वैष्णव खण्ड · अध्याय 18
वेंकटेश्वर वैभव एवं अष्टविध भक्ति
श्लोक 1 (skanda.2.18.1)
श्रीसूत उवाच । अथेदानीं प्रवक्ष्यामि वेंकटेश्वरवैभवम् । यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ।
śrīsūta uvāca athedānīṁ pravakṣyāmi veṁkaṭeśvaravaibhavam yacchrutvā sarvapāpebhyo mucyate nātra saṁśayaḥ
श्री सूत ने कहा — अब मैं वेंकटेश्वर के वैभव का वर्णन करूँगा, जिसे सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक 2 (skanda.2.18.2)
श्रीवेंकटेश्वरं देवं यः पश्यति सकृन्नरः । स नरो मुक्तिमाप्नोति विष्णुसायुज्यमाप्नुयात् ।
śrīveṁkaṭeśvaraṁ devaṁ yaḥ paśyati sakṛnnaraḥ sa naro muktimāpnoti viṣṇusāyujyamāpnuyāt
जो मनुष्य श्री वेंकटेश्वर देव के दर्शन एक बार भी करता है, वह मनुष्य मुक्ति प्राप्त कर लेता है, और विष्णु के साथ सायुज्य (एकत्व) प्राप्त करता है।
श्लोक 3 (skanda.2.18.3)
दशवर्षैस्तु यत्पुण्यं क्रियते तु कृते युगे । त्रेतायामेकवर्षेण तत्पुण्यं साध्यते नृभिः ।
daśavarṣaistu yatpuṇyaṁ kriyate tu kṛte yuge tretāyāmekavarṣeṇa tatpuṇyaṁ sādhyate nṛbhiḥ
सतयुग में जो पुण्य दस वर्षों में किया जाता है, त्रेता युग में मनुष्य उसी पुण्य को एक ही वर्ष में साध लेते हैं,
श्लोक 4 (skanda.2.18.4)
द्वापरे पञ्चमासेन तद्दिनेन कलौ युगे । तत्फलं कोटिगुणितं निमिषेनिमिषे नृणाम् ।
dvāpare pañcamāsena taddinena kalau yuge tatphalaṁ koṭiguṇitaṁ nimiṣenimiṣe nṛṇām
द्वापर में पाँच महीनों में, और कलियुग में उसी दिन में। मनुष्यों के लिए वह फल, प्रत्येक पल-पल में करोड़ गुना हो जाता है,
श्लोक 5 (skanda.2.18.5)
निःसंदेहं भवेदेवं श्रीनिवासविलोकिनाम् । श्रीवेंकटेश्वरे देवे तीर्थानि सकलान्यपि ।
niḥsaṁdehaṁ bhavedevaṁ śrīnivāsavilokinām śrīveṁkaṭeśvare deve tīrthāni sakalānyapi
निःसंदेह ऐसा ही होता है, जो लोग श्रीनिवास के दर्शन करते हैं उनके लिए। श्री वेंकटेश्वर देव में समस्त तीर्थ भी,
श्लोक 6 (skanda.2.18.6)
विद्यन्ते सर्वदेवाश्च मुनयः पितरस्तथा । एककालं द्विकालं वा त्रिकालं सर्वदैव वा ।
vidyante sarvadevāśca munayaḥ pitarastathā ekakālaṁ dvikālaṁ vā trikālaṁ sarvadaiva vā
समस्त देवता, मुनि और पितर भी विद्यमान हैं। जो लोग एक बार, दो बार, तीन बार, या सदा ही,
श्लोक 7 (skanda.2.18.7)
ये स्मरन्ति महादेवं श्रीनिवासं विमुक्तिदम् । कीर्तयन्त्यथवा विप्रास्ते मुक्ताः पापपञ्जरात् ।
ye smaranti mahādevaṁ śrīnivāsaṁ vimuktidam kīrtayantyathavā viprāste muktāḥ pāpapañjarāt
मुक्तिदाता महादेव श्रीनिवास का स्मरण करते हैं, या उनका कीर्तन करते हैं, हे विप्रो, वे पाप के पिंजरे से मुक्त हो जाते हैं,
श्लोक 8 (skanda.2.18.8)
नारायणं परं देवं वेंकटेशं प्रयान्ति वै । पूजितं शङ्खराजेन सच्चिदानंदविग्रहम् ।
