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वैष्णव खण्ड · अध्याय 23

चक्रतीर्थ माहात्म्य

अध्याय 22अध्याय-सूचीअध्याय 24

श्लोक 1 (skanda.2.23.1)

श्रीसूत उवाच । अथाहं संप्रवक्ष्यामि द्विजेन्द्राः सत्यवादिनः । चक्रतीर्थस्य माहात्म्यं सर्वपापप्रणाशनम् ।

śrīsūta uvāca athāhaṁ saṁpravakṣyāmi dvijendrāḥ satyavādinaḥ cakratīrthasya māhātmyaṁ sarvapāpapraṇāśanam

श्री सूत जी ने कहा — हे सत्यवादी द्विजेन्द्रो! अब मैं चक्रतीर्थ का माहात्म्य कहता हूँ, जो समस्त पापों का नाश करने वाला है।

श्लोक 2 (skanda.2.23.2)

ये शृण्वन्ति महापुण्यं चक्रतीर्थस्य वैभवम् । ते यांति विष्णुभवनं पुनरावृत्तिवर्जितम् ।

ye śṛṇvaṁti mahāpuṇyaṁ cakratīrthasya vaibhavam te yāṁti viṣṇubhavanaṁ punarāvṛttivarjitam

जो लोग चक्रतीर्थ के इस अत्यंत पुण्यमय वैभव को सुनते हैं, वे विष्णु के उस धाम को प्राप्त होते हैं जहाँ से पुनरावृत्ति नहीं होती।

श्लोक 3 (skanda.2.23.3)

अन्नदाने च विमुखा जलदाने तथैव च । गोदानविमुखा ये च शुद्धास्तेऽत्र निमज्जनात् ।

annadāne ca vimukhā jaladāne tathaiva ca godānavimukhā ye ca śuddhāste'tra nimajjanāt

जो लोग अन्नदान, जलदान और गोदान से विमुख रहे हैं, वे भी इस तीर्थ में स्नान करने मात्र से शुद्ध हो जाते हैं।

श्लोक 4 (skanda.2.23.4)

तस्मात्पुण्यतमं तीर्थं चक्रतीर्थमनुत्तमम् ।

tasmātpuṇyatamaṁ tīrthaṁ cakratīrthamanuttamam

इसलिए चक्रतीर्थ सबसे अधिक पुण्यमय और अनुपम तीर्थ है।

श्लोक 5 (skanda.2.23.5)

श्रीसूत उवाच । पुरा श्रीवत्सगोत्रीयः पद्मनाभो जितेन्द्रियः । चक्रपुष्करिणीतीरे सोऽतप्यत महत्तपः ।

śrīsūta uvāca purā śrīvatsagotrīyaḥ padmanābho jitendriyaḥ cakrapuṣkariṇītīre so'tapyata mahattapaḥ

श्री सूत जी ने कहा — पूर्वकाल में श्रीवत्स गोत्र में उत्पन्न, जितेन्द्रिय पद्मनाभ नामक एक ब्राह्मण ने चक्रपुष्करिणी के तट पर महान तप किया।

श्लोक 6 (skanda.2.23.6)

दयायुक्तो निराहारः सत्यवादी जितेन्द्रियः । आत्मवत्सर्वभूतानि पश्यन्विषयनिःस्पृहः ।

dayāyukto nirāhāraḥ satyavādī jitendriyaḥ ātmavatsarvabhūtāni paśyanviṣayaniḥspṛhaḥ

वह दयावान, निराहार, सत्यवादी, जितेन्द्रिय, सब प्राणियों को अपने समान देखने वाला और विषयों से निःस्पृह था।

श्लोक 7 (skanda.2.23.7)

सर्वभूतहितो दान्तः सर्वद्वन्द्वविवर्जितः । वर्षाणि कतिचित्सोऽयं जीर्णपर्णाशनोऽभवत् ।

sarvabhūtahito dāntaḥ sarvadvaṁdvavivarjitaḥ varṣāṇi katicitso'yaṁ jīrṇaparṇāśano'bhavat

वह सब प्राणियों के हित में रत, संयमी और समस्त द्वंद्वों से रहित था; कुछ वर्षों तक वह केवल झरे हुए पत्तों का ही आहार करता रहा।

श्लोक 8 (skanda.2.23.8)

