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वैष्णव खण्ड · अध्याय 6

सखियों द्वारा बकुलमालिका को पद्मावती-वृत्तांत

अध्याय 5अध्याय-सूचीअध्याय 7

श्लोक 1 (skanda.2.6.1)

योषित ऊचुः। वयमाकाशराजस्य शुद्धान्तनिलयाः स्त्रियः। सख्यः पद्मालयाया वै दुहितुर्वसुधापतेः

yoṣita ūcuḥ| vayamākāśarājasya śuddhāntanilayāḥ striyaḥ| sakhyaḥ padmālayāyā vai duhiturvasudhāpateḥ

उन स्त्रियों ने कहा — हम आकाशराज के अन्तःपुर की निवासिनी स्त्रियाँ हैं, वसुधापति की पुत्री पद्मालया की सखियाँ हैं।

श्लोक 2 (skanda.2.6.2)

राजपुत्रीं पुरस्कृत्य गताः पूर्वं वनांतरम्। कुर्वंत्यः पुष्पावचयं राजपुत्र्यर्थमाकुलाः

rājaputrīṁ puraskṛtya gatāḥ pūrvaṁ vanāṁtaram| kurvaṁtyaḥ puṣpāvacayaṁ rājaputryarthamākulāḥ

हम राजकुमारी को आगे करके पहले वन में गई थीं, राजकुमारी के लिए व्यग्र होकर पुष्प-संचयन करती हुईं।

श्लोक 3 (skanda.2.6.3)

वृक्षमूले समासीनास्तत्र पश्याम पूरुषम्। इन्द्रनीलमणिश्याममिन्दिरामन्दिरोरसम्

vṛkṣamūle samāsīnāstatra paśyāma pūruṣam| indranīlamaṇiśyāmamindirāmandirorasam

एक वृक्ष के मूल में बैठी हुई हमने वहाँ एक पुरुष देखा, जो इन्द्रनीलमणि के समान श्याम था, जिसका वक्षस्थल लक्ष्मी का निवास था।

श्लोक 4 (skanda.2.6.4)

ईषत्स्मितमुखं चारुपीनदीर्घभुजद्वयम्। मृष्टपीतांबरं हेमबाणबाणासनोज्ज्वलम्

īṣatsmitamukhaṁ cārupīnadīrghabhujadvayam| mṛṣṭapītāṁbaraṁ hemabāṇabāṇāsanojjvalam

उसका मुख हल्की मुस्कान से युक्त था, उसकी दोनों भुजाएँ सुंदर, भरी हुई और लंबी थीं; वह उज्ज्वल पीत वस्त्र धारण किए था, स्वर्ण-बाण और धनुष से देदीप्यमान था।

श्लोक 5 (skanda.2.6.5)

सुवर्णमुकुटं हारकेयूरादिविभूषितम्। तं तु पद्मालया दृष्ट्वा सखी कमललोचना

suvarṇamukuṭaṁ hārakeyūrādivibhūṣitam| taṁ tu padmālayā dṛṣṭvā sakhī kamalalocanā

वह स्वर्ण-मुकुट, हार, केयूर आदि से विभूषित था। उसे देखकर हमारी कमल-नेत्रोंवाली सखी पद्मालया ने -

श्लोक 6 (skanda.2.6.6)

द्रुतहेमनिभाकारा पश्य पश्येति साब्रवीत्। पश्यन्तीनां तदास्माकं गतोऽन्तर्धानमाशु सः

drutahemanibhākārā paśya paśyeti sābravīt| paśyantīnāṁ tadāsmākaṁ gato'ntardhānamāśu saḥ

पिघले हुए स्वर्ण के समान कान्तिवाली उसने कहा — "देखो, देखो!" तब हमारे देखते-देखते ही वह शीघ्र अन्तर्धान हो गया।

श्लोक 7 (skanda.2.6.7)

सा सखी मूर्च्छितास्माभिनीता राजगृहं ततः

sā sakhī mūrcchitāsmābhinītā rājagṛhaṁ tataḥ

वह सखी मूर्च्छित हो गई, और हम उसे राजमहल में ले आईं।

श्लोक 8 (skanda.2.6.8)

दृष्ट्वाऽस्वस्थां नृपः पुत्रीमपृच्छद्दैवचिन्तकम्। वद विप्रेन्द्र पुत्र्या मे ग्रहचारफलं मुने

dṛṣṭvā'svasthāṁ nṛpaḥ putrīmapṛcchaddaivacintakam| vada viprendra putryā me grahacāraphalaṁ mune

अपनी पुत्री को अस्वस्थ देखकर राजा ने ज्योतिषी से पूछा — "हे विप्रेन्द्र! हे मुने! मेरी पुत्री के ग्रहों की चाल का फल बताइए।"

श्लोक 9 (skanda.2.6.9)

बृहस्पतिसमो विप्रो विचार्यात्मनि खेचरान्। अनुकूला ग्रहाः सर्वे तव पुत्र्या नृपोत्तम

bṛhaspatisamo vipro vicāryātmani khecarān| anukūlā grahāḥ sarve tava putryā nṛpottama

बृहस्पति के समान उस विप्र ने ग्रहों का विचार करके कहा — "हे नृपोत्तम! आपकी पुत्री के लिए सभी ग्रह अनुकूल हैं।"

