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वैष्णव खण्ड · अध्याय 5

पद्मावती-दर्शन से श्रीनिवास का मोह

अध्याय 4अध्याय-सूचीअध्याय 6

श्लोक 1 (skanda.2.5.1)

श्रीवराह उवाच। सम्प्राप्य चालयं दिव्यमवतीर्य हयोत्तमात्। विसृज्य सानुगान्सर्वान्देवान्कैरातरूपकान्

śrīvarāha uvāca| samprāpya cālayaṁ divyamavatīrya hayottamāt| visṛjya sānugānsarvāndevānkairātarūpakān

श्रीवराह भगवान ने कहा — उस दिव्य आलय में पहुँचकर, उत्तम अश्व से उतरकर, किरात-रूपधारी अपने सभी अनुचर देवताओं को विदा करके -

श्लोक 2 (skanda.2.5.2)

विश्रमध्वमिति प्रोच्य विवेश मणिमण्डपम्। आरुह्य मणिसोपानं पंचकक्षा अतीत्य च

viśramadhvamiti procya viveśa maṇimaṇḍapam| āruhya maṇisopānaṁ paṁcakakṣā atītya ca

"विश्राम करो" ऐसा कहकर वह मणिमय मण्डप में प्रविष्ट हुआ। मणिमय सीढ़ियाँ चढ़कर और पाँच प्रकोष्ठों को पार करके -

श्लोक 3 (skanda.2.5.3)

मुक्तागृहं समासाद्य तस्मिँल्लोलायिते शुभे। नवरत्नमये मंचे संविवेशावशो हरिः

muktāgṛhaṁ samāsādya tasmi~llolāyite śubhe| navaratnamaye maṁce saṁviveśāvaśo hariḥ

मोतियों से बने भवन में पहुँचकर, उस झूलते हुए शुभ, नवरत्नमय पलंग पर, विवश होकर हरि लेट गए।

श्लोक 4 (skanda.2.5.4)

संस्मरन्पद्मगर्भाभां तामेवायतलोचनाम्। तनुमध्यां पीनकुचां मन्दस्मितसुखांबुजाम्

saṁsmaranpadmagarbhābhāṁ tāmevāyatalocanām| tanumadhyāṁ pīnakucāṁ mandasmitasukhāṁbujām

वे उस कमल-गर्भ के समान कान्तिवाली, विशाल नेत्रोंवाली, पतली कमरवाली, भरे हुए स्तनोंवाली, मंद मुस्कान से सुखदायी कमल-मुखवाली कन्या का बारंबार स्मरण करते रहे।

श्लोक 5 (skanda.2.5.5)

क्षीराब्धितनयामेव मेने पद्मोद्भवां शुभाम्। तस्यां गतमना देवः श्रीनिवासो मुमोह च

kṣīrābdhitanayāmeva mene padmodbhavāṁ śubhām| tasyāṁ gatamanā devaḥ śrīnivāso mumoha ca

वे उसे मानो क्षीरसागर की पुत्री, कमल से उत्पन्न शुभा लक्ष्मी के समान मानने लगे। उसी में मन लगाए हुए देव श्रीनिवास मोहग्रस्त हो गए।

श्लोक 6 (skanda.2.5.6)

ततो मध्याह्नसमये कृत्वान्नं दिव्यमुत्तमम्। सूपदंशं सुगन्धं च देवार्हमतिशोभनम्

tato madhyāhnasamaye kṛtvānnaṁ divyamuttamam| sūpadaṁśaṁ sugandhaṁ ca devārhamatiśobhanam

तत्पश्चात् मध्याह्न के समय दिव्य उत्तम अन्न, सुगंधित व्यंजन तथा देवताओं के योग्य अत्यंत सुंदर भोजन बनाकर -

श्लोक 7 (skanda.2.5.7)

शुद्धान्नं पायसान्नं च गौडं मुद्गान्नमेव च। कृत्वा पञ्चविधापूपान्पूरिकावटकानपि

śuddhānnaṁ pāyasānnaṁ ca gauḍaṁ mudgānnameva ca| kṛtvā pañcavidhāpūpānpūrikāvaṭakānapi

शुद्ध चावल, खीर, गुड़ का व्यंजन, मूँग का अन्न, पाँच प्रकार के पुए, पूरी और बड़े भी बनाकर -

श्लोक 8 (skanda.2.5.8)

देवं द्रष्टुं ययौ शीघ्रं सखी वकुलमालिका। पद्मावतीपद्मपत्रा चित्ररेखासमन्विता

devaṁ draṣṭuṁ yayau śīghraṁ sakhī vakulamālikā| padmāvatīpadmapatrā citrarekhāsamanvitā