कञ्चित्कालं जलाहारो वायुभक्षः कियत्समाः । एवं द्वादश वर्षाणि पद्मनाभो महामुनिः ।

kaṁcitkālaṁ jalāhāro vāyubhakṣaḥ kiyatsamāḥ evaṁ dvādaśa varṣāṇi padmanābho mahāmuniḥ

कुछ काल तक वह केवल जल पीकर और कुछ वर्षों तक केवल वायु का ही सेवन करता रहा; इस प्रकार महामुनि पद्मनाभ ने बारह वर्षों तक —

श्लोक 9 (skanda.2.23.9)

अतप्यत तपो घोरं देवैरपि सुदुष्करम् । अथ तत्तपसा तुष्टो भगवान्कमलापतिः ।

atapyata tapo ghoraṁ devairapi suduṣkaram atha tattapasā tuṣṭo bhagavānkamalāpatiḥ

— ऐसी घोर तपस्या की, जो देवताओं के लिए भी अत्यंत दुष्कर थी; तब उस तप से प्रसन्न होकर भगवान् कमलापति (लक्ष्मीपति) —

श्लोक 10 (skanda.2.23.10)

प्रत्यक्षतामगात्तस्य शङ्खचक्रगदाधरः । विकचाम्बुजपत्राक्षः सूर्यकोटिसमप्रभः ।

pratyakṣatāmagāttasya śaṁkhacakragadādharaḥ vikacāṁbujapatrākṣaḥ sūryakoṭisamaprabhaḥ

— शंख-चक्र-गदा धारण किए हुए, खिले हुए कमल-दल के समान नेत्रों वाले, करोड़ों सूर्यों के समान कान्ति वाले होकर उसके समक्ष प्रत्यक्ष प्रकट हुए।

श्लोक 11 (skanda.2.23.11)

उन्मील्य चक्षुषी तत्र दृष्टवान्वेंकटेश्वरम् । शंखचक्रधरं शांतं श्रीनिवासं कृपानिधिम् । दृष्ट्वा देवं महात्मानं स्तोतुं समुपचक्रमे ।

unmīlya cakṣuṣī tatra dṛṣṭavānveṁkaṭeśvaram śaṁkhacakradharaṁ śāṁtaṁ śrīnivāsaṁ kṛpānidhim dṛṣṭvā devaṁ mahātmānaṁ stotuṁ samupacakrame

वहाँ अपनी आँखें खोलकर उसने वेंकटेश्वर को देखा — शंख-चक्र धारण किए, शांत, कृपानिधि श्रीनिवास को; उस महात्मा देव को देखकर वह स्तुति करने लगा।

श्लोक 12 (skanda.2.23.12)

नमो देवाधिदेवाय वेंकटेशाय शार्ङ्गिणे । नारायणाद्रिवासाय श्रीनिवासाय ते नमः ।

namo devādhidevāya veṁkaṭeśāya śārṁgiṇe nārāyaṇādrivāsāya śrīnivāsāya te namaḥ

हे देवाधिदेव! हे शार्ङ्गधारी वेंकटेश! आपको नमस्कार है। हे नारायणाद्रि पर निवास करने वाले श्रीनिवास! आपको नमस्कार है।

श्लोक 13 (skanda.2.23.13)

नमः कल्मषनाशाय वासुदेवाय विष्णवे । शेषाचलनिवासाय श्रीनिवासाय ते नमः ।

namaḥ kalmaṣanāśāya vāsudevāya viṣṇave śeṣācalanivāsāya śrīnivāsāya te namaḥ

पापों का नाश करने वाले वासुदेव विष्णु को नमस्कार है; शेषाचल पर निवास करने वाले श्रीनिवास को नमस्कार है।

श्लोक 14 (skanda.2.23.14)

नमस्त्रैलोक्यनाथाय विश्वरूपाय साक्षिणे । शिवब्रह्मादिवंद्याय श्रीनिवासाय ते नमः ।

namastrailokyanāthāya viśvarūpāya sākṣiṇe śivabrahmādivaṁdyāya śrīnivāsāya te namaḥ

तीनों लोकों के स्वामी, विश्वरूप, साक्षी-स्वरूप, शिव-ब्रह्मा आदि द्वारा वंदित श्रीनिवास को नमस्कार है।

श्लोक 15 (skanda.2.23.15)

