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वैष्णव खण्ड · अध्याय 12

अट्ठाईस नरक एवं स्वामिपुष्करिणी की महिमा

अध्याय 11अध्याय-सूचीअध्याय 13

श्लोक 1 (skanda.2.12.1)

ऋषय ऊचुः । सूत सर्वार्थतत्त्वज्ञ वेदवेदांगपारग । श्रीस्वामिपुष्करिण्याश्च वैभवं वद नः प्रभो ।

ṛṣaya ūcuḥ sūta sarvārthatattvajña vedavedāṁgapāraga śrīsvāmipuṣkariṇyāśca vaibhavaṁ vada naḥ prabho

ऋषियों ने कहा — हे सूत! हे सम्पूर्ण तत्त्वों के ज्ञाता! हे वेद-वेदांगों के पारगामी! हे प्रभु! हमें श्री स्वामिपुष्करिणी का वैभव बताइए,

श्लोक 2 (skanda.2.12.2)

यस्याः स्मरणमात्रेण मुक्तः स्यान्मानवो भुवि ।

yasyāḥ smaraṇamātreṇa muktaḥ syānmānavo bhuvi

जिसके स्मरण मात्र से ही मनुष्य इस पृथ्वी पर मुक्त हो जाता है।

श्लोक 3 (skanda.2.12.3)

श्रीसूत उवाच । स्वामितीर्थं प्रशंसन्ति स्नांति वा कथयंति ये । अष्टाविंशतिभेदांस्ते नरकान्नोपभुञ्जते ।

śrīsūta uvāca svāmitīrthaṁ praśaṁsanti snāṁti vā kathayaṁti ye aṣṭāviṁśatibhedāṁste narakānnopabhuñjate

श्री सूत ने कहा — जो लोग स्वामितीर्थ की प्रशंसा करते हैं, वहाँ स्नान करते हैं, या इसकी चर्चा करते हैं, वे अट्ठाईस प्रकार के नरकों को कभी नहीं भोगते —

श्लोक 4 (skanda.2.12.4)

तामिस्रमन्धतामिस्रं महारौरवरौरवौ । कुम्भीपाकं कालसूत्रमसिपत्रवनं तथा ।

tāmisramandhatāmisraṁ mahārauravarauravau kumbhīpākaṁ kālasūtramasipatravanaṁ tathā

तामिस्र, अंधतामिस्र, महारौरव, रौरव, कुम्भीपाक, कालसूत्र, असिपत्रवन,

श्लोक 5 (skanda.2.12.5)

कृमिभक्षोऽन्धकूपश्च संदंशः शाल्मली तथा । लालाभक्षो ह्यवीचिश्च सारमेयादनं तथा ।

kṛmibhakṣo'ndhakūpaśca saṁdaṁśaḥ śālmalī tathā lālābhakṣo hyavīciśca sārameyādanaṁ tathā

कृमिभक्ष, अंधकूप, संदंश, शाल्मली, लालाभक्ष, अवीचि, सारमेयादन,

श्लोक 6 (skanda.2.12.6)

तथैव वज्रकणकः क्षारकर्दमपातनम् । रक्षोगणाशनं चापि शूलप्रोतनिरोधनम् ।

tathaiva vajrakaṇakaḥ kṣārakardamapātanam rakṣogaṇāśanaṁ cāpi śūlaprotanirodhanam

वज्रकणक, क्षारकर्दमपातन, रक्षोगणाशन,

श्लोक 7 (skanda.2.12.7)

तिरोधानाभिधं विप्रास्तथा सूचीमुखाभिधम् । पूयशोणितभक्षं च विषाग्निपरिपीडनम् ।

tirodhānābhidhaṁ viprāstathā sūcīmukhābhidham pūyaśoṇitabhakṣaṁ ca viṣāgniparipīḍanam

शूलप्रोत-निरोधन, तिरोधान, सूचीमुख, पूयशोणितभक्ष, और विषाग्नि-परिपीडन नामक नरक — हे विप्रो!

