वैष्णव खण्ड · अध्याय 22
आकाशगंगा माहात्म्य: पुण्यशील एवं अपात्र-निमंत्रण
श्लोक 1 (skanda.2.22.1)
ऋषय ऊचुः । भगवन्सूत सर्वज्ञ वेदवेदान्तकोविद । दानानि कस्मै देयानि दानकालश्च कीदृशः ।
ṛṣaya ūcuḥ bhagavansūta sarvajña vedavedāṁtakovida dānāni kasmai deyāni dānakālaśca kīdṛśaḥ
ऋषियों ने कहा — हे भगवन् सूत! हे सर्वज्ञ! हे वेद-वेदांत में निपुण! दान किसे देना चाहिए और दान का समय कैसा होना चाहिए?
श्लोक 2 (skanda.2.22.2)
कश्च तत्प्रतिगृह्णीयात्सर्वं नो वक्तुमर्हसि ।
kaśca tatpratigṛhṇīyātsarvaṁ no vaktumarhasi
और कौन उस दान को ग्रहण करने योग्य है — यह सब हमें बताने की कृपा करें।
श्लोक 3 (skanda.2.22.3)
श्रीसूत उवाच । महापुण्यप्रदे क्षेत्रे वेंकटाख्ये द्विजोत्तमाः । सर्वेषामेव वर्णानां ब्राह्मणः परमो गुरुः ।
śrīsūta uvāca mahāpuṇyaprade kṣetre veṁkaṭākhye dvijottamāḥ sarveṣāmeva varṇānāṁ brāhmaṇaḥ paramo guruḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे श्रेष्ठ ब्राह्मणो! महापुण्यदायक वेंकट नामक क्षेत्र में, सभी वर्णों के लिए ब्राह्मण ही परम गुरु है।
श्लोक 4 (skanda.2.22.4)
तस्मै दानानि देयानि स तारयति पंडितः । ब्राह्मणः प्रतिगृह्णीयाद्वर्जयित्वा त्ववर्णकम् ।
tasmai dānāni deyāni sa tārayati paṁḍitaḥ brāhmaṇaḥ pratigṛhṇīyādvarjayitvā tvavarṇakam
उसी को दान देना चाहिए, क्योंकि विद्वान ब्राह्मण ही (दाता को) तार देता है; ब्राह्मण को दान ग्रहण करना चाहिए, किन्तु वर्णहीन (अयोग्य) व्यक्ति को छोड़कर।
श्लोक 5 (skanda.2.22.5)
षण्डस्य पुत्रहीनस्य दंभाचाररतस्य च । वेदविद्वेषिणश्चैव द्विजविद्वेषिणस्तथा ।
ṣaṁḍasya putrahīnasya daṁbhācāraratasya ca vedavidveṣiṇaścaiva dvijavidveṣiṇastathā
नपुंसक, पुत्रहीन, पाखंडी आचरण में रत, वेद से द्वेष करने वाले और ब्राह्मणों से द्वेष करने वाले —
श्लोक 6 (skanda.2.22.6)
स्वकर्मत्यागिनश्चापि दत्तं भवति निष्फलम् । परदाररतस्यापि परद्रव्यरतस्य च ।
svakarmatyāginaścāpi dattaṁ bhavati niṣphalam paradāraratasyāpi paradravyaratasya ca
— और अपने कर्म का त्याग करने वाले को दिया गया दान निष्फल होता है; परस्त्रीगामी और पराए धन में आसक्त व्यक्ति को दिया गया दान भी निष्फल होता है।
श्लोक 7 (skanda.2.22.7)
गायकस्यापि विप्रस्य दत्तं भवति निष्फलम् । असूयाविष्टमनसः कृतघ्नस्य च मायिनः ।
gāyakasyāpi viprasya dattaṁ bhavati niṣphalam asūyāviṣṭamanasaḥ kṛtaghnasya ca māyinaḥ
गाने-बजाने से जीविका चलाने वाले ब्राह्मण को दिया गया दान भी निष्फल होता है; ईर्ष्यालु मन वाले, कृतघ्न और छली को दिया गया दान भी निष्फल होता है।
श्लोक 8 (skanda.2.22.8)
