वैष्णव खण्ड · अध्याय 14
सुमति-पतन एवं स्वामिपुष्करिणी में शुद्धि
श्लोक 1 (skanda.2.14.1)
श्रीसूत उवाच । भोभोस्तपोधनाः सर्वे नैमिषारण्यवासिनः । स्वामितीर्थस्य माहात्म्यं भूयोऽपि प्रवदाम्यहम् ।
śrīsūta uvāca bhobhostapodhanāḥ sarve naimiṣāraṇyavāsinaḥ svāmitīrthasya māhātmyaṁ bhūyo'pi pravadāmyaham
श्री सूत ने कहा — हे नैमिषारण्य-निवासी तपोधनो! मैं फिर से स्वामितीर्थ की महिमा तुम्हें कहूँगा।
श्लोक 2 (skanda.2.14.2)
पुरा किरातीसंसर्गात्सुमतिर्ब्राह्मणः सुराम् । पीतवान्पुष्करिण्यां स स्नात्वा पापाद्विमोचितः ।
purā kirātīsaṁsargātsumatirbrāhmaṇaḥ surām pītavānpuṣkariṇyāṁ sa snātvā pāpādvimocitaḥ
पूर्वकाल में एक किरात-स्त्री के संसर्ग से सुमति नामक ब्राह्मण ने मदिरा पी ली थी; उसने पुष्करिणी में स्नान करके उस पाप से मुक्ति पाई।
श्लोक 3 (skanda.2.14.3)
ऋषय ऊचुः । सुमतिः कस्य पुत्रोऽसौ कथं स च सुरां पपौ । कथं किरात्यासक्तोऽभूत्सूत पौराणिकोत्तम ।
ṛṣaya ūcuḥ sumatiḥ kasya putro'sau kathaṁ sa ca surāṁ papau kathaṁ kirātyāsakto'bhūtsūta paurāṇikottama
ऋषियों ने कहा — हे श्रेष्ठ पौराणिक सूत! वह सुमति किसका पुत्र था, वह मदिरा कैसे पी बैठा, और वह किरात-स्त्री में कैसे आसक्त हुआ?
श्लोक 4 (skanda.2.14.4)
सर्वेषां विस्तरादेतद्वद त्वं कृपयाधुना ।
sarveṣāṁ vistarādetadvada tvaṁ kṛpayādhunā
कृपा करके अब यह सब हमें विस्तार से बताइए।
श्लोक 5 (skanda.2.14.5)
श्रीसूत उवाच । महाराष्ट्राभिधे देशे ब्राह्मणः कश्चिदास्तिकः । यज्ञदेव इति ख्यातो वेदवेदांगपारगः ।
śrīsūta uvāca mahārāṣṭrābhidhe deśe brāhmaṇaḥ kaścidāstikaḥ yajñadeva iti khyāto vedavedāṁgapāragaḥ
श्री सूत ने कहा — महाराष्ट्र नामक देश में यज्ञदेव नाम से विख्यात, वेद-वेदांगों में पारंगत, आस्तिक बुद्धि वाला एक ब्राह्मण था,
श्लोक 6 (skanda.2.14.6)
दयालुरातिथेयश्च शिवनारायणार्चकः । सुमतिर्नामपुत्रोऽभूद्यज्ञदेवस्य तस्य वै ।
dayālurātitheyaśca śivanārāyaṇārcakaḥ sumatirnāmaputro'bhūdyajñadevasya tasya vai
दयालु, अतिथियों का सत्कार करने वाला, शिव और नारायण का उपासक। उस यज्ञदेव का सुमति नाम का एक पुत्र था।
श्लोक 7 (skanda.2.14.7)
पितरं स परित्यज्य भार्यामपि पतिव्रताम् । प्रययावुत्कले देशे विटगोष्ठीपरायणः ।
pitaraṁ sa parityajya bhāryāmapi pativratām prayayāvutkale deśe viṭagoṣṭhīparāyaṇaḥ
वह अपने पिता को और अपनी पतिव्रता पत्नी को भी त्यागकर, दुष्ट संगति में रत होकर उत्कल देश को चला गया।
श्लोक 8 (skanda.2.14.8)
काचित्किराती तद्देशे वसन्ती युवमोहनी । यूनां समस्तद्रव्याणि प्रलोभ्य जगृहे चिरम् ।
kācitkirātī taddeśe vasantī yuvamohanī yūnāṁ samastadravyāṇi pralobhya jagṛhe ciram
उस देश में युवकों को मोहित करने वाली एक किरात-स्त्री रहती थी, जो युवकों को लुभाकर उनका सारा धन चिरकाल तक हड़प लेती थी।
