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वैष्णव खण्ड · अध्याय 21

आकाशगंगा माहात्म्य: रामानुज व्रत वर्णन

अध्याय 20अध्याय-सूचीअध्याय 22

श्लोक 1 (skanda.2.21.1)

श्रीसूत उवाच । भोभोस्तपोधनाः सर्वे नैमिषारण्यवासिनः । आकाशगंगातीर्थस्य माहात्म्यं प्रवदाम्यहम् ।

śrīsūta uvāca bhobhostapodhanāḥ sarve naimiṣāraṇyavāsinaḥ ākāśagaṁgātīrthasya māhātmyaṁ pravadāmyaham

श्री सूत जी ने कहा — हे नैमिषारण्य में निवास करने वाले तपोधन मुनियो! अब मैं आकाशगंगा तीर्थ का माहात्म्य कहता हूँ।

श्लोक 2 (skanda.2.21.2)

आकाशगंगानिकटे सर्वशास्त्रार्थपारगः । रामानुज इति ख्यातो विष्णुभक्तो जितेन्द्रियः ।

ākāśagaṁgānikaṭe sarvaśāstrārthapāragaḥ rāmānuja iti khyāto viṣṇubhakto jitendriyaḥ

आकाशगंगा के समीप एक ब्राह्मण रहता था, जो समस्त शास्त्रों के अर्थ में पारंगत, रामानुज नाम से विख्यात, विष्णुभक्त और जितेन्द्रिय था।

श्लोक 3 (skanda.2.21.3)

तपश्चकार धर्मात्मा वैखानसमते स्थितः । ग्रीष्मे पंचाग्निमध्यस्थो विष्णुध्यानपरायणः ।

tapaścakāra dharmātmā vaikhānasamate sthitaḥ grīṣme paṁcāgnimadhyastho viṣṇudhyānaparāyaṇaḥ

वह धर्मात्मा वैखानस मत में स्थित रहकर तप करता था; ग्रीष्म ऋतु में पंचाग्नि के मध्य बैठकर विष्णु के ध्यान में तत्पर रहता था।

श्लोक 4 (skanda.2.21.4)

जपन्नष्टाक्षरं मंत्रं ध्यायन्हृदि जनार्दनम् । वर्षास्वाकाशगो नित्यं हेमन्तेषु जलेशयः ।

japannaṣṭākṣaraṁ maṁtraṁ dhyāyanhṛdi janārdanam varṣāsvākāśago nityaṁ hemanteṣu jaleśayaḥ

वह अष्टाक्षर मंत्र का जप करते हुए हृदय में जनार्दन का ध्यान करता था; वर्षा ऋतु में सदा खुले आकाश में रहता और हेमन्त ऋतु में जल में शयन करता था।

श्लोक 5 (skanda.2.21.5)

सर्वभूतहितो दान्तः सर्वद्वन्द्वविवर्जितः । वर्षाणि कतिचित्सोऽयं जीर्णपर्णाशनोभवत् ।

sarvabhūtahito dāntaḥ sarvadvaṁdvavivarjitaḥ varṣāṇi katicitso'yaṁ jīrṇaparṇāśanobhavat

वह सब प्राणियों का हितकारी, संयमी और समस्त द्वंद्वों से रहित था; कुछ वर्षों तक वह केवल झरे हुए सूखे पत्तों का ही आहार करता रहा।

श्लोक 6 (skanda.2.21.6)

कञ्चित्कालं जलाहारो वायुभक्षः कियत्समाः ।

kaṁcitkālaṁ jalāhāro vāyubhakṣaḥ kiyatsamāḥ

कुछ काल तक वह केवल जल पीकर रहा, और कुछ वर्षों तक केवल वायु का ही भक्षण करता रहा।

श्लोक 7 (skanda.2.21.7)

अथ तत्तपसा तुष्टो भगवान्भक्तवत्सलः । प्रत्यक्षतामगात्तस्य शंखचक्रगदाधरः ।

atha tattapasā tuṣṭo bhagavānbhaktavatsalaḥ pratyakṣatāmagāttasya śaṁkhacakragadādharaḥ

तब उसके उस तप से प्रसन्न होकर भक्तवत्सल भगवान् शंख-चक्र-गदाधारी उसके समक्ष प्रत्यक्ष प्रकट हुए।

श्लोक 8 (skanda.2.21.8)

विकचाम्बुजपत्राक्षः सूर्यकोटिसमप्रभः । विनतानन्दनारूढश्छत्रचामरशोभितः ।

vikacāṁbujapatrākṣaḥ sūryakoṭisamaprabhaḥ vinatānaṁdanārūḍhaśchatracāmaraśobhitaḥ

