वैष्णव खण्ड · अध्याय 19
पापविनाशन तीर्थ महिमा
श्लोक 1 (skanda.2.19.1)
श्रीसूत उवाच । अथातः संप्रवक्ष्यामि वेंकटाचलवैभवम् । युष्माकं सावधानेन शृणुध्वं सुसमाहिताः ।
śrīsūta uvāca athātaḥ saṁpravakṣyāmi veṁkaṭācalavaibhavam yuṣmākaṁ sāvadhānena śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ
श्री सूत ने कहा — अब मैं वेंकटाचल का वैभव कहूँगा; तुम सब एकाग्रचित्त होकर सावधानीपूर्वक सुनो।
श्लोक 2 (skanda.2.19.2)
लक्षकोटिसहस्राणि सरांसि सरितस्तथा । समुद्राश्च महापुण्या वनान्यप्याश्रमा अपि ।
lakṣakoṭisahasrāṇi sarāṁsi saritastathā samudrāśca mahāpuṇyā vanānyapyāśramā api
लाखों-करोड़ों-हज़ारों सरोवर और नदियाँ, तथा अत्यंत पुण्यमय समुद्र, वन और आश्रम भी,
श्लोक 3 (skanda.2.19.3)
पुण्यानि क्षेत्रजातानि वेदारण्यादिकानि च । मुनयश्च वसिष्ठाद्या सिद्धचारणकिंनराः ।
puṇyāni kṣetrajātāni vedāraṇyādikāni ca munayaśca vasiṣṭhādyā siddhacāraṇakiṁnarāḥ
पुण्यमय तीर्थ-क्षेत्र और वेदारण्य आदि, तथा वसिष्ठ आदि मुनि, सिद्ध, चारण और किन्नर —
श्लोक 4 (skanda.2.19.4)
लक्ष्म्या सह धरण्या च भगवान्मधुसूदनः । सावित्र्या च सरस्वत्या सहैव चतुराननः ।
lakṣmyā saha dharaṇyā ca bhagavānmadhusūdanaḥ sāvitryā ca sarasvatyā sahaiva caturānanaḥ
लक्ष्मी और धरणी सहित भगवान मधुसूदन, सावित्री और सरस्वती सहित चतुरानन ब्रह्मा,
श्लोक 5 (skanda.2.19.5)
पार्वत्या सह देवेशस्त्र्यम्बकस्त्रिपुरांतकः । हेरम्बषण्मुखाद्याश्च देवाः सेन्द्रपुरोगमाः ।
pārvatyā saha deveśastryambakastripurāṁtakaḥ herambaṣaṇmukhādyāśca devāḥ sendrapurogamāḥ
पार्वती सहित त्रिपुरांतक त्र्यंबक देवेश, हेरंब और षण्मुख आदि देवता, इंद्र सहित,
श्लोक 6 (skanda.2.19.6)
आदित्यादि ग्रहाश्चैव तथाष्टवसवो द्विजाः । पितरो लोकपालाश्च तथान्ये देवतागणाः ।
ādityādi grahāścaiva tathāṣṭavasavo dvijāḥ pitaro lokapālāśca tathānye devatāgaṇāḥ
आदित्य आदि ग्रह और आठों वसु, हे द्विजो, पितर, लोकपाल, और अन्य देवगण भी,
श्लोक 7 (skanda.2.19.7)
महापातकसंघानां नाशने लोकपावने । दिवानिशं वसन्त्यंतर्वेंकटाचलमूर्धनि ।
mahāpātakasaṁghānāṁ nāśane lokapāvane divāniśaṁ vasantyaṁtarveṁkaṭācalamūrdhani
जो महापातकों के समूहों का नाश करने वाले, संसार को पवित्र करने वाले वेंकटाचल के शिखर पर, दिन-रात भीतर वास करते हैं।
श्लोक 8 (skanda.2.19.8)
तस्य दर्शनमात्रेण बुद्धिसौख्यं नृणां भवेत् । तन्मूर्धनि कृतावासा सिद्धचारणयोषितः ।
tasya darśanamātreṇa buddhisaukhyaṁ nṛṇāṁ bhavet tanmūrdhani kṛtāvāsā siddhacāraṇayoṣitaḥ
उसके दर्शन मात्र से मनुष्यों को बुद्धि और सुख प्राप्त होते हैं। उसके शिखर पर निवास करने वाली सिद्ध और चारणों की स्त्रियाँ,
श्लोक 9 (skanda.2.19.9)
पूजयंति सदाकालं वेंकटेशं कृपानिधिम् । कोटयो ब्रह्महत्यानामगम्यागमकोटयः ।
pūjayaṁti sadākālaṁ veṁkaṭeśaṁ kṛpānidhim koṭayo brahmahatyānāmagamyāgamakoṭayaḥ
सदा-सर्वदा करुणा-निधान वेंकटेश की पूजा करती हैं। करोड़ों ब्रह्महत्याएँ और करोड़ों अगम्यागमन के पाप,
श्लोक 10 (skanda.2.19.10)
अङ्गलग्ना विनश्यंति वेंकटाचलमारुतैः ।
aṅgalagnā vinaśyaṁti veṁkaṭācalamārutaiḥ
शरीर से लगे हुए भी, वेंकटाचल की वायु के स्पर्श मात्र से नष्ट हो जाते हैं।
श्लोक 11 (skanda.2.19.11)
वेंकटाद्रिं गिरिं तं तु प्रार्थयेत्पुण्यवर्धनम् । स्वर्णाचल महापुण्य सर्वदेवनिषेवित ।
veṁkaṭādriṁ giriṁ taṁ tu prārthayetpuṇyavardhanam svarṇācala mahāpuṇya sarvadevaniṣevita
वेंकटाद्रि पर्वत से, जो पुण्य को बढ़ाने वाला है, इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिए — 'हे स्वर्णाचल! हे महापुण्यमय! हे समस्त देवताओं द्वारा सेवित पर्वत!
