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वैष्णव खण्ड · अध्याय 11

काश्यप-दोष-निवृत्ति: स्वामिपुष्करिणी महिमा

अध्याय 10अध्याय-सूचीअध्याय 12

श्लोक 1 (skanda.2.11.1)

श्रीसूत उवाच । अथ काश्यपस्य स्वामिपुष्करिणीस्नानेन महापातकनाशः । अथातः संप्रवक्ष्यामि स्वामिपुष्करिणीं शुभाम् । लक्षीकृत्य कथामेकां पवित्रां द्विजसत्तमाः ।

śrīsūta uvāca atha kāśyapasya svāmipuṣkariṇīsnānena mahāpātakanāśaḥ athātaḥ saṁpravakṣyāmi svāmipuṣkariṇīṁ śubhām lakṣīkṛtya kathāmekāṁ pavitrāṁ dvijasattamāḥ

श्री सूत ने कहा — अब मैं शुभ स्वामिपुष्करिणी के विषय में, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, एक पवित्र कथा को लक्षित करते हुए, आगे कहूँगा।

श्लोक 2 (skanda.2.11.2)

काश्यपाख्यो द्विजः पूर्वमस्मिंस्तीर्थवरे शुभे । स्नात्वातिमहतः पापाद्विमुक्तो नरकप्रदात् ।

kāśyapākhyo dvijaḥ pūrvamasmiṁstīrthavare śubhe snātvātimahataḥ pāpādvimukto narakapradāt

पूर्वकाल में काश्यप नामक एक ब्राह्मण ने इस श्रेष्ठ, शुभ तीर्थ में स्नान करके, नरक ले जाने वाले अत्यंत महान पाप से मुक्ति पाई थी।

श्लोक 3 (skanda.2.11.3)

ऋषय ऊचुः । मुने काश्यपनामासावकरोत्किं हि पातकम् । स्नात्वा तीर्थवरे ह्यत्र यस्मान्मुक्तोऽभवत्क्षणात् ।

ṛṣaya ūcuḥ mune kāśyapanāmāsāvakarotkiṁ hi pātakam snātvā tīrthavare hyatra yasmānmukto'bhavatkṣaṇāt

ऋषियों ने कहा — हे मुने! उस काश्यप नामक ब्राह्मण ने ऐसा कौन सा पाप किया था, जिससे इस श्रेष्ठ तीर्थ में स्नान करके ही वह क्षण भर में मुक्त हो गया?

श्लोक 4 (skanda.2.11.4)

एतन्नः श्रद्दधानानां ब्रूहि सूत कृपाबलात् । त्वद्वचोऽमृततृप्तानां न पिपासापि विद्यते ।

etannaḥ śraddadhānānāṁ brūhi sūta kṛpābalāt tvadvaco'mṛtatṛptānāṁ na pipāsāpi vidyate

हे सूत! आपकी कृपा से हम श्रद्धावानों को यह बताइए। आपके वचन-अमृत से तृप्त हुए हमें कभी तृप्ति नहीं होती।

श्लोक 5 (skanda.2.11.5)

श्रीसूत उवाच । श्रीस्वामिपुष्करिण्याश्च माहात्म्यप्रतिपादकम् । इतिहासं प्रवक्ष्यामि पठतां पापनाशनम् ।

śrīsūta uvāca śrīsvāmipuṣkariṇyāśca māhātmyapratipādakam itihāsaṁ pravakṣyāmi paṭhatāṁ pāpanāśanam

श्री सूत ने कहा — अब मैं श्री स्वामिपुष्करिणी की महिमा प्रतिपादित करने वाला यह इतिहास कहूँगा, जो इसे पढ़ने वालों के पापों का नाश करता है।

श्लोक 6 (skanda.2.11.6)

अभिमन्युसुतो राजा परीक्षिन्नाम नामतः । अध्यास्त हास्तिनपुरं पालयन्धर्मतो महीम् ।

abhimanyusuto rājā parīkṣinnāma nāmataḥ adhyāsta hāstinapuraṁ pālayandharmato mahīm

अभिमन्यु का पुत्र, परीक्षित नाम का राजा, हस्तिनापुर में रहकर धर्मपूर्वक पृथ्वी का पालन करता था।

श्लोक 7 (skanda.2.11.7)

स राजा जातु विपिने चचार मृगयारतः । षष्टिवर्षवया भूपः क्षुत्तृष्णापरिपीडितः ।

sa rājā jātu vipine cacāra mṛgayārataḥ ṣaṣṭivarṣavayā bhūpaḥ kṣuttṛṣṇāparipīḍitaḥ

एक बार वह राजा शिकार में रत होकर वन में विचरण कर रहा था; साठ वर्ष की आयु वाला वह राजा भूख-प्यास से अत्यंत पीड़ित हो गया।

श्लोक 8 (skanda.2.11.8)

नष्टमेकं स विपिने मार्गयन्मृगमादरात् । ध्यानारूढं मुनिं दृष्ट्वा प्राह भूपालकोत्तमः ।

naṣṭamekaṁ sa vipine mārgayanmṛgamādarāt dhyānārūḍhaṁ muniṁ dṛṣṭvā prāha bhūpālakottamaḥ

वन में एक भागे हुए मृग को आदरपूर्वक खोजते हुए, उसने ध्यानमग्न एक मुनि को देखा और उस श्रेष्ठ राजा ने उनसे कहा —

श्लोक 9 (skanda.2.11.9)

मया बाणेन विपिने मृगो विद्धोऽधुना मुने । दृष्टः स किं त्वया विद्वन्विद्रुतो भयकातरः ।

mayā bāṇena vipine mṛgo viddho'dhunā mune dṛṣṭaḥ sa kiṁ tvayā vidvanvidruto bhayakātaraḥ

'हे मुने! मैंने वन में एक मृग को बाण से बींध दिया था; क्या आपने, हे विद्वन्, उस भय से व्याकुल भागते हुए मृग को देखा है?'

श्लोक 10 (skanda.2.11.10)

समाधिनिष्ठो मौनित्वान्न किंचिदपि सोऽब्रवीत् । ततो धनुरटन्या स स्कन्धे तस्य महामुनेः ।

samādhiniṣṭho maunitvānna kiṁcidapi so'bravīt tato dhanuraṭanyā sa skandhe tasya mahāmuneḥ

समाधि में स्थित वह मुनि मौन होने के कारण कुछ भी नहीं बोला। तब वह राजा अपने धनुष की नोक से उस महामुनि के कंधे पर,

श्लोक 11 (skanda.2.11.11)

निधाय मृतसर्पं तु कुपितः स्वपुरं ययौ । मुनेस्तस्य सुतः कश्चिच्छृंगीनाम बभूव वै ।

nidhāya mṛtasarpaṁ tu kupitaḥ svapuraṁ yayau munestasya sutaḥ kaścicchṛṁgīnāma babhūva vai

एक मरा हुआ सर्प रखकर, क्रुद्ध होकर अपनी नगरी को चला गया। उस मुनि का एक पुत्र था जिसका नाम शृंगी था,

