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वैष्णव खण्ड · अध्याय 16

जलदान महिमा: राजा हेमांग का गृहगोधिका जन्म

अध्याय 15अध्याय-सूचीअध्याय 17

श्लोक 1 (skanda.2.16.1)

अथ श्रीवेंकटाद्रौ जलदानप्रशंसा । श्रीसूत उवाच । वेंकटाख्ये महापुण्ये तृषार्तानां विशेषतः । जलदानमकुर्वाणस्तिर्यग्योनिमवाप्नुयात् ।

atha śrīveṁkaṭādrau jaladānapraśaṁsā śrīsūta uvāca veṁkaṭākhye mahāpuṇye tṛṣārtānāṁ viśeṣataḥ jaladānamakurvāṇastiryagyonimavāpnuyāt

श्री सूत ने कहा — अत्यंत पुण्यमय वेंकट पर्वत पर, विशेष रूप से प्यास से पीड़ितों को जल-दान न करने वाला मनुष्य पशु-योनि को प्राप्त होता है।

श्लोक 2 (skanda.2.16.2)

तस्माद्वेंकटशैलेन्द्रे यथाशक्त्यनुसारतः । जलदानं हि कर्तव्यं सर्वेषां जीवनं महत् ।

tasmādveṁkaṭaśailendre yathāśaktyanusārataḥ jaladānaṁ hi kartavyaṁ sarveṣāṁ jīvanaṁ mahat

इसलिए उस वेंकट पर्वत पर, अपनी शक्ति के अनुसार, जल-दान अवश्य करना चाहिए, क्योंकि यह सभी प्राणियों के लिए महान जीवनदायी है।

श्लोक 3 (skanda.2.16.3)

अत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । विप्रस्य गृहगोधायाः संवादं परमाद्भुतम् ।

atraivodāharantīmamitihāsaṁ purātanam viprasya gṛhagodhāyāḥ saṁvādaṁ paramādbhutam

इस विषय में लोग इस प्राचीन इतिहास का उदाहरण देते हैं — एक ब्राह्मण और घर की छिपकली के बीच हुए एक अत्यंत अद्भुत संवाद का।

श्लोक 4 (skanda.2.16.4)

पुरा चेक्ष्वाकुवंशेऽभूद्धेमांग इति भूमिपः । ब्रह्मण्यो ब्रह्मभूयिष्ठो जितामित्रो जितेंद्रियः ।

purā cekṣvākuvaṁśe'bhūddhemāṁga iti bhūmipaḥ brahmaṇyo brahmabhūyiṣṭho jitāmitro jiteṁdriyaḥ

पूर्वकाल में इक्ष्वाकु वंश में हेमांग नाम का एक राजा हुआ, जो ब्राह्मणों का हितैषी, ब्रह्म-परायण, शत्रुओं को जीतने वाला और जितेंद्रिय था।

श्लोक 5 (skanda.2.16.5)

यावन्तो भूमिकणिका यावन्तस्तोयबिन्दवः । यावन्त्युडूनि गगने तावतीर्गा ददात्यसौ ।

yāvanto bhūmikaṇikā yāvantastoyabindavaḥ yāvantyuḍūni gagane tāvatīrgā dadātyasau

पृथ्वी के जितने कण हैं, जल की जितनी बूँदें हैं, आकाश में जितने तारे हैं, उतनी ही गायें वह दान करता था।

श्लोक 6 (skanda.2.16.6)

येनेष्टयज्ञदर्भैश्च भूमिर्बर्हिष्मती स्मृता । गोभूतिलहिरण्याद्यैस्तोषिता बहवो द्विजाः ।

yeneṣṭayajñadarbhaiśca bhūmirbarhiṣmatī smṛtā gobhūtilahiraṇyādyaistoṣitā bahavo dvijāḥ

जिसने यज्ञों की कुशाओं से पृथ्वी को कुशा-आसन से युक्त बना दिया, जिसने गायों, भूमि, तिल और सुवर्ण आदि से अनेक ब्राह्मणों को संतुष्ट किया —

श्लोक 7 (skanda.2.16.7)

तेनादत्तानि दानानि न विद्यन्त इति श्रुतम् । तेनादत्तं जलं चैकं सुखलभ्यधिया द्विजाः ।

tenādattāni dānāni na vidyanta iti śrutam tenādattaṁ jalaṁ caikaṁ sukhalabhyadhiyā dvijāḥ