श्लोक 9 (skanda.2.14.9)
तस्या गृहं स प्रययौ सुमतिर्ब्राह्मणाधमः । सुमतिं सा च जग्राह किराती निर्धनं द्विजम् ।
tasyā gṛhaṁ sa prayayau sumatirbrāhmaṇādhamaḥ sumatiṁ sā ca jagrāha kirātī nirdhanaṁ dvijam
वह अधम ब्राह्मण सुमति उसके घर चला गया, और उस किरात-स्त्री ने उस निर्धन ब्राह्मण सुमति को अपने वश में कर लिया।
श्लोक 10 (skanda.2.14.10)
तया युक्तोऽथ सुमतिस्तत्संयोगैकतत्परः । इतस्ततश्चोरयित्वा बहुद्रव्याणि सन्ततम् ।
tayā yukto'tha sumatistatsaṁyogaikatatparaḥ itastataścorayitvā bahudravyāṇi santatam
तब सुमति उसी में तत्पर होकर, उससे जुड़े रहकर, इधर-उधर से निरंतर बहुत सा धन चुराकर,
श्लोक 11 (skanda.2.14.11)
दत्त्वा तया चिरं रेमे तद्गृहे बुभुजे च सः । एकेन चषकेणासौ तया सह सुरां पपौ ।
dattvā tayā ciraṁ reme tadgṛhe bubhuje ca saḥ ekena caṣakeṇāsau tayā saha surāṁ papau
वह धन उसे देकर उसी के घर में चिरकाल तक रमण करता और भोग भोगता रहा। वह एक ही पात्र से उसके साथ मदिरा पीने लगा।
श्लोक 12 (skanda.2.14.12)
एवं स बहुकालं वै रममाणस्तया सह । पितरौ निजपत्नीं च नास्मरद्विषयातुरः ।
evaṁ sa bahukālaṁ vai ramamāṇastayā saha pitarau nijapatnīṁ ca nāsmaradviṣayāturaḥ
इस प्रकार वह बहुत काल तक उसके साथ रमण करते हुए, विषय-भोगों में आसक्त होकर, अपने माता-पिता और अपनी पत्नी को भी भूल गया।
श्लोक 13 (skanda.2.14.13)
स कदाचित्किरातैस्तु चौर्यं कर्तुं ययौ सह । विप्रस्य कस्यचिद्गेहे सोऽपि कैरातवेषभृत् ।
sa kadācitkirātaistu cauryaṁ kartuṁ yayau saha viprasya kasyacidgehe so'pi kairātaveṣabhṛt
एक बार वह किरातों के साथ चोरी करने के लिए किसी ब्राह्मण के घर गया, किरात का वेश धारण किए हुए।
श्लोक 14 (skanda.2.14.14)
ययौ चोरयितुं द्रव्यं साहसी खङ्गहस्तवान् । तद्गृहस्वामिनं विप्रं हत्वा खङ्गेन साहसात् ।
yayau corayituṁ dravyaṁ sāhasī khaṅgahastavān tadgṛhasvāminaṁ vipraṁ hatvā khaṅgena sāhasāt
तलवार हाथ में लिए, साहसपूर्वक धन चुराने गया वह, उस घर के स्वामी ब्राह्मण को साहस के साथ तलवार से मारकर,
श्लोक 15 (skanda.2.14.15)
समादाय बहु द्रव्यं किरातीभवनं ययौ । तं यान्तमनुयाति स्म ब्रह्महत्या भयंकरी ।
samādāya bahu dravyaṁ kirātībhavanaṁ yayau taṁ yāntamanuyāti sma brahmahatyā bhayaṁkarī
बहुत सा धन लेकर उस किरात-स्त्री के घर चला गया। जाते हुए उसके पीछे-पीछे भयंकर ब्रह्महत्या [स्वयं मूर्त रूप में] चल पड़ी,
श्लोक 16 (skanda.2.14.16)
नीलवस्त्रधरा भीमा भृशं रक्तशिरोरुहा । गर्जन्ती साट्टहासं सा कम्पयन्ती च रोदसी ।
nīlavastradharā bhīmā bhṛśaṁ raktaśiroruhā garjantī sāṭṭahāsaṁ sā kampayantī ca rodasī
नीले वस्त्र धारण किए, भयानक, अत्यंत लाल केशों वाली, अट्टहास के साथ गर्जना करती हुई, और दोनों लोकों को कंपा देने वाली।
