वैष्णव खण्ड · अध्याय 15
कृष्णतीर्थ महिमा एवं रामकृष्ण मुनि
श्लोक 1 (skanda.2.15.1)
श्रीसूत उवाच । वेंकटाख्ये महापुण्ये सर्वपातकनाशने । कृष्णतीर्थस्य माहात्म्यं शृणुध्वं सुसमाहिताः ।
śrīsūta uvāca veṁkaṭākhye mahāpuṇye sarvapātakanāśane kṛṣṇatīrthasya māhātmyaṁ śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ
श्री सूत ने कहा — अत्यंत पुण्यमय, समस्त पापों का नाश करने वाले वेंकट नामक पर्वत पर, कृष्णतीर्थ की महिमा सुनो, एकाग्रचित्त होकर,
श्लोक 2 (skanda.2.15.2)
यत्र मज्जनमात्रेण कृतघ्नोऽपि विमुच्यते । पितॄन्मातॄर्गुरूंश्चावमन्यंते मोहमोहिताः ।
yatra majjanamātreṇa kṛtaghno'pi vimucyate pitṝnmātṝrgurūṁścāvamanyaṁte mohamohitāḥ
जहाँ केवल डुबकी लगाने मात्र से कृतघ्न व्यक्ति भी मुक्त हो जाता है। जो लोग मोह से मोहित होकर माता, पिता और गुरुओं का अपमान करते हैं,
श्लोक 3 (skanda.2.15.3)
ये चाप्यन्ये दुरात्मानः कृतघ्ना निरपत्रपाः । ते सर्वे कृष्णतीर्थेस्मिञ्छुद्ध्यन्ति स्नानमात्रतः ।
ye cāpyanye durātmānaḥ kṛtaghnā nirapatrapāḥ te sarve kṛṣṇatīrthesmiñchuddhyanti snānamātrataḥ
और अन्य जो भी दुरात्मा, कृतघ्न और निर्लज्ज हैं, वे सभी इस कृष्णतीर्थ में केवल स्नान करने मात्र से शुद्ध हो जाते हैं।
श्लोक 4 (skanda.2.15.4)
कृष्णनामा मुनिः पूर्वं वेंकटाहृयभूधरे । अवर्तत तपः कुर्वन्विष्णुं ध्यायन्समाहितः ।
kṛṣṇanāmā muniḥ pūrvaṁ veṁkaṭāhṛyabhūdhare avartata tapaḥ kurvanviṣṇuṁ dhyāyansamāhitaḥ
पूर्वकाल में कृष्ण नाम के एक मुनि, वेंकट नाम के इस पर्वत पर, एकाग्रचित्त होकर विष्णु का ध्यान करते हुए तप करते थे।
श्लोक 5 (skanda.2.15.5)
स तत्र कल्पयामास स्नानार्थं तीर्थमुत्तमम् । तत्र स्नात्वा सकृन्मर्त्यः कृतघ्नोऽपि विमुच्यते ।
sa tatra kalpayāmāsa snānārthaṁ tīrthamuttamam tatra snātvā sakṛnmartyaḥ kṛtaghno'pi vimucyate
उन्होंने वहाँ स्नान के लिए एक उत्तम तीर्थ की रचना की। वहाँ एक बार स्नान करके, कृतघ्न व्यक्ति भी मुक्त हो जाता है।
श्लोक 6 (skanda.2.15.6)
अत्रेतिहासं वक्ष्यामि पुराणं पापनाशनम् । यस्य श्रवणमात्रेण नरो मुक्तिमवाप्नुयात् ।
atretihāsaṁ vakṣyāmi purāṇaṁ pāpanāśanam yasya śravaṇamātreṇa naro muktimavāpnuyāt
यहाँ मैं एक प्राचीन, पाप-नाशक इतिहास कहूँगा, जिसके श्रवण मात्र से मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है।
श्लोक 7 (skanda.2.15.7)