उनके नेत्र खिले हुए कमल-दल के समान थे, उनकी कान्ति करोड़ों सूर्यों के समान थी; वे विनता-पुत्र गरुड़ पर आरूढ़ थे और छत्र-चामर से सुशोभित थे।

श्लोक 9 (skanda.2.21.9)

हारकेयूरमुकुटः कटकादिविभूषितः । विष्वक्सेनसुनन्दादि किङ्करैः परिवारितः ।

hārakeyūramukuṭaḥ kaṭakādivibhūṣitaḥ viṣvaksenasunaṁdādi kiṁkaraiḥ parivāritaḥ

वे हार, केयूर और मुकुट धारण किए हुए, कंकण आदि आभूषणों से विभूषित थे; विष्वक्सेन, सुनन्द आदि सेवकों से घिरे हुए थे।

श्लोक 10 (skanda.2.21.10)

वीणावेणुमृदंगादिवादकैर्नारदादिभिः । गीयमानः सुविभवः पीताम्बरविराजितः ।

vīṇāveṇumṛdaṁgādivādakairnāradādibhiḥ gīyamānaḥ suvibhavaḥ pītāṁbaravirājitaḥ

वीणा, वेणु, मृदंग आदि बजाने वाले नारद आदि द्वारा गुणगान किए जाते हुए, अत्यंत वैभवशाली और पीताम्बर से सुशोभित थे।

श्लोक 11 (skanda.2.21.11)

लक्ष्मीविराजितोरस्को नीलमेघनिवच्छविः । सनकादिमहायोगिसेवितः पार्श्वयोर्द्वयोः ।

lakṣmīvirājitorasko nīlameghanivacchaviḥ sanakādimahāyogisevitaḥ pārśvayordvayoḥ

लक्ष्मी से सुशोभित वक्षस्थल वाले, नीले मेघ के समान कान्ति वाले, वे दोनों ओर सनक आदि महायोगियों द्वारा सेवित थे।

श्लोक 12 (skanda.2.21.12)

मन्दस्मितेन सकलं मोहयन्भुवनत्रयम् । स्वभासा मानयन्सर्वा दिशो दश विराजयन् ।

maṁdasmitena sakalaṁ mohayanbhuvanatrayam svabhāsā mānayansarvā diśo daśa virājayan

वे अपनी मंद मुस्कान से समस्त त्रिभुवन को मोहित करते हुए, अपनी आभा से सभी दसों दिशाओं को सम्मानित और प्रकाशित कर रहे थे।

श्लोक 13 (skanda.2.21.13)

सुभक्तसुलभो देवो वेंकटेशो दयानिधिः । पुनः सन्निदधे तस्य रामानुजमहामुनेः ।

subhaktasulabho devo veṁkaṭeśo dayānidhiḥ punaḥ sannidadhe tasya rāmānujamahāmuneḥ

वे देव वेंकटेश, दयानिधि, अपने भक्तों के लिए सुलभ, महामुनि रामानुज के समक्ष पुनः प्रकट हुए।

श्लोक 14 (skanda.2.21.14)

आविर्भूतं तदा दृष्ट्वा श्रीनिवासं कृपानिधिम् । पीताम्बरधरं देवं तुष्टिं प्राप महामुनिः ।

āvirbhūtaṁ tadā dṛṣṭvā śrīnivāsaṁ kṛpānidhim pītāṁbaradharaṁ devaṁ tuṣṭiṁ prāpa mahāmuniḥ

उस समय कृपानिधि श्रीनिवास को, पीताम्बरधारी देव को प्रत्यक्ष प्रकट देखकर महामुनि को अत्यंत संतोष प्राप्त हुआ।

श्लोक 15 (skanda.2.21.15)

भक्त्या परमया युक्तस्तुष्टाव जगदीश्वरम् ।

bhaktyā paramayā yuktastuṣṭāva jagadīśvaram

वह परम भक्ति से युक्त होकर जगदीश्वर की स्तुति करने लगा।

श्लोक 16 (skanda.2.21.16)

रामानुज उवाच । नमो देवाधिदेवाय शङ्खचक्रगदाभृते । नमो नित्याय शुद्धाय वेंकटशाय ते नमः ।

rāmānuja uvāca namo devādhidevāya śaṁkhacakragadābhṛte namo nityāya śuddhāya veṁkaṭaśāya te namaḥ