श्लोक 12 (skanda.2.19.12)
ब्रह्मादयोऽपि यं देवाः सेवन्ते श्रद्धया सह । तं भवन्तमहं पद्भ्यामाक्रमेयं नगोत्तम ।
brahmādayo'pi yaṁ devāḥ sevante śraddhayā saha taṁ bhavantamahaṁ padbhyāmākrameyaṁ nagottama
ब्रह्मा आदि देवता भी जिसकी श्रद्धापूर्वक सेवा करते हैं, हे श्रेष्ठ पर्वत, आज मैं अपने पैरों से तुम पर पदार्पण करूँगा।
श्लोक 13 (skanda.2.19.13)
क्षमस्व तदघं मेऽद्य दयया पापचेतसः । त्वन्मूर्धनि कृतावासं माधवं दर्शयस्व मे ।
kṣamasva tadaghaṁ me'dya dayayā pāpacetasaḥ tvanmūrdhani kṛtāvāsaṁ mādhavaṁ darśayasva me
पापी चित्त वाले मेरे उस दोष को आज दया करके क्षमा कीजिए। अपने शिखर पर निवास करने वाले माधव के दर्शन मुझे कराइए।'
श्लोक 14 (skanda.2.19.14)
प्रार्थयित्वा नरस्त्वेवं वेंकटाद्रिं नगोत्तमम् । ततो मृदुपदं गच्छेत्पावनं वेंकटाचलम् ।
prārthayitvā narastvevaṁ veṁkaṭādriṁ nagottamam tato mṛdupadaṁ gacchetpāvanaṁ veṁkaṭācalam
इस प्रकार श्रेष्ठ पर्वत वेंकटाद्रि से प्रार्थना करके, मनुष्य को फिर मृदु पगों से पवित्र वेंकटाचल पर चढ़ना चाहिए।
श्लोक 15 (skanda.2.19.15)
वेंकटाद्रौ महापुण्ये सर्वपातकनाशने । स्वामिपुष्करिणीतीर्थे स्नात्वा नियमपूर्वकम् ।
veṁkaṭādrau mahāpuṇye sarvapātakanāśane svāmipuṣkariṇītīrthe snātvā niyamapūrvakam
अत्यंत पुण्यमय, समस्त पातकों को नष्ट करने वाले वेंकटाद्रि पर, स्वामिपुष्करिणी तीर्थ में विधिपूर्वक स्नान करके,
श्लोक 16 (skanda.2.19.16)
पिण्डदानं ततः कुर्यादपि सर्षपमात्रकम् । शमीदलसमानान्वा दद्यात्पिंडान्पितॄन्प्रति ।
piṇḍadānaṁ tataḥ kuryādapi sarṣapamātrakam śamīdalasamānānvā dadyātpiṁḍānpitṝnprati
फिर पितरों के लिए राई के दाने बराबर ही सही, पिंड-दान करना चाहिए, या शमी के पत्ते के बराबर पिंड पितरों को अर्पित करने चाहिए।
श्लोक 17 (skanda.2.19.17)
स्वर्गस्था मोक्षमायांति स्वर्गं नरकवासिनः ।
svargasthā mokṣamāyāṁti svargaṁ narakavāsinaḥ
[इससे] स्वर्गवासी पितर मोक्ष को प्राप्त होते हैं, और नरकवासी पितर स्वर्ग को प्राप्त होते हैं।
श्लोक 18 (skanda.2.19.18)
ततस्तस्योपरि महत्सर्वलोकेषु विश्रुतम् । सर्वतीर्थोत्तमं पुण्यं नाम्ना पापविनाशनम् ।
tatastasyopari mahatsarvalokeṣu viśrutam sarvatīrthottamaṁ puṇyaṁ nāmnā pāpavināśanam
फिर उसके ऊपर एक महान, सम्पूर्ण लोकों में विख्यात, समस्त तीर्थों में श्रेष्ठ, पुण्यमय तीर्थ है, जो 'पापविनाशन' नाम से जाना जाता है,
श्लोक 19 (skanda.2.19.19)
अस्ति पुण्यतमे विप्राः पवित्रे वेंकटाचले । यस्य संस्मरणादेव गर्भवासो न विद्यते ।
asti puṇyatame viprāḥ pavitre veṁkaṭācale yasya saṁsmaraṇādeva garbhavāso na vidyate
हे विप्रो, अत्यंत पुण्यमय, पवित्र वेंकटाचल में स्थित, जिसके स्मरण मात्र से गर्भ में निवास (पुनर्जन्म) नहीं होता।
श्लोक 20 (skanda.2.19.20)
तत्प्राप्य तु नरः स्नायात्स्वामितीर्थस्य चोत्तरे । तत्र स्नानान्नरा यांति वैकुण्ठं नात्र संशयः ।
tatprāpya tu naraḥ snāyātsvāmitīrthasya cottare tatra snānānnarā yāṁti vaikuṇṭhaṁ nātra saṁśayaḥ
उसे प्राप्त करके मनुष्य को स्वामितीर्थ के उत्तर में स्नान करना चाहिए। वहाँ स्नान करने से मनुष्य वैकुण्ठ को प्राप्त होते हैं, इसमें कोई संशय नहीं है।
श्लोक 21 (skanda.2.19.21)
ऋषय ऊचुः । सूत पापविनाशाख्यतीर्थस्य ब्रूहि वैभवम् । व्यासेन बोधितस्त्वं हि वेत्सि सर्वं महामुने ।
ṛṣaya ūcuḥ sūta pāpavināśākhyatīrthasya brūhi vaibhavam vyāsena bodhitastvaṁ hi vetsi sarvaṁ mahāmune
ऋषियों ने कहा — हे सूत! पापविनाशन नामक उस तीर्थ का वैभव बताइए। हे महामुने! व्यास द्वारा शिक्षित होने के कारण आप सब कुछ जानते हैं।
श्लोक 22 (skanda.2.19.22)
श्रीसूत उवाच । ब्रह्माश्रमपदे वृत्तां पार्श्वे हिमवतः शुभे । वक्ष्यामि ब्राह्मणश्रेष्ठा युष्माकं तु कथां शुभाम् ।
śrīsūta uvāca brahmāśramapade vṛttāṁ pārśve himavataḥ śubhe vakṣyāmi brāhmaṇaśreṣṭhā yuṣmākaṁ tu kathāṁ śubhām
श्री सूत ने कहा — हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! हिमालय के शुभ पार्श्व में स्थित ब्रह्माश्रम-पद में घटित तुम्हारी यह शुभ कथा मैं कहूँगा।
श्लोक 23 (skanda.2.19.23)
तदाश्रमपदं पुण्यं ब्रह्माश्रमपदं शुभम् । नानावृक्षसमाकीर्णं पार्श्वे हिमवतः शुभे ।
tadāśramapadaṁ puṇyaṁ brahmāśramapadaṁ śubham nānāvṛkṣasamākīrṇaṁ pārśve himavataḥ śubhe