श्लोक 17 (skanda.2.14.17)
अनुद्रुतस्तया सोऽयं बभ्राम जगतीतले । एवं भ्रमन्भुवं सर्वां कदाचित्सुमतिः स्वयम् ।
anudrutastayā so'yaṁ babhrāma jagatītale evaṁ bhramanbhuvaṁ sarvāṁ kadācitsumatiḥ svayam
उसके पीछा किए जाने पर वह इस पृथ्वी पर भटकने लगा। इस प्रकार सारी पृथ्वी पर भटकते हुए, एक दिन सुमति स्वयं,
श्लोक 18 (skanda.2.14.18)
स्वग्रामं प्रययौ भीत्या विप्रबन्धुर्दुरात्मवान् । अनुद्रुतस्तया भीतः प्रययौ स्वगृहं प्रति ।
svagrāmaṁ prayayau bhītyā viprabandhurdurātmavān anudrutastayā bhītaḥ prayayau svagṛhaṁ prati
भय से अपने ही गाँव को चला गया, वह ब्राह्मण-कुल में जन्मा दुरात्मा। उसके द्वारा पीछा किए जाने के भय से वह अपने ही घर की ओर चला।
श्लोक 19 (skanda.2.14.19)
ब्रह्महत्याप्यनुद्रुत्य तेन साकं गृहं ययौ । पितरं रक्षरक्षेति सुमतिः शरणं ययौ ।
brahmahatyāpyanudrutya tena sākaṁ gṛhaṁ yayau pitaraṁ rakṣarakṣeti sumatiḥ śaraṇaṁ yayau
ब्रह्महत्या भी उसका पीछा करते हुए उसी के साथ उस घर में जा पहुँची। 'पिता जी, रक्षा करो, रक्षा करो' कहते हुए सुमति ने अपने पिता की शरण ली।
श्लोक 20 (skanda.2.14.20)
मा भैषीरिति तं प्रोच्य पिता रक्षितुमुद्यतः । तदानीं ब्रह्महत्येयं तत्तातं प्रत्यभाषत ।
mā bhaiṣīriti taṁ procya pitā rakṣitumudyataḥ tadānīṁ brahmahatyeyaṁ tattātaṁ pratyabhāṣata
'डरो मत' कहकर पिता ने उसकी रक्षा करने का निश्चय किया। तभी उस ब्रह्महत्या ने उसके पिता से कहा —
श्लोक 21 (skanda.2.14.21)
ब्रह्महत्योवाच । मैव त्वं प्रतिगृह्णीष्व यज्ञदेव द्विजोत्तम । असौ सुरापी स्तेयी च ब्रह्महा चातिपातकी ।
brahmahatyovāca maiva tvaṁ pratigṛhṇīṣva yajñadeva dvijottama asau surāpī steyī ca brahmahā cātipātakī
ब्रह्महत्या ने कहा — 'हे श्रेष्ठ द्विज यज्ञदेव! इसे स्वीकार मत करो। यह मदिरापायी, चोर, ब्रह्महत्यारा और अत्यंत पापी है,
श्लोक 22 (skanda.2.14.22)
मातृद्रोही पितृद्रोही भार्यात्यागी च पातकी । किरातीसंगदुष्टश्च ह्येनं मुंच दुरात्मकम् ।
mātṛdrohī pitṛdrohī bhāryātyāgī ca pātakī kirātīsaṁgaduṣṭaśca hyenaṁ muṁca durātmakam
माता का द्रोही, पिता का द्रोही, पत्नी को त्यागने वाला पापी और किरात-स्त्री के संग से दूषित है — इस दुरात्मा को त्याग दो।
श्लोक 23 (skanda.2.14.23)
गृह्णासि चेदिमं विप्र महापातकिनं सुतम् । त्वद्भार्यामस्य भार्यां च त्वां च पुत्रमिमं द्विज ।
gṛhṇāsi cedimaṁ vipra mahāpātakinaṁ sutam tvadbhāryāmasya bhāryāṁ ca tvāṁ ca putramimaṁ dvija
हे विप्र! यदि तुम इस महापातकी पुत्र को स्वीकार करते हो, तो हे द्विज! तुम्हारी पत्नी को, इसकी पत्नी को, तुम्हें, और इस पुत्र को,
श्लोक 24 (skanda.2.14.24)