रामानुज ने कहा — हे देवाधिदेव! शंख-चक्र-गदा धारण करने वाले आपको नमस्कार है। हे नित्य, शुद्ध वेंकटेश! आपको नमस्कार है।

श्लोक 17 (skanda.2.21.17)

नमो भक्तार्तिहंत्रे ते हव्यकव्यस्वरूपिणे । नमस्त्रिमूर्तये तुभ्यं सृष्टिस्थित्यन्तकारिणे ।

namo bhaktārtihaṁtre te havyakavyasvarūpiṇe namastrimūrtaye tubhyaṁ sṛṣṭisthityaṁtakāriṇe

भक्तों की पीड़ा हरने वाले, हव्य-कव्य स्वरूप आपको नमस्कार है; सृष्टि, स्थिति और प्रलय करने वाले त्रिमूर्ति आपको नमस्कार है।

श्लोक 18 (skanda.2.21.18)

नमः परेशाय नमोऽतिभूम्ने नमोऽस्तु लक्ष्मीपतये विधात्रे । नमोऽस्तु सूर्येन्दुविलोचनाय नमो विरिञ्चाद्यभिवन्दिताय ।

namaḥ pareśāya namo'tibhūmne namo'stu lakṣmīpataye vidhātre namo'stu sūryenduvilocanāya namo viriñcādyabhivaṁditāya

परमेश्वर को नमस्कार, अनन्त-स्वरूप को नमस्कार; लक्ष्मीपति विधाता को नमस्कार हो; सूर्य और चंद्र जिनके नेत्र हैं, उन्हें नमस्कार; ब्रह्मा आदि द्वारा वंदित आपको नमस्कार।

श्लोक 19 (skanda.2.21.19)

यो नाम जात्यादिविकल्पहीनः समस्तदोषैरपि वर्जितो यः । समस्तसंसारभयापहारिणे तस्मै नमो दैत्यविनाशकाय ।

yo nāma jātyādivikalpahīnaḥ samastadoṣairapi varjito yaḥ samastasaṁsārabhayāpahāriṇe tasmai namo daityavināśakāya

जो नाम, जाति आदि भेदों से रहित है, जो समस्त दोषों से भी मुक्त है, जो संसार के समस्त भय का हरण करने वाला है — उस दैत्यविनाशक को नमस्कार है।

श्लोक 20 (skanda.2.21.20)

वेदांतवेद्याय रमेश्वराय वृषादिवासाय विधातृपित्रे । नमोनमः सर्वजनार्तिहारिणे नारायणायामितविक्रमाय ।

vedāṁtavedyāya rameśvarāya vṛṣādivāsāya vidhātṛpitre namonamaḥ sarvajanārtihāriṇe nārāyaṇāyāmitavikramāya

वेदांत से जानने योग्य, रमा के स्वामी, वृषाद्रि में निवास करने वाले, विधाता के पिता — उन्हें बार-बार नमस्कार है; समस्त जनों की पीड़ा हरने वाले, अमित पराक्रमी नारायण को नमस्कार है।

श्लोक 21 (skanda.2.21.21)

नमस्तुभ्यं भगवते वासुदेवाय शार्ङ्गिणे । भूयोभूयो नमस्तुभ्यं वेंकटाद्रिनिवासिने ।

namastubhyaṁ bhagavate vāsudevāya śārṁgiṇe bhūyobhūyo namastubhyaṁ veṁkaṭādrinivāsine

शार्ङ्ग धनुष धारण करने वाले भगवान् वासुदेव को नमस्कार है; वेंकटाद्रि निवासी आपको बार-बार नमस्कार है।

श्लोक 22 (skanda.2.21.22)

इति स्तुत्वा वेंकटेशं श्रीनिवासं जगद्गुरुम् । रामानुजो मुनिस्तूष्णीमास्ते विप्रवरोत्तमः ।

iti stutvā veṁkaṭeśaṁ śrīnivāsaṁ jagadgurum rāmānujo munistūṣṇīmāste vipravarottamaḥ

इस प्रकार जगद्गुरु श्रीनिवास वेंकटेश की स्तुति करके, वह श्रेष्ठ ब्राह्मण मुनि रामानुज मौन होकर बैठ गया।

श्लोक 23 (skanda.2.21.23)

श्रुत्वा स्तुतिं श्रुतिसुखां स्तुतस्तस्य महात्मनः । अवाप परमं तोषं वेंकटाचलनायकः ।

śrutvā stutiṁ śrutisukhāṁ stutastasya mahātmanaḥ avāpa paramaṁ toṣaṁ veṁkaṭācalanāyakaḥ