श्लोक 8 (skanda.2.12.8)

अष्टाविंशतिसंख्यातमेतन्नरकसंचयम् । न याति मनुजो विप्राः स्वामितीर्थनिमज्जनात् ।

aṣṭāviṁśatisaṁkhyātametannarakasaṁcayam na yāti manujo viprāḥ svāmitīrthanimajjanāt

इस प्रकार अट्ठाईस की संख्या में गिने गए इन समस्त नरकों में मनुष्य कभी नहीं जाता, केवल स्वामितीर्थ में डुबकी लगाने भर से।

श्लोक 9 (skanda.2.12.9)

वित्तापत्यकलत्राणां योऽन्येषामपहारकः । स कालपाशबद्धोऽयं यमदूतैर्भयानकैः ।

vittāpatyakalatrāṇāṁ yo'nyeṣāmapahārakaḥ sa kālapāśabaddho'yaṁ yamadūtairbhayānakaiḥ

जो दूसरों के धन, संतान और पत्नी का अपहरण करता है, वह काल-पाश में बंधा हुआ भयानक यमदूतों द्वारा,

श्लोक 10 (skanda.2.12.10)

तामिस्रे नरके घोरे पात्यते बहुवत्सरम् । स्नाति चेत्स्वामितीर्थे स तस्मिन्नासौ निपात्यते ।

tāmisre narake ghore pātyate bahuvatsaram snāti cetsvāmitīrthe sa tasminnāsau nipātyate

घोर तामिस्र नरक में बहुत वर्षों तक गिराया जाता है। किन्तु यदि वह स्वामितीर्थ में स्नान करता है, तो उसे उस नरक में नहीं गिराया जाता।

श्लोक 11 (skanda.2.12.11)

मातरं पितरं विप्रान्यो द्वेष्टि पुरुषाधमः । स कालसूत्रनरके विस्तृतायुतयोजने ।

mātaraṁ pitaraṁ viprānyo dveṣṭi puruṣādhamaḥ sa kālasūtranarake vistṛtāyutayojane

जो अधम पुरुष माता, पिता और ब्राह्मणों से द्वेष करता है, वह दस हज़ार योजन विस्तृत,

श्लोक 12 (skanda.2.12.12)

अधस्तादग्निसन्तप्ते उपर्यर्कमरीचिभिः । खले ताम्रमये विप्राः पात्यते क्षुधयार्दितः ।

adhastādagnisantapte uparyarkamarīcibhiḥ khale tāmramaye viprāḥ pātyate kṣudhayārditaḥ

नीचे से अग्नि से तप्त और ऊपर से सूर्य की किरणों से जलते हुए, ताम्बे के खलिहान में, भूख से पीड़ित होकर, हे विप्रो, गिराया जाता है,

श्लोक 13 (skanda.2.12.13)

स्नाति चेत्पुष्करिण्यां वै तस्मिन्नाऽसौ निपात्यते । यो वेदमार्गमुल्लंघ्य वर्तते कुपथे नरः ।

snāti cetpuṣkariṇyāṁ vai tasminnā'sau nipātyate yo vedamārgamullaṁghya vartate kupathe naraḥ

— यह है कालसूत्र नरक। किन्तु यदि वह पुष्करिणी में स्नान करता है, तो उसे उस नरक में नहीं गिराया जाता। जो मनुष्य वेद-मार्ग का उल्लंघन करके कुमार्ग पर चलता है,

श्लोक 14 (skanda.2.12.14)

सोऽसिपत्रवने घोरे पात्यते यमकिंकरैः । स्नाति चेत्स्वामितीर्थे तु तस्मिन्नाऽसौ निपात्यते ।

so'sipatravane ghore pātyate yamakiṁkaraiḥ snāti cetsvāmitīrthe tu tasminnā'sau nipātyate

वह घोर असिपत्रवन नरक में यम के दूतों द्वारा गिराया जाता है। किन्तु यदि वह स्वामितीर्थ में स्नान करता है, तो उसे उस नरक में नहीं गिराया जाता।

श्लोक 15 (skanda.2.12.15)