नमः कमलनेत्राय क्षीराब्धिशयनाय ते । दुष्टराक्षससंहर्त्रे श्रीनिवासाय ते नमः ।

namaḥ kamalanetrāya kṣīrābdhiśayanāya te duṣṭarākṣasasaṁhartre śrīnivāsāya te namaḥ

कमल के समान नेत्रों वाले, क्षीरसागर में शयन करने वाले आपको नमस्कार है; दुष्ट राक्षसों का संहार करने वाले श्रीनिवास को नमस्कार है।

श्लोक 16 (skanda.2.23.16)

भक्तप्रियाय देवाय देवानां पतये नमः ।

bhaktapriyāya devāya devānāṁ pataye namaḥ

भक्तों को प्रिय देव, देवताओं के स्वामी को नमस्कार है।

श्लोक 17 (skanda.2.23.17)

प्रणतार्तिविनाशाय श्रीनिवासाय ते नमः ।

praṇatārtivināśāya śrīnivāsāya te namaḥ

शरणागतों की पीड़ा का नाश करने वाले श्रीनिवास को नमस्कार है।

श्लोक 18 (skanda.2.23.18)

योगिनां पतये नित्यं वेदवेद्याय विष्णवे । भक्तानां पापसंहर्त्रे श्रीनिवासाय ते नमः ।

yogināṁ pataye nityaṁ vedavedyāya viṣṇave bhaktānāṁ pāpasaṁhartre śrīnivāsāya te namaḥ

योगियों के नित्य स्वामी, वेद से जानने योग्य विष्णु को नमस्कार है; भक्तों के पापों का नाश करने वाले श्रीनिवास को नमस्कार है।

श्लोक 19 (skanda.2.23.19)

एवं स्तुतो महाभागः श्रीनिवासो जगन्मयः । पद्मनाभाख्यऋषिणा चक्रतीर्थनिवासिना ।

evaṁ stuto mahābhāgaḥ śrīnivāso jagaṁmayaḥ padmanābhākhyaṛṣiṇā cakratīrthanivāsinā

इस प्रकार चक्रतीर्थ में निवास करने वाले पद्मनाभ नामक ऋषि द्वारा वह महाभाग, जगन्मय श्रीनिवास स्तुत हुआ।

श्लोक 20 (skanda.2.23.20)

संतोषं परमं प्राप्य वेंकटेशो दयानिधिः ।

saṁtoṣaṁ paramaṁ prāpya veṁkaṭeśo dayānidhiḥ

परम संतोष को प्राप्त होकर दयानिधि वेंकटेश ने —

श्लोक 21 (skanda.2.23.21)

पद्मनाभं द्विजवरं शांतं धर्मपरायणम् । सुधाधारोपमं वाक्यमब्रवीत्पुरुषोत्तमः ।

padmanābhaṁ dvijavaraṁ śāṁtaṁ dharmaparāyaṇam sudhādhāropamaṁ vākyamabravītpuruṣottamaḥ

— शांत और धर्मपरायण श्रेष्ठ ब्राह्मण पद्मनाभ से, पुरुषोत्तम ने अमृत-धारा के समान वचन कहे।

श्लोक 22 (skanda.2.23.22)

श्रीनिवास उवाच । द्विजवर्य महाभाग मत्पादकमलार्चक । चक्रतीर्थस्य तीरे त्वमाकल्पं पूजयन्वस ।

śrīnivāsa uvāca dvijavarya mahābhāga matpādakamalārcaka cakratīrthasya tīre tvamākalpaṁ pūjayanvasa

श्रीनिवास ने कहा — हे श्रेष्ठ ब्राह्मण! हे महाभाग! हे मेरे चरण-कमलों के पूजक! तुम कल्प के अंत तक चक्रतीर्थ के तट पर मेरी पूजा करते हुए निवास करो।

श्लोक 23 (skanda.2.23.23)

इत्युक्त्वा भगवान्विष्णुस्तत्रैवांतरधीयत । अन्तर्धानं गते देवे श्रीनिवासे जगद्गुरौ ।

ityuktvā bhagavānviṣṇustatraivāṁtaradhīyata aṁtardhānaṁ gate deve śrīnivāse jagadgurau

ऐसा कहकर भगवान् विष्णु वहीं अंतर्धान हो गए; जब जगद्गुरु देव श्रीनिवास अंतर्धान हो गए —

श्लोक 24 (skanda.2.23.24)