भक्षयिष्यामि वंशं च तस्मान्मुञ्च सुतं त्विमम् । इमं त्यजसि चेत्पुत्रं युष्मान्मुचांमि सांप्रतम् ।
bhakṣayiṣyāmi vaṁśaṁ ca tasmānmuñca sutaṁ tvimam imaṁ tyajasi cetputraṁ yuṣmānmucāṁmi sāṁpratam
और तुम्हारे समस्त वंश को मैं भस्म कर दूँगी। इसलिए इस पुत्र को त्याग दो। यदि तुम इस पुत्र को त्याग दो, तो मैं तुम सबको अभी छोड़ दूँगी।
श्लोक 25 (skanda.2.14.25)
नैकस्यार्थे कुलं हन्तुमर्हसि त्वं महामते । इत्युक्तः स तया तत्र यज्ञदेवोऽब्रवीच्च ताम् ।
naikasyārthe kulaṁ hantumarhasi tvaṁ mahāmate ityuktaḥ sa tayā tatra yajñadevo'bravīcca tām
हे महामते! एक ही व्यक्ति के लिए तुम्हें अपना पूरा कुल नष्ट नहीं करना चाहिए।' इस प्रकार उसके द्वारा कहे जाने पर यज्ञदेव ने उससे कहा —
श्लोक 26 (skanda.2.14.26)
यज्ञदेव उवाच । बाधते मां सुतस्नेहः कथमेनं परित्यजे । ब्रह्महत्या तदाकर्ण्य द्विजोक्तं तमभाषत ।
yajñadeva uvāca bādhate māṁ sutasnehaḥ kathamenaṁ parityaje brahmahatyā tadākarṇya dvijoktaṁ tamabhāṣata
यज्ञदेव ने कहा — 'पुत्र के प्रति स्नेह मुझे रोकता है; मैं इसे कैसे त्याग दूँ?' यह सुनकर ब्रह्महत्या ने उस ब्राह्मण से कहा —
श्लोक 27 (skanda.2.14.27)
ब्रह्महत्योवाच । अयं हि पतितो भूत्वा वर्णाश्रम बहिष्कृतः । पुत्रेस्मिन्मा कुरु स्नेहं निन्दितं चास्य दर्शनम् ।
brahmahatyovāca ayaṁ hi patito bhūtvā varṇāśrama bahiṣkṛtaḥ putresminmā kuru snehaṁ ninditaṁ cāsya darśanam
ब्रह्महत्या ने कहा — 'यह तो पतित हो चुका है, वर्णाश्रम से बहिष्कृत हो चुका है। इस पुत्र के प्रति स्नेह मत रखो — इसका दर्शन भी निंदित है।'
श्लोक 28 (skanda.2.14.28)
इत्युक्त्वा ब्रह्महत्या सा यज्ञदेवस्य पश्यतः । तलेन प्रजहारास्य पुत्रं सुमतिनामकम् ।
ityuktvā brahmahatyā sā yajñadevasya paśyataḥ talena prajahārāsya putraṁ sumatināmakam
ऐसा कहकर, यज्ञदेव के देखते-देखते ही, उस ब्रह्महत्या ने सुमति नामक उस पुत्र को अपनी हथेली से पीट दिया।
श्लोक 29 (skanda.2.14.29)
रुरोद ताततातेति पितरं प्रब्रुवन्मुहुः ।
ruroda tātatāteti pitaraṁ prabruvanmuhuḥ
वह बार-बार 'हे पिता, हे पिता' कहते हुए अपने पिता को पुकारता हुआ रो पड़ा।
श्लोक 30 (skanda.2.14.30)
रुरु दुर्जनको माता भार्यापि सुमतेस्तदा । एतस्मिन्नंतरे तत्र दुर्वासाः शंकरांशकः ।
ruru durjanako mātā bhāryāpi sumatestadā etasminnaṁtare tatra durvāsāḥ śaṁkarāṁśakaḥ
सुमति के बुरे भाग्य के कारण उसकी माता और पत्नी भी विलाप करने लगीं। इसी बीच वहाँ शंकर के अंश से उत्पन्न दुर्वासा मुनि,
श्लोक 31 (skanda.2.14.31)
दिष्ट्या समाययौ योगी धार्मिको मुनिसत्तमः । यज्ञदेवोऽथ तं दृष्ट्वा मुनिं रुद्रावतारकम् ।
diṣṭyā samāyayau yogī dhārmiko munisattamaḥ yajñadevo'tha taṁ dṛṣṭvā muniṁ rudrāvatārakam
