वैष्णव खण्ड · अध्याय 25
जाबालितीर्थ माहात्म्य
श्लोक 1 (skanda.2.25.1)
श्रीसूत उवाच । भोभोस्तपोधनाः सर्वे नैमिषारण्यवासिनः । वेंकटाद्रौ महापुण्ये सर्वपातकनाशने ।
śrīsūta uvāca bhobhostapodhanāḥ sarve naimiṣāraṇyavāsinaḥ veṁkaṭādrau mahāpuṇye sarvapātakanāśane
श्री सूत जी ने कहा — हे नैमिषारण्य में निवास करने वाले तपोधन मुनियो! समस्त पातकों का नाश करने वाले, महापुण्यमय वेंकटाद्रि पर —
श्लोक 2 (skanda.2.25.2)
ततो जाबालितीर्थस्य माहात्म्यं वर्णयाम्यहम् । दुराचाराभिधो यत्र स्नात्वा मुक्तोऽभवद्द्विजाः ।
tato jābālitīrthasya māhātmyaṁ varṇayāmyaham durācārābhidho yatra snātvā mukto'bhavaddvijāḥ
— अब मैं जाबालितीर्थ का माहात्म्य वर्णन करता हूँ, हे द्विजो! जहाँ स्नान करके दुराचार नामक ब्राह्मण मुक्त हो गया था।
श्लोक 3 (skanda.2.25.3)
मुनय ऊचुः । दुराचाराभिधः कोऽसौ सूत तत्त्वार्थकोविद । किञ्च पापं कृतं तेन दुराचारेण वै मुने ।
munaya ūcuḥ durācārābhidhaḥ ko'sau sūta tattvārthakovida kiñca pāpaṁ kṛtaṁ tena durācāreṇa vai mune
मुनियों ने कहा — हे तत्त्वार्थ में निपुण सूत! वह दुराचार नामक कौन था? हे मुने! उस दुराचार ने कौन-सा पाप किया था?
श्लोक 4 (skanda.2.25.4)
कथं वा पातकान्मुक्तस्तीर्थेस्मिन्स्नानवैभवात् । एतच्छुश्रूषमाणानां विस्तराद्वद नो मुने ।
kathaṁ vā pātakānmuktastīrthesminsnānavaibhavāt etacchuśrūṣamāṇānāṁ vistarādvada no mune
और वह इस तीर्थ में स्नान के प्रभाव से पापों से किस प्रकार मुक्त हुआ? हे मुने! सुनने के इच्छुक हम सबको यह विस्तार से बताइए।
श्लोक 5 (skanda.2.25.5)
श्रीसूत उवाच । मुनयः श्रूयतां तस्य दुराचारस्य पातकम् । जाबालितीर्थस्नानेन यथा मुक्तश्च पातकात् ।
śrīsūta uvāca munayaḥ śrūyatāṁ tasya durācārasya pātakam jābālitīrthasnānena yathā muktaśca pātakāt
श्री सूत जी ने कहा — हे मुनियो! सुनो उस दुराचार के पाप को, और यह भी कि किस प्रकार वह जाबालितीर्थ में स्नान से पाप से मुक्त हुआ।
श्लोक 6 (skanda.2.25.6)
दुराचाराभिधो विप्रः कावेरीतीरमाश्रितः । कश्चिदास्ते द्विजः पापी क्रूरकर्मरतः सदा ।
durācārābhidho vipraḥ kāverītīramāśritaḥ kaścidāste dvijaḥ pāpī krūrakarmarataḥ sadā
कावेरी के तट का आश्रय लेने वाला दुराचार नामक एक ब्राह्मण था, जो सदा क्रूर कर्मों में लीन रहने वाला पापी था।
