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वैष्णव खण्ड · अध्याय 20

भद्रमति-विलाप एवं पापनाशन में भूदान महिमा

अध्याय 19अध्याय-सूचीअध्याय 21

श्लोक 1 (skanda.2.20.1)

श्रीसूत उवाच । पुनश्चाहं प्रवक्ष्यामि पापनाशनवैभवम् । भगवद्भक्तिभावेन शृणुध्वं सुसमाहिताः ।

śrīsūta uvāca punaścāhaṁ pravakṣyāmi pāpanāśanavaibhavam bhagavadbhaktibhāvena śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ

श्री सूत ने कहा — मैं फिर से पापनाशन तीर्थ का वैभव कहूँगा; भगवद्भक्ति के भाव से, एकाग्रचित्त होकर सुनो।

श्लोक 2 (skanda.2.20.2)

इतिहासं प्रवक्ष्यामि सर्वपापविनाशनम् । यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते नात्र संशयः ।

itihāsaṁ pravakṣyāmi sarvapāpavināśanam yacchrutvā sarvapāpebhyo mucyate nātra saṁśayaḥ

मैं एक ऐसा इतिहास कहूँगा जो समस्त पापों का नाश करने वाला है, जिसे सुनकर मनुष्य समस्त पापों से मुक्त हो जाता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 3 (skanda.2.20.3)

आसीत्पुरा द्विजवरो वेदवेदांगपारगः । दरिद्रो वृत्तिहीनश्च नाम्ना भद्रमतिर्द्विजः ।

āsītpurā dvijavaro vedavedāṁgapāragaḥ daridro vṛttihīnaśca nāmnā bhadramatirdvijaḥ

पूर्वकाल में एक श्रेष्ठ ब्राह्मण था, जो वेद-वेदांगों में पारंगत, दरिद्र और वृत्ति-हीन था, जिसका नाम भद्रमति था।

श्लोक 4 (skanda.2.20.4)

श्रुतानि सर्वशास्त्राणि तेन विप्रेण धीमता । श्रुतानि च पुराणानि धर्मशास्त्राणि सर्वशः ।

śrutāni sarvaśāstrāṇi tena vipreṇa dhīmatā śrutāni ca purāṇāni dharmaśāstrāṇi sarvaśaḥ

उस बुद्धिमान ब्राह्मण ने समस्त शास्त्रों का श्रवण किया था, सभी पुराणों और धर्मशास्त्रों का भी पूर्ण रूप से श्रवण किया था।

श्लोक 5 (skanda.2.20.5)

अभवंस्तस्य षट् पत्न्यः कृता सिंधुर्यशोवती । कामिनी मालिनी चैव शोभा चैव प्रकीर्तिताः ।

abhavaṁstasya ṣaṭ patnyaḥ kṛtā siṁdhuryaśovatī kāminī mālinī caiva śobhā caiva prakīrtitāḥ

उसकी छह पत्नियाँ थीं — सिंधु, यशोवती, कामिनी, मालिनी और शोभा नाम से विख्यात।

श्लोक 6 (skanda.2.20.6)

तासु पत्नीषु तस्यासीत्पुत्राणां च शतद्वयम् । ते सर्वे तस्य पुत्राद्याः क्षुधया परिपीडिताः ।

tāsu patnīṣu tasyāsītputrāṇāṁ ca śatadvayam te sarve tasya putrādyāḥ kṣudhayā paripīḍitāḥ

उन पत्नियों से उसे दो सौ पुत्र हुए थे। वे सभी, पुत्र आदि, भूख से अत्यंत पीड़ित थे।

श्लोक 7 (skanda.2.20.7)

अकिञ्चनो भद्रमतिः क्षुधार्तानात्मजान्प्रियान् । पश्यन्प्रियाः क्षुधार्ताश्च विललापाकुलेन्द्रियः ।

akiñcano bhadramatiḥ kṣudhārtānātmajānpriyān paśyanpriyāḥ kṣudhārtāśca vilalāpākulendriyaḥ

निर्धन भद्रमति, अपनी भूख से पीड़ित प्रिय संतानों को देखते हुए, उन भूखे प्रियजनों को देखकर व्याकुल इंद्रियों से विलाप करने लगा —

श्लोक 8 (skanda.2.20.8)

धिग्जन्म भाग्यरहितं धिग्जन्म धनवर्जितम् । धिग्जन्म कीर्तिरहितं धिग्जन्मातिथ्यवर्जितम् ।

dhigjanma bhāgyarahitaṁ dhigjanma dhanavarjitam dhigjanma kīrtirahitaṁ dhigjanmātithyavarjitam

'धिक्कार है भाग्यहीन जन्म को, धिक्कार है धनहीन जन्म को, धिक्कार है कीर्तिहीन जन्म को, धिक्कार है आतिथ्यहीन जन्म को,

श्लोक 9 (skanda.2.20.9)

धिग्जन्माचाररहितं धिग्जन्म ज्ञानवर्जितम् । धिग्जन्म यत्नरहितं धिग्जन्म सुखवर्जितम् ।

dhigjanmācārarahitaṁ dhigjanma jñānavarjitam dhigjanma yatnarahitaṁ dhigjanma sukhavarjitam

धिक्कार है सदाचार-हीन जन्म को, धिक्कार है ज्ञान-हीन जन्म को, धिक्कार है प्रयत्न-हीन जन्म को, धिक्कार है सुख-हीन जन्म को,

श्लोक 10 (skanda.2.20.10)

धिग्जन्म बन्धुरहितं धिग्जन्म ख्यातिवर्जितम् । नरस्य बह्वपत्यस्य धिग्जन्मैश्वर्यवर्जितम् ।

dhigjanma bandhurahitaṁ dhigjanma khyātivarjitam narasya bahvapatyasya dhigjanmaiśvaryavarjitam

धिक्कार है बंधु-हीन जन्म को, धिक्कार है ख्याति-हीन जन्म को। अनेक संतानों वाले मनुष्य का ऐश्वर्य-हीन जन्म भी धिक्कार योग्य है।

श्लोक 11 (skanda.2.20.11)

अहो गुणाः सौम्यता च विद्वत्ता जन्म सत्कुले । दारिद्र्याम्बुधिमग्नस्य सर्वमेतन्न शोभते ।

aho guṇāḥ saumyatā ca vidvattā janma satkule dāridryāmbudhimagnasya sarvametanna śobhate