पद्मावती की सखी बकुलमालिका, कमल-पत्र के समान सुंदर चित्ररेखा से युक्त होकर, भगवान के दर्शन के लिए शीघ्र वहाँ गई।

श्लोक 9 (skanda.2.5.9)

निवेश्य द्वारि देवस्य ताः सर्वाः प्रमदोत्तमाः। विवेश तत्समीपं सा स्वयं बकुलमालिका

niveśya dvāri devasya tāḥ sarvāḥ pramadottamāḥ| viveśa tatsamīpaṁ sā svayaṁ bakulamālikā

उन सभी उत्तम स्त्रियों को भगवान के द्वार पर ठहराकर बकुलमालिका स्वयं उनके समीप गई।

श्लोक 10 (skanda.2.5.10)

गत्वा समीपं देवस्य ववन्दे भक्तिभावतः। दृष्ट्वाथ देवं विवशं पर्यंके रत्नभूषिते

gatvā samīpaṁ devasya vavande bhaktibhāvataḥ| dṛṣṭvātha devaṁ vivaśaṁ paryaṁke ratnabhūṣite

भगवान के समीप जाकर उसने भक्तिपूर्वक वंदना की। तत्पश्चात् उसने रत्नजड़ित पलंग पर विवश पड़े हुए भगवान को देखा।

श्लोक 11 (skanda.2.5.11)

पादसंवाहनं कृत्वा निमीलितविलोचनम्। तं ध्यायन्तं च किमपि व्याजहार शुचिस्मिता

pādasaṁvāhanaṁ kṛtvā nimīlitavilocanam| taṁ dhyāyantaṁ ca kimapi vyājahāra śucismitā

उनके चरण दबाते हुए, आँखें बंद किए, कुछ ध्यान करते हुए उन्हें देखकर, उस निर्मल मुस्कानवाली ने कहा।

श्लोक 12 (skanda.2.5.12)

उत्तिष्ठ देवदेवेश किं शेषे पुरुषोत्तम। परमान्नं कृतं देव भोक्तुमागच्छ माधव

uttiṣṭha devadeveśa kiṁ śeṣe puruṣottama| paramānnaṁ kṛtaṁ deva bhoktumāgaccha mādhava

"उठिए, हे देवाधिदेव! हे पुरुषोत्तम! आप क्यों लेटे हैं? हे देव! उत्तम भोजन तैयार है, हे माधव! भोजन करने आइए।"

श्लोक 13 (skanda.2.5.13)

किं वा त्वमार्तवच्छेषे सर्वलोकार्तिनाशन। मृगयामटता देव कि दृष्टं भवता वने

kiṁ vā tvamārtavaccheṣe sarvalokārtināśana| mṛgayāmaṭatā deva ki dṛṣṭaṁ bhavatā vane

"हे सर्वलोक की पीड़ा नष्ट करने वाले! आप दुःखी की भाँति क्यों लेटे हैं? हे देव! शिकार करते हुए वन में आपने क्या देखा?"

श्लोक 14 (skanda.2.5.14)

अवस्था ते विशालाक्ष कामुकस्येव दृश्यते। का दृष्टा देवकन्या वा मानुषी वाऽहिकन्यका

avasthā te viśālākṣa kāmukasyeva dṛśyate| kā dṛṣṭā devakanyā vā mānuṣī vā'hikanyakā

"हे विशाल नेत्रोंवाले! आपकी दशा तो किसी काम-पीड़ित व्यक्ति के समान दिखाई देती है। कौन देखी, कोई देवकन्या, या मानवकन्या, अथवा नागकन्या?"

श्लोक 15 (skanda.2.5.15)

ब्रूहि मे त्वमचिन्त्यात्मन्कन्यां तां चित्तहारिणीम्

brūhi me tvamacintyātmankanyāṁ tāṁ cittahāriṇīm

"हे अचिन्त्य स्वरूपवाले! मुझे बताइए उस चित्त हरने वाली कन्या के विषय में।"

श्लोक 16 (skanda.2.5.16)

श्रीवराह उवाच। तस्यास्तद्वचनं श्रुत्वा निःश्वासमकरोद्विभुः। निःश्वसंतं पुनः प्राह प्रीता बकुलमालिका

śrīvarāha uvāca| tasyāstadvacanaṁ śrutvā niḥśvāsamakarodvibhuḥ| niḥśvasaṁtaṁ punaḥ prāha prītā bakulamālikā

श्रीवराह भगवान ने कहा — उसके इन वचनों को सुनकर प्रभु ने एक लंबी साँस ली। इस प्रकार साँस लेते हुए उनसे प्रसन्नचित्त बकुलमालिका ने पुनः कहा।

श्लोक 17 (skanda.2.5.17)