श्लोक 10 (skanda.2.6.10)

किन्तु नित्यं ग्रहफलं किंचिद्भ्रांतिकरं नृप। तमुवाच पुनर्धीमान्प्रश्नकालं विचार्य च

kintu nityaṁ grahaphalaṁ kiṁcidbhrāṁtikaraṁ nṛpa| tamuvāca punardhīmānpraśnakālaṁ vicārya ca

"परंतु हे नृप! ग्रहों का फल सदा कुछ भ्रम उत्पन्न करने वाला होता है।" तत्पश्चात् उस बुद्धिमान् ने प्रश्न के समय का विचार करके पुनः कहा।

श्लोक 11 (skanda.2.6.11)

छायां गुणित्वा लग्नं च तत्फलानि विचार्य च। लग्ने लग्नाधिपश्चन्द्रः केंद्रे चैव बृहस्पतिः

chāyāṁ guṇitvā lagnaṁ ca tatphalāni vicārya ca| lagne lagnādhipaścandraḥ keṁdre caiva bṛhaspatiḥ

छाया की गणना करके, लग्न और उसके फलों का विचार करके — "लग्न में लग्नेश चन्द्रमा है, और केंद्र में बृहस्पति है।"

श्लोक 12 (skanda.2.6.12)

निद्राति दिनपक्षी तु प्रश्नपक्षी तु राज्यगः। शृणु राजन्फलं तस्य स्वास्थ्यमेव भविष्यति

nidrāti dinapakṣī tu praśnapakṣī tu rājyagaḥ| śṛṇu rājanphalaṁ tasya svāsthyameva bhaviṣyati

"दिन का पक्षी सो रहा है, और प्रश्न का पक्षी राज्य-स्थान में है। हे राजन्! सुनो, इसका फल स्वास्थ्य-प्राप्ति ही होगा।"

श्लोक 13 (skanda.2.6.13)

उत्तमः पुरुषः कश्चिदागतः कन्यकां प्रति। तं दृष्ट्वा मूर्च्छिता पुत्री तेन योगं समेष्यति

uttamaḥ puruṣaḥ kaścidāgataḥ kanyakāṁ prati| taṁ dṛṣṭvā mūrcchitā putrī tena yogaṁ sameṣyati

"कोई उत्तम पुरुष उस कन्या के पास आया था; उसे देखकर आपकी पुत्री मूर्च्छित हो गई, और वह उसी से मिलन को प्राप्त करेगी।"

श्लोक 14 (skanda.2.6.14)

तेनैव प्रेषिता काचिदागमिष्यति कन्यका। सा तु वक्ष्यति यद्वाक्यं तद्धितं ते भविष्यति

tenaiva preṣitā kācidāgamiṣyati kanyakā| sā tu vakṣyati yadvākyaṁ taddhitaṁ te bhaviṣyati

"उसी के द्वारा भेजी गई कोई कन्या आएगी; वह जो वचन कहेगी, वह आपके लिए हितकर होगा।"

श्लोक 15 (skanda.2.6.15)

तत्कुरुष्व महाराज सत्यंसत्यं वदाम्यहम्। किं च सर्वार्थदं यत्तु सर्वव्याधिविनाशनम्

tatkuruṣva mahārāja satyaṁsatyaṁ vadāmyaham| kiṁ ca sarvārthadaṁ yattu sarvavyādhivināśanam

"अतः हे महाराज! वैसा ही कीजिए, मैं सत्य-सत्य कह रहा हूँ। और जो सब कामनाओं को देने वाला तथा सब व्याधियों का नाशक है -"

श्लोक 16 (skanda.2.6.16)

वक्ष्यामि तत्कुरुष्वाद्य पुत्र्यास्तव सुखावहम्। कारयागस्त्यलिंगस्य ब्राह्मणैरभिषेचनम्

vakṣyāmi tatkuruṣvādya putryāstava sukhāvaham| kārayāgastyaliṁgasya brāhmaṇairabhiṣecanam

"वह मैं बताता हूँ, आज ही उसे कीजिए, जो आपकी पुत्री के लिए सुखदायी होगा — ब्राह्मणों द्वारा अगस्त्य-लिंग का अभिषेक करवाइए।"

श्लोक 17 (skanda.2.6.17)

इत्युक्ताथ गृहं यातो राजानं दैवचितकः

ityuktātha gṛhaṁ yāto rājānaṁ daivacitakaḥ

ऐसा कहकर वह ज्योतिषी राजा से आज्ञा लेकर अपने घर चला गया।

श्लोक 18 (skanda.2.6.18)

आकाशराजोऽपि तदा विप्रानाहूय वैदिकान्। अभ्यर्च्याज्ञापयामास गत्वा देवालयं द्विजाः

ākāśarājo'pi tadā viprānāhūya vaidikān| abhyarcyājñāpayāmāsa gatvā devālayaṁ dvijāḥ

तब आकाशराज ने वैदिक ब्राह्मणों को बुलाकर, उनका पूजन करके आज्ञा दी — "हे द्विजो! देवालय जाकर -"

श्लोक 19 (skanda.2.6.19)