श्लोक 7 (skanda.2.25.7)
ब्रह्मघ्नैश्च सुरापैश्च स्तेयिभिर्गुरुतल्पगैः । सदा संसर्गदुष्टोऽसौ तैः साकं न्यवसद्द्विजाः ।
brahmaghnaiśca surāpaiśca steyibhirgurutalpagaiḥ sadā saṁsargaduṣṭo'sau taiḥ sākaṁ nyavasaddvijāḥ
हे द्विजो! वह ब्राह्मण-हत्यारों, मद्यपियों, चोरों और गुरु-पत्नीगामियों के साथ रहकर, उनकी संगति से सदा दूषित रहता था।
श्लोक 8 (skanda.2.25.8)
महापातकसंसर्गदोषेणास्य द्विजस्य वै । ब्राह्मण्यं सकलं नष्टं निःशेषेण द्विजोत्तमाः ।
mahāpātakasaṁsargadoṣeṇāsya dvijasya vai brāhmaṇyaṁ sakalaṁ naṣṭaṁ niḥśeṣeṇa dvijottamāḥ
हे श्रेष्ठ द्विजो! महापातकियों की संगति के दोष से इस ब्राह्मण की समस्त ब्राह्मणता पूर्णतः नष्ट हो गई।
श्लोक 9 (skanda.2.25.9)
महापातकिभिः सार्धं दिनमेकं तु यो द्विजः । निवसेत्सादरं तस्य तत्क्षणाद्वै द्विजन्मनः ।
mahāpātakibhiḥ sārdhaṁ dinamekaṁ tu yo dvijaḥ nivasetsādaraṁ tasya tatkṣaṇādvai dvijanmanaḥ
जो द्विज एक दिन भी आदरपूर्वक महापातकियों के साथ निवास करता है, उस द्विजजन्मा का उसी क्षण से —
श्लोक 10 (skanda.2.25.10)
ब्राह्मणस्य तु चैकांशो नश्यत्येव न संशयः । द्विदिनं सेवनात्स्पर्शाद्दर्शनाच्छयनात्तथा ।
brāhmaṇasya tu caikāṁśo naśyatyeva na saṁśayaḥ dvidinaṁ sevanātsparśāddarśanācchayanāttathā
— उसका एक अंश ब्राह्मणत्व निःसंदेह नष्ट हो जाता है; दो दिन तक सेवा, स्पर्श, दर्शन और शयन के द्वारा —
श्लोक 11 (skanda.2.25.11)
भोजनात्सह पंक्तौ च महापातकिभिर्द्विजाः । द्वितीयभागो नश्येत ब्राह्मण्यस्य न संशयः ।
bhojanātsaha paṁktau ca mahāpātakibhirdvijāḥ dvitīyabhāgo naśyeta brāhmaṇyasya na saṁśayaḥ
— और उनके साथ एक ही पंक्ति में भोजन करने से, हे द्विजो, उसके ब्राह्मणत्व का दूसरा भाग भी निःसंदेह नष्ट हो जाता है।
श्लोक 12 (skanda.2.25.12)
त्रिदिनाच्च तृतीयांशो नश्यत्येव न संशयः । चतुर्दिनाच्चतुर्थांशो विलयं याति हि धुवम् ।
tridināt ca tṛtīyāṁśo naśyatyeva na saṁśayaḥ caturdināccaturthāṁśo vilayaṁ yāti hi dhruvam
तीन दिनों तक ऐसा करने से तीसरा भाग भी निःसंदेह नष्ट हो जाता है, और चार दिनों तक करने से चौथा भाग भी निश्चित रूप से विलीन हो जाता है।
श्लोक 13 (skanda.2.25.13)
अतः परं च तैः साकं शयनासनभोजनैः । तत्तुल्यपातकी भूयान्महापातकिसंगवान् ।
