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वैष्णव खण्ड · अध्याय 24

चक्रतीर्थ माहात्म्य: सुन्दर गंधर्व की कथा

अध्याय 23अध्याय-सूचीअध्याय 25

श्लोक 1 (skanda.2.24.1)

ऋषय ऊचुः । भगवन्राक्षसः कोऽसौ सूत पौराणिकोत्तम । विष्णुभक्तं महात्मानं यो ब्राह्मणमबाधत ।

ṛṣaya ūcuḥ bhagavanrākṣasaḥ ko'sau sūta paurāṇikottama viṣṇubhaktaṁ mahātmānaṁ yo brāhmaṇamabādhata

ऋषियों ने कहा — हे पुराणविदों में श्रेष्ठ भगवन् सूत! वह राक्षस कौन था, जिसने विष्णुभक्त महात्मा ब्राह्मण को पीड़ित किया?

श्लोक 2 (skanda.2.24.2)

श्रीसूत उवाच । वक्ष्यामि राक्षसं क्रूरं तं विप्राः शृणुतादरात् । यथा च राक्षसो जातो मुनीनां शापवैभवात् ।

śrīsūta uvāca vakṣyāmi rākṣasaṁ krūraṁ taṁ viprāḥ śṛṇutādarāt yathā ca rākṣaso jāto munīnāṁ śāpavaibhavāt

श्री सूत जी ने कहा — हे विप्रो! अब मैं उस क्रूर राक्षस के बारे में बताता हूँ, आदरपूर्वक सुनो — किस प्रकार वह मुनियों के शाप के प्रभाव से राक्षस बना।

श्लोक 3 (skanda.2.24.3)

पुरा वैकुण्ठसदृशे श्रीरङ्गे विष्णुमंदिरे । वसिष्ठात्रिमुखाः सर्वे विष्णुभक्ता महौजसः ।

purā vaikuṇṭhasadṛśe śrīraṁge viṣṇumaṁdire vasiṣṭhātrimukhāḥ sarve viṣṇubhaktā mahaujasaḥ

पूर्वकाल में वैकुण्ठ के समान श्रीरंग नामक विष्णु-मंदिर में, वसिष्ठ, अत्रि आदि सभी महातेजस्वी विष्णुभक्त —

श्लोक 4 (skanda.2.24.4)

श्रीरङ्गनाथं देवेशं भक्तानामभयप्रदम् । उपासांचक्रिरे मुक्त्यै श्रीरङ्गपुरवासिनः ।

śrīraṁganāthaṁ deveśaṁ bhaktānāmabhayapradam upāsāṁcakrire muktyai śrīraṁgapuravāsinaḥ

— श्रीरंगनाथ, देवेश, भक्तों को अभय देने वाले भगवान की मुक्ति के लिए, श्रीरंगपुर में निवास करते हुए उपासना करते थे।

श्लोक 5 (skanda.2.24.5)

कदाचित्तत्र गन्धर्वो वीरबाहुसुतो बली । सुन्दरो नाम विप्रेंद्रा विटगोष्ठीपरायणः ।

kadācittatra gaṁdharvo vīrabāhusuto balī suṁdaro nāma viprendrā viṭagoṣṭhīparāyaṇaḥ

हे विप्रेन्द्रो! एक बार वहाँ वीरबाहु का पुत्र, बलवान गंधर्व, जिसका नाम सुन्दर था, विलासी संगति में लीन रहता था।

श्लोक 6 (skanda.2.24.6)

ललनाशतसंयुक्तो विवस्त्रः सलिलाशये । चिक्रीड स विवस्त्राभिः साकं युवतिभिर्मुदा ।

lalanāśatasaṁyukto vivastraḥ salilāśaye cikrīḍa sa vivastrābhiḥ sākaṁ yuvatibhirmudā

वह सैकड़ों स्त्रियों के साथ, निर्वस्त्र होकर, जलाशय में उन्हीं निर्वस्त्रा युवतियों के साथ हर्षपूर्वक क्रीड़ा करता था।

श्लोक 7 (skanda.2.24.7)

कवेरजायास्तीर्थे तु वसिष्ठो मुनिभिः सह । माध्याह्निकं कर्तुमना ययौ श्रीरंगमंदिरात् ।

kaverajāyāstīrthe tu vasiṣṭho munibhiḥ saha mādhyāhnikaṁ kartumanā yayau śrīraṁgamaṁdirāt

