनन्दन । तयोर्मध्यं समासाद्य तपः कुर्वित्यचोदयत् ।
aśvatthaṁ tatra valmīkaṁ drakṣyase nṛpanandana tayormadhyaṁ samāsādya tapaḥ kurvityacodayat
तुम वहाँ एक पीपल का वृक्ष और एक बाँबी देखोगे, हे राजकुमार; उन दोनों के बीच पहुँचकर तप करो' — इस प्रकार उसने आदेश दिया।
श्लोक 25 (skanda.2.7.25)
कश्चिच्छ्वेतो वराहोऽस्मिन्वल्मीके चरति धुवम् । स तु पुण्यवतामेव दर्शनं याति भूपते ।
kaścicchveto varāho'sminvalmīke carati dhuvam sa tu puṇyavatāmeva darśanaṁ yāti bhūpate
'उस बाँबी में निश्चय ही एक श्वेत वराह विचरण करता है; हे राजन्! वह पुण्यवानों को ही दर्शन देता है।'
श्लोक 26 (skanda.2.7.26)
श्रीवराह उवाच । इत्यादिश्य हयारूढो जगाम मृगयां विभुः । चरन्वनाद्वनं सुभ्रूः समासाद्यारणीं नदीम् ।
śrīvarāha uvāca ityādiśya hayārūḍho jagāma mṛgayāṁ vibhuḥ caranvanādvanaṁ subhrūḥ samāsādyāraṇīṁ nadīm
श्री वराह ने कहा — इस प्रकार उसे आदेश देकर, अश्व पर सवार वह प्रभु शिकार के लिए चले गए; वन से वन में विचरण करते हुए, वे सुन्दर भौंहों वाले प्रभु अरणी नदी के पास पहुँचे।
श्लोक 27 (skanda.2.7.27)
अवरुह्य हयात्तत्र विचचार तटे शुभे । वनान्तादागतो वायुः पद्मकह्लारशीतलः । श्रमापनयनो मन्दं सिषेवे पुरुषोत्तमम् ।
avaruhya hayāttatra vicacāra taṭe śubhe vanāntādāgato vāyuḥ padmakahlāraśītalaḥ śramāpanayano mandaṁ siṣeve puruṣottamam
वहाँ अश्व से उतरकर वे सुन्दर तट पर विचरण करने लगे। वन से आती हुई कमल और कह्लार से शीतल वायु ने पुरुषोत्तम की थकान को दूर करते हुए धीरे-धीरे उनकी सेवा की,
श्लोक 28 (skanda.2.7.28)
तरवः पुष्पवर्षाणि विकिरन्तः सिषेविरे । एवं स विचरन्देवः पुष्पभारानतांस्तरून् ।
taravaḥ puṣpavarṣāṇi vikirantaḥ siṣevire evaṁ sa vicarandevaḥ puṣpabhārānatāṁstarūn
और वृक्षों ने पुष्पों की वर्षा बिखेरते हुए उनकी सेवा की। इस प्रकार विचरण करते हुए वे देव पुष्पों के भार से झुके वृक्षों को देखते हुए,
श्लोक 29 (skanda.2.7.29)
विचिन्वन्गजराजं तं पुष्पलावीर्ददर्श ह । कन्याः सुवेषा रुचिरा मेघेष्विव शतह्रदाः ।
vicinvangajarājaṁ taṁ puṣpalāvīrdadarśa ha kanyāḥ suveṣā rucirā megheṣviva śatahradāḥ
उस गजराज को खोजते हुए, उन्होंने पुष्प चुनती हुई कन्याओं को देखा, जो सुसज्जित और मनोहर थीं, मानो मेघों में बिजलियाँ हों।
श्लोक 30 (skanda.2.7.30)
तासां मध्यगतां तन्वीं ददर्शातिमनोहराम् । लक्ष्मीसमां हेमवर्णां तस्यां सक्तमना अभूत् ।
