वैष्णव खण्ड · अध्याय 17
वेंकटाद्रि क्षेत्र महिमा
श्लोक 1 (skanda.2.17.1)
श्रीसूत उवाच । वेंकटाद्रेस्तु माहात्म्यं भूयोऽपि प्रवदाम्यहम् । युष्माकं सावधानेन शृणुध्वं सुसमाहिताः ।
śrīsūta uvāca veṁkaṭādrestu māhātmyaṁ bhūyo'pi pravadāmyaham yuṣmākaṁ sāvadhānena śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ
श्री सूत ने कहा — अब मैं फिर से वेंकटाद्रि की महिमा कहूँगा; तुम सब एकाग्रचित्त होकर सावधानीपूर्वक सुनो।
श्लोक 2 (skanda.2.17.2)
पृथिव्यां यानि तीर्थानि ब्रह्माण्डान्तर्गतानि च । तानि सर्वाणि वर्तंते वेंकटाह्वयभूधरे ।
pṛthivyāṁ yāni tīrthāni brahmāṇḍāntargatāni ca tāni sarvāṇi vartaṁte veṁkaṭāhvayabhūdhare
पृथ्वी पर और सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड में जितने भी तीर्थ हैं, वे सभी वेंकट नाम के इस पर्वत पर विद्यमान हैं।
श्लोक 3 (skanda.2.17.3)
तस्मिन्नगोत्तमे पुण्ये वसन्तं पुरुषोत्तमम् । शंखचक्रधरं देवं पीताम्बरधरं शुभम् ।
tasminnagottame puṇye vasantaṁ puruṣottamam śaṁkhacakradharaṁ devaṁ pītāmbaradharaṁ śubham
उस श्रेष्ठ पुण्यमय पर्वत पर वास करने वाले पुरुषोत्तम, शंख-चक्रधारी, पीत वस्त्र धारण करने वाले, शुभ,
श्लोक 4 (skanda.2.17.4)
कौस्तुभालंकृतोरस्कं भक्तानामभयप्रदम् । देवदेवं विशालाक्षं वेदवेद्यं सनातनम् ।
kaustubhālaṁkṛtoraskaṁ bhaktānāmabhayapradam devadevaṁ viśālākṣaṁ vedavedyaṁ sanātanam
कौस्तुभ मणि से सुशोभित वक्षस्थल वाले, भक्तों को अभय देने वाले, देवाधिदेव, विशाल नेत्रों वाले, वेदों द्वारा जानने योग्य, सनातन —
श्लोक 5 (skanda.2.17.5)
अंगकोसलकर्णाटकाशीगुर्जरदेशगाः । चोलकेरलपाण्ड्यादिसर्वदेशसमुद्भवाः ।
aṁgakosalakarṇāṭakāśīgurjaradeśagāḥ colakeralapāṇḍyādisarvadeśasamudbhavāḥ
अंग, कोसल, कर्णाटक, काशी, गुर्जर देश के, और चोल, केरल, पांड्य आदि सभी देशों में उत्पन्न लोग,
श्लोक 6 (skanda.2.17.6)
सकुटुंबाश्च सेवार्थमायान्ति प्रतिवत्सरम् । देवाश्च ऋषयः सिद्धा योगिनः सनकादयः ।
sakuṭuṁbāśca sevārthamāyānti prativatsaram devāśca ṛṣayaḥ siddhā yoginaḥ sanakādayaḥ
अपने परिवारों सहित, प्रति वर्ष उनकी सेवा के लिए आते हैं। देवता, ऋषि, सिद्ध और सनक आदि योगीजन भी,
श्लोक 7 (skanda.2.17.7)
ये भाद्रपदमासे तु वेंकटेशमहोत्सवे । सेवां कुर्वन्ति ते सर्वे निष्पापा उत्तमोत्तमाः ।
ye bhādrapadamāse tu veṁkaṭeśamahotsave sevāṁ kurvanti te sarve niṣpāpā uttamottamāḥ