ज्ञानशून्यस्य विप्रस्य दत्तं भवति निष्फलम् । नित्यं याञ्चापरस्यापि हिंसकस्याबलस्य च ।
jñānaśūnyasya viprasya dattaṁ bhavati niṣphalam nityaṁ yāñcāparasyāpi hiṁsakasyābalasya ca
ज्ञानरहित ब्राह्मण को दिया गया दान निष्फल होता है; सदा दूसरों से माँगते रहने वाले, हिंसक और निर्बल को दिया दान भी निष्फल होता है।
श्लोक 9 (skanda.2.22.9)
नामविक्रयिणश्चैव वेदविक्रयिणस्तथा । स्मृतिविक्रयिणश्चैव धर्मविक्रयिणस्तथा ।
nāmavikrayiṇaścaiva vedavikrayiṇastathā smṛtivikrayiṇaścaiva dharmavikrayiṇastathā
नाम बेचने वाले (नाम-जप का व्यापार करने वाले), वेद बेचने वाले, स्मृति बेचने वाले और धर्म बेचने वाले —
श्लोक 10 (skanda.2.22.10)
परोपतापशीलस्य दत्तं भवति निष्फलम् । ये केचित्पापनिरता निन्दिताः सुकृतैस्तथा ।
paropatāpaśīlasya dattaṁ bhavati niṣphalam ye kecitpāpaniratā niṁditāḥ sukṛtaistathā
— और दूसरों को कष्ट पहुँचाने के स्वभाव वाले को दिया गया दान निष्फल होता है; जो कोई पाप में रत हैं और सत्कर्मी लोगों द्वारा निंदित हैं —
श्लोक 11 (skanda.2.22.11)
न तेभ्यः प्रतिगृह्णीयान्न देयं वापि किञ्चन । सत्कर्मनिरतायैव श्रोत्रियायाहिताग्नये ।
na tebhyaḥ pratigṛhṇīyānna deyaṁ vāpi kiñcana satkarmaniratāyaiva śrotriyāyāhitāgnaye
— उनसे कुछ भी ग्रहण न किया जाए और न ही उन्हें कुछ दिया जाए; सत्कर्म में रत, वेदपाठी और अग्निहोत्री को ही —
श्लोक 12 (skanda.2.22.12)
वृत्तिहीनाय वै देयं दरिद्राय कुटुम्बिने । देवपूजासु सक्ताय पुराणकथकाय च ।
vṛttihīnāya vai deyaṁ daridrāya kuṭuṁbine devapūjāsu saktāya purāṇakathakāya ca
— जीविकाहीन, दरिद्र गृहस्थ को, देवपूजा में लगे हुए और पुराण-कथा कहने वाले को दान देना चाहिए।
श्लोक 13 (skanda.2.22.13)
देयं प्रयत्नतो विप्रा दरिद्रस्य विशेषतः । बहुना किमिहोक्तेन शृणुध्वं द्विजसत्तमाः ।
deyaṁ prayatnato viprā daridrasya viśeṣataḥ bahunā kimihoktena śṛṇudhvaṁ dvijasattamāḥ
हे विप्रो! विशेष रूप से दरिद्र को प्रयत्नपूर्वक दान देना चाहिए; अधिक कहने से क्या लाभ — हे श्रेष्ठ द्विजो! सुनो।
श्लोक 14 (skanda.2.22.14)
सर्वेषां ब्राह्मणानां च प्रदातुं शक्यते सदा । वन्ध्याभर्त्रे प्रदत्तञ्चेद्रासभो जायते नरः ।
sarveṣāṁ brāhmaṇānāṁ ca pradātuṁ śakyate sadā vaṁdhyābhartre pradattañcedrāsabho jāyate naraḥ
सभी ब्राह्मणों को सदा दान दिया जा सकता है; परंतु यदि वन्ध्या स्त्री के पति को दान दिया जाए तो देने वाला मनुष्य गधा बन जाता है।
श्लोक 15 (skanda.2.22.15)
नास्तिकं भिन्नमर्यादं पुत्रहीनं जडं खलम् । स्तेयिनं कितवं चैव कदाचिन्नाभिवादयेत् ।