tāsāṁ madhyagatāṁ tanvīṁ dadarśātimanoharām lakṣmīsamāṁ hemavarṇāṁ tasyāṁ saktamanā abhūt
उनमें से उन्होंने एक अत्यंत सुन्दर, सुकुमार, स्वर्ण के समान वर्ण वाली, लक्ष्मी के समान कन्या को देखा; उसमें उनका मन आसक्त हो गया।
श्लोक 31 (skanda.2.7.31)
तां गृध्नुराह ताः कन्याः केयमित्येव पूरुषः । उक्तस्ताभिरियं कन्या वियद्राज्ञो महाबल ।
tāṁ gṛdhnurāha tāḥ kanyāḥ keyamityeva pūruṣaḥ uktastābhiriyaṁ kanyā viyadrājño mahābala
उस लालायित प्रभु ने उन कन्याओं से पूछा, 'यह कौन है?' उन्होंने कहा, 'हे महाबल! यह कन्या वियद्राज (आकाशराज) की पुत्री है।'
श्लोक 32 (skanda.2.7.32)
इदं श्रुत्वा वचस्तासां हयमारुह्य वेगवान् । आजगामाशु भगवान्स्वालयं रुचिरं गिरिम् ।
idaṁ śrutvā vacastāsāṁ hayamāruhya vegavān ājagāmāśu bhagavānsvālayaṁ ruciraṁ girim
उनके ये वचन सुनकर, वेगवान भगवान अश्व पर सवार होकर शीघ्र ही अपने सुन्दर निवास पर्वत पर लौट आए।
श्लोक 33 (skanda.2.7.33)
तत्र स्वालयमासाद्य स्वामिपुष्करिणीतटे । मामाहूयावदद्देवो हला बकुलमालिके ।
tatra svālayamāsādya svāmipuṣkariṇītaṭe māmāhūyāvadaddevo halā bakulamālike
वहाँ अपने निवास पर पहुँचकर, स्वामिपुष्करिणी के तट पर, देव ने मुझे बुलाकर कहा, 'हे बकुलमालिके!
श्लोक 34 (skanda.2.7.34)
वियद्राजपुरं गत्वा प्रविश्यान्तःपुरं सखि । तत्पत्नीं धरणीं प्राप्य पृष्ट्वा कुशलमेव च ।
viyadrājapuraṁ gatvā praviśyāntaḥpuraṁ sakhi tatpatnīṁ dharaṇīṁ prāpya pṛṣṭvā kuśalameva ca
वियद्राज की नगरी जाकर, अंतःपुर में प्रवेश करके, हे सखी, उसकी पत्नी धरणी के पास पहुँचकर, कुशल पूछकर,
श्लोक 35 (skanda.2.7.35)
याचस्व तनयां तस्या रुचिरां कमलालयाम् । राज्ञोभिमतमाज्ञाय शीघ्रमागच्छ भामिनि ।
yācasva tanayāṁ tasyā rucirāṁ kamalālayām rājñobhimatamājñāya śīghramāgaccha bhāmini
उसकी सुन्दर पुत्री कमलालया को माँगो; राजा की स्वीकृति जानकर शीघ्र लौट आओ, हे भामिनी।'
श्लोक 36 (skanda.2.7.36)
इत्थं दैवेन चाज्ञप्ता देवि त्वद्गृहमागता । यथोचितं कुरुष्वेह राज्ञा मंत्रियुतेन च ।
itthaṁ daivena cājñaptā devi tvadgṛhamāgatā yathocitaṁ kuruṣveha rājñā maṁtriyutena ca
इस प्रकार दैव द्वारा आज्ञप्त होकर, हे देवी, मैं तुम्हारे घर आई हूँ; यहाँ राजा और मंत्रियों सहित जो उचित हो वह करो,
श्लोक 37 (skanda.2.7.37)
कन्यया च विचार्यैव प्रोच्यतामुत्तरं वचः ।
kanyayā ca vicāryaiva procyatāmuttaraṁ vacaḥ