वह पुण्यमय, शुभ आश्रम-स्थल, जो हिमालय के शुभ पार्श्व में विविध वृक्षों से भरा हुआ था,
श्लोक 24 (skanda.2.19.24)
बहुगुल्मलताकीर्णं मृगद्विपनिषेवितम् । सिद्धचारणसंघुष्टं रम्यं पुष्पितकाननम् ।
bahugulmalatākīrṇaṁ mṛgadvipaniṣevitam siddhacāraṇasaṁghuṣṭaṁ ramyaṁ puṣpitakānanam
अनेक झाड़ियों और लताओं से भरा, मृगों और हाथियों से सेवित, सिद्धों और चारणों की ध्वनि से गूँजता, रमणीय, फूलों से लदा वन,
श्लोक 25 (skanda.2.19.25)
यतिभिर्बहुभिः कीर्णं तापसैरुपशोभितम् । ब्राह्मणैश्च महाभागैः सूर्यज्वलनसन्निभैः ।
yatibhirbahubhiḥ kīrṇaṁ tāpasairupaśobhitam brāhmaṇaiśca mahābhāgaiḥ sūryajvalanasannibhaiḥ
अनेक संन्यासियों से भरा, तपस्वियों से सुशोभित, सूर्य के समान तेजस्वी महाभाग्यशाली ब्राह्मणों से,
श्लोक 26 (skanda.2.19.26)
नियमव्रतसम्पन्नैः समाकीर्णे तपस्विभिः । दीक्षितैर्यागशीलैश्च यताहारैः कृतात्मभिः ।
niyamavratasampannaiḥ samākīrṇe tapasvibhiḥ dīkṣitairyāgaśīlaiśca yatāhāraiḥ kṛtātmabhiḥ
नियम-व्रत से संपन्न तपस्वियों से भरा हुआ, दीक्षित यज्ञशील, संयमित आहार वाले, जितेंद्रिय पुरुषों से,
श्लोक 27 (skanda.2.19.27)
वेदाध्ययनसंपन्नैर्वैदिकैः परिवेष्टितम् । वर्णिभिश्च गृहस्थैश्च वानप्रस्थैश्च भिक्षुभिः ।
vedādhyayanasaṁpannairvaidikaiḥ pariveṣṭitam varṇibhiśca gṛhasthaiśca vānaprasthaiśca bhikṣubhiḥ
वेद-अध्ययन-संपन्न वैदिकों से घिरा हुआ, ब्रह्मचारियों, गृहस्थों, वानप्रस्थों और भिक्षुओं से,
श्लोक 28 (skanda.2.19.28)
स्वाश्रमाचारनिरतैः स्ववर्णोक्तविधायिभिः । वालखिल्यैश्च ऋषिभिः समंतात्परिवेष्टितम् ।
svāśramācāranirataiḥ svavarṇoktavidhāyibhiḥ vālakhilyaiśca ṛṣibhiḥ samaṁtātpariveṣṭitam
अपने-अपने आश्रम के आचार में तत्पर, अपनी-अपनी जाति के अनुसार विधियों का पालन करने वाले, वालखिल्य ऋषियों से सब ओर घिरा हुआ था।
श्लोक 29 (skanda.2.19.29)
तत्राश्रमे पुरा कश्चिच्छूद्रो दृढमतिर्द्विजाः । साहसी ब्राह्मणाभ्याशमाजगाम मुदान्वितः ।
tatrāśrame purā kaścicchūdro dṛḍhamatirdvijāḥ sāhasī brāhmaṇābhyāśamājagāma mudānvitaḥ
हे द्विजो! उस आश्रम में पूर्वकाल में दृढ़मति नाम का एक साहसी शूद्र, प्रसन्न मन से,
श्लोक 30 (skanda.2.19.30)
आगतो ह्याश्रमपदं पूजितश्च तपस्विभिः । नाम्ना दृढमतिः शूद्रः साष्टांगं प्रणनाम वै ।
āgato hyāśramapadaṁ pūjitaśca tapasvibhiḥ nāmnā dṛḍhamatiḥ śūdraḥ sāṣṭāṁgaṁ praṇanāma vai
आश्रम में आया, और तपस्वियों द्वारा पूजित होकर, उस शूद्र दृढ़मति ने साष्टांग प्रणाम किया।
श्लोक 31 (skanda.2.19.31)
तान्स दृष्ट्वा मुनिगणान्देवकल्पान्महौजसः । कुर्वतो विविधान्यज्ञान्संप्राशहृष्यत शूद्रकः ।
tānsa dṛṣṭvā munigaṇāndevakalpānmahaujasaḥ kurvato vividhānyajñānsaṁprāśahṛṣyata śūdrakaḥ
वहाँ विविध यज्ञ करते हुए, देवताओं के समान तेजस्वी उन मुनियों के समूहों को देखकर, वह शूद्र अत्यंत प्रसन्न हुआ।
श्लोक 32 (skanda.2.19.32)
अथास्य बुद्धिरभवत्तपः कर्तुमनुत्तमम् । ततोऽब्रवीत्कुलपतिं मुनिमागत्य तापसम् ।
athāsya buddhirabhavattapaḥ kartumanuttamam tato'bravītkulapatiṁ munimāgatya tāpasam
तब उसके मन में उत्तम तप करने की इच्छा जागी। तब उसने आकर उस तपस्वी मुनि, आश्रम के प्रधान, से कहा —
श्लोक 33 (skanda.2.19.33)
दृढमतिरुवाच । तपोधन नमस्तेऽस्तु रक्ष मां करुणानिधे । तव प्रसादादिच्छामि यागं कर्तुं प्रसीद मे ।
dṛḍhamatiruvāca tapodhana namaste'stu rakṣa māṁ karuṇānidhe tava prasādādicchāmi yāgaṁ kartuṁ prasīda me
दृढ़मति ने कहा — 'हे तपोधन! आपको नमस्कार है। हे करुणा-निधान! मेरी रक्षा कीजिए। आपकी कृपा से मैं यज्ञ करना चाहता हूँ; मुझ पर प्रसन्न होइए।'
श्लोक 34 (skanda.2.19.34)
एवमुक्तस्तु शूद्रेण तमाह ब्राह्मणस्तदा ।
evamuktastu śūdreṇa tamāha brāhmaṇastadā
शूद्र द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, उस ब्राह्मण ने उससे कहा —
श्लोक 35 (skanda.2.19.35)
कुलपतिरुवाच । यागे दीक्षयितुं शक्यो न शूद्रो हीनजन्मभाक् । भूयते यदि ते बुद्धिः शुश्रूषा निरतो भव ।
kulapatiruvāca yāge dīkṣayituṁ śakyo na śūdro hīnajanmabhāk bhūyate yadi te buddhiḥ śuśrūṣā nirato bhava
कुलपति ने कहा — 'नीच जन्म पाया हुआ शूद्र यज्ञ में दीक्षित नहीं किया जा सकता। यदि तुम्हारी ऐसी इच्छा है, तो तुम सेवा में तत्पर हो जाओ।
श्लोक 36 (skanda.2.19.36)
उपदेशो न कर्तव्यो जातिहीनस्य कर्हिचित् । उपदेशे महान्दोष उपाध्यायस्यविद्यते ।