जो भाद्रपद मास में वेंकटेश के महोत्सव में सेवा करते हैं, वे सभी निष्पाप और सर्वोत्तम बन जाते हैं।
श्लोक 8 (skanda.2.17.8)
तत्र श्रीवेंकटेशस्य ब्रह्मा लोकपितामहः । चकार कन्यामासे तु ध्वजारोपमहोत्सवम् ।
tatra śrīveṁkaṭeśasya brahmā lokapitāmahaḥ cakāra kanyāmāse tu dhvajāropamahotsavam
वहाँ लोकपितामह ब्रह्मा ने श्री वेंकटेश के लिए, कन्या-मास में ध्वजारोहण का महोत्सव आयोजित किया था।
श्लोक 9 (skanda.2.17.9)
प्रतिवर्षं च तत्सेवा निमित्तं सर्वमानवाः । सर्वे देवाश्च गंधर्वाः सिद्धाः साध्या महौजसः ।
prativarṣaṁ ca tatsevā nimittaṁ sarvamānavāḥ sarve devāśca gaṁdharvāḥ siddhāḥ sādhyā mahaujasaḥ
प्रति वर्ष उस सेवा के निमित्त सभी मनुष्य, सभी देवगण, गंधर्व, सिद्ध और महातेजस्वी साध्यगण,
श्लोक 10 (skanda.2.17.10)
ब्रह्मोत्सवे भगवतः समायांति द्विजोत्तमाः । विद्यानां वेदविद्येव मंत्राणां प्रणवो यथा ।
brahmotsave bhagavataḥ samāyāṁti dvijottamāḥ vidyānāṁ vedavidyeva maṁtrāṇāṁ praṇavo yathā
हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! भगवान के ब्रह्मोत्सव में आते हैं। जैसे विद्याओं में वेद-विद्या, मंत्रों में प्रणव (ॐ) श्रेष्ठ है,
श्लोक 11 (skanda.2.17.11)
प्राणवत्प्रियवस्तूनां धेनूनां कामधेनुवत् । तथा वेंकटशैलेन्द्रः क्षेत्राणामुत्तमोत्तमः ।
prāṇavatpriyavastūnāṁ dhenūnāṁ kāmadhenuvat tathā veṁkaṭaśailendraḥ kṣetrāṇāmuttamottamaḥ
जैसे प्रिय वस्तुओं में प्राण और गायों में कामधेनु श्रेष्ठ है, वैसे ही वेंकट पर्वत सभी तीर्थ-क्षेत्रों में सर्वोत्तम है।
श्लोक 12 (skanda.2.17.12)
शेषवत्सर्वनागानां पक्षिणां गरुडो यथा । देवानां तु यथा विष्णुर्वर्णानां ब्राह्मणो यथा ।
śeṣavatsarvanāgānāṁ pakṣiṇāṁ garuḍo yathā devānāṁ tu yathā viṣṇurvarṇānāṁ brāhmaṇo yathā
जैसे सभी नागों में शेष श्रेष्ठ है, पक्षियों में गरुड़ श्रेष्ठ है, देवताओं में विष्णु श्रेष्ठ है और वर्णों में ब्राह्मण श्रेष्ठ है,
श्लोक 13 (skanda.2.17.13)
तथा वेंकटशैलेन्द्रः क्षेत्राणामुत्तमोत्तमः । भूरुहाणां सुरतरुर्भार्येव सुहृदां यथा ।
tathā veṁkaṭaśailendraḥ kṣetrāṇāmuttamottamaḥ bhūruhāṇāṁ suratarurbhāryeva suhṛdāṁ yathā
वैसे ही वेंकट पर्वत सभी तीर्थ-क्षेत्रों में सर्वोत्तम है। जैसे वृक्षों में कल्पवृक्ष श्रेष्ठ है, मित्रों में पत्नी श्रेष्ठ है,
श्लोक 14 (skanda.2.17.14)
तीर्थानां तु यथा गंगा तेजसां तु रविर्यथा । तथा वेंकटशैलेन्द्रः क्षेत्राणामुत्तमोत्तमः ।