और कन्या से भी विचार करके ही उत्तर कहा जाए।
श्लोक 38 (skanda.2.7.38)
श्रीवराह उवाच । अथ तस्या वचः श्रुत्वा प्रीता राज्ञी बभूव ह । आहूयाकाशराजं तमुपेत्य कमलालयाम् ।
śrīvarāha uvāca atha tasyā vacaḥ śrutvā prītā rājñī babhūva ha āhūyākāśarājaṁ tamupetya kamalālayām
श्री वराह ने कहा — तब उसके वचन सुनकर रानी प्रसन्न हुई; उसने आकाशराज को बुलाकर कमलालया के पास जाकर,
श्लोक 39 (skanda.2.7.39)
मंत्रिमध्येऽवदद्देवी वचनं बकुलस्रजः । श्रुत्वा प्रीतोऽवदद्राजा मंत्रिणः सपुरोहितान् ।
maṁtrimadhye'vadaddevī vacanaṁ bakulasrajaḥ śrutvā prīto'vadadrājā maṁtriṇaḥ sapurohitān
मंत्रियों के बीच देवी ने बकुलमाला का संदेश कहा; उसे सुनकर प्रसन्न राजा ने पुरोहितों सहित मंत्रियों से कहा —
श्लोक 40 (skanda.2.7.40)
आकाशराज उवाच । कन्या त्वयोनिजा दिव्या सुभगा कमलालया । अर्थिता देवदेवेन वेंकटाद्रिनिवासिना ।
ākāśarāja uvāca kanyā tvayonijā divyā subhagā kamalālayā arthitā devadevena veṁkaṭādrinivāsinā
आकाशराज ने कहा — यह कन्या, जो अयोनिज (गर्भ से नहीं जन्मी), दिव्य, सौभाग्यशाली कमलालया है, वेंकटाद्रि निवासी देवाधिदेव द्वारा माँगी गई है।
श्लोक 41 (skanda.2.7.41)
पूर्णो मनोरथो मेऽद्य ब्रूत किं संमतं तु वः । श्रुत्वा मंत्रिगणाः सर्वे राज्ञो वचनमुत्तमम् ।
pūrṇo manoratho me'dya brūta kiṁ saṁmataṁ tu vaḥ śrutvā maṁtrigaṇāḥ sarve rājño vacanamuttamam
आज मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ; कहो, तुम सबकी क्या सम्मति है?' राजा के ये उत्तम वचन सुनकर सभी मंत्रीगण —
श्लोक 42 (skanda.2.7.42)
प्रोचुः सुप्रीतमनसो वियद्राजं महीपतिम् । वयं कृतार्था राजेन्द्र कुलं सर्वोन्नतं भवेत् ।
procuḥ suprītamanaso viyadrājaṁ mahīpatim vayaṁ kṛtārthā rājendra kulaṁ sarvonnataṁ bhavet
अत्यंत प्रसन्न मन से वियद्राज महीपति से बोले, 'हे राजेन्द्र! हम कृतार्थ हुए, हमारा कुल सर्वोच्च हो जाएगा।
श्लोक 43 (skanda.2.7.43)
भवत्कन्येयमतुला श्रिया सह रमिष्यति । दीयतां देवदेवाय शार्ङ्गिणे परमात्मने ।
bhavatkanyeyamatulā śriyā saha ramiṣyati dīyatāṁ devadevāya śārṅgiṇe paramātmane
तुम्हारी यह अनुपम कन्या श्री (लक्ष्मी) सहित रमण करेगी; इसे शार्ङ्गधारी परमात्मा देवाधिदेव को दे दिया जाए।
श्लोक 44 (skanda.2.7.44)
अयं वसन्तः श्रीमांश्च शुभं शीघ्रं विधीयताम् ।
ayaṁ vasantaḥ śrīmāṁśca śubhaṁ śīghraṁ vidhīyatām
यह वसन्त ऋतु भी शुभ और श्रीमान है — यह शुभ कार्य शीघ्र ही सम्पन्न किया जाए।'
