वैष्णव खण्ड · अध्याय 13
धर्मगुप्त-उन्माद एवं स्वामिपुष्करिणी में निवृत्ति
श्लोक 1 (skanda.2.13.1)
श्रीसूत उवाच । भूयोपि संप्रवक्ष्यामि स्वामितीर्थस्य वैभवम् । युष्माकमादरेणाऽहं नैमिषारण्यवासिनः ।
śrīsūta uvāca bhūyopi saṁpravakṣyāmi svāmitīrthasya vaibhavam yuṣmākamādareṇā'haṁ naimiṣāraṇyavāsinaḥ
श्री सूत ने कहा — हे नैमिषारण्य-निवासियो! तुम्हारे आदर के कारण मैं फिर से स्वामितीर्थ का यह वैभव कहूँगा।
श्लोक 2 (skanda.2.13.2)
नन्दोनाम महाराजः सोमवंशसमुद्भवः । धर्मेण पालयामास सागरान्तां धरामिमाम् ।
nandonāma mahārājaḥ somavaṁśasamudbhavaḥ dharmeṇa pālayāmāsa sāgarāntāṁ dharāmimām
सोमवंश में उत्पन्न नंद नामक एक महाराज सागर-पर्यंत इस पृथ्वी का धर्मपूर्वक पालन करता था।
श्लोक 3 (skanda.2.13.3)
तस्य पुत्रः समभवद्धर्मगुप्त इति स्मृतः । राज्यरक्षाधुरं नन्दो निजपुत्रे निधाय सः ।
tasya putraḥ samabhavaddharmagupta iti smṛtaḥ rājyarakṣādhuraṁ nando nijaputre nidhāya saḥ
उसका एक पुत्र था, जो धर्मगुप्त नाम से जाना जाता था। नंद ने राज्य-रक्षा का भार अपने पुत्र को सौंपकर,
श्लोक 4 (skanda.2.13.4)
जितेंद्रियो जिताहारः प्रविवेश तपोवनम् । ताते तपोवनं याते धर्मगुप्ताभिधो नृपः ।
jiteṁdriyo jitāhāraḥ praviveśa tapovanam tāte tapovanaṁ yāte dharmaguptābhidho nṛpaḥ
इंद्रियों और आहार दोनों को जीतकर तपोवन में प्रवेश किया। पिता के तपोवन चले जाने पर, धर्मगुप्त नाम का वह राजा,
श्लोक 5 (skanda.2.13.5)
मेदिनीं पालयामास धर्मज्ञो नीतितत्परः । ईजे वहुविधैर्यज्ञैर्देवानिन्द्र पुरोगमान् ।
medinīṁ pālayāmāsa dharmajño nītitatparaḥ īje vahuvidhairyajñairdevānindra purogamān
धर्मज्ञ और नीति में तत्पर होकर पृथ्वी का पालन करने लगा। उसने इंद्र आदि देवताओं के लिए विविध यज्ञ किए,
श्लोक 6 (skanda.2.13.6)
ब्राह्मणानां ददौ वित्तं क्षेत्राणि च बहूनि सः । सर्वे स्वधर्मनिरतास्तस्मिन्राजनि शासति ।
brāhmaṇānāṁ dadau vittaṁ kṣetrāṇi ca bahūni saḥ sarve svadharmaniratāstasminrājani śāsati
ब्राह्मणों को धन और अनेक भूमियाँ दान कीं। उस राजा के शासन में सभी लोग अपने-अपने धर्म में तत्पर रहते थे,
श्लोक 7 (skanda.2.13.7)
कदाचिन्नाभवन्पीडास्तस्मिंश्चोरादिसंभवाः । कदाचिद्धर्मगुप्तोऽयमारुह्य तुरगोत्तमम् ।
kadācinnābhavanpīḍāstasmiṁścorādisaṁbhavāḥ kadāciddharmagupto'yamāruhya turagottamam
और उसके राज्य में चोरों आदि से उत्पन्न कोई भी पीड़ा कभी नहीं हुई। एक बार यह धर्मगुप्त एक श्रेष्ठ अश्व पर सवार होकर,
श्लोक 8 (skanda.2.13.8)
वनं विवेश विप्रेंद्रा मृगयारसकौतुकी । तमालतालहिन्तालकुरवाकुलदिङ्मुखे ।
vanaṁ viveśa vipreṁdrā mṛgayārasakautukī tamālatālahintālakuravākuladiṅmukhe
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! शिकार के आनंद में उत्सुक होकर एक वन में प्रवेश किया, जो सभी दिशाओं में ताड़, हिंताल और तमाल वृक्षों से भरा था,