एवं मनोहरा का सा तवापि पुरुषोत्तम। तामवोचद्धृषीकेशो वक्ष्यामि शृणु तत्त्वतः

evaṁ manoharā kā sā tavāpi puruṣottama| tāmavocaddhṛṣīkeśo vakṣyāmi śṛṇu tattvataḥ

"हे पुरुषोत्तम! ऐसी मनोहर वह कौन है, जिसने आपको भी मोहित कर लिया?" उससे हृषीकेश ने कहा — "मैं सत्य बताता हूँ, सुनो।"

श्लोक 18 (skanda.2.5.18)

श्रीभगवानुवाच। पुरा त्रेतायुगे पुण्ये रावणं हतवानहम्। तदा वेदवती कन्या साहाय्यमकरोच्छ्रियः

śrībhagavānuvāca| purā tretāyuge puṇye rāvaṇaṁ hatavānaham| tadā vedavatī kanyā sāhāyyamakarocchriyaḥ

श्रीभगवान ने कहा — पूर्वकाल में पवित्र त्रेतायुग में मैंने रावण का वध किया था। उस समय वेदवती नामक कन्या ने लक्ष्मी की सहायता की थी।

श्लोक 19 (skanda.2.5.19)

सीतारूपाभवल्लक्ष्मीर्जनकस्य महीतलात्। गते मयि तु मारीचं हन्तुं पञ्चवटीवने

sītārūpābhavallakṣmīrjanakasya mahītalāt| gate mayi tu mārīcaṁ hantuṁ pañcavaṭīvane

लक्ष्मी जनक की भूमि से सीता के रूप में प्रकट हुई थीं। पंचवटी वन में जब मैं मारीच को मारने गया -

श्लोक 20 (skanda.2.5.20)

ममानुजोऽपि मामेव सीतया चोदितोन्वयात्। तदन्तरे राक्षसेन्द्रो हर्तुं सीतामुपाययौ

mamānujo'pi māmeva sītayā coditonvayāt| tadantare rākṣasendro hartuṁ sītāmupāyayau

मेरा छोटा भाई भी सीता द्वारा प्रेरित होकर मेरे ही पीछे चला आया; इसी बीच राक्षसराज सीता का हरण करने आया।

श्लोक 21 (skanda.2.5.21)

अग्निहोत्रगतो वह्निस्तं ज्ञात्वा रावणोद्यमम्। आदाय सीतां पाताले स्वाहायां सन्निवेश्य च

agnihotragato vahnistaṁ jñātvā rāvaṇodyamam| ādāya sītāṁ pātāle svāhāyāṁ sanniveśya ca

अग्निहोत्र में स्थित अग्नि ने रावण के इस प्रयत्न को जानकर, सीता को ले जाकर पाताल में स्वाहा के पास रखकर -

श्लोक 22 (skanda.2.5.22)

तेनैव रक्षसा स्पृष्टां पुरा वेदवतीं शुभाम्। अग्नौ विसृष्टदेहां तां संहर्तुं रावणं पुनः

tenaiva rakṣasā spṛṣṭāṁ purā vedavatīṁ śubhām| agnau visṛṣṭadehāṁ tāṁ saṁhartuṁ rāvaṇaṁ punaḥ

और उसी राक्षस के द्वारा पूर्वकाल में स्पर्श किए जाने पर जिसने अपनी देह अग्नि में त्याग दी थी, उस शुभा वेदवती को, रावण को पुनः नष्ट करने के उद्देश्य से -

श्लोक 23 (skanda.2.5.23)

सीताया रूपसदृशीं कृत्वा चैवोत्ससर्ज ह। सा रावणहृता भूत्वा लंकायां च निवेशिता

sītāyā rūpasadṛśīṁ kṛtvā caivotsasarja ha| sā rāvaṇahṛtā bhūtvā laṁkāyāṁ ca niveśitā

उसे सीता के समान रूप बनाकर वहाँ छोड़ दिया। वह रावण द्वारा हरण की जाकर लंका में रखी गई।

श्लोक 24 (skanda.2.5.24)

हते तु रावणे पश्चात्पुनरग्निं विवेश सा। अग्निस्तु रक्षितां लक्ष्मीं स्वाहायां मम जानकीम्

hate tu rāvaṇe paścātpunaragniṁ viveśa sā| agnistu rakṣitāṁ lakṣmīṁ svāhāyāṁ mama jānakīm

रावण के मारे जाने के पश्चात् वह पुनः अग्नि में प्रविष्ट हो गई। अग्नि ने स्वाहा के पास सुरक्षित रखी हुई मेरी जानकी लक्ष्मी को -

श्लोक 25 (skanda.2.5.25)