श्लोक 45 (skanda.2.7.45)
आहूय धिषणं लग्नं विवाहार्थं विधीयताम् ।
āhūya dhiṣaṇaṁ lagnaṁ vivāhārthaṁ vidhīyatām
बृहस्पति (धिषण) को बुलाकर विवाह के लिए लग्न निश्चित किया जाए।
श्लोक 46 (skanda.2.7.46)
तथास्त्वित्याह्वयामास सुरलोकाद्बृहस्पतिम् । पप्रच्छ कन्यावरयोर्विवाहार्थं नरेश्वरः ।
tathāstvityāhvayāmāsa suralokādbṛhaspatim papraccha kanyāvarayorvivāhārthaṁ nareśvaraḥ
'ऐसा ही हो' कहकर राजा ने देवलोक से बृहस्पति को बुलाया; नरेश्वर ने वर-वधू के विवाह के विषय में पूछा।
श्लोक 47 (skanda.2.7.47)
राजोवाच । कन्याया जन्मनक्षत्रं मृगशीर्षमिति स्मृतम् । देवस्य श्रवणर्क्षन्तु तयोर्योगो विचार्यताम् ।
rājovāca kanyāyā janmanakṣatraṁ mṛgaśīrṣamiti smṛtam devasya śravaṇarkṣantu tayoryogo vicāryatām
राजा ने कहा — कन्या का जन्म-नक्षत्र मृगशीर्ष माना जाता है, और देव का नक्षत्र श्रवण है; दोनों का योग विचारा जाए।
श्लोक 48 (skanda.2.7.48)
श्रुत्वाऽब्रवीत्स धिषणस्तयोरुत्तरफल्गुनी । संमता सुखवृद्ध्यर्थं प्रोच्यते दैवचिंतकैः ।
śrutvā'bravītsa dhiṣaṇastayoruttaraphalgunī saṁmatā sukhavṛddhyarthaṁ procyate daivaciṁtakaiḥ
यह सुनकर धिषण ने कहा कि दोनों के लिए उत्तरा फाल्गुनी नक्षत्र उपयुक्त है; ज्योतिषी उसे सुख-समृद्धि के लिए शुभ बताते हैं।
श्लोक 49 (skanda.2.7.49)
तयोरुत्तरफल्गुन्यां विवाहः क्रियतामिति । वैशाखमासे विधिवत्क्रियतामिति सोऽब्रवीत् ।
tayoruttaraphalgunyāṁ vivāhaḥ kriyatāmiti vaiśākhamāse vidhivatkriyatāmiti so'bravīt
'उत्तरा फाल्गुनी में, वैशाख मास में, विधिपूर्वक विवाह किया जाए' — ऐसा उसने कहा।
श्लोक 50 (skanda.2.7.50)
श्रीवराह उवाच । राजा तु धिषणं तत्र संपूज्याथ विसृज्य च । देवस्य दूतिकामाह गच्छ देवालयं शुभे ।
śrīvarāha uvāca rājā tu dhiṣaṇaṁ tatra saṁpūjyātha visṛjya ca devasya dūtikāmāha gaccha devālayaṁ śubhe
श्री वराह ने कहा — राजा ने धिषण की पूजा करके उन्हें विदा किया, फिर देवी की दूती (बकुलमालिका) से कहा, 'हे शुभे! देवालय जाओ,
श्लोक 51 (skanda.2.7.51)
वैशाखे देवदेवाय कल्याणं वद सुव्रते । वैवाहिकविधानं तु कृत्वा चागम्यतामिति ।
vaiśākhe devadevāya kalyāṇaṁ vada suvrate vaivāhikavidhānaṁ tu kṛtvā cāgamyatāmiti
वैशाख में देवाधिदेव से यह शुभ संदेश कहो, हे सुव्रते; विवाह की तैयारी करके ही लौटना' — ऐसा कहा।
श्लोक 52 (skanda.2.7.52)