श्लोक 9 (skanda.2.13.9)
विचचार वने तस्मिन्सिंसहव्याघ्रभयानके । मत्तालिकुलसन्नादसंमूर्च्छितदिगन्तरे ।
vicacāra vane tasminsiṁsahavyāghrabhayānake mattālikulasannādasaṁmūrcchitadigantare
और सिंहों तथा व्याघ्रों से भयावह उस वन में विचरण करने लगा, जहाँ मतवाले भ्रमरों के समूहों की गूँज से दिशाएँ मूर्च्छित हो रही थीं,
श्लोक 10 (skanda.2.13.10)
पद्मकल्हारकुमुदनीलोत्पलवनाकुले । तटाके रससंपूर्णे तपस्विजनमण्डिते ।
padmakalhārakumudanīlotpalavanākule taṭāke rasasaṁpūrṇe tapasvijanamaṇḍite
जो कमल, कह्लार, कुमुद और नीलकमल के वनों से भरा था, और जहाँ रस से परिपूर्ण, तपस्वीजनों से सुशोभित एक सरोवर था।
श्लोक 11 (skanda.2.13.11)
तस्मिन्वने सञ्चरतो धर्मगुप्तस्य भूपतेः । अभूद्विभावरी विप्रास्तमसावृतदिङ्मुखा ।
tasminvane sañcarato dharmaguptasya bhūpateḥ abhūdvibhāvarī viprāstamasāvṛtadiṅmukhā
उस वन में विचरण करते हुए राजा धर्मगुप्त के लिए, हे विप्रो, रात्रि हो गई, जिसने दिशाओं के मुख अंधकार से ढँक दिए।
श्लोक 12 (skanda.2.13.12)
राजाऽपि पश्चिमां सन्ध्यामुपास्य विनयान्वितः । जजाप च वने तत्र गायत्रीं वेदमातरम् ।
rājā'pi paścimāṁ sandhyāmupāsya vinayānvitaḥ jajāpa ca vane tatra gāyatrīṁ vedamātaram
विनयशील राजा ने सायं-संध्या की उपासना करके, उस वन में वेद-माता गायत्री का जप किया।
श्लोक 13 (skanda.2.13.13)
सिंहव्याघ्रादिभीत्यास्मिन्वृक्षमेकं समाश्रिते । राजपुत्रे तदभ्याशमृक्षः सिंहभयार्दितः ।
siṁhavyāghrādibhītyāsminvṛkṣamekaṁ samāśrite rājaputre tadabhyāśamṛkṣaḥ siṁhabhayārditaḥ
सिंह-व्याघ्र आदि के भय से उस राजकुमार ने एक वृक्ष का आश्रय लिया। उसी वृक्ष के निकट सिंह के भय से पीड़ित एक भालू भी,
श्लोक 14 (skanda.2.13.14)
अन्वधावत वृक्षं तमेकः सिंहो वनेचरः । अनुद्रुतः स सिंहेन ऋक्षो वृक्षमुपारुहत् ।
anvadhāvata vṛkṣaṁ tamekaḥ siṁho vanecaraḥ anudrutaḥ sa siṁhena ṛkṣo vṛkṣamupāruhat
उस वन-विचरणशील एक सिंह द्वारा पीछा किया जा रहा था। सिंह द्वारा पीछा किए जाने पर वह भालू भी उसी वृक्ष पर चढ़ गया।
श्लोक 15 (skanda.2.13.15)
आरुह्य ऋक्षो वृक्षं तं ददर्श जगतीपतिम् । वृक्षस्थितं महात्मानं महाबलपराक्रमम् ।
āruhya ṛkṣo vṛkṣaṁ taṁ dadarśa jagatīpatim vṛkṣasthitaṁ mahātmānaṁ mahābalaparākramam
वृक्ष पर चढ़कर भालू ने उस पृथ्वीपति को देखा — वृक्ष पर स्थित उस महाबली, महापराक्रमी, महात्मा को।
श्लोक 16 (skanda.2.13.16)
उवाच भूपतिं दृष्ट्वा ऋक्षोयं वनगोचरः । मा भीतिं कुरु राजेंद्र वत्स्यावो रजनीमिह ।
uvāca bhūpatiṁ dṛṣṭvā ṛkṣoyaṁ vanagocaraḥ mā bhītiṁ kuru rājeṁdra vatsyāvo rajanīmiha
राजा को देखकर उस वन-चर भालू ने कहा, 'हे राजेन्द्र! डरो मत, हम दोनों यहीं यह रात बिताएँगे।
श्लोक 17 (skanda.2.13.17)
महासत्त्वो महाकायो महादंष्ट्रसमाकुलः । वृक्षमूलं समायातः सिंहोऽयमतिभीषणः ।