योऽश्नाति पंक्तिभेदेन पक्वं सूपादिकं नरः । अकृत्वा पंचयज्ञान्वा भुंक्ते मोहेन स द्विजाः ।

yo'śnāti paṁktibhedena pakvaṁ sūpādikaṁ naraḥ akṛtvā paṁcayajñānvā bhuṁkte mohena sa dvijāḥ

जो मनुष्य पंक्ति के भेदभाव से, या पंचमहायज्ञ किए बिना ही मोहवश पका हुआ अन्न आदि खा लेता है, हे द्विजो,

श्लोक 16 (skanda.2.12.16)

पात्यतेऽयं यमभटैर्नरके कृमिभोजने । भक्ष्यमाणः कृमिशतैर्भक्षयन्कृमिसंचयान् ।

pātyate'yaṁ yamabhaṭairnarake kṛmibhojane bhakṣyamāṇaḥ kṛmiśatairbhakṣayankṛmisaṁcayān

वह यम के सैनिकों द्वारा कृमिभोजन नामक नरक में गिराया जाता है, जहाँ सैकड़ों कीड़ों द्वारा खाया जाता हुआ, स्वयं भी कीड़ों के समूह को खाता हुआ,

श्लोक 17 (skanda.2.12.17)

स्वयं च कृमिभूतः संस्तिष्ठेद्यावदघक्षयम् । स्नाति चेत्स्वामितीर्थे वै तस्मिन्नाऽसौ निपात्यते ।

svayaṁ ca kṛmibhūtaḥ saṁstiṣṭhedyāvadaghakṣayam snāti cetsvāmitīrthe vai tasminnā'sau nipātyate

वह स्वयं भी कीड़ा बनकर तब तक रहता है जब तक उसका पाप क्षय नहीं हो जाता। किन्तु यदि वह स्वामितीर्थ में स्नान करता है, तो उसे उस नरक में नहीं गिराया जाता।

श्लोक 18 (skanda.2.12.18)

यो हरेद्विप्रवित्तानि स्नेहेन बलतोऽपि वा । अन्येषामपि वित्तानि राजा तत्पुरुषोऽपि वा ।

yo haredvipravittāni snehena balato'pi vā anyeṣāmapi vittāni rājā tatpuruṣo'pi vā

जो स्नेहवश या बलपूर्वक ब्राह्मणों का धन हर लेता है, या दूसरों के धन को, चाहे वह राजा हो या राजा का ही कोई अन्य पुरुष,

श्लोक 19 (skanda.2.12.19)

अयोमयाग्निकुंडेषु संदंशैः सोऽपि पीडितः । संदंशे नरके घोरे पात्यते यमपूरुषैः ।

ayomayāgnikuṁḍeṣu saṁdaṁśaiḥ so'pi pīḍitaḥ saṁdaṁśe narake ghore pātyate yamapūruṣaiḥ

वह लोहे के अग्नि-कुण्डों में चिमटों से पीड़ित होकर, घोर संदंश नरक में यम के पुरुषों द्वारा गिराया जाता है।

श्लोक 20 (skanda.2.12.20)

स्नाति चेत्स्वामितीर्थे तु तस्मिन्नासौ निपात्यते । अगम्यां योभिगच्छेत स्त्रियं वै पुरुषाधमः ।

snāti cetsvāmitīrthe tu tasminnāsau nipātyate agamyāṁ yobhigaccheta striyaṁ vai puruṣādhamaḥ

किन्तु यदि वह स्वामितीर्थ में स्नान करता है, तो उसे उस नरक में नहीं गिराया जाता। जो अधम पुरुष किसी अगम्य स्त्री के पास जाता है,

श्लोक 21 (skanda.2.12.21)

अगम्यं पुरुषं योषिदभिगच्छेत वा द्विजाः । तावयोमयनारीं च पुरुषं चाप्ययोमयम् ।

agamyaṁ puruṣaṁ yoṣidabhigaccheta vā dvijāḥ tāvayomayanārīṁ ca puruṣaṁ cāpyayomayam

या हे द्विजो, जो स्त्री किसी अगम्य पुरुष के पास जाती है, वे दोनों तपाई हुई लोहे की स्त्री और लोहे के पुरुष का,