ataḥ paraṁ ca taiḥ sākaṁ śayanāsanabhojanaiḥ tattulyapātakī bhūyānmahāpātakisaṁgavān
इसके आगे भी उनके साथ सोने, बैठने और भोजन करने से, महापातकियों की संगति करने वाला उन्हीं के समान महापातकी बन जाता है।
श्लोक 14 (skanda.2.25.14)
तेन ब्राह्मण्यहीनोऽयं दुराचाराभिधो द्विज । ग्रस्तोऽभवद्भीषणेन व्यालेनेव बलीयसा ।
tena brāhmaṇyahīno'yaṁ durācārābhidho dvijaḥ grasto'bhavadbhīṣaṇena vyāleneva balīyasā
इस प्रकार ब्राह्मणत्वहीन हुआ वह दुराचार नामक द्विज, मानो किसी भयंकर, बलवान सर्प द्वारा ग्रस्त हो गया।
श्लोक 15 (skanda.2.25.15)
असौ परवशस्तेन वेतालेनातिपीडितः । देशाद्देशं भ्रमन्विप्रो वनाच्चैव वनान्तरम् ।
asau paravaśastena vetālenātipīḍitaḥ deśāddeśaṁ bhramanvipro vanāccaiva vanāntaram
वह परवश होकर उस वेताल द्वारा अत्यंत पीड़ित हो गया, और वह ब्राह्मण देश-देश में तथा वन-वन में भटकने लगा।
श्लोक 16 (skanda.2.25.16)
पूर्वपुण्यविपाकेन दैवयोगेन स द्विजः । वेंकटाद्रिं महापुण्यं सर्वपातकनाशनम् ।
pūrvapuṇyavipākena daivayogena sa dvijaḥ veṁkaṭādriṁ mahāpuṇyaṁ sarvapātakanāśanam
पूर्वजन्म के पुण्य के फलस्वरूप और दैवयोग से वह ब्राह्मण, समस्त पातकों का नाश करने वाले महापुण्यमय वेंकटाद्रि की ओर —
श्लोक 17 (skanda.2.25.17)
अनुद्रुतः पिशाचेन वेतालेन द्विजो ययौ । न्यमज्जयत्स वेतालो महापातकनाशने ।
anudrutaḥ piśācena vetālena dvijo yayau nyamajjayatsa vetālo mahāpātakanāśane
— पिशाच वेताल के पीछे-पीछे भागता हुआ वह ब्राह्मण आया, और उस वेताल ने महापातकों का नाश करने वाले तीर्थ में उसे डुबो दिया।
श्लोक 18 (skanda.2.25.18)
जाबालितीर्थे विप्रेन्द्रा महापातकिसंगिनम् । उदतिष्ठत्क्षणादेव वेतालेन विमोचितः ।
jābālitīrthe viprendrā mahāpātakisaṁginam udatiṣṭhatkṣaṇādeva vetālena vimocitaḥ
हे विप्रेन्द्रो! महापातकियों की संगति करने वाला वह ब्राह्मण जाबालितीर्थ में, वेताल से मुक्त होकर, उसी क्षण उठ खड़ा हुआ।
श्लोक 19 (skanda.2.25.19)
उत्थितोऽसौ द्विजो विप्रास्तस्मात्तीर्थात्तु पावनात् । स्वस्थो व्यचिन्तयत्कोऽयं स्वर्णमुख्याः समीपतः ।
utthito'sau dvijo viprāstasmāttīrthāttu pāvanāt svastho vyacintayatko'yaṁ svarṇamukhyāḥ samīpataḥ
हे विप्रो! उस पवित्र तीर्थ से उठकर वह ब्राह्मण स्वस्थ होकर सोचने लगा — "यह क्या स्थान है, जो स्वर्णमुखी के समीप है?"