अहो! सुंदरता, विद्वत्ता, कुलीनता में जन्म — ये सारे गुण दरिद्रता के सागर में डूबे हुए व्यक्ति के लिए शोभा नहीं देते।

श्लोक 12 (skanda.2.20.12)

विप्राः पुत्राश्च पौत्राश्च बान्धवा भ्रातरस्तथा । शिष्याश्च सर्वे मनुजास्त्यजन्त्यैश्वर्यवर्जितम् ।

viprāḥ putrāśca pautrāśca bāndhavā bhrātarastathā śiṣyāśca sarve manujāstyajantyaiśvaryavarjitam

ब्राह्मण, पुत्र, पौत्र, बंधु-बांधव, भाई और शिष्य — ये सब ही उस मनुष्य को त्याग देते हैं, जो ऐश्वर्य-रहित है।

श्लोक 13 (skanda.2.20.13)

इति निश्चित्य मतिमान्धीरो भद्रमतिर्द्विजः । चण्डालो वा द्विजो वापि भाग्यवानेव पूज्यते ।

iti niścitya matimāndhīro bhadramatirdvijaḥ caṇḍālo vā dvijo vāpi bhāgyavāneva pūjyate

इस प्रकार निश्चय करके, वह बुद्धिमान, धीर ब्राह्मण भद्रमति [आगे विलाप करने लगा] — 'चांडाल हो या ब्राह्मण, भाग्यवान ही पूजा जाता है;

श्लोक 14 (skanda.2.20.14)

दरिद्रः पुरुषो लोके शववल्लोकनिन्दितः । अहो सम्पत्समायुक्तो निष्ठुरो वाप्यनिष्ठुरः ।

daridraḥ puruṣo loke śavavallokaninditaḥ aho sampatsamāyukto niṣṭhuro vāpyaniṣṭhuraḥ

दरिद्र पुरुष तो इस संसार में शव के समान निंदित होता है। अहो! सम्पन्न व्यक्ति चाहे निष्ठुर हो या न हो,

श्लोक 15 (skanda.2.20.15)

गुणहीनोऽपि गुणवान्मूर्खो वापि स पण्डितः । निष्ठुरो वा गुणी वापि धर्महीनोऽथ वा नरः ।

guṇahīno'pi guṇavānmūrkho vāpi sa paṇḍitaḥ niṣṭhuro vā guṇī vāpi dharmahīno'tha vā naraḥ

गुणहीन होकर भी गुणवान माना जाता है, मूर्ख होकर भी पंडित माना जाता है। निष्ठुर हो, या गुणी हो, या धर्महीन हो,

श्लोक 16 (skanda.2.20.16)

ऐश्वर्यगुणयुक्तश्चेत्पूज्य एव न संशयः । अहो दरिद्रता दुःखं तत्राप्याशातिदुःखदा ।

aiśvaryaguṇayuktaścetpūjya eva na saṁśayaḥ aho daridratā duḥkhaṁ tatrāpyāśātiduḥkhadā

यदि वह ऐश्वर्य के गुण से युक्त हो, तो वह पूजनीय ही बनता है, इसमें कोई संशय नहीं है। अहो, दरिद्रता दुःखमयी है, और उसमें भी आशा अत्यंत दुःखदायी है।

श्लोक 17 (skanda.2.20.17)

आशाभिभूताः पुरुषा दुःखमश्नुवते क्षणात् ।

āśābhibhūtāḥ puruṣā duḥkhamaśnuvate kṣaṇāt

आशा से अभिभूत मनुष्य क्षण भर में ही दुःख भोगने लगते हैं।

श्लोक 18 (skanda.2.20.18)

आशाया ये दासा दासास्ते सर्वलोकस्य । आशा दासी येषां तेषां दासायते लोकः ।

āśāyā ye dāsā dāsāste sarvalokasya āśā dāsī yeṣāṁ teṣāṁ dāsāyate lokaḥ

जो आशा के दास हैं, वे सारे संसार के दास हैं। जिनकी आशा दासी बन जाती है, उनका तो सारा संसार ही दास बन जाता है [उलटा भी सत्य है]।

श्लोक 19 (skanda.2.20.19)

सर्वशास्त्रार्थवेत्तापि दरिद्रो भाति मूर्खवत् । आकिञ्चन्यमहाग्राहग्रस्तानां नास्ति मोचकः ।

sarvaśāstrārthavettāpi daridro bhāti mūrkhavat ākiñcanyamahāgrāhagrastānāṁ nāsti mocakaḥ

समस्त शास्त्रों के अर्थ का ज्ञाता होकर भी दरिद्र व्यक्ति मूर्ख जैसा ही दिखाई देता है। अकिंचनता (निर्धनता) रूपी महान ग्राह (मगरमच्छ) द्वारा ग्रस्त व्यक्तियों का कोई मुक्तिदाता नहीं है।

श्लोक 20 (skanda.2.20.20)

अहो दुःखमहो दुःखमहो दुःखं दरिद्रता । तत्रापि पुत्रदाराणां बाहुल्यमतिदुःखदम् ।

aho duḥkhamaho duḥkhamaho duḥkhaṁ daridratā tatrāpi putradārāṇāṁ bāhulyamatiduḥkhadam

अहो दुःख, अहो दुःख, अहो दुःख है यह दरिद्रता! और उसमें भी पुत्रों और पत्नियों की अधिकता अत्यंत दुःखदायी है।'

श्लोक 21 (skanda.2.20.21)

एवमुक्त्वा भद्रमतिः सर्वशास्त्रार्थपारगः । अत्यैश्वर्यप्रदं धर्मं मनसा चिन्तयंस्तदा । तूष्णीं स्थितो भद्रमतिमहाक्लेशसमन्वितः ।

evamuktvā bhadramatiḥ sarvaśāstrārthapāragaḥ atyaiśvaryapradaṁ dharmaṁ manasā cintayaṁstadā tūṣṇīṁ sthito bhadramatimahākleśasamanvitaḥ

समस्त शास्त्रों के अर्थ में पारंगत भद्रमति ऐसा कहकर, मन में अत्यंत ऐश्वर्य देने वाले धर्म का चिंतन करते हुए, महाक्लेश से युक्त होकर चुपचाप बैठ गया।

श्लोक 22 (skanda.2.20.22)