दत्त्वा हस्ते च मामाह सीतया सहितां सखीम। इयं वेदवती देव सीतायाः प्रियकारिणी

dattvā haste ca māmāha sītayā sahitāṁ sakhīma| iyaṁ vedavatī deva sītāyāḥ priyakāriṇī

और उसे मेरे हाथों में सौंपकर, सीता की सखी सहित मुझसे कहा — "हे देव! यह वेदवती सीता की प्रिय सहचरी है।"

श्लोक 26 (skanda.2.5.26)

सीतार्थं राक्षसपुरे तेन बन्दीकृता स्थिता। तस्मादेनां वरेणैव प्रीणय त्वं श्रिया सह

sītārthaṁ rākṣasapure tena bandīkṛtā sthitā| tasmādenāṁ vareṇaiva prīṇaya tvaṁ śriyā saha

"सीता के लिए उस राक्षस द्वारा वह राक्षसनगरी में बंदी बनाकर रखी गई थी। अतः तुम इसे वर देकर, श्री के साथ प्रसन्न करो।"

श्लोक 27 (skanda.2.5.27)

इति वह्निवचः श्रुत्वा सीता मामवदच्छुभा। मम प्रीतिकरी नित्यमियं वेदवती विभो

iti vahnivacaḥ śrutvā sītā māmavadacchubhā| mama prītikarī nityamiyaṁ vedavatī vibho

अग्नि के इन वचनों को सुनकर शुभा सीता ने मुझसे कहा — "हे विभो! यह वेदवती सदा मुझे प्रिय है।"

श्लोक 28 (skanda.2.5.28)

तस्मात्परं भागवतीं देवैनां वरय प्रभो

tasmātparaṁ bhāgavatīṁ devaināṁ varaya prabho

"अतः हे प्रभो! इसे परम भागवती देवी के रूप में वरण कीजिए।"

श्लोक 29 (skanda.2.5.29)

श्रीभगवानुवाच। तथा देवि करिष्यामि ह्यष्टाविंशे कलौ युगे। तावदेषा ब्रह्मलोके वसत्वमरपूजिता

śrībhagavānuvāca| tathā devi kariṣyāmi hyaṣṭāviṁśe kalau yuge| tāvadeṣā brahmaloke vasatvamarapūjitā

श्रीभगवान ने कहा — "हे देवि! ऐसा ही होगा, अट्ठाईसवें कलियुग में; तब तक यह देवताओं द्वारा पूजित होकर ब्रह्मलोक में निवास करे।"

श्लोक 30 (skanda.2.5.30)

पश्चात्तु भूमितनया भविष्यति वियत्सुता। इति दत्तवरा पूर्वं मया लक्ष्म्या च सुन्दरी

paścāttu bhūmitanayā bhaviṣyati viyatsutā| iti dattavarā pūrvaṁ mayā lakṣmyā ca sundarī

"तत्पश्चात् वह पृथ्वी की पुत्री, वियत् की पुत्री होगी" — इस प्रकार मेरे और लक्ष्मी के द्वारा पूर्वकाल में उस सुंदरी को वर दिया गया था।

श्लोक 31 (skanda.2.5.31)

अद्य नारायणपुरे सम्भूता धरणीतलात्। पद्मासमा पद्मनेत्री पद्मादत्तवरा सती

adya nārāyaṇapure sambhūtā dharaṇītalāt| padmāsamā padmanetrī padmādattavarā satī

आज वही, धरणीतल से नारायणपुर में उत्पन्न, पद्मा के समान, कमल-नेत्रोंवाली, पद्मा द्वारा वरदान प्राप्त सती -

श्लोक 32 (skanda.2.5.32)

सखीभिरनुरूपाभिर्वने पुष्पाणि चिन्वती। मृगयामटता तत्र मया दृष्टा मनोरमा

sakhībhiranurūpābhirvane puṣpāṇi cinvatī| mṛgayāmaṭatā tatra mayā dṛṣṭā manoramā

अपनी योग्य सखियों के साथ वन में फूल चुनती हुई, वहाँ शिकार करते हुए मेरे द्वारा वह मनोहर कन्या देखी गई।

श्लोक 33 (skanda.2.5.33)

तस्या रूपं मया वक्तुं न शक्यं शतहायनैः। लक्ष्म्येव च तया मेऽद्य संगमो भविता यदि

tasyā rūpaṁ mayā vaktuṁ na śakyaṁ śatahāyanaiḥ| lakṣmyeva ca tayā me'dya saṁgamo bhavitā yadi

उसके रूप का वर्णन मैं सौ वर्षों में भी नहीं कर सकता। यदि आज लक्ष्मी के समान उससे मेरा संगम हो जाए -

श्लोक 34 (skanda.2.5.34)