श्लोक 12 (skanda.2.11.12)

सखा तस्य कृशाख्योऽभूच्छृंगिणो द्विजसत्तमः । सखायं शृंगिणं प्राह कृशाख्यः स सखा ततः ।

sakhā tasya kṛśākhyo'bhūcchṛṁgiṇo dvijasattamaḥ sakhāyaṁ śṛṁgiṇaṁ prāha kṛśākhyaḥ sa sakhā tataḥ

और शृंगी का एक मित्र था, कृश नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण। उस मित्र कृश ने अपने मित्र शृंगी से कहा —

श्लोक 13 (skanda.2.11.13)

पिता तव मृतं सर्पं स्कन्धेन वहतेऽधुना । मा भूद्दर्पस्तव सखे मा क्रुध्यस्त्वमिदं वृथा ।

pitā tava mṛtaṁ sarpaṁ skandhena vahate'dhunā mā bhūddarpastava sakhe mā krudhyastvamidaṁ vṛthā

'तुम्हारे पिता अभी एक मरा हुआ सर्प अपने कंधे पर ढो रहे हैं। हे मित्र! तुम्हें इस पर घमंड न हो, व्यर्थ ही क्रोध मत करो।'

श्लोक 14 (skanda.2.11.14)

सोऽभवत्कुपितः शृंगी दित्सुः शापं नृपाय वै । मत्ताते शवसर्पं यो न्यस्तवान्मूढचेतनः ।

so'bhavatkupitaḥ śṛṁgī ditsuḥ śāpaṁ nṛpāya vai mattāte śavasarpaṁ yo nyastavānmūḍhacetanaḥ

तब शृंगी क्रोधित होकर राजा को शाप देने के लिए उद्यत हो गया — 'जो मूढ़बुद्धि व्यक्ति मेरे मूर्च्छित पिता पर मृत सर्प रखता है,

श्लोक 15 (skanda.2.11.15)

स सप्तरात्रान्म्रियतां संदष्टस्तक्षकाहिना । शशापैवं मुनिसुतः सौभद्रेयं परीक्षितम् ।

sa saptarātrānmriyatāṁ saṁdaṣṭastakṣakāhinā śaśāpaivaṁ munisutaḥ saubhadreyaṁ parīkṣitam

वह सात रात्रियों में तक्षक सर्प द्वारा डसा जाकर मर जाए' — इस प्रकार मुनिपुत्र ने अभिमन्यु के पुत्र परीक्षित को शाप दिया।

श्लोक 16 (skanda.2.11.16)

शमीकाख्यः पिता तस्य शप्तं श्रुत्वा सुतेन तम् । नृपं प्रोवाच तनयं शृङ्गिणं मुनिपुंगवः ।

śamīkākhyaḥ pitā tasya śaptaṁ śrutvā sutena tam nṛpaṁ provāca tanayaṁ śṛṅgiṇaṁ munipuṁgavaḥ

उसके पिता शमीक नामक मुनि ने अपने पुत्र द्वारा दिए गए इस शाप को सुनकर, अपने पुत्र शृंगी से कहा —

श्लोक 17 (skanda.2.11.17)

रक्षकं सर्वलोकानां नृपं किं शप्तवानसि । अराजके वयं लोके स्थास्यामः कथमञ्जसा ।

rakṣakaṁ sarvalokānāṁ nṛpaṁ kiṁ śaptavānasi arājake vayaṁ loke sthāsyāmaḥ kathamañjasā

'सभी लोकों के रक्षक राजा को तुमने क्यों शाप दे दिया? अराजक संसार में हम कैसे सहजता से रह पाएँगे?

श्लोक 18 (skanda.2.11.18)

क्रोधेन पातकं भूयाद्दयया प्राप्यते सुखम् । यः समुत्पादितं कोपं क्षमयैव निरस्यति ।

krodhena pātakaṁ bhūyāddayayā prāpyate sukham yaḥ samutpāditaṁ kopaṁ kṣamayaiva nirasyati

क्रोध से पाप उत्पन्न होता है, दया से सुख प्राप्त होता है। जो उत्पन्न हुए क्रोध को क्षमा से ही दूर कर देता है,

श्लोक 19 (skanda.2.11.19)

इह लोके परत्रासावत्यंतं सुखमश्नुते । क्षमायुक्ता हि पुरुषा लभंते श्रेय उत्तमम् ।

iha loke paratrāsāvatyaṁtaṁ sukhamaśnute kṣamāyuktā hi puruṣā labhaṁte śreya uttamam

वह इस लोक और परलोक में अत्यंत सुख भोगता है। क्षमाशील पुरुष ही सर्वोत्तम कल्याण को प्राप्त करते हैं।

श्लोक 20 (skanda.2.11.20)

ततः शमीकः स्वं शिष्यं प्राह गौरमुखाभिधम् । भो गौरमुख गत्वा त्वं वद भूपं परीक्षितम् ।

tataḥ śamīkaḥ svaṁ śiṣyaṁ prāha gauramukhābhidham bho gauramukha gatvā tvaṁ vada bhūpaṁ parīkṣitam

तब शमीक मुनि ने अपने शिष्य गौरमुख से कहा, 'हे गौरमुख! जाकर राजा परीक्षित से कहो —

श्लोक 21 (skanda.2.11.21)

इमं शापं मत्सुतोक्तं तक्षकाधिपदंशनम् । पुनरायाहि शीघ्रं त्वं मत्समीपं महामते ।

imaṁ śāpaṁ matsutoktaṁ takṣakādhipadaṁśanam punarāyāhi śīghraṁ tvaṁ matsamīpaṁ mahāmate

मेरे पुत्र द्वारा दिए गए इस शाप की, तक्षक-राज के दंश की बात। हे महामते! फिर तुम शीघ्र ही मेरे पास लौट आना।'

श्लोक 22 (skanda.2.11.22)

एवमुक्तः शमीकेन ययौ गौरमुखो नृपम् । समेत्य चाब्रवीद्भूपं सौभद्रेयं परीक्षितम् ।

evamuktaḥ śamīkena yayau gauramukho nṛpam sametya cābravīdbhūpaṁ saubhadreyaṁ parīkṣitam

शमीक द्वारा ऐसा कहे जाने पर गौरमुख राजा के पास गया, और अभिमन्यु के पुत्र राजा परीक्षित से मिलकर उसने कहा —

श्लोक 23 (skanda.2.11.23)

दृष्ट्वा सर्पं पितुः स्कंधे त्वया विनिहितं मृतम् । शमीकस्य सुतः शृङ्गी शशाप त्वां रुषान्वितः ।

dṛṣṭvā sarpaṁ pituḥ skaṁdhe tvayā vinihitaṁ mṛtam śamīkasya sutaḥ śṛṅgī śaśāpa tvāṁ ruṣānvitaḥ

'तुमने पिता के कंधे पर मरा हुआ सर्प रखा हुआ देखकर, शमीक के पुत्र शृंगी ने क्रोधित होकर तुम्हें शाप दिया है —

श्लोक 24 (skanda.2.11.24)