mahāsattvo mahākāyo mahādaṁṣṭrasamākulaḥ vṛkṣamūlaṁ samāyātaḥ siṁho'yamatibhīṣaṇaḥ
महाबली, विशालकाय, विशाल दाढ़ों वाला यह अत्यंत भयंकर सिंह वृक्ष की जड़ में आ पहुँचा है।
श्लोक 18 (skanda.2.13.18)
रात्र्यर्धं भज निद्रां त्वं रक्ष्यमाणो मयोद्यतः । ततः प्रसुप्तं मां रक्ष शर्वर्यर्धं महामते ।
rātryardhaṁ bhaja nidrāṁ tvaṁ rakṣyamāṇo mayodyataḥ tataḥ prasuptaṁ māṁ rakṣa śarvaryardhaṁ mahāmate
तुम रात्रि के पहले आधे भाग में सो जाओ, मैं जाग कर तुम्हारी रक्षा करूँगा। फिर, हे महामते, रात्रि के दूसरे आधे भाग में सोए हुए मेरी तुम रक्षा करना।'
श्लोक 19 (skanda.2.13.19)
इति तद्वाक्यमाकर्ण्य सुप्ते नन्दसुते हरिः । प्रोवाच ऋक्षं सुप्तोऽयं नृपो मे त्यज्यतामिति ।
iti tadvākyamākarṇya supte nandasute hariḥ provāca ṛkṣaṁ supto'yaṁ nṛpo me tyajyatāmiti
यह वचन सुनकर, नंद के पुत्र के सो जाने पर, उस भालू से हरि ने [अर्थात् वह सिंह] कहा, 'यह राजा सो गया है, इसे मेरे लिए त्याग दो।'
श्लोक 20 (skanda.2.13.20)
तं सिंहमब्रवीदृक्षो धर्मज्ञो द्विजसत्तमाः । भवान्धर्मं न जानीते मृगराज वनेचर ।
taṁ siṁhamabravīdṛkṣo dharmajño dvijasattamāḥ bhavāndharmaṁ na jānīte mṛgarāja vanecara
तब उस धर्मज्ञ भालू ने उस सिंह से कहा, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, 'हे मृगराज, हे वनचर! आप धर्म को नहीं जानते।
श्लोक 21 (skanda.2.13.21)
विश्वासघातिनां लोके महाकष्टं भवत्यहो । न हि मित्रद्रुहां पापं नश्येद्यज्ञायुतैरपि ।
viśvāsaghātināṁ loke mahākaṣṭaṁ bhavatyaho na hi mitradruhāṁ pāpaṁ naśyedyajñāyutairapi
संसार में विश्वासघातियों को महान कष्ट भोगना पड़ता है। मित्र से द्रोह करने वालों का पाप दस हज़ार यज्ञों से भी नष्ट नहीं होता।
श्लोक 22 (skanda.2.13.22)
ब्रह्महत्यादिपापानां कथञ्चिन्निष्कृतिर्भवेत् । विश्वासघातिनां पापं न नश्येज्जन्मकोटिभिः ।
brahmahatyādipāpānāṁ kathañcinniṣkṛtirbhavet viśvāsaghātināṁ pāpaṁ na naśyejjanmakoṭibhiḥ
ब्रह्महत्या आदि पापों का किसी न किसी प्रकार प्रायश्चित हो जाता है, किन्तु विश्वासघातियों का पाप करोड़ों जन्मों में भी नष्ट नहीं होता।
श्लोक 23 (skanda.2.13.23)
नाहं मेरुं महाभारं मन्ये पञ्चास्य भूतले । महाभारमिमं मन्ये लोकविश्वासघातकम् ।
nāhaṁ meruṁ mahābhāraṁ manye pañcāsya bhūtale mahābhāramimaṁ manye lokaviśvāsaghātakam
मैं इस पृथ्वी पर मेरु पर्वत को भी उतना भारी नहीं मानता, जितना भारी मैं इस संसार के विश्वासघातक को मानता हूँ।'
श्लोक 24 (skanda.2.13.24)
एवमुक्तोऽथ ऋक्षेण सिंहस्तूष्णीं बभूव ह । धर्मगुप्ते प्रबुद्धे तु ऋक्षः सुष्वाप भूरुहे ।
evamukto'tha ṛkṣeṇa siṁhastūṣṇīṁ babhūva ha dharmagupte prabuddhe tu ṛkṣaḥ suṣvāpa bhūruhe
भालू द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर सिंह चुप हो गया। धर्मगुप्त के जाग जाने पर, भालू उस वृक्ष पर सो गया।