प्राणाः स्थिरा भविष्यन्ति सत्यमित्यवधारय

prāṇāḥ sthirā bhaviṣyanti satyamityavadhāraya

तो मेरे प्राण स्थिर रह सकेंगे — यह सत्य जान लो।

श्लोक 35 (skanda.2.5.35)

त्वं तत्र गत्वा तां कन्यां दृष्ट्वा बकुलमालिके। जानीहि रूपलावण्यादियं योग्येति चास्य वै। अनवद्या विशालाक्षी पद्मेन्दीवरलोचना

tvaṁ tatra gatvā tāṁ kanyāṁ dṛṣṭvā bakulamālike| jānīhi rūpalāvaṇyādiyaṁ yogyeti cāsya vai| anavadyā viśālākṣī padmendīvaralocanā

हे बकुलमालिके! तुम वहाँ जाकर उस कन्या को देखकर यह जान लो कि क्या यह अपने रूप-लावण्य से इसके योग्य है — निर्दोष, विशाल नेत्रोंवाली, कमल और नीलकमल के समान नेत्रोंवाली।

श्लोक 36 (skanda.2.5.36)

इत्युक्त्वा मोहमापन्नं तं प्राह बकुला पुनः। इतो गच्छामि देवेश मनोज्ञा तव यत्र सा

ityuktvā mohamāpannaṁ taṁ prāha bakulā punaḥ| ito gacchāmi deveśa manojñā tava yatra sā

यह कहने के बाद, मोहग्रस्त उन्हें बकुला ने पुनः कहा — "हे देवेश! मैं अभी वहाँ जाती हूँ जहाँ आपकी वह मनोज्ञा है।"

श्लोक 37 (skanda.2.5.37)

मार्गं वद रमाधीश गमिष्ये येन तां प्रति। एवमुक्तो रमाधीशस्तां प्राह वकुलस्रजम्

mārgaṁ vada ramādhīśa gamiṣye yena tāṁ prati| evamukto ramādhīśastāṁ prāha vakulasrajam

"हे रमाधीश! मार्ग बताइए, जिससे मैं उसके पास जा सकूँ।" इस प्रकार कहे जाने पर रमाधीश ने उस बकुलस्रजा से कहा।

श्लोक 38 (skanda.2.5.38)

इतो गच्छ महाभागे श्रीनृसिंहगुहा यतः। तन्मार्गेणावतीर्यास्माद्भूधरेन्द्रान्मनोरमात्

ito gaccha mahābhāge śrīnṛsiṁhaguhā yataḥ| tanmārgeṇāvatīryāsmādbhūdharendrānmanoramāt

"हे महाभागे! यहाँ से जाओ, जहाँ श्रीनृसिंह की गुफा है। उसी मार्ग से इस मनोहर पर्वतराज से उतरकर -"

श्लोक 39 (skanda.2.5.39)

अगस्त्याश्रममासाद्य दृष्ट्वा लिंगं तदर्चितम्। अगस्त्येश इति ख्यातं सुवर्णमुखरीतटे

agastyāśramamāsādya dṛṣṭvā liṁgaṁ tadarcitam| agastyeśa iti khyātaṁ suvarṇamukharītaṭe

"अगस्त्य के आश्रम पहुँचकर, सुवर्णमुखरी नदी के तट पर स्थित, अगस्त्येश के नाम से प्रसिद्ध, अर्चित लिंग के दर्शन करके -"

श्लोक 40 (skanda.2.5.40)

तीरेणैव ततो गच्छ शुकब्रह्मऋषेर्वनम्। पश्यन्ती स्वर्णमुखरीं तत्र कल्लोलमालिनीम्

tīreṇaiva tato gaccha śukabrahmaṛṣervanam| paśyantī svarṇamukharīṁ tatra kallolamālinīm

"उसी तट के सहारे फिर ब्रह्मर्षि शुक के वन में जाओ, वहाँ लहरों की माला से युक्त सुवर्णमुखरी को देखते हुए -"

श्लोक 41 (skanda.2.5.41)

तत्र पद्मसरोनाम पावनं पद्मसंयुतम्। तत्र स्नात्वाऽथ तत्तीरे तपन्तं मुनिसत्तमम्

tatra padmasaronāma pāvanaṁ padmasaṁyutam| tatra snātvā'tha tattīre tapantaṁ munisattamam

"वहाँ पद्मसर नामक कमलों से युक्त पवित्र सरोवर है; वहाँ स्नान करके, उसके तट पर तपस्या करते हुए मुनिश्रेष्ठ को -"

श्लोक 42 (skanda.2.5.42)