उसी समय वसिष्ठ मुनि, अन्य मुनियों के साथ, माध्याह्निक कर्म करने के लिए श्रीरंग मंदिर से कावेरी-सुता तीर्थ की ओर गए।

श्लोक 8 (skanda.2.24.8)

तानृषीनवलोक्याथ रामास्ता भयकातराः । वासांस्याच्छादयामासुः सुन्दरो न तु साहसी ।

tānṛṣīnavalokyātha rāmāstā bhayakātarāḥ vāsāṁsyācchādayāmāsuḥ sundaro na tu sāhasī

उन ऋषियों को देखकर वे स्त्रियाँ भय से व्याकुल होकर तुरंत अपने वस्त्रों से ढक गईं, परन्तु सुन्दर ने ऐसा साहस नहीं किया।

श्लोक 9 (skanda.2.24.9)

ततो वसिष्ठः कुपितः शशापैनं गतत्रपम् ।

tato vasiṣṭhaḥ kupitaḥ śaśāpainaṁ gatatrapam

तब क्रुद्ध होकर वसिष्ठ ने निर्लज्ज सुन्दर को शाप दे दिया।

श्लोक 10 (skanda.2.24.10)

वसिष्ठ उवाच । यस्मात्सुन्दर गन्धर्व दृष्ट्वाऽस्माँल्लज्जया त्वया । वासो नाच्छादितं शीघ्रं याहि राक्षसतां ततः ।

vasiṣṭha uvāca yasmātsuṁdara gaṁdharva dṛṣṭvā'smāṁllajjayā tvayā vāso nācchāditaṁ śīghraṁ yāhi rākṣasatāṁ tataḥ

वसिष्ठ ने कहा — हे सुन्दर गंधर्व! चूँकि तुमने हमें देखकर भी लज्जावश शीघ्र अपने वस्त्र नहीं ढके, इसलिए अब तुम राक्षसत्व को प्राप्त हो जाओ।

श्लोक 11 (skanda.2.24.11)

एवमुक्ते वसिष्ठेन रामाः प्राञ्जलयस्तदा । प्रणिपत्य वसिष्ठं तं भक्तिनम्रेण चेतसा ।

evamukte vasiṣṭhena rāmāḥ prāñjalayastadā praṇipatya vasiṣṭhaṁ taṁ bhaktinamreṇa cetasā

वसिष्ठ के ऐसा कहने पर, वे स्त्रियाँ हाथ जोड़कर, भक्तिपूर्ण नम्र हृदय से वसिष्ठ को प्रणाम करके —

श्लोक 12 (skanda.2.24.12)

मुनिमण्डलमध्ये तु वसिष्ठमिदमब्रुवन् ।

munimaṁḍalamadhye tu vasiṣṭhamidamabruvan

— मुनियों की सभा के मध्य में वसिष्ठ से इस प्रकार बोलीं।

श्लोक 13 (skanda.2.24.13)

रामा ऊचुः । भगवन्सर्वधर्मज्ञ चतुरानननन्दन । दयासिन्धोऽवलोक्यास्मान्न कोपं कर्तुमर्हसि ।

rāmā ūcuḥ bhagavansarvadharmajña caturānananandana dayāsindho'valokyāsmānna kopaṁ kartumarhasi

उन स्त्रियों ने कहा — हे भगवन्! हे सर्वधर्मज्ञ! हे चतुरानन ब्रह्मा के पुत्र! हे दया के सागर! हमें देखकर आपको क्रोध नहीं करना चाहिए।

श्लोक 14 (skanda.2.24.14)

पतिरेव हि नारीणां भूषणं परमुच्यते । पतिहीना तु या नारी शतपुत्रापि सा मुने ।

patireva hi nārīṇāṁ bhūṣaṇaṁ paramucyate patihīnā tu yā nārī śataputrāpi sā mune

पति ही स्त्रियों का सबसे बड़ा आभूषण कहा जाता है; हे मुने! जो स्त्री पति से रहित है, वह चाहे सौ पुत्रों वाली भी क्यों न हो —

श्लोक 15 (skanda.2.24.15)