पुरा बभूव विप्रेन्द्रो रामकृष्णो महामुनिः । सत्यवाञ्छीलवान्वाग्मी सर्वभूतदयान्वितः ।
purā babhūva viprendro rāmakṛṣṇo mahāmuniḥ satyavāñchīlavānvāgmī sarvabhūtadayānvitaḥ
पूर्वकाल में रामकृष्ण नामक एक श्रेष्ठ ब्राह्मण महामुनि हुए थे, जो सत्यवादी, सुशील, वाक्पटु और समस्त प्राणियों के प्रति दया से युक्त थे,
श्लोक 8 (skanda.2.15.8)
शत्रुमित्रसमो दान्तस्तपस्वी विजितेंद्रियः । परे ब्रह्मणि निष्णातो ब्रह्मतत्त्वैकसंश्रयः ।
śatrumitrasamo dāntastapasvī vijiteṁdriyaḥ pare brahmaṇi niṣṇāto brahmatattvaikasaṁśrayaḥ
शत्रु और मित्र में समभाव रखने वाले, संयमी, तपस्वी, इंद्रियों को जीतने वाले, परब्रह्म में लीन और ब्रह्म-तत्त्व के एकमात्र आश्रय।
श्लोक 9 (skanda.2.15.9)
एवंप्रभावः स मुनिस्तपस्तेपे सुदारुणम् । स वै निश्चलसर्वांगस्तिष्ठन्सर्वत्र भूतले ।
evaṁprabhāvaḥ sa munistapastepe sudāruṇam sa vai niścalasarvāṁgastiṣṭhansarvatra bhūtale
ऐसे महाप्रभाव वाले उस मुनि ने अत्यंत कठोर तप किया। वे अपने सम्पूर्ण अंगों को स्थिर करके, पृथ्वी पर सर्वत्र [ध्यानस्थ] रहते हुए,
श्लोक 10 (skanda.2.15.10)
परमाण्वन्तरं वापि न स्वस्थानाच्चचाल सः । स्थित्वा तत्र तपस्यंतमनेकशतवत्सरान् ।
paramāṇvantaraṁ vāpi na svasthānāccacāla saḥ sthitvā tatra tapasyaṁtamanekaśatavatsarān
एक परमाणु के बराबर भी अपने स्थान से नहीं हिले। वहाँ अनेक सौ वर्षों तक तप करते हुए स्थिर रहकर,
श्लोक 11 (skanda.2.15.11)
तं चाक्रमत वल्मीकं छादितांगं चकार वै । वल्मीकाक्रान्तदेहोऽपि रामकृष्णो महामुनिः ।
taṁ cākramata valmīkaṁ chāditāṁgaṁ cakāra vai valmīkākrāntadeho'pi rāmakṛṣṇo mahāmuniḥ
एक बाँबी ने उन्हें ढँक लिया और उनका पूरा शरीर आच्छादित कर दिया। शरीर के बाँबी से ढँक जाने पर भी वह महामुनि रामकृष्ण,
श्लोक 12 (skanda.2.15.12)
अकरोत्तप एवासौ वल्मीकं न त्वबुध्यत । तस्मिंश्च तप्यति तपो वासवो मुनिपुंगवे ।
akarottapa evāsau valmīkaṁ na tvabudhyata tasmiṁśca tapyati tapo vāsavo munipuṁgave
तप ही करते रहे, उन्हें इसका कुछ भी बोध न हुआ। उस मुनिश्रेष्ठ के तप करते समय, इंद्र ने,
श्लोक 13 (skanda.2.15.13)
विसृज्य मेघजालानि वर्षयामास वेगवान् । एवं दिनानि सप्तायं ववर्ष च निरन्तरम् ।
visṛjya meghajālāni varṣayāmāsa vegavān evaṁ dināni saptāyaṁ vavarṣa ca nirantaram
मेघों के समूह छोड़कर वेगपूर्वक वर्षा करने लगा। इस प्रकार सात दिनों तक वह निरंतर वर्षा करता रहा।