nāstikaṁ bhinnamaryādaṁ putrahīnaṁ jaḍaṁ khalam steyinaṁ kitavaṁ caiva kadācinnābhivādayet
नास्तिक, मर्यादा भंग करने वाले, पुत्रहीन, जड़, दुष्ट, चोर और जुआरी को कभी प्रणाम नहीं करना चाहिए।
श्लोक 16 (skanda.2.22.16)
पाषण्डं पतितं व्रात्यं वेदविक्रयिणं तथा । कृतघ्नं पापनिरतं कदाचिन्नाभिवादयेत् ।
pāṣaṁḍaṁ patitaṁ vrātyaṁ vedavikrayiṇaṁ tathā kṛtaghnaṁ pāpanirataṁ kadācinnābhivādayet
पाखंडी, पतित, व्रात्य (संस्कारहीन), वेद बेचने वाले, कृतघ्न और पापरत व्यक्ति को कभी प्रणाम नहीं करना चाहिए।
श्लोक 17 (skanda.2.22.17)
तथा स्नानं प्रकुर्वन्तं समित्पुष्पकरं तथा । उदपात्रधरञ्चैव भुंजन्तं नाभिवादयेत् ।
tathā snānaṁ prakurvaṁtaṁ samitpuṣpakaraṁ tathā udapātradharañcaiva bhuṁjaṁtaṁ nābhivādayet
इसी प्रकार स्नान करते हुए, हाथ में समिधा या पुष्प लिए हुए, जल-पात्र धारण किए हुए, अथवा भोजन करते हुए व्यक्ति को प्रणाम नहीं करना चाहिए।
श्लोक 18 (skanda.2.22.18)
विवादशालिनं चण्डं वमन्तं जनमध्यगम् । भिक्षान्नधारिणं चैव शयानं नाभिवादयेत् ।
vivādaśālinaṁ caṁḍaṁ vamaṁtaṁ janamadhyagam bhikṣānnadhāriṇaṁ caiva śayānaṁ nābhivādayet
विवाद में लगे हुए, क्रोधी, वमन करते हुए, भीड़ के बीच में खड़े हुए, भिक्षा का अन्न लिए हुए और सोए हुए व्यक्ति को प्रणाम नहीं करना चाहिए।
श्लोक 19 (skanda.2.22.19)
वन्ध्याञ्च पुष्पिणीं जारां सूतिकां गर्भपातिनीम् । व्रतघ्नीञ्च तथा चण्डीं कदाचिन्नाभिवादयेत् ।
vaṁdhyāñca puṣpiṇīṁ jārāṁ sūtikāṁ garbhapātinīm vrataghnīñca tathā caṁḍīṁ kadācinnābhivādayet
वन्ध्या स्त्री, रजस्वला, व्यभिचारिणी, प्रसूता, गर्भपात करने वाली, व्रतभंग करने वाली और क्रोधी स्त्री को कभी प्रणाम नहीं करना चाहिए।
श्लोक 20 (skanda.2.22.20)
सभायां यज्ञशालायां देवतायतनेष्वपि । प्रत्येकं तु नमस्कारो हन्ति पुण्यं पुरातनम् ।
sabhāyāṁ yajñaśālāyāṁ devatāyataneṣvapi pratyekaṁ tu namaskāro haṁti puṇyaṁ purātanam
सभा में, यज्ञशाला में और देवालयों में भी प्रत्येक व्यक्ति को अलग-अलग प्रणाम करना पूर्व-संचित पुण्य को नष्ट कर देता है।
श्लोक 21 (skanda.2.22.21)
श्राद्धव्रते नियुक्तञ्च देवताभ्यर्चकं तथा । यज्ञं च तर्पणञ्चैव कुर्वन्तं नाभिवादयेत् ।
śrāddhavrate niyuktañca devatābhyarcakaṁ tathā yajñaṁ ca tarpaṇañcaiva kurvaṁtaṁ nābhivādayet
श्राद्ध-व्रत में नियुक्त व्यक्ति को, देवता की पूजा करते हुए व्यक्ति को, तथा यज्ञ और तर्पण करते हुए व्यक्ति को प्रणाम नहीं करना चाहिए।
श्लोक 22 (skanda.2.22.22)
कुर्वते वन्दनं यस्तु न कुर्यात्प्रतिवन्दनम् । नाभिवाद्यः स विज्ञेयो यथा शूद्रस्तथैव च ।