एतद्दिनात्सप्तमेऽह्नि तक्षकेण महाहिना । दष्टो विषाग्निना दग्धो भूयादाश्वभिमन्युजः ।

etaddinātsaptame'hni takṣakeṇa mahāhinā daṣṭo viṣāgninā dagdho bhūyādāśvabhimanyujaḥ

आज से सातवें दिन तुम्हें महासर्प तक्षक डसेगा, और तुम, हे अभिमन्यु-पुत्र, विष की अग्नि से भस्म हो जाओगे।

श्लोक 25 (skanda.2.11.25)

एवं शशाप त्वां राजञ्छृंगी तस्य मुनेः सुतः । एतद्वक्तुं पिता तस्य प्राहिणोन्मां त्वदंतिकम् ।

evaṁ śaśāpa tvāṁ rājañchṛṁgī tasya muneḥ sutaḥ etadvaktuṁ pitā tasya prāhiṇonmāṁ tvadaṁtikam

इस प्रकार, हे राजन्, उस मुनि के पुत्र शृंगी ने तुम्हें शाप दिया है। यह बताने के लिए ही उसके पिता ने मुझे तुम्हारे पास भेजा है।'

श्लोक 26 (skanda.2.11.26)

इतीरयित्वा तं भूपमाशु गौरमुखो ययौ । गते गौरमुखे पश्चाद्राजा शोकपरायणः ।

itīrayitvā taṁ bhūpamāśu gauramukho yayau gate gauramukhe paścādrājā śokaparāyaṇaḥ

इतना कहकर गौरमुख शीघ्र ही उस राजा से विदा हो गया। गौरमुख के जाने के बाद, वह राजा शोक में डूब गया,

श्लोक 27 (skanda.2.11.27)

अभ्रंलिहमथोत्तुङ्गमेकस्तंभं सुविस्तृतम् । मध्ये गङ्गं व्यतनुत मण्डपं नृपपुङ्गवः ।

abhraṁlihamathottuṅgamekastaṁbhaṁ suvistṛtam madhye gaṅgaṁ vyatanuta maṇḍapaṁ nṛpapuṅgavaḥ

और उस श्रेष्ठ राजा ने आकाश को छूने वाला, अत्यंत ऊँचा, एक ही स्तंभ पर टिका, अत्यंत विस्तृत, गंगा के बीच में एक मंडप बनवाया।

श्लोक 28 (skanda.2.11.28)

महागारुडमन्त्रज्ञैरोषधिज्ञैश्चिकित्सकैः । तक्षकस्य विषं हन्तुं यत्नं कुर्वन्समाहितः ।

mahāgāruḍamantrajñairoṣadhijñaiścikitsakaiḥ takṣakasya viṣaṁ hantuṁ yatnaṁ kurvansamāhitaḥ

गरुड़-मंत्र के महान ज्ञाताओं, औषधियों के विशेषज्ञों और वैद्यों के साथ, तक्षक के विष को नष्ट करने के लिए सावधानीपूर्वक प्रयत्न करते हुए,

श्लोक 29 (skanda.2.11.29)

अनेकदेवब्रह्मर्षिराजर्षिप्रवरान्वितः । आस्ते तस्मिन्नृपस्तुङ्गे मण्डपे विष्णुभक्तिमान् ।

anekadevabrahmarṣirājarṣipravarānvitaḥ āste tasminnṛpastuṅge maṇḍape viṣṇubhaktimān

अनेक देवताओं, ब्रह्मर्षियों और श्रेष्ठ राजर्षियों से घिरा हुआ, वह राजा उस ऊँचे मंडप में विष्णु-भक्तिपूर्वक बैठा रहा।

श्लोक 30 (skanda.2.11.30)

तस्मिन्नवसरे विप्रः काश्यपो मान्त्रिकोत्तमः । राजानं रक्षितुं प्रायात्तक्षकस्य महाविषात् ।

tasminnavasare vipraḥ kāśyapo māntrikottamaḥ rājānaṁ rakṣituṁ prāyāttakṣakasya mahāviṣāt

उसी अवसर पर काश्यप नामक एक श्रेष्ठ मंत्रवेत्ता ब्राह्मण, राजा की रक्षा करने के लिए, तक्षक के महाविष से बचाने हेतु, चल पड़ा।

श्लोक 31 (skanda.2.11.31)

सप्तमेऽहनि विप्रेन्द्रो दरिद्रो धनकामुकः । अत्रांतरे तक्षकोऽपि विप्ररूपी समाययौ ।

saptame'hani viprendro daridro dhanakāmukaḥ atrāṁtare takṣako'pi viprarūpī samāyayau

सातवें दिन वह श्रेष्ठ ब्राह्मण, जो निर्धन था और धन का इच्छुक था, [जा रहा था]; इसी बीच तक्षक भी ब्राह्मण-रूप धारण करके आ पहुँचा।

श्लोक 32 (skanda.2.11.32)

मध्येमार्गं विलोक्याथ काश्यपं प्रत्यभाषत । ब्राह्मण त्वं कुत्र यासि वद मेऽद्य महामुने ।

madhyemārgaṁ vilokyātha kāśyapaṁ pratyabhāṣata brāhmaṇa tvaṁ kutra yāsi vada me'dya mahāmune

मार्ग के मध्य में उसे देखकर तक्षक ने काश्यप से पूछा, 'हे ब्राह्मण! तुम कहाँ जा रहे हो? हे महामुने, मुझे आज ही बताओ।'

श्लोक 33 (skanda.2.11.33)

इति पृष्टस्तदाऽवादीत्काश्यपस्तक्षकं द्विजः । परीक्षितं महाराजं तक्षकोऽद्य विषाग्निना ।

iti pṛṣṭastadā'vādītkāśyapastakṣakaṁ dvijaḥ parīkṣitaṁ mahārājaṁ takṣako'dya viṣāgninā

इस प्रकार पूछे जाने पर काश्यप ब्राह्मण ने तक्षक से कहा, 'आज महाराज परीक्षित को तक्षक विष की अग्नि से,

श्लोक 34 (skanda.2.11.34)

धक्ष्यते तं शमयितुं तत्समीपमुपैम्यहम् । इत्युक्तः स च तं विप्रं तक्षकः पुनरब्रवीत् ।

dhakṣyate taṁ śamayituṁ tatsamīpamupaimyaham ityuktaḥ sa ca taṁ vipraṁ takṣakaḥ punarabravīt

भस्म कर देगा; उसे शांत करने के लिए ही मैं उनके पास जा रहा हूँ।' यह सुनकर तक्षक ने उस ब्राह्मण से फिर कहा —

श्लोक 35 (skanda.2.11.35)

तक्षकोऽहं द्विजश्रेष्ठ मया दष्टश्चिकित्सितुम् । न शक्योब्दशतेनाऽपि महामन्त्रायुतैरपि ।

takṣako'haṁ dvijaśreṣṭha mayā daṣṭaścikitsitum na śakyobdaśatenā'pi mahāmantrāyutairapi