उस महात्मा की कर्णप्रिय स्तुति सुनकर, स्तुति किए गए वेंकटाचल के स्वामी को परम संतोष प्राप्त हुआ।

श्लोक 24 (skanda.2.21.24)

अथालिङ्ग्य मुनिं शौरिश्चतुर्भिर्बाहुभिस्तदा । बभाषे प्रीतिसंयुक्तो वरं वै व्रियतामिति ।

athāliṁgya muniṁ śauriścaturbhirbāhubhistadā babhāṣe prītisaṁyukto varaṁ vai vriyatāmiti

तब शौरि (विष्णु) ने अपनी चारों भुजाओं से उस मुनि का आलिंगन करके, प्रेमपूर्वक कहा — "वर माँगो।"

श्लोक 25 (skanda.2.21.25)

तुष्टोऽस्मि तपसा तेऽद्य स्तोत्रेणापि महामुने । नमस्कारेण च प्रीतो वरदोऽहं तवागतः ।

tuṣṭo'smi tapasā te'dya stotreṇāpi mahāmune namaskāreṇa ca prīto varado'haṁ tavāgataḥ

"हे महामुने! आज मैं तुम्हारे तप से प्रसन्न हूँ, तुम्हारी स्तुति से भी प्रसन्न हूँ; तुम्हारे नमस्कार से प्रीत होकर मैं तुम्हें वर देने आया हूँ।"

श्लोक 26 (skanda.2.21.26)

रामानुज उवाच । नारायण रमानाथ श्रीनिवास जगन्मय । जनार्दन जगद्धाम गोविन्द नरकान्तक ।

rāmānuja uvāca nārāyaṇa ramānātha śrīnivāsa jagaṁmaya janārdana jagaddhāma govinda narakāṁtaka

रामानुज ने कहा — हे नारायण! हे रमानाथ! हे श्रीनिवास! हे जगन्मय! हे जनार्दन! हे जगद्धाम! हे गोविन्द! हे नरकान्तक!

श्लोक 27 (skanda.2.21.27)

त्वद्दर्शनात्कृतार्थोऽस्मि वेंकटाद्रिशिरोमणे । त्वां नमस्यंति धर्मिष्ठा यतस्त्वं धर्मपालकः ।

tvaddarśanātkṛtārtho'smi veṁkaṭādriśiromaṇe tvāṁ namasyaṁti dharmiṣṭhā yatastvaṁ dharmapālakaḥ

हे वेंकटाद्रि के शिरोमणि! आपके दर्शन से मैं कृतार्थ हो गया; धर्मिष्ठ लोग आपको इसलिए नमस्कार करते हैं क्योंकि आप धर्म के रक्षक हैं।

श्लोक 28 (skanda.2.21.28)

यं न वेत्ति भवो ब्रह्मा यं न वेत्ति त्रयी तथा । त्वां वेद्मि परमात्मानं किमस्मादधिकं परम् ।

yaṁ na vetti bhavo brahmā yaṁ na vetti trayī tathā tvāṁ vedmi paramātmānaṁ kimasmādadhikaṁ param

जिसे शिव भी नहीं जानते, जिसे ब्रह्मा भी नहीं जानते, जिसे तीनों वेद भी नहीं जानते — मैं आपको परमात्मा के रूप में जानता हूँ; इससे बढ़कर और क्या हो सकता है?

श्लोक 29 (skanda.2.21.29)

योगिनो यं न पश्यंति यं न पश्यंति कर्मठाः । पश्यामि परमात्मानं किमस्मादधिकं परम् ।

yogino yaṁ na paśyaṁti yaṁ na paśyaṁti karmaṭhāḥ paśyāmi paramātmānaṁ kimasmādadhikaṁ param

जिसे योगी लोग भी नहीं देख पाते, जिसे कर्मनिष्ठ लोग भी नहीं देख पाते — उस परमात्मा को मैं देख रहा हूँ; इससे बढ़कर और क्या हो सकता है?