nārāyaṇaṁ paraṁ devaṁ veṁkaṭeśaṁ prayānti vai pūjitaṁ śaṅkharājena saccidānaṁdavigraham
और परम देव नारायण वेंकटेश को प्राप्त होते हैं, जो शंख-राज द्वारा पूजित हैं, जो सत्-चित्-आनंद स्वरूप हैं।
श्लोक 9 (skanda.2.18.9)
तस्य स्मरणमात्रेण यमपीडाऽपि नो भवेत् । श्रीनिवासं महादेवं येऽर्चयंति सकृन्नराः ।
tasya smaraṇamātreṇa yamapīḍā'pi no bhavet śrīnivāsaṁ mahādevaṁ ye'rcayaṁti sakṛnnarāḥ
उनके स्मरण मात्र से यम की पीड़ा भी नहीं होती। जो मनुष्य महादेव श्रीनिवास की एक बार भी पूजा करते हैं,
श्लोक 10 (skanda.2.18.10)
किं दानैः किं व्रतैस्तेषां किं तपोभिः किमध्वरैः । वेंकटेशं परं देवं यो न चिन्तयति क्षणम् ।
kiṁ dānaiḥ kiṁ vrataisteṣāṁ kiṁ tapobhiḥ kimadhvaraiḥ veṁkaṭeśaṁ paraṁ devaṁ yo na cintayati kṣaṇam
उनके लिए दान से, व्रतों से, तप से, या यज्ञों से क्या प्रयोजन? किन्तु जो परम देव वेंकटेश का एक क्षण भी चिंतन नहीं करता,
श्लोक 11 (skanda.2.18.11)
अज्ञानी स च पापी स्यात्स मूको बधिरस्तथा । स जडोऽन्धश्च विज्ञेयश्छिद्रं तस्य सदा भवेत् ।
ajñānī sa ca pāpī syātsa mūko badhirastathā sa jaḍo'ndhaśca vijñeyaśchidraṁ tasya sadā bhavet
वह अज्ञानी और पापी है; वह गूँगा और बहरा है, वह जड़ और अंधा जानना चाहिए; उसमें सदा एक बड़ा दोष रहता है।
श्लोक 12 (skanda.2.18.12)
श्रीनिवासे महादेवे सकृद्दृष्टे मुनीश्वराः । किं काश्या गयया चैव प्रयागेनापि किं फलम् ।
śrīnivāse mahādeve sakṛddṛṣṭe munīśvarāḥ kiṁ kāśyā gayayā caiva prayāgenāpi kiṁ phalam
हे मुनीश्वरो! महादेव श्रीनिवास के एक बार दर्शन कर लेने पर, काशी से, गया से, अथवा प्रयाग से भी क्या फल प्राप्त करना शेष रह जाता है?
श्लोक 13 (skanda.2.18.13)
दुर्लभं प्राप्य मानुष्यं मानवा इह भूतले । वेंकटेशं परं देवं ये पश्यन्त्यर्चयन्ति वा ।
durlabhaṁ prāpya mānuṣyaṁ mānavā iha bhūtale veṁkaṭeśaṁ paraṁ devaṁ ye paśyantyarcayanti vā
इस पृथ्वी पर दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाकर, जो लोग परम देव वेंकटेश के दर्शन करते हैं या उनकी पूजा करते हैं,
श्लोक 14 (skanda.2.18.14)
जन्म तेषां हि सफलं ते कृतार्थाश्च नेतरे । वेंकटेशे परे देवे दृष्टे वा पूजितेऽपि वा ।
janma teṣāṁ hi saphalaṁ te kṛtārthāśca netare veṁkaṭeśe pare deve dṛṣṭe vā pūjite'pi vā
उन्हीं का जन्म सफल है, वे ही कृतार्थ हैं, अन्य कोई नहीं। परम देव वेंकटेश के दर्शन या पूजन हो जाने पर,
श्लोक 15 (skanda.2.18.15)
शम्भुना ब्रह्मणा किं वा शक्रेणाप्यखिलामरैः । वेंकटेशे महादेवे भक्तियुक्ताश्च ये नराः ।
śambhunā brahmaṇā kiṁ vā śakreṇāpyakhilāmaraiḥ veṁkaṭeśe mahādeve bhaktiyuktāśca ye narāḥ
शंभु से, ब्रह्मा से, इंद्र से, या समस्त देवताओं से भी और क्या प्रयोजन? महादेव वेंकटेश में जो मनुष्य भक्तियुक्त हैं,