श्लोक 22 (skanda.2.12.22)

तप्तावालिङ्ग्य तिष्ठन्तौ यावच्चन्द्रदिवाकरम् । सूच्याख्ये नरके घोरे पात्येते यमकिंकरैः ।

taptāvāliṅgya tiṣṭhantau yāvaccandradivākaram sūcyākhye narake ghore pātyete yamakiṁkaraiḥ

आलिंगन किए हुए, सूर्य और चंद्रमा के रहने तक खड़े रहते हुए, सूची नामक घोर नरक में यम के किंकरों द्वारा गिराए जाते हैं।

श्लोक 23 (skanda.2.12.23)

स्नाति चेत्स्वामितीर्थे च तस्मिन्नासौ निपाप्यते । बाधते सर्वजन्तून्यो नानोपायैरुपद्रवैः ।

snāti cetsvāmitīrthe ca tasminnāsau nipāpyate bādhate sarvajantūnyo nānopāyairupadravaiḥ

किन्तु यदि वे स्वामितीर्थ में स्नान करते हैं, तो उन्हें उस नरक में नहीं गिराया जाता। जो नाना उपायों और उपद्रवों से सभी प्राणियों को पीड़ित करता है,

श्लोक 24 (skanda.2.12.24)

शाल्मलीनरके घोरे पात्यते बहुकण्टके । स्नाति चेत्स्वामितीर्थे तु तस्मिन्नासौ निपात्यते ।

śālmalīnarake ghore pātyate bahukaṇṭake snāti cetsvāmitīrthe tu tasminnāsau nipātyate

वह अत्यंत कंटीले, घोर शाल्मली नरक में गिराया जाता है। किन्तु यदि वह स्वामितीर्थ में स्नान करता है, तो उसे उस नरक में नहीं गिराया जाता।

श्लोक 25 (skanda.2.12.25)

राजा वा राजभृत्यो वा यः पाषण्डमनुद्रुतः । भेदको धर्मसेतूनां वैतरण्यां निपात्यते ।

rājā vā rājabhṛtyo vā yaḥ pāṣaṇḍamanudrutaḥ bhedako dharmasetūnāṁ vaitaraṇyāṁ nipātyate

जो राजा या राजा का सेवक पाखंड का अनुसरण करता है, धर्म-मर्यादाओं को तोड़ता है, वह वैतरणी नदी में गिराया जाता है।

श्लोक 26 (skanda.2.12.26)

स्नाति चेत्स्वामितीर्थे तु तस्मिन्नासौ निपात्यते । वृषलीसङ्गदुष्टो वा शौचाद्याचारवर्जितः ।

snāti cetsvāmitīrthe tu tasminnāsau nipātyate vṛṣalīsaṅgaduṣṭo vā śaucādyācāravarjitaḥ

किन्तु यदि वह स्वामितीर्थ में स्नान करता है, तो उसे उस नरक में नहीं गिराया जाता। जो वृषली (नीच स्त्री) के संग से दूषित, शौच आदि आचारों से रहित,

श्लोक 27 (skanda.2.12.27)

त्यक्तलज्जस्त्यक्तवेदः पशुचर्यारतः सदा । स पूयविष्ठामूत्रासृक्छ्लेष्मपित्तादिपूरिते ।

tyaktalajjastyaktavedaḥ paśucaryārataḥ sadā sa pūyaviṣṭhāmūtrāsṛkchleṣmapittādipūrite

लज्जा और वेद दोनों को त्यागकर सदा पशु-आचरण में रत रहता है, वह मवाद, विष्ठा, मूत्र, रक्त, कफ और पित्त आदि से भरे,

श्लोक 28 (skanda.2.12.28)

अतिबीभत्सनरके पात्यते यमकिंकरैः । स्नाति चेत्स्वामितीर्थे तु तस्मिन्नासौ निपात्यते ।

atibībhatsanarake pātyate yamakiṁkaraiḥ snāti cetsvāmitīrthe tu tasminnāsau nipātyate