श्लोक 30 (skanda.2.21.30)

एतेन च कृतार्थोऽस्मि वेंकटेश जगत्पते । यन्नामस्मृतिमात्रेण महापातकिनोऽपि च ।

etena ca kṛtārtho'smi veṁkaṭeśa jagatpate yannāmasmṛtimātreṇa mahāpātakino'pi ca

हे वेंकटेश! हे जगत्पते! इसी से मैं कृतार्थ हो गया, क्योंकि जिनके नाम के स्मरण मात्र से महापातकी भी —

श्लोक 31 (skanda.2.21.31)

मुक्तिं प्रयांति मनुजास्तं पश्यामि जनार्दनम् । त्वत्पादपद्मयुगले निश्चला भक्तिरस्तु मे ।

muktiṁ prayāṁti manujāstaṁ paśyāmi janārdanam tvatpādapadmayugale niścalā bhaktirastu me

— मनुष्य मुक्ति को प्राप्त हो जाते हैं, उन्हीं जनार्दन को मैं देख रहा हूँ; आपके चरण-कमल युगल में मेरी अटल भक्ति बनी रहे।

श्लोक 32 (skanda.2.21.32)

श्रीभगवानुवाच । मयि भक्तिर्दृढा तेस्तु रामानुज महामते । शृणु चाप्यपरं वाक्यमुच्यते ते मया द्विज ।

śrībhagavānuvāca mayi bhaktirdṛḍhā testu rāmānuja mahāmate śṛṇu cāpyaparaṁ vākyamucyate te mayā dvija

श्री भगवान ने कहा — हे महामति रामानुज! तुम्हारी भक्ति मुझमें दृढ़ रहे; हे द्विज! अब मैं जो और वचन कहता हूँ उसे भी सुनो।

श्लोक 33 (skanda.2.21.33)

मेषसंक्रमणे भानोश्चित्रानक्षत्रसंयुते । पौर्णमास्यां च गंगायां स्नानं कुर्वन्ति ये जनाः ।

meṣasaṁkramaṇe bhānościtrānakṣatrasaṁyute paurṇamāsyāṁ ca gaṁgāyāṁ snānaṁ kurvaṁti ye janāḥ

जब सूर्य मेष राशि में संक्रमण करता है और चित्रा नक्षत्र से युक्त पूर्णिमा होती है, उस समय जो लोग गंगा में स्नान करते हैं —

श्लोक 34 (skanda.2.21.34)

ते यांति परमं धाम पुनरावृत्तिवर्जितम् । वियद्गंगासमीपे त्वं वस रामानुज द्विज ।

te yāṁti paramaṁ dhāma punarāvṛttivarjitam viyadgaṁgāsamīpe tvaṁ vasa rāmānuja dvija

— वे परम धाम को प्राप्त होते हैं, जहाँ से पुनरावृत्ति नहीं होती; हे द्विज रामानुज! तुम आकाशगंगा के समीप निवास करो।

श्लोक 35 (skanda.2.21.35)

एतत्प्रारब्धदेहांते मत्स्वरूपमवाप्स्यसि । बहुना किमिहोक्तेन वियद्गंगाजले शुभे ।

etatprārabdhadehāṁte matsvarūpamavāpsyasi bahunā kimihoktena viyadgaṁgājale śubhe

इस वर्तमान शरीर के अंत में तुम मेरे स्वरूप को प्राप्त कर लोगे; अधिक कहने से क्या लाभ — शुभ आकाशगंगा के जल में —

श्लोक 36 (skanda.2.21.36)

स्नान्ति ये वै जनाः सर्वे ते वै भागवतोत्तमाः । भवन्ति मुनिशार्दूल नात्र कार्या विचारणा ।

snāṁti ye vai janāḥ sarve te vai bhāgavatottamāḥ bhavaṁti muniśārdūla nātra kāryā vicāraṇā

— जो भी लोग स्नान करते हैं, वे सब सर्वश्रेष्ठ भागवत हो जाते हैं; हे मुनिश्रेष्ठ! इसमें कोई संदेह नहीं करना चाहिए।

श्लोक 37 (skanda.2.21.37)

रामानुज उवाच । किंलक्षणा भागवता ज्ञायन्ते केन कर्मणा । एतदिच्छाम्यहं श्रोतुं कौतूहलपरो यतः ।

rāmānuja uvāca kiṁlakṣaṇā bhāgavatā jñāyaṁte kena karmaṇā etadicchāmyahaṁ śrotuṁ kautūhalaparo yataḥ

रामानुज ने कहा — भागवत किन लक्षणों से और किस कर्म से पहचाने जाते हैं? मैं यह सुनना चाहता हूँ क्योंकि मुझे इसकी अत्यंत जिज्ञासा है।

श्लोक 38 (skanda.2.21.38)

श्रीवेंकटेश उवाच । लक्ष्म भागवतानां तु शृणुष्व मुनिसत्तम ।

śrīveṁkaṭeśa uvāca lakṣma bhāgavatānāṁ tu śṛṇuṣva munisattama

श्री वेंकटेश ने कहा — हे मुनिश्रेष्ठ! अब भागवतों के लक्षण सुनो।

श्लोक 39 (skanda.2.21.39)