श्लोक 20 (skanda.2.25.20)
कथं मयागतमहो कावेरीतीरवासिना । इति चिन्ताकुलः सोऽयं जाबालेस्तीर्थमुत्तमम् ।
kathaṁ mayāgatamaho kāverītīravāsinā iti cintākulaḥ so'yaṁ jābālestīrthamuttamam
"अहो! कावेरी-तट का निवासी होकर भी मैं यहाँ कैसे आ गया?" — इस प्रकार चिंता से व्याकुल होकर वह जाबालि के इस उत्तम तीर्थ में —
श्लोक 21 (skanda.2.25.21)
जाबालिं च महात्मानं योगीन्द्रवरमुत्तमम् । समागम्य प्रणम्यासौ दुराचारोऽभ्यभाषत ।
jābāliṁ ca mahātmānaṁ yogīndravaramuttamam samāgamya praṇamyāsau durācāro'bhyabhāṣata
— महात्मा जाबालि से, जो योगियों में श्रेष्ठ थे, मिलकर और प्रणाम करके, वह दुराचार बोला।
श्लोक 22 (skanda.2.25.22)
न जाने भगवन्विप्र पर्वतोऽयं वदाधुना । कावेरीतीरनिलयो दुराचाराभिधो ह्यहम् ।
na jāne bhagavanvipra parvato'yaṁ vadādhunā kāverītīranilayo durācārābhidho hyaham
"हे भगवन्! हे विप्र! मैं नहीं जानता कि यह कौन-सा पर्वत है, अभी मुझे बताइए; मैं कावेरी-तट का निवासी दुराचार नामक ब्राह्मण हूँ।"
श्लोक 23 (skanda.2.25.23)
कृपया ब्रूहि मे ब्रह्मन्मयात्र कथमागतम् । इति पृष्टो मुनिस्तेन दुराचारेण सुव्रतः ।
kṛpayā brūhi me brahmanmayātra kathamāgatam iti pṛṣṭo munistena durācāreṇa suvrataḥ
"हे ब्रह्मन्! कृपया मुझे बताइए, मैं यहाँ कैसे आया।" इस प्रकार उस दुराचार द्वारा पूछे जाने पर, उस उत्तम व्रत वाले मुनि ने —
श्लोक 24 (skanda.2.25.24)
ध्यात्वा मुहुर्तमवदद्दुराचारं कृपानिधिः ।
dhyātvā muhūrtamavadaddurācāraṁ kṛpānidhiḥ
— क्षणभर ध्यान करके, वह कृपानिधि दुराचार से बोला।
श्लोक 25 (skanda.2.25.25)
जाबालिरुवाच । महापातकिसंसर्गाद्दुराचारस्य ते पुरा । ब्राह्मण्यं नष्टमभवद्वेतालस्त्वां ततोऽग्रहीत् ।
jābālir uvāca mahāpātakisaṁsargāddurācārasya te purā brāhmaṇyaṁ naṣṭamabhavadvetālastvāṁ tato'grahīt
जाबालि ने कहा — हे दुराचार! पहले महापातकियों की संगति से तुम्हारा ब्राह्मणत्व नष्ट हो गया था, इसीलिए वेताल ने तुम्हें पकड़ लिया।
श्लोक 26 (skanda.2.25.26)
तेनाविष्टस्त्वमायातो विवशोऽत्र विमूढधीः । न्यमज्जयत्त्वां वेतालस्तीर्थेऽस्मिन्नतिपावने ।
tenāviṣṭastvamāyāto vivaśo'tra vimūḍhadhīḥ nyamajjayattvāṁ vetālastīrthe'sminnatipāvane
उससे आविष्ट होकर, अपने वश में न रहते हुए, मोहित बुद्धि वाले तुम यहाँ आए; उस वेताल ने तुम्हें इस अत्यंत पवित्र तीर्थ में डुबो दिया।
श्लोक 27 (skanda.2.25.27)
अत्र मज्जनमात्रेण विमुक्तः पातकाद्भवान् । जाबालितीर्थे ये स्नानं पुण्यं कुर्वन्ति मानवाः ।