चक्रतीर्थस्य तीरे तु वासं चक्रे महामतिः । ततः कालांतरे कश्चिद्राक्षसो भीमदर्शनः ।

cakratīrthasya tīre tu vāsaṁ cakre mahāmatiḥ tataḥ kālāṁtare kaścidrākṣaso bhīmadarśanaḥ

— उस महामति ने चक्रतीर्थ के तट पर निवास बनाया; इसके बाद कुछ समय पश्चात् एक भयंकर दिखने वाला राक्षस —

श्लोक 25 (skanda.2.23.25)

मुनिं तं पद्मनाभाख्यं नारायणपरायणम् । आययौ भक्षितुं क्रूरः क्षुधया परिपीडतः ।

muniṁ taṁ padmanābhākhyaṁ nārāyaṇaparāyaṇam āyayau bhakṣituṁ krūraḥ kṣudhayā paripīḍataḥ

— भूख से अत्यंत पीड़ित वह क्रूर राक्षस, नारायण-परायण मुनि पद्मनाभ को खाने के लिए वहाँ आया।

श्लोक 26 (skanda.2.23.26)

ब्राह्मणं तरसा सोऽयं राक्षसो जगृहे तदा । गृहीतस्तरसा तेन विप्रो वेदांगपारगः ।

brāhmaṇaṁ tarasā so'yaṁ rākṣaso jagṛhe tadā gṛhītastarasā tena vipro vedāṁgapāragaḥ

उस राक्षस ने बलपूर्वक उस ब्राह्मण को तुरंत पकड़ लिया; वेदांगों में पारंगत वह ब्राह्मण उसके द्वारा बलपूर्वक पकड़ा जाकर —

श्लोक 27 (skanda.2.23.27)

प्रचुक्रोश दयाम्भोधिमापन्नानां परायणम् । नारायणं चक्रपाणिं पक्ष रक्षेति वै मुहुः ।

pracukrośa dayāmbhodhimāpannānāṁ parāyaṇam nārāyaṇaṁ cakrapāṇiṁ pakṣa rakṣeti vai muhuḥ

— बार-बार पुकार उठा — "हे नारायण! हे चक्रपाणि! हे विपत्तिग्रस्तों के आश्रय, दया के सागर! मेरी रक्षा करो, रक्षा करो!"

श्लोक 28 (skanda.2.23.28)

वेंकटेश दयासिन्धो शरणागतपालक । त्राहि मां पुरुषव्याघ्र रक्षोवशमुपागतम् ।

veṁkaṭeśa dayāsiṁdho śaraṇāgatapālaka trāhi māṁ puruṣavyāghra rakṣovaśamupāgatam

"हे वेंकटेश! हे दया के सागर! हे शरणागतों के पालक! हे पुरुषों में व्याघ्र के समान! राक्षस के वश में आए हुए मेरी रक्षा करो।"

श्लोक 29 (skanda.2.23.29)

लक्ष्मीकांत हरे विष्णो वैकुण्ठ गरुडध्वज । मां रक्ष राक्षसाक्रांतं ग्राहाक्रांतं गजं यथा ।

lakṣmīkāṁta hare viṣṇo vaikuṇṭha garuḍadhvaja māṁ rakṣa rākṣasākrāṁtaṁ grāhākrāṁtaṁ gajaṁ yathā

"हे लक्ष्मीकांत! हे हरि! हे विष्णु! हे वैकुण्ठवासी! हे गरुड़ध्वज! जैसे मगरमच्छ से घिरे हाथी की रक्षा की, वैसे ही राक्षस से घिरे मेरी रक्षा करो।"

श्लोक 30 (skanda.2.23.30)

दामोदर जगन्नाथ हिरण्यासुरमर्दन । प्रह्लादमिव मां रक्ष राक्षसेनातिपीडितम् ।

dāmodara jagannātha hiraṇyāsuramardana prahlādamiva māṁ rakṣa rākṣasenātipīḍitam

"हे दामोदर! हे जगन्नाथ! हे हिरण्यकशिपु का मर्दन करने वाले! जैसे प्रह्लाद की रक्षा की, वैसे ही इस राक्षस द्वारा अत्यंत पीड़ित मेरी रक्षा करो।"

श्लोक 31 (skanda.2.23.31)