महाभिषेकं शम्भोश्च कुरुध्वं मंत्रपूर्वकम्। इत्यनुज्ञाप्य तानस्मानाहूयाभ्यवदच्छुभे

mahābhiṣekaṁ śambhośca kurudhvaṁ maṁtrapūrvakam| ityanujñāpya tānasmānāhūyābhyavadacchubhe

"और मंत्रपूर्वक शम्भु का महाभिषेक करो।" उन्हें ऐसी आज्ञा देकर, हे शुभे! हमें बुलाकर उन्होंने कहा।

श्लोक 20 (skanda.2.6.20)

महाभिषेकसम्भारान्सम्पादयत कन्यकाः। इत्याज्ञप्ता नृपेणैव वयं देवालयं गताः

mahābhiṣekasambhārānsampādayata kanyakāḥ| ityājñaptā nṛpeṇaiva vayaṁ devālayaṁ gatāḥ

"हे कन्याओ! महाभिषेक की सामग्री तैयार करो।" राजा द्वारा इस प्रकार आज्ञप्त होकर हम देवालय गईं।

श्लोक 21 (skanda.2.6.21)

ब्रूहि त्वं सुभगेऽस्माकं त्वदागमनमंजसा। कुतोसि कस्य वार्थेन क्व वा जिगमिषा हि ते

brūhi tvaṁ subhage'smākaṁ tvadāgamanamaṁjasā| kutosi kasya vārthena kva vā jigamiṣā hi te

"अब हे सुभगे! तुम हमें अपने आने का कारण स्पष्ट रूप से बताओ — तुम कहाँ से आई हो, किसलिए आई हो, और तुम्हारी कहाँ जाने की इच्छा है?"

श्लोक 22 (skanda.2.6.22)

दिव्याश्वमधिरुह्येमं देवलोकादिवागता

divyāśvamadhiruhyemaṁ devalokādivāgatā

"यह दिव्य अश्व पर सवार होकर, मानो देवलोक से ही आई हो।"

श्लोक 23 (skanda.2.6.23)

श्रीवराह उवाच। इति ताभिस्तदा पृष्टा हृष्टा बकुलमालिका। प्रोवाच वाचं मधुरां हर्षयन्तीव बालिकाः

śrīvarāha uvāca| iti tābhistadā pṛṣṭā hṛṣṭā bakulamālikā| provāca vācaṁ madhurāṁ harṣayantīva bālikāḥ

श्रीवराह भगवान ने कहा — इस प्रकार उनके द्वारा पूछे जाने पर हर्षित बकुलमालिका ने उन बालिकाओं को मानो प्रसन्न करती हुई मधुर वाणी में कहा।

श्लोक 24 (skanda.2.6.24)

बकुलमालिकोवाच। श्रीवेंकटाद्रेः प्राप्ताहं नाम्ना बकुलमालिका। धरणीं द्रष्टुकामाहमारुह्येमं तुरंगमम्

bakulamālikovāca| śrīveṁkaṭādreḥ prāptāhaṁ nāmnā bakulamālikā| dharaṇīṁ draṣṭukāmāhamāruhyemaṁ turaṁgamam

बकुलमालिका ने कहा — मैं श्रीवेंकटाद्रि से आई हूँ, मेरा नाम बकुलमालिका है। धरणी को देखने की इच्छा से मैं इस घोड़े पर सवार होकर आई हूँ।

श्लोक 25 (skanda.2.6.25)

द्रष्टुं शक्या भवेद्देवी किमु तत्र नृपालये। इति तस्या वचः श्रुत्वा ताः प्रोचुर्नृपकन्यकाः

draṣṭuṁ śakyā bhaveddevī kimu tatra nṛpālaye| iti tasyā vacaḥ śrutvā tāḥ procurnṛpakanyakāḥ

"क्या वहाँ राजमहल में उस देवी के दर्शन सम्भव हो सकते हैं?" उसके ये वचन सुनकर उन राजकुमारियों ने कहा।

श्लोक 26 (skanda.2.6.26)

अस्माभिः सहिता त्वं वै द्रक्ष्यसे धरणीं शुभे। इत्युक्ता सा ततस्ताभिरागता नृपमंदिरम्

asmābhiḥ sahitā tvaṁ vai drakṣyase dharaṇīṁ śubhe| ityuktā sā tatastābhirāgatā nṛpamaṁdiram

"हे शुभे! हमारे साथ रहकर तुम अवश्य धरणी के दर्शन करोगी।" ऐसा कहे जाने पर वह उनके साथ राजमहल में आई।

श्लोक 27 (skanda.2.6.27)

आगच्छन्तीषु तास्वेवं धरणी तु पुलिन्दिनीम्

āgacchantīṣu tāsvevaṁ dharaṇī tu pulindinīm

उनके इस प्रकार आते समय, धरणी उधर एक भीलनी को -

श्लोक 28 (skanda.2.6.28)

आयान्तीं वीथिकायां सा सगुंजाशंखभूषिताम्। शिशुं स्तनं धयं पृष्ठे बद्ध्वा वस्त्रांचलेन वै

āyāntīṁ vīthikāyāṁ sā saguṁjāśaṁkhabhūṣitām| śiśuṁ stanaṁ dhayaṁ pṛṣṭhe baddhvā vastrāṁcalena vai

जो गली में आ रही थी, गुंजा और शंख से विभूषित, अपने दूध पीते शिशु को वस्त्र के आँचल से पीठ पर बाँधे हुए थी।