'हे श्रेष्ठ द्विज! मैं ही तक्षक हूँ। मेरे डसे हुए को सैकड़ों वर्षों में भी, महामंत्रों की भी दस हज़ार पुनरावृत्तियों से भी,

श्लोक 36 (skanda.2.11.36)

चिकित्सितुं चेन्मद्दष्टं शक्तिरस्ति तवाधुना । अनेकयोजनोच्छ्रायं दशाम्युज्जीवय द्रुमम् ।

cikitsituṁ cenmaddaṣṭaṁ śaktirasti tavādhunā anekayojanocchrāyaṁ daśāmyujjīvaya drumam

चिकित्सा करना संभव नहीं है। यदि मेरे डसने पर भी चिकित्सा करने की तुममें अभी शक्ति है, तो अनेक योजन ऊँचे इस वृक्ष को [डसने के बाद] पुनर्जीवित करके दिखाओ,

श्लोक 37 (skanda.2.11.37)

ततो भवान्समर्थो हीत्येवं मे भाति हे द्विज । इतीरयित्वा तं वृक्षमदशत्तक्षकस्तदा ।

tato bhavānsamartho hītyevaṁ me bhāti he dvija itīrayitvā taṁ vṛkṣamadaśattakṣakastadā

तभी मैं मानूँगा कि तुम समर्थ हो, हे द्विज।' ऐसा कहकर तक्षक ने उस वृक्ष को डस लिया।

श्लोक 38 (skanda.2.11.38)

अभवद्भस्मसात्सोऽपि वृक्षोत्यन्तसमुच्छ्रितः । पूर्वमेव नरः कश्चित्तं वृक्षमधिरूढवान् ।

abhavadbhasmasātso'pi vṛkṣotyantasamucchritaḥ pūrvameva naraḥ kaścittaṁ vṛkṣamadhirūḍhavān

वह अत्यंत विशाल वृक्ष भी उसी क्षण भस्म हो गया। उस वृक्ष पर पहले से ही कोई एक मनुष्य चढ़ा हुआ था,

श्लोक 39 (skanda.2.11.39)

तक्षकस्य विषोल्काभिः सोऽपि दग्धोऽभवत्तदा । तन्नरं न विजज्ञाते तौ च काश्यपतक्षकौ ।

takṣakasya viṣolkābhiḥ so'pi dagdho'bhavattadā tannaraṁ na vijajñāte tau ca kāśyapatakṣakau

और वह भी तक्षक के विष की ज्वालाओं से भस्म हो गया। उस मनुष्य को न तो काश्यप ने और न तक्षक ने ही पहचाना था।

श्लोक 40 (skanda.2.11.40)

काश्यपः प्रतिजज्ञेऽथ तक्षकस्यापि शृण्वतः । मन्मन्त्रशक्तिं पश्यन्तु सर्वे विप्रादयोऽधुना ।

kāśyapaḥ pratijajñe'tha takṣakasyāpi śṛṇvataḥ manmantraśaktiṁ paśyantu sarve viprādayo'dhunā

तब काश्यप ने तक्षक के सुनते ही प्रतिज्ञा की, 'अब सभी ब्राह्मण आदि मेरी मंत्र-शक्ति को देखें।'

श्लोक 41 (skanda.2.11.41)

इतीरयित्वा तं वृक्षं भस्मीभूतं विषाग्निना । आजीवयन्मन्त्रशक्त्या काश्यपो मान्त्रिकोत्तमः ।

itīrayitvā taṁ vṛkṣaṁ bhasmībhūtaṁ viṣāgninā ājīvayanmantraśaktyā kāśyapo māntrikottamaḥ

ऐसा कहकर, विष की अग्नि से भस्म हुए उस वृक्ष को, उस श्रेष्ठ मंत्रवेत्ता काश्यप ने अपनी मंत्र-शक्ति से पुनर्जीवित कर दिया,

श्लोक 42 (skanda.2.11.42)

स नरस्तेन वृक्षेण साकमुज्जीवितोऽभवत् । अथाब्रवीत्तक्षकस्तं काश्यपं मन्त्रकोविदम् ।

sa narastena vṛkṣeṇa sākamujjīvito'bhavat athābravīttakṣakastaṁ kāśyapaṁ mantrakovidam

और उस वृक्ष के साथ-साथ वह मनुष्य भी जीवित हो उठा। तब तक्षक ने मंत्रकोविद काश्यप से कहा —

श्लोक 43 (skanda.2.11.43)

यथा न मुनिवाङ्मिथ्या भवेदेवं कुरु द्विज । यत्ते राजा धनं दद्यात्ततोऽपि द्विगुणं धनम् ।

yathā na munivāṅmithyā bhavedevaṁ kuru dvija yatte rājā dhanaṁ dadyāttato'pi dviguṇaṁ dhanam

'हे द्विज! ऐसा करो कि मुनि (मेरी) यह बात मिथ्या न हो जाए। राजा तुम्हें जो भी धन देगा, उससे दुगना धन,

श्लोक 44 (skanda.2.11.44)

ददाम्यहं निवर्तस्व शीघ्रमेव द्विजोत्तम । इत्युक्त्वानर्घरत्नानि तस्मै दत्त्वा स तक्षकः ।

dadāmyahaṁ nivartasva śīghrameva dvijottama ityuktvānargharatnāni tasmai dattvā sa takṣakaḥ

मैं तुम्हें देता हूँ; तुम शीघ्र ही लौट जाओ, हे श्रेष्ठ द्विज।' ऐसा कहकर, तक्षक ने उसे अमूल्य रत्न देकर,

श्लोक 45 (skanda.2.11.45)

न्यवर्तयत्काश्यपं तं ब्राह्मणं मन्त्रकोविदम् । अल्पायुषं नृपं मत्वा ज्ञानदृष्ट्या स काश्यपः ।

nyavartayatkāśyapaṁ taṁ brāhmaṇaṁ mantrakovidam alpāyuṣaṁ nṛpaṁ matvā jñānadṛṣṭyā sa kāśyapaḥ

मंत्रकोविद ब्राह्मण काश्यप को लौटा दिया। राजा की आयु अल्प है, यह ज्ञान-दृष्टि से जानकर काश्यप ने,

श्लोक 46 (skanda.2.11.46)

स्वाश्रमं प्रययौ तूष्णीं लब्धरत्नश्च तक्षकात् । सोऽब्रवीत्तक्षकः सर्पान्सर्वानाहूय तत्क्षणे ।

svāśramaṁ prayayau tūṣṇīṁ labdharatnaśca takṣakāt so'bravīttakṣakaḥ sarpānsarvānāhūya tatkṣaṇe

तक्षक से रत्न लेकर चुपचाप अपने आश्रम को चला गया। तब तक्षक ने उसी क्षण सभी सर्पों को बुलाकर कहा —

श्लोक 47 (skanda.2.11.47)

यूयं तं नृपतिं प्राप्य मुनीनां वेषधारिणः । उपहारफलान्याशु प्रयच्छत परीक्षिते ।

yūyaṁ taṁ nṛpatiṁ prāpya munīnāṁ veṣadhāriṇaḥ upahāraphalānyāśu prayacchata parīkṣite