श्लोक 25 (skanda.2.13.25)
ततः सिंहोऽब्रवीद्भूपमेनमृक्षं त्यजस्व मे । एवमुक्तोऽथ सिंहेन राजा सुप्तमशंकितः ।
tataḥ siṁho'bravīdbhūpamenamṛkṣaṁ tyajasva me evamukto'tha siṁhena rājā suptamaśaṁkitaḥ
तब सिंह ने उस राजा से कहा, 'इस भालू को मेरे लिए त्याग दो।' सिंह द्वारा ऐसा कहे जाने पर, निडर होकर राजा ने,
श्लोक 26 (skanda.2.13.26)
स्वांकन्यस्तशिरस्कं तमृक्षं तत्याज भूतले । पात्यमानस्ततो राज्ञा समालम्बितपादपः ।
svāṁkanyastaśiraskaṁ tamṛkṣaṁ tatyāja bhūtale pātyamānastato rājñā samālambitapādapaḥ
अपनी गोद में सिर रखे सोए हुए उस भालू को पृथ्वी पर गिरा दिया। राजा द्वारा गिराए जाने पर, गिरते हुए भी वह भालू,
श्लोक 27 (skanda.2.13.27)
ऋक्षः पुण्यवशाद्वृक्षान्न पपात महीतले । स ऋक्षो नृपमभ्येत्य कोपाद्वाक्यमभाषत ।
ṛkṣaḥ puṇyavaśādvṛkṣānna papāta mahītale sa ṛkṣo nṛpamabhyetya kopādvākyamabhāṣata
अपने पुण्य के प्रताप से एक शाखा को पकड़ लेने के कारण वृक्ष से भूमि पर नहीं गिरा। वह भालू राजा के पास आकर क्रोधपूर्वक बोला —
श्लोक 28 (skanda.2.13.28)
कामरूपधरो राजन्नहं भृगुकुलोद्भवः । ध्यानकाष्ठाभिधो नाम्ना ऋक्षरूपमधारयम् ।
kāmarūpadharo rājannahaṁ bhṛgukulodbhavaḥ dhyānakāṣṭhābhidho nāmnā ṛkṣarūpamadhārayam
'हे राजन्! मैं इच्छानुसार रूप धारण करने वाला, भृगु-कुल में उत्पन्न, ध्यानकाष्ठ नामक एक मुनि हूँ, जिसने भालू का रूप धारण कर रखा था।
श्लोक 29 (skanda.2.13.29)
कस्मादनागसं सुप्तमत्याक्षीन्मां भवान्नृप । मच्छापादतिशीघ्रं त्वमुन्मत्तश्चर भूतले ।
kasmādanāgasaṁ suptamatyākṣīnmāṁ bhavānnṛpa macchāpādatiśīghraṁ tvamunmattaścara bhūtale
निर्दोष होकर सोए हुए मुझे तुमने किसलिए त्याग दिया, हे राजन्? मेरे शाप से तुम अभी से ही उन्मत्त होकर इस पृथ्वी पर भटकोगे।'
श्लोक 30 (skanda.2.13.30)
इति शप्त्वा मुनिर्भूपं ततः सिंहमभाषत । न सिंहस्त्वं महायक्षः कुबेरसचिवः पुरा ।
iti śaptvā munirbhūpaṁ tataḥ siṁhamabhāṣata na siṁhastvaṁ mahāyakṣaḥ kuberasacivaḥ purā
इस प्रकार राजा को शाप देकर, मुनि ने फिर सिंह से कहा, 'तुम सिंह नहीं हो, तुम पहले महायक्ष कुबेर के मंत्री थे।
श्लोक 31 (skanda.2.13.31)
हिमवद्गिरिमासाद्य कदाचित्तं वधूसखः । अज्ञानाद्गौतमाभ्याशे विहारमतनोर्मुदा ।
himavadgirimāsādya kadācittaṁ vadhūsakhaḥ ajñānādgautamābhyāśe vihāramatanormudā
एक बार हिमवान पर्वत पर पहुँचकर, अपनी पत्नी के साथ, अज्ञानवश गौतम मुनि के आश्रम के निकट ही, तुम आनंदपूर्वक विहार करने लगे।
श्लोक 32 (skanda.2.13.32)
गौतमोऽप्युटजाद्दैवात्समिदाहरणाय वै । निर्गतस्त्वां विवसनं दृष्ट्वा शापमुदाहरत् ।
gautamo'pyuṭajāddaivātsamidāharaṇāya vai nirgatastvāṁ vivasanaṁ dṛṣṭvā śāpamudāharat
गौतम भी दैववश समिधा लाने के लिए अपनी कुटिया से बाहर निकले, और तुम्हें [अपनी पत्नी सहित] नग्न देखकर उन्होंने यह शाप दिया —