विधवेत्युच्यते लोके तासां जन्म निरर्थकम् । तत्प्रसादं कुरु मुने पत्यावस्माकमादरात् ।

vidhavetyucyate loke tāsāṁ janma nirarthakam tatprasādaṁ kuru mune patyāvasmākamādarāt

— वह इस संसार में विधवा कहलाती है, और उसका जन्म व्यर्थ हो जाता है। इसलिए हे मुने! आदरपूर्वक हमारे पति पर कृपा करें।

श्लोक 16 (skanda.2.24.16)

एकोऽपराधः क्षंतव्यो मुनिभिस्तत्त्वदर्शिभिः । क्षमां कुरु दयासिन्धो युष्मच्छिष्येऽत्र सुन्दरे ।

eko'parādhaḥ kṣaṁtavyo munibhistattvadarśibhiḥ kṣamāṁ kuru dayāsindho yuṣmacchiṣye'tra sundare

एक अपराध को तो तत्त्वदर्शी मुनियों को क्षमा कर देना चाहिए; हे दया के सागर! अपने ही शिष्य इस सुन्दर को क्षमा कर दीजिए।

श्लोक 17 (skanda.2.24.17)

श्रीसूत उवाच । वसिष्ठः प्रार्थितस्त्वेवं सुन्दरस्यांगनाजनैः । प्रोवाच वचनं भूयः प्रसन्नः स द्विजोत्तमः ।

śrīsūta uvāca vasiṣṭhaḥ prārthitastvevaṁ sundarasyāṁganājanaiḥ provāca vacanaṁ bhūyaḥ prasannaḥ sa dvijottamaḥ

श्री सूत जी ने कहा — इस प्रकार सुन्दर की स्त्रियों द्वारा प्रार्थना किए जाने पर, प्रसन्न होकर उस श्रेष्ठ ब्राह्मण वसिष्ठ ने फिर से यह वचन कहा।

श्लोक 18 (skanda.2.24.18)

वसिष्ठ उवाच । न मे स्याद्वचनं मिथ्या कदाचिदपि सुभ्रुवः । उपायं वः प्रवक्ष्यामि शृणुध्वं श्रद्धया सह ।

vasiṣṭha uvāca na me syādvacanaṁ mithyā kadācidapi subhruvaḥ upāyaṁ vaḥ pravakṣyāmi śṛṇudhvaṁ śraddhayā saha

वसिष्ठ ने कहा — हे सुंदर भौंहों वाली स्त्रियो! मेरा वचन कभी मिथ्या नहीं हो सकता; परन्तु मैं तुम्हें एक उपाय बताता हूँ, श्रद्धापूर्वक सुनो।

श्लोक 19 (skanda.2.24.19)

षोडशाब्दावधिः शापो भर्तुर्वै भविता ध्रुवम् । षोडशाब्दावधौ चैव सुन्दरो राक्षसाकृतिः ।

ṣoḍaśābdāvadhiḥ śāpo bharturvai bhavitā dhruvam ṣoḍaśābdāvadhau caiva sundaro rākṣasākṛtiḥ

तुम्हारे पति का यह शाप निश्चित रूप से सोलह वर्षों तक की अवधि का होगा; उन सोलह वर्षों तक ही सुन्दर राक्षस के रूप में रहेगा।

श्लोक 20 (skanda.2.24.20)

यदृच्छया वेंकटाद्रिं सर्वपापहरं शुभम् । गत्वासौ चक्रतीर्थं तद्गमिष्यति सुरांगनाः ।

yadṛcchayā veṁkaṭādriṁ sarvapāpaharaṁ śubham gatvāsau cakratīrthaṁ tadgamiṣyati surāṁganāḥ

वह अपनी ही इच्छा से समस्त पापों को हरने वाले शुभ वेंकटाद्रि पर जाकर, वहाँ से चक्रतीर्थ को जाएगा, जो देवांगनाओं द्वारा भी सेवित है।

श्लोक 21 (skanda.2.24.21)

आस्ते तत्र महायोगी पद्मनाभो मुनीश्वरः । भक्षार्थं तं मुनिं सोऽयं राक्षसोऽभिगमिष्यति ।

āste tatra mahāyogī padmanābho munīśvaraḥ bhakṣārthaṁ taṁ muniṁ so'yaṁ rākṣaso'bhigamiṣyati