ऐसा सुना जाता है कि उसके द्वारा न दिए गए कोई भी दान शेष नहीं रहे। किन्तु, हे द्विजो, उसने एक जल का दान सहज-सुलभ समझकर नहीं दिया था —

श्लोक 8 (skanda.2.16.8)

बोधितो ब्रह्मपुत्रेण वसिष्ठेन महात्मना । अमूल्यं सर्वतोलभ्यं तद्दातुः किं फलं लभेत् ।

bodhito brahmaputreṇa vasiṣṭhena mahātmanā amūlyaṁ sarvatolabhyaṁ taddātuḥ kiṁ phalaṁ labhet

ब्रह्मा के पुत्र, महात्मा वसिष्ठ द्वारा समझाए जाने पर भी। 'जो वस्तु सर्वत्र सहज उपलब्ध और अमूल्य है, उसे देने वाले को क्या फल मिल सकता है?'

श्लोक 9 (skanda.2.16.9)

इति दुर्धीर्हेतुवादैर्न जलं दत्तवान्विभुः । अलभ्यदाने पुण्यं स्यादित्यवादीत्सयुक्तिकम् ।

iti durdhīrhetuvādairna jalaṁ dattavānvibhuḥ alabhyadāne puṇyaṁ syādityavādītsayuktikam

ऐसा कुतर्क करते हुए उस दुर्बुद्धि प्रभु ने जल का दान नहीं किया। 'जो वस्तु दुर्लभ है, उसी का दान पुण्यदायी होता है' — ऐसा उसने युक्तिपूर्वक कहा।

श्लोक 10 (skanda.2.16.10)

स आनर्च द्विजान्व्यङ्गान्दरिद्रान्वृत्तिकर्शितान् । नानर्च श्रोत्रियान्विप्रान्ब्रह्मज्ञान्ब्रह्मवादिनः ।

sa ānarca dvijānvyaṅgāndaridrānvṛttikarśitān nānarca śrotriyānviprānbrahmajñānbrahmavādinaḥ

वह विकलांग, दरिद्र और वृत्ति-हीन ब्राह्मणों की तो पूजा करता था, पर श्रोत्रिय, ब्रह्मज्ञानी और ब्रह्मवादी ब्राह्मणों का सम्मान नहीं करता था।

श्लोक 11 (skanda.2.16.11)

प्रख्यातान्पूजयिष्यन्ति सर्वलोकाः सहार्हणैः । अनाथानामविद्यानां व्यङ्गानां च कुटुंबिनाम् ।

prakhyātānpūjayiṣyanti sarvalokāḥ sahārhaṇaiḥ anāthānāmavidyānāṁ vyaṅgānāṁ ca kuṭuṁbinām

'प्रसिद्ध लोगों को तो सारा संसार ही सम्मान सहित पूजेगा; पर अनाथों, अशिक्षितों, विकलांगों और परिवार वालों की,

श्लोक 12 (skanda.2.16.12)

दरिद्राणां गतिः का वा तस्मात्ते मद्दयास्पदाः । इति दुष्टेषु पात्रेषु दत्तवान्किमपि स्वकम् ।

daridrāṇāṁ gatiḥ kā vā tasmātte maddayāspadāḥ iti duṣṭeṣu pātreṣu dattavānkimapi svakam

दरिद्रों की और कौन गति होगी? इसलिए वे ही मेरी दया के पात्र हैं' — ऐसा सोचकर उसने अपनी संपत्ति कुपात्रों को ही दान की।

श्लोक 13 (skanda.2.16.13)

तेन दोषेण महता चातकत्वं त्रिजन्मसु । एकजन्मनि गृध्रत्वं श्वत्वं वा सप्त जन्मसु ।

tena doṣeṇa mahatā cātakatvaṁ trijanmasu ekajanmani gṛdhratvaṁ śvatvaṁ vā sapta janmasu

इस महान दोष के कारण वह तीन जन्मों तक चातक पक्षी बना, एक जन्म में गीध बना, और सात जन्मों तक कुत्ता बना।

श्लोक 14 (skanda.2.16.14)