इत्येवं स्तुवततस्तस्य पद्मनाभस्य हे द्विजाः । स्वभक्तस्य भयं ज्ञात्वा चक्रपाणिर्दयानिधिः ।

ityevaṁ stuvatatastasya padmanābhasya he dvijāḥ svabhaktasya bhayaṁ jñātvā cakrapāṇirdayānidhiḥ

हे द्विजो! इस प्रकार स्तुति करते हुए उस पद्मनाभ के भय को जानकर, चक्रपाणि, दयानिधि ने अपने भक्त के लिए —

श्लोक 32 (skanda.2.23.32)

स्वचक्रं प्रेषयामास भक्तरक्षणकारणात् । प्रेरितं विष्णुचक्रं तद्विष्णुना प्रभविष्णुना ।

svacakraṁ preṣayāmāsa bhaktarakṣaṇakāraṇāt preritaṁ viṣṇucakraṁ tadviṣṇunā prabhaviṣṇunā

— भक्त की रक्षा के लिए अपने चक्र को भेजा; सर्वशक्तिमान विष्णु द्वारा प्रेरित वह विष्णुचक्र —

श्लोक 33 (skanda.2.23.33)

आजगामाथ वेगेन चक्रपुष्करिणीतटम् । अनन्तादित्यसंकाशमनन्ताग्निसमप्रभम् ।

ājagāmātha vegena cakrapuṣkariṇītaṭam anaṁtādityasaṁkāśamanaṁtāgnisamaprabham

— वेग से चक्रपुष्करिणी के तट पर आया, अनंत सूर्यों के समान और अनंत अग्नियों के समान तेजस्वी।

श्लोक 34 (skanda.2.23.34)

महाज्वालं महानाद महासुरविमर्दनम् । दृष्ट्वा सुदर्शनं विष्णो राक्षसोऽथ प्रदुद्रुवे ।

mahājvālaṁ mahānāda mahāsuravimardanam dṛṣṭvā sudarśanaṁ viṣṇo rākṣaso'tha pradudruve

उस महाज्वालामय, महानादयुक्त, महान असुरों का विनाश करने वाले सुदर्शन चक्र को देखकर राक्षस भाग खड़ा हुआ।

श्लोक 35 (skanda.2.23.35)

द्रवमाणस्य तस्याशु राक्षसस्य सुदर्शनम् । शिरश्चकर्त सहसा ज्वालामालादुरासदम् ।

dravamāṇasya tasyāśu rākṣasasya sudarśanam śiraścakarta sahasā jvālāmālādurāsadam

उस भागते हुए राक्षस का सिर, ज्वालाओं की माला से दुर्दम्य सुदर्शन ने तत्काल काट डाला।

श्लोक 36 (skanda.2.23.36)

ततो विप्रवरो दृष्ट्वा राक्षसं पतितं भुवि । मुदा परमया युक्तस्तुष्टाव च सुदर्शनम् ।

tato vipravaro dṛṣṭvā rākṣasaṁ patitaṁ bhuvi mudā paramayā yuktastuṣṭāva ca sudarśanam

तब उस श्रेष्ठ ब्राह्मण ने राक्षस को धरती पर गिरा हुआ देखकर, परम हर्ष से युक्त होकर सुदर्शन की स्तुति की।

श्लोक 37 (skanda.2.23.37)

पद्मनाभ उवाच । विष्णुचक्र नमस्तेऽस्तु विश्वरक्षणदीक्षित । नारायणकराम्भोज भूषणाय नमोऽस्तु ते ।

padmanābha uvāca viṣṇucakra namaste'stu viśvarakṣaṇadīkṣita nārāyaṇakarāṁbhoja bhūṣaṇāya namo'stu te

पद्मनाभ ने कहा — हे विष्णुचक्र! तुम्हें नमस्कार हो, जो समस्त विश्व की रक्षा में समर्पित हो; नारायण के करकमल के आभूषण, तुम्हें नमस्कार हो।

श्लोक 38 (skanda.2.23.38)

युद्धेष्वसुरसंहारकुशलाय महारव । सुदर्शन नमस्तुभ्यं भक्तानामार्तिनाशन ।

yuddheṣvasurasaṁhārakuśalāya mahārava sudarśana namastubhyaṁ bhaktānāmārtināśana

हे महानादयुक्त! युद्धों में असुरों के संहार में कुशल! हे सुदर्शन! भक्तों की पीड़ा का नाश करने वाले, तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 39 (skanda.2.23.39)