ततो देव्याः प्रियकरं शुकं दूतं तया सह । विसृज्य वायुं स्वसुतमिन्द्राद्यानयनेऽसृजत् ।
tato devyāḥ priyakaraṁ śukaṁ dūtaṁ tayā saha visṛjya vāyuṁ svasutamindrādyānayane'sṛjat
फिर देवी के प्रिय दूत शुक के साथ, राजा ने इन्द्र आदि देवताओं को लाने के लिए अपने पुत्र वायु को भेजा।
श्लोक 53 (skanda.2.7.53)
आहूय विश्वकर्माणं पुरालंकारकर्मणि । नियोजयामास सोऽपि निर्ममे निमिषांतरात् ।
āhūya viśvakarmāṇaṁ purālaṁkārakarmaṇi niyojayāmāsa so'pi nirmame nimiṣāṁtarāt
विश्वकर्मा को बुलाकर नगर को सजाने के कार्य में नियुक्त किया; उन्होंने भी क्षण भर में सब कुछ रच दिया।
श्लोक 54 (skanda.2.7.54)
इन्द्रोऽसृजत्पुष्पवृष्टिं ननृतुश्चाप्सरोगणाः । धनदो धनधान्याद्यैः पूरयामास वेश्म तत् ।
indro'sṛjatpuṣpavṛṣṭiṁ nanṛtuścāpsarogaṇāḥ dhanado dhanadhānyādyaiḥ pūrayāmāsa veśma tat
इन्द्र ने पुष्पवृष्टि की, अप्सराओं के समूह नाचने लगे; कुबेर ने धन-धान्य आदि से उस भवन को भर दिया।
श्लोक 55 (skanda.2.7.55)
यमस्तु रोगरहितांश्चकार मनुजान्भुवि । वरुणो रत्नजालानि मौक्तिकादीन्यपूरयत् ।
yamastu rogarahitāṁścakāra manujānbhuvi varuṇo ratnajālāni mauktikādīnyapūrayat
यम ने पृथ्वी पर मनुष्यों को रोगरहित बना दिया; वरुण ने रत्नों और मोतियों के जाल से उसे भर दिया।
श्लोक 56 (skanda.2.7.56)
एवं संपाद्य सर्वाणि ययुर्देवा वृषाचलम् ।
evaṁ saṁpādya sarvāṇi yayurdevā vṛṣācalam
इस प्रकार सब कुछ सम्पन्न करके देवगण वृषाचल (वेंकटाद्रि) गए।
श्लोक 57 (skanda.2.7.57)
श्रीवराह उवाच । ततः सा हयमारुह्य शुकेन सहिता ययौ । श्रीवेंकटाद्रिमासाद्य देवालयसमीपतः ।
śrīvarāha uvāca tataḥ sā hayamāruhya śukena sahitā yayau śrīveṁkaṭādrimāsādya devālayasamīpataḥ
श्री वराह ने कहा — फिर वह (बकुलमालिका) अश्व पर सवार होकर शुक के साथ चली, और श्री वेंकटाद्रि पर देवालय के निकट पहुँची।
श्लोक 58 (skanda.2.7.58)
अवरुह्य तुरंगात्सा सशुकाऽभ्यन्तरं ययौ । दृष्ट्वा देवं रत्नपीठे श्रिया सह सुलोचनम् ।
avaruhya turaṁgātsā saśukā'bhyantaraṁ yayau dṛṣṭvā devaṁ ratnapīṭhe śriyā saha sulocanam
अश्व से उतरकर वह शुक सहित भीतर गई; उसने देव को रत्नजड़ित सिंहासन पर श्री सहित, सुन्दर नेत्रों वाले, देखा।
श्लोक 59 (skanda.2.7.59)
प्रणम्य ह्यवदत्प्रीता कृत्यं तत्र कृतं विभो । मांगल्यवार्तां वक्तुं वै शुक एष समागतः ।
praṇamya hyavadatprītā kṛtyaṁ tatra kṛtaṁ vibho māṁgalyavārtāṁ vaktuṁ vai śuka eṣa samāgataḥ