तदानीं तासु भार्यासु कामिनी पतिदेवता ।

tadānīṁ tāsu bhāryāsu kāminī patidevatā

उसी समय उन पत्नियों में से कामिनी, जो अपने पति को ही देवता मानने वाली थी,

श्लोक 23 (skanda.2.20.23)

भार्या साधुगुणैर्युक्ता पतिं तं प्रत्यभाषत ।

bhāryā sādhuguṇairyuktā patiṁ taṁ pratyabhāṣata

वह सद्गुणों से युक्त पत्नी, अपने पति से बोली।

श्लोक 24 (skanda.2.20.24)

कामिन्युवाच । भगवन्सर्वधर्मज्ञ सर्वशास्त्रार्थपारग । मम नाथ महाभाग वाक्यं शृणु महामते ।

kāminyuvāca bhagavansarvadharmajña sarvaśāstrārthapāraga mama nātha mahābhāga vākyaṁ śṛṇu mahāmate

कामिनी ने कहा — हे भगवन्, हे सर्वधर्मज्ञ, हे समस्त शास्त्रों के अर्थ में पारंगत! हे मेरे स्वामी, हे महाभाग! मेरा वचन सुनिए, हे महामते!

श्लोक 25 (skanda.2.20.25)

सुवर्णमुखरीतीरे ऋषिसंघनिषेविते । वर्तते दैवतैः सेव्यः पावनो वेंकटाचलः ।

suvarṇamukharītīre ṛṣisaṁghaniṣevite vartate daivataiḥ sevyaḥ pāvano veṁkaṭācalaḥ

सुवर्णमुखरी नदी के तट पर, मुनियों के समूहों द्वारा सेवित, देवताओं द्वारा सेव्य, पवित्र वेंकटाचल स्थित है।

श्लोक 26 (skanda.2.20.26)

तस्मिन्वेंकटशैलेन्द्रे सुरासुरनमस्कृते । वर्तते पावनं तीर्थं पापानां दाहकं शुभम् ।

tasminveṁkaṭaśailendre surāsuranamaskṛte vartate pāvanaṁ tīrthaṁ pāpānāṁ dāhakaṁ śubham

उस वेंकट पर्वत पर, जो देवताओं और असुरों दोनों द्वारा नमस्कृत है, एक पवित्र, शुभ तीर्थ स्थित है, जो पापों को जला देने वाला है।

श्लोक 27 (skanda.2.20.27)

तत्र गत्वा महाभाग पापनाशे महामते । कुरु स्नानं प्रयत्नेन भार्यापुत्रसमन्वितः ।

tatra gatvā mahābhāga pāpanāśe mahāmate kuru snānaṁ prayatnena bhāryāputrasamanvitaḥ

हे महाभाग, हे महामते! वहाँ पापनाश तीर्थ में जाकर, पत्नी और पुत्रों सहित यत्नपूर्वक स्नान कीजिए।

श्लोक 28 (skanda.2.20.28)

तस्य तीर्थस्य माहात्म्यं नारदाच्च श्रुतं मया । बालभावे मम पितुरंतिके प्रोक्तवान्मुनिः ।

tasya tīrthasya māhātmyaṁ nāradācca śrutaṁ mayā bālabhāve mama pituraṁtike proktavānmuniḥ

उस तीर्थ की महिमा मैंने नारद मुनि से सुनी थी; उन्होंने मेरे पिता के बचपन में, मेरे पिता के समीप, यह बात कही थी।

श्लोक 29 (skanda.2.20.29)

वेंकटाद्रौ महापुण्ये सर्वपातकनाशने । सर्वदुःखप्रशमने सर्वसंपत्प्रदायके ।

veṁkaṭādrau mahāpuṇye sarvapātakanāśane sarvaduḥkhapraśamane sarvasaṁpatpradāyake

अत्यंत पुण्यमय, समस्त पापों का नाश करने वाले, समस्त दुःखों को शांत करने वाले, समस्त संपत्तियाँ देने वाले वेंकटाद्रि पर,

श्लोक 30 (skanda.2.20.30)

पापनाशे महातीर्थे स्नात्वा संकल्पपूर्वकम् । अत्यैश्वर्यप्रदं धर्मं मनसा चिन्तयंस्तदा ।

pāpanāśe mahātīrthe snātvā saṁkalpapūrvakam atyaiśvaryapradaṁ dharmaṁ manasā cintayaṁstadā

पापनाश नामक महातीर्थ में संकल्पपूर्वक स्नान करके, मन में अत्यंत ऐश्वर्य देने वाले धर्म का चिंतन करते हुए,

श्लोक 31 (skanda.2.20.31)

भूमिदानं विनिश्चित्य सर्वदानोत्तमोत्तमम् । प्रापकं परलोकस्य सर्वकामफलप्रदम् ।

bhūmidānaṁ viniścitya sarvadānottamottamam prāpakaṁ paralokasya sarvakāmaphalapradam

भूमि-दान का निश्चय करना चाहिए, जो समस्त दानों में सर्वोत्तम है, परलोक की प्राप्ति करानेवाला और समस्त कामनाओं के फल को देने वाला है।

श्लोक 32 (skanda.2.20.32)

दानानामुत्तमं दानं भूदानं परिकीर्तितम् । तद्दत्त्वा समवाप्नोति यद्यदिष्टतमं नरः ।

dānānāmuttamaṁ dānaṁ bhūdānaṁ parikīrtitam taddattvā samavāpnoti yadyadiṣṭatamaṁ naraḥ

दानों में सर्वोत्तम दान भूदान ही कहा गया है; उसे देकर मनुष्य जो-जो सर्वाधिक इच्छित हो, वह सब प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 33 (skanda.2.20.33)

इत्येवं नारदेनोक्तं श्रुत्वा मे जनको द्विजः । संप्रहृष्टमना भूत्वा शेषाद्रिं प्राप्तवांस्तदा ।

ityevaṁ nāradenoktaṁ śrutvā me janako dvijaḥ saṁprahṛṣṭamanā bhūtvā śeṣādriṁ prāptavāṁstadā

नारद द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, यह सुनकर मेरे पिता, हे द्विज, अत्यंत प्रसन्न मन से शेषाद्रि पहुँचे थे।

श्लोक 34 (skanda.2.20.34)