श्लोक 14 (skanda.2.15.14)
धारावर्षेण महता वृष्यमाणोपि वै मुनिः । तद्वर्षं प्रतिजग्राह निमीलितविलोचनः ।
dhārāvarṣeṇa mahatā vṛṣyamāṇopi vai muniḥ tadvarṣaṁ pratijagrāha nimīlitavilocanaḥ
उस महान मूसलाधार वर्षा से भीगते हुए भी वह मुनि, आँखें बंद किए हुए, उस वर्षा को सहन करते रहे।
श्लोक 15 (skanda.2.15.15)
महता स्तनितेनाशु तदा बधिरयन्छ्रुतीः । वल्मीकस्योपरिष्टाद्वै निपपात महाशनिः ।
mahatā stanitenāśu tadā badhirayanchrutīḥ valmīkasyopariṣṭādvai nipapāta mahāśaniḥ
तभी एक भीषण गर्जना के साथ, कानों को बहरा कर देने वाली, एक महान वज्र उस बाँबी के ऊपर आ गिरी।
श्लोक 16 (skanda.2.15.16)
तस्मिन्वर्षति पर्जन्ये शीतवातादिदुःसहे ।
tasminvarṣati parjanye śītavātādiduḥsahe
इस प्रकार मेघ के वर्षा करते समय, अत्यंत असह्य शीत-वायु आदि के मध्य,
श्लोक 17 (skanda.2.15.17)
वल्मीकशिखरं ध्वस्तं बभूवाशनिताडितम् । तदाप्रादुरभूद्देवः शङ्खचक्रगदाधरः ।
valmīkaśikharaṁ dhvastaṁ babhūvāśanitāḍitam tadāprādurabhūddevaḥ śaṅkhacakragadādharaḥ
वज्र से आहत होकर उस बाँबी का शिखर नष्ट हो गया। तभी शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले देव प्रकट हुए,
श्लोक 18 (skanda.2.15.18)
विनतानन्दनारूढो वनमालाविभूषितः । रामकृष्णस्य तपसा तोषितो वाक्यमब्रवीत् ।
vinatānandanārūḍho vanamālāvibhūṣitaḥ rāmakṛṣṇasya tapasā toṣito vākyamabravīt
विनता के पुत्र गरुड़ पर सवार, वनमाला से विभूषित, रामकृष्ण के तप से प्रसन्न होकर, उन्होंने यह वचन कहा —
श्लोक 19 (skanda.2.15.19)
तपोनिधे रामकृष्ण वेदशास्त्रार्थपारग । मदाविर्भावदिवसे यः स्नाति मनुजोत्तमः ।
taponidhe rāmakṛṣṇa vedaśāstrārthapāraga madāvirbhāvadivase yaḥ snāti manujottamaḥ
'हे तपोनिधि रामकृष्ण, हे वेद-शास्त्रों के अर्थ में पारंगत! जो श्रेष्ठ मनुष्य मेरे इस प्राकट्य के दिन यहाँ स्नान करेगा,
श्लोक 20 (skanda.2.15.20)
तस्य पुण्यफलं वक्तुं शेषेणापि न शक्यते । मकरस्थे रवौ विप्र पौर्णमास्यां महातिथौ ।
tasya puṇyaphalaṁ vaktuṁ śeṣeṇāpi na śakyate makarasthe ravau vipra paurṇamāsyāṁ mahātithau
उसके पुण्य-फल का वर्णन शेषनाग भी नहीं कर सकते। हे विप्र! सूर्य के मकर राशि में होने पर, पूर्णिमा की उस महातिथि पर,
श्लोक 21 (skanda.2.15.21)
पुष्यनक्षत्रयुक्तायां स्नानकालो विधीयते । तद्दिने स्नाति यो मर्त्यः कृष्णतीर्थं महामतिः ।