upadeśo na kartavyo jātihīnasya karhicit upadeśe mahāndoṣa upādhyāyasyavidyate
जाति-हीन को कभी भी उपदेश नहीं देना चाहिए; उपदेश देने में उपाध्याय (गुरु) का महान दोष होता है।
श्लोक 37 (skanda.2.19.37)
नाध्यापयेद्बुधः शूद्रं तथा नैव च याजयेत् । न पाठयेत्तथा शूद्रं शास्त्रं व्याकरणादिकम् ।
nādhyāpayedbudhaḥ śūdraṁ tathā naiva ca yājayet na pāṭhayettathā śūdraṁ śāstraṁ vyākaraṇādikam
बुद्धिमान को न तो शूद्र को अध्ययन कराना चाहिए, न उससे यज्ञ कराना चाहिए। न ही शूद्र को व्याकरण आदि शास्त्र पढ़ाना चाहिए,
श्लोक 38 (skanda.2.19.38)
काव्यं वा नाटकं वापि तथालंकारमेव वा । पुराणमितिहासं च शूद्रं नैव तु पाठयेत् ।
kāvyaṁ vā nāṭakaṁ vāpi tathālaṁkārameva vā purāṇamitihāsaṁ ca śūdraṁ naiva tu pāṭhayet
न काव्य, न नाटक, न अलंकार-शास्त्र। पुराण और इतिहास भी शूद्र को कभी नहीं पढ़ाने चाहिए।
श्लोक 39 (skanda.2.19.39)
यदि चोपदिशेद्विप्रः शूद्रस्यैतानि कर्हिचित् । त्यजेयुर्ब्राह्मणा विप्रं ते ग्रामाद्ब्रह्मसंकुलात् ।
yadi copadiśedvipraḥ śūdrasyaitāni karhicit tyajeyurbrāhmaṇā vipraṁ te grāmādbrahmasaṁkulāt
यदि कोई ब्राह्मण शूद्र को कभी भी इन बातों का उपदेश दे, तो अन्य ब्राह्मण उस विप्र को ब्राह्मणों से भरे गाँव से बहिष्कृत कर दें।
श्लोक 40 (skanda.2.19.40)
शूद्राय चोपदेष्टारं द्विजं चण्डालवत्त्यजेत् । शूद्रं चाक्षरसंयुक्तं दूरतः परिवर्जयेत् ।
śūdrāya copadeṣṭāraṁ dvijaṁ caṇḍālavattyajet śūdraṁ cākṣarasaṁyuktaṁ dūrataḥ parivarjayet
जो द्विज शूद्र को उपदेश देता है, उसे चांडाल के समान त्याग देना चाहिए; अक्षर-ज्ञान से युक्त शूद्र को भी दूर से ही त्याग देना चाहिए।
श्लोक 41 (skanda.2.19.41)
तच्छुश्रूषस्व भद्रं ते ब्राह्मणाच्छद्धयासह । शूद्रस्य द्विजशुश्रूषा मन्वादिभिरुदीरिता ।
tacchuśrūṣasva bhadraṁ te brāhmaṇācchaddhayāsaha śūdrasya dvijaśuśrūṣā manvādibhirudīritā
श्रद्धापूर्वक ब्राह्मण की वही सेवा करो, यह तुम्हारा कल्याण होगा। मनु आदि द्वारा शूद्र के लिए द्विज की सेवा ही निर्धारित की गई है।
श्लोक 42 (skanda.2.19.42)
न हि नैसर्गिकं कर्म परित्यक्तुं त्वमर्हसि । एवमुक्तः स मुनिना स शूद्रोऽचिन्तयत्तदा ।
na hi naisargikaṁ karma parityaktuṁ tvamarhasi evamuktaḥ sa muninā sa śūdro'cintayattadā
तुम्हें अपने स्वाभाविक कर्तव्य को त्यागना उचित नहीं है।' मुनि द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, उस शूद्र ने तब विचार किया —
श्लोक 43 (skanda.2.19.43)
किं कर्तव्यं मया त्वद्य व्रते श्रद्धा हि मे परा । यथा स्यान्ममसुज्ञान यतिष्येऽहं तथाद्य वै ।
kiṁ kartavyaṁ mayā tvadya vrate śraddhā hi me parā yathā syānmamasujñāna yatiṣye'haṁ tathādya vai
'मुझे आज क्या करना चाहिए? मुझे तो व्रत में अत्यंत श्रद्धा है। जो मेरे लिए भला हो, आज मैं वैसा ही प्रयत्न करूँगा।'
श्लोक 44 (skanda.2.19.44)
इति निश्चित्य मनसा शूद्रो दृढमतिस्तदा । गत्वाश्रमपदादूरं कृतवानुटजशुभम् ।
iti niścitya manasā śūdro dṛḍhamatistadā gatvāśramapadādūraṁ kṛtavānuṭajaśubham
मन में ऐसा निश्चय करके, वह शूद्र दृढ़मति तब आश्रम-स्थल से दूर जाकर, एक शुभ कुटिया बना ली।
श्लोक 45 (skanda.2.19.45)
तत्र वै देवतागारं पुण्यान्यायतनानि च । पुष्पारामादिकं चापि तटाकखननादिकम् ।
tatra vai devatāgāraṁ puṇyānyāyatanāni ca puṣpārāmādikaṁ cāpi taṭākakhananādikam
वहाँ उसने श्रद्धापूर्वक एक देवालय, पुण्यमय मंदिर, फूलों का बगीचा और तालाब की खुदाई आदि,
श्लोक 46 (skanda.2.19.46)
श्रद्धया कारयामास तपः सिद्ध्यर्थमात्मन । अभिषेकांश्च नियमानुपवासादिकानपि ।
śraddhayā kārayāmāsa tapaḥ siddhyarthamātmana abhiṣekāṁśca niyamānupavāsādikānapi
अपनी तप-सिद्धि के लिए करवाए, तथा अभिषेक, नियम, उपवास आदि भी किए।
श्लोक 47 (skanda.2.19.47)
बलिं कृत्वा च हुत्वा च दैवतान्यभ्यपूजयत् । संकल्पनियमोपेतः फलाहारो जितेंद्रियः ।
baliṁ kṛtvā ca hutvā ca daivatānyabhyapūjayat saṁkalpaniyamopetaḥ phalāhāro jiteṁdriyaḥ
बलि अर्पण करके और हवन करके वह देवताओं की पूजा करता रहा। संकल्प और नियम से युक्त, फल खाकर रहने वाला, इंद्रियों को जीतने वाला वह,
श्लोक 48 (skanda.2.19.48)
नित्यं कन्दैश्च मूलैश्च पुष्पैरपि तथा फलैः । अतिथीन्पूजयामास यथावत्समुपागतान् ।
nityaṁ kandaiśca mūlaiśca puṣpairapi tathā phalaiḥ atithīnpūjayāmāsa yathāvatsamupāgatān