तत्र गत्वा महाभागः सर्वसंपत्प्रदायकम् । भूदानं विप्रवर्याय श्रोत्रियाय प्रदत्तवान् ।

tatra gatvā mahābhāgaḥ sarvasaṁpatpradāyakam bhūdānaṁ vipravaryāya śrotriyāya pradattavān

वहाँ जाकर, उस महाभाग्यशाली ने सभी संपत्तियाँ देने वाला भूमि-दान एक श्रेष्ठ, श्रोत्रिय ब्राह्मण को दिया था।

श्लोक 35 (skanda.2.20.35)

ततो मे जनको विद्वन्सर्वभाग्यसमन्वितः । इहलोके सुखं प्राप्य चान्ते विष्णुपुरं ययौ ।

tato me janako vidvansarvabhāgyasamanvitaḥ ihaloke sukhaṁ prāpya cānte viṣṇupuraṁ yayau

तब से मेरे पिता, हे विद्वन्, समस्त सौभाग्य से युक्त हो गए; इस लोक में सुख पाकर, अंत में वे विष्णु के धाम को गए।

श्लोक 36 (skanda.2.20.36)

त्वं च गत्वा महाभाग वेंकटाद्रिं नगोत्तमम् । कुरु दानं प्रयत्नेन भूदानं सर्वकामदम् ।

tvaṁ ca gatvā mahābhāga veṁkaṭādriṁ nagottamam kuru dānaṁ prayatnena bhūdānaṁ sarvakāmadam

आप भी, हे महाभाग, उस श्रेष्ठ पर्वत वेंकटाद्रि पर जाकर, यत्नपूर्वक सर्वकाम-प्रद भूदान कीजिए।

श्लोक 37 (skanda.2.20.37)

अथ कामिनीकथितभूदानप्रशंसा । भूमिदानस्य माहात्म्यं शृणुष्व सुसमाहितः । न कोऽपि गदितुं शक्तो लोकेऽस्मिन्भगवन्प्रभो ।

atha kāminīkathitabhūdānapraśaṁsā bhūmidānasya māhātmyaṁ śṛṇuṣva susamāhitaḥ na ko'pi gadituṁ śakto loke'sminbhagavanprabho

[इसके बाद कामिनी द्वारा कही गई भूमि-दान की प्रशंसा] — भूमि-दान की महिमा सुनिए, एकाग्रचित्त होकर। हे भगवन्, हे प्रभु! इस संसार में इसका वर्णन कोई भी पूर्णतः नहीं कर सकता।

श्लोक 38 (skanda.2.20.38)

भूमिदानात्परं दानं न भूतं न भविष्यति । परं निर्वाणमाप्नोति भूमिदो नात्र संशयः ।

bhūmidānātparaṁ dānaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati paraṁ nirvāṇamāpnoti bhūmido nātra saṁśayaḥ

भूमि-दान से बढ़कर कोई दान न हुआ है, न होगा। भूमि देने वाला निश्चय ही परम निर्वाण को प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 39 (skanda.2.20.39)

स्वल्पामपि महीं दत्त्वा श्रोत्रियायाहिताग्नये । ब्रह्मलोकमवाप्नोति पुनरावृत्तिवर्जितम् ।

svalpāmapi mahīṁ dattvā śrotriyāyāhitāgnaye brahmalokamavāpnoti punarāvṛttivarjitam

थोड़ी सी भी भूमि किसी श्रोत्रिय, अग्निहोत्री ब्राह्मण को देकर, मनुष्य ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है, जहाँ से फिर लौटना नहीं होता।

श्लोक 40 (skanda.2.20.40)

भूमिदः सर्वदः प्रोक्तो भूमिदो मोक्षभाग्भवेत् । भूभिदानं वृषाद्रौ च सर्वपापप्रणाशनम् ।

bhūmidaḥ sarvadaḥ prokto bhūmido mokṣabhāgbhavet bhūbhidānaṁ vṛṣādrau ca sarvapāpapraṇāśanam

भूमि देने वाला 'सर्वदाता' कहा गया है, भूमि देने वाला मोक्ष का भागी बनता है। वृषाद्रि (वेंकटाद्रि) पर भूमि-दान समस्त पापों का नाशक है।

श्लोक 41 (skanda.2.20.41)

महापातकयुक्तो वा युक्तो वा सर्वपातकैः । दशहस्तां महीं दत्त्वा सर्वपापैः प्रमुच्यते ।

mahāpātakayukto vā yukto vā sarvapātakaiḥ daśahastāṁ mahīṁ dattvā sarvapāpaiḥ pramucyate

चाहे कोई महापातकों से युक्त हो, या समस्त पापों से युक्त हो, दस हाथ भूमि देकर वह समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

श्लोक 42 (skanda.2.20.42)

सत्पात्रे भूमिदाता यः सर्वदानफलं लभेत् । भूमिदस्य समो नान्यस्त्रिषु लोकेषु विद्यते ।

satpātre bhūmidātā yaḥ sarvadānaphalaṁ labhet bhūmidasya samo nānyastriṣu lokeṣu vidyate

जो सत्पात्र को भूमि देता है, वह समस्त दानों का फल प्राप्त करता है; तीनों लोकों में भूमि-दाता के समान कोई अन्य नहीं है।

श्लोक 43 (skanda.2.20.43)

द्विजस्य वृत्तिहीनस्य यः प्रदद्यान्महीं शुभाम् । तस्य पुण्यफलं वक्तुं शेषो नार्हः कदाचन ।

dvijasya vṛttihīnasya yaḥ pradadyānmahīṁ śubhām tasya puṇyaphalaṁ vaktuṁ śeṣo nārhaḥ kadācana

जो वृत्ति-हीन ब्राह्मण को शुभ भूमि प्रदान करता है, उसके पुण्य-फल का वर्णन शेषनाग भी कभी नहीं कर सकते।

श्लोक 44 (skanda.2.20.44)

विप्रस्य वृत्तिहीनस्य सदाचारस्य कस्यचित् । यो ऽल्पामपि महीं दद्यात्स विष्णुर्नात्र संशयः ।

viprasya vṛttihīnasya sadācārasya kasyacit yo 'lpāmapi mahīṁ dadyātsa viṣṇurnātra saṁśayaḥ

सदाचारी किसी भी वृत्ति-हीन ब्राह्मण को जो थोड़ी सी भी भूमि देता है, वह स्वयं विष्णु है, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 45 (skanda.2.20.45)