kurvate vaṁdanaṁ yastu na kuryātprativaṁdanam nābhivādyaḥ sa vijñeyo yathā śūdrastathaiva ca
जो व्यक्ति प्रणाम करने पर भी प्रति-प्रणाम नहीं करता, वह शूद्र के समान अभिवादन के अयोग्य समझा जाना चाहिए।
श्लोक 23 (skanda.2.22.23)
तस्मात्सर्वेपु कालेषु बुद्धिमान्ब्राह्मणोत्तमः । वन्ध्यापतिं द्विजं क्रूरं कदाचिन्नाभिवादयेत् ।
tasmātsarveṣu kāleṣu buddhimānbrāhmaṇottamaḥ vaṁdhyāpatiṁ dvijaṁ krūraṁ kadācinnābhivādayet
इसलिए बुद्धिमान श्रेष्ठ ब्राह्मण को सर्वदा वन्ध्या के पति और क्रूर ब्राह्मण को कभी प्रणाम नहीं करना चाहिए।
श्लोक 24 (skanda.2.22.24)
श्रीसूत उवाच । अत्रेतिहासं वक्ष्यामि पुण्यशीलस्य धीमतः । सनत्कुमारमुनये नारदेन प्रभाषितम् ।
śrīsūta uvāca atretihāsaṁ vakṣyāmi puṇyaśīlasya dhīmataḥ sanatkumāramunaye nāradena prabhāṣitam
श्री सूत जी ने कहा — यहाँ मैं बुद्धिमान पुण्यशील का वह इतिहास कहता हूँ, जो नारद ने सनत्कुमार मुनि को कहा था।
श्लोक 25 (skanda.2.22.25)
तद्वक्ष्यामि मुनिश्रेष्ठाः शृणुध्वं सुसमाहिताः । पुरा गोदावरीतीरे सर्वधर्मपरायणः ।
tadvakṣyāmi muniśreṣṭhāḥ śṛṇudhvaṁ susamāhitāḥ purā godāvarītīre sarvadharmaparāyaṇaḥ
हे श्रेष्ठ मुनियो! मैं वह कहता हूँ, एकाग्रचित्त होकर सुनो; पूर्वकाल में गोदावरी के तट पर एक सर्वधर्मपरायण —
श्लोक 26 (skanda.2.22.26)
पुण्यशीलो द्विजवरः सत्यवादी जितेन्द्रियः । दयावान्सर्वभूतेषु देवाग्निद्विजपूजकः ।
puṇyaśīlo dvijavaraḥ satyavādī jitendriyaḥ dayāvānsarvabhūteṣu devāgnidvijapūjakaḥ
— पुण्यशील नामक श्रेष्ठ ब्राह्मण, जो सत्यवादी, जितेन्द्रिय, सब प्राणियों पर दयावान तथा देव, अग्नि और ब्राह्मणों का पूजक था।
श्लोक 27 (skanda.2.22.27)
कर्मणा जन्मशुद्धश्च मातापितृहिते रतः । गुरुभक्तिः सदाक्षिण्यो ब्रह्मण्यः साधुसंमतः ।
karmaṇā janmaśuddhaśca mātāpitṛhite rataḥ gurubhaktiḥ sadākṣiṇyo brahmaṇyaḥ sādhusaṁmataḥ
वह अपने कर्मों और जन्म दोनों से शुद्ध था, माता-पिता के हित में रत था, गुरुभक्त, सदा उदार, ब्राह्मण-हितैषी और साधु-पुरुषों द्वारा सम्मानित था।
श्लोक 28 (skanda.2.22.28)
एतादृशगुणैर्युक्तः पुण्यशीलस्य धीमतः ।
etādṛśaguṇairyuktaḥ puṇyaśīlasya dhīmataḥ
ऐसे-ऐसे गुणों से युक्त था वह बुद्धिमान पुण्यशील।
श्लोक 29 (skanda.2.22.29)
गृहं सम्प्राप्तवान्विप्रो वेदवेदांगपारगः । प्रार्थितः पुण्यशीलेन पितृश्राद्धेऽतिवेगतः ।
gṛhaṁ saṁprāptavānvipro vedavedāṁgapāragaḥ prārthitaḥ puṇyaśīlena pitṛśrāddhe'tivegataḥ
एक ब्राह्मण, जो वेद और वेदांगों में पारंगत था, पुण्यशील के घर पहुँचा, जिसे पितृ-श्राद्ध के लिए अत्यंत शीघ्रता से आमंत्रित किया गया था।
श्लोक 30 (skanda.2.22.30)