नित्य कंद, मूल, फूल और फलों से, विधिपूर्वक वहाँ आने वाले अतिथियों की पूजा करता था।
श्लोक 49 (skanda.2.19.49)
एवं हि सुमहान्कालो व्यतिचक्राम तस्य वै ।
evaṁ hi sumahānkālo vyaticakrāma tasya vai
इस प्रकार उसका बहुत बड़ा काल बीत गया।
श्लोक 50 (skanda.2.19.50)
अथाश्रममगात्तस्य सुमतिर्नाम नामतः । द्विजो गर्गकुलोद्भूतः सत्यवादी जितेंद्रियः ।
athāśramamagāttasya sumatirnāma nāmataḥ dvijo gargakulodbhūtaḥ satyavādī jiteṁdriyaḥ
तब उसके आश्रम में सुमति नाम का एक ब्राह्मण आया, जो गर्ग-कुल में उत्पन्न, सत्यवादी और जितेंद्रिय था।
श्लोक 51 (skanda.2.19.51)
स्वागतैर्मुनिमाराध्य तोषयित्वा फलादिकैः । कथयन्वै कथाः पुण्याः कुशलं पर्यपृच्छत ।
svāgatairmunimārādhya toṣayitvā phalādikaiḥ kathayanvai kathāḥ puṇyāḥ kuśalaṁ paryapṛcchata
स्वागत करके, फलों आदि से उस मुनि (सुमति) को आराधित करके, संतुष्ट करके, वह शूद्र पवित्र कथाएँ कहता हुआ उसका कुशल-क्षेम पूछता था।
श्लोक 52 (skanda.2.19.52)
इत्थं विप्रः स पाद्याद्यैरुपचारैस्तु पूजितः । आशीर्भिरभिनन्द्यैनं प्रतिगृह्य च सत्क्रियाम् ।
itthaṁ vipraḥ sa pādyādyairupacāraistu pūjitaḥ āśīrbhirabhinandyainaṁ pratigṛhya ca satkriyām
इस प्रकार वह ब्राह्मण, पाद्य आदि उपचारों से पूजित होकर, आशीर्वादों से उसे अभिनंदित करके, उस सत्कार को स्वीकार करके,
श्लोक 53 (skanda.2.19.53)
तमापृच्छत्प्रहृष्टात्मा स्वाश्रमं पुनराययौ । एवं दिनेदिने विप्रः शूद्रेऽस्मिन्पक्षपातवान् ।
tamāpṛcchatprahṛṣṭātmā svāśramaṁ punarāyayau evaṁ dinedine vipraḥ śūdre'sminpakṣapātavān
प्रसन्न मन से उससे विदा लेकर अपने आश्रम को लौट जाता था। इस प्रकार दिन-प्रतिदिन वह ब्राह्मण इस शूद्र के प्रति पक्षपात रखने लगा,
श्लोक 54 (skanda.2.19.54)
आगच्छदाश्रमं तस्य द्रष्टुं तं शूद्रयोनिजम् । बहुकालं द्विजस्याभूत्संसर्गः शूद्रयोनिना ।
āgacchadāśramaṁ tasya draṣṭuṁ taṁ śūdrayonijam bahukālaṁ dvijasyābhūtsaṁsargaḥ śūdrayoninā
और उस शूद्र-जन्मा को देखने के लिए उसके आश्रम में आने लगा। ब्राह्मण का शूद्र-जन्मा के साथ यह संसर्ग बहुत काल तक चलता रहा।
श्लोक 55 (skanda.2.19.55)
स्नेहस्य वशमापन्नः शूद्रोक्तं नातिचक्रमे । अथागतं द्विजं शूद्रः प्राह स्नेहवशीकृतम् ।
snehasya vaśamāpannaḥ śūdroktaṁ nāticakrame athāgataṁ dvijaṁ śūdraḥ prāha snehavaśīkṛtam
स्नेह के वशीभूत होकर वह शूद्र के कहे को कभी नहीं टालता था। एक दिन उस शूद्र ने, स्नेह से वशीभूत उस ब्राह्मण से कहा —
श्लोक 56 (skanda.2.19.56)
हव्यकव्यविधानं मे ब्रूहि त्वं तु गुरुर्मतः । एवमुक्तः स शूद्रेण सर्वमेतदुपादिशत् ।
havyakavyavidhānaṁ me brūhi tvaṁ tu gururmataḥ evamuktaḥ sa śūdreṇa sarvametadupādiśat
'मुझे हव्य और कव्य (देव-कार्य और पितृ-कार्य) की विधि बताइए; मैं आपको ही अपना गुरु मानता हूँ।' इस प्रकार शूद्र द्वारा कहे जाने पर, उसने यह सब उसे सिखा दिया।
श्लोक 57 (skanda.2.19.57)
कारयामास शूद्रस्य पितृकार्यादिकं तदा । पितृकार्ये कृते तेन विसृष्टः स द्विजोत्तमः ।
kārayāmāsa śūdrasya pitṛkāryādikaṁ tadā pitṛkārye kṛte tena visṛṣṭaḥ sa dvijottamaḥ
तब उस ब्राह्मण ने उस शूद्र के लिए पितृ-कार्य आदि भी करवाए। पितृ-कार्य कर देने के बाद, वह शूद्र उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को विदा कर देता था।
श्लोक 58 (skanda.2.19.58)
अथ दीर्घेण कालेन पोषितः शूद्रयोनिना । त्यक्तो विप्रगणैः सोऽयं पञ्चत्वमगमद्द्विजः ।
atha dīrgheṇa kālena poṣitaḥ śūdrayoninā tyakto vipragaṇaiḥ so'yaṁ pañcatvamagamaddvijaḥ
अंततः दीर्घ काल तक उस शूद्र-जन्मा द्वारा पोषित रहकर, ब्राह्मणों के समूह द्वारा त्याग दिया गया, वह द्विज मृत्यु को प्राप्त हुआ।
श्लोक 59 (skanda.2.19.59)
वैवस्वतभटैर्नीत्वा पातितो नरकेष्वपि । कल्पकोटिसहस्राणि कल्पकोटिशतानि च ।
vaivasvatabhaṭairnītvā pātito narakeṣvapi kalpakoṭisahasrāṇi kalpakoṭiśatāni ca
यमराज के दूतों द्वारा ले जाकर उसे नरकों में भी गिराया गया। हज़ारों करोड़ों कल्पों और सैकड़ों करोड़ों कल्पों तक,
श्लोक 60 (skanda.2.19.60)
भुक्त्वा क्रमेण नरकांस्तदन्ते स्थावरोऽभवत् । गर्दभस्तु ततो जज्ञे विड्वराहस्ततः परम् ।
bhuktvā krameṇa narakāṁstadante sthāvaro'bhavat gardabhastu tato jajñe viḍvarāhastataḥ param