श्लोक 16 (skanda.2.18.16)
तेषां प्रणामस्मरणपूजायुक्तास्तु ये नराः । न ते पश्यंति दुःखानि नैव यांति यमालयम् ।
teṣāṁ praṇāmasmaraṇapūjāyuktāstu ye narāḥ na te paśyaṁti duḥkhāni naiva yāṁti yamālayam
जो मनुष्य उन्हें प्रणाम करने, स्मरण करने और पूजा करने में तत्पर रहते हैं, वे न दुःखों को देखते हैं और न यमलोक जाते हैं।
श्लोक 17 (skanda.2.18.17)
ब्रह्महत्यासहस्राणि सुरापानायुतानि च । दृष्टे नारायणे देवे विलयं यांति कृत्स्नशः ।
brahmahatyāsahasrāṇi surāpānāyutāni ca dṛṣṭe nārāyaṇe deve vilayaṁ yāṁti kṛtsnaśaḥ
हज़ारों ब्रह्महत्याएँ और दस हज़ार सुरापान — देव नारायण के दर्शन होते ही ये सब पूर्णतः विलीन हो जाते हैं।
श्लोक 18 (skanda.2.18.18)
ये वाञ्छंति सदा भोगं राज्यं च त्रिदशालये । वेंकटाद्रिनिवासं ते प्रणमन्तु सकृन्मुदा ।
ye vāñchaṁti sadā bhogaṁ rājyaṁ ca tridaśālaye veṁkaṭādrinivāsaṁ te praṇamantu sakṛnmudā
जो लोग सदा स्वर्गलोक में भोग और राज्य की कामना रखते हैं, उन्हें भी वेंकटाद्रि-निवासी को हर्षपूर्वक एक बार प्रणाम करना चाहिए।
श्लोक 19 (skanda.2.18.19)
यानि कानि च पापानि जन्मकोटिकृतानि च । तानि सर्वाणि नश्यन्ति वेंकटेश्वरदर्शनात् ।
yāni kāni ca pāpāni janmakoṭikṛtāni ca tāni sarvāṇi naśyanti veṁkaṭeśvaradarśanāt
करोड़ों जन्मों में किए गए जो भी पाप हों, वे सभी वेंकटेश्वर के दर्शन से नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 20 (skanda.2.18.20)
संपर्कात्कौतुकाल्लोभाद्भयाद्वापि च संस्मरन् । वेंकटेशं महादेवं नेहामुत्र च दुःखभाक् ।
saṁparkātkautukāllobhādbhayādvāpi ca saṁsmaran veṁkaṭeśaṁ mahādevaṁ nehāmutra ca duḥkhabhāk
संपर्क से, कुतूहल से, लोभ से, या भय से भी जो महादेव वेंकटेश का स्मरण करता है, वह न इस लोक में और न परलोक में दुःख भोगता है।
श्लोक 21 (skanda.2.18.21)
वेंकटाचलदेवेशं कीर्तयन्नर्चयन्नपि । अवश्यं विष्णुसारूप्यं लभते नात्र संशयः ।
veṁkaṭācaladeveśaṁ kīrtayannarcayannapi avaśyaṁ viṣṇusārūpyaṁ labhate nātra saṁśayaḥ
वेंकटाचल के स्वामी का कीर्तन या पूजन करने वाला निश्चय ही विष्णु का सारूप्य प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक 22 (skanda.2.18.22)
यथैधांसि समिद्धोऽग्निर्भस्मसात्कुरुते क्षणात् । तथा पापानि सर्वाणि वेंकटेश्वरदर्शनम् ।
yathaidhāṁsi samiddho'gnirbhasmasātkurute kṣaṇāt tathā pāpāni sarvāṇi veṁkaṭeśvaradarśanam
जैसे प्रज्वलित अग्नि क्षण भर में ईंधन को भस्म कर देती है, वैसे ही वेंकटेश्वर का दर्शन समस्त पापों को [भस्म कर देता है]।
श्लोक 23 (skanda.2.18.23)
वेंकटेश्वरदेवस्य भक्तिरष्टविधा स्मृता । तद्भक्तजनवात्सल्यं तत्पूजापरितोषणम् ।
veṁkaṭeśvaradevasya bhaktiraṣṭavidhā smṛtā tadbhaktajanavātsalyaṁ tatpūjāparitoṣaṇam