छायाशुकं नमस्कृत्य कृष्णं च बलसंयुतम्। आराध्यमानं मुनिना शुकेन सततं शुभे

chāyāśukaṁ namaskṛtya kṛṣṇaṁ ca balasaṁyutam| ārādhyamānaṁ muninā śukena satataṁ śubhe

"छायाशुक को नमस्कार करके, तथा बलराम सहित कृष्ण को, जिनकी शुक मुनि सदा आराधना करते हैं, हे शुभे! देखकर -"

श्लोक 43 (skanda.2.5.43)

इन्द्रनीलमणिश्यामं पीतनिर्मलवाससम्। तीर्थयात्रां गमिष्यन्तं बलभद्रं सिताकृतिम्

indranīlamaṇiśyāmaṁ pītanirmalavāsasam| tīrthayātrāṁ gamiṣyantaṁ balabhadraṁ sitākṛtim

"नीलमणि के समान श्याम, पीत निर्मल वस्त्र धारण किए, तीर्थयात्रा को जाते हुए, तथा श्वेत वर्णवाले बलभद्र को -"

श्लोक 44 (skanda.2.5.44)

उपासयन्तं मंत्राणि मुक्तान्वितकरद्वयम्। उद्यन्तं पादुकायुक्तं बलभद्रं प्रणम्य च

upāsayantaṁ maṁtrāṇi muktānvitakaradvayam| udyantaṁ pādukāyuktaṁ balabhadraṁ praṇamya ca

"मंत्रों की उपासना करते हुए, दोनों हाथों में मुक्ता-माला लिए, चरण-पादुका पहने, प्रस्थान करते हुए बलभद्र को प्रणाम करके -"

श्लोक 45 (skanda.2.5.45)

आदाय स्वर्णकमलं सरसोऽस्माद्वरानने। तीर्त्वा सुवर्णमुखरीं वनान्युपवनानि च

ādāya svarṇakamalaṁ saraso'smādvarānane| tīrtvā suvarṇamukharīṁ vanānyupavanāni ca

"हे वरानने! इस सरोवर से एक स्वर्णकमल लेकर, सुवर्णमुखरी नदी को पार करके, वनों और उपवनों को पार करती हुई -"

श्लोक 46 (skanda.2.5.46)

अरणीतीरमासाद्य विश्रम्य च वनान्तरे। नारायणपुरीं दृष्ट्वा विस्मयं च गमिष्यसि

araṇītīramāsādya viśramya ca vanāntare| nārāyaṇapurīṁ dṛṣṭvā vismayaṁ ca gamiṣyasi

"अरणी नदी के तट पर पहुँचकर, वन के भीतर विश्राम करके, नारायणपुरी को देखकर तुम आश्चर्यचकित हो जाओगी।"

श्लोक 47 (skanda.2.5.47)

तस्याश्चोपवने वृक्षान्पुष्पाढ्यान्फलसंयुतान्। पनसाम्रशिरीषांश्च कुन्दतिन्दुकपाटलान्

tasyāścopavane vṛkṣānpuṣpāḍhyānphalasaṁyutān| panasāmraśirīṣāṁśca kundatindukapāṭalān

"उसके उपवन में फूलों और फलों से भरे वृक्षों को देखोगी — कटहल, आम्र, शिरीष, कुन्द, तिन्दुक, पाटल -"

श्लोक 48 (skanda.2.5.48)

पुन्नागनागवरणरसालांकोलचंपकान्। बकुलामलकान्सालांस्तालहिंतालपद्मकान्

punnāganāgavaraṇarasālāṁkolacaṁpakān| bakulāmalakānsālāṁstālahiṁtālapadmakān

"पुन्नाग, नाग, वरण, आम्र, अंकोल, चम्पक, बकुल, आमला, साल, ताल, हिंताल, पद्मक -"

श्लोक 49 (skanda.2.5.49)

जम्बूनिम्बकदम्बैलापिप्पलीमधुकार्जुनान्। प्रियंगुहिंगुखर्जूरमायूराशोकलोध्रकान्

jambūnimbakadambailāpippalīmadhukārjunān| priyaṁguhiṁgukharjūramāyūrāśokalodhrakān

"जामुन, नीम, कदम्ब, इलायची, पीपल, महुआ, अर्जुन, प्रियंगु, हिंगु, खजूर, मयूर-वृक्ष, अशोक, लोध्र -"

श्लोक 50 (skanda.2.5.50)

अश्वत्थोदुम्बरप्लक्षबदरीभूर्जकीचकान्। चिञ्चाकिंशुकमन्दारशाल्मलीबीजपूरकान्

aśvatthodumbaraplakṣabadarībhūrjakīcakān| ciñcākiṁśukamandāraśālmalībījapūrakān

"पीपल, गूलर, पाकड़, बेर, भोजपत्र, बाँस, इमली, पलाश, मन्दार, शाल्मली, बिजौरा -"