प्राप्य पश्चाद्गृहे जातो भूपोऽयं गृहगोधिका । श्रुतकीर्तेस्तु भूपस्य मिथिलाधिपतेर्द्विजाः ।

prāpya paścādgṛhe jāto bhūpo'yaṁ gṛhagodhikā śrutakīrtestu bhūpasya mithilādhipaterdvijāḥ

इसके बाद वह राजा घर की छिपकली के रूप में जन्मा। मिथिला के राजा श्रुतकीर्ति के घर में, हे द्विजो,

श्लोक 15 (skanda.2.16.15)

गृहद्वारप्रतोल्यां स्म वर्तते कीटकाशनः । अष्टाशीतिषु वर्षेषु स्थितं तेन दुरात्मना ।

gṛhadvārapratolyāṁ sma vartate kīṭakāśanaḥ aṣṭāśītiṣu varṣeṣu sthitaṁ tena durātmanā

घर के द्वार की चौखट में कीड़े खाकर रहने वाली वह छिपकली रहती थी। उस दुरात्मा ने अठासी वर्षों तक वहीं रहकर [अपने पापों को भोगा]।

श्लोक 16 (skanda.2.16.16)

विदेहाधिपतेर्गेहं कदाचिदृषिसत्तमः । श्रुतदेव इति ख्यातः श्रान्तो मध्याह्न आगमत् ।

videhādhipatergehaṁ kadācidṛṣisattamaḥ śrutadeva iti khyātaḥ śrānto madhyāhna āgamat

एक बार विदेह के राजा के घर में श्रुतदेव नाम से विख्यात एक श्रेष्ठ ऋषि, मध्याह्न में थके हुए, आ पहुँचे।

श्लोक 17 (skanda.2.16.17)

तं दृष्ट्वा सहसोत्थाय जातहर्षो नराधिपः । मधुपर्कः सुसंपूज्य तस्य पादावनेजनीः ।

taṁ dṛṣṭvā sahasotthāya jātaharṣo narādhipaḥ madhuparkaḥ susaṁpūjya tasya pādāvanejanīḥ

उन्हें देखकर हर्षित होकर, तुरंत उठकर, राजा ने मधुपर्क से उनका सम्मान करके, उनके चरणों को धोने के लिए जल,

श्लोक 18 (skanda.2.16.18)

अपो मूर्ध्नावहत्क्षिप्रं तदोत्क्षिप्तैश्च बिन्दुभिः । दैवोपदिष्टकालेन प्रोक्षिता गृहगोधिका ।

apo mūrdhnāvahatkṣipraṁ tadotkṣiptaiśca bindubhiḥ daivopadiṣṭakālena prokṣitā gṛhagodhikā

उनके मस्तक से शीघ्र बहाया; तभी उस जल की उछली हुई बूँदों से, दैव द्वारा नियत उस काल में, वह घर की छिपकली सींची गई,

श्लोक 19 (skanda.2.16.19)

सद्यो जातिस्मृतिरभूत्कृतकर्मातिदुःखिता । त्राहि त्राहीति चुक्रोश ब्राह्मणं गृहमागतम् ।

sadyo jātismṛtirabhūtkṛtakarmātiduḥkhitā trāhi trāhīti cukrośa brāhmaṇaṁ gṛhamāgatam

और उसे तत्काल पूर्व-जन्म का स्मरण हो आया; अपने ही किए हुए कर्मों से अत्यंत दुखी होकर, वह घर में आए उस ब्राह्मण को 'रक्षा करो, रक्षा करो' कहकर पुकारने लगी।

श्लोक 20 (skanda.2.16.20)

तिर्यग्जन्तुरवं श्रुत्वा ब्राह्मणो विस्मितोऽभवत् । कुतः क्रोशसि गोधे त्वं दशेयं केन कर्मणा ।

tiryagjanturavaṁ śrutvā brāhmaṇo vismito'bhavat kutaḥ krośasi godhe tvaṁ daśeyaṁ kena karmaṇā

उस पशु-जन्तु की आवाज़ सुनकर ब्राह्मण विस्मित हो गया — 'हे गोधे! तू क्यों पुकार रही है? यह किस कर्म से तुझे कष्ट हो रहा है?