puṣyanakṣatrayuktāyāṁ snānakālo vidhīyate taddine snāti yo martyaḥ kṛṣṇatīrthaṁ mahāmatiḥ
पुष्य-नक्षत्र से युक्त उस समय, स्नान का काल निर्धारित किया गया है। उस दिन जो श्रेष्ठ बुद्धि वाला मनुष्य इस कृष्णतीर्थ में स्नान करता है,
श्लोक 22 (skanda.2.15.22)
सर्वपापविनिर्मुक्तः सर्वान्कामाँल्लभेत सः । मदाविर्भावदिवसे कृष्णतीर्थजले शुभे ।
sarvapāpavinirmuktaḥ sarvānkāmām̐llabheta saḥ madāvirbhāvadivase kṛṣṇatīrthajale śubhe
वह समस्त पापों से मुक्त होकर अपनी सभी कामनाओं को प्राप्त कर लेता है। मेरे प्राकट्य के दिन, इस शुभ कृष्णतीर्थ के जल में,
श्लोक 23 (skanda.2.15.23)
स्नातुं तत्र समायांति स्वपापपरिशुद्धये । देवा मनुष्याः सर्वे च दिक्पालाश्च महौजसः ।
snātuṁ tatra samāyāṁti svapāpapariśuddhaye devā manuṣyāḥ sarve ca dikpālāśca mahaujasaḥ
अपने पापों की शुद्धि के लिए स्नान करने के लिए वहाँ आते हैं — देवता, मनुष्य, और महातेजस्वी दिक्पाल, वे सब भी।
श्लोक 24 (skanda.2.15.24)
एते सर्वे महात्मानः कोटिसूर्यसमप्रभाः । ते सर्वे कृष्णतीर्थेस्मिन्स्नानात्पूता भवंति हि ।
ete sarve mahātmānaḥ koṭisūryasamaprabhāḥ te sarve kṛṣṇatīrthesminsnānātpūtā bhavaṁti hi
ये सभी महात्मा, करोड़ों सूर्यों के समान तेजस्वी, इस कृष्णतीर्थ में स्नान करने मात्र से पवित्र हो जाते हैं।
श्लोक 25 (skanda.2.15.25)
त्वन्नाम्नेदं महातीर्थं लोके प्रख्यातिमेष्यति । इत्युक्त्वा श्रीनिवासश्च तत्रैवान्तरधीयत ।
tvannāmnedaṁ mahātīrthaṁ loke prakhyātimeṣyati ityuktvā śrīnivāsaśca tatraivāntaradhīyata
तुम्हारे ही नाम से यह महातीर्थ संसार में विख्यात होगा।' ऐसा कहकर श्रीनिवास वहीं अंतर्धान हो गए।
श्लोक 26 (skanda.2.15.26)
एवं प्रभावं तत्तीर्थं महापापविशोधनम् । बुद्धिशुद्धिप्रदं पुसां सर्वैश्वर्यप्रदायकम् ।
evaṁ prabhāvaṁ tattīrthaṁ mahāpāpaviśodhanam buddhiśuddhipradaṁ pusāṁ sarvaiśvaryapradāyakam
इस प्रकार का प्रभाव रखने वाला वह तीर्थ महापापों को धोने वाला, मनुष्यों को बुद्धि की शुद्धि देने वाला और समस्त ऐश्वर्य प्रदान करने वाला है।
श्लोक 27 (skanda.2.15.27)
एवं वः कथितं विप्राः कृष्णतीर्थस्य वैभवम् । शृण्वतां पठतां चैव विष्णुलोकप्रदायकम् ।
evaṁ vaḥ kathitaṁ viprāḥ kṛṣṇatīrthasya vaibhavam śṛṇvatāṁ paṭhatāṁ caiva viṣṇulokapradāyakam
इस प्रकार, हे विप्रो, मैंने तुम्हें कृष्णतीर्थ का यह वैभव कह सुनाया, जो सुनने और पढ़ने वालों को विष्णुलोक प्रदान करने वाला है।