tīrthānāṁ tu yathā gaṁgā tejasāṁ tu raviryathā tathā veṁkaṭaśailendraḥ kṣetrāṇāmuttamottamaḥ
जैसे तीर्थों में गंगा और तेजस्वी वस्तुओं में सूर्य श्रेष्ठ है, वैसे ही वेंकट पर्वत सभी तीर्थ-क्षेत्रों में सर्वोत्तम है।
श्लोक 15 (skanda.2.17.15)
आयुधानां यथा वज्रं लोहानां कांचनं यथा । वैष्णवानां यथा रुद्रो रत्नानां कौस्तुभो यथा ।
āyudhānāṁ yathā vajraṁ lohānāṁ kāṁcanaṁ yathā vaiṣṇavānāṁ yathā rudro ratnānāṁ kaustubho yathā
जैसे आयुधों में वज्र, धातुओं में स्वर्ण, वैष्णवों में रुद्र, और रत्नों में कौस्तुभ मणि श्रेष्ठ है,
श्लोक 16 (skanda.2.17.16)
तथा वेंकटशैलेन्द्रः क्षेत्राणामुत्तमोत्तमः । नानेन सदृशो लोके विष्णुप्रीतिविवर्धनः ।
tathā veṁkaṭaśailendraḥ kṣetrāṇāmuttamottamaḥ nānena sadṛśo loke viṣṇuprītivivardhanaḥ
वैसे ही वेंकट पर्वत सभी तीर्थ-क्षेत्रों में सर्वोत्तम है। इसके समान विष्णु की प्रीति को बढ़ाने वाला संसार में और कुछ भी नहीं है।
श्लोक 17 (skanda.2.17.17)
न माधवसमो मासो न कृतेन समं युगम् । न च वेदसमं शास्त्रं न तीर्थं गंगया समम् ।
na mādhavasamo māso na kṛtena samaṁ yugam na ca vedasamaṁ śāstraṁ na tīrthaṁ gaṁgayā samam
माधव मास (वैशाख) के समान कोई मास नहीं, सतयुग के समान कोई युग नहीं, वेद के समान कोई शास्त्र नहीं, और गंगा के समान कोई तीर्थ नहीं।
श्लोक 18 (skanda.2.17.18)
न जलेन समं दानं न सुखं भार्यया समम् । न कृषेस्तु समं वित्तं न लाभो जीवितात्परः ।
na jalena samaṁ dānaṁ na sukhaṁ bhāryayā samam na kṛṣestu samaṁ vittaṁ na lābho jīvitātparaḥ
जल के समान कोई दान नहीं, पत्नी के समान कोई सुख नहीं, खेती के समान कोई धन नहीं, और जीवन से बढ़कर कोई लाभ नहीं।
श्लोक 19 (skanda.2.17.19)
न तपोऽनशनादन्यन्न दानात्परमं सुखम् । न धर्मस्तु दयातुल्यो न ज्योतिश्चक्षुषा समम् ।
na tapo'naśanādanyanna dānātparamaṁ sukham na dharmastu dayātulyo na jyotiścakṣuṣā samam
उपवास के अतिरिक्त कोई तप नहीं, दान से बढ़कर कोई सुख नहीं, दया के समान कोई धर्म नहीं, और आँख के समान कोई प्रकाश नहीं।
श्लोक 20 (skanda.2.17.20)
न तृप्तिरशनातुल्या न वाणिज्यं कृषेः समम् । न धर्मेण समं मित्रं न सत्येन समं यशः ।
na tṛptiraśanātulyā na vāṇijyaṁ kṛṣeḥ samam na dharmeṇa samaṁ mitraṁ na satyena samaṁ yaśaḥ
भोजन के समान कोई तृप्ति नहीं, खेती के समान कोई व्यापार नहीं, धर्म के समान कोई मित्र नहीं, और सत्य के समान कोई यश नहीं।
श्लोक 21 (skanda.2.17.21)