श्लोक 21 (skanda.2.16.21)

उपदेवोऽथ देवो वा त्वं नृपोऽथ द्विजोत्तमः । कस्त्वं ब्रूहि महाभाग त्वामद्याहं समुद्धरे ।

upadevo'tha devo vā tvaṁ nṛpo'tha dvijottamaḥ kastvaṁ brūhi mahābhāga tvāmadyāhaṁ samuddhare

क्या तू कोई उपदेवता है, या देवता है, या राजा है, या श्रेष्ठ ब्राह्मण है? हे महाभाग! तू कौन है, बता; मैं आज ही तेरा उद्धार करूँगा।'

श्लोक 22 (skanda.2.16.22)

इत्युक्तः स नृपः प्राह श्रुतदेवं महाप्रभुः । अहमिक्ष्वाकुकुलजः शस्त्रविद्याविशारदः ।

ityuktaḥ sa nṛpaḥ prāha śrutadevaṁ mahāprabhuḥ ahamikṣvākukulajaḥ śastravidyāviśāradaḥ

इस प्रकार पूछे जाने पर उस राजा (जो अब छिपकली था) ने श्रुतदेव से कहा — 'हे महाप्रभु! मैं इक्ष्वाकु-कुल में जन्मा, शस्त्र-विद्या में निपुण था।

श्लोक 23 (skanda.2.16.23)

यावन्तो भूमिकणिका यावन्तस्तोयबिन्दवः । यावन्त्युडूनि गगने तावतीर्गा अदामहम् ।

yāvanto bhūmikaṇikā yāvantastoyabindavaḥ yāvantyuḍūni gagane tāvatīrgā adāmaham

पृथ्वी के जितने कण हैं, जल की जितनी बूँदें हैं, आकाश में जितने तारे हैं, उतनी ही गायें मैंने दान कीं।

श्लोक 24 (skanda.2.16.24)

सर्वैर्यज्ञैर्मया चेष्टं पूर्तान्याचरितानि मे । दानान्यपि च दत्तानि धर्मजातं स्वनुष्ठितम् ।

sarvairyajñairmayā ceṣṭaṁ pūrtānyācaritāni me dānānyapi ca dattāni dharmajātaṁ svanuṣṭhitam

मैंने समस्त यज्ञों का अनुष्ठान किया, पूर्त-कर्म (कुएँ, तालाब आदि) किए, दान भी दिए, और सारे धर्म-कर्मों का सम्यक् पालन किया।

श्लोक 25 (skanda.2.16.25)

तथापि दुर्गतिर्जाता न मे चोर्ध्वगतिर्विभो । त्रिवारं चातकत्वं मे गृध्रत्वं चैकजन्मनि ।

tathāpi durgatirjātā na me cordhvagatirvibho trivāraṁ cātakatvaṁ me gṛdhratvaṁ caikajanmani

फिर भी, हे प्रभु, मेरी दुर्गति ही हुई, ऊर्ध्वगति नहीं मिली। मुझे तीन बार चातक-जन्म, एक जन्म में गीध-जन्म,

श्लोक 26 (skanda.2.16.26)

सप्तजन्मसु च श्वत्वं प्राप्तं पूर्वं मया द्विज । धरतानेन भूपेन चापः पादावनेजनीः ।

saptajanmasu ca śvatvaṁ prāptaṁ pūrvaṁ mayā dvija dharatānena bhūpena cāpaḥ pādāvanejanīḥ

और सात जन्मों में कुत्ते का जन्म प्राप्त हुआ, हे द्विज, इससे पहले। इस राजा (मुझ) ने चरणामृत की वे जल-बूँदें,

श्लोक 27 (skanda.2.16.27)

बिन्दवो दूरमुत्क्षिप्तास्तैः सिक्तोऽहं कथंचन । तदा जन्मस्मृतिरभूत्तेन मे हतपाप्मनः ।

bindavo dūramutkṣiptāstaiḥ sikto'haṁ kathaṁcana tadā janmasmṛtirabhūttena me hatapāpmanaḥ

दूर तक उछलती हुई, जिनसे मैं किसी तरह सिंचित हो गया — तभी मुझे पूर्व-जन्म का स्मरण हो आया, जिससे मेरे पाप नष्ट हो गए।

श्लोक 28 (skanda.2.16.28)