वहाँ महायोगी मुनीश्वर पद्मनाभ निवास करते हैं; उन्हीं मुनि को खाने के लिए यह राक्षस वहाँ जाएगा।

श्लोक 22 (skanda.2.24.22)

ततो ब्राह्मणरक्षार्थ प्रेरितं चक्रमुत्तमम् । विष्णुनास्य शिरः कायाद्धरिष्यति न संशयः ।

tato brāhmaṇarakṣārtha preritaṁ cakramuttamam viṣṇunāsya śiraḥ kāyāddhariṣyati na saṁśayaḥ

तब ब्राह्मण की रक्षा के लिए विष्णु द्वारा प्रेरित उत्तम चक्र, निःसंदेह उसके सिर को शरीर से अलग कर देगा।

श्लोक 23 (skanda.2.24.23)

ततः स्वं रूपमासाद्य शापान्मुक्तः स सुन्दरः । पतिर्वस्त्रिदिवं भूयो गन्ता नास्त्यत्र संशयः ।

tataḥ svaṁ rūpamāsādya śāpānmuktaḥ sa sundaraḥ pativastridivaṁ bhūyo gaṁtā nāstyatra saṁśayaḥ

तब अपने स्वरूप को प्राप्त करके, शाप से मुक्त वह सुन्दर, तुम्हारा पति, फिर से स्वर्ग जाएगा — इसमें कोई संदेह नहीं है।

श्लोक 24 (skanda.2.24.24)

ततस्त्रिदिवमासाद्य सुन्दरोऽयं पतिर्हि वः । रमयिष्यति सुन्दर्यो युष्मान्सुन्दरवेषभृत् ।

tatastridivamāsādya sundaro'yaṁ patirhi vaḥ ramayiṣyati suṁdaryo yuṣmānsuṁdaraveṣabhṛt

फिर स्वर्ग को प्राप्त करके यही सुन्दर, तुम्हारा पति, अपने सुंदर स्वरूप को धारण करके तुम सुन्दरियों को आनंदित करेगा।

श्लोक 25 (skanda.2.24.25)

श्रीसूत उवाच । इत्युक्त्वा तु वसिष्ठस्ताः सुन्दरस्य वरांगनाः । स्वाश्रमं प्रययौ तूर्णं श्रीरंगेश्वरभक्तिमान् ।

śrīsūta uvāca ityuktvā tu vasiṣṭhastāḥ sundarasya varāṁganāḥ svāśramaṁ prayayau tūrṇaṁ śrīraṁgeśvarabhaktimān

श्री सूत जी ने कहा — इस प्रकार सुन्दर की उन उत्तम स्त्रियों से कहकर, श्रीरंगेश्वर के भक्त वसिष्ठ शीघ्र ही अपने आश्रम को लौट गए।

श्लोक 26 (skanda.2.24.26)

अथ रामास्तमालिंग्य सुन्दरं पतिमात्मनः । रुरुदुः शोकसन्तप्ता दुःखसागरमध्यगाः ।

atha rāmāstamāliṁgya sundaraṁ patimātmanaḥ ruruduḥ śokasaṁtaptā duḥkhasāgaramadhyagāḥ

तब वे स्त्रियाँ अपने पति सुन्दर को आलिंगन कर, शोक से संतप्त होकर, दुःख के सागर में डूबी हुई सी विलाप करने लगीं।

श्लोक 27 (skanda.2.24.27)

दृश्यमानासु तास्वेवं सुन्दरो राक्षसोऽभवत् । महादंष्ट्रो महाकायो रक्तश्मश्रुशिरोरुहः ।

dṛśyamānāsu tāsvevaṁ sundaro rākṣaso'bhavat mahādaṁṣṭro mahākāyo raktaśmaśruśiroruhaḥ

उन्हीं के देखते-देखते सुन्दर एक राक्षस बन गया — विशाल दाढ़ों वाला, विशालकाय, लाल दाढ़ी-मूँछ और केश वाला।

श्लोक 28 (skanda.2.24.28)