तं विप्रं श्रोत्रियं शान्तं पितृश्राद्धे नियोज्य वै । श्राद्धं चकार धर्मात्मा प्रत्याब्दिकमनुत्तमम् ।
taṁ vipraṁ śrotriyaṁ śāṁtaṁ pitṛśrāddhe niyojya vai śrāddhaṁ cakāra dharmātmā pratyābdikamanuttamam
उस वेदपाठी और शान्त ब्राह्मण को पितृ-श्राद्ध में नियुक्त करके, उस धर्मात्मा ने अनुत्तम वार्षिक श्राद्ध सम्पन्न किया।
श्लोक 31 (skanda.2.22.31)
ततः कालान्तरे तस्य पुण्यशीलस्य चानने । वैरूप्यं प्राप्तमत्युग्रं रासभाननवत्तदा ।
tataḥ kālāṁtare tasya puṇyaśīlasya cānane vairūpyaṁ prāptamatyugraṁ rāsabhānanavattadā
इसके कुछ काल बाद उस पुण्यशील के मुख पर एक अत्यंत भयंकर विकृति उत्पन्न हो गई, जो गधे के मुख के समान थी।
श्लोक 32 (skanda.2.22.32)
ततः खिन्नमना भूत्वा पुण्यशीलोऽतिधार्मिकः । निःश्वस्य बहुधा खिन्नः प्रपेदेऽगस्त्ययोगिनः ।
tataḥ khinnamanā bhūtvā puṇyaśīlo'tidhārmikaḥ niḥśvasya bahudhā khinnaḥ prapede'gastyayoginaḥ
तब अत्यंत दुःखित मन से वह परम धार्मिक पुण्यशील बार-बार दीर्घ निःश्वास लेता हुआ, अत्यंत दुखी होकर योगी अगस्त्य की शरण में गया।
श्लोक 33 (skanda.2.22.33)
सुवर्णमुखरीतीरे ऋषिसंघनिषेविते । आश्रमं परमं दिव्यं सर्वकामफलप्रदम् ।
suvarṇamukharītīre ṛṣisaṁghaniṣevite āśramaṁ paramaṁ divyaṁ sarvakāmaphalapradam
सुवर्णमुखरी नदी के तट पर, ऋषियों के समूह द्वारा सेवित, सर्व-कामनाओं को फल देने वाले परम दिव्य आश्रम में —
श्लोक 34 (skanda.2.22.34)
तत्राश्रमे मुनिवरैः सेव्यमानमहर्निशम् । दृष्ट्वागस्त्यं महात्मानं सर्वलोकहितैषिणम् ।
tatrāśrame munivaraiḥ sevyamānamaharniśam dṛṣṭvāgastyaṁ mahātmānaṁ sarvalokahitaiṣiṇam
— उस आश्रम में, जहाँ श्रेष्ठ मुनियों द्वारा वह दिन-रात सेवित रहता था, महात्मा अगस्त्य को, जो समस्त लोकों के हित की कामना करते थे, देखकर —
श्लोक 35 (skanda.2.22.35)
प्रणाममकरोत्तस्मै गार्दभास्योऽतिदुःखितः ।
praṇāmamakarottasmai gārdabhāsyo'tiduḥkhitaḥ
— उस अत्यंत दुःखी, गधे के मुख वाले पुण्यशील ने उन्हें प्रणाम किया।
श्लोक 36 (skanda.2.22.36)
पुण्यशील उवाच । तपोनिधे नमस्तुभ्यमगस्त्य मुनिसेवित । कुत्सितास्यं महापापं रक्षरक्ष दयानिधे ।
puṇyaśīla uvāca taponidhe namastubhyamagastya munisevita kutsitāsyaṁ mahāpāpaṁ rakṣarakṣa dayānidhe
पुण्यशील ने कहा — हे तपोनिधि अगस्त्य! हे मुनियों द्वारा सेवित! आपको नमस्कार है। मैं घृणित मुख वाला महापापी हूँ; हे दयानिधे! मेरी रक्षा करें, रक्षा करें।
श्लोक 37 (skanda.2.22.37)
केन दोषेण मे चात्र मुखस्यासीत्कुरूपता ।
kena doṣeṇa me cātra mukhasyāsītkurūpatā
किस दोष के कारण मेरे मुख की यह कुरूपता उत्पन्न हुई है?