वक्तुं तेषां प्रभावं तु शक्यते नाब्दकोटिभिः ।

vaktuṁ teṣāṁ prabhāvaṁ tu śakyate nābdakoṭibhiḥ

उनके प्रभाव का वर्णन करना करोड़ों वर्षों में भी संभव नहीं है।

श्लोक 40 (skanda.2.21.40)

ये हिताः सर्वजन्तूनां गतासूया विमत्सराः । ज्ञानिनो निःस्पृहाः शान्तास्ते वै भागवतोत्तमाः ।

ye hitāḥ sarvajaṁtūnāṁ gatāsūyā vimatsarāḥ jñānino niḥspṛhāḥ śāṁtāste vai bhāgavatottamāḥ

जो सब प्राणियों के हितकारी हैं, ईर्ष्या और द्वेष से रहित हैं, ज्ञानी, निष्काम और शांत हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 41 (skanda.2.21.41)

कर्मणा मनसा वाचा परपीडां न कुर्वते । अपरिग्रहशीलाश्च ते वै भागवतोत्तमाः ।

karmaṇā manasā vācā parapīḍāṁ na kurvate aparigrahaśīlāśca te vai bhāgavatottamāḥ

जो कर्म, मन और वचन से किसी को पीड़ा नहीं पहुँचाते और अपरिग्रह के स्वभाव वाले हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 42 (skanda.2.21.42)

सत्कथाश्रवणे येषां वर्तते सात्त्विकी मतिः । मत्पादाम्बुजभक्ता ये ते वै भागवतोत्तमाः ।

satkathāśravaṇe yeṣāṁ vartate sāttvikī matiḥ matpādāṁbujabhaktā ye te vai bhāgavatottamāḥ

जिनकी बुद्धि सत्कथा-श्रवण में सात्त्विक रहती है, जो मेरे चरण-कमलों के भक्त हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 43 (skanda.2.21.43)

मातापित्रोश्च शुश्रूषां कुर्वते ये नरोत्तमाः । ये तु देवार्चनरता ये तु तत्साधका नराः । पूजां दृष्ट्वा तु मोदन्ते ते वै भागवतोत्तमाः ।

mātāpitrośca śuśrūṣāṁ kurvate ye narottamāḥ ye tu devārcanaratā ye tu tatsādhakā narāḥ pūjāṁ dṛṣṭvā tu modaṁte te vai bhāgavatottamāḥ

जो श्रेष्ठ मनुष्य माता-पिता की सेवा करते हैं, जो देव-पूजा में रत हैं, जो उसके साधक हैं, और पूजा को देखकर आनंदित होते हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 44 (skanda.2.21.44)

वर्णिनां च यतीनां च परिचर्यापराश्च ये । परनिन्दामकुर्वाणास्ते वै भागवतोत्तमाः ।

varṇināṁ ca yatīnāṁ ca paricaryāparāśca ye paranindāmakurvāṇāste vai bhāgavatottamāḥ

जो ब्रह्मचारियों और यतियों की सेवा में तत्पर रहते हैं, जो पर-निन्दा नहीं करते — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 45 (skanda.2.21.45)

सर्वेषां हितवाक्यानि ये वदन्ति नरोत्तमाः । ये गुणग्राहिणो लोके ते वै भागवतोत्तमाः ।

sarveṣāṁ hitavākyāni ye vadaṁti narottamāḥ ye guṇagrāhiṇo loke te vai bhāgavatottamāḥ

जो श्रेष्ठ मनुष्य सबके हित की बातें कहते हैं, जो संसार में सद्गुणों को ग्रहण करने वाले हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 46 (skanda.2.21.46)

आत्मवत्सर्वभूतानि ये पश्यन्ति नरोत्तमाः । तुल्याः शत्रुषु मित्रेषु ते वै भागवताः स्मृताः ।

ātmavatsarvabhūtāni ye paśyaṁti narottamāḥ tulyāḥ śatruṣu mitreṣu te vai bhāgavatāḥ smṛtāḥ

जो श्रेष्ठ मनुष्य सब प्राणियों को अपने समान देखते हैं, जो शत्रु और मित्र में समान भाव रखते हैं — वे ही भागवत कहे गए हैं।

श्लोक 47 (skanda.2.21.47)

धर्मशास्त्रप्रवक्तारः सत्यवाक्यरताश्च ये । तेषां शुश्रूषवो ये च ते वै भागवतोत्तमाः ।

dharmaśāstrapravaktāraḥ satyavākyaratāśca ye teṣāṁ śuśrūṣavo ye ca te vai bhāgavatottamāḥ