श्लोक 29 (skanda.2.6.29)

वदामि सत्यं शृणुत भूतं भव्यं भविष्यकम्। वदन्ती वीथिवीथीषु तामाहूय शुचिस्मिता

vadāmi satyaṁ śṛṇuta bhūtaṁ bhavyaṁ bhaviṣyakam| vadantī vīthivīthīṣu tāmāhūya śucismitā

वह हर गली में यह कहती हुई घूम रही थी — "मैं सत्य कहती हूँ, भूत, वर्तमान और भविष्य सुनो।" उस निर्मल मुस्कानवाली को धरणी ने बुलाकर -

श्लोक 30 (skanda.2.6.30)

स्वर्णशूर्पं समादाय तस्मिन्मुक्ता निधाय च। त्रिप्रस्थमात्रांस्त्रीन्राशीन्कृत्वा तस्यै निधाय च

svarṇaśūrpaṁ samādāya tasminmuktā nidhāya ca| triprasthamātrāṁstrīnrāśīnkṛtvā tasyai nidhāya ca

एक स्वर्ण-सूप लेकर, उसमें मोती रखकर, तीन-तीन प्रस्थ के तीन ढेर बनाकर, उसके सामने रखकर -

श्लोक 31 (skanda.2.6.31)

वद सत्यं त्वमेष्यद्वा भूतमेव वा। इत्येवं धरणी देवी पृच्छंती तां स्थिताऽभवत्

vada satyaṁ tvameṣyadvā bhūtameva vā| ityevaṁ dharaṇī devī pṛcchaṁtī tāṁ sthitā'bhavat

"सत्य बताओ, यह भविष्य है या भूतकाल की बात।" इस प्रकार पूछती हुई धरणी देवी वहीं खड़ी रह गईं।

श्लोक 32 (skanda.2.6.32)

पृष्टा सावददस्यास्तु मनसा यद्विचिन्तितम्। मध्यराशौ चिन्तितं ते वद कल्याणि मे ऋजु

pṛṣṭā sāvadadasyāstu manasā yadvicintitam| madhyarāśau cintitaṁ te vada kalyāṇi me ṛju

पूछे जाने पर उसने कहा — "जो तुम्हारे मन में सोचा गया है, वह मध्य के ढेर में है। हे कल्याणि! मुझे सीधा-सीधा बताओ।"

श्लोक 33 (skanda.2.6.33)

ओमित्याहाथ धरणी पुलिंदां राजवल्लभा। राशिरुक्तः फलं ब्रूहि धनराशिं ददामि ते

omityāhātha dharaṇī puliṁdāṁ rājavallabhā| rāśiruktaḥ phalaṁ brūhi dhanarāśiṁ dadāmi te

तब राजा की प्रिया धरणी ने "हाँ" कहा। "ढेर तो बताया गया, अब फल बताओ; मैं तुम्हें धन का ढेर दूँगी।"

श्लोक 34 (skanda.2.6.34)

धरण्युवाच। पुलिन्दोवाच। सत्यं वदामि ते सुभ्रु शिशोरन्नं प्रयच्छ मे। इत्युक्ता सा तु धरणी स्वर्णपात्रेऽन्नमाददे

dharaṇyuvāca| pulindovāca| satyaṁ vadāmi te subhru śiśorannaṁ prayaccha me| ityuktā sā tu dharaṇī svarṇapātre'nnamādade

धरणी ने कहा — भीलनी ने कहा — "हे सुभ्रु! मैं तुम्हें सत्य बताती हूँ, पहले मुझे मेरे शिशु के लिए अन्न दो।" ऐसा कहे जाने पर धरणी ने स्वर्ण-पात्र में अन्न लिया।

श्लोक 35 (skanda.2.6.35)

दत्त्वा तस्यै पुलिंदिन्यै सत्यं ब्रूहीति सावदत्। सक्षीरमन्नमादाय दत्त्वा पुत्राय भामिनी

dattvā tasyai puliṁdinyai satyaṁ brūhīti sāvadat| sakṣīramannamādāya dattvā putrāya bhāminī

उसे भीलनी को देकर "अब सत्य बताओ" ऐसा उसने कहा। दूध सहित अन्न लेकर, उस भामिनी ने अपने पुत्र को खिलाकर -

श्लोक 36 (skanda.2.6.36)

सा सत्यमवदत्सुभ्रूर्दुहितुर्देहशोषणम्। पुरुषादागतं भीरु तद्रूपाऽदर्शनादियम्

sā satyamavadatsubhrūrduhiturdehaśoṣaṇam| puruṣādāgataṁ bhīru tadrūpā'darśanādiyam

उस सुभ्रु ने सत्य कहा — "हे भीरु! तुम्हारी पुत्री का शरीर एक पुरुष के कारण क्षीण हो रहा है; उसके रूप के अदर्शन से यह अवस्था हुई है।"

श्लोक 37 (skanda.2.6.37)

अंगतापं समापन्ना ह्यनंगशरपीडिता। स तु देवादिदेवो वै वैकुण्ठादागतः स्वयम्

aṁgatāpaṁ samāpannā hyanaṁgaśarapīḍitā| sa tu devādidevo vai vaikuṇṭhādāgataḥ svayam