'तुम सब मुनियों का वेश धारण करके उस राजा के पास जाओ, और परीक्षित को शीघ्र ही उपहार-स्वरूप फल भेंट करो।'

श्लोक 48 (skanda.2.11.48)

तथेत्युक्त्वा सर्वसर्पा ददू राज्ञे फलान्यमी । तक्षकोऽपि तथा तत्र कस्मिंश्चिद्बदरीफले ।

tathetyuktvā sarvasarpā dadū rājñe phalānyamī takṣako'pi tathā tatra kasmiṁścidbadarīphale

'ऐसा ही होगा' कहकर सभी सर्पों ने राजा को वे फल दिए। तक्षक भी उनमें से किसी एक बेर के फल में,

श्लोक 49 (skanda.2.11.49)

कृमिवेषधरो भूत्वा व्यतिष्ठद्दंशितुं नृपम् । अथ राजा प्रदत्तानि सर्वैर्ब्राह्मणरूपकैः ।

kṛmiveṣadharo bhūtvā vyatiṣṭhaddaṁśituṁ nṛpam atha rājā pradattāni sarvairbrāhmaṇarūpakaiḥ

कीड़े का रूप धारण करके, राजा को डसने की प्रतीक्षा में स्थित हो गया। तब राजा ने, सभी ब्राह्मण-रूपधारियों द्वारा दिए गए,

श्लोक 50 (skanda.2.11.50)

परीक्षिन्मन्त्रिवृद्धेभ्यो दत्त्वा सर्वफलान्यपि ।

parīkṣinmantrivṛddhebhyo dattvā sarvaphalānyapi

वे सारे फल परीक्षित ने अपने वृद्ध मंत्रियों को बाँट दिए।

श्लोक 51 (skanda.2.11.51)

कौतूहलेन जग्राह स्थूलमेकं करे फलम् । तस्मिन्नवसरे सूर्योऽप्यस्ताचलमगाहत ।

kautūhalena jagrāha sthūlamekaṁ kare phalam tasminnavasare sūryo'pyastācalamagāhata

कुतूहलवश उसने हाथ में एक बड़ा-सा फल उठा लिया। उसी अवसर पर सूर्य भी अस्ताचल में प्रवेश कर रहा था।

श्लोक 52 (skanda.2.11.52)

मिथ्या ऋषिवचो माभूदिति तत्रत्यमानवाः । अन्योऽन्यमवदन्सर्वे ब्राह्मणाश्च नृपास्तदा ।

mithyā ṛṣivaco mābhūditi tatratyamānavāḥ anyo'nyamavadansarve brāhmaṇāśca nṛpāstadā

'ऋषि का वचन मिथ्या न हो' — यह सोचकर वहाँ उपस्थित सभी ब्राह्मण और राजा लोग परस्पर एक-दूसरे से कहने लगे,

श्लोक 53 (skanda.2.11.53)

एवं वदत्सु सर्वेषु फले तस्मिन्नदृश्यत । साधु रक्तः कृमिः सर्वै राज्ञा चापि परीक्षिता ।

evaṁ vadatsu sarveṣu phale tasminnadṛśyata sādhu raktaḥ kṛmiḥ sarvai rājñā cāpi parīkṣitā

इस प्रकार सभी के कहते-कहते, उस फल में एक भला-सा लाल कीड़ा दिखाई दिया, जिसे राजा और सबने ही देखा।

श्लोक 54 (skanda.2.11.54)

अयं किं मां दशेदद्य क्रिमिरित्युक्तवान्नृपः । निदधे तत्फलं कण्ठे सकृमि द्विजसत्तमाः ।

ayaṁ kiṁ māṁ daśedadya krimirityuktavānnṛpaḥ nidadhe tatphalaṁ kaṇṭhe sakṛmi dvijasattamāḥ

'यह कीड़ा आज मुझे क्या डसेगा?' — ऐसा कहते हुए राजा ने, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, उस कीड़े सहित उस फल को अपने कंठ पर रख लिया।

श्लोक 55 (skanda.2.11.55)

तक्षकोऽस्मिन्स्थितः कण्ठे कृमिरूपी फले तदा । निर्गत्य तत्फलादाशु नृपदेहमवेष्टयत् ।

takṣako'sminsthitaḥ kaṇṭhe kṛmirūpī phale tadā nirgatya tatphalādāśu nṛpadehamaveṣṭayat

उस फल में कीड़े के रूप में स्थित तक्षक तभी उस फल से शीघ्र निकलकर राजा की देह के चारों ओर लिपट गया।

श्लोक 56 (skanda.2.11.56)

तक्षकावेष्टिते भूपे पार्श्वस्था दुद्रुवुर्भयात् । अनन्तरं नृपो विप्रास्तक्षकस्य विषाग्निना ।

takṣakāveṣṭite bhūpe pārśvasthā dudruvurbhayāt anantaraṁ nṛpo viprāstakṣakasya viṣāgninā

राजा को तक्षक से लिपटा देखकर, आस-पास खड़े लोग भय से भाग गए। इसके बाद वह राजा, हे विप्रो, तक्षक की विष-अग्नि से,

श्लोक 57 (skanda.2.11.57)

दग्धोभूद्भस्मसादाशु सप्रासादो बलीयसा । कृत्वौर्ध्वदेहिकं तस्य नृपस्य सपुरोहिताः ।

dagdhobhūdbhasmasādāśu saprāsādo balīyasā kṛtvaurdhvadehikaṁ tasya nṛpasya sapurohitāḥ

अपने महल सहित उसी क्षण भस्म हो गया। उस राजा के पुरोहितों सहित उसके अंतिम संस्कार करके,

श्लोक 58 (skanda.2.11.58)

मंत्रिणस्तत्सुतं राज्ये जनमेजयनामकम् । राजानमभ्यषिञ्चन्वै जगद्रक्षणवाच्छया ।

maṁtriṇastatsutaṁ rājye janamejayanāmakam rājānamabhyaṣiñcanvai jagadrakṣaṇavācchayā

मंत्रियों ने संसार की रक्षा की इच्छा से उसके पुत्र जनमेजय नामक को राजपद पर अभिषिक्त किया।

श्लोक 59 (skanda.2.11.59)

तक्षकाद्रक्षितुं भूपमायातः काश्यपाभिधः । यो ब्राह्मणो मुनिश्रेष्ठः स सर्वैर्निंदितो जनैः ।

takṣakādrakṣituṁ bhūpamāyātaḥ kāśyapābhidhaḥ yo brāhmaṇo muniśreṣṭhaḥ sa sarvairniṁdito janaiḥ

राजा की तक्षक से रक्षा करने आए काश्यप नामक जो श्रेष्ठ मुनि ब्राह्मण था, वह सब लोगों द्वारा निंदित हुआ।

श्लोक 60 (skanda.2.11.60)