एक योगी, धार्मिक और श्रेष्ठ मुनि, सौभाग्य से वहाँ आ पहुँचे। यज्ञदेव ने उन रुद्र के अवतार मुनि को देखकर,
श्लोक 32 (skanda.2.14.32)
स्तुत्वा प्रणम्य शरणं ययाचे पुत्रकारणात् । दुर्वासास्त्वं महायोगिन्साक्षाद्वै शंकरांशकः ।
stutvā praṇamya śaraṇaṁ yayāce putrakāraṇāt durvāsāstvaṁ mahāyoginsākṣādvai śaṁkarāṁśakaḥ
उनकी स्तुति और प्रणाम करके, अपने पुत्र के लिए उनकी शरण माँगी — 'हे महायोगी दुर्वासा! तुम साक्षात् शंकर के ही अंश हो;
श्लोक 33 (skanda.2.14.33)
त्वद्दर्शनमपुण्यानां भविता न कदाचन । ब्रह्महा च सुरापी च स्तेयी चाभूत्सुतो मम ।
tvaddarśanamapuṇyānāṁ bhavitā na kadācana brahmahā ca surāpī ca steyī cābhūtsuto mama
जो पुण्यहीन हैं, उन्हें तुम्हारा दर्शन कभी प्राप्त नहीं होता। मेरा पुत्र ब्रह्महत्यारा, मदिरापायी और चोर बन गया है,
श्लोक 34 (skanda.2.14.34)
एनं प्रहर्तुमायाता ब्रह्महत्यापि वर्तते । स्याद्यथा मे पुत्रोऽयं महापातकमोचितः ।
enaṁ prahartumāyātā brahmahatyāpi vartate syādyathā me putro'yaṁ mahāpātakamocitaḥ
और उसे मारने के लिए यह ब्रह्महत्या भी यहाँ उपस्थित है। मेरा यह पुत्र इस महापाप से जिस प्रकार भी मुक्त हो सके,
श्लोक 35 (skanda.2.14.35)
घोरा च ब्रह्महत्येयं यथा शीघ्रं लयं व्रजेत् । तमुपायं वदस्वाद्य मम पुत्रे दयां कुरु ।
ghorā ca brahmahatyeyaṁ yathā śīghraṁ layaṁ vrajet tamupāyaṁ vadasvādya mama putre dayāṁ kuru
और यह भयंकर ब्रह्महत्या भी जिस प्रकार शीघ्र नष्ट हो जाए, वह उपाय आज बताओ — मेरे पुत्र पर दया करो।
श्लोक 36 (skanda.2.14.36)
अयमेव हि पुत्रो मे नान्योऽस्ति तनयो मुने । अस्मिन्मृते तु वंशो मे समुच्छिद्येत मूलतः ।
ayameva hi putro me nānyo'sti tanayo mune asminmṛte tu vaṁśo me samucchidyeta mūlataḥ
हे मुने! यही मेरा एकमात्र पुत्र है, मेरा कोई अन्य संतान नहीं है। इसके मरने पर मेरा वंश जड़ से ही उखड़ जाएगा,
श्लोक 37 (skanda.2.14.37)
ततः पितृभ्यः पिण्डानां दातापि न भवेद्ध्रुवम् । ततः कृपां कुरुष्व त्वमस्मासु भगवन्मुने ।
tataḥ pitṛbhyaḥ piṇḍānāṁ dātāpi na bhaveddhruvam tataḥ kṛpāṁ kuruṣva tvamasmāsu bhagavanmune
और तब निश्चय ही पितरों को पिंड देने वाला भी कोई नहीं रह जाएगा। इसलिए, हे भगवन् मुने! हम पर कृपा कीजिए।'
श्लोक 38 (skanda.2.14.38)
इत्युक्तः स तदोवाच दुर्वासाः शंकरांशकः । ध्यात्वाथसुचिरं कालं यज्ञदेवं द्विजोत्तमम् ।
ityuktaḥ sa tadovāca durvāsāḥ śaṁkarāṁśakaḥ dhyātvāthasuciraṁ kālaṁ yajñadevaṁ dvijottamam
इस प्रकार कहे जाने पर, शंकर के अंश दुर्वासा ने, उस श्रेष्ठ ब्राह्मण यज्ञदेव के विषय में बहुत देर तक ध्यान करके, [उससे] कहा —
श्लोक 39 (skanda.2.14.39)
दुर्वासा उवाच । यज्ञदेवकृतं षापमतिदूर सुतेन ते । नास्य पापस्य शातिः स्यात्प्रायश्चित्तायुतैरपि ।