अत्यंत घृणित नरक में यम के किंकरों द्वारा गिराया जाता है। किन्तु यदि वह स्वामितीर्थ में स्नान करता है, तो उसे उस नरक में नहीं गिराया जाता।

श्लोक 29 (skanda.2.12.29)

यः श्वभिर्मृगयुर्वन्यान्बाणैर्वा बाधते मृगान् । स विध्यमानो बाणौघैः परत्र यमकिंकरैः ।

yaḥ śvabhirmṛgayurvanyānbāṇairvā bādhate mṛgān sa vidhyamāno bāṇaughaiḥ paratra yamakiṁkaraiḥ

जो शिकारी कुत्तों या बाणों से वन के मृगों को पीड़ित करता है, वह परलोक में यम के किंकरों द्वारा बाणों की झड़ी से बींधा जाकर,

श्लोक 30 (skanda.2.12.30)

प्राणरोधाख्यनरके पात्यते यमकिंकरैः । स्नाति चेत्स्वामितीर्थे तु तस्मिन्नासौ निपात्यते ।

prāṇarodhākhyanarake pātyate yamakiṁkaraiḥ snāti cetsvāmitīrthe tu tasminnāsau nipātyate

प्राणरोध नामक नरक में यम के किंकरों द्वारा गिराया जाता है। किन्तु यदि वह स्वामितीर्थ में स्नान करता है, तो उसे उस नरक में नहीं गिराया जाता।

श्लोक 31 (skanda.2.12.31)

दाम्भिको यः पशून्यज्ञे विध्यनुष्ठानवर्जितः । हन्त्यसौ परलोकेषु वैशसे नरके द्विजाः ।

dāmbhiko yaḥ paśūnyajñe vidhyanuṣṭhānavarjitaḥ hantyasau paralokeṣu vaiśase narake dvijāḥ

जो पाखंडी यज्ञ में पशुओं को विधि-अनुष्ठान के बिना ही मार डालता है, वह परलोक में, हे द्विजो, वैशस नामक नरक में,

श्लोक 32 (skanda.2.12.32)

कर्त्यमानो यमभटैः पात्यते यमकिंकरैः । स्नाति चेत्पुष्करिण्यां वै तस्मिन्नासौ निपात्यते ।

kartyamāno yamabhaṭaiḥ pātyate yamakiṁkaraiḥ snāti cetpuṣkariṇyāṁ vai tasminnāsau nipātyate

यम के भटों द्वारा काटा जाता हुआ, यम के किंकरों द्वारा गिराया जाता है। किन्तु यदि वह पुष्करिणी में स्नान करता है, तो उसे उस नरक में नहीं गिराया जाता।

श्लोक 33 (skanda.2.12.33)

आत्मभार्यां सवर्णां यो रेतः पाययते यदि । परत्र रेतःपायी स रेतःकुण्डे निपात्यते ।

ātmabhāryāṁ savarṇāṁ yo retaḥ pāyayate yadi paratra retaḥpāyī sa retaḥkuṇḍe nipātyate

जो अपनी ही जाति की पत्नी को [अनुचित रूप से] वीर्यपान कराता है, वह परलोक में वीर्यपायी होकर वीर्य-कुण्ड में गिराया जाता है।

श्लोक 34 (skanda.2.12.34)

स्नाति चेत्पुष्करिण्यां वै तस्मिन्नासौ निपात्यते । यो दस्युर्मार्गमाश्रित्य गरदो ग्रामदाहकः ।

snāti cetpuṣkariṇyāṁ vai tasminnāsau nipātyate yo dasyurmārgamāśritya garado grāmadāhakaḥ

किन्तु यदि वह पुष्करिणी में स्नान करता है, तो उसे उस नरक में नहीं गिराया जाता। जो डाकू मार्ग पर बैठकर विष देता है, गाँवों को जलाता है,

श्लोक 35 (skanda.2.12.35)

वणिग्द्रव्यापहारी च स परत्र द्विजोत्तमाः । वज्रदंष्ट्राभिधे घोरे पात्यते नरके चिरम् ।

vaṇigdravyāpahārī ca sa paratra dvijottamāḥ vajradaṁṣṭrābhidhe ghore pātyate narake ciram