बभ्राम सकलान्देशाञ्छिष्टैः सर्वैश्च दूषितः । अवस्थानं न लेभे स ग्रामे वाप्याश्रमेऽपि वा ।

babhrāma sakalāndeśāñchiṣṭaiḥ sarvaiśca dūṣitaḥ avasthānaṁ na lebhe sa grāme vāpyāśrame'pi vā

वह समस्त देशों में भटकता रहा, सभी शिष्ट लोगों द्वारा दूषित माना जाता रहा; उसे किसी गाँव में, न ही किसी आश्रम में ठहरने की जगह मिली।

श्लोक 61 (skanda.2.11.61)

यान्यान्देशानसौ यातस्तत्र तत्र महाजनैः । तत्तद्देशान्निरस्तः सञ्छाकल्यं शरणं ययौ ।

yānyāndeśānasau yātastatra tatra mahājanaiḥ tattaddeśānnirastaḥ sañchākalyaṁ śaraṇaṁ yayau

वह जिस-जिस देश में गया, वहाँ-वहाँ महाजनों ने उसे उस देश से निकाल दिया; अंत में वह शाकल्य मुनि की शरण में गया।

श्लोक 62 (skanda.2.11.62)

प्रणम्य शाकल्यमुनिं काश्यपो निन्दितो जनैः । इदं विज्ञापयामास शाकल्याय महात्मने ।

praṇamya śākalyamuniṁ kāśyapo nindito janaiḥ idaṁ vijñāpayāmāsa śākalyāya mahātmane

लोगों द्वारा निंदित काश्यप ने शाकल्य मुनि को प्रणाम करके, महात्मा शाकल्य से यह निवेदन किया —

श्लोक 63 (skanda.2.11.63)

काश्यप उवाच । भगवन्सर्वधर्मज्ञ शाकल्य हरिवल्लभ । मुनयो ब्राह्मणाश्चान्ये मां निन्दंति सुहृज्जनाः ।

kāśyapa uvāca bhagavansarvadharmajña śākalya harivallabha munayo brāhmaṇāścānye māṁ nindaṁti suhṛjjanāḥ

काश्यप ने कहा — हे भगवन्, हे सर्वधर्मज्ञ शाकल्य, हे हरि के प्रिय! मुनिजन, ब्राह्मणजन और अन्य मित्रजन सब मेरी निंदा करते हैं,

श्लोक 64 (skanda.2.11.64)

नास्याहं कारणं जाने किं मां निन्दंति मानवाः । ब्रह्महत्या सुरापानगुरुस्त्रीगमनं तथा ।

nāsyāhaṁ kāraṇaṁ jāne kiṁ māṁ nindaṁti mānavāḥ brahmahatyā surāpānagurustrīgamanaṁ tathā

पर मैं इसका कारण नहीं जानता, कि लोग मेरी निंदा क्यों करते हैं। ब्रह्महत्या, सुरापान, गुरु-पत्नी-गमन,

श्लोक 65 (skanda.2.11.65)

स्तेयं संसर्गदोषो वा मया नाचरितं क्वचित् । अन्यान्यपि च पापानि न कृतानि मया मुने ।

steyaṁ saṁsargadoṣo vā mayā nācaritaṁ kvacit anyānyapi ca pāpāni na kṛtāni mayā mune

चोरी, या संसर्ग-दोष — इनमें से मैंने कभी कोई भी आचरण नहीं किया है; अन्य कोई पाप भी मैंने कभी नहीं किया है, हे मुने।

श्लोक 66 (skanda.2.11.66)

तथाऽपि निन्दंति जना वृथा मां बान्धवादयः । जानासि चेत्त्वं शाकल्य मया दोषं कृतं वद ।

tathā'pi nindaṁti janā vṛthā māṁ bāndhavādayaḥ jānāsi cettvaṁ śākalya mayā doṣaṁ kṛtaṁ vada

फिर भी लोग व्यर्थ ही मेरी निंदा करते हैं, बंधुजन भी। हे शाकल्य! यदि तुम जानते हो, तो बताओ मैंने क्या दोष किया है।

श्लोक 67 (skanda.2.11.67)

उक्तोऽथ काश्यपेनैव शाकल्याख्यो महामुनिः । क्षणं ध्यात्वा बभाषे तं काश्यपं द्विजसत्तमाः ।

ukto'tha kāśyapenaiva śākalyākhyo mahāmuniḥ kṣaṇaṁ dhyātvā babhāṣe taṁ kāśyapaṁ dvijasattamāḥ

काश्यप द्वारा इस प्रकार पूछे जाने पर, महामुनि शाकल्य ने क्षण भर ध्यान करके, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, काश्यप से कहा —

श्लोक 68 (skanda.2.11.68)

शाकल्य उवाच । परीक्षितं महाराजं तक्षकाद्रक्षितुं भवान् । आयासीदर्धमार्गे तु तक्षकेण निवारितः ।

śākalya uvāca parīkṣitaṁ mahārājaṁ takṣakādrakṣituṁ bhavān āyāsīdardhamārge tu takṣakeṇa nivāritaḥ

शाकल्य ने कहा — तुम महाराज परीक्षित की तक्षक से रक्षा करने के लिए गए थे, पर आधे मार्ग में ही तक्षक द्वारा रोक दिए गए।

श्लोक 69 (skanda.2.11.69)

चिकित्सितुं समर्थोऽपि विषरोगादिपीडितम् । यो न रक्षति लोकेस्मिंस्तमाहुर्ब्रह्मघातकम् ।

cikitsituṁ samartho'pi viṣarogādipīḍitam yo na rakṣati lokesmiṁstamāhurbrahmaghātakam

विष-रोग से पीड़ित व्यक्ति की चिकित्सा करने में समर्थ होते हुए भी, जो उसकी रक्षा नहीं करता, उसे इस संसार में ब्रह्मघाती कहा जाता है।

श्लोक 70 (skanda.2.11.70)

क्रोधात्कामाद्भयाल्लोभान्मात्सर्यान्मोहतोऽपि वा । यो न रक्षति विप्रेंद्र विषरोगातुरं नरम् ।

krodhātkāmādbhayāllobhānmātsaryānmohato'pi vā yo na rakṣati vipreṁdra viṣarogāturaṁ naram

हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! क्रोध से, काम से, भय से, लोभ से, ईर्ष्या से या मोह से भी, जो विष-रोग से पीड़ित व्यक्ति की रक्षा नहीं करता,

श्लोक 71 (skanda.2.11.71)

ब्रह्महा च सुरापी वा स्तेयी च गुरुतल्पगः । संसर्गदोषदुष्टश्च नापि तस्य विनिष्कृतिः ।

brahmahā ca surāpī vā steyī ca gurutalpagaḥ saṁsargadoṣaduṣṭaśca nāpi tasya viniṣkṛtiḥ

वह ब्रह्महत्या, सुरापान, चोरी और गुरु-पत्नी-गमन के समान दोषी माना जाता है; ऐसे संसर्ग-दोष से दूषित व्यक्ति का भी प्रायश्चित होता है,

श्लोक 72 (skanda.2.11.72)