श्लोक 33 (skanda.2.13.33)
यस्मान्ममाश्रमेऽद्य त्वं विवस्त्रः स्थितवानसि । अतः सिंहत्वमद्यैव भविता ते न संशयः ।
yasmānmamāśrame'dya tvaṁ vivastraḥ sthitavānasi ataḥ siṁhatvamadyaiva bhavitā te na saṁśayaḥ
'चूँकि आज तुम मेरे आश्रम में नग्न अवस्था में खड़े हुए हो, इसी कारण आज ही, निश्चय ही, तुम सिंह बन जाओगे।'
श्लोक 34 (skanda.2.13.34)
इति गौतमशापेन सिंहत्वमगमत्पुरा । कुबेरसचिवो यक्षो भद्रनामा भवान्पुरा ।
iti gautamaśāpena siṁhatvamagamatpurā kuberasacivo yakṣo bhadranāmā bhavānpurā
इस प्रकार गौतम के शाप से तुम पहले सिंह बन गए। तुम पहले कुबेर के मंत्री, भद्र नामक यक्ष थे,
श्लोक 35 (skanda.2.13.35)
कुबेरो धर्मशीलो हि तद्भृत्याश्च तथैव हि । अतः किमर्थं त्वं हंसि मामृषिं वनगोचरम् ।
kubero dharmaśīlo hi tadbhṛtyāśca tathaiva hi ataḥ kimarthaṁ tvaṁ haṁsi māmṛṣiṁ vanagocaram
और कुबेर स्वयं धर्मशील है, और उसके सेवक भी उसी प्रकार धर्मशील होते हैं। तो फिर तुम क्यों मुझ वन-निवासी ऋषि को मारना चाहते थे?
श्लोक 36 (skanda.2.13.36)
एतत्सर्वमहं ध्यानाज्जानामि हि मृगाधिप । इत्युक्तो ध्यानकाष्ठेन त्यक्त्वा सिंहत्वमाशु सः ।
etatsarvamahaṁ dhyānājjānāmi hi mṛgādhipa ityukto dhyānakāṣṭhena tyaktvā siṁhatvamāśu saḥ
हे मृगाधिप! यह सब मैं ध्यान से जानता हूँ।' ध्यानकाष्ठ द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, वह सिंह अपनी सिंह-योनि को शीघ्र त्यागकर,
श्लोक 37 (skanda.2.13.37)
यक्षरूपं गतो दिव्यं कुबेरसचिवात्मकम् । ध्यानकाष्ठमसावाह प्रांजलिः प्रणतो मुनिम् ।
yakṣarūpaṁ gato divyaṁ kuberasacivātmakam dhyānakāṣṭhamasāvāha prāṁjaliḥ praṇato munim
कुबेर के मंत्री के दिव्य यक्ष-रूप को प्राप्त हुआ। उस यक्ष ने हाथ जोड़कर मुनि ध्यानकाष्ठ को प्रणाम करते हुए कहा —
श्लोक 38 (skanda.2.13.38)
अद्य ज्ञातं मया सर्वं पूर्ववृत्तं महामुने । गौतमः शापकाले मे शापान्तमपि चोक्तवान् ।
adya jñātaṁ mayā sarvaṁ pūrvavṛttaṁ mahāmune gautamaḥ śāpakāle me śāpāntamapi coktavān
'हे महामुने! आज मुझे यह सब पूर्ववृत्तांत ज्ञात हो गया। गौतम ने शाप देते समय ही शाप के अंत की बात भी कही थी —
श्लोक 39 (skanda.2.13.39)
ध्यानकाष्ठेन संवाद ऋक्षरूपेण ते यदा । तदा निर्धूय सिंहत्वं यक्षरूपमवाप्स्यसि ।
dhyānakāṣṭhena saṁvāda ṛkṣarūpeṇa te yadā tadā nirdhūya siṁhatvaṁ yakṣarūpamavāpsyasi
कि जब भालू के रूप में तुम्हारा ध्यानकाष्ठ से संवाद होगा, तब सिंह-भाव को त्यागकर तुम यक्ष-रूप को पुनः प्राप्त कर लोगे।
श्लोक 40 (skanda.2.13.40)
इति मामब्रवीद्ब्रह्मन्गौतमो मुनिपुङ्गवः । अद्य सिंहत्वनाशान्मे जानामि त्वां महामुने ।
iti māmabravīdbrahmangautamo munipuṅgavaḥ adya siṁhatvanāśānme jānāmi tvāṁ mahāmune