जो धर्मशास्त्र के उपदेशक हैं और सत्यवचन में रत हैं, और जो उनकी सेवा करने वाले हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 48 (skanda.2.21.48)

व्याकुर्वन्ति पुराणानि तानि शृण्वन्ति ये तथा । तद्वक्तरि च भक्ता ये ते वै भागवतोत्तमाः ।

vyākurvaṁti purāṇāni tāni śṛṇvaṁti ye tathā tadvaktari ca bhaktā ye te vai bhāgavatottamāḥ

जो पुराणों की व्याख्या करते हैं, जो उन्हें सुनते हैं, और जो उनके वक्ता के प्रति भक्तिभाव रखते हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 49 (skanda.2.21.49)

ये गोब्राह्मणशुश्रूषां कुर्वन्ति सततं नराः । तीर्थयात्रापरा ये च ते वै भागवतोत्तमाः ।

ye gobrāhmaṇaśuśrūṣāṁ kurvaṁti satataṁ narāḥ tīrthayātrāparā ye ca te vai bhāgavatottamāḥ

जो मनुष्य निरंतर गौ और ब्राह्मणों की सेवा करते हैं, जो तीर्थयात्रा में तत्पर रहते हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 50 (skanda.2.21.50)

अन्येषामुदयं दृष्ट्वा येऽभिनन्दंति मानवाः । हरिनामपरा ये च ते वै भागवतोत्तमाः ।

anyeṣāmudayaṁ dṛṣṭvā ye'bhinaṁdaṁti mānavāḥ harināmaparā ye ca te vai bhāgavatottamāḥ

जो मनुष्य दूसरों की उन्नति देखकर उसका अभिनन्दन करते हैं, जो हरिनाम में तत्पर रहते हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 51 (skanda.2.21.51)

आरामारोपणरतास्तटाकपरिरक्षकाः । कासारकूपकर्तारस्ते वै भागवतोत्तमाः ।

ārāmāropaṇaratāstaṭākaparirakṣakāḥ kāsārakūpakartāraste vai bhāgavatottamāḥ

जो उद्यान लगाने में रत रहते हैं, जो तालाबों की रक्षा करते हैं, जो सरोवर और कुएँ बनवाते हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 52 (skanda.2.21.52)

ये वै तटाककर्तारो देवसद्मानि कुर्वते । गायत्रीनिरता ये च ते वै भागवतोत्तमाः ।

ye vai taṭākakartāro devasadmāni kurvate gāyatrīniratā ye ca te vai bhāgavatottamāḥ

जो तालाब बनवाने वाले हैं, जो देवालय बनवाते हैं, जो गायत्री-जप में निरत रहते हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 53 (skanda.2.21.53)

येऽभिनन्दंति नामानि हरेः श्रुत्वाऽतिहर्षिताः । रोमाञ्चितशरीराश्च ते वै भागवतोत्तमाः ।

ye'bhinaṁdaṁti nāmāni hareḥ śrutvā'tiharṣitāḥ romāñcitaśarīrāśca te vai bhāgavatottamāḥ

जो हरि के नामों को सुनकर अत्यंत हर्षित होते हैं और जिनका शरीर रोमांचित हो उठता है — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 54 (skanda.2.21.54)

तुलसीकाननं दृष्ट्वा ये नमस्कुर्वते नराः । तत्काष्ठांकितकर्णा ये ते वै भागवतोत्तमाः ।

tulasīkānanaṁ dṛṣṭvā ye namaskurvate narāḥ tatkāṣṭhāṁkitakarṇā ye te vai bhāgavatottamāḥ

जो तुलसी-वन को देखकर प्रणाम करते हैं, जो उसकी लकड़ी के आभूषण कानों में धारण करते हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 55 (skanda.2.21.55)

तुलसीगन्धमाघ्राय सन्तोषं कुर्वते तु ये । तन्मूलमुद्धरा ये च ते वै भागवतोत्तमाः ।

tulasīgaṁdhamāghrāya saṁtoṣaṁ kurvate tu ye tanmūlamuddharā ye ca te vai bhāgavatottamāḥ

जो तुलसी की सुगंध सूँघकर संतुष्ट होते हैं, जो उसकी जड़ की माला धारण करते हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 56 (skanda.2.21.56)

स्वाश्रमाचारनिरतास्तथैवातिथिपूजकाः । ये च वेदार्थवक्तारस्ते वै भागवतोत्तमाः ।

svāśramācāraniratāstathaivātithipūjakāḥ ye ca vedārthavaktāraste vai bhāgavatottamāḥ