क्रमशः नरकों को भोगकर, उसके अंत में वह स्थावर (वृक्ष आदि स्थिर योनि) बना। फिर उसने गधे का जन्म पाया, उसके बाद विष्ठा-भक्षी सूअर का,
श्लोक 61 (skanda.2.19.61)
जज्ञेऽथ सारमेयोऽसौ पश्चाद्वायसतां गतः । अथ चण्डालतां प्राप्य शूद्रयोनिमगात्ततः ।
jajñe'tha sārameyo'sau paścādvāyasatāṁ gataḥ atha caṇḍālatāṁ prāpya śūdrayonimagāttataḥ
फिर उसने कुत्ते का जन्म पाया, और उसके बाद कौवे का जन्म प्राप्त किया। फिर चांडाल बनकर, उसके बाद वह शूद्र-योनि को प्राप्त हुआ,
श्लोक 62 (skanda.2.19.62)
गतवान्वैश्यतां पश्चात्क्षत्रियस्तदनन्तरम् । प्रबलैर्बाध्यमानोऽसौ ब्राह्मणो वै तदाभवत् ।
gatavānvaiśyatāṁ paścātkṣatriyastadanantaram prabalairbādhyamāno'sau brāhmaṇo vai tadābhavat
फिर वैश्य बना, और उसके बाद क्षत्रिय बना। शक्तिशाली लोगों द्वारा पीड़ित होते हुए वह तब ब्राह्मण भी बना।
श्लोक 63 (skanda.2.19.63)
उपनीतः स पित्रा तु वर्षे गर्भाष्टमे द्विजः । वर्तमानः पितुर्गेहे स्वाचाराभ्यासतत्परः ।
upanītaḥ sa pitrā tu varṣe garbhāṣṭame dvijaḥ vartamānaḥ piturgehe svācārābhyāsatatparaḥ
वह द्विज गर्भ के आठवें वर्ष में अपने पिता द्वारा उपनयन-संस्कार से युक्त किया गया। पिता के घर में रहते हुए, अपने आचार के अभ्यास में तत्पर,
श्लोक 64 (skanda.2.19.64)
गच्छन्कदाचिद्गहने गृहीतो ब्रह्मरक्षसा । रुदन्भ्रमन्स्खलन्मूढः प्रलपन्प्रहसन्नसौ ।
gacchankadācidgahane gṛhīto brahmarakṣasā rudanbhramanskhalanmūḍhaḥ pralapanprahasannasau
एक बार वह घने वन में जाते हुए एक ब्रह्मराक्षस द्वारा पकड़ लिया गया। रोता, भटकता, लड़खड़ाता, मूर्च्छित,
श्लोक 65 (skanda.2.19.65)
शश्वद्धाहेति च वदन्वैदिकं कर्म सोऽत्यजत् । दृष्ट्वा सुतं तथाभूतं पिता दुःखेन पीडितः ।
śaśvaddhāheti ca vadanvaidikaṁ karma so'tyajat dṛṣṭvā sutaṁ tathābhūtaṁ pitā duḥkhena pīḍitaḥ
बड़बड़ाता और हँसता हुआ, वह निरंतर 'हाय, हाय' कहते हुए अपने वैदिक कर्मों को त्याग बैठा। अपने पुत्र को इस अवस्था में देखकर पिता दुःख से पीड़ित हुआ,
श्लोक 66 (skanda.2.19.66)
सुतमादाय च स्नेहादगस्त्यं शरणं ययौ । सुवर्णमुखरीतीरे तपस्यन्तं शिवाग्रतः ।
sutamādāya ca snehādagastyaṁ śaraṇaṁ yayau suvarṇamukharītīre tapasyantaṁ śivāgrataḥ
और स्नेहवश अपने पुत्र को लेकर अगस्त्य मुनि की शरण में गया, जो सुवर्णमुखरी नदी के तट पर, शिव के सामने तप कर रहे थे।
श्लोक 67 (skanda.2.19.67)
भक्त्या मुनिं प्रणम्यासौ पिता तस्य सुतस्य वै । तस्मै निवेदयामास स्वपुत्रस्य विचेष्टितम् ।
bhaktyā muniṁ praṇamyāsau pitā tasya sutasya vai tasmai nivedayāmāsa svaputrasya viceṣṭitam
भक्तिपूर्वक उस मुनि को प्रणाम करके, उस पुत्र के पिता ने उन्हें अपने पुत्र की [इस दयनीय] दशा का वृत्तांत निवेदन किया।
श्लोक 68 (skanda.2.19.68)
अथागस्त्योक्त्या दुर्गत्यपनोदनार्थं सुमतेर्वेंकटाद्रिगमनम् । अब्रवीच्च तदा विप्रः कुम्भजं मुनिपुंगवम् । एष मे तनयो ब्रह्मन्गृहीतो ब्रह्मरक्षसा ।
athāgastyoktyā durgatyapanodanārthaṁ sumaterveṁkaṭādrigamanam abravīcca tadā vipraḥ kumbhajaṁ munipuṁgavam eṣa me tanayo brahmangṛhīto brahmarakṣasā
उस विप्र ने घट से जन्मे उस मुनिश्रेष्ठ अगस्त्य से कहा, 'हे ब्रह्मन्! मेरा यह पुत्र किसी ब्रह्मराक्षस द्वारा पकड़ लिया गया है।
श्लोक 69 (skanda.2.19.69)
सुखं न लभते ब्रह्मन्रक्ष तं करुणादृशा । नास्ति मे तनयोऽप्यन्यः पितॄणामृणमुक्तये ।
sukhaṁ na labhate brahmanrakṣa taṁ karuṇādṛśā nāsti me tanayo'pyanyaḥ pitṝṇāmṛṇamuktaye
हे ब्रह्मन्! इसे कोई सुख नहीं मिलता; कृपा-दृष्टि से इसकी रक्षा कीजिए। पितरों के ऋण से मुक्ति के लिए मेरा इसके अतिरिक्त कोई अन्य पुत्र भी नहीं है।
श्लोक 70 (skanda.2.19.70)
तस्य पीडाविनाशार्थमुपायं ब्रूहि कुम्भज । त्वत्समस्त्रिषु लोकेषु तपःशीलो न विद्यते ।
tasya pīḍāvināśārthamupāyaṁ brūhi kumbhaja tvatsamastriṣu lokeṣu tapaḥśīlo na vidyate
हे घटज! इसकी पीड़ा के नाश का उपाय बताइए। तीनों लोकों में तप-शीलता में आपके समान कोई नहीं है।
श्लोक 71 (skanda.2.19.71)
त्वां विनास्य परित्राता न मे पुत्रस्य विद्यते । पुत्रे दयां कुरु गुरो दयाशीला हि साधवः ।
tvāṁ vināsya paritrātā na me putrasya vidyate putre dayāṁ kuru guro dayāśīlā hi sādhavaḥ
आपके अतिरिक्त मेरे इस पुत्र का कोई अन्य रक्षक नहीं है। हे गुरु! अपने पुत्र पर दया कीजिए, क्योंकि साधुजन सदा दयाशील होते हैं।'