ऐसा गौतम मुनि ने मुझसे, हे ब्रह्मन्, कहा था। आज अपने सिंहत्व के नाश से मैं जान गया हूँ कि आप वही शुद्ध,
श्लोक 41 (skanda.2.13.41)
ध्यानकाष्ठाभिधं शुद्धं कामरूपधरं सदा । इत्युक्त्वा तं प्रणम्याथ ध्यानकाष्ठं स यक्षराट् ।
dhyānakāṣṭhābhidhaṁ śuddhaṁ kāmarūpadharaṁ sadā ityuktvā taṁ praṇamyātha dhyānakāṣṭhaṁ sa yakṣarāṭ
सदा इच्छानुसार रूप धारण करने वाले ध्यानकाष्ठ नामक मुनि हैं।' इतना कहकर, उस ध्यानकाष्ठ को प्रणाम करके, वह यक्षराज,
श्लोक 42 (skanda.2.13.42)
विमानवरमारुह्य प्रययावलकापुरीम् । उन्मत्तरूपं तं दृष्ट्वा मन्त्रिणस्तु नृपोत्तमम् ।
vimānavaramāruhya prayayāvalakāpurīm unmattarūpaṁ taṁ dṛṣṭvā mantriṇastu nṛpottamam
श्रेष्ठ विमान पर सवार होकर अलकापुरी को चला गया। उस उन्मत्त-रूप वाले श्रेष्ठ राजा को देखकर, उसके मंत्री,
श्लोक 43 (skanda.2.13.43)
पितुः सकाशमानिन्यू रेवातीरे नृपोत्तमम् । तस्मै निवेदयामासुर्मतिभ्रंशं सुतस्य च ।
pituḥ sakāśamāninyū revātīre nṛpottamam tasmai nivedayāmāsurmatibhraṁśaṁ sutasya ca
उस श्रेष्ठ राजा को रेवा नदी के तट पर उसके पिता के पास ले गए, और उन्हें पुत्र की बुद्धि-भ्रंश की बात निवेदन की।
श्लोक 44 (skanda.2.13.44)
ज्ञात्वा तु पुत्रवृत्तान्तं पिता वै नंदनस्तदा ।
jñātvā tu putravṛttāntaṁ pitā vai naṁdanastadā
पुत्र का यह समाचार जानकर पिता नंद तब [अत्यंत दुखी हुआ] —
श्लोक 45 (skanda.2.13.45)
पुत्रमादाय सहसा जैमिनेरन्तिकं ययौ । तस्मै निवेदयामास पुत्रवृत्तान्तमादितः ।
putramādāya sahasā jaiminerantikaṁ yayau tasmai nivedayāmāsa putravṛttāntamāditaḥ
अपने पुत्र को साथ लेकर वह तुरंत मुनि जैमिनि के पास गया, और उन्हें आदि से लेकर पुत्र का सारा वृत्तांत निवेदन किया।
श्लोक 46 (skanda.2.13.46)
भगवञ्जैमिने पुत्रो ममाद्योन्मत्ततां गतः । अस्योन्मादविनाशाय ब्रूह्युपायं महामुने ।
bhagavañjaimine putro mamādyonmattatāṁ gataḥ asyonmādavināśāya brūhyupāyaṁ mahāmune
'हे भगवन् जैमिनि! मेरा पुत्र आज उन्मत्त हो गया है। हे महामुने! इसके उन्माद के नाश का कोई उपाय बताइए।'
श्लोक 47 (skanda.2.13.47)
इति पृष्टश्चिरं दध्यौ जैमिनिर्मुनिपुंगवः । ध्यात्वा तु सुचिरं कालं नृपनन्दनमब्रवीत् ।
iti pṛṣṭaściraṁ dadhyau jaiminirmunipuṁgavaḥ dhyātvā tu suciraṁ kālaṁ nṛpanandanamabravīt
इस प्रकार पूछे जाने पर मुनिश्रेष्ठ जैमिनि बहुत देर तक ध्यानमग्न रहे। बहुत समय तक ध्यान करके उन्होंने उस राजपुत्र से कहा —
श्लोक 48 (skanda.2.13.48)
ध्यानकाष्ठस्य शापेन ह्युन्मत्तस्ते सुतोऽभवत् । तस्य शापस्य मोक्षार्थमुपायं प्रब्रवीमि ते ।
dhyānakāṣṭhasya śāpena hyunmattaste suto'bhavat tasya śāpasya mokṣārthamupāyaṁ prabravīmi te
'ध्यानकाष्ठ के शाप से ही तुम्हारा पुत्र उन्मत्त हुआ है। उस शाप से मुक्ति का उपाय मैं तुम्हें बताता हूँ।
श्लोक 49 (skanda.2.13.49)
सुवर्णमुखरीतीरे वेंकटेनाम पर्वते । सर्वपापहरे पुण्ये नानाधातुविनिर्मिते ।