जो अपने आश्रम के आचार में निरत रहते हैं और अतिथियों की पूजा करते हैं, जो वेद के अर्थ का उपदेश करते हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 57 (skanda.2.21.57)

विदितानि च शास्त्राणि परार्थं प्रवदन्ति ये । सर्वत्र गुणभाजो ये ते वै भागवतोत्तमाः ।

viditāni ca śāstrāṇi parārthaṁ pravadaṁti ye sarvatra guṇabhājo ye te vai bhāgavatottamāḥ

जो अपने ज्ञात शास्त्रों को दूसरों के हित के लिए बताते हैं, जो सर्वत्र गुणों का आदर करते हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 58 (skanda.2.21.58)

पानीयदाननिरता ह्यन्नदानरताश्च ये । एकादशीव्रतपरास्ते वै भागवतोत्तमाः ।

pānīyadānaniratā hyannadānaratāśca ye ekādaśīvrataparāste vai bhāgavatottamāḥ

जो जल-दान में निरत रहते हैं और अन्न-दान में भी रत रहते हैं, जो एकादशी व्रत में तत्पर रहते हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 59 (skanda.2.21.59)

गोदाननिरता ये च कन्यादानरताश्च ये । मदर्थं कर्मकर्तारस्ते वै भागवतोत्तमाः ।

godānaniratā ye ca kanyādānaratāśca ye madarthaṁ karmakartāraste vai bhāgavatottamāḥ

जो गौ-दान में निरत रहते हैं, जो कन्या-दान में रत रहते हैं, जो मेरे लिए कर्म करते हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 60 (skanda.2.21.60)

मन्मानसाश्च मद्भक्ता ये मद्भजनलोलुपाः । मन्नामस्मरणासक्तास्ते वै भागवतोत्तमाः ।

manmānasāśca madbhaktā ye madbhajanalolupāḥ mannāmasmaraṇāsaktāste vai bhāgavatottamāḥ

जिनका मन मुझमें लीन है, जो मेरे भक्त हैं, जो मेरी भक्ति के लिए लालायित रहते हैं, जो मेरे नाम के स्मरण में आसक्त रहते हैं — वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 61 (skanda.2.21.61)

बहुनात्र किमुक्तेन संक्षेपात्ते ब्रवीम्यहम् । सद्गुणाय प्रवर्तंते ते वै भागवतोत्तमाः ।

bahunātra kimuktena saṁkṣepātte bravīmyaham sadguṇāya pravartaṁte te vai bhāgavatottamāḥ

यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ, मैं तुम्हें संक्षेप में कहता हूँ — जो सद्गुणों की ओर प्रवृत्त होते हैं, वे ही सर्वश्रेष्ठ भागवत हैं।

श्लोक 62 (skanda.2.21.62)

एते भागवता विप्राः केचिदत्र प्रकीर्तिताः । ममापि गदितुं शक्या नाब्दकोटिशतैरपि ।

ete bhāgavatā viprāḥ kecidatra prakīrtitāḥ mamāpi gadituṁ śakyā nābdakoṭiśatairapi

हे विप्र! ये कुछ भागवत यहाँ वर्णित किए गए हैं; मेरे लिए भी इन्हें पूरी तरह कहना अरबों वर्षों में भी संभव नहीं है।

श्लोक 63 (skanda.2.21.63)

रामानुज महाभाग मद्भक्तानां च लक्षणम् । मयि भक्ते त्वयि प्रीत्या युक्तं किल महामते ।

rāmānuja mahābhāga madbhaktānāṁ ca lakṣaṇam mayi bhakte tvayi prītyā yuktaṁ kila mahāmate

हे महाभाग रामानुज! मेरे भक्तों का यह लक्षण, हे महामति, मुझमें भक्त तुम्हारे प्रति प्रेमपूर्वक उपयुक्त रूप से कहा गया है।

श्लोक 64 (skanda.2.21.64)

श्रीसूत उवाच । एवं वः कथितं विप्राः शौनकाद्या महौजसः । वृषाद्रौ च वियद्गंगातीर्थमाहात्म्यमुत्तमम् ।

śrīsūta uvāca evaṁ vaḥ kathitaṁ viprāḥ śaunakādyā mahaujasaḥ vṛṣādrau ca viyadgaṁgātīrthamāhātmyamuttamam

श्री सूत जी ने कहा — हे शौनक आदि महातेजस्वी विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें वृषाद्रि पर स्थित उत्तम आकाशगंगा तीर्थ का माहात्म्य कह सुनाया।

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