"वह अनंग के बाणों से पीड़ित होकर शारीरिक संताप को प्राप्त हुई है। और वह पुरुष तो स्वयं वैकुण्ठ से आया देवाधिदेव है।"

श्लोक 38 (skanda.2.6.38)

श्रीवेंकटाद्रिशिखरे स्वामिपुष्करिणीतटे। मायावी परमानंदः श्रिया सह रमापतिः

śrīveṁkaṭādriśikhare svāmipuṣkariṇītaṭe| māyāvī paramānaṁdaḥ śriyā saha ramāpatiḥ

"श्रीवेंकटाद्रि के शिखर पर, स्वामिपुष्करिणी के तट पर, वह मायावी, परमानंदस्वरूप, श्री के साथ रमापति -"

श्लोक 39 (skanda.2.6.39)

कामरूपी विहरते भक्ताभीष्टप्रदो हरिः। स तुरंगं समारुह्य विहरन्काननान्तरे

kāmarūpī viharate bhaktābhīṣṭaprado hariḥ| sa turaṁgaṁ samāruhya viharankānanāntare

"इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, भक्तों की अभीष्ट पूर्ति करने वाला हरि विहार करता है। वह घोड़े पर सवार होकर वन में विहार करते हुए -"

श्लोक 40 (skanda.2.6.40)

आगत्योपवनं राज्ञि तव कन्यां स दृष्टवान्। रमासमामिमां दृष्ट्वा स्वयं कामवशं गतः

āgatyopavanaṁ rājñi tava kanyāṁ sa dṛṣṭavān| ramāsamāmimāṁ dṛṣṭvā svayaṁ kāmavaśaṁ gataḥ

"हे राज्ञि! उद्यान में आकर उसने तुम्हारी इस कन्या को देखा; लक्ष्मी के समान इसे देखकर वह स्वयं काम के वश में हो गया।"

श्लोक 41 (skanda.2.6.41)

स्वसखीं ललितां देवः प्रेषयिष्यति तेंतिकम्। रमेव तं समेत्यैषा रमिष्यति सुखं चिरम्

svasakhīṁ lalitāṁ devaḥ preṣayiṣyati teṁtikam| rameva taṁ sametyaiṣā ramiṣyati sukhaṁ ciram

"वह देव अपनी सुंदर सखी को तुम्हारे पास भेजेगा; लक्ष्मी की भाँति यह उससे मिलकर चिरकाल तक सुखपूर्वक रमण करेगी।"

श्लोक 42 (skanda.2.6.42)

एतत्सत्यं मम वचः पश्याद्यैव नृपात्मजे। पुत्रस्यान्नं प्रयच्छेति तूष्णीमास पुलिन्दिनी

etatsatyaṁ mama vacaḥ paśyādyaiva nṛpātmaje| putrasyānnaṁ prayaccheti tūṣṇīmāsa pulindinī

"हे राजपुत्री! मेरा यह वचन आज ही सत्य होते देखो।" "अब मेरे पुत्र को अन्न दो" — ऐसा कहकर वह भीलनी चुप हो गई।

श्लोक 43 (skanda.2.6.43)

अन्नं दत्त्वा पुनर्भूरि तस्यै तां विससर्ज ह। तस्यां विनिर्गतायां तु पुलिंदिन्यामनिन्दिता

annaṁ dattvā punarbhūri tasyai tāṁ visasarja ha| tasyāṁ vinirgatāyāṁ tu puliṁdinyāmaninditā

उसे पुनः प्रचुर अन्न देकर धरणी ने उसे विदा कर दिया। उस भीलनी के चले जाने पर, वह निर्दोष धरणी -

श्लोक 44 (skanda.2.6.44)

उत्थाय चांगणात्तस्माद्विवेशांतःपुरं शुभम्। यत्र पद्मालया कन्या समास्ते स्वसखीवृता

utthāya cāṁgaṇāttasmādviveśāṁtaḥpuraṁ śubham| yatra padmālayā kanyā samāste svasakhīvṛtā

उस आँगन से उठकर उस शुभ अन्तःपुर में गई, जहाँ पद्मालया कन्या अपनी सखियों से घिरी हुई बैठी थी।

श्लोक 45 (skanda.2.6.45)

गत्वा पुत्रीसमीपस्था कन्यां कामातुरां सुताम्। पुत्रि किं ते करिष्यामि वस्तु किं वा प्रियं शुभे

gatvā putrīsamīpasthā kanyāṁ kāmāturāṁ sutām| putri kiṁ te kariṣyāmi vastu kiṁ vā priyaṁ śubhe

पुत्री के समीप जाकर, काम-पीड़ित उस कन्या से — "हे पुत्री! तुम्हारे लिए मैं क्या करूँ? हे शुभे! तुम्हें कौन-सी वस्तु प्रिय है?"