इक्षुगोधूमकेदारपूगदृक्षादिसंयुता । पृथ्वी प्रदीयते येन स विष्णुर्नात्र संशयः ।

ikṣugodhūmakedārapūgadṛkṣādisaṁyutā pṛthvī pradīyate yena sa viṣṇurnātra saṁśayaḥ

जो ईख, गेहूँ, धान के खेत, सुपारी और अन्य वृक्षों से युक्त पृथ्वी देता है, वह स्वयं विष्णु है, इसमें कोई संशय नहीं है।

श्लोक 46 (skanda.2.20.46)

वृत्तिहीनस्य विप्रस्य दरिद्रस्य कुटुम्बिनः । स्वल्पामपि महीं दत्त्वा विष्णुसायुज्यमश्नुते ।

vṛttihīnasya viprasya daridrasya kuṭumbinaḥ svalpāmapi mahīṁ dattvā viṣṇusāyujyamaśnute

वृत्ति-हीन, दरिद्र, परिवार वाले ब्राह्मण को थोड़ी सी भी भूमि देकर मनुष्य विष्णु का सायुज्य प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 47 (skanda.2.20.47)

सक्तस्य देवपूजासु विप्रस्याटविका मही । दत्ता भवति गंगायां त्रिरात्रस्नानजं फलम् ।

saktasya devapūjāsu viprasyāṭavikā mahī dattā bhavati gaṁgāyāṁ trirātrasnānajaṁ phalam

देव-पूजा में तत्पर ब्राह्मण को दी गई वन की भूमि का फल, गंगा में तीन रात्रि स्नान करने के फल के समान माना जाता है।

श्लोक 48 (skanda.2.20.48)

विप्रस्य वृत्तिहीनस्य सदाचाररतस्य च । द्रोणिकां पृथिवीं दत्त्वा यत्फलं लभते शृणु ।

viprasya vṛttihīnasya sadācāraratasya ca droṇikāṁ pṛthivīṁ dattvā yatphalaṁ labhate śṛṇu

वृत्ति-हीन, सदाचार-निरत ब्राह्मण को एक द्रोणिका (छोटा भू-भाग) देने से जो फल प्राप्त होता है, वह सुनिए —

श्लोक 49 (skanda.2.20.49)

गंगातीरेऽश्वमेधानां शतानि विधिवन्नरः । कृत्वा यत्फलमाप्नोति तदाप्नोति महत्फलम् ।

gaṁgātīre'śvamedhānāṁ śatāni vidhivannaraḥ kṛtvā yatphalamāpnoti tadāpnoti mahatphalam

गंगा के तट पर विधिपूर्वक सैकड़ों अश्वमेध यज्ञ करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह वही महाफल प्राप्त कर लेता है।

श्लोक 50 (skanda.2.20.50)

ददाति भारिकां भूमिं दरिद्राय द्विजातये । तस्य पुण्यं प्रवक्ष्यामि मन्नाथ भगवन्प्रभो ।

dadāti bhārikāṁ bhūmiṁ daridrāya dvijātaye tasya puṇyaṁ pravakṣyāmi mannātha bhagavanprabho

जो दरिद्र ब्राह्मण को भारी भूमि दान करता है, हे मेरे स्वामी, हे भगवन् प्रभो! उसका पुण्य मैं आपको बताती हूँ —

श्लोक 51 (skanda.2.20.51)

अश्वमेधसहस्राणि वाजपेयशतानि च । विधाय जाह्नवीतीरे यत्फलं तल्लभेत सः ।

aśvamedhasahasrāṇi vājapeyaśatāni ca vidhāya jāhnavītīre yatphalaṁ tallabheta saḥ

गंगा के तट पर हज़ारों अश्वमेध और सैकड़ों वाजपेय यज्ञ करके मनुष्य जो फल प्राप्त करता है, वह वही फल प्राप्त करता है।

श्लोक 52 (skanda.2.20.52)

भूमिदानं महादानमतिदानं प्रकीर्तितम् । सर्वपापप्रशमनमपवर्गफलप्रदम् ।

bhūmidānaṁ mahādānamatidānaṁ prakīrtitam sarvapāpapraśamanamapavargaphalapradam

भूमि-दान महादान कहा गया है, अतिदान भी कहा गया है, जो समस्त पापों को शांत करने वाला और मोक्ष का फल देने वाला है।

श्लोक 53 (skanda.2.20.53)

यच्छ्रुत्वा श्रद्धया युक्तो भूमिदानफलं लभेत् । भार्याया वचनं श्रुत्वा त्वितिहाससमन्वितम् ।

yacchrutvā śraddhayā yukto bhūmidānaphalaṁ labhet bhāryāyā vacanaṁ śrutvā tvitihāsasamanvitam

जो श्रद्धापूर्वक इसे सुनता है, वह भूमि-दान का फल प्राप्त कर लेता है।' अपनी पत्नी के इतिहास सहित इन वचनों को सुनकर,

श्लोक 54 (skanda.2.20.54)

सन्तुष्टो मनसि ध्यात्वा शेषाचलनिवासिनम् ।

santuṣṭo manasi dhyātvā śeṣācalanivāsinam

वह संतुष्ट होकर, मन में शेषाचल-निवासी देव का ध्यान करने लगा।

श्लोक 55 (skanda.2.20.55)

गन्तुं प्रचक्रमे बुद्ध्या क्रीडाचलमनुत्तमम् । ततो भद्रमतिः सौम्यः सर्वधर्मपरायणः ।

gantuṁ pracakrame buddhyā krīḍācalamanuttamam tato bhadramatiḥ saumyaḥ sarvadharmaparāyaṇaḥ

तब उसने बुद्धिपूर्वक उस सर्वोत्तम क्रीड़ाचल की ओर जाने का निश्चय किया। तब वह सौम्य, समस्त धर्मों में परायण भद्रमति,

श्लोक 56 (skanda.2.20.56)

सुशालिंनाम नगरीं कलत्रसहितो ययौ । सुघोषं नाम विप्रेन्द्रं सर्वैश्वर्यसमन्वितम् ।

suśāliṁnāma nagarīṁ kalatrasahito yayau sughoṣaṁ nāma viprendraṁ sarvaiśvaryasamanvitam

अपनी पत्नी सहित सुशालि नामक नगरी को गया। समस्त ऐश्वर्य से युक्त सुघोष नाम के एक श्रेष्ठ ब्राह्मण के पास,