प्रणाम करके, प्रसन्न होकर उसने कहा, 'हे प्रभु! वहाँ कार्य सम्पन्न हो गया है; यह शुक मंगल-समाचार सुनाने के लिए आया है।'
श्लोक 60 (skanda.2.7.60)
वदेति देवेनाज्ञप्तः शुको नत्वा तमब्रवीत् । शुक उवाच । त्वां प्रत्याह सुता भूमेर्मामंगीकुरु माधव ।
vadeti devenājñaptaḥ śuko natvā tamabravīt śuka uvāca tvāṁ pratyāha sutā bhūmermāmaṁgīkuru mādhava
'बोलो' — देव द्वारा आज्ञप्त होकर, प्रणाम करके शुक ने उनसे कहा — शुक ने कहा — भूमि की पुत्री तुमसे कहती है, 'हे माधव! मुझे स्वीकार करो,
श्लोक 61 (skanda.2.7.61)
वदामि तव नामानि स्मरामि त्वद्वपुस्सदा । ध्रियन्ते तव चिह्नानि भुजाद्यंगै रमापते ।
vadāmi tava nāmāni smarāmi tvadvapussadā dhriyante tava cihnāni bhujādyaṁgai ramāpate
मैं तुम्हारे नामों का उच्चारण करती हूँ, सदा तुम्हारे स्वरूप का स्मरण करती हूँ। हे रमापते! तुम्हारे चिह्न मेरी भुजाओं और अन्य अंगों पर धारण किए हुए हैं,
श्लोक 62 (skanda.2.7.62)
त्वद्भक्तानर्चयामीह पंचसंस्कारसंयुतान् । त्वत्प्रीतये हि कर्माणि करोमि मधुसूदन ।
tvadbhaktānarcayāmīha paṁcasaṁskārasaṁyutān tvatprītaye hi karmāṇi karomi madhusūdana
मैं यहाँ पंचसंस्कार से युक्त तुम्हारे भक्तों की अर्चना करती हूँ; हे मधुसूदन! मैं तुम्हारी प्रसन्नता के लिए ही सब कर्म करती हूँ,
श्लोक 63 (skanda.2.7.63)
एवं सदैवाचरंत्याः पित्रोरनुमते मम । कुरु प्रसादं देवेश मामंगीकुरु माधव ।
evaṁ sadaivācaraṁtyāḥ pitroranumate mama kuru prasādaṁ deveśa māmaṁgīkuru mādhava
इस प्रकार सदा आचरण करती हुई, अपने माता-पिता की सम्मति से — हे देवेश! मुझ पर कृपा करो, मुझे स्वीकार करो, हे माधव!'
श्लोक 64 (skanda.2.7.64)
इति विज्ञापयामास कमलस्था धरासुता । शुकस्य वचनं श्रुत्वा सुप्रियं त्वात्मनो हरिः ।
iti vijñāpayāmāsa kamalasthā dharāsutā śukasya vacanaṁ śrutvā supriyaṁ tvātmano hariḥ
कमल पर स्थित भूमि की उस पुत्री ने इस प्रकार निवेदन किया। शुक के इन वचनों को सुनकर, जो उन्हें अत्यंत प्रिय लगे, हरि ने —
श्लोक 65 (skanda.2.7.65)
श्रीभगवानुवाच । कर्तुं कल्याणमुद्वाहमागमिष्यामि चाऽमरैः । शुक गच्छ वदैवं तामित्थं देवोऽब्रवीदिति ।
śrībhagavānuvāca kartuṁ kalyāṇamudvāhamāgamiṣyāmi cā'maraiḥ śuka gaccha vadaivaṁ tāmitthaṁ devo'bravīditi
श्री भगवान ने कहा — 'मंगल विवाह सम्पन्न करने के लिए मैं देवताओं सहित आऊँगा। हे शुक! जाओ और उससे ऐसा ही कहो' — देव ने ऐसा कहा।
श्लोक 66 (skanda.2.7.66)