तं दृष्ट्वा भयसंविग्ना जग्मू रामास्त्रिविष्टपम् । ततो राक्षसवेषोऽयं सुंदरी भैरवाकृतिः ।

taṁ dṛṣṭvā bhayasaṁvignā jagmū rāmāstriviṣṭapam tato rākṣasaveṣo'yaṁ suṁdarī bhairavākṛtiḥ

उसे देखकर वे स्त्रियाँ भय से व्याकुल होकर स्वर्ग को चली गईं; इस प्रकार वह सुन्दर, राक्षस के भयंकर वेश में —

श्लोक 29 (skanda.2.24.29)

भक्षयन्प्राणिनः सर्वान्देशाद्देशं वनाद्वनम् । भ्रमन्ननिलवेगोऽयं वेंकटाद्रिं नगोत्तमम् ।

bhakṣayanprāṇinaḥ sarvāndeśāddeśaṁ vanādvanam bhramannanilavego'yaṁ veṁkaṭādriṁ nagottamam

— सभी प्राणियों को खाता हुआ, देश-देश, वन-वन में वायु के समान वेग से भटकता हुआ, अंततः श्रेष्ठ पर्वत वेंकटाद्रि में —

श्लोक 30 (skanda.2.24.30)

प्रविश्यासौ महापापी चक्रतीर्थं ततो ययौ । एवं षोडशवर्षाणि भ्रमतोऽस्य ययुस्तदा ।

praviśyāsau mahāpāpī cakratīrthaṁ tato yayau evaṁ ṣoḍaśavarṣāṇi bhramato'sya yayustadā

— उस अत्यंत पापी ने प्रवेश किया, फिर वह चक्रतीर्थ की ओर गया; इस प्रकार भटकते हुए उसके सोलह वर्ष बीत गए।

श्लोक 31 (skanda.2.24.31)

ततस्तु षोडशाब्दान्ते राक्षसोऽयं मुनीश्वराः । भक्षितुं पद्मनाभं तं चक्रतीर्थनिवासिनम् ।

tatastu ṣoḍaśābdānte rākṣaso'yaṁ munīśvarāḥ bhakṣituṁ padmanābhaṁ taṁ cakratīrthanivāsinam

हे मुनीश्वरो! फिर सोलह वर्षों के अंत में यह राक्षस, चक्रतीर्थ में निवास करने वाले उस पद्मनाभ को खाने के लिए —

श्लोक 32 (skanda.2.24.32)

उपाद्रवद्वायुवेगः सचास्तौषीज्जनार्दनम् । योगिना च स्तुतो विष्णुस्तदा चक्रमचोदयत् ।

upādravadvāyuvegaḥ sacāstauṣījjanārdanam yoginā ca stuto viṣṇustadā cakramacodayat

— वायु के समान वेग से आक्रमण किया; तब पद्मनाभ ने जनार्दन की स्तुति की, और उस योगी द्वारा स्तुत विष्णु ने अपने चक्र को प्रेरित किया।

श्लोक 33 (skanda.2.24.33)

रक्षितुं पद्मनाभं तं राक्षसेन प्रपीडितम् । अथागत्य हरेश्चक्रं राक्षसस्य शिरोऽहरत् ।

rakṣituṁ padmanābhaṁ taṁ rākṣasena prapīḍitam athāgatya hareścakraṁ rākṣasasya śiro'harat

— पद्मनाभ की रक्षा के लिए, जो राक्षस द्वारा अत्यंत पीड़ित था; तब आकर हरि के चक्र ने राक्षस के सिर को काट डाला।

श्लोक 34 (skanda.2.24.34)

ततोऽयं राक्षसं देहं त्यक्त्वा दिव्यकलेवरः । विमानवरमारुह्य सुन्दरः पुष्पवर्षितः ।

tato'yaṁ rākṣasaṁ dehaṁ tyaktvā divyakalevaraḥ vimānavaramāruhya sundaraḥ puṣpavarṣitaḥ

तब यह सुन्दर, राक्षस-देह का त्याग कर, दिव्य शरीर धारण कर, उत्तम विमान पर आरूढ़ होकर, पुष्पों की वर्षा से आच्छादित होकर —

श्लोक 35 (skanda.2.24.35)

प्राञ्जलिः प्रणतो भूत्वा ववंदे तत्सुदर्शनम् । तुष्टाव श्रुतिरम्याभिर्वाग्भिरग्र्याभिरादरात् ।

prāñjaliḥ praṇato bhūtvā vavaṁde tatsudarśanam tuṣṭāva śrutiramyābhirvāgbhiragryābhirādarāt