या व्यापारियों का माल लूटता है, वह परलोक में, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, घोर वज्रदंष्ट्र नामक नरक में दीर्घकाल तक गिराया जाता है।

श्लोक 36 (skanda.2.12.36)

स्नाति चेत्स्वामितीर्थे तु तस्मिन्नासौ निपात्यते । विद्यन्ते यानि चान्यानि नरकाणि परत्र वै ।

snāti cetsvāmitīrthe tu tasminnāsau nipātyate vidyante yāni cānyāni narakāṇi paratra vai

किन्तु यदि वह स्वामितीर्थ में स्नान करता है, तो उसे उस नरक में नहीं गिराया जाता। परलोक में जो भी अन्य नरक विद्यमान हैं,

श्लोक 37 (skanda.2.12.37)

तानि नाप्नोति मनुजः स्वामितीर्थनिमज्जनात् । पुष्करिण्यां सकृत्स्नानादश्वमेधफलं लभेत् ।

tāni nāpnoti manujaḥ svāmitīrthanimajjanāt puṣkariṇyāṁ sakṛtsnānādaśvamedhaphalaṁ labhet

उन्हें भी मनुष्य स्वामितीर्थ में डुबकी लगाने से नहीं भोगता। पुष्करिणी में एक बार स्नान करने से अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है,

श्लोक 38 (skanda.2.12.38)

आत्मविद्या भवेत्साक्षान्मुक्तिश्चापि चतुर्विधा । न पापे रमते बुद्धिर्न भवेदुःखमेव वा ।

ātmavidyā bhavetsākṣānmuktiścāpi caturvidhā na pāpe ramate buddhirna bhaveduḥkhameva vā

आत्म-विद्या साक्षात् प्राप्त हो जाती है, और चार प्रकार की मुक्ति भी मिलती है। बुद्धि पाप में रमण नहीं करती, और दुःख भी नहीं होता।

श्लोक 39 (skanda.2.12.39)

तुलापुरुषदानेन यत्फलं लभ्यते नरैः । तत्फलं लभ्यते पुम्भिः स्वामितीर्थनिमज्जनात् ।

tulāpuruṣadānena yatphalaṁ labhyate naraiḥ tatphalaṁ labhyate pumbhiḥ svāmitīrthanimajjanāt

तुला-पुरुष दान से मनुष्यों को जो फल मिलता है, वही फल पुरुषों को स्वामितीर्थ में डुबकी लगाने से प्राप्त होता है।

श्लोक 40 (skanda.2.12.40)

गोसहस्रप्रदानेन यत्पुण्यं हि भवेन्नृणाम् । तत्पुण्यं लभते मर्त्यः स्वामितीर्थनिमजनात् ।

gosahasrapradānena yatpuṇyaṁ hi bhavennṛṇām tatpuṇyaṁ labhate martyaḥ svāmitīrthanimajanāt

हज़ार गायों के दान से मनुष्यों को जो पुण्य होता है, वही पुण्य मनुष्य को स्वामितीर्थ में डुबकी लगाने से प्राप्त होता है।

श्लोक 41 (skanda.2.12.41)

धर्मार्थकाममोक्षाणां यं यमिच्छति पूरुषः । तं तं सद्यः समाप्नोति स्वामितीर्थनिमज्जनात् ।

dharmārthakāmamokṣāṇāṁ yaṁ yamicchati pūruṣaḥ taṁ taṁ sadyaḥ samāpnoti svāmitīrthanimajjanāt

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष में से पुरुष जिस-जिस की कामना करता है, उसे उसे स्वामितीर्थ में डुबकी लगाने से तत्काल प्राप्त हो जाता है।

श्लोक 42 (skanda.2.12.42)

महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः । सद्यः पूतो भवेद्विप्राः स्वामितीर्थनिमज्जनात् ।

mahāpātakayukto vā yukto vā sarvapātakaiḥ sadyaḥ pūto bhavedviprāḥ svāmitīrthanimajjanāt

चाहे वह महापातकों से युक्त हो, या समस्त पापों से युक्त हो, हे विप्रो, वह तुरंत ही पवित्र हो जाता है, स्वामितीर्थ में डुबकी लगाने से।