शुकः श्रुत्वा देववाक्यमादाय वनमालिकाम् । देवदत्तां ययौ शीघ्रं वियद्राजसुतां प्रति ।
śukaḥ śrutvā devavākyamādāya vanamālikām devadattāṁ yayau śīghraṁ viyadrājasutāṁ prati
शुक, देव के वचन सुनकर, देव द्वारा दी गई वनमाला लेकर, शीघ्र ही वियद्राज की पुत्री के पास गया।
श्लोक 67 (skanda.2.7.67)
तुलसीमालिकां दत्त्वा मृगनाभिसुगंधिनीम् । प्रणम्य देवीमवदच्छुको देववचः शुभम् ।
tulasīmālikāṁ dattvā mṛganābhisugaṁdhinīm praṇamya devīmavadacchuko devavacaḥ śubham
मृगनाभि (कस्तूरी) से सुगंधित तुलसी की माला उसे देकर, देवी को प्रणाम करके, शुक ने देव के शुभ वचन कहे।
श्लोक 68 (skanda.2.7.68)
श्रुत्वा तन्मालिकां गृह्य भूमिजा शिरसा दधौ । चक्रेऽलंकारमुचितं देवागमनकांक्षिणी ।
śrutvā tanmālikāṁ gṛhya bhūmijā śirasā dadhau cakre'laṁkāramucitaṁ devāgamanakāṁkṣiṇī
यह सुनकर और वह माला लेकर, भूमिजा ने उसे सिर पर धारण किया; देव के आगमन की प्रतीक्षा करती हुई उसने यथोचित श्रृंगार किया।
श्लोक 69 (skanda.2.7.69)
वियद्राजोऽपि सानन्दमिन्दुमाहूय सादरम् । अन्नं विधीयतां राजन्विविधं रससंयुतम् ।
viyadrājo'pi sānandamindumāhūya sādaram annaṁ vidhīyatāṁ rājanvividhaṁ rasasaṁyutam
वियद्राज ने भी आनंदपूर्वक आदरसहित इन्दु को बुलाकर कहा, 'हे राजन्! विविध रसों से युक्त अन्न तैयार किया जाए,
श्लोक 70 (skanda.2.7.70)
विष्णोर्नैवेद्ययोग्यं यत्परमान्नं विधीयताम् । देवानां च ऋषीणां च नराणामपि संमतम् ।
viṣṇornaivedyayogyaṁ yatparamānnaṁ vidhīyatām devānāṁ ca ṛṣīṇāṁ ca narāṇāmapi saṁmatam
विष्णु को नैवेद्य के योग्य जो परमान्न हो वही बनाया जाए, जो देवताओं, ऋषियों और मनुष्यों को भी मान्य हो,
श्लोक 71 (skanda.2.7.71)
चतुर्विधं सुगन्धाढ्यममृतांशैः सुधाकर । एवं कृत्वा संविधानं प्रतीक्ष्यागमनं विभोः ।
caturvidhaṁ sugandhāḍhyamamṛtāṁśaiḥ sudhākara evaṁ kṛtvā saṁvidhānaṁ pratīkṣyāgamanaṁ vibhoḥ
चार प्रकार का, सुगंध से युक्त, अमृत के अंशों सहित, हे सुधाकर!' — इस प्रकार सारी व्यवस्था करके, प्रभु के आगमन की प्रतीक्षा करते हुए,
श्लोक 72 (skanda.2.7.72)
सभायां मंत्रिसहितः समास्त प्रीतमानसः । पुत्रीमलंकृतां कृत्वा धरणीसहितो नृपः ।
sabhāyāṁ maṁtrisahitaḥ samāsta prītamānasaḥ putrīmalaṁkṛtāṁ kṛtvā dharaṇīsahito nṛpaḥ
राजा सभा में मंत्रियों सहित प्रसन्न मन से बैठे रहे; अपनी पुत्री को सुसज्जित करके, धरणी सहित वे राजा प्रतीक्षा करने लगे।