गोधाजन्मानि भाव्यानीत्यष्टाविंशति मे द्विज । दृश्यन्ते देवदिष्टानि बिभ्यते जन्मभिर्भृशम् ।

godhājanmāni bhāvyānītyaṣṭāviṁśati me dvija dṛśyante devadiṣṭāni bibhyate janmabhirbhṛśam

हे द्विज! अब मुझे यह भी दिखाई देता है कि देवताओं द्वारा नियत, अभी भोगने योग्य अट्ठाईस छिपकली-जन्म शेष हैं। इन जन्मों से मैं अत्यंत भयभीत हूँ,

श्लोक 29 (skanda.2.16.29)

न कारणं प्रपश्यामि तन्मे विस्तरतो वद । इत्युक्तः स द्विजः प्राह ज्ञातं विज्ञानचक्षुषा ।

na kāraṇaṁ prapaśyāmi tanme vistarato vada ityuktaḥ sa dvijaḥ prāha jñātaṁ vijñānacakṣuṣā

और मुझे इसका कारण नहीं दिखाई देता — यह मुझे विस्तार से बताइए।' इस प्रकार पूछे जाने पर उस ब्राह्मण ने कहा, जो अपने ज्ञान-नेत्र से जान चुका था —

श्लोक 30 (skanda.2.16.30)

शृणु भूप प्रवक्ष्यामि तव दुर्गतिकारणम् । न जलं तु त्वया दत्तं वेंकटाह्वयभूधरे ।

śṛṇu bhūpa pravakṣyāmi tava durgatikāraṇam na jalaṁ tu tvayā dattaṁ veṁkaṭāhvayabhūdhare

'सुनो, हे राजन्! मैं तुम्हें तुम्हारी दुर्गति का कारण बताता हूँ। तुमने वेंकट नाम के इस पर्वत पर कभी जल-दान नहीं किया,

श्लोक 31 (skanda.2.16.31)

तज्जलं सुलभं मत्वा न मौल्यमिति निश्चितः । नाध्वगानां द्विजादीनां घर्मकालेऽप्यजानता ।

tajjalaṁ sulabhaṁ matvā na maulyamiti niścitaḥ nādhvagānāṁ dvijādīnāṁ gharmakāle'pyajānatā

क्योंकि तुमने उस जल को सहज-सुलभ मानकर उसे मूल्यहीन निश्चित कर लिया था — यह न जानते हुए कि गर्मी के मौसम में भी पथिकों और ब्राह्मणों आदि के लिए वह कितना आवश्यक है।

श्लोक 32 (skanda.2.16.32)

तथा पात्रं समुत्सृज्य ह्यपात्रे प्रतिपादितम् । ज्वलन्तमग्निमुत्सृज्य न हि भस्मनि हूयते ।

tathā pātraṁ samutsṛjya hyapātre pratipāditam jvalantamagnimutsṛjya na hi bhasmani hūyate

इसी प्रकार, योग्य पात्र को छोड़कर तुमने अपना दान अयोग्य पात्रों को दे दिया। जलती हुई अग्नि को छोड़कर कोई राख में तो हवन नहीं करता,

श्लोक 33 (skanda.2.16.33)

तुलसीं तु समुत्सृज्य बृहती पूज्यते नु किम् । अनाथव्यंगपंगुत्वं न प्रयोजकतामियात् ।

tulasīṁ tu samutsṛjya bṛhatī pūjyate nu kim anāthavyaṁgapaṁgutvaṁ na prayojakatāmiyāt

और तुलसी को छोड़कर क्या कोई बड़ी घास की पूजा करता है? अनाथता, विकलांगता या दरिद्रता स्वयं में योग्यता का कारण नहीं बनतीं।

श्लोक 34 (skanda.2.16.34)

पंग्वाद्या येप्यनाथा हि दयापात्रं हि केवलम् । तपोनिष्ठा ज्ञाननिष्ठाः श्रुतिशास्त्रपरायणाः ।

paṁgvādyā yepyanāthā hi dayāpātraṁ hi kevalam taponiṣṭhā jñānaniṣṭhāḥ śrutiśāstraparāyaṇāḥ

निःसंदेह, अनाथ, अपंग आदि सभी केवल दया के पात्र हैं। तपस्या में स्थित, ज्ञान में स्थित, वेद-शास्त्रों में तत्पर,