श्लोक 38 (skanda.2.22.38)
मयि प्रीत्या महाभाग वदस्व मुनिसत्तम ।
mayi prītyā mahābhāga vadasva munisattama
हे महाभाग! हे मुनिश्रेष्ठ! मुझ पर प्रेमपूर्वक कृपा करके यह बतलाइए।
श्लोक 39 (skanda.2.22.39)
अगस्त्य उवाच । विप्रवर्य महाभाग पुण्यशील महामते । आननस्य विरूपं वै शृणु नान्यमना द्विज ।
agastya uvāca vipravarya mahābhāga puṇyaśīla mahāmate ānanasya virūpaṁ vai śṛṇu nānyamanā dvija
अगस्त्य ने कहा — हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! हे महाभाग बुद्धिमान पुण्यशील! अपने मुख की इस विकृति का कारण सुनो, हे द्विज, अन्यमनस्क हुए बिना।
श्लोक 40 (skanda.2.22.40)
कञ्चिद्विप्रं गुणनिधिं वेदवेदांगपारगम् । श्रोत्रियं पुत्ररहितं श्राद्धे त्वं विनियुक्तवान् ।
kaṁcidvipraṁ guṇanidhiṁ vedavedāṁgapāragam śrotriyaṁ putrarahitaṁ śrāddhe tvaṁ viniyuktavān
तुमने एक ब्राह्मण को, जो गुणों का भंडार, वेद-वेदांगों में पारंगत और वेदपाठी था किन्तु पुत्रहीन था, श्राद्ध में नियुक्त किया था।
श्लोक 41 (skanda.2.22.41)
तेन दोषेण महता मुखे तव विरूपता । ये लोके हव्यकव्यादौ वन्ध्यायाः स्वामिनं द्विजम् ।
tena doṣeṇa mahatā mukhe tava virūpatā ye loke havyakavyādau vaṁdhyāyāḥ svāmināṁ dvijam
उसी बड़े दोष के कारण तुम्हारे मुख में यह विकृति आई है; जो लोग संसार में हव्य-कव्य आदि (यज्ञ-श्राद्ध) कर्मों में वन्ध्या स्त्री के पति ब्राह्मण को —
श्लोक 42 (skanda.2.22.42)
नियोजयन्ति ते यान्ति मुखे गर्दभरूपताम् । शुभकर्मणि वा विप्र पैतृके वापि कर्मणि ।
niyojayaṁti te yāṁti mukhe gardabharūpatām śubhakarmaṇi vā vipra paitṛke vāpi karmaṇi
— नियुक्त करते हैं, वे मुख में गधे का रूप प्राप्त करते हैं, चाहे वह शुभ कर्म हो या पितृ-कर्म हो, हे विप्र।
श्लोक 43 (skanda.2.22.43)
वन्ध्यापतिं महापापं कदाचिन्न निमन्त्रयेत् । वन्ध्यापतिं महाक्रूरं वृषलीपतिमेव वा ।
vaṁdhyāpatiṁ mahāpāpaṁ kadācinna nimaṁtrayet vaṁdhyāpatiṁ mahākrūraṁ vṛṣalīpatimeva vā
वन्ध्या के पति, जो महापापी है, उसे कभी आमंत्रित नहीं करना चाहिए; न ही महाक्रूर वन्ध्या-पति या शूद्र-स्त्री के पति को।
श्लोक 44 (skanda.2.22.44)
श्रेयस्कामी हि विप्रेंद्र श्राद्धे तु न निमन्त्रयेत् । वेदशास्त्रादियुक्तोऽपि कुलीनः कर्मठोऽपि वा ।
śreyaskāmī hi viprendra śrāddhe tu na nimaṁtrayet vedaśāstrādiyukto'pi kulīnaḥ karmaṭho'pi vā
हे विप्रेन्द्र! जो कल्याण चाहता है वह श्राद्ध में ऐसे व्यक्ति को आमंत्रित न करे, चाहे वह वेद-शास्त्र से युक्त, कुलीन अथवा कर्मनिष्ठ ही क्यों न हो।
श्लोक 45 (skanda.2.22.45)
वन्ध्याभर्ता द्विजश्रेष्ठ श्राद्धे त्याज्यः कथञ्चन । ज्योतिष्टोमादियज्ञेषु व्रतेषु च तपःसु च ।
vaṁdhyābhartā dvijaśreṣṭha śrāddhe tyājyaḥ kathañcana jyotiṣṭomādiyajñeṣu vrateṣu ca tapaḥsu ca