वेंकटेश्वर देव की भक्ति आठ प्रकार की मानी गई है — उनके भक्तों के प्रति वात्सल्य, उनकी पूजा में संतोष,
श्लोक 24 (skanda.2.18.24)
स्वयं तत्पूजनं भक्त्या तदर्थे देहचेष्टितम् । तन्माहात्म्यकथावांछाश्रवणेष्वादरस्तथा ।
svayaṁ tatpūjanaṁ bhaktyā tadarthe dehaceṣṭitam tanmāhātmyakathāvāṁchāśravaṇeṣvādarastathā
स्वयं भक्तिपूर्वक उनकी पूजा करना, उनके लिए शरीर से सेवा-कार्य करना, उनकी महिमा की कथा सुनने की इच्छा और उसमें आदर,
श्लोक 25 (skanda.2.18.25)
स्वरनेत्रशरीरेषु विकारस्फुरणं तथा । श्रीनिवासस्य देवस्य स्मरणं सततं तथा ।
svaranetraśarīreṣu vikārasphuraṇaṁ tathā śrīnivāsasya devasya smaraṇaṁ satataṁ tathā
स्वर, नेत्र और शरीर में भाव-विकार का स्फुरण होना, तथा देव श्रीनिवास का निरंतर स्मरण करते रहना,
श्लोक 26 (skanda.2.18.26)
वेंकटाद्रिनिवासं तमाश्रित्यैवोपजीवनम् । एवमष्टविधा भक्तिर्यस्मिन्म्लेच्छेऽपि वर्तते ।
veṁkaṭādrinivāsaṁ tamāśrityaivopajīvanam evamaṣṭavidhā bhaktiryasminmlecche'pi vartate
और वेंकटाद्रि-निवासी उन्हीं का आश्रय लेकर जीवन-यापन करना। यह आठ प्रकार की भक्ति जिसमें भी, चाहे वह म्लेच्छ ही क्यों न हो,
श्लोक 27 (skanda.2.18.27)
स एव मुक्तिमाप्नोति शौनकाद्या महौजसः । भक्त्या त्वनन्यया मुक्तिर्ब्रह्मज्ञानेन निश्चिता ।
sa eva muktimāpnoti śaunakādyā mahaujasaḥ bhaktyā tvananyayā muktirbrahmajñānena niścitā
वह भी मुक्ति प्राप्त कर लेता है, हे शौनक आदि महातेजस्वी ऋषियो। अनन्य भक्ति के द्वारा, ब्रह्मज्ञान के द्वारा निश्चित मुक्ति,
श्लोक 28 (skanda.2.18.28)
वेदान्तशास्त्रश्रवणाद्यतीनामूर्ध्वरेतसाम् । सा च मुक्तिर्विना ज्ञानं वेदान्तश्रवणोद्भवम् । यत्याश्रमं विना विप्रा विरक्तिं च विना तथा ।
vedāntaśāstraśravaṇādyatīnāmūrdhvaretasām sā ca muktirvinā jñānaṁ vedāntaśravaṇodbhavam yatyāśramaṁ vinā viprā viraktiṁ ca vinā tathā
जो ऊर्ध्वरेता संन्यासियों को वेदांत-शास्त्र के श्रवण से प्राप्त होती है — वह मुक्ति भी, हे विप्रो, वेदांत-श्रवण से उत्पन्न ज्ञान के बिना, संन्यास-आश्रम के बिना, और वैराग्य के बिना दुर्लभ है।
श्लोक 29 (skanda.2.18.29)
सर्वेषां चैव वर्णानामखिलाश्रमिणामपि । वेकटेश्वरदेवस्य दर्शनादेव केवलम् ।
sarveṣāṁ caiva varṇānāmakhilāśramiṇāmapi vekaṭeśvaradevasya darśanādeva kevalam
किन्तु समस्त वर्णों और समस्त आश्रमों के लोगों के लिए भी, केवल वेंकटेश्वर देव के दर्शन मात्र से ही,
श्लोक 30 (skanda.2.18.30)
अपुनर्भवदा मुक्तिर्भविष्यत्यविलंबितम् । कृमिकीटाश्च देवाश्च मुनयश्च तपोधनाः ।
apunarbhavadā muktirbhaviṣyatyavilaṁbitam kṛmikīṭāśca devāśca munayaśca tapodhanāḥ
पुनर्जन्म-रहित मुक्ति बिना विलंब के प्राप्त हो जाएगी। कीड़े-मकोड़े, देवता, और तपोधन मुनि —