श्लोक 57 (skanda.2.20.57)

गत्वा याचितवान्भूमिं पञ्चहस्तायतां द्विजः । सुघोषो धर्मनिरतस्तं निरीक्ष्य कुटुम्बिनम् ।

gatvā yācitavānbhūmiṁ pañcahastāyatāṁ dvijaḥ sughoṣo dharmaniratastaṁ nirīkṣya kuṭumbinam

जाकर उस ब्राह्मण ने पाँच हाथ भूमि की याचना की। धर्मपरायण सुघोष ने उस परिवार वाले व्यक्ति को देखकर,

श्लोक 58 (skanda.2.20.58)

मनसा प्रीतिमापन्नं समभ्यर्च्यैनमब्रवीत् । कृतार्थोऽहं भद्रमते सफलं मम जन्म च । मत्कुलं चानघं जातं त्वं हि ग्राह्योऽसि मे यतः ।

manasā prītimāpannaṁ samabhyarcyainamabravīt kṛtārtho'haṁ bhadramate saphalaṁ mama janma ca matkulaṁ cānaghaṁ jātaṁ tvaṁ hi grāhyo'si me yataḥ

मन में प्रसन्नता को प्राप्त होकर, उसका सम्मान करके कहा, 'हे भद्रमति! मैं कृतार्थ हुआ, मेरा जन्म सफल हुआ, मेरा कुल भी निष्पाप हो गया, क्योंकि तुम मुझसे [कुछ] ग्रहण करने योग्य हो।'

श्लोक 59 (skanda.2.20.59)

इत्युक्त्वा तं समभ्यर्च्य सुघोषो धर्मतत्परः । पञ्चहस्तप्रमाणां तां ददौ तस्मै महामतिः ।

ityuktvā taṁ samabhyarcya sughoṣo dharmatatparaḥ pañcahastapramāṇāṁ tāṁ dadau tasmai mahāmatiḥ

ऐसा कहकर, उसका सम्मान करके, धर्म-तत्पर, बुद्धिमान सुघोष ने उसे पाँच हाथ की माप वाली वह भूमि दे दी।

श्लोक 60 (skanda.2.20.60)

पृथिवी वैष्णवी पुण्या पृथिवी विष्णुपालिता । पृथिव्यास्तु प्रदानेन प्रीयतां मे जनार्दनः ।

pṛthivī vaiṣṇavī puṇyā pṛthivī viṣṇupālitā pṛthivyāstu pradānena prīyatāṁ me janārdanaḥ

'यह पृथ्वी विष्णु-संबंधी है, पुण्यमय है, विष्णु द्वारा पालित है; इस पृथ्वी के दान से मुझ पर जनार्दन प्रसन्न हों।'

श्लोक 61 (skanda.2.20.61)

मन्त्रेणानेन विप्रेन्द्राः सुघोषस्तं द्विजेश्वरम् । विष्णुबुद्ध्या समभ्यर्च्य तावतीं पृथिवीं ददौ ।

mantreṇānena viprendrāḥ sughoṣastaṁ dvijeśvaram viṣṇubuddhyā samabhyarcya tāvatīṁ pṛthivīṁ dadau

हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! इस मंत्र के साथ सुघोष ने उस श्रेष्ठ ब्राह्मण को, विष्णु-बुद्धि से पूजित करके, उतनी भूमि दे दी।

श्लोक 62 (skanda.2.20.62)

स भद्रमतये विप्रा धीमांस्तां याचितां भुवम् । दत्तवान्हरिभक्ताय श्रोत्रियाय कुटुंबिने ।

sa bhadramataye viprā dhīmāṁstāṁ yācitāṁ bhuvam dattavānharibhaktāya śrotriyāya kuṭuṁbine

हे विप्रो! उस बुद्धिमान ने भद्रमति के लिए उस याचित भूमि को हरि-भक्त, श्रोत्रिय, परिवार वाले उस ब्राह्मण को दे दिया था।

श्लोक 63 (skanda.2.20.63)

सुघोषो भूमिदानेन कोटिवंशसमन्वितः । प्रपेदे विष्णुभवनं यत्र गत्वा न शोचति ।

sughoṣo bhūmidānena koṭivaṁśasamanvitaḥ prapede viṣṇubhavanaṁ yatra gatvā na śocati

सुघोष उस भूमि-दान के फलस्वरूप, करोड़ों पीढ़ियों सहित, विष्णु के धाम को प्राप्त हुआ, जहाँ जाकर फिर कभी शोक नहीं करना पड़ता।

श्लोक 64 (skanda.2.20.64)

विप्रो भद्रमतिश्चापि पुत्रदारसमन्वितः । गतो वेंकटशैलेन्द्रं सुरासुरनमस्कृतम् ।

vipro bhadramatiścāpi putradārasamanvitaḥ gato veṁkaṭaśailendraṁ surāsuranamaskṛtam

वह ब्राह्मण भद्रमति भी अपनी पत्नी और पुत्रों सहित, देवताओं और असुरों द्वारा नमस्कृत उस श्रेष्ठ वेंकटाचल पर्वत को गया,

श्लोक 65 (skanda.2.20.65)

गन्धर्वयक्षशैलादिसेवितं मेरुपुत्रकम् । वैकुण्ठादागतं दिव्यं क्रीडाचलमनुत्तमम् ।

gandharvayakṣaśailādisevitaṁ meruputrakam vaikuṇṭhādāgataṁ divyaṁ krīḍācalamanuttamam

जो गंधर्वों, यक्षों और पर्वतों आदि द्वारा सेवित है, मेरु का पुत्र है, वैकुण्ठ से आया हुआ, दिव्य, सर्वोत्तम क्रीड़ाचल है।

श्लोक 66 (skanda.2.20.66)

तत्र स्वामिसरस्तोये निर्मले पावने शुभे । दारपुत्रादिसंयुक्तः स्नात्वा संकल्पपूर्वकम् ।

tatra svāmisarastoye nirmale pāvane śubhe dāraputrādisaṁyuktaḥ snātvā saṁkalpapūrvakam

वहाँ स्वामिपुष्करिणी के निर्मल, पवित्र, शुभ जल में, पत्नी और पुत्रों सहित, संकल्पपूर्वक स्नान करके,

श्लोक 67 (skanda.2.20.67)