हे द्विजश्रेष्ठ! वन्ध्या के पति को श्राद्ध में किसी भी प्रकार त्याग देना चाहिए; ज्योतिष्टोम आदि यज्ञों में, व्रतों में और तपस्याओं में भी।
श्लोक 46 (skanda.2.22.46)
समर्थोऽपि द्विजश्रेष्ठः श्राद्धे वन्ध्यापतिं त्यजेत् । अलभ्ये तु द्विजे पात्रे तन्तुमात्रोपजीविनम् ।
samartho'pi dvijaśreṣṭhaḥ śrāddhe vaṁdhyāpatiṁ tyajet alabhye tu dvije pātre taṁtumātropajīvinam
सक्षम होते हुए भी श्रेष्ठ ब्राह्मण को श्राद्ध में वन्ध्या-पति का त्याग करना चाहिए; यदि योग्य ब्राह्मण पात्र उपलब्ध न हो तो केवल तंतु मात्र से जीवन चलाने वाले (निर्धन) को भी बुलाया जा सकता है।
श्लोक 47 (skanda.2.22.47)
पुत्रवन्तं सदाचारं श्राद्धार्थं तु निमन्त्रयेत् । तदभावे द्विजश्रेष्ठ पुत्रं वाऽनुजमेव वा ।
putravaṁtaṁ sadācāraṁ śrāddhārthaṁ tu nimaṁtrayet tadabhāve dvijaśreṣṭha putraṁ vā'nujameva vā
एक पुत्रवान, सदाचारी व्यक्ति को ही श्राद्ध के लिए आमंत्रित करना चाहिए; उसके अभाव में हे द्विजश्रेष्ठ, अपने पुत्र या छोटे भाई को —
श्लोक 48 (skanda.2.22.48)
आत्मानं वा नियुञ्जीत श्राद्धे वन्ध्यापतिं त्यजेत् । पुण्यशील महाभाग चोद्धृत्य भुजमुच्यते ।
ātmānaṁ vā niyuñjīta śrāddhe vaṁdhyāpatiṁ tyajet puṇyaśīla mahābhāga coddhṛtya bhujamucyate
— अथवा स्वयं को ही नियुक्त कर लेना चाहिए, परन्तु श्राद्ध में वन्ध्या-पति का त्याग अवश्य करना चाहिए; हे महाभाग पुण्यशील! यह बात मैं भुजा उठाकर (दृढ़तापूर्वक) कहता हूँ।
श्लोक 49 (skanda.2.22.49)
सर्वथा पुत्रहीनं तु श्राद्धार्थं न नियोजयेत् । वन्ध्यापतिं द्विजं यस्तु श्राद्धकर्ता नियोक्ष्यति ।
sarvathā putrahīnaṁ tu śrāddhārthaṁ na niyojayet vaṁdhyāpatiṁ dvijaṁ yastu śrāddhakartā niyokṣyati
पुत्रहीन व्यक्ति को श्राद्ध के लिए किसी भी प्रकार नियुक्त न करे; जो श्राद्ध-कर्ता वन्ध्या-पति ब्राह्मण को नियुक्त करेगा —
श्लोक 50 (skanda.2.22.50)
तच्छ्राद्धमासुरं ज्ञेयं कर्ता च नरकं व्रजेत् ।
tacchrāddhamāsuraṁ jñeyaṁ kartā ca narakaṁ vrajet
— उसका वह श्राद्ध आसुरी समझा जाना चाहिए, और उसका करने वाला नरक को प्राप्त होता है।
श्लोक 51 (skanda.2.22.51)
बहुनात्र किमुक्तेन तद्दोषविनिवृत्तये । उपायं ते प्रवक्ष्यामि स्वर्णमुख्यास्तटे शुभे ।
bahunātra kimuktena taddoṣavinivṛttaye upāyaṁ te pravakṣyāmi svarṇamukhyāstaṭe śubhe
यहाँ अधिक कहने से क्या लाभ — उस दोष के निवारण का उपाय मैं तुम्हें बताता हूँ, जो स्वर्णमुखी के शुभ तट पर स्थित है।
श्लोक 52 (skanda.2.22.52)
वर्तते देवसंघैश्च सेवितो वेंकटाचलः । मेरुपुत्रो महापुण्यः सर्वकामफलप्रदः ।
vartate devasaṁghaiśca sevito veṁkaṭācalaḥ meruputro mahāpuṇyaḥ sarvakāmaphalapradaḥ
वहाँ देवसमूहों द्वारा सेवित वेंकटाचल विद्यमान है, जो मेरु का पुत्र, अत्यंत पुण्यमय और सर्व-कामनाओं को फल देने वाला है।
श्लोक 53 (skanda.2.22.53)
तस्मिन्वेंकटशैलेन्द्रे सुरासुरनमस्कृते । वियद्गंगेति नाम्ना वै तीर्थमस्ति महत्तरम् ।