atra majjanamātreṇa vimuktaḥ pātakādbhavān jābālitīrthe ye snānaṁ puṇyaṁ kurvaṁti mānavāḥ
यहाँ केवल डुबकी लगाने मात्र से तुम पाप से मुक्त हो गए हो; जो मनुष्य जाबालितीर्थ में पुण्यमय स्नान करते हैं —
श्लोक 28 (skanda.2.25.28)
तेषां नश्यंति वै सत्यं पञ्चपातकसंचयाः । सत्कर्मसाधने पुण्यतीर्थेऽस्मिन्स्नानमात्रतः ।
teṣāṁ naśyaṁti vai satyaṁ pañcapātakasaṁcayāḥ satkarmasādhane puṇyatīrthe'sminsnānamātrataḥ
— उनके संचित पंच महापातक भी सत्य में नष्ट हो जाते हैं; सत्कर्म को सिद्ध करने वाले इस पुण्य-तीर्थ में स्नान मात्र से।
श्लोक 29 (skanda.2.25.29)
महापातकिसंसर्गदोषस्ते विलयं गतः । त्वामग्रहीद्यो वेतालः पुरायं ब्राह्मणोऽभवत् ।
mahāpātakisaṁsargadoṣaste vilayaṁ gataḥ tvāmagrahīdyo vetālaḥ purāyaṁ brāhmaṇo'bhavat
तुम्हारा महापातकियों की संगति का दोष नष्ट हो गया है; जिस वेताल ने तुम्हें पकड़ा था, वह पहले एक ब्राह्मण था।
श्लोक 30 (skanda.2.25.30)
मृतेऽहनि पितृश्राद्धं नाकरोत्पार्वणेन वै । तेन स्वपितृभिः शप्तो वेतालत्वमगादयम् ।
mṛte'hani pitṛśrāddhaṁ nākarotpārvaṇena vai tena svapitṛbhiḥ śapto vetālatvamagādayam
उसने अपने पिता की मृत्यु के दिन पार्वण श्राद्ध नहीं किया था; इसलिए अपने ही पितरों द्वारा शापित होकर वह वेताल-योनि को प्राप्त हुआ।
श्लोक 31 (skanda.2.25.31)
सोऽपि जाबालितीर्थस्य जले स्नानप्रभावतः । वेतालत्वं विहायैव विष्णुलोकमवाप्तवान् ।
so'pi jābālitīrthasya jale snānaprabhāvataḥ vetālatvaṁ vihāyaiva viṣṇulokamavāptavān
वह भी जाबालितीर्थ के जल में स्नान के प्रभाव से, वेताल-योनि का त्याग कर विष्णुलोक को प्राप्त हुआ।
श्लोक 32 (skanda.2.25.32)
न कुर्याद्यो नरः श्राद्धं मातापित्रोर्मृतेऽहनि । वेतालत्वमवाप्याशु पश्चान्नरकमश्नुते ।
na kuryādyo naraḥ śrāddhaṁ mātāpitrormṛte'hani vetālatvamavāpyāśu paścānnarakamaśnute
जो मनुष्य माता-पिता की मृत्यु के दिन श्राद्ध नहीं करता, वह शीघ्र वेताल-योनि को प्राप्त होकर बाद में नरक भोगता है।
श्लोक 33 (skanda.2.25.33)
श्रीसूत उवाच । दुराचारो महापापी तीर्थेऽस्मित्स्नानमात्रतः । प्राप्तवान्विष्णुलोकं वै पुनरावृत्तिवर्जितम् ।
śrīsūta uvāca durācāro mahāpāpī tīrthe'smitsnānamātrataḥ prāptavānviṣṇulokaṁ vai punarāvṛttivarjitam
श्री सूत जी ने कहा — वह महापापी दुराचार, इस तीर्थ में स्नान मात्र से, विष्णुलोक को प्राप्त हुआ, जहाँ से पुनरावृत्ति नहीं होती।
श्लोक 34 (skanda.2.25.34)