तत्पश्चिमतटे श्वेतसूकरं वसुधाधरम् । नत्वा तत्र विधानेन श्रीनिवासालयं गतः ।

tatpaścimataṭe śvetasūkaraṁ vasudhādharam natvā tatra vidhānena śrīnivāsālayaṁ gataḥ

उसके पश्चिमी तट पर पृथ्वी को धारण करने वाले श्वेत वराह को प्रणाम करके, विधिपूर्वक श्रीनिवास के मंदिर को गया।

श्लोक 68 (skanda.2.20.68)

तत्र ब्रह्मादिदेवैश्च सेवितं वेंकटेश्वरम् । दृष्टवान्सह पुत्राद्यैर्विष्णुभक्तो महामतिः ।

tatra brahmādidevaiśca sevitaṁ veṁkaṭeśvaram dṛṣṭavānsaha putrādyairviṣṇubhakto mahāmatiḥ

वहाँ ब्रह्मा आदि देवताओं द्वारा सेवित वेंकटेश्वर के दर्शन उस विष्णु-भक्त, महाबुद्धिमान ब्राह्मण ने अपने पुत्रों सहित किए।

श्लोक 69 (skanda.2.20.69)

भक्त्या प्रणम्य देवेशं श्रीनिवासं कृपानिधिम् । पुत्रदारादिसंयुक्तः पापनाशनमाययौ ।

bhaktyā praṇamya deveśaṁ śrīnivāsaṁ kṛpānidhim putradārādisaṁyuktaḥ pāpanāśanamāyayau

भक्तिपूर्वक करुणानिधान देवाधिदेव श्रीनिवास को प्रणाम करके, पत्नी और पुत्रों सहित वह पापनाशन तीर्थ को गया।

श्लोक 70 (skanda.2.20.70)

तत्र स्नात्वा विधानेन कृतधर्मादिसत्क्रियः । कस्मैचिद्विष्णुभक्ताय श्रोत्रियाय महामतिः ।

tatra snātvā vidhānena kṛtadharmādisatkriyaḥ kasmaicidviṣṇubhaktāya śrotriyāya mahāmatiḥ

वहाँ विधिपूर्वक स्नान करके, धर्म आदि श्रेष्ठ कर्म करते हुए, उस महाबुद्धिमान ने किसी विष्णु-भक्त, श्रोत्रिय ब्राह्मण को,

श्लोक 71 (skanda.2.20.71)

विष्णुबुद्ध्या स प्रददौ भूदानं मोक्षदं शुभम् ।

viṣṇubuddhyā sa pradadau bhūdānaṁ mokṣadaṁ śubham

विष्णु-बुद्धि से वह मोक्ष प्रदान करने वाला, शुभ भूमि-दान दे दिया।

श्लोक 72 (skanda.2.20.72)

तदा प्रादुरभूद्देवः शंखचक्रगदाधरः ।

tadā prādurabhūddevaḥ śaṁkhacakragadādharaḥ

तभी शंख, चक्र और गदा धारण करने वाले देव प्रकट हुए,

श्लोक 73 (skanda.2.20.73)

विनतानन्दनारूढो वनमालाविभूषितः । पापनाशस्य तीरे तु भूदानस्य प्रभावतः ।

vinatānandanārūḍho vanamālāvibhūṣitaḥ pāpanāśasya tīre tu bhūdānasya prabhāvataḥ

विनता के पुत्र गरुड़ पर सवार, वनमाला से विभूषित — पापनाश के तट पर, भूमि-दान के प्रभाव से।

श्लोक 74 (skanda.2.20.74)

तदा भद्रमतिः सौम्यः स्तोतुं समुपचक्रमे ।

tadā bhadramatiḥ saumyaḥ stotuṁ samupacakrame

तब वह सौम्य भद्रमति उनकी स्तुति करने लगा —

श्लोक 75 (skanda.2.20.75)

नमोनमस्तेऽखिलकारणाय नमोनमस्तेऽखिलपालकाय । नमोनमस्तेऽमरनायकाय नमोनमो दैत्यविमर्दनाय ।

namonamaste'khilakāraṇāya namonamaste'khilapālakāya namonamaste'maranāyakāya namonamo daityavimardanāya

'नमस्कार, बारंबार नमस्कार, हे समस्त कारणों के कारण! नमस्कार, बारंबार नमस्कार, हे समस्त जगत के पालक! नमस्कार, बारंबार नमस्कार, हे अमरों के स्वामी! नमस्कार, बारंबार नमस्कार, हे दैत्यों के संहारक!

श्लोक 76 (skanda.2.20.76)

नमोनमो भक्तजनप्रियाय नमोनमः पापविदारणाय । नमोनमो दुर्जननाशकाय नमोऽस्तु तस्मै जगदीश्वराय ।

namonamo bhaktajanapriyāya namonamaḥ pāpavidāraṇāya namonamo durjananāśakāya namo'stu tasmai jagadīśvarāya

नमस्कार, बारंबार नमस्कार, हे भक्तजनों के प्रिय! नमस्कार, बारंबार नमस्कार, हे पापों को विदीर्ण करने वाले! नमस्कार, बारंबार नमस्कार, हे दुर्जनों के नाशक! नमस्कार हो उन जगदीश्वर को।

श्लोक 77 (skanda.2.20.77)

नमो नमः कारणवामनाय नारायणायामितविक्रमाय । श्रीशार्ङ्गचक्रासिगदाधराय नमोऽस्तु तस्मै पुरुषोत्तमाय ।

namo namaḥ kāraṇavāmanāya nārāyaṇāyāmitavikramāya śrīśārṅgacakrāsigadādharāya namo'stu tasmai puruṣottamāya

नमस्कार, बारंबार नमस्कार, हे [जगत की] उत्पत्ति के कारण वामन-रूप धारण करने वाले, हे अपार पराक्रम वाले नारायण! श्री शार्ङ्ग धनुष, चक्र, तलवार और गदा धारण करने वाले उन पुरुषोत्तम को नमस्कार हो।

श्लोक 78 (skanda.2.20.78)

नमः पयोराशिनिवासकाय नमोऽस्तु लक्ष्मीपतयेऽव्ययाय । नमोऽस्तु सूर्याद्यमितप्रभाय नमोनमः पुण्यगतागताय ।

namaḥ payorāśinivāsakāya namo'stu lakṣmīpataye'vyayāya namo'stu sūryādyamitaprabhāya namonamaḥ puṇyagatāgatāya

क्षीरसागर में निवास करने वाले को नमस्कार, अविनाशी लक्ष्मीपति को नमस्कार, सूर्य आदि से भी अधिक अपार तेज वाले को नमस्कार, बारंबार नमस्कार, हे पुण्य के आने-जाने का कारण!