suvarṇamukharītīre veṁkaṭenāma parvate sarvapāpahare puṇye nānādhātuvinirmite
सुवर्णमुखरी नदी के तट पर, वेंकट नामक पर्वत पर, जो समस्त पापों को हरने वाला, पुण्यमय और विविध धातुओं से बना है,
श्लोक 50 (skanda.2.13.50)
स्वामिपुष्करिणी चेति तीर्थमस्ति महत्तरम् । पवित्राणां पवित्रं हि मंगलानां च मंगलम् ।
svāmipuṣkariṇī ceti tīrthamasti mahattaram pavitrāṇāṁ pavitraṁ hi maṁgalānāṁ ca maṁgalam
वहाँ स्वामिपुष्करिणी नामक एक महान तीर्थ है, जो सभी पवित्र वस्तुओं में परम पवित्र और सभी मंगलों में परम मंगल है।
श्लोक 51 (skanda.2.13.51)
श्रुतिसिद्धं महापुण्यं ब्रह्महत्यादिशोधकम् । नीत्वा तत्र सुतं तेऽद्य स्नापयस्व महामते ।
śrutisiddhaṁ mahāpuṇyaṁ brahmahatyādiśodhakam nītvā tatra sutaṁ te'dya snāpayasva mahāmate
जो वेद-सिद्ध, अत्यंत पुण्यमय, और ब्रह्महत्या आदि पापों का शोधक है — अपने पुत्र को आज वहाँ ले जाकर, हे महामते, स्नान कराओ।
श्लोक 52 (skanda.2.13.52)
उन्मादस्तत्क्षणादेव तस्य नश्येन्न संशयः । इत्युक्तस्तं प्रणम्यासौ जैमिनिं मुनिपुंगवम् ।
unmādastatkṣaṇādeva tasya naśyenna saṁśayaḥ ityuktastaṁ praṇamyāsau jaiminiṁ munipuṁgavam
उसका उन्माद उसी क्षण नष्ट हो जाएगा, इसमें कोई संदेह नहीं है।' यह सुनकर, मुनिश्रेष्ठ जैमिनि को प्रणाम करके,
श्लोक 53 (skanda.2.13.53)
नन्दः पुत्रं समादाय स्वामिपुष्करिणीं ययौ । तत्र च स्नापयामास पुत्रं नियमपूर्वकम् ।
nandaḥ putraṁ samādāya svāmipuṣkariṇīṁ yayau tatra ca snāpayāmāsa putraṁ niyamapūrvakam
नंद अपने पुत्र को साथ लेकर स्वामिपुष्करिणी गया, और वहाँ विधिपूर्वक अपने पुत्र को स्नान कराया।
श्लोक 54 (skanda.2.13.54)
स्नानमात्रात्ततः सद्यो नष्टोन्मादोऽभवत्सुतः । स्वयं सस्नौ स नन्दोऽपि स्वामिपुष्करिणीजले ।
snānamātrāttataḥ sadyo naṣṭonmādo'bhavatsutaḥ svayaṁ sasnau sa nando'pi svāmipuṣkariṇījale
स्नान करते ही तत्काल उसके पुत्र का उन्माद नष्ट हो गया। नंद ने स्वयं भी स्वामिपुष्करिणी के जल में स्नान किया।
श्लोक 55 (skanda.2.13.55)
उषित्वा दिनमेकं तु सहपुत्रः पिता तदा । सेवित्वा वेंकटेशं च श्रीनिवासं कृपानिधिम् ।
uṣitvā dinamekaṁ tu sahaputraḥ pitā tadā sevitvā veṁkaṭeśaṁ ca śrīnivāsaṁ kṛpānidhim
एक दिन वहाँ ठहरकर, पिता और पुत्र दोनों ने कृपानिधि वेंकटेश श्रीनिवास की सेवा की।
श्लोक 56 (skanda.2.13.56)
पुत्रमापृच्छ्य नन्दस्तं प्रययौ तपसे वनम् । गते पितरि पुत्रोऽपि धर्मगुप्तो नृपो द्विजाः ।
putramāpṛcchya nandastaṁ prayayau tapase vanam gate pitari putro'pi dharmagupto nṛpo dvijāḥ
नंद ने पुत्र से अनुमति लेकर तप के लिए वन को प्रस्थान किया। पिता के चले जाने पर, हे विप्रो, पुत्र धर्मगुप्त राजा ने,
श्लोक 57 (skanda.2.13.57)
प्रददौ वेंकटेशस्य बहुवित्तानि भक्तितः । ब्राह्मणेभ्यो धनं धान्यं क्षेत्राणि च ददौ तदा ।