श्लोक 35 (skanda.2.16.35)

विष्णुरूपाः सदा पूज्या नेतरे तु कदाचन । तत्रापि ज्ञानिनोऽत्यर्थं प्रिया विष्णोः सदैव हि ।

viṣṇurūpāḥ sadā pūjyā netare tu kadācana tatrāpi jñānino'tyarthaṁ priyā viṣṇoḥ sadaiva hi

विष्णु-स्वरूप ब्राह्मण ही सदा पूजनीय हैं, अन्य कभी नहीं। उनमें भी ज्ञानी लोग विष्णु को सदैव अत्यंत प्रिय हैं।

श्लोक 36 (skanda.2.16.36)

ज्ञानिनामपि भूपाल विष्णुरेव सदा प्रियः । तस्माज्ज्ञानी सदा पूज्यः पूज्यात्पूज्यतरः स्मृतः ।

jñānināmapi bhūpāla viṣṇureva sadā priyaḥ tasmājjñānī sadā pūjyaḥ pūjyātpūjyataraḥ smṛtaḥ

हे राजन्! ज्ञानियों में भी विष्णु ही सदा उन्हें सर्वाधिक प्रिय होते हैं; इसलिए ज्ञानी सदा पूज्य है, वह पूज्यों में भी अधिक पूज्य माना गया है।

श्लोक 37 (skanda.2.16.37)

न जलं तु त्वया दत्तं साधवो वा न सेविताः । तेन ते दुर्गतिश्चेयं प्राप्ता चेक्ष्वाकुनन्दन ।

na jalaṁ tu tvayā dattaṁ sādhavo vā na sevitāḥ tena te durgatiśceyaṁ prāptā cekṣvākunandana

न तुमने जल-दान किया, न सज्जनों की सेवा की — इसी कारण, हे इक्ष्वाकु-नंदन, तुम्हें यह दुर्गति प्राप्त हुई।

श्लोक 38 (skanda.2.16.38)

वेंकटाद्रौ कृतं पुण्यं तुभ्यं दास्यामि शान्तये । भूतं भव्यं भवत्तेन कर्मजातं विजेष्यसि ।

veṁkaṭādrau kṛtaṁ puṇyaṁ tubhyaṁ dāsyāmi śāntaye bhūtaṁ bhavyaṁ bhavattena karmajātaṁ vijeṣyasi

वेंकटाद्रि पर मेरे द्वारा अर्जित पुण्य को मैं तुम्हारी शांति के लिए तुम्हें देता हूँ; इससे तुम अपने भूत और भावी सभी कर्मों को जीत लोगे।'

श्लोक 39 (skanda.2.16.39)

इत्युक्त्वाप उपस्पृश्य ददौ पुण्यमनुत्तमम् । यद्दत्तं ब्राह्मणेनापि स्नानं चैकदिने कृतम् ।

ityuktvāpa upaspṛśya dadau puṇyamanuttamam yaddattaṁ brāhmaṇenāpi snānaṁ caikadine kṛtam

ऐसा कहकर, जल का स्पर्श करके, उस ब्राह्मण ने उसे वह सर्वोत्तम पुण्य दे दिया, जो उसने एक दिन के स्नान से अर्जित किया था।

श्लोक 40 (skanda.2.16.40)

तेन ध्वस्ताखिलाऽऽगास्तु त्यक्त्वा च गृहगोधिका । रूपं कर्मोचितं घोरं सद्योऽदृश्यत पूरुषः ।

tena dhvastākhilā''gāstu tyaktvā ca gṛhagodhikā rūpaṁ karmocitaṁ ghoraṁ sadyo'dṛśyata pūruṣaḥ

उससे उसके समस्त पाप नष्ट हो गए, और वह घर की छिपकली का रूप त्यागकर, अपने कर्मों के अनुरूप उस भयानक रूप को छोड़कर, उसी क्षण एक पुरुष के रूप में प्रकट हो गई,

श्लोक 41 (skanda.2.16.41)

दिव्यं विमानमारूढो दिव्यस्रग्वस्त्रभूषणः । पश्यतामेव साधूनां मैथिलस्य गृहान्तरे ।

divyaṁ vimānamārūḍho divyasragvastrabhūṣaṇaḥ paśyatāmeva sādhūnāṁ maithilasya gṛhāntare