श्लोक 72 (skanda.2.19.72)
श्रीसूत उवाच । एवमुक्तस्तदा तेन कुम्भजो ध्यानमास्थितः । ध्यात्वा तु सुचिरं कालमब्रवीद्ब्राह्मणं ततः ।
śrīsūta uvāca evamuktastadā tena kumbhajo dhyānamāsthitaḥ dhyātvā tu suciraṁ kālamabravīdbrāhmaṇaṁ tataḥ
श्री सूत ने कहा — इस प्रकार कहे जाने पर, घटज अगस्त्य ध्यान में स्थित हो गए। बहुत देर तक ध्यान करके, उन्होंने तब उस ब्राह्मण से कहा —
श्लोक 73 (skanda.2.19.73)
अगस्त्य उवाच । पूर्वजन्मनि ते पुत्रो ब्राह्मणोऽयं महामते । सुमतिर्नाम विप्रोऽयं मतिं शूद्राय वै ददौ ।
agastya uvāca pūrvajanmani te putro brāhmaṇo'yaṁ mahāmate sumatirnāma vipro'yaṁ matiṁ śūdrāya vai dadau
अगस्त्य ने कहा — 'हे महामते! पूर्वजन्म में तुम्हारा यह पुत्र एक ब्राह्मण था। सुमति नाम का यह विप्र था, जिसने अपनी बुद्धि (विद्या) एक शूद्र को दे दी थी,
श्लोक 74 (skanda.2.19.74)
कर्माणि वैदिकान्येष सर्वाण्युपदिदेश वै । अतोऽयं नरकान्भुक्त्वा कल्पकोटिसहस्रकम् ।
karmāṇi vaidikānyeṣa sarvāṇyupadideśa vai ato'yaṁ narakānbhuktvā kalpakoṭisahasrakam
और उसे समस्त वैदिक कर्मों का उपदेश दे दिया था। इसी कारण, हज़ारों करोड़ों कल्पों तक नरकों को भोगकर,
श्लोक 75 (skanda.2.19.75)
जातो भुवि तदन्तेषु स्थावरादिषु योनिषु । इदानीं ब्राह्मणो जातः कर्मशेषेण ते सुतः ।
jāto bhuvi tadanteṣu sthāvarādiṣu yoniṣu idānīṁ brāhmaṇo jātaḥ karmaśeṣeṇa te sutaḥ
अंत में वह पृथ्वी पर स्थावर आदि योनियों में जन्मा। अब, उसी शेष कर्म के कारण, तुम्हारा पुत्र ब्राह्मण के रूप में जन्मा है,
श्लोक 76 (skanda.2.19.76)
यमेन प्रेषितेनात्र गृहीतो ब्रह्मरक्षसा । क्रूरेण पातकेनाद्य पूर्वजन्मकृतेन वै ।
yamena preṣitenātra gṛhīto brahmarakṣasā krūreṇa pātakenādya pūrvajanmakṛtena vai
और यमराज द्वारा भेजे गए एक ब्रह्मराक्षस ने उसे पकड़ लिया है — पूर्वजन्म में किए गए उसी क्रूर पाप के फलस्वरूप, आज।
श्लोक 77 (skanda.2.19.77)
उपायं ते प्रवक्ष्यामि ब्रह्मरक्षोविनाशने । शृणुष्व श्रद्धया युक्तः समाधाय च मानसम् ।
upāyaṁ te pravakṣyāmi brahmarakṣovināśane śṛṇuṣva śraddhayā yuktaḥ samādhāya ca mānasam
मैं तुम्हें उस ब्रह्मराक्षस के नाश का उपाय बताता हूँ; श्रद्धापूर्वक, मन को स्थिर करके सुनो।
श्लोक 78 (skanda.2.19.78)
सुवर्णमुखरीतीरे ऋषिसंघनिषेविते । वर्तते दैवतैः सेव्यः पावनो वेंकटाचलः ।
suvarṇamukharītīre ṛṣisaṁghaniṣevite vartate daivataiḥ sevyaḥ pāvano veṁkaṭācalaḥ
सुवर्णमुखरी नदी के तट पर, मुनियों के समूहों द्वारा सेवित, देवताओं द्वारा सेव्य, पवित्र वेंकटाचल स्थित है।
श्लोक 79 (skanda.2.19.79)
तस्योपरि महातीर्थं नाम्ना पापविनाशनम् । अस्ति पुण्यं प्रसिद्धं च महापातकनाशनम् ।
tasyopari mahātīrthaṁ nāmnā pāpavināśanam asti puṇyaṁ prasiddhaṁ ca mahāpātakanāśanam
उसके ऊपर 'पापविनाशन' नाम का एक महातीर्थ है, जो पुण्यमय, प्रसिद्ध और महापातकों का नाशक है।
श्लोक 80 (skanda.2.19.80)
भूतप्रेतपिशाचानां वेतालब्रह्मरक्षसाम् । महतां चैव रोगाणां तीर्थं तन्नाशकं स्मृतम् ।
bhūtapretapiśācānāṁ vetālabrahmarakṣasām mahatāṁ caiva rogāṇāṁ tīrthaṁ tannāśakaṁ smṛtam
भूत, प्रेत, पिशाच, वेताल और ब्रह्मराक्षस, तथा बड़े-बड़े रोगों का भी, वह तीर्थ नाशक माना गया है।
श्लोक 81 (skanda.2.19.81)
सुतमादाय गच्छ त्वं तत्तीर्थं गिरिमध्यगम् । प्रयतः स्नापय सुतं तीर्थे पापविनाशने ।
sutamādāya gaccha tvaṁ tattīrthaṁ girimadhyagam prayataḥ snāpaya sutaṁ tīrthe pāpavināśane
अपने पुत्र को लेकर तुम उस पर्वत के मध्य स्थित उस तीर्थ में जाओ। संयमपूर्वक अपने पुत्र को उस पापविनाशन तीर्थ में स्नान कराओ।
श्लोक 82 (skanda.2.19.82)
स्नानेन त्रिदिनं तत्र बह्मरक्षो विनश्यति । नैवोपायान्तरं तस्य विनाशे विद्यते भुवि ।
snānena tridinaṁ tatra bahmarakṣo vinaśyati naivopāyāntaraṁ tasya vināśe vidyate bhuvi
तीन दिन के स्नान से वहाँ ब्रह्मराक्षस नष्ट हो जाएगा। इस पृथ्वी पर उसके नाश के लिए कोई अन्य उपाय नहीं है।
श्लोक 83 (skanda.2.19.83)
तस्माच्छीघ्रं प्रयाहि त्वं वेंकटाह्वयपर्वतम् । तत्र पापविनाशाख्यतीर्थे स्नापय ते सुतम् ।
tasmācchīghraṁ prayāhi tvaṁ veṁkaṭāhvayaparvatam tatra pāpavināśākhyatīrthe snāpaya te sutam
इसलिए तुम शीघ्र ही वेंकट नामक उस पर्वत को जाओ। वहाँ पापविनाशन नामक उस तीर्थ में अपने पुत्र को स्नान कराओ।
श्लोक 84 (skanda.2.19.84)