एवं वः कथितं पुण्यं दुराचारविमोक्षणम् । तस्मात्पुण्यतमं तीर्थं सर्वपापहरं शुभम् ।
evaṁ vaḥ kathitaṁ puṇyaṁ durācāravimokṣaṇam tasmātpuṇyatamaṁ tīrthaṁ sarvapāpaharaṁ śubham
इस प्रकार मैंने तुम्हें दुराचार की मुक्ति की यह पुण्यमय कथा सुनाई; इसलिए यह तीर्थ सबसे पुण्यमय, समस्त पापों को हरने वाला और शुभ है।
श्लोक 35 (skanda.2.25.35)
यत्र हि स्नानमात्रेण दुराचारो विमोचितः । यानि निष्कृतिहीनानि पापान्यपि विनाशयेत् ।
yatra hi snānamātreṇa durācāro vimocitaḥ yāni niṣkṛtihīnāni pāpānyapi vināśayet
जहाँ मात्र स्नान से दुराचार मुक्त हो गया, यह तीर्थ उन पापों को भी नष्ट कर देता है जिनका कोई प्रायश्चित नहीं है।
श्लोक 36 (skanda.2.25.36)
शूद्रेण पूजितं लिङ्गं विष्णुं वा यो नमेद्द्विजः । प्रायश्चित्तं न स्मृतिषु तस्योक्तं परमर्षिभिः ।
śūdreṇa pūjitaṁ liṅgaṁ viṣṇuṁ vā yo nameddvijaḥ prāyaścittaṁ na smṛtiṣu tasyoktaṁ paramarṣibhiḥ
जो द्विज शूद्र द्वारा पूजित लिंग या विष्णु को नमस्कार करता है, उसके लिए स्मृतियों में महर्षियों द्वारा कोई प्रायश्चित नहीं बताया गया है।
श्लोक 37 (skanda.2.25.37)
नश्येत्तस्यापि तत्पापं तीर्थे जाबालिसंज्ञके । विप्रनिन्दाकृतां चैव प्रायश्चित्तं न विद्यते ।
naśyettasyāpi tatpāpaṁ tīrthe jābālisaṁjñake vipranindākṛtāṁ caiva prāyaścittaṁ na vidyate
उसका भी वह पाप जाबालि नामक तीर्थ में नष्ट हो जाता है; और ब्राह्मणों की निन्दा करने वालों के लिए भी कोई प्रायश्चित नहीं है।
श्लोक 38 (skanda.2.25.38)
विश्वासघातुकानां च कृतघ्नानां च निष्कृतिः । भ्रातृभार्यारतानां च प्रायश्चित्तं न विद्यते ।
viśvāsaghātukānāṁ ca kṛtaghnānāṁ ca niṣkṛtiḥ bhrātṛbhāryārtānāṁ ca prāyaścittaṁ na vidyate
— विश्वासघातियों और कृतघ्नों के लिए भी कोई निवारण नहीं है, और भाई की पत्नी में आसक्त रहने वालों के लिए भी कोई प्रायश्चित नहीं है।
श्लोक 39 (skanda.2.25.39)
तेषां जाबालितीर्थे वै स्नानाच्छुद्धिर्भविष्यति । एवं वः कथितं विप्रा जाबालेस्तीर्थवैभवम् ।
teṣāṁ jābālitīrthe vai snānācchuddhirbhaviṣyati evaṁ vaḥ kathitaṁ viprā jābālestīrthavaibhavam
उन सबकी शुद्धि केवल जाबालितीर्थ में स्नान से ही होगी। इस प्रकार, हे विप्रो, मैंने तुम्हें जाबालि तीर्थ के वैभव की यह कथा सुनाई।
श्लोक 40 (skanda.2.25.40)
यच्छ्रुत्वा सर्वपापेभ्यो मुच्यते मानवो भुवि ।
yacchrutvā sarvapāpebhyo mucyate mānavo bhuvi
जिसे सुनकर मनुष्य इस पृथ्वी पर समस्त पापों से मुक्त हो जाता है।