— हाथ जोड़कर, प्रणाम करके उस सुदर्शन को नमन किया और श्रुति के समान मधुर, उत्कृष्ट वचनों से आदरपूर्वक स्तुति की।

श्लोक 36 (skanda.2.24.36)

सुन्दर उवाच । सुदर्शन नमस्तेऽस्तु विष्णुहस्तैकभूषण । नमस्तेऽसुरसंहर्त्रे सहस्रादित्यतेजसे ।

sundara uvāca sudarśana namaste'stu viṣṇuhastaikabhūṣaṇa namaste'surasaṁhartre sahasrādityatejase

सुन्दर ने कहा — हे सुदर्शन! तुम्हें नमस्कार है, जो विष्णु के हाथ के अद्वितीय आभूषण हो; असुरों का संहार करने वाले, सहस्र सूर्यों के समान तेजस्वी तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 37 (skanda.2.24.37)

कृपावेशेन भवतस्त्यक्वाहं राक्षसीं तनुम् । स्वं रूपमभजं विष्णोश्चक्रायुध नमोऽस्तु ते ।

kṛpāveśena bhavatastyaktvāhaṁ rākṣasīṁ tanum svaṁ rūpamabhajaṁ viṣṇościakrāyudha namo'stu te

तुम्हारी कृपा के प्रभाव से मैंने राक्षस-शरीर का त्याग कर अपना स्वरूप प्राप्त किया; हे विष्णु के चक्रायुध! तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 38 (skanda.2.24.38)

अनुजानीहि मां गंतुं त्रिदिवं विष्णुवल्लभ । भार्या मे परिशोचन्ति विरहातुरचेतसः ।

anujānīhi māṁ gaṁtuṁ tridivaṁ viṣṇuvallabha bhāryā me pariśocaṁti virahāturacetasaḥ

हे विष्णु के प्रिय! मुझे स्वर्ग जाने की अनुमति दो; मेरी पत्नियाँ विरह से पीड़ित मन से शोक कर रही हैं।

श्लोक 39 (skanda.2.24.39)

त्वन्मनस्को भविष्यामि यावज्जीवं यथा ह्यहम् । तथा रूपं कुरुष्व त्वं मयि चक्र नमोऽस्तु ते ।

tvanmanasko bhaviṣyāmi yāvajjīvaṁ yathā hyaham tathā rūpaṁ kuruṣva tvaṁ mayi cakra namo'stu te

मैं जीवनभर तुम्हारे ही ध्यान में मन लगाए रहूँगा; हे चक्र! मुझमें वैसी कृपा करो, तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 40 (skanda.2.24.40)

एवं स्तुतं विष्णुचक्रं सुन्दरेण सभक्तिकम् । अनुजग्राह सहसा तथास्त्विति मुनीश्वराः ।

evaṁ stutaṁ viṣṇucakraṁ sundareṇa sabhaktikam anujagrāha sahasā tathāstviti munīśvarāḥ

हे मुनीश्वरो! इस प्रकार भक्तिपूर्वक सुन्दर द्वारा स्तुत विष्णुचक्र ने तुरंत "ऐसा ही हो" कहकर उसे अनुगृहीत किया।

श्लोक 41 (skanda.2.24.41)

चक्रायुधाभ्यनुज्ञातः सुन्दरो ब्राह्मणोत्तमम् । प्रणम्य तेनानुज्ञातो गन्धर्वस्त्रिदिवं ययौ ।

cakrāyudhābhyanujñātaḥ sundaro brāhmaṇottamam praṇamya tenānujñāto gaṁdharvastridivaṁ yayau

चक्रायुध द्वारा अनुमति पाकर सुन्दर ने श्रेष्ठ ब्राह्मण पद्मनाभ को प्रणाम किया, और उनसे भी अनुमति पाकर वह गंधर्व स्वर्ग को चला गया।

श्लोक 42 (skanda.2.24.42)