tasminveṁkaṭaśailendre surāsuranamaskṛte viyadgaṁgeti nāmnā vai tīrthamasti mahattaram
उस वेंकट पर्वतराज पर, जो देवों और असुरों दोनों द्वारा वंदित है, वियद्गंगा नाम से एक महान तीर्थ विद्यमान है।
श्लोक 54 (skanda.2.22.54)
सर्वपापप्रशमनमायुरारोग्यवर्धनम् । त्वं गत्वा वेंकटं शैलं स्वामिपुष्करिणीजले ।
sarvapāpapraśamanamāyurārogyavardhanam tvaṁ gatvā veṁkaṭaṁ śailaṁ svāmipuṣkariṇījale
यह समस्त पापों को शान्त करने वाला और आयु तथा आरोग्य को बढ़ाने वाला है; तुम वेंकट पर्वत पर जाकर स्वामिपुष्करिणी के जल में —
श्लोक 55 (skanda.2.22.55)
स्नात्वा संकल्पपूर्वं तु गंगातीर्थमनन्तरम् । गत्वा तीर्थविधानेन स्नानं कुरु महामते ।
snātvā saṁkalpapūrvaṁ tu gaṁgātīrthamanaṁtaram gatvā tīrthavidhānena snānaṁ kuru mahāmate
— संकल्पपूर्वक स्नान करके, उसके पश्चात् गंगा-तीर्थ में जाकर तीर्थ-विधि के अनुसार स्नान करो, हे महामते।
श्लोक 56 (skanda.2.22.56)
स्नानमात्रात्ततः सद्यो मुखस्यास्य महामते । वैरूप्यं तत्क्षणादेव नंक्ष्यत्येव न संशयः ।
snānamātrāttataḥ sadyo mukhasyāsya mahāmate vairūpyaṁ tatkṣaṇādeva naṁkṣyatyeva na saṁśayaḥ
उस स्नान मात्र से ही, हे महामते, तत्काल तुम्हारे इस मुख की विकृति उसी क्षण नष्ट हो जाएगी, इसमें कोई संदेह नहीं है।
श्लोक 57 (skanda.2.22.57)
एवमुक्तः पुण्यशीलो ह्यगस्त्येन महात्मना । तं प्रणम्य महात्मानं वेंकटाद्रिं ततो ययौ ।
evamuktaḥ puṇyaśīlo hyagastyena mahātmanā taṁ praṇamya mahātmānaṁ veṁkaṭādriṁ tato yayau
महात्मा अगस्त्य के इस प्रकार कहने पर, पुण्यशील ने उस महात्मा को प्रणाम कर, फिर वेंकटाद्रि की ओर प्रस्थान किया।
श्लोक 58 (skanda.2.22.58)
तत्र गत्वा महाभागः स्वामिपुष्करिणीजले । स्नात्वा नियमपूर्वं तु वियद्गंगासमीपगः ।
tatra gatvā mahābhāgaḥ svāmipuṣkariṇījale snātvā niyamapūrvaṁ tu viyadgaṁgāsamīpagaḥ
वहाँ पहुँचकर उस महाभाग ने स्वामिपुष्करिणी के जल में नियमपूर्वक स्नान किया, फिर वियद्गंगा के समीप गया।
श्लोक 59 (skanda.2.22.59)
तत्र स्नानेन धर्मात्मा कामवक्रोपमं मुखम् । प्राप्तवान्पुण्यशीलस्तु अहो तीर्थस्य वैभवम् ।
tatra snānena dharmātmā kāmavakropamaṁ mukham prāptavānpuṇyaśīlastu aho tīrthasya vaibhavam
वहाँ स्नान करने से उस धर्मात्मा पुण्यशील को कामदेव के समान सुंदर मुख प्राप्त हो गया — अहो, इस तीर्थ का कैसा वैभव है!
श्लोक 60 (skanda.2.22.60)
श्रीसूत उवाच । एवं वः कथितं विप्रा नारदेन प्रभाषितम् । सनत्कुमारमुनये शौनकाद्या महौजसः ।
śrīsūta uvāca evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā nāradena prabhāṣitam sanatkumāramunaye śaunakādyā mahaujasaḥ
श्री सूत जी ने कहा — हे शौनक आदि महातेजस्वी विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें वह कथा सुनाई जो नारद ने सनत्कुमार मुनि को कही थी।