श्लोक 51 (skanda.2.5.51)

पूगनारंगलिकुचनारिकेलवनाकुलान्। मल्लिकामालतीकुन्द यूथिकाकेतकीयुतान्

pūganāraṁgalikucanārikelavanākulān| mallikāmālatīkunda yūthikāketakīyutān

"सुपारी, संतरा, लिकुच, नारियल के वनों से घिरे, मल्लिका, मालती, कुन्द, यूथिका, केतकी से युक्त -"

श्लोक 52 (skanda.2.5.52)

करवीराब्जसंपन्नान्राजरंभाविराजितान्। मयूरकीरगरुडशुकसारससंकुलान्

karavīrābjasaṁpannānrājaraṁbhāvirājitān| mayūrakīragaruḍaśukasārasasaṁkulān

"करवीर और कमलों से युक्त, राज-केले से सुशोभित, मयूर, तोता, गरुड़, शुक और सारस पक्षियों से भरे -"

श्लोक 53 (skanda.2.5.53)

भृंगझंकारनिबिडानारामान्सुमनोहरान्। पश्यन्तीं परमं हर्षमवाप्य च नदीतटे

bhṛṁgajhaṁkāranibiḍānārāmānsumanoharān| paśyantīṁ paramaṁ harṣamavāpya ca nadītaṭe

"भ्रमरों की गुंजार से सघन, अत्यंत मनोहर उद्यानों को देखती हुई, तुम नदी के तट पर परम हर्ष प्राप्त करोगी।"

श्लोक 54 (skanda.2.5.54)

गत्वा पूर्वोत्तरे मार्गे पुरीमिन्द्रपुरीसमाम्। गङ्गयेवावृतां नित्यं सरितारणिनामया

gatvā pūrvottare mārge purīmindrapurīsamām| gaṅgayevāvṛtāṁ nityaṁ saritāraṇināmayā

"पूर्वोत्तर मार्ग से जाकर, इन्द्रपुरी के समान उस नगरी को देखोगी, जो गंगा के समान नित्य अरणि नाम की नदी से घिरी हुई है।"

श्लोक 55 (skanda.2.5.55)

आकाशराजनगरीं गत्वा तत्रोचितं कुरु

ākāśarājanagarīṁ gatvā tatrocitaṁ kuru

"आकाशराज की उस नगरी में पहुँचकर, वहाँ जो उचित हो, वही करना।"

श्लोक 56 (skanda.2.5.56)

श्रीवराह उवाच। इत्यादिश्य सुराधीशः सखीं तां बकुलाभिधाम्। विसृज्य शयने शुभ्रे स शिश्ये श्रीसमन्वितः

śrīvarāha uvāca| ityādiśya surādhīśaḥ sakhīṁ tāṁ bakulābhidhām| visṛjya śayane śubhre sa śiśye śrīsamanvitaḥ

श्रीवराह भगवान ने कहा — इस प्रकार बकुला नामक सखी को आदेश देकर, देवाधीश उसे विदा करके, श्री के साथ शुभ्र शय्या पर लेट गए।

श्लोक 57 (skanda.2.5.57)

प्रणम्य देवदेवेशं सखी बकुलमालिका। गुञ्जामणिसमाकारं रक्ताश्वमधिरुह्य सा

praṇamya devadeveśaṁ sakhī bakulamālikā| guñjāmaṇisamākāraṁ raktāśvamadhiruhya sā

देवाधिदेव को प्रणाम करके, सखी बकुलमालिका, गुंजा-मणि के समान लाल रंग के घोड़े पर सवार होकर -

श्लोक 58 (skanda.2.5.58)

यथोक्तमार्गेण ययौ पश्यन्ती विविधान्मृगान्। मत्तेभान्पर्वताकाराञ्छ्वेतदन्तविभूषितान्

yathoktamārgeṇa yayau paśyantī vividhānmṛgān| mattebhānparvatākārāñchvetadantavibhūṣitān

बताए गए मार्ग से चल पड़ी, विविध वन्य पशुओं को देखती हुई — पर्वत के समान विशालकाय, श्वेत दाँतोंवाले मतवाले हाथी -

श्लोक 59 (skanda.2.5.59)

करिणीयूथसहिताञ्जलदादानतत्परान्। सिंहाञ्छ्वे(?)तघनप्रख्यान्सिंहीयूथैरनुद्रुतान्

kariṇīyūthasahitāñjaladādānatatparān| siṁhāñchve(?)taghanaprakhyānsiṁhīyūthairanudrutān

हथिनियों के झुंड सहित, बादलों से जल लेने में तत्पर; श्वेत मेघ के समान सिंह, सिंहनियों के झुंड से घिरे हुए -