मा विलम्बं कुरुष्वात्र त्वरया याहि वै द्विज । इत्युक्तः स द्विजोऽगस्त्यं प्रणम्य भुवि दण्डवत् ।
mā vilambaṁ kuruṣvātra tvarayā yāhi vai dvija ityuktaḥ sa dvijo'gastyaṁ praṇamya bhuvi daṇḍavat
यहाँ विलंब मत करो, हे द्विज, शीघ्रता से जाओ।' इस प्रकार कहे जाने पर, उस ब्राह्मण ने अगस्त्य को भूमि पर दंडवत प्रणाम किया,
श्लोक 85 (skanda.2.19.85)
अनुज्ञातश्च तेनासौ प्रययौ वेंकटाचलम् । सुतेन साकं विप्रोऽसौ गत्वा पापविनाशनम् ।
anujñātaśca tenāsau prayayau veṁkaṭācalam sutena sākaṁ vipro'sau gatvā pāpavināśanam
और उनकी अनुमति पाकर वह वेंकटाचल की ओर चल पड़ा। अपने पुत्र सहित उस ब्राह्मण ने पापविनाशन तीर्थ में जाकर,
श्लोक 86 (skanda.2.19.86)
संकल्पपूर्वं संस्नाप्य दिनत्रयमसौ सुतम् । सस्नौ स्वयं च विप्रेन्द्रः पिता पापविनाशने ।
saṁkalpapūrvaṁ saṁsnāpya dinatrayamasau sutam sasnau svayaṁ ca viprendraḥ pitā pāpavināśane
संकल्पपूर्वक अपने पुत्र को तीन दिनों तक स्नान कराया, और वह श्रेष्ठ ब्राह्मण पिता भी स्वयं पापविनाशन तीर्थ में स्नान करता रहा।
श्लोक 87 (skanda.2.19.87)
समागतः पपौ तोयं कृत्वा चाप्याह्निकक्रमम् । अथ तस्य सुतस्तत्र विमुक्तो ब्रह्मरक्षसा ।
samāgataḥ papau toyaṁ kṛtvā cāpyāhnikakramam atha tasya sutastatra vimukto brahmarakṣasā
वहाँ आकर उसने तीर्थ-जल पिया, और अपने नित्य आह्निक कर्म भी सम्पन्न किए। तब वहाँ उसका वह पुत्र ब्रह्मराक्षस से मुक्त हो गया,
श्लोक 88 (skanda.2.19.88)
समजायत नीरोगः स्वस्थः सुन्दररूपधृक् । सर्वसंपत्समृद्धोऽसौ भुक्त्वा भोगाननेकशः ।
samajāyata nīrogaḥ svasthaḥ sundararūpadhṛk sarvasaṁpatsamṛddho'sau bhuktvā bhogānanekaśaḥ
और नीरोग, स्वस्थ, सुंदर रूप धारण करने वाला बन गया। सम्पूर्ण संपत्तियों से समृद्ध वह अनेक भोगों का उपभोग करके,
श्लोक 89 (skanda.2.19.89)
देहान्ते प्रययौ मुक्तिं स्नानात्पापविनाशने । पितापि तत्र स्नानेन देहान्ते मुक्तिमाप्तवान् ।
dehānte prayayau muktiṁ snānātpāpavināśane pitāpi tatra snānena dehānte muktimāptavān
देह त्यागने पर मुक्ति को प्राप्त हुआ, पापविनाशन में स्नान के प्रभाव से। पिता ने भी वहाँ स्नान करके, देह त्यागने पर मुक्ति प्राप्त की।
श्लोक 90 (skanda.2.19.90)
तेनोपदिष्टोऽयं शूद्रः स भुक्त्वा नरकान्क्रमात् । अनेकासु जनित्वा च कुत्सितास्वपि योनिषु ।
tenopadiṣṭo'yaṁ śūdraḥ sa bhuktvā narakānkramāt anekāsu janitvā ca kutsitāsvapi yoniṣu
जिस शूद्र को उस [ब्राह्मण] ने उपदेश दिया था, वह भी क्रमशः नरकों को भोगकर, अनेक निंदित योनियों में भी जन्म लेकर,
श्लोक 91 (skanda.2.19.91)
गृध्रजन्माभवत्पश्चाद्वेंकटाचलभूधरे । स कदाचिज्जलं पातुं तीर्थे पापविनाशने ।
gṛdhrajanmābhavatpaścādveṁkaṭācalabhūdhare sa kadācijjalaṁ pātuṁ tīrthe pāpavināśane
बाद में वेंकटाचल पर्वत पर गीध का जन्म पाया। एक बार वह जल पीने के लिए पापविनाशन तीर्थ पर,
श्लोक 92 (skanda.2.19.92)
समागतः पपौ तोयं सिषिचे चात्मनस्तनुम् । तदैव दिव्यदेहः सन्सर्वाभरणभूषितः ।
samāgataḥ papau toyaṁ siṣice cātmanastanum tadaiva divyadehaḥ sansarvābharaṇabhūṣitaḥ
आकर उसने वह जल पिया, और उससे अपने शरीर को भी सींच लिया। उसी क्षण वह दिव्य देह धारण करके, समस्त आभूषणों से सुशोभित हो गया,
श्लोक 93 (skanda.2.19.93)
दिव्यं विमानमारुह्य प्रययावमरालयम् ।
divyaṁ vimānamāruhya prayayāvamarālayam
और दिव्य विमान पर सवार होकर अमरों के लोक को चला गया।
श्लोक 94 (skanda.2.19.94)
श्रीसूत उवाच । एवम्प्रभावमेतद्वै तीर्थं पापविनाशनम् । पापानां नाशनाद्विप्राः पापनाशाभिधं हि तत् ।
śrīsūta uvāca evamprabhāvametadvai tīrthaṁ pāpavināśanam pāpānāṁ nāśanādviprāḥ pāpanāśābhidhaṁ hi tat
श्री सूत ने कहा — ऐसा ही प्रभाव है, हे विप्रो, इस पापविनाशन तीर्थ का। पापों के नाश के कारण ही इसका नाम पापनाश है।
श्लोक 95 (skanda.2.19.95)
इत्थं रहस्यं कथितं मुनीन्द्रास्तद्वैभवं पापविनाशनस्य । यत्राभिषेकात्सहसा विमुक्तौ द्विजश्च शूद्रश्च विनिन्द्यकृत्यौ ।
itthaṁ rahasyaṁ kathitaṁ munīndrāstadvaibhavaṁ pāpavināśanasya yatrābhiṣekātsahasā vimuktau dvijaśca śūdraśca vinindyakṛtyau
इस प्रकार, हे मुनीश्रेष्ठो, मैंने तुम्हें पापविनाशन तीर्थ का यह रहस्यमय वैभव कह सुनाया, जहाँ स्नान करने मात्र से, निंदित कर्म करने वाले ब्राह्मण और शूद्र दोनों ही, तत्काल मुक्ति को प्राप्त हो गए।