श्लोक 46 (skanda.2.6.46)

इति मात्राभिपृष्टा सा मन्दमाह मनस्विनी

iti mātrābhipṛṣṭā sā mandamāha manasvinī

माता के इस प्रकार पूछने पर वह धैर्यवती कन्या धीरे से बोली।

श्लोक 47 (skanda.2.6.47)

नेत्राभिरामं यल्लोके सतामपि मनःप्रियम्। यद्द्रष्टुकामा ब्रह्माद्या यत्तु सर्वगतं महत्

netrābhirāmaṁ yalloke satāmapi manaḥpriyam| yaddraṣṭukāmā brahmādyā yattu sarvagataṁ mahat

"जो इस लोक में नेत्रों को सुखद है, सज्जनों के मन को भी प्रिय है, जिसे देखने की इच्छा ब्रह्मा आदि भी रखते हैं, जो सर्वव्यापी महान् तत्त्व है -"

श्लोक 48 (skanda.2.6.48)

तेजसामपि तेजस्वि देवानामपि दैवतम्। भक्तैस्सद्भिरिह प्राप्यमभक्तैर्न कदाचन

tejasāmapi tejasvi devānāmapi daivatam| bhaktaissadbhiriha prāpyamabhaktairna kadācana

"जो तेजस्वियों का भी तेज है, देवताओं का भी देवता है, जो सज्जन भक्तों द्वारा ही यहाँ प्राप्त किया जा सकता है, अभक्तों द्वारा कभी नहीं -"

श्लोक 49 (skanda.2.6.49)

तस्मिन्नेव मनो मेऽम्ब वस्तुनीह प्रवर्तते। तदेवान्विष्यतां मातर्भक्तानां सर्वकामदम्

tasminneva mano me'mba vastunīha pravartate| tadevānviṣyatāṁ mātarbhaktānāṁ sarvakāmadam

"उसी वस्तु में, हे माता! मेरा मन प्रवृत्त होता है। हे माता! उसी की खोज कीजिए, जो भक्तों की सभी कामनाओं को पूर्ण करने वाला है।"

श्लोक 50 (skanda.2.6.50)

श्रीवराह उवाच। एतच्छ्रुत्वाथ धरणी तामपृच्छत्पुनः सुताम्। तद्भक्तलक्षणं ब्रूहि यैः प्राप्यं तत्सुलोचने

śrīvarāha uvāca| etacchrutvātha dharaṇī tāmapṛcchatpunaḥ sutām| tadbhaktalakṣaṇaṁ brūhi yaiḥ prāpyaṁ tatsulocane

श्रीवराह भगवान ने कहा — यह सुनकर धरणी ने अपनी पुत्री से पुनः पूछा — "हे सुलोचने! उसके भक्तों के लक्षण बताओ, जिनके द्वारा वह प्राप्त होता है।"

श्लोक 51 (skanda.2.6.51)

पद्मालयोवाच। भक्तानां लक्षणं मातः शृणु गुह्यं समाहिता। शंखचक्रांकिता नित्यं भुजयुग्मे वसुन्धरे

padmālayovāca| bhaktānāṁ lakṣaṇaṁ mātaḥ śṛṇu guhyaṁ samāhitā| śaṁkhacakrāṁkitā nityaṁ bhujayugme vasundhare

पद्मालया ने कहा — हे माता! सावधान होकर सुनिए भक्तों का गुह्य लक्षण। हे वसुन्धरे! वे अपनी दोनों भुजाओं पर सदा शंख और चक्र का चिह्न धारण करते हैं।

श्लोक 52 (skanda.2.6.52)

ऊर्ध्वपुंड्रं सान्तरालं तेषामेव विशेषतः। पुण्ड्रानि द्वादश पुनर्धारयंति तथापरे

ūrdhvapuṁḍraṁ sāntarālaṁ teṣāmeva viśeṣataḥ| puṇḍrāni dvādaśa punardhārayaṁti tathāpare

वे विशेष रूप से मध्यरेखा सहित ऊर्ध्वपुंड्र धारण करते हैं; कुछ अन्य फिर से बारह पुंड्र धारण करते हैं।

श्लोक 53 (skanda.2.6.53)

ललाटोदरहृत्कण्ठे जठरे पार्श्वयोरपि। कूर्परयोर्भुजद्वन्द्वे पृष्ठे च गलपृष्ठके

lalāṭodarahṛtkaṇṭhe jaṭhare pārśvayorapi| kūrparayorbhujadvandve pṛṣṭhe ca galapṛṣṭhake

ललाट, उदर, हृदय, कण्ठ, जठर, दोनों पार्श्वों में, दोनों कोहनियों में, दोनों भुजाओं में, पीठ में और गर्दन के पिछले भाग में -

श्लोक 54 (skanda.2.6.54)

केशवादीनि नामानि द्वादशांगेषु द्वादश। वासुदेवेति तन्मूर्ध्नि धारयंति नमोऽस्त्विति

keśavādīni nāmāni dvādaśāṁgeṣu dvādaśa| vāsudeveti tanmūrdhni dhārayaṁti namo'stviti

बारह अंगों पर केशव आदि बारह नामों को धारण करते हैं, और सिर पर "वासुदेव" नाम को "नमोऽस्तु" कहते हुए धारण करते हैं।

श्लोक 55 (skanda.2.6.55)

तेषां तु नियमान्वक्ष्ये मातः शृणु मनोरमान्। वेदपारायणरताः कर्म कुर्वंति वैदिकम्

teṣāṁ tu niyamānvakṣye mātaḥ śṛṇu manoramān| vedapārāyaṇaratāḥ karma kurvaṁti vaidikam

हे माता! उनके व्रतों को बताती हूँ, सुनिए वे मनोहर नियम — वे वेद-पारायण में रत रहते हैं, वैदिक कर्म करते हैं।