श्लोक 31 (skanda.2.18.31)
तुल्या वेंकटशैलेन्द्रे श्रीनिवासप्रसादतः । पापं कृतं मयानेकमिति मा क्रियतां भयम् ।
tulyā veṁkaṭaśailendre śrīnivāsaprasādataḥ pāpaṁ kṛtaṁ mayānekamiti mā kriyatāṁ bhayam
सभी वेंकट पर्वत पर श्रीनिवास की कृपा से समान हो जाते हैं। 'मैंने अनेक पाप किए हैं' — ऐसा सोचकर भय न करे,
श्लोक 32 (skanda.2.18.32)
मा गर्वः क्रियतां पुण्यं मयाऽकारीति वा जनैः । वेंकटेशे महादेवे श्रीनिवासे विलोकिते ।
mā garvaḥ kriyatāṁ puṇyaṁ mayā'kārīti vā janaiḥ veṁkaṭeśe mahādeve śrīnivāse vilokite
और न ही यह अभिमान करे कि 'मैंने पुण्य किया है'। महादेव वेंकटेश श्रीनिवास के दर्शन हो जाने पर,
श्लोक 33 (skanda.2.18.33)
न न्यूना नाधिकाश्च स्युः किन्तु सर्वे महाजनाः । वेंकटाख्ये महापुण्ये सर्वपातकनाशने ।
na nyūnā nādhikāśca syuḥ kintu sarve mahājanāḥ veṁkaṭākhye mahāpuṇye sarvapātakanāśane
कोई न्यून नहीं रहता, न कोई अधिक — बल्कि सभी महान बन जाते हैं। वेंकट नामक उस अत्यंत पुण्यमय, समस्त पातकों को नष्ट करने वाले स्थान पर,
श्लोक 34 (skanda.2.18.34)
श्रीनिवासं परं देवं यः पश्यति सभक्तिकम् । न तेन तुल्यतामेति चतुर्वेद्यापि भूतले ।
śrīnivāsaṁ paraṁ devaṁ yaḥ paśyati sabhaktikam na tena tulyatāmeti caturvedyāpi bhūtale
जो व्यक्ति भक्तिपूर्वक परम देव श्रीनिवास के दर्शन करता है, इस पृथ्वी पर चारों वेदों का ज्ञाता भी उसकी समानता नहीं पा सकता।
श्लोक 35 (skanda.2.18.35)
वेंकटेश्वरदेवेशं यः पूजयति भक्तितः । स कोटिकुलसंयुक्तः प्रयाति हरिमंदिरम् ।
veṁkaṭeśvaradeveśaṁ yaḥ pūjayati bhaktitaḥ sa koṭikulasaṁyuktaḥ prayāti harimaṁdiram
जो भक्तिपूर्वक वेंकटेश्वर देवाधिदेव की पूजा करता है, वह करोड़ों कुलों सहित हरि के मंदिर (धाम) को प्राप्त होता है।
श्लोक 36 (skanda.2.18.36)
श्रीनिवासाच्च न समं नाधिकं पुण्यमस्ति वै । वेंकटाद्रिनिवासं तं द्वेष्टि यो मोहमास्थितः ।
śrīnivāsācca na samaṁ nādhikaṁ puṇyamasti vai veṁkaṭādrinivāsaṁ taṁ dveṣṭi yo mohamāsthitaḥ
श्रीनिवास के समान या उससे अधिक कोई पुण्य नहीं है। जो मोहग्रस्त होकर वेंकटाद्रि-निवासी उन देव से द्वेष करता है,
श्लोक 37 (skanda.2.18.37)
ब्रह्महत्यायुतं तेन कृतं नरककारणम् । तत्संभाषणमात्रेण मानवो नरकं व्रजेत् ।
brahmahatyāyutaṁ tena kṛtaṁ narakakāraṇam tatsaṁbhāṣaṇamātreṇa mānavo narakaṁ vrajet
वह मानो हज़ारों ब्रह्महत्याओं के समान नरक का कारण उत्पन्न कर लेता है; उससे बातचीत करने मात्र से ही मनुष्य नरक को प्राप्त होता है।
श्लोक 38 (skanda.2.18.38)
श्रीनिवासपरा वेदाः श्रीनिवासपरा मखाः । श्रीनिवासपराः सर्वे तस्मादन्यन्न विद्यते ।
śrīnivāsaparā vedāḥ śrīnivāsaparā makhāḥ śrīnivāsaparāḥ sarve tasmādanyanna vidyate