सुन्दरे तु गते स्वर्गं पद्मनाभो मुनीश्वरः । तच्चक्रं प्रार्थयामास विष्ण्वायुध नमोऽस्तु ते ।

sundare tu gate svargaṁ padmanābho munīśvaraḥ taccakraṁ prārthayāmāsa viṣṇvāyudha namo'stu te

सुन्दर के स्वर्ग चले जाने पर, मुनीश्वर पद्मनाभ ने उस चक्र से प्रार्थना की — "हे विष्णु के आयुध! तुम्हें नमस्कार है।

श्लोक 43 (skanda.2.24.43)

चक्रायुध नमामि त्वां महासुरविमर्दन । सन्निधानं कुरुष्व त्वं चक्रतीर्थेऽमले शुभे ।

cakrāyudha namāmi tvāṁ mahāsuravimardana sannidhānaṁ kuruṣva tvaṁ cakratīrthe'male śubhe

हे चक्रायुध! हे महान असुरों को मर्दन करने वाले! मैं तुम्हें नमस्कार करता हूँ। इस निर्मल, शुभ चक्रतीर्थ में तुम अपना निवास बनाओ।

श्लोक 44 (skanda.2.24.44)

त्वत्सन्निधानात्सर्वेषां स्नातानां पापिनामिह । पापनाशं कुरुष्व त्वं मोक्षं च कुरु शाश्वतम् ।

tvatsannidhānātsarveṣāṁ snātānāṁ pāpināmiha pāpanāśaṁ kuruṣva tvaṁ mokṣaṁ ca kuru śāśvatam

तुम्हारी उपस्थिति से, यहाँ स्नान करने वाले सभी पापियों के पापों का नाश करो और उन्हें शाश्वत मोक्ष प्रदान करो।

श्लोक 45 (skanda.2.24.45)

चक्रतीर्थमिति ख्यातिं लोकेऽस्य परिकल्पय । त्वत्सन्निधानादत्रत्यमुनीनां भयनाशनम् ।

cakratīrthamiti khyātiṁ loke'sya parikalpaya tvatsannidhānādatratyamunīnāṁ bhayanāśanam

इस तीर्थ की 'चक्रतीर्थ' नाम से संसार में प्रसिद्धि स्थापित करो; तुम्हारी उपस्थिति से यहाँ के मुनियों का भय नष्ट हो जाए।

श्लोक 46 (skanda.2.24.46)

इतः परं भवत्वार्य चक्रायुध नमोऽस्तु ते । भूतप्रेतपिशाचेभ्यो भयं मा भवतु प्रभो ।

itaḥ paraṁ bhavatvārya cakrāyudha namo'stu te bhūtapretapiśācebhyo bhayaṁ mā bhavatu prabho

हे आर्य! इससे आगे ऐसा ही हो; हे चक्रायुध! तुम्हें नमस्कार है। हे प्रभो! भूत, प्रेत और पिशाचों से कोई भय न रहे।"

श्लोक 47 (skanda.2.24.47)

इति सम्प्रार्थितं चक्रं पद्मनाभेन योगिना । तथैवास्त्विति सम्भाष्य तस्मिंस्तीर्थे तिरोहितम् ।

iti samprārthitaṁ cakraṁ padmanābhena yoginā tathaivāstviti sambhāṣya tasmiṁstīrthe tirohitam

इस प्रकार योगी पद्मनाभ द्वारा प्रार्थना किए जाने पर, वह चक्र "ऐसा ही हो" कहकर उसी तीर्थ में अंतर्धान हो गया।

श्लोक 48 (skanda.2.24.48)

श्रीसूत उवाच । एवं वः कथितं विप्रा राक्षसस्योद्भवे मया । माहात्म्यं चक्रतीर्थस्य कथितं च मलापहम् ।

śrīsūta uvāca evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā rākṣasasyodbhave mayā māhātmyaṁ cakratīrthasya kathitaṁ ca malāpaham

श्री सूत जी ने कहा — हे विप्रो! इस प्रकार मैंने तुम्हें राक्षस की उत्पत्ति की कथा कह सुनाई, और चक्रतीर्थ का पाप-नाशक माहात्म्य भी कहा।

श्लोक 49 (skanda.2.24.49)

यच्छुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवो भुवि ।

yacchrutvā sarvapāpebhyo mucyate mānavo bhuvi

जिसे सुनकर मनुष्य इस पृथ्वी पर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।

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