pradadau veṁkaṭeśasya bahuvittāni bhaktitaḥ brāhmaṇebhyo dhanaṁ dhānyaṁ kṣetrāṇi ca dadau tadā
वेंकटेश को भक्तिपूर्वक बहुत सा धन अर्पित किया, और ब्राह्मणों को धन, धान्य और अनेक भूमियाँ दान कीं।
श्लोक 58 (skanda.2.13.58)
प्रययौ मन्त्रिभिः सार्धं स्वां पुरीं तदनन्तरम् । धर्मेण पालयामास राज्यं निहतकण्टकम् ।
prayayau mantribhiḥ sārdhaṁ svāṁ purīṁ tadanantaram dharmeṇa pālayāmāsa rājyaṁ nihatakaṇṭakam
इसके बाद वह मंत्रियों सहित अपनी नगरी को लौट गया, और शत्रुओं से रहित राज्य का धर्मपूर्वक पालन करने लगा।
श्लोक 59 (skanda.2.13.59)
पितृपैतामहं विप्रा धर्मगुप्तोतिधार्मिकः । उन्मादैरप्यपस्मारैर्ग्रहैर्दुष्टैश्च ये नराः ।
pitṛpaitāmahaṁ viprā dharmaguptotidhārmikaḥ unmādairapyapasmārairgrahairduṣṭaiśca ye narāḥ
हे विप्रो! यह पिता और पितामह की परंपरा से चला आ रहा अत्यंत धार्मिक धर्मगुप्त का वृत्तांत है। जो लोग उन्माद, अपस्मार या दुष्ट ग्रहों से,
श्लोक 60 (skanda.2.13.60)
ग्रस्ता भवन्ति विप्रेन्द्रास्तेऽपि चात्र निमज्जनात् । पुष्करिण्यां विमुक्ताः स्युः सत्यं सत्यं वदाम्यहम् ।
grastā bhavanti viprendrāste'pi cātra nimajjanāt puṣkariṇyāṁ vimuktāḥ syuḥ satyaṁ satyaṁ vadāmyaham
ग्रस्त हो जाते हैं, हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो, वे भी यहाँ इस पुष्करिणी में डुबकी लगाने मात्र से मुक्त हो जाते हैं। मैं सत्य ही, सत्य ही कह रहा हूँ।
श्लोक 61 (skanda.2.13.61)
स्वामिपुष्करिणीं त्यक्त्वा तीर्थमन्यद्व्रजेत्तु यः । स्निग्धं स गोपयस्त्यक्त्वा स्नुहीक्षीरं प्रयाचते ।
svāmipuṣkariṇīṁ tyaktvā tīrthamanyadvrajettu yaḥ snigdhaṁ sa gopayastyaktvā snuhīkṣīraṁ prayācate
जो स्वामिपुष्करिणी को छोड़कर किसी अन्य तीर्थ में जाता है, वह मानो स्निग्ध गोदुग्ध को त्यागकर स्नुही (एक विषैले पौधे) के दूध की याचना करता है।
श्लोक 62 (skanda.2.13.62)
स्वामितीर्थं स्वामितीर्थं स्वामितीर्थमिति द्विजाः । त्रिःपठन्तो नरा एवं यत्र क्वापि जलाशये ।
svāmitīrthaṁ svāmitīrthaṁ svāmitīrthamiti dvijāḥ triḥpaṭhanto narā evaṁ yatra kvāpi jalāśaye
हे द्विजो! 'स्वामितीर्थ, स्वामितीर्थ, स्वामितीर्थ' — इस प्रकार तीन बार पढ़ते हुए मनुष्य जिस किसी भी जलाशय में,
श्लोक 63 (skanda.2.13.63)
स्नांति सर्वे नरास्ते वै यास्यन्ति ब्रह्मणः पदम् । एवं वः कथिता विप्रा धर्मगुप्तकथा शुभा ।
snāṁti sarve narāste vai yāsyanti brahmaṇaḥ padam evaṁ vaḥ kathitā viprā dharmaguptakathā śubhā
स्नान करते हैं, वे सभी मनुष्य ब्रह्मा के पद को प्राप्त होते हैं। इस प्रकार, हे विप्रो, मैंने तुम्हें धर्मगुप्त की यह शुभ कथा कह सुनाई,
श्लोक 64 (skanda.2.13.64)
यस्याः श्रवणमात्रेण ब्रह्महत्या विनश्यति ।
yasyāḥ śravaṇamātreṇa brahmahatyā vinaśyati
जिसके श्रवण मात्र से ब्रह्महत्या का पाप भी नष्ट हो जाता है।