durvāsā uvāca yajñadevakṛtaṁ ṣāpamatidūra sutena te nāsya pāpasya śātiḥ syātprāyaścittāyutairapi
दुर्वासा ने कहा — 'यज्ञदेव! तुम्हारे पुत्र द्वारा किया गया यह पाप अत्यंत गंभीर है। इस पाप की शांति दस हज़ार प्रायश्चितों से भी संभव नहीं है।
श्लोक 40 (skanda.2.14.40)
तथापि ते सुतस्याहं तस्य पापस्य शान्तये । प्रायश्चित्तं वदिष्यामि शृणु नान्यमना द्विज ।
tathāpi te sutasyāhaṁ tasya pāpasya śāntaye prāyaścittaṁ vadiṣyāmi śṛṇu nānyamanā dvija
फिर भी, तुम्हारे इस पुत्र के उस पाप की शांति के लिए मैं तुम्हें एक प्रायश्चित बताता हूँ; ध्यान लगाकर सुनो, हे द्विज।
श्लोक 41 (skanda.2.14.41)
वेंकटाद्रौ महापुण्ये सर्वपातकनाशने । स्वामिपुष्करिणी चेति वर्तते मंगलप्रदा ।
veṁkaṭādrau mahāpuṇye sarvapātakanāśane svāmipuṣkariṇī ceti vartate maṁgalapradā
वेंकटाद्रि पर, जो अत्यंत पुण्यमय और समस्त पापों का नाशक है, स्वामिपुष्करिणी नामक एक मंगलदायी तीर्थ स्थित है।
श्लोक 42 (skanda.2.14.42)
स्नाति चेत्तव पुत्रोऽयं पातकान्मुच्यते क्षणात् । एवं श्रुत्वा मुनेर्वाक्यं यज्ञदेवो महामतिः ।
snāti cettava putro'yaṁ pātakānmucyate kṣaṇāt evaṁ śrutvā munervākyaṁ yajñadevo mahāmatiḥ
यदि तुम्हारा यह पुत्र वहाँ स्नान करता है, तो वह उसी क्षण अपने पापों से मुक्त हो जाएगा।' मुनि के इस वचन को सुनकर, उस महाबुद्धि यज्ञदेव ने,
श्लोक 43 (skanda.2.14.43)
पुत्रमादाय सुमतिं स्वामिपुष्करिणींगतः । स्नापयामास सुमतिं हत्यया पीडितं सुतम् ।
putramādāya sumatiṁ svāmipuṣkariṇīṁgataḥ snāpayāmāsa sumatiṁ hatyayā pīḍitaṁ sutam
अपने पुत्र सुमति को साथ लेकर स्वामिपुष्करिणी की यात्रा की, और ब्रह्महत्या से पीड़ित अपने पुत्र सुमति को वहाँ स्नान कराया।
श्लोक 44 (skanda.2.14.44)
आकाशवाणी तं विप्रमुवाच मधुरस्वरा । यज्ञदेव महाभाग स्नानेनानेन सुव्रत ।
ākāśavāṇī taṁ vipramuvāca madhurasvarā yajñadeva mahābhāga snānenānena suvrata
तब मधुर स्वर वाली एक आकाशवाणी ने उस ब्राह्मण से कहा, 'हे महाभाग, हे सुव्रत यज्ञदेव! इस स्नान से,
श्लोक 45 (skanda.2.14.45)
पूतोऽभवत्तव सुतः संशयं मा कृथा द्विज । एवंप्रभावं तत्तीर्थं पापवृक्षकुठारकम् ।
pūto'bhavattava sutaḥ saṁśayaṁ mā kṛthā dvija evaṁprabhāvaṁ tattīrthaṁ pāpavṛkṣakuṭhārakam
तुम्हारा पुत्र पवित्र हो गया है; इसमें संशय मत करो, हे द्विज। यह तीर्थ ऐसा ही प्रभावशाली है, मानो पाप-वृक्ष के लिए कुठार हो।
श्लोक 46 (skanda.2.14.46)
एवं वः कथितं विप्रा इतिहासं पुरातनम् । शृण्वतां पठतां चापि वाजपेयफलं लभेत् ।
evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā itihāsaṁ purātanam śṛṇvatāṁ paṭhatāṁ cāpi vājapeyaphalaṁ labhet
इस प्रकार, हे विप्रो, मैंने तुम्हें यह प्राचीन इतिहास कह सुनाया, जिसे सुनने और पढ़ने वालों को वाजपेय-यज्ञ का फल प्राप्त होता है।