कन्याविक्रयिणश्चापि हयविक्रयिणस्तथा । कृतघ्नस्याऽपि शास्त्रेषु प्रायश्चित्तं तु विद्यते ।

kanyāvikrayiṇaścāpi hayavikrayiṇastathā kṛtaghnasyā'pi śāstreṣu prāyaścittaṁ tu vidyate

कन्या बेचने वाले, अश्व बेचने वाले, और कृतघ्न व्यक्ति के लिए भी शास्त्रों में प्रायश्चित का विधान है।

श्लोक 73 (skanda.2.11.73)

विषरोगातुरं यस्तु समर्थोऽपि न रक्षति । न तस्य निष्कृतिः प्रोक्ता प्रायश्चित्तायुतैरपि ।

viṣarogāturaṁ yastu samartho'pi na rakṣati na tasya niṣkṛtiḥ proktā prāyaścittāyutairapi

किन्तु जो समर्थ होते हुए भी विष-रोग से पीड़ित व्यक्ति की रक्षा नहीं करता, उसके लिए दस हज़ार प्रायश्चितों से भी मुक्ति नहीं कही गई है।

श्लोक 74 (skanda.2.11.74)

न तेन सह पङ्क्तौ च भुञ्जीत सुकृती जनः । न तेन सह भाषेत न पश्येत्तं नरं क्वचित् ।

na tena saha paṅktau ca bhuñjīta sukṛtī janaḥ na tena saha bhāṣeta na paśyettaṁ naraṁ kvacit

पुण्यवान व्यक्ति को उसके साथ एक पंक्ति में बैठकर भोजन नहीं करना चाहिए, उससे बातचीत नहीं करनी चाहिए, कभी उसे देखना भी नहीं चाहिए;

श्लोक 75 (skanda.2.11.75)

तत्संभाषणमात्रेण महापातकभाग्भवेत् । परीक्षित्स महाराजः पुण्यश्लोकश्च धार्मिकः ।

tatsaṁbhāṣaṇamātreṇa mahāpātakabhāgbhavet parīkṣitsa mahārājaḥ puṇyaślokaśca dhārmikaḥ

उससे बात करने मात्र से ही महापाप का भागी बन जाता है। महाराज परीक्षित पुण्यश्लोक और धार्मिक थे,

श्लोक 76 (skanda.2.11.76)

विष्णुभक्तो महायोगी चातुर्वर्ण्यस्य रक्षिता । व्यासपुत्राद्धरिकथां श्रुतवान्भक्तिपूर्वकम् ।

viṣṇubhakto mahāyogī cāturvarṇyasya rakṣitā vyāsaputrāddharikathāṁ śrutavānbhaktipūrvakam

विष्णु-भक्त, महायोगी, चारों वर्णों के रक्षक थे; उन्होंने व्यास-पुत्र (शुकदेव) से हरि-कथा भक्तिपूर्वक सुनी थी।

श्लोक 77 (skanda.2.11.77)

अरक्षित्वा नृपं तं तु वचसा तक्षकस्य यत् । निवृत्तस्तेन विप्रेन्द्रैर्बान्धवैरपि दूष्यसे ।

arakṣitvā nṛpaṁ taṁ tu vacasā takṣakasya yat nivṛttastena viprendrairbāndhavairapi dūṣyase

उस राजा की रक्षा न करके, तक्षक के वचन के कारण तुम पीछे हट गए — इसी कारण, हे श्रेष्ठ ब्राह्मण, तुम्हारे बंधुजनों द्वारा भी तुम्हारी निंदा की जाती है।

श्लोक 78 (skanda.2.11.78)

स परीक्षिन्महाराजो यद्यपि क्षणजीवितः । तथापि यावन्मरणं बुधैः कार्यं चिकित्सितम् ।

sa parīkṣinmahārājo yadyapi kṣaṇajīvitaḥ tathāpi yāvanmaraṇaṁ budhaiḥ kāryaṁ cikitsitam

वह महाराज परीक्षित भले ही क्षणभंगुर जीवन वाला था, फिर भी मृत्यु तक विद्वानों को उसकी चिकित्सा करते ही रहना चाहिए था।

श्लोक 79 (skanda.2.11.79)

यावत्कण्ठगताः प्राणा मुमूषोर्मानवस्य हि । तावच्चिकित्सा कर्तव्या कालस्य कुटिला गतिः ।

yāvatkaṇṭhagatāḥ prāṇā mumūṣormānavasya hi tāvaccikitsā kartavyā kālasya kuṭilā gatiḥ

जब तक मरणासन्न मनुष्य के प्राण कंठ में अटके हों, तब तक चिकित्सा करते ही रहना चाहिए — क्योंकि काल की गति टेढ़ी होती है,

श्लोक 80 (skanda.2.11.80)

इति प्राहुः पुरा श्लोकं भिषग्विद्याब्धिपारगाः । ततश्चिकित्साशक्तोऽपि यस्मादकृतभेषजः ।

iti prāhuḥ purā ślokaṁ bhiṣagvidyābdhipāragāḥ tataścikitsāśakto'pi yasmādakṛtabheṣajaḥ

ऐसा प्राचीन काल में चिकित्सा-विद्या के पारगामी वैद्यों ने यह श्लोक कहा है। इसलिए, चिकित्सा में समर्थ होते हुए भी, औषधि न देने के कारण,

श्लोक 81 (skanda.2.11.81)

अर्धमार्गे निवृत्तश्च तेन त्वं गर्हितो ह्यसि । शाकल्येनैवमुदितः काश्यपः प्रत्यभाषत ।

ardhamārge nivṛttaśca tena tvaṁ garhito hyasi śākalyenaivamuditaḥ kāśyapaḥ pratyabhāṣata

और आधे मार्ग में लौट आने के कारण ही तुम निंदित हुए हो।' शाकल्य द्वारा ऐसा कहे जाने पर काश्यप ने उत्तर दिया —

श्लोक 82 (skanda.2.11.82)

काश्यप उवाच । ममैतद्दोषशांत्यर्थमुपायं वद सुव्रत । येन मां प्रतिगृह्णीयुर्बान्धवाः ससुहृज्जनाः ।

kāśyapa uvāca mamaitaddoṣaśāṁtyarthamupāyaṁ vada suvrata yena māṁ pratigṛhṇīyurbāndhavāḥ sasuhṛjjanāḥ

काश्यप ने कहा — हे सुव्रत! मेरे इस दोष की शांति के लिए कोई उपाय बताइए, जिससे बंधुजन और मित्रगण मुझे पुनः स्वीकार कर लें।

श्लोक 83 (skanda.2.11.83)

कृपां मयि कुरुष्व त्वं शाकल्य हरिवल्लभ । काश्यपेनैवमुक्तस्तु शाकल्योऽपि मुनीश्वरः ।

kṛpāṁ mayi kuruṣva tvaṁ śākalya harivallabha kāśyapenaivamuktastu śākalyo'pi munīśvaraḥ

हे शाकल्य, हे हरि-प्रिय! मुझ पर कृपा कीजिए।' काश्यप द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, मुनीश्वर शाकल्य ने भी,