श्लोक 43 (skanda.2.12.43)

प्रज्ञा लक्ष्मीर्यशः संपज्ज्ञानं धर्मो विरक्तता । मनःशुद्धिर्भवेन्नृणां स्वामितीर्थनिषेवणात् ।

prajñā lakṣmīryaśaḥ saṁpajjñānaṁ dharmo viraktatā manaḥśuddhirbhavennṛṇāṁ svāmitīrthaniṣevaṇāt

बुद्धि, लक्ष्मी, यश, संपत्ति, ज्ञान, धर्म, वैराग्य और मन की शुद्धि — ये सब मनुष्यों को स्वामितीर्थ की सेवा से प्राप्त होते हैं।

श्लोक 44 (skanda.2.12.44)

ब्रह्महत्याऽयुतं चापि सुरापानायुतं तथा । अयुतं गुरुदाराणां गमनं पापकारिणाम् ।

brahmahatyā'yutaṁ cāpi surāpānāyutaṁ tathā ayutaṁ gurudārāṇāṁ gamanaṁ pāpakāriṇām

दस हज़ार ब्रह्महत्याएँ, दस हज़ार सुरापान, दस हज़ार गुरु-पत्नी-गमन के पापकर्म,

श्लोक 45 (skanda.2.12.45)

स्तेयायुतं सुवर्णानां तत्संसर्गाश्च कोटिशः । शीघ्रं विलयमायान्ति स्वामितीर्थनिमज्जनात् ।

steyāyutaṁ suvarṇānāṁ tatsaṁsargāśca koṭiśaḥ śīghraṁ vilayamāyānti svāmitīrthanimajjanāt

दस हज़ार स्वर्ण-चोरियाँ, और करोड़ों ऐसे संसर्ग-दोष — ये सब स्वामितीर्थ में डुबकी लगाने से शीघ्र ही नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 46 (skanda.2.12.46)

ब्रह्महत्यासमानानि सुरापानसमानि च । गुरुस्त्रीगमनेनापि यानि तुल्यानि चास्तिकाः ।

brahmahatyāsamānāni surāpānasamāni ca gurustrīgamanenāpi yāni tulyāni cāstikāḥ

हे आस्तिको! जो भी पाप ब्रह्महत्या के समान हैं, सुरापान के समान हैं, गुरु-पत्नी-गमन के तुल्य हैं,

श्लोक 47 (skanda.2.12.47)

सुवर्णस्तेयतुल्यानि तत्संसर्गसमानि च । तानि सर्वाणि नश्यन्ति स्वामितीर्थनिमज्जनात् ।

suvarṇasteyatulyāni tatsaṁsargasamāni ca tāni sarvāṇi naśyanti svāmitīrthanimajjanāt

स्वर्ण-चोरी के तुल्य हैं, या उस संसर्ग-दोष के समान हैं — वे सभी स्वामितीर्थ में डुबकी लगाने से नष्ट हो जाते हैं।

श्लोक 48 (skanda.2.12.48)

उक्तेष्वेतेषु सन्देहो न कर्त्तव्यः कदाचन । जिह्वाग्रे परशुं तप्तं प्रक्षिपंति च किंकराः ।

ukteṣveteṣu sandeho na karttavyaḥ kadācana jihvāgre paraśuṁ taptaṁ prakṣipaṁti ca kiṁkarāḥ

इन कही गई बातों में कभी संदेह नहीं करना चाहिए, क्योंकि यमदूत तप्त फरसा जीभ के अगले सिरे पर रख देते हैं,

श्लोक 49 (skanda.2.12.49)

अर्थवादमिमं सर्वं ब्रुवन्वै नरकं व्रजेत् । सूकरः स हि विज्ञेयः सर्वकर्मबहिष्कृतः ।

arthavādamimaṁ sarvaṁ bruvanvai narakaṁ vrajet sūkaraḥ sa hi vijñeyaḥ sarvakarmabahiṣkṛtaḥ