श्लोक 56 (skanda.2.6.56)

सत्यं वदन्ति ये देवि नासूयंति परान्क्वचित्। परनिंदां न कुर्वंति परस्वं न हरंति च

satyaṁ vadanti ye devi nāsūyaṁti parānkvacit| paraniṁdāṁ na kurvaṁti parasvaṁ na haraṁti ca

हे देवि! वे सत्य बोलते हैं, किसी की भी निंदा नहीं करते, दूसरों की निंदा नहीं करते और दूसरों का धन नहीं हरते।

श्लोक 57 (skanda.2.6.57)

न स्मरंति न पश्यन्ति न स्पृशंति कदाचन। परदारान्सुरूपांश्च ये च तान्विद्धि वैष्णवान्

na smaraṁti na paśyanti na spṛśaṁti kadācana| paradārānsurūpāṁśca ye ca tānviddhi vaiṣṇavān

वे सुंदर परस्त्रियों का न कभी स्मरण करते हैं, न देखते हैं, न स्पर्श करते हैं — उन्हें ही वैष्णव जानो।

श्लोक 58 (skanda.2.6.58)

सर्वभूतदयावंतः सर्वभूतहिते रताः। सदा गायंति देवेशमेतान्भक्तानवेहि वै

sarvabhūtadayāvaṁtaḥ sarvabhūtahite ratāḥ| sadā gāyaṁti deveśametānbhaktānavehi vai

वे सब प्राणियों पर दया करने वाले, सब प्राणियों के हित में रत रहते हैं, सदा देवेश का गुणगान करते हैं — इन्हें ही भक्त जानो।

श्लोक 59 (skanda.2.6.59)

येन केन च सन्तुष्टाः स्वदारनिरताश्च ये। वीतरागभयक्रोधास्तान्भक्तान्विद्धि वैष्णवान्

yena kena ca santuṣṭāḥ svadāraniratāśca ye| vītarāgabhayakrodhāstānbhaktānviddhi vaiṣṇavān

जो जिस किसी वस्तु से भी संतुष्ट रहते हैं, अपनी ही पत्नी में अनुरक्त रहते हैं, राग, भय और क्रोध से रहित हैं — उन भक्तों को वैष्णव जानो।

श्लोक 60 (skanda.2.6.60)

एवंविधैर्गुणैर्युक्ताः पंचायुधधरा अपि। पित्रा चाचार्यरूपेण शिष्टेनान्येन वा पुनः

evaṁvidhairguṇairyuktāḥ paṁcāyudhadharā api| pitrā cācāryarūpeṇa śiṣṭenānyena vā punaḥ

ऐसे गुणों से युक्त, पाँच आयुधों को धारण करने वाले वे — पिता के द्वारा, आचार्य-रूप में, अथवा किसी अन्य सुसंस्कृत जन के द्वारा -

श्लोक 61 (skanda.2.6.61)

स्वगृह्योक्तविधानेन वह्निमादाय वै बुधः। चक्राद्यायुधमंत्रेण जुहुयात्षोडशाहुतीः

svagṛhyoktavidhānena vahnimādāya vai budhaḥ| cakrādyāyudhamaṁtreṇa juhuyātṣoḍaśāhutīḥ

अपने गृह्यसूत्र में कहे गए विधान से अग्नि को प्रज्वलित करके, वह विद्वान् चक्र आदि आयुधों के मंत्र से सोलह आहुतियाँ दे।

श्लोक 62 (skanda.2.6.62)

मूलमंत्रेण सूक्तेन पौरुषेण ततः परम्। जातवेदः सुमंत्रेण पश्चादष्टोत्तरं शतम्

mūlamaṁtreṇa sūktena pauruṣeṇa tataḥ param| jātavedaḥ sumaṁtreṇa paścādaṣṭottaraṁ śatam

तत्पश्चात् मूलमंत्र से, पुरुषसूक्त से आहुति दे, और फिर जातवेद के उत्तम मंत्र से एक सौ आठ आहुतियाँ दे।

श्लोक 63 (skanda.2.6.63)

हुत्वा महाव्याहृतिभिश्चक्रादींस्तत्र तापयेत्। सह्यान्सुतप्तान्गुरुणा मंत्रवद्धारयेद्बुधः

hutvā mahāvyāhṛtibhiścakrādīṁstatra tāpayet| sahyānsutaptānguruṇā maṁtravaddhārayedbudhaḥ

महाव्याहृतियों से हवन करके वहाँ चक्र आदि को तपाना चाहिए। सहने योग्य रूप से तपाए गए उन चिह्नों को गुरु द्वारा विद्वान् मंत्रपूर्वक धारण कराए।

श्लोक 64 (skanda.2.6.64)

भुजद्वये शंखचक्रे मूर्ध्नि शार्ङ्गशरौ तथा। ललाटे तु गदा धार्या हृदये खड्गमेव च

bhujadvaye śaṁkhacakre mūrdhni śārṅgaśarau tathā| lalāṭe tu gadā dhāryā hṛdaye khaḍgameva ca

दोनों भुजाओं पर शंख और चक्र, सिर पर शार्ङ्ग धनुष और बाण, ललाट पर गदा, तथा हृदय पर खड्ग धारण किया जाए।

श्लोक 65 (skanda.2.6.65)