श्लोक 84 (skanda.2.11.84)

क्षणं ध्यात्वा जगादैवं काश्यपं कृपया तदा ।

kṣaṇaṁ dhyātvā jagādaivaṁ kāśyapaṁ kṛpayā tadā

क्षण भर ध्यान करके, तब कृपापूर्वक काश्यप से यह कहा —

श्लोक 85 (skanda.2.11.85)

शाकल्य उवाच । अस्य पापस्य शान्त्यर्थमुपायं प्रवदामि ते । तत्कर्तव्यं त्वया शीघ्रं विलम्बं मा कृथा द्विज ।

śākalya uvāca asya pāpasya śāntyarthamupāyaṁ pravadāmi te tatkartavyaṁ tvayā śīghraṁ vilambaṁ mā kṛthā dvija

शाकल्य ने कहा — इस पाप की शांति के लिए मैं तुम्हें उपाय बताता हूँ। हे द्विज! इसे शीघ्र करना, विलंब मत करना।

श्लोक 86 (skanda.2.11.86)

सुवर्णमुखरीतीरे लक्ष्मीपतिनिवासभूः । वेंकटाद्रिरिति ख्यातः सर्वलोकेषु पूजितः ।

suvarṇamukharītīre lakṣmīpatinivāsabhūḥ veṁkaṭādririti khyātaḥ sarvalokeṣu pūjitaḥ

सुवर्णमुखरी नदी के तट पर, लक्ष्मीपति के निवास-स्थान के रूप में, वेंकटाद्रि नाम से विख्यात, समस्त लोकों में पूजित एक पर्वत है।

श्लोक 87 (skanda.2.11.87)

तस्मिञ्छेषगिरौ पुण्ये सुरासुरनमस्कृते । ब्रह्महत्यासुरापानस्वर्णस्तेयादिनाशके ।

tasmiñcheṣagirau puṇye surāsuranamaskṛte brahmahatyāsurāpānasvarṇasteyādināśake

उस पुण्य शेषगिरि पर, जो देवताओं और असुरों दोनों द्वारा नमस्कृत है, ब्रह्महत्या, सुरापान और स्वर्ण-चोरी आदि पापों का नाश करने वाली,

श्लोक 88 (skanda.2.11.88)

स्वामिपुष्करिणी चेति सर्वपापापनोदिनी । उत्तरे श्रीनिवासस्य वर्तते मंगलप्रदा ।

svāmipuṣkariṇī ceti sarvapāpāpanodinī uttare śrīnivāsasya vartate maṁgalapradā

स्वामिपुष्करिणी नामक, सभी पापों को दूर करने वाली, मंगलदायिनी तीर्थ श्रीनिवास के उत्तर में स्थित है।

श्लोक 89 (skanda.2.11.89)

तं गत्वा वेंकटं शैलं स्वामिपुष्करिणीं शुभाम् । स्नात्वा संकल्पपूर्वं तु वराहस्वामिनं हरिम् ।

taṁ gatvā veṁkaṭaṁ śailaṁ svāmipuṣkariṇīṁ śubhām snātvā saṁkalpapūrvaṁ tu varāhasvāminaṁ harim

वहाँ वेंकट पर्वत पर जाकर, शुभ स्वामिपुष्करिणी में संकल्पपूर्वक स्नान करके, वराह-स्वामी हरि की,

श्लोक 90 (skanda.2.11.90)

सेवित्वा पश्चिमे तीरे निर्गत्य हरिमन्दिरम् । गत्वा तत्र विधानेन स्वर्णाचलनिवासिनम् ।

sevitvā paścime tīre nirgatya harimandiram gatvā tatra vidhānena svarṇācalanivāsinam

सेवा करके, पश्चिमी तट से निकलकर, विधिपूर्वक हरि-मंदिर जाकर, स्वर्णाचल-निवासी,

श्लोक 91 (skanda.2.11.91)

श्रीनिवासं परं देवं भक्तानामभयप्रदम् । शङ्खचक्रधरं देवं वनमालाविभूषितम् ।

śrīnivāsaṁ paraṁ devaṁ bhaktānāmabhayapradam śaṅkhacakradharaṁ devaṁ vanamālāvibhūṣitam

परम देव श्रीनिवास को, जो भक्तों को अभय प्रदान करने वाले, शंख-चक्रधारी और वनमाला से विभूषित हैं,

श्लोक 92 (skanda.2.11.92)

दृष्ट्वा निर्धूतपापोऽसि संशयं मा कृथा द्विज । शाकल्येनैवमुक्तस्तु काश्यपो मुनिपुंगवः ।

dṛṣṭvā nirdhūtapāpo'si saṁśayaṁ mā kṛthā dvija śākalyenaivamuktastu kāśyapo munipuṁgavaḥ

देखने मात्र से ही तुम्हारे पाप धुल जाएँगे; इसमें संशय मत करो, हे द्विज।' शाकल्य द्वारा ऐसा कहे जाने पर श्रेष्ठ मुनि काश्यप,

श्लोक 93 (skanda.2.11.93)

गत्वा वेंकटशैलेन्द्रं सुरासुरनमस्कृतम् । पुष्करिण्यां शुभायां तु स्नातो नियमपूर्वकम् ।

gatvā veṁkaṭaśailendraṁ surāsuranamaskṛtam puṣkariṇyāṁ śubhāyāṁ tu snāto niyamapūrvakam

देवताओं और असुरों द्वारा नमस्कृत उस वेंकट पर्वत पर जाकर, शुभ पुष्करिणी में नियमपूर्वक स्नान करके,

श्लोक 94 (skanda.2.11.94)

स्वस्थोऽभूत्काश्यपो विप्रो भिषग्विद्याब्धिपारगः । सर्वे बंधुजना विप्राः काश्यपं ब्राह्मणोत्तमम् ।

svastho'bhūtkāśyapo vipro bhiṣagvidyābdhipāragaḥ sarve baṁdhujanā viprāḥ kāśyapaṁ brāhmaṇottamam

चिकित्सा-विद्या के पारगामी ब्राह्मण काश्यप स्वस्थ हो गया। सभी बंधुजन और ब्राह्मणों ने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण काश्यप का,

श्लोक 95 (skanda.2.11.95)

पूजयित्वा विधानेन पूज्योऽसि न च संशयः । एवं वः कथितं विप्रा वेंकटाचलवैभवम् ।

pūjayitvā vidhānena pūjyo'si na ca saṁśayaḥ evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā veṁkaṭācalavaibhavam

विधिपूर्वक सम्मान करके कहा, 'तुम पूज्य हो, इसमें कोई संशय नहीं है।' इस प्रकार, हे विप्रो, मैंने तुम्हें वेंकटाचल की महिमा कह सुनाई।

श्लोक 96 (skanda.2.11.96)

यः शृणोति नरो भक्त्या विष्णुलोके महीयते ।

yaḥ śṛṇoti naro bhaktyā viṣṇuloke mahīyate

जो मनुष्य इसे भक्तिपूर्वक सुनता है, वह विष्णुलोक में महिमामंडित होता है।

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