उसके लिए, जो इस सम्पूर्ण [महिमा] को अर्थवाद (केवल प्रशंसात्मक अतिशयोक्ति) कहता हुआ नरक में जाता है। वह मनुष्य निश्चय ही सूअर के समान जानना चाहिए, जो समस्त धर्म-कर्मों से बहिष्कृत है।

श्लोक 50 (skanda.2.12.50)

अहो मौर्ख्यमहो मौर्ख्यमहो मौर्ख्यं द्विजोत्तमाः । स्वामितीर्थाभिधे तीर्थे सर्वपातकनाशने ।

aho maurkhyamaho maurkhyamaho maurkhyaṁ dvijottamāḥ svāmitīrthābhidhe tīrthe sarvapātakanāśane

अहो, कैसी मूर्खता है, कैसी मूर्खता है, कैसी मूर्खता है, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, कि स्वामितीर्थ नामक इस तीर्थ के, जो समस्त पापों का नाशक है,

श्लोक 51 (skanda.2.12.51)

अद्वैतज्ञानदे पुंसां भुक्तिमुक्तिप्रदायिनि । इष्टकामप्रदे नित्यं तथैवाज्ञाननाशने ।

advaitajñānade puṁsāṁ bhuktimuktipradāyini iṣṭakāmaprade nityaṁ tathaivājñānanāśane

जो मनुष्यों को अद्वैत-ज्ञान देता है, भुक्ति और मुक्ति दोनों प्रदान करता है, सदा इच्छित कामनाओं को पूर्ण करता है, तथा अज्ञान का नाशक है,

श्लोक 52 (skanda.2.12.52)

स्थितेऽपि तद्विहायायं रमतेन्यत्र वै जनः । अहो मोहस्य माहात्म्यं मया वक्तुं न शक्यते ।

sthite'pi tadvihāyāyaṁ ramatenyatra vai janaḥ aho mohasya māhātmyaṁ mayā vaktuṁ na śakyate

उसके स्थित रहते हुए भी, इस मनुष्य को छोड़कर, वह अन्यत्र ही रमण करता है। अहो, मोह की यह महिमा मुझसे कही ही नहीं जा सकती!

श्लोक 53 (skanda.2.12.53)

स्नातस्य स्वामितीर्थे तु नान्तकाद्भयमस्ति वै । स्वामितीर्थं च पश्यंति तत्र स्नांति च ये नराः ।

snātasya svāmitīrthe tu nāntakādbhayamasti vai svāmitīrthaṁ ca paśyaṁti tatra snāṁti ca ye narāḥ

स्वामितीर्थ में स्नान करने वाले को मृत्यु का भी भय नहीं रहता। जो मनुष्य स्वामितीर्थ को देखते हैं, वहाँ स्नान करते हैं,

श्लोक 54 (skanda.2.12.54)

स्तुवन्ति च प्रशंसंति स्पृशंति च नमन्ति च । न पिबन्ति हि ते स्तन्यं मातॄणां द्विजपुंगवाः ।

stuvanti ca praśaṁsaṁti spṛśaṁti ca namanti ca na pibanti hi te stanyaṁ mātṝṇāṁ dvijapuṁgavāḥ

जो इसकी स्तुति और प्रशंसा करते हैं, इसका स्पर्श करते हैं और इसे प्रणाम करते हैं, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो — वे फिर कभी माताओं का स्तन-पान नहीं करते (अर्थात् पुनर्जन्म नहीं लेते)।

श्लोक 55 (skanda.2.12.55)

एवं वः कथितं विप्राः स्वामितीर्थस्य वैभवम् । भुक्तिमुक्तिप्रदं नृणां सर्वपापनिबर्हणम् ।

evaṁ vaḥ kathitaṁ viprāḥ svāmitīrthasya vaibhavam bhuktimuktipradaṁ nṛṇāṁ sarvapāpanibarhaṇam

इस प्रकार, हे विप्रो, मैंने तुम्हें स्वामितीर्थ का यह वैभव कह सुनाया, जो मनुष्यों को भोग और मोक्ष दोनों प्रदान करने वाला तथा समस्त पापों का नाश करने वाला है।

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