एवं धार्याणि पञ्चैव विष्णुभक्तैर्मुमुक्षुभिः। अथवा भुजयोश्चक्र शंखौ चैव सुलक्षणौ

evaṁ dhāryāṇi pañcaiva viṣṇubhaktairmumukṣubhiḥ| athavā bhujayoścakra śaṁkhau caiva sulakṣaṇau

इस प्रकार मुमुक्षु विष्णुभक्तों को ये पाँचों चिह्न धारण करने चाहिए, अथवा केवल दोनों भुजाओं पर सुंदर लक्षणोंवाले चक्र और शंख धारण करें।

श्लोक 66 (skanda.2.6.66)

एवं लाञ्छनयुक्ता ये भक्तास्ते वैष्णवाः स्मृताः। तैरेव लभ्यं तद्ब्रह्म सदाचारसमन्वितैः

evaṁ lāñchanayuktā ye bhaktāste vaiṣṇavāḥ smṛtāḥ| taireva labhyaṁ tadbrahma sadācārasamanvitaiḥ

इस प्रकार इन चिह्नों से युक्त भक्त ही वैष्णव कहलाते हैं। सदाचार से युक्त उन्हीं के द्वारा वह ब्रह्म प्राप्त किया जा सकता है।

श्लोक 67 (skanda.2.6.67)

तस्मिन्नेव मम प्रीतिस्तत्प्राप्तिं कांक्षते मनः। मातर्विष्णुविनान्येषु वाञ्छा काचिन्न जायते

tasminneva mama prītistatprāptiṁ kāṁkṣate manaḥ| mātarviṣṇuvinānyeṣu vāñchā kācinna jāyate

उसी में मेरी प्रीति है, मेरा मन उसी की प्राप्ति चाहता है। हे माता! विष्णु के अतिरिक्त अन्य किसी वस्तु की इच्छा मुझे नहीं होती।

श्लोक 68 (skanda.2.6.68)

स्मरामि श्यामलं विष्णुं वदामि हरिमच्युतम्। तेनैव मातर्जीवामि तद्योगे चिन्त्यतां विधिः

smarāmi śyāmalaṁ viṣṇuṁ vadāmi harimacyutam| tenaiva mātarjīvāmi tadyoge cintyatāṁ vidhiḥ

मैं श्यामल विष्णु का स्मरण करती हूँ, अच्युत हरि का ही नाम लेती हूँ; हे माता! उन्हीं के सहारे मैं जीवित हूँ — उनसे मिलन का उपाय सोचिए।

श्लोक 69 (skanda.2.6.69)

श्रीवराह उवाच। इत्युक्त्वा मातरं दीना विररामाम्बुजानना। तच्छ्रुत्वा चिन्तयामास विष्णुः प्रीतः कथं भवेत्

śrīvarāha uvāca| ityuktvā mātaraṁ dīnā virarāmāmbujānanā| tacchrutvā cintayāmāsa viṣṇuḥ prītaḥ kathaṁ bhavet

श्रीवराह भगवान ने कहा — अपनी माता से यह कहकर वह दीन कमल-मुखी चुप हो गई। यह सुनकर विष्णु ने विचार किया कि वे कैसे प्रसन्न हों।

श्लोक 70 (skanda.2.6.70)

एतस्मिन्नंतरे कन्या अगस्त्येशं समर्च्य च। आगता धरणीं द्रष्टुं सहैव बकुलस्रजा

etasminnaṁtare kanyā agastyeśaṁ samarcya ca| āgatā dharaṇīṁ draṣṭuṁ sahaiva bakulasrajā

इसी बीच, अगस्त्येश्वर की पूजा करके, वह कन्या बकुलमालिका सहित धरणी के दर्शन के लिए आ पहुँची।

श्लोक 71 (skanda.2.6.71)

आगतान्ब्राह्मणान्साथ पूजयित्वा सुभोजनैः। दत्त्वाथ दक्षिणाः पूर्णा वस्त्रालंकारसंयुताः

āgatānbrāhmaṇānsātha pūjayitvā subhojanaiḥ| dattvātha dakṣiṇāḥ pūrṇā vastrālaṁkārasaṁyutāḥ

वहाँ आए हुए ब्राह्मणों का उत्तम भोजन से पूजन करके, वस्त्र और आभूषणों सहित पूर्ण दक्षिणा देकर -

श्लोक 72 (skanda.2.6.72)

आशिषौ वाचयित्वाथ वांछितार्थस्य सिद्धये। विसृज्य व्राह्मणान्सर्वानथापृच्छत्स्वयोषितः

āśiṣau vācayitvātha vāṁchitārthasya siddhaye| visṛjya vrāhmaṇānsarvānathāpṛcchatsvayoṣitaḥ

वांछित कार्य की सिद्धि के लिए उनसे आशीर्वाद दिलवाकर, तत्पश्चात् सभी ब्राह्मणों को विदा करके, उसने अपनी स्त्रियों से पूछा।

श्लोक 73 (skanda.2.6.73)

पूजयित्वा ह्यगस्त्येशमागतास्ता मनस्विनीः

pūjayitvā hyagastyeśamāgatāstā manasvinīḥ

अगस्त्येश्वर की पूजा करके वे बुद्धिमती स्त्रियाँ वहाँ आ चुकी थीं।

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