श्लोक 79 (skanda.2.20.79)

नमोनमोऽर्केन्दुविलोचनाय नमोऽस्तु ते यज्ञफलप्रदाय । नमोस्तु यज्ञांगविराजिताय नमोऽस्तु ते सज्जनवल्लभाय ।

namonamo'rkenduvilocanāya namo'stu te yajñaphalapradāya namostu yajñāṁgavirājitāya namo'stu te sajjanavallabhāya

सूर्य और चंद्रमा नेत्र वाले को नमस्कार, बारंबार नमस्कार, यज्ञ का फल देने वाले आपको नमस्कार हो। यज्ञ के अंगों में विराजमान आपको नमस्कार हो, सज्जनों के प्रिय आपको नमस्कार हो।

श्लोक 80 (skanda.2.20.80)

नमोनमः कारणकारणाय नमोऽस्तु शब्दादिविवर्जिताय । नमोऽस्तु तेऽभीष्टसुखप्रदाय नमोनमो भक्तमनोरमाय ।

namonamaḥ kāraṇakāraṇāya namo'stu śabdādivivarjitāya namo'stu te'bhīṣṭasukhapradāya namonamo bhaktamanoramāya

नमस्कार, बारंबार नमस्कार, हे कारणों के भी कारण! नमस्कार हो आपको, जो शब्द आदि [इंद्रिय-विषयों] से रहित हैं। नमस्कार हो आपको, जो अभीष्ट सुख देने वाले हैं। नमस्कार, बारंबार नमस्कार, हे भक्तों के मन को रमाने वाले!

श्लोक 81 (skanda.2.20.81)

नमोनमस्तेऽद्भुतकारणाय नमोऽस्तु ते मन्दरधारकाय । नमोऽस्तु ते यज्ञवराहनाम्ने नमो हिरण्याक्षविदारकाय ।

namonamaste'dbhutakāraṇāya namo'stu te mandaradhārakāya namo'stu te yajñavarāhanāmne namo hiraṇyākṣavidārakāya

नमस्कार, बारंबार नमस्कार, हे अद्भुत कारणों वाले! नमस्कार हो आपको, जो मंदराचल को धारण करने वाले हैं। नमस्कार हो आपको, जिनका नाम यज्ञ-वराह है। नमस्कार हो, हिरण्याक्ष को विदीर्ण करने वाले को।

श्लोक 82 (skanda.2.20.82)

नमोऽस्तु ते वामनरूपभाजे नमोऽस्तु ते क्षत्रकुलान्तकाय । नमोऽस्तु ते रावणमर्दनाय नमोऽस्तु ते नन्दसुताग्रजाय ।

namo'stu te vāmanarūpabhāje namo'stu te kṣatrakulāntakāya namo'stu te rāvaṇamardanāya namo'stu te nandasutāgrajāya

नमस्कार हो आपको, जो वामन-रूप धारण करने वाले हैं। नमस्कार हो आपको, क्षत्रिय-कुल का अंत करने वाले। नमस्कार हो आपको, रावण का मर्दन करने वाले। नमस्कार हो आपको, नंद-पुत्र [कृष्ण] के अग्रज [बलराम]।

श्लोक 83 (skanda.2.20.83)

नमस्ते कमलाकान्त नमस्ते सुखदायिने । श्रितार्तिनाशिने तुभ्यं भूयोभूयो नमोनमः ।

namaste kamalākānta namaste sukhadāyine śritārtināśine tubhyaṁ bhūyobhūyo namonamaḥ

नमस्कार, हे कमला के प्रियतम! नमस्कार, हे सुख देने वाले! शरण में आए हुओं की पीड़ा हरने वाले आपको बारंबार नमस्कार हो।'

श्लोक 84 (skanda.2.20.84)

विप्रेण संस्तुतो देवो भगवान्भक्तवत्सलः । वात्सल्येनाब्रवीद्वाक्यं श्रीनिवासो दयानिधिः ।

vipreṇa saṁstuto devo bhagavānbhaktavatsalaḥ vātsalyenābravīdvākyaṁ śrīnivāso dayānidhiḥ

उस ब्राह्मण द्वारा इस प्रकार स्तुति किए गए भक्तवत्सल भगवान देव, दया-निधान श्रीनिवास ने वात्सल्यपूर्वक यह वचन कहा —

श्लोक 85 (skanda.2.20.85)

तात तुष्टोऽस्मि भद्रं ते स्तोत्रेण महता द्विज । सर्वभोगसमायुक्तः पुत्रपौत्रादिभिर्युतः ।

tāta tuṣṭo'smi bhadraṁ te stotreṇa mahatā dvija sarvabhogasamāyuktaḥ putrapautrādibhiryutaḥ

'हे तात! मैं तुम्हारे इस महान स्तोत्र से प्रसन्न हूँ, तुम्हारा कल्याण हो, हे द्विज। समस्त भोगों से युक्त होकर, पुत्रों-पौत्रों सहित,

श्लोक 86 (skanda.2.20.86)

इह लोके सुखं प्राप्य देहान्ते मुक्तिमाप्नुहि । इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुस्तत्रैवान्तरधीयत ।

iha loke sukhaṁ prāpya dehānte muktimāpnuhi ityuktvā bhagavānviṣṇustatraivāntaradhīyata

इस लोक में सुख पाकर, देह के अंत में मुक्ति प्राप्त करो।' ऐसा कहकर भगवान विष्णु वहीं अंतर्धान हो गए।

श्लोक 87 (skanda.2.20.87)

एवं वः कथितं विप्राः पापनाशनवैभवम् । तत्तीरे भूप्रदानस्य माहात्म्यं चापि वर्णितम् ।

evaṁ vaḥ kathitaṁ viprāḥ pāpanāśanavaibhavam tattīre bhūpradānasya māhātmyaṁ cāpi varṇitam

इस प्रकार, हे विप्रो, मैंने तुम्हें पापनाशन तीर्थ का यह वैभव कह सुनाया, और उसके तट पर भूमि-दान की महिमा भी वर्णित की।

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