रक्ष मां भयसंविग्नं सर्वस्मादपि कल्मषात् । स्वामिन्सुदर्शन विभो चक्रतीर्थे सदा भवान् ।

rakṣa māṁ bhayasaṁvignaṁ sarvasmādapi kalmaṣāt svāminsudarśana vibho cakratīrthe sadā bhavān

भय से व्याकुल मुझे समस्त पापों से भी बचाओ; हे स्वामी सुदर्शन! हे विभो! तुम सदा चक्रतीर्थ में —

श्लोक 40 (skanda.2.23.40)

सन्निधेहि हिताय त्वं जगतो मुक्तिकांक्षिणः । ब्राह्मणेनैवमुक्तं तद्विष्णुचक्रं मुनीश्वराः ।

sannidhehi hitāya tvaṁ jagato muktikāṁkṣiṇaḥ brāhmaṇenaivamuktaṁ tadviṣṇucakraṁ munīśvarāḥ

— निवास करो, उन जगत्वासियों के हित के लिए जो मुक्ति की कामना रखते हैं। हे मुनीश्वरो! ब्राह्मण द्वारा इस प्रकार कहे जाने पर, उस विष्णुचक्र ने —

श्लोक 41 (skanda.2.23.41)

तं प्राह पद्मनाभाख्यं प्रीणयन्निव सौहृदात् ।

taṁ prāha padmanābhākhyaṁ prīṇayanniva sauhṛdāt

— प्रेमपूर्वक, मानो सौहार्दवश उस पद्मनाभ नामक ब्राह्मण से बोला।

श्लोक 42 (skanda.2.23.42)

सुदर्शन उवाच । पद्मनाभ महापुण्यं चक्रतीर्थमनुत्तमम् । अस्मिन्वसामि सततं लोकानां हितकाम्यया ।

sudarśana uvāca padmanābha mahāpuṇyaṁ cakratīrthamanuttamam asminvasāmi satataṁ lokānāṁ hitakāmyayā

सुदर्शन ने कहा — हे पद्मनाभ! यह चक्रतीर्थ अत्यंत पुण्यमय और अनुपम है; मैं यहाँ सदा लोगों के हित की कामना से निवास करता हूँ।

श्लोक 43 (skanda.2.23.43)

त्वत्पीडां परिचिन्त्याहं राक्षसेन दुरात्मना ।

tvatpīḍāṁ paricintyāhaṁ rākṣasena durātmanā

तुम्हें इस दुष्ट राक्षस द्वारा दी गई पीड़ा को जानकर मैं —

श्लोक 44 (skanda.2.23.44)

प्रेरितो विष्णुना विप्र त्वरया समुपागतः । त्वत्पीडकोऽपि निहतो मयाऽयं राक्षसाधमः ।

prerito viṣṇunā vipra tvarayā samupāgataḥ tvatpīḍako'pi nihato mayā'yaṁ rākṣasādhamaḥ

— विष्णु द्वारा प्रेरित होकर, हे विप्र, शीघ्रता से यहाँ आया; तुम्हें पीड़ित करने वाला यह नीच राक्षस मेरे द्वारा मार डाला गया।

श्लोक 45 (skanda.2.23.45)

मोचितस्त्वं भयादस्मात्त्वं हि भक्तो हरेः सदा । चक्रतीर्थे महापुण्ये सर्वपापहरे द्विज ।

mocitastvaṁ bhayādasmāttvaṁ hi bhakto hareḥ sadā cakratīrthe mahāpuṇye sarvapāpahare dvija

तुम इस भय से मुक्त हो गए हो, क्योंकि तुम सदा हरि के भक्त हो; हे द्विज! इस महापुण्यमय, सर्वपापहारी चक्रतीर्थ में —

श्लोक 46 (skanda.2.23.46)

सततं लोकरक्षार्थं सन्निधानं करोमि ते । अस्मिन्मत्सन्निधानात्ते तथान्येषामपि द्विज ।

satataṁ lokarakṣārthaṁ sannidhānaṁ karomi te asminmatsannidhānātte tathānyeṣāmapi dvija

— मैं सदा लोगों की रक्षा के लिए तुम्हारे लिए यहाँ उपस्थित रहूँगा; मेरी इस उपस्थिति से तुम्हें तथा अन्य लोगों को भी, हे द्विज —