वेद श्रीनिवास को ही अपना परम लक्ष्य मानते हैं, यज्ञ श्रीनिवास को ही अपना परम लक्ष्य मानते हैं, सब कुछ श्रीनिवास को ही परम लक्ष्य मानता है — उनसे बढ़कर कुछ भी नहीं है।
श्लोक 39 (skanda.2.18.39)
अन्यत्सर्वं परित्यज्य श्रीनिवासं समाश्रयेत् । सर्वयज्ञतपोदानतीर्थस्नाने तु यत्फलम् ।
anyatsarvaṁ parityajya śrīnivāsaṁ samāśrayet sarvayajñatapodānatīrthasnāne tu yatphalam
अन्य सब कुछ त्यागकर मनुष्य को श्रीनिवास की ही शरण लेनी चाहिए। समस्त यज्ञों, तपों, दानों और तीर्थ-स्नानों से जो फल प्राप्त होता है,
श्लोक 40 (skanda.2.18.40)
तत्फलं कोटिगुणितं श्रीनिवासस्य सेवया । वेंकटाद्रिनिवासं तं चिंतयन्घटिकाद्वयम् ।
tatphalaṁ koṭiguṇitaṁ śrīnivāsasya sevayā veṁkaṭādrinivāsaṁ taṁ ciṁtayanghaṭikādvayam
वह फल श्रीनिवास की सेवा से करोड़ गुना हो जाता है। वेंकटाद्रि-निवासी उन देव का दो घड़ी भी चिंतन करते हुए,
श्लोक 41 (skanda.2.18.41)
कुलैकविंशतिं धृत्वा विष्णुलोके महीयते । स्वामिपुष्करिणीतीर्थे स्नानं देवस्य दर्शनम् ।
kulaikaviṁśatiṁ dhṛtvā viṣṇuloke mahīyate svāmipuṣkariṇītīrthe snānaṁ devasya darśanam
इक्कीस पीढ़ियों को उद्धार करके मनुष्य विष्णुलोक में महिमामंडित होता है। स्वामिपुष्करिणी तीर्थ में स्नान और देव का दर्शन,
श्लोक 42 (skanda.2.18.42)
यदि लभ्येत वै पुंसां किं गङ्गाजलसेवया । वेकटेशं परं देवं यः कदापि न पश्यति ।
yadi labhyeta vai puṁsāṁ kiṁ gaṅgājalasevayā vekaṭeśaṁ paraṁ devaṁ yaḥ kadāpi na paśyati
यदि मनुष्यों को प्राप्त हो जाए, तो फिर गंगाजल की सेवा से क्या प्रयोजन रह जाता है? जो कभी भी परम देव वेंकटेश का दर्शन नहीं करता,
श्लोक 43 (skanda.2.18.43)
संकरः स तु विज्ञेयो न पितुर्बीजसंभवः । तस्मात्सर्वप्रयत्नेन वेंकटेशो दयानिधिः ।
saṁkaraḥ sa tu vijñeyo na piturbījasaṁbhavaḥ tasmātsarvaprayatnena veṁkaṭeśo dayānidhiḥ
वह वर्ण-संकर ही जानना चाहिए, न कि अपने पिता के बीज से उत्पन्न पुत्र। इसलिए, हे द्विजो, समस्त प्रयत्नों से,
श्लोक 44 (skanda.2.18.44)
द्रष्टव्योऽतिप्रयत्नेन परलोकेच्छया द्विजाः । एवं वः कथितं विप्रा वेंकटेशस्य वैभवम् ।
draṣṭavyo'tiprayatnena paralokecchayā dvijāḥ evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā veṁkaṭeśasya vaibhavam
परलोक की इच्छा रखते हुए, अत्यंत प्रयत्नपूर्वक करुणा-निधान वेंकटेश के दर्शन करने चाहिए। इस प्रकार, हे विप्रो, मैंने तुम्हें वेंकटेश का यह वैभव कह सुनाया।
श्लोक 45 (skanda.2.18.45)
यस्त्वेतच्छृणुयान्नित्यं पठते च सभक्तिकम् । स वै वेंकटनाथस्य सेवाफलमवाप्नुयात् ।
yastvetacchṛṇuyānnityaṁ paṭhate ca sabhaktikam sa vai veṁkaṭanāthasya sevāphalamavāpnuyāt
जो इसे सदा भक्तिपूर्वक सुनता और पढ़ता है, वह वेंकटनाथ की सेवा का फल प्राप्त करता है।