यथा तथा भगवतः स्थानेन सदृशं न हि ।
yathā tathā bhagavataḥ sthānena sadṛśaṁ na hi
इसी प्रकार, भगवान के इस निवास-स्थान के समान भी कुछ नहीं है।
श्लोक 22 (skanda.2.17.22)
यत्कीर्तनं सकलपापहरं मुनीन्द्रा यद्वन्दनं सकलसौख्यदमेव लोके । यात्रापि यं प्रति सुरैरपि पूजनीया तादृङ्महान्भवति वेंकटशैलमुख्यः ।
yatkīrtanaṁ sakalapāpaharaṁ munīndrā yadvandanaṁ sakalasaukhyadameva loke yātrāpi yaṁ prati surairapi pūjanīyā tādṛṅmahānbhavati veṁkaṭaśailamukhyaḥ
हे मुनीश्वरो! जिसका कीर्तन ही समस्त पापों को हर लेता है, जिसकी वंदना संसार में सम्पूर्ण सुख प्रदान करती है, जिसकी यात्रा भी देवताओं द्वारा पूजनीय है — ऐसा महान है यह प्रमुख वेंकट पर्वत।
श्लोक 23 (skanda.2.17.23)
तस्यानुभावं प्रवदामि भूयः समस्ततीर्थानि वसंति यत्र । एवं समस्तेषु च मुख्यतीर्थं श्रीस्वामिनामास्ति सरोवरं तत् ।
tasyānubhāvaṁ pravadāmi bhūyaḥ samastatīrthāni vasaṁti yatra evaṁ samasteṣu ca mukhyatīrthaṁ śrīsvāmināmāsti sarovaraṁ tat
मैं इसका प्रभाव फिर से कहता हूँ — यहाँ समस्त तीर्थ निवास करते हैं। इस प्रकार इन समस्त तीर्थों में भी श्री स्वामी नामक वह सरोवर सबसे प्रमुख तीर्थ है।
श्लोक 24 (skanda.2.17.24)
माहात्म्यमेतस्य मयोच्यते कथं यत्पश्चिमे रोधसि भूवराहः । आलिंग्य कान्तामतिसौम्यमूर्तिर्विराजते विश्वजनोपकारी ।
māhātmyametasya mayocyate kathaṁ yatpaścime rodhasi bhūvarāhaḥ āliṁgya kāntāmatisaumyamūrtirvirājate viśvajanopakārī
इसकी महिमा मैं किस प्रकार कहूँ, जिसके पश्चिमी तट पर, अत्यंत सौम्य रूप वाले, विश्व-जनों के हितकारी भू-वराह अपनी प्रिया (भूदेवी) का आलिंगन करते हुए विराजमान हैं?
श्लोक 25 (skanda.2.17.25)
श्रीस्वामिपुष्करिण्यां च दक्षिणे वेंकटेश्वरः । आलिंगितवपुर्लक्ष्म्या वरदो वर्तते चिरम् ।
śrīsvāmipuṣkariṇyāṁ ca dakṣiṇe veṁkaṭeśvaraḥ āliṁgitavapurlakṣmyā varado vartate ciram
और श्री स्वामिपुष्करिणी के दक्षिणी तट पर, लक्ष्मी द्वारा आलिंगित शरीर वाले वरदाता वेंकटेश्वर सदा विराजमान हैं।
श्लोक 26 (skanda.2.17.26)
एवं वः कथितं विप्राः क्षेत्रमाहात्म्यमुत्तमम् । यः शृणोति सदा भक्त्या विष्णुलोके महीयते ।
evaṁ vaḥ kathitaṁ viprāḥ kṣetramāhātmyamuttamam yaḥ śṛṇoti sadā bhaktyā viṣṇuloke mahīyate
इस प्रकार, हे विप्रो, मैंने तुम्हें इस क्षेत्र की उत्तम महिमा कह सुनाई। जो इसे सदा भक्तिपूर्वक सुनता है, वह विष्णुलोक में महिमामंडित होता है।