श्लोक 47 (skanda.2.23.47)

इतः परं न पीडा स्याद्भूतराक्षससम्भवा । अस्मिन्मत्सन्निधानात्स्याच्चक्रतीर्थमिति प्रथा ।

itaḥ paraṁ na pīḍā syādbhūtarākṣasasaṁbhavā asminmatsannidhānātsyāccakratīrthamiti prathā

— इससे आगे भूत-प्रेतों और राक्षसों से उत्पन्न कोई पीड़ा नहीं होगी; मेरी इस उपस्थिति के कारण ही इस तीर्थ का नाम चक्रतीर्थ प्रसिद्ध होगा।

श्लोक 48 (skanda.2.23.48)

स्नानं येऽत्र प्रकुर्वन्ति चक्रतीर्थे विमुक्तिदे । तेषां पुत्राश्च पौत्राश्च वंशजाः सर्व एव हि ।

snānaṁ ye'tra prakurvaṁti cakratīrthe vimuktide teṣāṁ putrāśca pautrāśca vaṁśajāḥ sarva eva hi

जो लोग यहाँ इस मुक्तिदायक चक्रतीर्थ में स्नान करते हैं, उनके पुत्र, पौत्र और समस्त वंशज भी —

श्लोक 49 (skanda.2.23.49)

विधूतपापा यास्यन्ति तद्विष्णोः परमं पदम् । इत्युक्त्वा विष्णुचक्रं तत्पद्मनाभस्य पश्यतः ।

vidhūtapāpā yāsyaṁti tadviṣṇoḥ paramaṁ padam ityuktvā viṣṇucakraṁ tatpadmanābhasya paśyataḥ

— पापों से मुक्त होकर विष्णु के परम पद को प्राप्त होंगे। ऐसा कहकर, वह विष्णुचक्र, पद्मनाभ के देखते-देखते —

श्लोक 50 (skanda.2.23.50)

अन्येषामपि विप्राणां पश्यतां सहसा द्विजाः । चक्रपुष्करिणीं तां तु प्राविशत्पापनाशिनीम् ।

anyeṣāmapi viprāṇāṁ paśyatāṁ sahasā dvijāḥ cakrapuṣkariṇīṁ tāṁ tu prāviśatpāpanāśinīm

— और अन्य ब्राह्मणों के देखते-देखते भी, हे द्विजो, तुरंत उस पाप-नाशिनी चक्रपुष्करिणी में प्रविष्ट हो गया।

श्लोक 51 (skanda.2.23.51)

श्रीसूत उवाच । चक्रतीर्थस्य माहात्म्यं विप्रेन्द्राः पापनाशनम् । युष्माकं कथितं सर्वं शौनकाद्या महौजसः ।

śrīsūta uvāca cakratīrthasya māhātmyaṁ viprendrāḥ pāpanāśanam yuṣmākaṁ kathitaṁ sarvaṁ śaunakādyā mahaujasaḥ

श्री सूत जी ने कहा — हे शौनक आदि महातेजस्वी विप्रेन्द्रो! चक्रतीर्थ का यह समस्त पाप-नाशक माहात्म्य मैंने तुम्हें कह सुनाया।

श्लोक 52 (skanda.2.23.52)

चक्रतीर्थसमं तीर्थं न भूतं न भविष्यति । अत्र स्नात्वा नरा विप्रा मोक्षभाजो न संशयः ।

cakratīrthasamaṁ tīrthaṁ na bhūtaṁ na bhaviṣyati atra snātvā narā viprā mokṣabhājo na saṁśayaḥ

चक्रतीर्थ के समान तीर्थ न कभी हुआ है, न कभी होगा; यहाँ स्नान करके मनुष्य, हे विप्रो, निःसंदेह मोक्ष के भागी बनते हैं।

श्लोक 53 (skanda.2.23.53)

कीर्तयेदिममध्यायं शृणुयाद्वा समाहितः । चक्रतीर्थाभिषेकस्य प्राप्नोति फलमुत्तमम् ।

kīrtayedimamadhyāyaṁ śṛṇuyādvā samāhitaḥ cakratīrthābhiṣekasya prāpnoti phalamuttamam

जो इस अध्याय का पाठ करता है, अथवा एकाग्रचित्त होकर सुनता है, वह चक्रतीर्थ में स्नान करने का उत्तम फल प्राप्त करता है।

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