दिव्य विमान पर सवार, दिव्य मालाओं, वस्त्रों और आभूषणों से सज्जित, उन्हीं साधुजनों के देखते-देखते, मैथिल राजा के घर में ही।

श्लोक 42 (skanda.2.16.42)

बद्धाञ्जलिपुटो भूत्वा परिक्रम्य प्रणम्य च । अनुज्ञातो ययौ राजा स्तूयमानोऽमरैर्दिवम् ।

baddhāñjalipuṭo bhūtvā parikramya praṇamya ca anujñāto yayau rājā stūyamāno'marairdivam

हाथ जोड़े, परिक्रमा करके और प्रणाम करके, उस राजा को अनुमति मिली, और देवताओं द्वारा स्तुति किया जाता हुआ वह स्वर्ग को चला गया।

श्लोक 43 (skanda.2.16.43)

तत्र भुक्त्वा महाभोगान्वर्षायुतमतन्द्रितः । स एव चेक्ष्वाकुकुले ककुत्स्थोऽभून्महारथः ।

tatra bhuktvā mahābhogānvarṣāyutamatandritaḥ sa eva cekṣvākukule kakutstho'bhūnmahārathaḥ

वहाँ दस हज़ार वर्षों तक अथक होकर महान भोगों का उपभोग करके, वही आत्मा फिर इक्ष्वाकु-कुल में ककुत्स्थ नाम के महारथी के रूप में जन्मी,

श्लोक 44 (skanda.2.16.44)

सप्तद्वीपप्रतीपालो ब्रह्मण्यः साधुसंमतः । देवेन्द्रस्य समो विष्णोरंश एवं महाप्रभुः ।

saptadvīpapratīpālo brahmaṇyaḥ sādhusaṁmataḥ devendrasya samo viṣṇoraṁśa evaṁ mahāprabhuḥ

सातों द्वीपों का पालनकर्ता, ब्राह्मणों का हितैषी, सज्जनों द्वारा सम्मानित, इंद्र के समान महाप्रभावशाली, विष्णु का ही एक अंश।

श्लोक 45 (skanda.2.16.45)

बोधितस्तु वसिष्ठेन सर्वान्धर्मान्मनोहरान् । अनुष्ठायाखिलान्राजा तेन ध्वस्ताशुभादिकः ।

bodhitastu vasiṣṭhena sarvāndharmānmanoharān anuṣṭhāyākhilānrājā tena dhvastāśubhādikaḥ

वसिष्ठ द्वारा समस्त मनोहर धर्मों का उपदेश पाकर, उन सभी का अनुष्ठान करते हुए उस राजा ने अपने समस्त अशुभों को नष्ट कर लिया,

श्लोक 46 (skanda.2.16.46)

दिव्यं ज्ञानं समासाद्य विष्णोः सायुज्यमाप्तवान् । तस्माद्वेंकटशैलेन्द्रः पुण्यः पापविनाशनः ।

divyaṁ jñānaṁ samāsādya viṣṇoḥ sāyujyamāptavān tasmādveṁkaṭaśailendraḥ puṇyaḥ pāpavināśanaḥ

और दिव्य ज्ञान प्राप्त करके उसने विष्णु के साथ सायुज्य (एकत्व) प्राप्त किया। इसलिए वेंकट पर्वत पुण्यमय और पापों का नाशक है,

श्लोक 47 (skanda.2.16.47)

तस्मिंश्च जलदानं तु विष्णुलोकप्रदायकम् । एवं वः कथितं विप्रा जलदानस्य वैभवम् । वेंकटाद्रौ महापुण्ये सर्वपातकनाशने ।

tasmiṁśca jaladānaṁ tu viṣṇulokapradāyakam evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā jaladānasya vaibhavam veṁkaṭādrau mahāpuṇye sarvapātakanāśane

और वहाँ जल-दान करना विष्णुलोक प्रदान करने वाला है। इस प्रकार, हे विप्रो, मैंने तुम्हें जल-दान की यह महिमा कह सुनाई, जो अत्यंत पुण्यमय, समस्त पातकों का नाशक वेंकटाद्रि पर की जाती है।

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