श्लोक 60 (skanda.2.5.60)

शार्दूलर्क्षांश्च खड्गांश्च शरभान्गवयान्मृगान्। कृष्णसारांश्च गोमायूञ्छशांश्च प्रियकानपि

śārdūlarkṣāṁśca khaḍgāṁśca śarabhāngavayānmṛgān| kṛṣṇasārāṁśca gomāyūñchaśāṁśca priyakānapi

बाघ, भालू, गैंडे, शरभ, गवय, मृग, कृष्णसार मृग, सियार, खरगोश तथा प्रियक मृग भी -

श्लोक 61 (skanda.2.5.61)

सारसांश्च मयूरांश्च मार्जारान्वनगोचरान्। वृकाञ्छुकान्सूकरांश्च सुवाचः पक्षिणस्तथा

sārasāṁśca mayūrāṁśca mārjārānvanagocarān| vṛkāñchukānsūkarāṁśca suvācaḥ pakṣiṇastathā

सारस, मयूर, वन-बिलाव, भेड़िए, तोते, सूअर, तथा मधुर बोलनेवाले पक्षी -

श्लोक 62 (skanda.2.5.62)

पश्यन्ती विविधाकारांस्तुष्यन्ती च मुहुर्मुहुः। आससादारणीतीरं पश्चिमं पादपाकुलम्

paśyantī vividhākārāṁstuṣyantī ca muhurmuhuḥ| āsasādāraṇītīraṁ paścimaṁ pādapākulam

इन विविध रूपोंवाले प्राणियों को देखती और बार-बार प्रसन्न होती हुई, वह वृक्षों से घिरे अरणी नदी के पश्चिमी तट पर पहुँची।

श्लोक 63 (skanda.2.5.63)

अवतीर्यारुणादश्वादगस्त्येशसमीपतः। दृष्ट्वागस्त्येश्वरं लिङ्गमगस्त्येन सुपूजितम्

avatīryāruṇādaśvādagastyeśasamīpataḥ| dṛṣṭvāgastyeśvaraṁ liṅgamagastyena supūjitam

वहाँ उस लाल घोड़े से उतरकर, अगस्त्येश्वर के समीप, अगस्त्य द्वारा सुपूजित लिंग के दर्शन करके -

श्लोक 64 (skanda.2.5.64)

तत्र स्नात्वा च पीत्वा च विशश्राम नदीतटे

tatra snātvā ca pītvā ca viśaśrāma nadītaṭe

वहाँ स्नान करके और जलपान करके नदी के तट पर विश्राम किया।

श्लोक 65 (skanda.2.5.65)

तत्रागता राजगृहाद्योषितो देवसंनिधौ। सखीः पद्मालयायास्ता दृष्ट्वा बकुलमालिका

tatrāgatā rājagṛhādyoṣito devasaṁnidhau| sakhīḥ padmālayāyāstā dṛṣṭvā bakulamālikā

वहाँ राजमहल से आई हुई, देव-समीप में उपस्थित, पद्मालया की सखी स्त्रियों को देखकर बकुलमालिका ने -

श्लोक 66 (skanda.2.5.66)

गत्वा समीपे तासां सा किंवदन्तीं स्म पृच्छति

gatvā samīpe tāsāṁ sā kiṁvadantīṁ sma pṛcchati

उनके पास जाकर उनसे कुशल-समाचार पूछा।

श्लोक 67 (skanda.2.5.67)

बकुलमालिकोवाच। का यूयं योषितो ब्रूत विचित्राभरणस्रजः। कुतः समागता ह्यत्र किं कार्यं वोऽमलाननाः

bakulamālikovāca| kā yūyaṁ yoṣito brūta vicitrābharaṇasrajaḥ| kutaḥ samāgatā hyatra kiṁ kāryaṁ vo'malānanāḥ

बकुलमालिका ने कहा — "हे विचित्र आभूषण और मालाओं से युक्त स्त्रियो! बताओ, तुम कौन हो? यहाँ कहाँ से आई हो, हे निर्मल मुखवालियो! तुम्हारा क्या कार्य है?"

श्लोक 68 (skanda.2.5.68)

तास्तु तस्या वचः श्रुत्वा स्मितपूर्वमथाब्रुवन्। शृणुष्वावहिता देवि वयं वक्ष्यामहेऽधुना

tāstu tasyā vacaḥ śrutvā smitapūrvamathābruvan| śṛṇuṣvāvahitā devi vayaṁ vakṣyāmahe'dhunā

उसके ये वचन सुनकर उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा — "हे देवि! ध्यानपूर्वक सुनो, अब हम बताती हैं।"

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